{"id":"4.1","title":"चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1","part":"चतुर्थ स्कन्ध","heading":"अथ प्रथमोऽध्यायः","topics":["स्वायम्भुव-मनुकी कन्याओंके वंशका वर्णन"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[404,411]},"verses":[{"id":"4.1.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/1/","page":405,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्‍च जज्ञिरे।","आकूतिर्देवहूतिश्‍च प्रसूतिरिति विश्रुताः॥ १"],"iast":["manostu śatarūpāyāṃ tisraḥ kanyāśca jajñire|","ākūtirdevahūtiśca prasūtiriti viśrutāḥ|| 1"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! स्वायम्भुव मनुके महारानी शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद—इन दो पुत्रोंके सिवा तीन कन्याएँ भी हुई थीं; वे आकूति, देवहूति और प्रसूति नामसे विख्यात थीं॥ १॥"},{"id":"4.1.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/2/","page":405,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["आकूतिं रुचये प्रादादपि भ्रातृमतीं नृपः।","पुत्रिकाधर्ममाश्रित्य शतरूपानुमोदितः॥ २"],"iast":["ākūtiṃ rucaye prādādapi bhrātṛmatīṃ nṛpaḥ|","putrikādharmamāśritya śatarūpānumoditaḥ|| 2"],"meaning":"आकूतिका, यद्यपि उसके भाई थे तो भी, महारानी शतरूपाकी अनुमतिसे उन्होंने रुचि प्रजापतिके साथ ‘पुत्रिकाधर्म’-के अनुसार विवाह किया॥ २॥"},{"id":"4.1.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/3/","page":405,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्रजापतिः स भगवान् रुचिस्तस्यामजीजनत्।","मिथुनं ब्रह्मवर्चस्वी परमेण समाधिना॥ ३"],"iast":["prajāpatiḥ sa bhagavān rucistasyāmajījanat|","mithunaṃ brahmavarcasvī parameṇa samādhinā|| 3"],"meaning":"प्रजापति रुचि भगवान्‌के अनन्य चिन्तनके कारण ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न थे। उन्होंने आकूतिके गर्भसे एक पुरुष और स्त्रीका जोड़ा उत्पन्‍न किया॥ ३॥"},{"id":"4.1.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/4/","page":405,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["यस्तयोः पुरुषः साक्षाद्विष्णुर्यज्ञस्वरूपधृक्।","या स्त्री सा दक्षिणा भूतेरंशभूतानपायिनी॥ ४"],"iast":["yastayoḥ puruṣaḥ sākṣādviṣṇuryajñasvarūpadhṛk|","yā strī sā dakṣiṇā bhūteraṃśabhūtānapāyinī|| 4"],"meaning":"उनमें जो पुरुष था, वह साक्षात् यज्ञस्वरूपधारी भगवान् विष्णु थे और जो स्त्री थी, वह भगवान्‌से कभी अलग न रहनेवाली लक्ष्मीजीकी अंशस्वरूपा ‘दक्षिणा’ थी॥ ४॥"},{"id":"4.1.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/5/","page":405,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["आनिन्ये स्वगृहं पुत्र्याः पुत्रं विततरोचिषम्।","स्वायम्भुवो मुदा युक्तो रुचिर्जग्राह दक्षिणाम्॥ ५"],"iast":["āninye svagṛhaṃ putryāḥ putraṃ vitatarociṣam|","svāyambhuvo mudā yukto rucirjagrāha dakṣiṇām|| 5"],"meaning":"मनुजी अपनी पुत्री आकूतिके उस परमतेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्‍नतासे अपने घर ले आये और दक्षिणाको रुचि प्रजापतिने अपने पास रखा॥ ५॥"},{"id":"4.1.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/6/","page":405,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तां कामयानां भगवानुवाह यजुषां पतिः।","तुष्टायां तोषमापन्‍नोऽजनयद् द्वादशात्मजान्॥ ६"],"iast":["tāṃ kāmayānāṃ bhagavānuvāha yajuṣāṃ patiḥ|","tuṣṭāyāṃ toṣamāpanno'janayad dvādaśātmajān|| 6"],"meaning":"जब दक्षिणा विवाहके योग्य हुई तो उसने यज्ञभगवान्‌को ही पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की, तब भगवान् यज्ञपुरुषने उससे विवाह किया। इससे दक्षिणाको बड़ा सन्तोष हुआ। भगवान्‌ने प्रसन्‍न होकर उससे बारह पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ६॥"},{"id":"4.1.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/7/","page":405,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तोषः प्रतोषः सन्तोषो भद्रः शान्तिरिडस्पतिः।","इध्मः कविर्विभुः स्वह्नः सुदेवो रोचनो द्विषट्॥ ७"],"iast":["toṣaḥ pratoṣaḥ santoṣo bhadraḥ śāntiriḍaspatiḥ|","idhmaḥ kavirvibhuḥ svahnaḥ sudevo rocano dviṣaṭ|| 7"],"meaning":"उनके नाम हैं—तोष, प्रतोष, सन्तोष, भद्र, शान्ति, इडस्पति, इध्म, कवि, विभु, स्वह्न, सुदेव और रोचन॥ ७॥"},{"id":"4.1.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/8/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तुषिता नाम ते देवा आसन् स्वायम्भुवान्तरे।","मरीचिमिश्रा ऋषयो यज्ञः सुरगणेश्‍वरः॥ ८"],"iast":["tuṣitā nāma te devā āsan svāyambhuvāntare|","marīcimiśrā ṛṣayo yajñaḥ suragaṇeśvaraḥ|| 8"],"meaning":"ये ही स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ‘तुषित’ नामके देवता हुए। उस मन्वन्तरमें मरीचि आदि सप्तर्षि थे, भगवान् यज्ञ ही देवताओंके अधीश्‍वर इन्द्र थे और महान् प्रभावशाली प्रियव्रत एवं उत्तानपाद मनुपुत्र थे। वह मन्वन्तर उन्हीं दोनोंके बेटों, पोतों और दौहित्रोंके वंशसे छा गया॥ ८-९॥","meaning_covers":[8,9]},{"id":"4.1.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/9/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुपुत्रौ महौजसौ।","तत्पुत्रपौत्रनप्तॄणामनुवृत्तं तदन्तरम्॥ ९"],"iast":["priyavratottānapādau manuputrau mahaujasau|","tatputrapautranaptṝṇāmanuvṛttaṃ tadantaram|| 9"],"meaning":"ये ही स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ‘तुषित’ नामके देवता हुए। उस मन्वन्तरमें मरीचि आदि सप्तर्षि थे, भगवान् यज्ञ ही देवताओंके अधीश्‍वर इन्द्र थे और महान् प्रभावशाली प्रियव्रत एवं उत्तानपाद मनुपुत्र थे। वह मन्वन्तर उन्हीं दोनोंके बेटों, पोतों और दौहित्रोंके वंशसे छा गया॥ ८-९॥","meaning_covers":[8,9]},{"id":"4.1.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/10/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["देवहूतिमदात्तात कर्दमायात्मजां मनुः।","तत्सम्बन्धि श्रुतप्रायं भवता गदतो मम॥ १०"],"iast":["devahūtimadāttāta kardamāyātmajāṃ manuḥ|","tatsambandhi śrutaprāyaṃ bhavatā gadato mama|| 10"],"meaning":"प्यारे विदुरजी! मनुजीने अपनी दूसरी कन्या देवहूति कर्दमजीको ब्याही थी। उसके सम्बन्धकी प्रायः सभी बातें तुम मुझसे सुन चुके हो॥ १०॥"},{"id":"4.1.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/11/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["दक्षाय ब्रह्मपुत्राय प्रसूतिं भगवान्मनुः।","प्रायच्छद्यत्कृतः सर्गस्त्रिलोक्यां विततो महान्॥ ११"],"iast":["dakṣāya brahmaputrāya prasūtiṃ bhagavānmanuḥ|","prāyacchadyatkṛtaḥ sargastrilokyāṃ vitato mahān|| 11"],"meaning":"भगवान् मनुने अपनी तीसरी कन्या प्रसूतिका विवाह ब्रह्माजीके पुत्र दक्षप्रजापतिसे किया था; उसकी विशाल वंशपरम्परा तो सारी त्रिलोकीमें फैली हुई है॥ ११॥"},{"id":"4.1.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/12/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["याः कर्दमसुताः प्रोक्ता नव ब्रह्मर्षिपत्नयः।","तासां प्रसूतिप्रसवं प्रोच्यमानं निबोध मे॥ १२"],"iast":["yāḥ kardamasutāḥ proktā nava brahmarṣipatnayaḥ|","tāsāṃ prasūtiprasavaṃ procyamānaṃ nibodha me|| 12"],"meaning":"मैं कर्दमजीकी नौ कन्याओंका, जो नौ ब्रह्मर्षियोंसे ब्याही गयी थीं, पहले ही वर्णन कर चुका हूँ। अब उनकी वंशपरम्पराका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ १२॥"},{"id":"4.1.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/13/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["पत्नी मरीचेस्तु कला सुषुवे कर्दमात्मजा।","कश्यपं पूर्णिमानं च ययोरापूरितं जगत्॥ १३"],"iast":["patnī marīcestu kalā suṣuve kardamātmajā|","kaśyapaṃ pūrṇimānaṃ ca yayorāpūritaṃ jagat|| 13"],"meaning":"मरीचि ऋषिकी पत्‍नी कर्दमजीकी बेटी कलासे कश्यप और पूर्णिमा नामक दो पुत्र हुए, जिनके वंशसे यह सारा जगत् भरा हुआ है॥ १३॥"},{"id":"4.1.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/14/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["पूर्णिमासूत विरजं विश्‍वगं च परंतप।","देवकुल्यां हरेः पादशौचाद्याभूत्सरिद्दिवः॥ १४"],"iast":["pūrṇimāsūta virajaṃ viśvagaṃ ca paraṃtapa|","devakulyāṃ hareḥ pādaśaucādyābhūtsariddivaḥ|| 14"],"meaning":"शत्रुतापन विदुरजी! पूर्णिमाके विरज और विश्‍वग नामके दो पुत्र तथा देवकुल्या नामकी एक कन्या हुई। यही दूसरे जन्ममें श्रीहरिके चरणोंके धोवनसे देवनदी गंगाके रूपमें प्रकट हुई॥ १४॥"},{"id":"4.1.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/15/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अत्रेः पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशसः सुतान्।","दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्॥ १५"],"iast":["atreḥ patnyanasūyā trīñjajñe suyaśasaḥ sutān|","dattaṃ durvāsasaṃ somamātmeśabrahmasambhavān|| 15"],"meaning":"अत्रिकी पत्‍नी अनसूयासे दत्तात्रेय, दुर्वासा और चन्द्रमा नामके तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमशः भगवान् विष्णु, शंकर और ब्रह्माके अंशसे उत्पन्‍न हुए थे॥ १५॥"},{"id":"4.1.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/16/","page":406,"speaker":"विदुर उवाच","sanskrit":["अत्रेर्गृहे सुरश्रेष्ठाः स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः।","किञ्चिच्चिकीर्षवो जाता एतदाख्याहि मे गुरो॥ १६"],"iast":["atrergṛhe suraśreṣṭhāḥ sthityutpattyantahetavaḥ|","kiñciccikīrṣavo jātā etadākhyāhi me guro|| 16"],"meaning":"विदुरजीने पूछा—गुरुजी! कृपया यह बतलाइये कि जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करनेवाले इन सर्वश्रेष्ठ देवोंने अत्रि मुनिके यहाँ क्या करनेकी इच्छासे अवतार लिया था?॥ १६॥"},{"id":"4.1.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/17/","page":406,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["ब्रह्मणा नोदितः सृष्टावत्रिर्ब्रह्मविदां वरः।","सह पत्न्या ययावृक्षं कुलाद्रिं तपसि स्थितः॥ १७"],"iast":["brahmaṇā noditaḥ sṛṣṭāvatrirbrahmavidāṃ varaḥ|","saha patnyā yayāvṛkṣaṃ kulādriṃ tapasi sthitaḥ|| 17"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजीने कहा—जब ब्रह्माजीने ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महर्षि अत्रिको सृष्टि रचनेके लिये आज्ञा दी, तब वे अपनी सहधर्मिणीके सहित तप करनेके लिये ऋक्षनामक कुलपर्वतपर गये॥ १७॥"},{"id":"4.1.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/18/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तस्मिन् प्रसूनस्तबकपलाशाशोककानने।","वार्भिःस्रवद्भिरुद्घुष्टे निर्विन्ध्यायाः समन्ततः॥ १८"],"iast":["tasmin prasūnastabakapalāśāśokakānane|","vārbhiḥsravadbhirudghuṣṭe nirvindhyāyāḥ samantataḥ|| 18"],"meaning":"वहाँ पलाश और अशोकके वृक्षोंका एक विशाल वन था। उसके सभी वृक्ष फूलोंके गुच्छोंसे लदे थे तथा उसमें सब ओर निर्विन्ध्या नदीके जलकी कलकल ध्वनि गूँजती रहती थी॥ १८॥"},{"id":"4.1.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/19/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्राणायामेन संयम्य मनो वर्षशतं मुनिः।","अतिष्ठदेकपादेन निर्द्वन्द्वोऽनिलभोजनः॥ १९"],"iast":["prāṇāyāmena saṃyamya mano varṣaśataṃ muniḥ|","atiṣṭhadekapādena nirdvandvo'nilabhojanaḥ|| 19"],"meaning":"उस वनमें वे मुनिश्रेष्ठ प्राणायामके द्वारा चित्तको वशमें करके सौ वर्षतक केवल वायु पीकर सर्दी-गरमी आदि द्वन्द्वोंकी कुछ भी परवा न कर एक ही पैरसे खड़े रहे॥ १९॥"},{"id":"4.1.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/20/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्‍वरः।","प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन्॥ २०"],"iast":["śaraṇaṃ taṃ prapadye'haṃ ya eva jagadīśvaraḥ|","prajāmātmasamāṃ mahyaṃ prayacchatviti cintayan|| 20"],"meaning":"उस समय वे मन-ही-मन यही प्रार्थना करते थे कि ‘जो कोई सम्पूर्ण जगत‍्के ईश्‍वर हैं, मैं उनकी शरणमें हूँ; वे मुझे अपने ही समान सन्तान प्रदान करें’॥ २०॥"},{"id":"4.1.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/21/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधसाग्‍निना।","निर्गतेन मुनेर्मूर्ध्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः॥ २१"],"iast":["tapyamānaṃ tribhuvanaṃ prāṇāyāmaidhasāgninā|","nirgatena munermūrdhnaḥ samīkṣya prabhavastrayaḥ|| 21"],"meaning":"तब यह देखकर कि प्राणायामरूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ अत्रि मुनिका तेज उनके मस्तकसे निकलकर तीनों लोकोंको तपा रहा है—ब्रह्मा, विष्णु और महादेव—तीनों जगत्पति उनके आश्रमपर आये। उस समय अप्सरा, मुनि, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और नाग—उनका सुयश गा रहे थे॥ २१-२२॥","meaning_covers":[21,22]},{"id":"4.1.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/22/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।","वितायमानयशसस्तदाश्रमपदं ययुः॥ २२"],"iast":["apsaromunigandharvasiddhavidyādharoragaiḥ |","vitāyamānayaśasastadāśramapadaṃ yayuḥ|| 22"],"meaning":"तब यह देखकर कि प्राणायामरूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ अत्रि मुनिका तेज उनके मस्तकसे निकलकर तीनों लोकोंको तपा रहा है—ब्रह्मा, विष्णु और महादेव—तीनों जगत्पति उनके आश्रमपर आये। उस समय अप्सरा, मुनि, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और नाग—उनका सुयश गा रहे थे॥ २१-२२॥","meaning_covers":[21,22]},{"id":"4.1.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/23/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तत्प्रादुर्भावसंयोगविद्योतितमना मुनिः।","उत्तिष्ठन्‍नेकपादेन ददर्श विबुधर्षभान्॥ २३"],"iast":["tatprādurbhāvasaṃyogavidyotitamanā muniḥ|","uttiṣṭhannekapādena dadarśa vibudharṣabhān|| 23"],"meaning":"उन तीनोंका एक ही साथ प्रादुर्भाव होनेसे अत्रि मुनिका अन्तःकरण प्रकाशित हो उठा। उन्होंने एक पैरसे खड़े-खड़े ही उन देवदेवोंको देखा और फिर पृथ्वीपर दण्डके समान लोटकर प्रणाम करनेके अनन्तर अर्घ्य-पुष्पादि पूजनकी सामग्री हाथमें ले उनकी पूजा की। वे तीनों अपने-अपने वाहन—हंस, गरुड और बैलपर चढ़े हुए तथा अपने कमण्डलु, चक्र, त्रिशूलादि चिह्नोंसे सुशोभित थे॥ २३-२४॥","meaning_covers":[23,24]},{"id":"4.1.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/24/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्रणम्य दण्डवद‍्भूमावुपतस्थेऽर्हणाञ्जलिः।","वृषहंससुपर्णस्थान् स्वैः स्वैश्चिह्नैश्‍च चिह्नितान्॥ २४"],"iast":["praṇamya daṇḍavadbhūmāvupatasthe'rhaṇāñjaliḥ|","vṛṣahaṃsasuparṇasthān svaiḥ svaiścihnaiśca cihnitān|| 24"],"meaning":"उन तीनोंका एक ही साथ प्रादुर्भाव होनेसे अत्रि मुनिका अन्तःकरण प्रकाशित हो उठा। उन्होंने एक पैरसे खड़े-खड़े ही उन देवदेवोंको देखा और फिर पृथ्वीपर दण्डके समान लोटकर प्रणाम करनेके अनन्तर अर्घ्य-पुष्पादि पूजनकी सामग्री हाथमें ले उनकी पूजा की। वे तीनों अपने-अपने वाहन—हंस, गरुड और बैलपर चढ़े हुए तथा अपने कमण्डलु, चक्र, त्रिशूलादि चिह्नोंसे सुशोभित थे॥ २३-२४॥","meaning_covers":[23,24]},{"id":"4.1.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/25/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["कृपावलोकेन हसद्वदनेनोपलम्भितान्।","तद्रोचिषा प्रतिहते निमील्य मुनिरक्षिणी॥ २५"],"iast":["kṛpāvalokena hasadvadanenopalambhitān|","tadrociṣā pratihate nimīlya munirakṣiṇī|| 25"],"meaning":"उनकी आँखोंसे कृपाकी वर्षा हो रही थी। उनके मुखपर मन्द हास्यकी रेखा थी—जिससे उनकी प्रसन्‍नता झलक रही थी। उनके तेजसे चौंधियाकर मुनिवरने अपनी आँखें मूँद लीं॥ २५॥"},{"id":"4.1.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/26/","page":407,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["चेतस्तत्प्रवणं युञ्जन्‍नस्तावीत्संहताञ्जलिः।","श्लक्ष्णया सूक्तया वाचा सर्वलोकगरीयसः॥ २६"],"iast":["cetastatpravaṇaṃ yuñjannastāvītsaṃhatāñjaliḥ|","ślakṣṇayā sūktayā vācā sarvalokagarīyasaḥ|| 26"],"meaning":"वे चित्तको उन्हींकी ओर लगाकर हाथ जोड़ अति मधुर और सुन्दर भावपूर्ण वचनोंमें लोकमें सबसे बड़े उन तीनों देवोंकी स्तुति करने लगे॥ २६॥"},{"id":"4.1.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/27/","page":407,"speaker":"अत्रिरुवाच","sanskrit":["विश्वोद्भवस्थितिलयेषु विभज्यमानै-","र्मायागुणैरनुयुगं विगृहीतदेहाः।","ते ब्रह्मविष्णुगिरिशाः प्रणतोऽस्म्यहं व-","स्तेभ्यः क एव भवतां म इहोपहूतः॥ २७"],"iast":["viśvodbhavasthitilayeṣu vibhajyamānai-","rmāyāguṇairanuyugaṃ vigṛhītadehāḥ|","te brahmaviṣṇugiriśāḥ praṇato'smyahaṃ va-","stebhyaḥ ka eva bhavatāṃ ma ihopahūtaḥ|| 27"],"meaning":"अत्रि मुनिने कहा—भगवन्! प्रत्येक कल्पके आरम्भमें जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके लिये जो मायाके सत्त्वादि तीनों गुणोंका विभाग करके भिन्‍न-भिन्‍न शरीर धारण करते हैं—वे ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आप ही हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ। कहिये—मैंने जिनको बुलाया था, आपमेंसे वे कौन महानुभाव हैं?॥ २७॥"},{"id":"4.1.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/28/","page":408,"speaker":"अत्रिरुवाच","sanskrit":["एको मयेह भगवान् विबुधप्रधान-","श्चित्तीकृतः प्रजननाय कथं नु यूयम्।","अत्रागतास्तनुभृतां मनसोऽपि दूरा","ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे॥ २८"],"iast":["eko mayeha bhagavān vibudhapradhāna-","ścittīkṛtaḥ prajananāya kathaṃ nu yūyam|","atrāgatāstanubhṛtāṃ manaso'pi dūrā","brūta prasīdata mahāniha vismayo me|| 28"],"meaning":"क्योंकि मैंने तो सन्तानप्राप्तिकी इच्छासे केवल एक सुरेश्‍वर भगवान्‌का ही चिन्तन किया था। फिर आप तीनोंने यहाँ पधारनेकी कृपा कैसे की? आप-लोगोंतक तो देहधारियोंके मनकी भी गति नहीं है, इसलिये मुझे बड़ा आश्‍चर्य हो रहा है। आपलोग कृपा करके मुझे इसका रहस्य बतलाइये॥ २८॥"},{"id":"4.1.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/29/","page":408,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इति तस्य वचः श्रुत्वा त्रयस्ते विबुधर्षभाः।","प्रत्याहुः श्लक्ष्णया वाचा प्रहस्य तमृषिं प्रभो॥ २९"],"iast":["iti tasya vacaḥ śrutvā trayaste vibudharṣabhāḥ|","pratyāhuḥ ślakṣṇayā vācā prahasya tamṛṣiṃ prabho|| 29"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—समर्थ विदुरजी! अत्रि मुनिके वचन सुनकर वे तीनों देव हँसे और उनसे सुमधुर वाणीमें कहने लगे॥ २९॥"},{"id":"4.1.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/30/","page":408,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["यथा कृतस्ते सङ्कल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा।","सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम्॥ ३०"],"iast":["yathā kṛtaste saṅkalpo bhāvyaṃ tenaiva nānyathā|","satsaṅkalpasya te brahman yadvai dhyāyati te vayam|| 30"],"meaning":"देवताओंने कहा—ब्रह्मन्! तुम सत्यसंकल्प हो। अतः तुमने जैसा संकल्प किया था, वही होना चाहिये। उससे विपरीत कैसे हो सकता था? तुम जिस ‘जगदीश्‍वर’ का ध्यान करते थे, वह हम तीनों ही हैं॥ ३०॥"},{"id":"4.1.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/31/","page":408,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुताः।","भवितारोऽङ्ग भद्रं ते विस्रप्स्यन्ति च ते यशः॥ ३१"],"iast":["athāsmadaṃśabhūtāste ātmajā lokaviśrutāḥ|","bhavitāro'ṅga bhadraṃ te visrapsyanti ca te yaśaḥ|| 31"],"meaning":"प्रिय महर्षे! तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे यहाँ हमारे ही अंशस्वरूप तीन जगद्विख्यात पुत्र उत्पन्‍न होंगे और तुम्हारे सुन्दर यशका विस्तार करेंगे॥ ३१॥"},{"id":"4.1.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/32/","page":408,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["एवं कामवरं दत्त्वा प्रतिजग्मुः सुरेश्‍वराः।","सभाजितास्तयोः सम्यग्दम्पत्योर्मिषतोस्ततः॥ ३२"],"iast":["evaṃ kāmavaraṃ dattvā pratijagmuḥ sureśvarāḥ|","sabhājitāstayoḥ samyagdampatyormiṣatostataḥ|| 32"],"meaning":"उन्हें इस प्रकार अभीष्ट वर देकर तथा पति-पत्नी दोनोंसे भलीभाँति पूजित होकर उनके देखते-ही-देखते वे तीनों सुरेश्‍वर अपने-अपने लोकोंको चले गये॥ ३२॥"},{"id":"4.1.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/33/","page":408,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["सोमोऽभूद्ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित्।","दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः॥ ३३"],"iast":["somo'bhūdbrahmaṇoṃ'śena datto viṣṇostu yogavit|","durvāsāḥ śaṅkarasyāṃśo nibodhāṅgirasaḥ prajāḥ|| 33"],"meaning":"ब्रह्माजीके अंशसे चन्द्रमा, विष्णुके अंशसे योगवेत्ता दत्तात्रेयजी और महादेवजीके अंशसे दुर्वासा ऋषि अत्रिके पुत्ररूपमें प्रकट हुए। अब अंगिरा ऋषिकी सन्तानोंका वर्णन सुनो॥ ३३॥"},{"id":"4.1.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/34/","page":408,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["श्रद्धा त्वङ्गिरसः पत्‍नी चतस्रोऽसूत कन्यकाः।","सिनीवाली कुहू राका चतुर्थ्यनुमतिस्तथा॥ ३४"],"iast":["śraddhā tvaṅgirasaḥ patnī catasro'sūta kanyakāḥ|","sinīvālī kuhū rākā caturthyanumatistathā|| 34"],"meaning":"अंगिराकी पत्‍नी श्रद्धाने सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति—इन चार कन्याओंको जन्म दिया॥ ३४॥"},{"id":"4.1.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/35/","page":408,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["तत्पुत्रावपरावास्तां ख्यातौ स्वारोचिषेऽन्तरे।","उतथ्यो भगवान् साक्षाद्ब्रह्मिष्ठश्‍च बृहस्पतिः॥ ३५"],"iast":["tatputrāvaparāvāstāṃ khyātau svārociṣe'ntare|","utathyo bhagavān sākṣādbrahmiṣṭhaśca bṛhaspatiḥ|| 35"],"meaning":"इनके सिवा उनके साक्षात् भगवान् उतथ्यजी और ब्रह्मनिष्ठ बृहस्पतिजी—ये दो पुत्र भी हुए, जो स्वारोचिष मन्वन्तरमें विख्यात हुए॥ ३५॥"},{"id":"4.1.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/36/","page":408,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["पुलस्त्योऽजनयत्पत्न्यामगस्त्यं च हविर्भुवि।","सोऽन्यजन्मनि दह्राग्‍निर्विश्रवाश्‍च महातपाः॥ ३६"],"iast":["pulastyo'janayatpatnyāmagastyaṃ ca havirbhuvi|","so'nyajanmani dahrāgnirviśravāśca mahātapāḥ|| 36"],"meaning":"पुलस्त्यजीके उनकी पत्‍नी हविर्भूसे महर्षि अगस्त्य और महातपस्वी विश्रवा—ये दो पुत्र हुए। इनमें अगस्त्यजी दूसरे जन्ममें जठराग्‍नि हुए॥ ३६॥"},{"id":"4.1.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/37/","page":408,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["तस्य यक्षपतिर्देवः कुबेरस्त्विडविडासुतः।","रावणः कुम्भकर्णश्‍च तथान्यस्यां विभीषणः॥ ३७"],"iast":["tasya yakṣapatirdevaḥ kuberastviḍaviḍāsutaḥ|","rāvaṇaḥ kumbhakarṇaśca tathānyasyāṃ vibhīṣaṇaḥ|| 37"],"meaning":"विश्रवा मुनिके इडविडाके गर्भसे यक्षराज कुबेरका जन्म हुआ और उनकी दूसरी पत्‍नी केशिनीसे रावण, कुम्भकर्ण एवं विभीषण उत्पन्‍न हुए॥ ३७॥"},{"id":"4.1.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/38/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["पुलहस्य गतिर्भार्या त्रीनसूत सती सुतान्।","कर्मश्रेष्ठं वरीयांसं सहिष्णुं च महामते॥ ३८"],"iast":["pulahasya gatirbhāryā trīnasūta satī sutān|","karmaśreṣṭhaṃ varīyāṃsaṃ sahiṣṇuṃ ca mahāmate|| 38"],"meaning":"महामते! महर्षि पुलहकी स्त्री परम साध्वी गतिसे कर्मश्रेष्ठ, वरीयान् और सहिष्णु—ये तीन पुत्र उत्पन्‍न हुए॥ ३८॥"},{"id":"4.1.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/39/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["क्रतोरपि क्रिया भार्या वालखिल्यानसूयत।","ऋषीन्षष्टिसहस्राणि ज्वलतो ब्रह्मतेजसा॥ ३९"],"iast":["kratorapi kriyā bhāryā vālakhilyānasūyata|","ṛṣīnṣaṣṭisahasrāṇi jvalato brahmatejasā|| 39"],"meaning":"इसी प्रकार क्रतुकी पत्‍नी क्रियाने ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान बालखिल्यादि साठ हजार ऋषियोंको जन्म दिया॥ ३९॥"},{"id":"4.1.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/40/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["ऊर्जायां जज्ञिरे पुत्रा वसिष्ठस्य परंतप।","चित्रकेतुप्रधानास्ते सप्त ब्रह्मर्षयोऽमलाः॥ ४०"],"iast":["ūrjāyāṃ jajñire putrā vasiṣṭhasya paraṃtapa|","citraketupradhānāste sapta brahmarṣayo'malāḥ|| 40"],"meaning":"शत्रुतापन विदुरजी! वसिष्ठजीकी पत्‍नी ऊर्जा (अरुन्धती)-से चित्रकेतु आदि सात विशुद्धचित्त ब्रह्मर्षियोंका जन्म हुआ॥ ४०॥"},{"id":"4.1.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/41/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["चित्रकेतुः सुरोचिश्‍च विरजा मित्र एव च।","उल्बणो वसुभृद्यानो द्युमान् शक्‍त्यादयोऽपरे॥ ४१"],"iast":["citraketuḥ surociśca virajā mitra eva ca|","ulbaṇo vasubhṛdyāno dyumān śaktyādayo'pare|| 41"],"meaning":"उनके नाम चित्रकेतु, सुरोचि, विरजा, मित्र, उल्बण, वसुभृद्यान और द्युमान् थे। इनके सिवा उनकी दूसरी पत्नीसे शक्ति आदि और भी कई पुत्र हुए॥ ४१॥"},{"id":"4.1.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/42/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["चित्तिस्त्वथर्वणः पत्‍नी लेभे पुत्रं धृतव्रतम्।","दध्यञ्चमश्‍वशिरसं भृगोर्वंशं निबोध मे॥ ४२"],"iast":["cittistvatharvaṇaḥ patnī lebhe putraṃ dhṛtavratam|","dadhyañcamaśvaśirasaṃ bhṛgorvaṃśaṃ nibodha me|| 42"],"meaning":"अथर्वा मुनिकी पत्‍नी चित्तिने दध्यङ् (दधीचि) नामक एक तपोनिष्ठ पुत्र प्राप्त किया, जिसका दूसरा नाम अश्‍वशिरा भी था। अब भृगुके वंशका वर्णन सुनो॥ ४२॥"},{"id":"4.1.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/43/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["भृगुः ख्यात्यां महाभागः पत्न्यां पुत्रानजीजनत्।","धातारं च विधातारं श्रियं च भगवत्पराम्॥ ४३"],"iast":["bhṛguḥ khyātyāṃ mahābhāgaḥ patnyāṃ putrānajījanat|","dhātāraṃ ca vidhātāraṃ śriyaṃ ca bhagavatparām|| 43"],"meaning":"महाभाग भृगुजीने अपनी भार्या ख्यातिसे धाता और विधाता नामक पुत्र तथा श्री नामकी एक भगवत्परायणा कन्या उत्पन्‍न की॥ ४३॥"},{"id":"4.1.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/44/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["आयतिं नियतिं चैव सुते मेरुस्तयोरदात्।","ताभ्यां तयोरभवतां मृकण्डः प्राण एव च॥ ४४"],"iast":["āyatiṃ niyatiṃ caiva sute merustayoradāt|","tābhyāṃ tayorabhavatāṃ mṛkaṇḍaḥ prāṇa eva ca|| 44"],"meaning":"मेरुऋषिने अपनी आयति और नियति नामकी कन्याएँ क्रमशः धाता और विधाताको ब्याहीं; उनसे उनके मृकण्ड और प्राण नामक पुत्र हुए॥ ४४॥"},{"id":"4.1.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/45/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["मार्कण्डेयो मृकण्डस्य प्राणाद्वेदशिरा मुनिः।","कविश्‍च भार्गवो यस्य भगवानुशना सुतः॥ ४५"],"iast":["mārkaṇḍeyo mṛkaṇḍasya prāṇādvedaśirā muniḥ|","kaviśca bhārgavo yasya bhagavānuśanā sutaḥ|| 45"],"meaning":"उनमेंसे मृकण्डके मार्कण्डेय और प्राणके मुनिवर वेदशिराका जन्म हुआ। भृगुजीके एक कवि नामक पुत्र भी थे। उनके भगवान् उशना (शुक्राचार्य) हुए॥ ४५॥"},{"id":"4.1.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/46/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["त एते मुनयः क्षत्तर्लोकान् सर्गैरभावयन्।","एष कर्दमदौहित्रसंतानः कथितस्तव।","शृण्वतः श्रद्दधानस्य सद्यः पापहरः परः॥ ४६"],"iast":["ta ete munayaḥ kṣattarlokān sargairabhāvayan|","eṣa kardamadauhitrasaṃtānaḥ kathitastava|","śṛṇvataḥ śraddadhānasya sadyaḥ pāpaharaḥ paraḥ|| 46"],"meaning":"विदुरजी! इन सब मुनीश्‍वरोंने भी सन्तान उत्पन्‍न करके सृष्टिका विस्तार किया। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह कर्दमजीके दौहित्रोंकी सन्तानका वर्णन सुनाया। जो पुरुष इसे श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके पापोंको यह तत्काल नष्ट कर देता है॥ ४६॥"},{"id":"4.1.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/47/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["प्रसूतिं मानवीं दक्ष उपयेमे ह्यजात्मजः।","तस्यां ससर्ज दुहितॄः षोडशामललोचनाः॥ ४७"],"iast":["prasūtiṃ mānavīṃ dakṣa upayeme hyajātmajaḥ|","tasyāṃ sasarja duhitṝḥ ṣoḍaśāmalalocanāḥ|| 47"],"meaning":"ब्रह्माजीके पुत्र दक्षप्रजापतिने मनुनन्दिनी प्रसूतिसे विवाह किया। उससे उन्होंने सुन्दर नेत्रोंवाली सोलह कन्याएँ उत्पन्‍न कीं॥ ४७॥"},{"id":"4.1.