{"id":"11.8","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 8","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथाष्टमोऽध्यायः","topics":["अवधूतोपाख्यान—अजगरसे लेकर पिंगलातक नौ गुरुओंकी कथा"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.8.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[763,769]},"verses":[{"id":"11.8.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/1/","page":763,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च।","देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्‍नेच्छेत तद् बुधः॥ १"],"iast":["sukhamaindriyakaṃ rājan svarge naraka eva ca|","dehināṃ yad yathā duḥkhaṃ tasmānneccheta tad budhaḥ|| 1"],"meaning":"अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं—राजन्! प्राणियोंको जैसे बिना इच्छाके, बिना किसी प्रयत्‍नके, रोकनेकी चेष्टा करनेपर भी पूर्वकर्मानुसार दुःख प्राप्त होते हैं, वैसे ही स्वर्गमें या नरकमें—कहीं भी रहें, उन्हें इन्द्रियसम्बन्धी सुख भी प्राप्त होते ही हैं। इसलिये सुख और दुःखका रहस्य जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि इनके लिये इच्छा अथवा किसी प्रकारका प्रयत्‍न न करे॥ १॥"},{"id":"11.8.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/2/","page":763,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेव वा।","यदृच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोऽक्रियः॥ २"],"iast":["grāsaṃ sumṛṣṭaṃ virasaṃ mahāntaṃ stokameva vā|","yadṛcchayaivāpatitaṃ grasedājagaro'kriyaḥ|| 2"],"meaning":"बिना माँगे, बिना इच्छा किये स्वयं ही अनायास जो कुछ मिल जाय—वह चाहे रूखा-सूखा हो, चाहे बहुत मधुर और स्वादिष्ट, अधिक हो या थोड़ा—बुद्धिमान् पुरुष अजगरके समान उसे ही खाकर जीवन-निर्वाह कर ले और उदासीन रहे॥ २॥"},{"id":"11.8.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/3/","page":763,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["शयीताहानि भूरीणि निराहारोऽनुपक्रमः।","यदि नोपनमेद् ग्रासो महाहिरिव दिष्टभुक्॥ ३"],"iast":["śayītāhāni bhūrīṇi nirāhāro'nupakramaḥ|","yadi nopanamed grāso mahāhiriva diṣṭabhuk|| 3"],"meaning":"यदि भोजन न मिले तो उसे भी प्रारब्ध-भोग समझकर किसी प्रकारकी चेष्टा न करे, बहुत दिनोंतक भूखा ही पड़ा रहे। उसे चाहिये कि अजगरके समान केवल प्रारब्धके अनुसार प्राप्त हुए भोजनमें ही सन्तुष्ट रहे॥ ३॥"},{"id":"11.8.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/4/","page":763,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["ओजःसहोबलयुतं बिभ्रद् देहमकर्मकम्।","शयानो वीतनिद्रश्‍च नेहेतेन्द्रियवानपि॥ ४"],"iast":["ojaḥsahobalayutaṃ bibhrad dehamakarmakam|","śayāno vītanidraśca nehetendriyavānapi|| 4"],"meaning":"उसके शरीरमें मनोबल, इन्द्रियबल और देहबल तीनों हों तब भी वह निश्‍चेष्ट ही रहे। निद्रारहित होनेपर भी सोया हुआ-सा रहे और कर्मेन्द्रियोंके होनेपर भी उनसे कोई चेष्टा न करे। राजन्! मैंने अजगरसे यही शिक्षा ग्रहण की है॥ ४॥"},{"id":"11.8.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/5/","page":763,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["मुनिः प्रसन्‍नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्ययः।","अनन्तपारो ह्यक्षोभ्यः स्तिमितोद इवार्णवः॥ ५"],"iast":["muniḥ prasannagambhīro durvigāhyo duratyayaḥ|","anantapāro hyakṣobhyaḥ stimitoda ivārṇavaḥ|| 5"],"meaning":"समुद्रसे मैंने यह सीखा है कि साधकको सर्वदा प्रसन्‍न और गम्भीर रहना चाहिये, उसका भाव अथाह, अपार और असीम होना चाहिये तथा किसी भी निमित्तसे उसे क्षोभ न होना चाहिये। उसे ठीक वैसे ही रहना चाहिये, जैसे ज्वार-भाटे और तरंगोंसे रहित शान्त समुद्र॥ ५॥"},{"id":"11.8.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/6/","page":763,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनिः।","नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागरः॥ ६"],"iast":["samṛddhakāmo hīno vā nārāyaṇaparo muniḥ|","notsarpeta na śuṣyeta saridbhiriva sāgaraḥ|| 6"],"meaning":"देखो, समुद्र वर्षाऋतुमें नदियोंकी बाढ़के कारण बढ़ता नहीं और न ग्रीष्म-ऋतुमें घटता ही है; वैसे ही भगवत्परायण साधकको भी सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिसे प्रफुल्लित न होना चाहिये और न उनके घटनेसे उदास ही होना चाहिये॥ ६॥"},{"id":"11.8.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/7/","page":764,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः।","प्रलोभितः पतत्यन्धे तमस्य‌ग्‍नौ पतंगवत्॥ ७"],"iast":["dṛṣṭvā striyaṃ devamāyāṃ tadbhāvairajitendriyaḥ|","pralobhitaḥ patatyandhe tamasyagnau pataṃgavat|| 7"],"meaning":"राजन्! मैंने पतिंगेसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह रूपपर मोहित होकर आगमें कूद पड़ता है और जल मरता है, वैसे ही अपनी इन्द्रियोंको वशमें न रखनेवाला पुरुष जब स्त्रीको देखता है तो उसके हाव-भावपर लट्टू हो जाता है और घोर अन्धकारमें, नरकमें गिरकर अपना सत्यानाश कर लेता है। सचमुच स्त्री देवताओंकी वह माया है, जिससे जीव भगवान् या मोक्षकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाता है॥ ७॥"},{"id":"11.8.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/8/","page":764,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["योषिद्धिरण्याभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः।","प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतंगवन्‍नश्यति नष्टदृष्टिः॥ ८"],"iast":["yoṣiddhiraṇyābharaṇāmbarādidravyeṣu māyāraciteṣu mūḍhaḥ|","pralobhitātmā hyupabhogabuddhyā pataṃgavannaśyati naṣṭadṛṣṭiḥ|| 8"],"meaning":"जो मूढ़ कामिनी-कंचन, गहने-कपड़े आदि नाशवान् मायिक पदार्थोंमें फँसा हुआ है और जिसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्ति उनके उपभोगके लिये ही लालायित है, वह अपनी विवेकबुद्धि खोकर पतिंगेके समान नष्ट हो जाता है॥ ८॥"},{"id":"11.8.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/9/","page":764,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["स्तोकं स्तोकं ग्रसेद् ग्रासं देहो वर्तेत यावता।","गृहानहिंसन्‍नातिष्ठेद् वृत्तिं माधुकरीं मुनिः॥ ९"],"iast":["stokaṃ stokaṃ grased grāsaṃ deho varteta yāvatā|","gṛhānahiṃsannātiṣṭhed vṛttiṃ mādhukarīṃ muniḥ|| 9"],"meaning":"राजन्! संन्यासीको चाहिये कि गृहस्थोंको किसी प्रकारका कष्ट न देकर भौंरेकी तरह अपना जीवन-निर्वाह करे। वह अपने शरीरके लिये उपयोगी रोटीके कुछ टुकड़े कई घरोंसे माँग ले॥ ९॥"},{"id":"11.8.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/10/","page":764,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["अणुभ्यश्‍च महद‍्भ्यश्‍च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः।","सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥ १०"],"iast":["aṇubhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyaḥ kuśalo naraḥ|","sarvataḥ sāramādadyāt puṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ|| 10"],"meaning":"जिस प्रकार भौंरा विभिन्‍न पुष्पोंसे—चाहे वे छोटे हों या बड़े—उनका सार संग्रह करता है, वैसे ही बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि छोटे-बड़े सभी शास्त्रोंसे उनका सार—उनका रस निचोड़ ले॥ १०॥"},{"id":"11.8.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/11/","page":764,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["सायन्तनं श्‍वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षितम्।","पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न सङ्ग्रही॥ ११"],"iast":["sāyantanaṃ śvastanaṃ vā na saṃgṛhṇīta bhikṣitam|","pāṇipātrodarāmatro makṣikeva na saṅgrahī|| 11"],"meaning":"राजन्! मैंने मधुमक्खीसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संन्यासीको सायंकाल अथवा दूसरे दिनके लिये भिक्षाका संग्रह न करना चाहिये। उसके पास भिक्षा लेनेको कोई पात्र हो तो केवल हाथ और रखनेके लिये कोई बर्तन हो तो पेट। वह कहीं संग्रह न कर बैठे, नहीं तो मधुमक्खियोंके समान उसका जीवन ही दूभर हो जायगा॥ ११॥"},{"id":"11.8.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/12/","page":764,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["सायन्तनं श्‍वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षुकः।","मक्षिका इव संगृह्णन् सह तेन विनश्यति॥ १२"],"iast":["sāyantanaṃ śvastanaṃ vā na saṃgṛhṇīta bhikṣukaḥ|","makṣikā iva saṃgṛhṇan saha tena vinaśyati|| 12"],"meaning":"यह बात खूब समझ लेनी चाहिये कि संन्यासी सबेरे-शामके लिये किसी प्रकारका संग्रह न करे; यदि संग्रह करेगा तो मधुमक्खियोंके समान अपने संग्रहके साथ ही जीवन भी गँवा बैठेगा॥ १२॥"},{"id":"11.8.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/13/","page":765,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि।","स्पृशन् करीव बध्येत करिण्या अंगसंगतः॥ १३"],"iast":["padāpi yuvatīṃ bhikṣurna spṛśed dāravīmapi|","spṛśan karīva badhyeta kariṇyā aṃgasaṃgataḥ|| 13"],"meaning":"राजन्! मैंने हाथीसे यह सीखा कि संन्यासीको कभी पैरसे भी काठकी बनी हुई स्त्रीका भी स्पर्श न करना चाहिये। यदि वह ऐसा करेगा तो जैसे हथिनीके अंग-संगसे हाथी बँध जाता है, वैसे ही वह भी बँध जायगा॥ १३॥"},{"id":"11.8.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/14/","page":765,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["नाधिगच्छेत् स्त्रियं प्राज्ञः कर्हिचिन्मृत्युमात्मनः।","बलाधिकैः स हन्येत गजैरन्यैर्गजो यथा॥ १४"],"iast":["nādhigacchet striyaṃ prājñaḥ karhicinmṛtyumātmanaḥ|","balādhikaiḥ sa hanyeta gajairanyairgajo yathā|| 14"],"meaning":"विवेकी पुरुष किसी भी स्त्रीको कभी भी भोग्यरूपसे स्वीकार न करे; क्योंकि यह उसकी मूर्तिमती मृत्यु है। यदि वह स्वीकार करेगा तो हाथियोंसे हाथीकी तरह अधिक बलवान् अन्य पुरुषोंके द्वारा मारा जायगा॥ १४॥"},{"id":"11.8.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/15/","page":765,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["न देयं नोपभोग्यं च लुब्धैर्यद् दुःखसंचितम्।","भुङ्क्ते तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु॥ १५"],"iast":["na deyaṃ nopabhogyaṃ ca lubdhairyad duḥkhasaṃcitam|","bhuṅkte tadapi taccānyo madhuhevārthavinmadhu|| 15"],"meaning":"मैंने मधु निकालनेवाले पुरुषसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संसारके लोभी पुरुष बड़ी कठिनाईसे धनका संचय तो करते रहते हैं, किन्तु वह संचित धन न किसीको दान करते हैं और न स्वयं उसका उपभोग ही करते हैं। बस, जैसे मधु निकालनेवाला मधुमक्खियोंद्वारा संचित रसको निकाल ले जाता है वैसे ही उनके संचित धनको भी उसकी टोह रखनेवाला कोई दूसरा पुरुष ही भोगता है॥ १५॥"},{"id":"11.8.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/16/","page":765,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिषः।","मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम्॥ १६"],"iast":["suduḥkhopārjitairvittairāśāsānāṃ gṛhāśiṣaḥ|","madhuhevāgrato bhuṅkte yatirvai gṛhamedhinām|| 16"],"meaning":"तुम देखते हो न कि मधुहारी मधुमक्खियोंका जोड़ा हुआ मधु उनके खानेसे पहले ही साफ कर जाता है; वैसे ही गृहस्थोंके बहुत कठिनाईसे संचित किये पदार्थोंको, जिनसे वे सुखभोगकी अभिलाषा रखते हैं, उनसे भी पहले संन्यासी और ब्रह्मचारी भोगते हैं। क्योंकि गृहस्थ तो पहले अतिथि-अभ्यागतोंको भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करेगा॥ १६॥"},{"id":"11.8.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/17/","page":765,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["ग्राम्यगीतं न शृणुयाद् यतिर्वनचरः क्‍वचित्।","शिक्षेत हरिणाद् बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात्॥ १७"],"iast":["grāmyagītaṃ na śṛṇuyād yatirvanacaraḥ kvacit|","śikṣeta hariṇād baddhānmṛgayorgītamohitāt|| 17"],"meaning":"मैंने हरिनसे यह सीखा है कि वनवासी संन्यासीको कभी विषय-सम्बन्धी गीत नहीं सुनने चाहिये। वह इस बातकी शिक्षा उस हरिनसे ग्रहण करे जो व्याधके गीतसे मोहित होकर बँध जाता है॥ १७॥"},{"id":"11.8.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/18/","page":765,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["नृत्यवादित्रगीतानि जुषन् ग्राम्याणि योषिताम्।","आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यशृंगो मृगीसुतः॥ १८"],"iast":["nṛtyavāditragītāni juṣan grāmyāṇi yoṣitām|","āsāṃ krīḍanako vaśya ṛṣyaśṛṃgo mṛgīsutaḥ|| 18"],"meaning":"तुम्हें इस बातका पता है कि हरिनीके गर्भसे पैदा हुए ऋष्यशृंग मुनि स्त्रियोंका विषय-सम्बन्धी गाना-बजाना, नाचना आदि देख-सुनकर उनके वशमें हो गये थे और उनके हाथकी कठपुतली बन गये थे॥ १८॥"},{"id":"11.8.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/19/","page":766,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["जिह्वयातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः।","मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा॥ १९"],"iast":["jihvayātipramāthinyā jano rasavimohitaḥ|","mṛtyumṛcchatyasadbuddhirmīnastu baḍiśairyathā|| 19"],"meaning":"अब मैं तुम्हें मछलीकी सीख सुनाता हूँ। जैसे मछली काँटेमें लगे हुए मांसके टुकड़ेके लोभसे अपने प्राण गँवा देती है, वैसे ही स्वादका लोभी दुर्बुद्धि मनुष्य भी मनको मथकर व्याकुल कर देनेवाली अपनी जिह्वाके वशमें हो जाता है और मारा जाता है॥ १९॥"},{"id":"11.8.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/20/","page":766,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः।","वर्जयित्वा तु रसनं तन्‍निरन्‍नस्य वर्धते॥ २०"],"iast":["indriyāṇi jayantyāśu nirāhārā manīṣiṇaḥ|","varjayitvā tu rasanaṃ tannirannasya vardhate|| 20"],"meaning":"विवेकी पुरुष भोजन बंद करके दूसरी इन्द्रियोंपर तो बहुत शीघ्र विजय प्राप्त कर लेते हैं, परन्तु इससे उनकी रसना-इन्द्रिय वशमें नहीं होती। वह तो भोजन बंद कर देनेसे और भी प्रबल हो जाती है॥ २०॥"},{"id":"11.8.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/21/","page":766,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान्।","न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे॥ २१"],"iast":["tāvajjitendriyo na syād vijitānyendriyaḥ pumān|","na jayed rasanaṃ yāvajjitaṃ sarvaṃ jite rase|| 21"],"meaning":"मनुष्य और सब इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेनेपर भी तबतक जितेन्द्रिय नहीं हो सकता, जबतक रसनेन्द्रियको