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/48/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["त्रयोदशादाद्धर्माय तथैकामग्नये विभुः।","पितृभ्य एकां युक्तेभ्यो भवायैकां भवच्छिदे॥ ४८"],"iast":["trayodaśādāddharmāya tathaikāmagnaye vibhuḥ|","pitṛbhya ekāṃ yuktebhyo bhavāyaikāṃ bhavacchide|| 48"],"meaning":"भगवान् दक्षने उनमेंसे तेरह धर्मको, एक अग्‍निको, एक समस्त पितृगणको और एक संसारका संहार करनेवाले तथा जन्म-मृत्युसे छुड़ानेवाले भगवान् शंकरको दी॥ ४८॥"},{"id":"4.1.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/49/","page":409,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टिः पुष्टिः क्रियोन्‍नतिः।","बुद्धिर्मेधा तितिक्षा ह्रीर्मूर्तिर्धर्मस्य पत्नयः॥ ४९"],"iast":["śraddhā maitrī dayā śāntistuṣṭiḥ puṣṭiḥ kriyonnatiḥ|","buddhirmedhā titikṣā hrīrmūrtirdharmasya patnayaḥ|| 49"],"meaning":"श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्‍नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति—ये धर्मकी पत्नियाँ हैं॥ ४९॥"},{"id":"4.1.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/50/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["श्रद्धासूत शुभं मैत्री प्रसादमभयं दया।","शान्तिः सुखं मुदं तुष्टिः स्मयं पुष्टिरसूयत॥ ५०"],"iast":["śraddhāsūta śubhaṃ maitrī prasādamabhayaṃ dayā|","śāntiḥ sukhaṃ mudaṃ tuṣṭiḥ smayaṃ puṣṭirasūyata|| 50"],"meaning":"इनमेंसे श्रद्धाने शुभ, मैत्रीने प्रसाद, दयाने अभय, शान्तिने सुख, तुष्टिने मोद और पुष्टिने अहंकारको जन्म दिया॥ ५०॥"},{"id":"4.1.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/51/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["योगं क्रियोन्‍नतिर्दर्पमर्थं बुद्धिरसूयत।","मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम्॥ ५१"],"iast":["yogaṃ kriyonnatirdarpamarthaṃ buddhirasūyata|","medhā smṛtiṃ titikṣā tu kṣemaṃ hrīḥ praśrayaṃ sutam|| 51"],"meaning":"क्रियाने योग, उन्‍नतिने दर्प, बुद्धिने अर्थ, मेधाने स्मृति, तितिक्षाने क्षेम और ह्री (लज्जा)-ने प्रश्रय (विनय) नामक पुत्र उत्पन्‍न किया॥ ५१॥"},{"id":"4.1.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/52/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्तिर्नरनारायणावृषी॥ ५२"],"iast":["mūrtiḥ sarvaguṇotpattirnaranārāyaṇāvṛṣī|| 52"],"meaning":"समस्त गुणोंकी खान मूर्तिदेवीने नर-नारायण ऋषियोंको जन्म दिया॥ ५२॥"},{"id":"4.1.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/53/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["ययोर्जन्मन्यदो विश्‍वमभ्यनन्दत्सुनिर्वृतम्।","मनांसि ककुभो वाताः प्रसेदुः सरितोऽद्रयः॥ ५३"],"iast":["yayorjanmanyado viśvamabhyanandatsunirvṛtam|","manāṃsi kakubho vātāḥ praseduḥ sarito'drayaḥ|| 53"],"meaning":"इनका जन्म होनेपर इस सम्पूर्ण विश्‍वने आनन्दित होकर प्रसन्‍नता प्रकट की। उस समय लोगोंके मन, दिशाएँ, वायु, नदी और पर्वत—सभीमें प्रसन्‍नता छा गयी॥ ५३॥"},{"id":"4.1.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/54/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["दिव्यवाद्यन्त तूर्याणि पेतुः कुसुमवृष्टयः।","मुनयस्तुष्टुवुस्तुष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्‍नराः॥ ५४"],"iast":["divyavādyanta tūryāṇi petuḥ kusumavṛṣṭayaḥ|","munayastuṣṭuvustuṣṭā jagurgandharvakinnarāḥ|| 54"],"meaning":"आकाशमें मांगलिक बाजे बजने लगे, देवतालोग फूलोंकी वर्षा करने लगे, मुनि प्रसन्‍न होकर स्तुति करने लगे, गन्धर्व और किन्‍नर गाने लगे॥ ५४॥"},{"id":"4.1.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/55/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत्परममङ्गलम्।","देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः॥ ५५"],"iast":["nṛtyanti sma striyo devya āsītparamamaṅgalam|","devā brahmādayaḥ sarve upatasthurabhiṣṭavaiḥ|| 55"],"meaning":"अप्सराएँ नाचने लगीं। इस प्रकार उस समय बड़ा ही आनन्द-मंगल हुआ तथा ब्रह्मादि समस्त देवता स्तोत्रोंद्वारा भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ५५॥"},{"id":"4.1.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/56/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["यो मायया विरचितं निजयाऽऽत्मनीदं","खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय।","एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य","प्रादुश्‍चकार पुरुषाय नमः परस्मै॥ ५६"],"iast":["yo māyayā viracitaṃ nijayā''tmanīdaṃ","khe rūpabhedamiva tatpraticakṣaṇāya|","etena dharmasadane ṛṣimūrtinādya","prāduścakāra puruṣāya namaḥ parasmai|| 56"],"meaning":"देवताओंने कहा—जिस प्रकार आकाशमें तरह-तरहके रूपोंकी कल्पना कर ली जाती है—उसी प्रकार जिन्होंने अपनी मायाके द्वारा अपने ही स्वरूपके अन्दर इस संसारकी रचना की है और अपने उस स्वरूपको प्रकाशित करनेके लिये इस समय इस ऋषि-विग्रहके साथ धर्मके घरमें अपने-आपको प्रकट किया है, उन परम पुरुषको हमारा नमस्कार है॥ ५६॥"},{"id":"4.1.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/57/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान्","सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः।","दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन","यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम्॥ ५७"],"iast":["so'yaṃ sthitivyatikaropaśamāya sṛṣṭān","sattvena naḥ suragaṇānanumeyatattvaḥ|","dṛśyādadabhrakaruṇena vilokanena","yacchrīniketamamalaṃ kṣipatāravindam|| 57"],"meaning":"जिनके तत्त्वका शास्त्रके आधारपर हमलोग केवल अनुमान ही करते हैं, प्रत्यक्ष नहीं कर पाते—उन्हीं भगवान्‌ने देवताओंको संसारकी मर्यादामें किसी प्रकारकी गड़बड़ी न हो, इसीलिये सत्त्वगुणसे उत्पन्‍न किया है। अब वे अपने करुणामय नेत्रोंसे—जो समस्त शोभा और सौन्दर्यके निवासस्थान निर्मल दिव्य कमलको भी नीचा दिखानेवाले हैं—हमारी ओर निहारें॥ ५७॥"},{"id":"4.1.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/58/","page":410,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["एवं सुरगणैस्तात भगवन्तावभिष्टुतौ।","लब्धावलोकैर्ययतुरर्चितौ गन्धमादनम्॥ ५८"],"iast":["evaṃ suragaṇaistāta bhagavantāvabhiṣṭutau|","labdhāvalokairyayaturarcitau gandhamādanam|| 58"],"meaning":"प्यारे विदुरजी! प्रभुका साक्षात् दर्शन पाकर देवताओंने उनकी इस प्रकार स्तुति और पूजा की। तदनन्तर भगवान् नर-नारायण दोनों गन्धमादन पर्वतपर चले गये॥ ५८॥"},{"id":"4.1.59","number":59,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/59/","page":411,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहागतौ।","भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ॥ ५९"],"iast":["tāvimau vai bhagavato hareraṃśāvihāgatau|","bhāravyayāya ca bhuvaḥ kṛṣṇau yadukurūdvahau|| 59"],"meaning":"भगवान् श्रीहरिके अंशभूत वे नर-नारायण ही इस समय पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यदुकुलभूषण श्रीकृष्ण और उन्हींके सरीखे श्यामवर्ण, कुरुकुलतिलक अर्जुनके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ ५९॥"},{"id":"4.1.60","number":60,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/60/","page":411,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत्।","पावकं पवमानं च शुचिं च हुतभोजनम्॥ ६०"],"iast":["svāhābhimāninaścāgnerātmajāṃstrīnajījanat|","pāvakaṃ pavamānaṃ ca śuciṃ ca hutabhojanam|| 60"],"meaning":"अग्‍निदेवकी पत्‍नी स्वाहाने अग्‍निके ही अभिमानी पावक, पवमान और शुचि—ये तीन पुत्र उत्पन्‍न किये। ये तीनों ही हवन किये हुए पदार्थोंका भक्षण करनेवाले हैं॥ ६०॥"},{"id":"4.1.61","number":61,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/61/","page":411,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["तेभ्योऽग्नयः समभवन् चत्वारिंशच्च पञ्च च।","त एवैकोनपञ्चाशत्साकं पितृपितामहैः॥ ६१"],"iast":["tebhyo'gnayaḥ samabhavan catvāriṃśacca pañca ca|","ta evaikonapañcāśatsākaṃ pitṛpitāmahaiḥ|| 61"],"meaning":"इन्हीं तीनोंसे पैंतालीस प्रकारके अग्‍नि और उत्पन्‍न हुए। ये ही अपने तीन पिता और एक पितामहको साथ लेकर उनचास अग्‍नि कहलाये॥ ६१॥"},{"id":"4.1.62","number":62,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/62/","page":411,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["वैतानिके कर्मणि यन्‍नामभिर्ब्रह्मवादिभिः।","आग्नेय्य इष्टयो यज्ञे निरूप्यन्तेऽग्नयस्तु ते॥ ६२"],"iast":["vaitānike karmaṇi yannāmabhirbrahmavādibhiḥ|","āgneyya iṣṭayo yajñe nirūpyante'gnayastu te|| 62"],"meaning":"वेदज्ञ ब्राह्मण वैदिक यज्ञकर्ममें जिन उनचास अग्‍नियोंके नामोंसे आग्नेयी इष्टियाँ करते हैं, वे ये ही हैं॥ ६२॥"},{"id":"4.1.63","number":63,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/63/","page":411,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["अग्‍निष्वात्ता बर्हिषदः सोम्याः पितर आज्यपाः।","साग्नयोऽनग्नयस्तेषां पत्‍नी दाक्षायणी स्वधा॥ ६३"],"iast":["agniṣvāttā barhiṣadaḥ somyāḥ pitara ājyapāḥ|","sāgnayo'nagnayasteṣāṃ patnī dākṣāyaṇī svadhā|| 63"],"meaning":"अग्‍निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमप और आज्यप—ये पितर हैं; इनमें साग्‍निक भी हैं और निरग्‍निक भी। इन सब पितरोंकी पत्‍नी दक्षकुमारी स्वधा हैं॥ ६३॥"},{"id":"4.1.64","number":64,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/64/","page":411,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["तेभ्यो दधार कन्ये द्वे वयुनां धारिणीं स्वधा।","उभे ते ब्रह्मवादिन्यौ ज्ञानविज्ञानपारगे॥ ६४"],"iast":["tebhyo dadhāra kanye dve vayunāṃ dhāriṇīṃ svadhā|","ubhe te brahmavādinyau jñānavijñānapārage|| 64"],"meaning":"इन पितरोंसे स्वधाके धारिणी और वयुना नामकी दो कन्याएँ हुईं। वे दोनों ही ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत और ब्रह्मज्ञानका उपदेश करनेवाली हुईं॥ ६४॥"},{"id":"4.1.65","number":65,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/65/","page":411,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["भवस्य पत्‍नी तु सती भवं देवमनुव्रता।","आत्मनः सदृशं पुत्रं न लेभे गुणशीलतः॥ ६५"],"iast":["bhavasya patnī tu satī bhavaṃ devamanuvratā|","ātmanaḥ sadṛśaṃ putraṃ na lebhe guṇaśīlataḥ|| 65"],"meaning":"महादेवजीकी पत्‍नी सती थीं, वे सब प्रकारसे अपने पतिदेवकी सेवामें संलग्न रहनेवाली थीं। किन्तु उनके अपने गुण और शीलके अनुरूप कोई पुत्र नहीं हुआ॥ ६५॥"},{"id":"4.1.66","number":66,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/66/","page":411,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा।","अप्रौढैवात्मनाऽऽत्मानमजहाद्योगसंयुता॥ ६६"],"iast":["pitaryapratirūpe sve bhavāyānāgase ruṣā|","aprauḍhaivātmanā''tmānamajahādyogasaṃyutā|| 66"],"meaning":"क्योंकि सतीके पिता दक्षने बिना ही किसी अपराधके भगवान् शिवजीके प्रतिकूल आचरण किया था, इसलिये सतीने युवावस्थामें ही क्रोधवश योगके द्वारा स्वयं ही अपने शरीरका त्याग कर दिया था॥ ६६॥"}],"text":[{"b":9679,"kind":"adhyaya_heading","page":405,"text":"अथ प्रथमोऽध्यायः"},{"b":9680,"kind":"topic_heading","page":405,"text":"स्वायम्भुव-मनुकी कन्याओंके वंशका वर्णन"},{"b":9681,"kind":"topic_heading","page":405,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":9682,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.1"],"text":"मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्‍च जज्ञिरे।"},{"b":9683,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.1"],"text":"आकूतिर्देवहूतिश्‍च प्रसूतिरिति विश्रुताः॥ १"},{"b":9684,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.2"],"text":"आकूतिं रुचये प्रादादपि भ्रातृमतीं नृपः।"},{"b":9685,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.2"],"text":"पुत्रिकाधर्ममाश्रित्य शतरूपानुमोदितः॥ २"},{"b":9686,"kind":"hindi_commentary","page":404,"explains":["4.1.1","4.1.2"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! स्वायम्भुव मनुके महारानी शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद—इन दो पुत्रोंके सिवा तीन कन्याएँ भी हुई थीं; वे आकूति, देवहूति और प्रसूति नामसे विख्यात थीं॥ १॥ आकूतिका, यद्यपि उसके भाई थे तो भी, महारानी शतरूपाकी अनुमतिसे उन्होंने रुचि प्रजापतिके साथ ‘पुत्रिकाधर्म’-के अनुसार विवाह किया॥ २॥"},{"b":9687,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.3"],"text":"प्रजापतिः स भगवान् रुचिस्तस्यामजीजनत्।"},{"b":9688,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.3"],"text":"मिथुनं ब्रह्मवर्चस्वी परमेण समाधिना॥ ३"},{"b":9689,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.4"],"text":"यस्तयोः पुरुषः साक्षाद्विष्णुर्यज्ञस्वरूपधृक्।"},{"b":9690,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.4"],"text":"या स्त्री सा दक्षिणा भूतेरंशभूतानपायिनी॥ ४"},{"b":9691,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.5"],"text":"आनिन्ये स्वगृहं पुत्र्याः पुत्रं विततरोचिषम्।"},{"b":9692,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.5"],"text":"स्वायम्भुवो मुदा युक्तो रुचिर्जग्राह दक्षिणाम्॥ ५"},{"b":9693,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.6"],"text":"तां कामयानां भगवानुवाह यजुषां पतिः।"},{"b":9694,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.6"],"text":"तुष्टायां तोषमापन्‍नोऽजनयद् द्वादशात्मजान्॥ ६"},{"b":9695,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.7"],"text":"तोषः प्रतोषः सन्तोषो भद्रः शान्तिरिडस्पतिः।"},{"b":9696,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["4.1.7"],"text":"इध्मः कविर्विभुः स्वह्नः सुदेवो रोचनो द्विषट्॥ ७"},{"b":9697,"kind":"hindi_commentary","page":405,"explains":["4.1.3","4.1.4","4.1.5","4.1.6","4.1.7"],"text":"प्रजापति रुचि भगवान्‌के अनन्य चिन्तनके कारण ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न थे। उन्होंने आकूतिके गर्भसे एक पुरुष और स्त्रीका जोड़ा उत्पन्‍न किया॥ ३॥ उनमें जो पुरुष था, वह साक्षात् यज्ञस्वरूपधारी भगवान् विष्णु थे और जो स्त्री थी, वह भगवान्‌से कभी अलग न रहनेवाली लक्ष्मीजीकी अंशस्वरूपा ‘दक्षिणा’ थी॥ ४॥ मनुजी अपनी पुत्री आकूतिके उस परमतेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्‍नतासे अपने घर ले आये और दक्षिणाको रुचि प्रजापतिने अपने पास रखा॥ ५॥ जब दक्षिणा विवाहके योग्य हुई तो उसने यज्ञभगवान्‌को ही पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की, तब भगवान् यज्ञपुरुषने उससे विवाह किया। इससे दक्षिणाको बड़ा सन्तोष हुआ। भगवान्‌ने प्रसन्‍न होकर उससे बारह पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ६॥ उनके नाम हैं—तोष, प्रतोष, सन्तोष, भद्र, शान्ति, इडस्पति, इध्म, कवि, विभु, स्वह्न, सुदेव और रोचन॥ ७॥"},{"b":9698,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.8"],"text":"तुषिता नाम ते देवा आसन् स्वायम्भुवान्तरे।"},{"b":9699,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.8"],"text":"मरीचिमिश्रा ऋषयो यज्ञः सुरगणेश्‍वरः॥ ८"},{"b":9700,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.9"],"text":"प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुपुत्रौ महौजसौ।"},{"b":9701,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.9"],"text":"तत्पुत्रपौत्रनप्तॄणामनुवृत्तं तदन्तरम्॥ ९"},{"b":9702,"kind":"hindi_commentary","page":406,"explains":["4.1.8","4.1.9"],"text":"ये ही स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ‘तुषित’ नामके देवता हुए। उस मन्वन्तरमें मरीचि आदि सप्तर्षि थे, भगवान् यज्ञ ही देवताओंके अधीश्‍वर इन्द्र थे और महान् प्रभावशाली प्रियव्रत एवं उत्तानपाद मनुपुत्र थे। वह मन्वन्तर उन्हीं दोनोंके बेटों, पोतों और दौहित्रोंके वंशसे छा गया॥ ८-९॥"},{"b":9703,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.10"],"text":"देवहूतिमदात्तात कर्दमायात्मजां मनुः।"},{"b":9704,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.10"],"text":"तत्सम्बन्धि श्रुतप्रायं भवता गदतो मम॥ १०"},{"b":9705,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.11"],"text":"दक्षाय ब्रह्मपुत्राय प्रसूतिं भगवान्मनुः।"},{"b":9706,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.11"],"text":"प्रायच्छद्यत्कृतः सर्गस्त्रिलोक्यां विततो महान्॥ ११"},{"b":9707,"kind":"hindi_commentary","page":406,"explains":["4.1.10","4.1.11"],"text":"प्यारे विदुरजी! मनुजीने अपनी दूसरी कन्या देवहूति कर्दमजीको ब्याही थी। उसके सम्बन्धकी प्रायः सभी बातें तुम मुझसे सुन चुके हो॥ १०॥ भगवान् मनुने अपनी तीसरी कन्या प्रसूतिका विवाह ब्रह्माजीके पुत्र दक्षप्रजापतिसे किया था; उसकी विशाल वंशपरम्परा तो सारी त्रिलोकीमें फैली हुई है॥ ११॥"},{"b":9708,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.12"],"text":"याः कर्दमसुताः प्रोक्ता नव ब्रह्मर्षिपत्नयः।"},{"b":9709,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.12"],"text":"तासां प्रसूतिप्रसवं प्रोच्यमानं निबोध मे॥ १२"},{"b":9710,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.13"],"text":"पत्नी मरीचेस्तु कला सुषुवे कर्दमात्मजा।"},{"b":9711,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.13"],"text":"कश्यपं पूर्णिमानं च ययोरापूरितं जगत्॥ १३"},{"b":9712,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.14"],"text":"पूर्णिमासूत विरजं विश्‍वगं च परंतप।"},{"b":9713,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.14"],"text":"देवकुल्यां हरेः पादशौचाद्याभूत्सरिद्दिवः॥ १४"},{"b":9714,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.15"],"text":"अत्रेः पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशसः सुतान्।"},{"b":9715,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.15"],"text":"दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्॥ १५"},{"b":9716,"kind":"hindi_commentary","page":406,"explains":["4.1.12","4.1.13","4.1.14","4.1.15"],"text":"मैं कर्दमजीकी नौ कन्याओंका, जो नौ ब्रह्मर्षियोंसे ब्याही गयी थीं, पहले ही वर्णन कर चुका हूँ। अब उनकी वंशपरम्पराका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ १२॥ मरीचि ऋषिकी पत्‍नी कर्दमजीकी बेटी कलासे कश्यप और पूर्णिमा नामक दो पुत्र हुए, जिनके वंशसे यह सारा जगत् भरा हुआ है॥ १३॥ शत्रुतापन विदुरजी! पूर्णिमाके विरज और विश्‍वग नामके दो पुत्र तथा देवकुल्या नामकी एक कन्या हुई। यही दूसरे जन्ममें श्रीहरिके चरणोंके धोवनसे देवनदी गंगाके रूपमें प्रकट हुई॥ १४॥ अत्रिकी पत्‍नी अनसूयासे दत्तात्रेय, दुर्वासा और चन्द्रमा नामके तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमशः भगवान् विष्णु, शंकर और ब्रह्माके अंशसे उत्पन्‍न हुए थे॥ १५॥"},{"b":9717,"kind":"hindi_commentary","page":406,"text":"विदुर उवाच"},{"b":9718,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.16"],"text":"अत्रेर्गृहे सुरश्रेष्ठाः स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः।"},{"b":9719,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.16"],"text":"किञ्चिच्चिकीर्षवो जाता एतदाख्याहि मे गुरो॥ १६"},{"b":9720,"kind":"hindi_commentary","page":406,"explains":["4.1.16"],"text":"विदुरजीने पूछा—गुरुजी! कृपया यह बतलाइये कि जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करनेवाले इन सर्वश्रेष्ठ देवोंने अत्रि मुनिके यहाँ क्या करनेकी इच्छासे अवतार लिया था?॥ १६॥"},{"b":9721,"kind":"hindi_commentary","page":405,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":9722,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.17"],"text":"ब्रह्मणा नोदितः सृष्टावत्रिर्ब्रह्मविदां वरः।"},{"b":9723,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["4.1.17"],"text":"सह पत्न्या ययावृक्षं कुलाद्रिं तपसि स्थितः॥ १७"},{"b":9724,"kind":"hindi_commentary","page":406,"explains":["4.1.17"],"text":"श्रीमैत्रेयजीने कहा—जब ब्रह्माजीने ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महर्षि अत्रिको सृष्टि रचनेके लिये आज्ञा दी, तब वे अपनी सहधर्मिणीके सहित तप करनेके लिये ऋक्षनामक कुलपर्वतपर गये॥ १७॥"},{"b":9725,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.18"],"text":"तस्मिन् प्रसूनस्तबकपलाशाशोककानने।"},{"b":9726,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.18"],"text":"वार्भिःस्रवद्भिरुद्घुष्टे निर्विन्ध्यायाः समन्ततः॥ १८"},{"b":9727,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.19"],"text":"प्राणायामेन संयम्य मनो वर्षशतं मुनिः।"},{"b":9728,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.19"],"text":"अतिष्ठदेकपादेन निर्द्वन्द्वोऽनिलभोजनः॥ १९"},{"b":9729,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.20"],"text":"शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्‍वरः।"},{"b":9730,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.20"],"text":"प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन्॥ २०"},{"b":9731,"kind":"hindi_translation","page":407,"explains":["4.1.18","4.1.19","4.1.20"],"text":"वहाँ पलाश और अशोकके वृक्षोंका एक विशाल वन था। उसके सभी वृक्ष फूलोंके गुच्छोंसे लदे थे तथा उसमें सब ओर निर्विन्ध्या नदीके जलकी कलकल ध्वनि गूँजती रहती थी॥ १८॥ उस वनमें वे मुनिश्रेष्ठ प्राणायामके द्वारा चित्तको वशमें करके सौ वर्षतक केवल वायु पीकर सर्दी-गरमी आदि द्वन्द्वोंकी कुछ भी परवा न कर एक ही पैरसे खड़े रहे॥ १९॥ उस समय वे मन-ही-मन यही प्रार्थना करते थे कि ‘जो कोई सम्पूर्ण जगत‍्के ईश्‍वर हैं, मैं उनकी शरणमें हूँ; वे मुझे अपने ही समान सन्तान प्रदान करें’॥ २०॥"},{"b":9732,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.21"],"text":"तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधसाग्‍निना।"},{"b":9733,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.21"],"text":"निर्गतेन मुनेर्मूर्ध्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः॥ २१"},{"b":9734,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.22"],"text":"अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।"},{"b":9735,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.22"],"text":"वितायमानयशसस्तदाश्रमपदं ययुः॥ २२"},{"b":9736,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.23"],"text":"तत्प्रादुर्भावसंयोगविद्योतितमना मुनिः।"},{"b":9737,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.23"],"text":"उत्तिष्ठन्‍नेकपादेन ददर्श विबुधर्षभान्॥ २३"},{"b":9738,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.24"],"text":"प्रणम्य दण्डवद‍्भूमावुपतस्थेऽर्हणाञ्जलिः।"},{"b":9739,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.24"],"text":"वृषहंससुपर्णस्थान् स्वैः स्वैश्चिह्नैश्‍च चिह्नितान्॥ २४"},{"b":9740,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.25"],"text":"कृपावलोकेन हसद्वदनेनोपलम्भितान्।"},{"b":9741,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.25"],"text":"तद्रोचिषा प्रतिहते निमील्य मुनिरक्षिणी॥ २५"},{"b":9742,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.26"],"text":"चेतस्तत्प्रवणं युञ्जन्‍नस्तावीत्संहताञ्जलिः।"},{"b":9743,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.26"],"text":"श्लक्ष्णया सूक्तया वाचा सर्वलोकगरीयसः॥ २६"},{"b":9744,"kind":"hindi_translation","page":407,"explains":["4.1.21","4.1.22","4.1.23","4.1.24","4.1.25","4.1.26"],"text":"तब यह देखकर कि प्राणायामरूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ अत्रि मुनिका तेज उनके मस्तकसे निकलकर तीनों लोकोंको तपा रहा है—ब्रह्मा, विष्णु और महादेव—तीनों जगत्पति उनके आश्रमपर आये। उस समय अप्सरा, मुनि, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और नाग—उनका सुयश गा रहे थे॥ २१-२२॥ उन तीनोंका एक ही साथ प्रादुर्भाव होनेसे अत्रि मुनिका अन्तःकरण प्रकाशित हो उठा। उन्होंने एक पैरसे खड़े-खड़े ही उन देवदेवोंको देखा और फिर पृथ्वीपर दण्डके समान लोटकर प्रणाम करनेके अनन्तर अर्घ्य-पुष्पादि पूजनकी सामग्री हाथमें ले उनकी पूजा की। वे तीनों अपने-अपने वाहन—हंस, गरुड और बैलपर चढ़े हुए तथा अपने कमण्डलु, चक्र, त्रिशूलादि चिह्नोंसे सुशोभित थे॥ २३-२४॥ उनकी आँखोंसे कृपाकी वर्षा हो रही थी। उनके मुखपर मन्द हास्यकी रेखा थी—जिससे उनकी प्रसन्‍नता झलक रही थी। उनके तेजसे चौंधियाकर मुनिवरने अपनी आँखें मूँद लीं॥ २५॥ वे चित्तको उन्हींकी ओर लगाकर हाथ जोड़ अति मधुर और सुन्दर भावपूर्ण वचनोंमें लोकमें सबसे बड़े उन तीनों देवोंकी स्तुति करने लगे॥ २६॥"},{"b":9745,"kind":"topic_heading","page":407,"text":"अत्रिरुवाच"},{"b":9746,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.27"],"text":"विश्वोद्भवस्थितिलयेषु विभज्यमानै-"},{"b":9747,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.27"],"text":"र्मायागुणैरनुयुगं विगृहीतदेहाः।"},{"b":9748,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.27"],"text":"ते ब्रह्मविष्णुगिरिशाः प्रणतोऽस्म्यहं व-"},{"b":9749,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["4.1.27"],"text":"स्तेभ्यः क एव भवतां म इहोपहूतः॥ २७"},{"b":9750,"kind":"hindi_commentary","page":407,"explains":["4.1.27"],"text":"अत्रि मुनिने कहा—भगवन्! प्रत्येक कल्पके आरम्भमें जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके लिये जो मायाके सत्त्वादि तीनों गुणोंका विभाग करके भिन्‍न-भिन्‍न शरीर धारण करते हैं—वे ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आप ही हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ। कहिये—मैंने जिनको बुलाया था, आपमेंसे वे कौन महानुभाव हैं?॥ २७॥"},{"b":9751,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.28"],"text":"एको मयेह भगवान् विबुधप्रधान-"},{"b":9752,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.28"],"text":"श्चित्तीकृतः प्रजननाय कथं नु यूयम्।"},{"b":9753,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.28"],"text":"अत्रागतास्तनुभृतां मनसोऽपि दूरा"},{"b":9754,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.28"],"text":"ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे॥ २८"},{"b":9755,"kind":"hindi_translation","page":408,"explains":["4.1.28"],"text":"क्योंकि मैंने तो सन्तानप्राप्तिकी इच्छासे केवल एक सुरेश्‍वर भगवान्‌का ही चिन्तन किया था। फिर आप तीनोंने यहाँ पधारनेकी कृपा कैसे की? आप-लोगोंतक तो देहधारियोंके मनकी भी गति नहीं है, इसलिये मुझे बड़ा आश्‍चर्य हो रहा है। आपलोग कृपा करके मुझे इसका रहस्य बतलाइये॥ २८॥"},{"b":9756,"kind":"topic_heading","page":408,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":9757,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.29"],"text":"इति तस्य वचः श्रुत्वा त्रयस्ते विबुधर्षभाः।"},{"b":9758,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.29"],"text":"प्रत्याहुः श्लक्ष्णया वाचा प्रहस्य तमृषिं प्रभो॥ २९"},{"b":9759,"kind":"hindi_commentary","page":408,"explains":["4.1.29"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—समर्थ विदुरजी! अत्रि मुनिके वचन सुनकर वे तीनों देव हँसे और उनसे सुमधुर वाणीमें कहने लगे॥ २९॥"},{"b":9760,"kind":"topic_heading","page":408,"text":"देवा ऊचुः"},{"b":9761,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.30"],"text":"यथा कृतस्ते सङ्कल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा।"},{"b":9762,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.30"],"text":"सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम्॥ ३०"},{"b":9763,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.31"],"text":"अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुताः।"},{"b":9764,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.31"],"text":"भवितारोऽङ्ग भद्रं ते विस्रप्स्यन्ति च ते यशः॥ ३१"},{"b":9765,"kind":"hindi_commentary","page":408,"explains":["4.1.30","4.1.31"],"text":"देवताओंने कहा—ब्रह्मन्! तुम सत्यसंकल्प हो। अतः तुमने जैसा संकल्प किया था, वही होना चाहिये। उससे विपरीत कैसे हो सकता था? तुम जिस ‘जगदीश्‍वर’ का ध्यान करते थे, वह हम तीनों ही हैं॥ ३०॥ प्रिय महर्षे! तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे यहाँ हमारे ही अंशस्वरूप तीन जगद्विख्यात पुत्र उत्पन्‍न होंगे और तुम्हारे सुन्दर यशका विस्तार करेंगे॥ ३१॥"},{"b":9766,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.32"],"text":"एवं कामवरं दत्त्वा प्रतिजग्मुः सुरेश्‍वराः।"},{"b":9767,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.32"],"text":"सभाजितास्तयोः सम्यग्दम्पत्योर्मिषतोस्ततः॥ ३२"},{"b":9768,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.33"],"text":"सोमोऽभूद्ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित्।"},{"b":9769,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.33"],"text":"दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः॥ ३३"},{"b":9770,"kind":"hindi_translation","page":408,"explains":["4.1.32","4.1.33"],"text":"उन्हें इस प्रकार अभीष्ट वर देकर तथा पति-पत्नी दोनोंसे भलीभाँति पूजित होकर उनके देखते-ही-देखते वे तीनों सुरेश्‍वर अपने-अपने लोकोंको चले गये॥ ३२॥ ब्रह्माजीके अंशसे चन्द्रमा, विष्णुके अंशसे योगवेत्ता दत्तात्रेयजी और महादेवजीके अंशसे दुर्वासा ऋषि अत्रिके पुत्ररूपमें प्रकट हुए। अब अंगिरा ऋषिकी सन्तानोंका वर्णन सुनो॥ ३३॥"},{"b":9771,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.34"],"text":"श्रद्धा त्वङ्गिरसः पत्‍नी चतस्रोऽसूत कन्यकाः।"},{"b":9772,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.34"],"text":"सिनीवाली कुहू राका चतुर्थ्यनुमतिस्तथा॥ ३४"},{"b":9773,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.35"],"text":"तत्पुत्रावपरावास्तां ख्यातौ स्वारोचिषेऽन्तरे।"},{"b":9774,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.35"],"text":"उतथ्यो भगवान् साक्षाद्ब्रह्मिष्ठश्‍च बृहस्पतिः॥ ३५"},{"b":9775,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.36"],"text":"पुलस्त्योऽजनयत्पत्न्यामगस्त्यं च हविर्भुवि।"},{"b":9776,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.36"],"text":"सोऽन्यजन्मनि दह्राग्‍निर्विश्रवाश्‍च महातपाः॥ ३६"},{"b":9777,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.37"],"text":"तस्य यक्षपतिर्देवः कुबेरस्त्विडविडासुतः।"},{"b":9778,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["4.1.37"],"text":"रावणः कुम्भकर्णश्‍च तथान्यस्यां विभीषणः॥ ३७"},{"b":9779,"kind":"hindi_translation","page":408,"explains":["4.1.34","4.1.35","4.1.36","4.1.37"],"text":"अंगिराकी पत्‍नी श्रद्धाने सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति—इन चार कन्याओंको जन्म दिया॥ ३४॥ इनके सिवा उनके साक्षात् भगवान् उतथ्यजी और ब्रह्मनिष्ठ बृहस्पतिजी—ये दो पुत्र भी हुए, जो स्वारोचिष मन्वन्तरमें विख्यात हुए॥ ३५॥ पुलस्त्यजीके उनकी पत्‍नी हविर्भूसे महर्षि अगस्त्य और महातपस्वी विश्रवा—ये दो पुत्र हुए। इनमें अगस्त्यजी दूसरे जन्ममें जठराग्‍नि हुए॥ ३६॥ विश्रवा मुनिके इडविडाके गर्भसे यक्षराज कुबेरका जन्म हुआ और उनकी दूसरी पत्‍नी केशिनीसे रावण, कुम्भकर्ण एवं विभीषण उत्पन्‍न हुए॥ ३७॥"},{"b":9780,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.38"],"text":"पुलहस्य गतिर्भार्या त्रीनसूत सती सुतान्।"},{"b":9781,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.38"],"text":"कर्मश्रेष्ठं वरीयांसं सहिष्णुं च महामते॥ ३८"},{"b":9782,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.39"],"text":"क्रतोरपि क्रिया भार्या वालखिल्यानसूयत।"},{"b":9783,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.39"],"text":"ऋषीन्षष्टिसहस्राणि ज्वलतो ब्रह्मतेजसा॥ ३९"},{"b":9784,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.40"],"text":"ऊर्जायां जज्ञिरे पुत्रा वसिष्ठस्य परंतप।"},{"b":9785,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.40"],"text":"चित्रकेतुप्रधानास्ते सप्त ब्रह्मर्षयोऽमलाः॥ ४०"},{"b":9786,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.41"],"text":"चित्रकेतुः सुरोचिश्‍च विरजा मित्र एव च।"},{"b":9787,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.41"],"text":"उल्बणो वसुभृद्यानो द्युमान् शक्‍त्यादयोऽपरे॥ ४१"},{"b":9788,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.42"],"text":"चित्तिस्त्वथर्वणः पत्‍नी लेभे पुत्रं धृतव्रतम्।"},{"b":9789,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.42"],"text":"दध्यञ्चमश्‍वशिरसं भृगोर्वंशं निबोध मे॥ ४२"},{"b":9790,"kind":"hindi_translation","page":409,"explains":["4.1.38","4.1.39","4.1.40","4.1.41","4.1.42"],"text":"महामते! महर्षि पुलहकी स्त्री परम साध्वी गतिसे कर्मश्रेष्ठ, वरीयान् और सहिष्णु—ये तीन पुत्र उत्पन्‍न हुए॥ ३८॥ इसी प्रकार क्रतुकी पत्‍नी क्रियाने ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान बालखिल्यादि साठ हजार ऋषियोंको जन्म दिया॥ ३९॥ शत्रुतापन विदुरजी! वसिष्ठजीकी पत्‍नी ऊर्जा (अरुन्धती)-से चित्रकेतु आदि सात विशुद्धचित्त ब्रह्मर्षियोंका जन्म हुआ॥ ४०॥ उनके नाम चित्रकेतु, सुरोचि, विरजा, मित्र, उल्बण, वसुभृद्यान और द्युमान् थे। इनके सिवा उनकी दूसरी पत्नीसे शक्ति आदि और भी कई पुत्र हुए॥ ४१॥ अथर्वा मुनिकी पत्‍नी चित्तिने दध्यङ् (दधीचि) नामक एक तपोनिष्ठ पुत्र प्राप्त किया, जिसका दूसरा नाम अश्‍वशिरा भी था। अब भृगुके वंशका वर्णन सुनो॥ ४२॥"},{"b":9791,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.43"],"text":"भृगुः ख्यात्यां महाभागः पत्न्यां पुत्रानजीजनत्।"},{"b":9792,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.43"],"text":"धातारं च विधातारं श्रियं च भगवत्पराम्॥ ४३"},{"b":9793,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.44"],"text":"आयतिं नियतिं चैव सुते मेरुस्तयोरदात्।"},{"b":9794,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.44"],"text":"ताभ्यां तयोरभवतां मृकण्डः प्राण एव च॥ ४४"},{"b":9795,"kind":"hindi_translation","page":409,"explains":["4.1.43","4.1.44"],"text":"महाभाग भृगुजीने अपनी भार्या ख्यातिसे धाता और विधाता नामक पुत्र तथा श्री नामकी एक भगवत्परायणा कन्या उत्पन्‍न की॥ ४३॥ मेरुऋषिने अपनी आयति और नियति नामकी कन्याएँ क्रमशः धाता और विधाताको ब्याहीं; उनसे उनके मृकण्ड और प्राण नामक पुत्र हुए॥ ४४॥"},{"b":9796,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.45"],"text":"मार्कण्डेयो मृकण्डस्य प्राणाद्वेदशिरा मुनिः।"},{"b":9797,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.45"],"text":"कविश्‍च भार्गवो यस्य भगवानुशना सुतः॥ ४५"},{"b":9798,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.46"],"text":"त एते मुनयः क्षत्तर्लोकान् सर्गैरभावयन्।"},{"b":9799,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.46"],"text":"एष कर्दमदौहित्रसंतानः कथितस्तव।"},{"b":9800,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.46"],"text":"शृण्वतः श्रद्दधानस्य सद्यः पापहरः परः॥ ४६"},{"b":9801,"kind":"hindi_translation","page":409,"explains":["4.1.45","4.1.46"],"text":"उनमेंसे मृकण्डके मार्कण्डेय और प्राणके मुनिवर वेदशिराका जन्म हुआ। भृगुजीके एक कवि नामक पुत्र भी थे। उनके भगवान् उशना (शुक्राचार्य) हुए॥ ४५॥ विदुरजी! इन सब मुनीश्‍वरोंने भी सन्तान उत्पन्‍न करके सृष्टिका विस्तार किया। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह कर्दमजीके दौहित्रोंकी सन्तानका वर्णन सुनाया। जो पुरुष इसे श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके पापोंको यह तत्काल नष्ट कर देता है॥ ४६॥"},{"b":9802,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.47"],"text":"प्रसूतिं मानवीं दक्ष उपयेमे ह्यजात्मजः।"},{"b":9803,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.47"],"text":"तस्यां ससर्ज दुहितॄः षोडशामललोचनाः॥ ४७"},{"b":9804,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.48"],"text":"त्रयोदशादाद्धर्माय तथैकामग्नये विभुः।"},{"b":9805,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.48"],"text":"पितृभ्य एकां युक्तेभ्यो भवायैकां भवच्छिदे॥ ४८"},{"b":9806,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.49"],"text":"श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टिः पुष्टिः क्रियोन्‍नतिः।"},{"b":9807,"kind":"sanskrit_shloka","page":409,"verses":["4.1.49"],"text":"बुद्धिर्मेधा तितिक्षा ह्रीर्मूर्तिर्धर्मस्य पत्नयः॥ ४९"},{"b":9808,"kind":"hindi_translation","page":409,"explains":["4.1.47","4.1.48","4.1.49"],"text":"ब्रह्माजीके पुत्र दक्षप्रजापतिने मनुनन्दिनी प्रसूतिसे विवाह किया। उससे उन्होंने सुन्दर नेत्रोंवाली सोलह कन्याएँ उत्पन्‍न कीं॥ ४७॥ भगवान् दक्षने उनमेंसे तेरह धर्मको, एक अग्‍निको, एक समस्त पितृगणको और एक संसारका संहार करनेवाले तथा जन्म-मृत्युसे छुड़ानेवाले भगवान् शंकरको दी॥ ४८॥ श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्‍नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति—ये धर्मकी पत्नियाँ हैं॥ ४९॥"},{"b":9809,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.50"],"text":"श्रद्धासूत शुभं मैत्री प्रसादमभयं दया।"},{"b":9810,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.50"],"text":"शान्तिः सुखं मुदं तुष्टिः स्मयं पुष्टिरसूयत॥ ५०"},{"b":9811,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.51"],"text":"योगं क्रियोन्‍नतिर्दर्पमर्थं बुद्धिरसूयत।"},{"b":9812,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.51"],"text":"मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम्॥ ५१"},{"b":9813,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.52"],"text":"मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्तिर्नरनारायणावृषी॥ ५२"},{"b":9814,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.53"],"text":"ययोर्जन्मन्यदो विश्‍वमभ्यनन्दत्सुनिर्वृतम्।"},{"b":9815,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.53"],"text":"मनांसि ककुभो वाताः प्रसेदुः सरितोऽद्रयः॥ ५३"},{"b":9816,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.54"],"text":"दिव्यवाद्यन्त तूर्याणि पेतुः कुसुमवृष्टयः।"},{"b":9817,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.54"],"text":"मुनयस्तुष्टुवुस्तुष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्‍नराः॥ ५४"},{"b":9818,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.55"],"text":"नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत्परममङ्गलम्।"},{"b":9819,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.55"],"text":"देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः॥ ५५"},{"b":9820,"kind":"hindi_translation","page":410,"explains":["4.1.50","4.1.51","4.1.52","4.1.53","4.1.54","4.1.55"],"text":"इनमेंसे श्रद्धाने शुभ, मैत्रीने प्रसाद, दयाने अभय, शान्तिने सुख, तुष्टिने मोद और पुष्टिने अहंकारको जन्म दिया॥ ५०॥ क्रियाने योग, उन्‍नतिने दर्प, बुद्धिने अर्थ, मेधाने स्मृति, तितिक्षाने क्षेम और ह्री (लज्जा)-ने प्रश्रय (विनय) नामक पुत्र उत्पन्‍न किया॥ ५१॥ समस्त गुणोंकी खान मूर्तिदेवीने नर-नारायण ऋषियोंको जन्म दिया॥ ५२॥ इनका जन्म होनेपर इस सम्पूर्ण विश्‍वने आनन्दित होकर प्रसन्‍नता प्रकट की। उस समय लोगोंके मन, दिशाएँ, वायु, नदी और पर्वत—सभीमें प्रसन्‍नता छा गयी॥ ५३॥ आकाशमें मांगलिक बाजे बजने लगे, देवतालोग फूलोंकी वर्षा करने लगे, मुनि प्रसन्‍न होकर स्तुति करने लगे, गन्धर्व और किन्‍नर गाने लगे॥ ५४॥ अप्सराएँ नाचने लगीं। इस प्रकार उस समय बड़ा ही आनन्द-मंगल हुआ तथा ब्रह्मादि समस्त देवता स्तोत्रोंद्वारा भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ५५॥"},{"b":9821,"kind":"topic_heading","page":410,"text":"देवा ऊचुः"},{"b":9822,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.56"],"text":"यो मायया विरचितं निजयाऽऽत्मनीदं"},{"b":9823,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.56"],"text":"खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय।"},{"b":9824,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.56"],"text":"एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य"},{"b":9825,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.56"],"text":"प्रादुश्‍चकार पुरुषाय नमः परस्मै॥ ५६"},{"b":9826,"kind":"hindi_commentary","page":410,"explains":["4.1.56"],"text":"देवताओंने कहा—जिस प्रकार आकाशमें तरह-तरहके रूपोंकी कल्पना कर ली जाती है—उसी प्रकार जिन्होंने अपनी मायाके द्वारा अपने ही स्वरूपके अन्दर इस संसारकी रचना की है और अपने उस स्वरूपको प्रकाशित करनेके लिये इस समय इस ऋषि-विग्रहके साथ धर्मके घरमें अपने-आपको प्रकट किया है, उन परम पुरुषको हमारा नमस्कार है॥ ५६॥"},{"b":9827,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.57"],"text":"सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान्"},{"b":9828,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.57"],"text":"सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः।"},{"b":9829,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.57"],"text":"दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन"},{"b":9830,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.57"],"text":"यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम्॥ ५७"},{"b":9831,"kind":"hindi_commentary","page":410,"explains":["4.1.57"],"text":"जिनके तत्त्वका शास्त्रके आधारपर हमलोग केवल अनुमान ही करते हैं, प्रत्यक्ष नहीं कर पाते—उन्हीं भगवान्‌ने देवताओंको संसारकी मर्यादामें किसी प्रकारकी गड़बड़ी न हो, इसीलिये सत्त्वगुणसे उत्पन्‍न किया है। अब वे अपने करुणामय नेत्रोंसे—जो समस्त शोभा और सौन्दर्यके निवासस्थान निर्मल दिव्य कमलको भी नीचा दिखानेवाले हैं—हमारी ओर निहारें॥ ५७॥"},{"b":9832,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.58"],"text":"एवं सुरगणैस्तात भगवन्तावभिष्टुतौ।"},{"b":9833,"kind":"sanskrit_shloka","page":410,"verses":["4.1.58"],"text":"लब्धावलोकैर्ययतुरर्चितौ गन्धमादनम्॥ ५८"},{"b":9834,"kind":"hindi_commentary","page":410,"explains":["4.1.58"],"text":"प्यारे विदुरजी! प्रभुका साक्षात् दर्शन पाकर देवताओंने उनकी इस प्रकार स्तुति और पूजा की। तदनन्तर भगवान् नर-नारायण दोनों गन्धमादन पर्वतपर चले गये॥ ५८॥"},{"b":9835,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.59"],"text":"ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहागतौ।"},{"b":9836,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.59"],"text":"भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ॥ ५९"},{"b":9837,"kind":"hindi_commentary","page":411,"explains":["4.1.59"],"text":"भगवान् श्रीहरिके अंशभूत वे नर-नारायण ही इस समय पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यदुकुलभूषण श्रीकृष्ण और उन्हींके सरीखे श्यामवर्ण, कुरुकुलतिलक अर्जुनके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ ५९॥"},{"b":9838,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.60"],"text":"स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत्।"},{"b":9839,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.60"],"text":"पावकं पवमानं च शुचिं च हुतभोजनम्॥ ६०"},{"b":9840,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.61"],"text":"तेभ्योऽग्नयः समभवन् चत्वारिंशच्च पञ्च च।"},{"b":9841,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.61"],"text":"त एवैकोनपञ्चाशत्साकं पितृपितामहैः॥ ६१"},{"b":9842,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.62"],"text":"वैतानिके कर्मणि यन्‍नामभिर्ब्रह्मवादिभिः।"},{"b":9843,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.62"],"text":"आग्नेय्य इष्टयो यज्ञे निरूप्यन्तेऽग्नयस्तु ते॥ ६२"},{"b":9844,"kind":"hindi_commentary","page":411,"explains":["4.1.60","4.1.61","4.1.62"],"text":"अग्‍निदेवकी पत्‍नी स्वाहाने अग्‍निके ही अभिमानी पावक, पवमान और शुचि—ये तीन पुत्र उत्पन्‍न किये। ये तीनों ही हवन किये हुए पदार्थोंका भक्षण करनेवाले हैं॥ ६०॥ इन्हीं तीनोंसे पैंतालीस प्रकारके अग्‍नि और उत्पन्‍न हुए। ये ही अपने तीन पिता और एक पितामहको साथ लेकर उनचास अग्‍नि कहलाये॥ ६१॥ वेदज्ञ ब्राह्मण वैदिक यज्ञकर्ममें जिन उनचास अग्‍नियोंके नामोंसे आग्नेयी इष्टियाँ करते हैं, वे ये ही हैं॥ ६२॥"},{"b":9845,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.63"],"text":"अग्‍निष्वात्ता बर्हिषदः सोम्याः पितर आज्यपाः।"},{"b":9846,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.63"],"text":"साग्नयोऽनग्नयस्तेषां पत्‍नी दाक्षायणी स्वधा॥ ६३"},{"b":9847,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.64"],"text":"तेभ्यो दधार कन्ये द्वे वयुनां धारिणीं स्वधा।"},{"b":9848,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.64"],"text":"उभे ते ब्रह्मवादिन्यौ ज्ञानविज्ञानपारगे॥ ६४"},{"b":9849,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.65"],"text":"भवस्य पत्‍नी तु सती भवं देवमनुव्रता।"},{"b":9850,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.65"],"text":"आत्मनः सदृशं पुत्रं न लेभे गुणशीलतः॥ ६५"},{"b":9851,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.66"],"text":"पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा।"},{"b":9852,"kind":"sanskrit_shloka","page":411,"verses":["4.1.66"],"text":"अप्रौढैवात्मनाऽऽत्मानमजहाद्योगसंयुता॥ ६६"},{"b":9853,"kind":"hindi_translation","page":411,"explains":["4.1.63","4.1.64","4.1.65","4.1.66"],"text":"अग्‍निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमप और आज्यप—ये पितर हैं; इनमें साग्‍निक भी हैं और निरग्‍निक भी। इन सब पितरोंकी पत्‍नी दक्षकुमारी स्वधा हैं॥ ६३॥ इन पितरोंसे स्वधाके धारिणी और वयुना नामकी दो कन्याएँ हुईं। वे दोनों ही ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत और ब्रह्मज्ञानका उपदेश करनेवाली हुईं॥ ६४॥ महादेवजीकी पत्‍नी सती थीं, वे सब प्रकारसे अपने पतिदेवकी सेवामें संलग्न रहनेवाली थीं। किन्तु उनके अपने गुण और शीलके अनुरूप कोई पुत्र नहीं हुआ॥ ६५॥ क्योंकि सतीके पिता दक्षने बिना ही किसी अपराधके भगवान् शिवजीके प्रतिकूल आचरण किया था, इसलिये सतीने युवावस्थामें ही क्रोधवश योगके द्वारा स्वयं ही अपने शरीरका त्याग कर दिया था॥ ६६॥"},{"b":9854,"kind":"topic_heading","page":411,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे"},{"b":9855,"kind":"topic_heading","page":411,"text":"विदुरमैत्रेयसंवादे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥"}],"notes":[{"id":"v1:455","mark":"१","page":405,"after_verse":"4.1.1","text":"प्रा० पा०—सुव्रताः।"},{"id":"v1:456","mark":"*","page":405,"after_verse":"4.1.2","text":"‘पुत्रिकाधर्म’ के अनुसार किये जानेवाले विवाहमें यह शर्त होती है कि कन्याके जो पहला पुत्र होगा, उसे कन्याके पिता ले लेंगे।"},{"id":"v1:457","mark":"१","page":406,"after_verse":"4.1.9","text":"प्रा० पा०—यद०।"},{"id":"v1:458","mark":"२","page":406,"after_verse":"4.1.12","text":"प्रा० पा०—क्ताःक्षत्तर्ब्रह्म०।"},{"id":"v1:459","mark":"३","page":406,"after_verse":"4.1.13","text":"प्रा० पा०—यज्ञं च।"},{"id":"v1:460","mark":"४","page":406,"after_verse":"4.1.17","text":"प्रा० पा०—चो०।"}],"corrections":{"count":7,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}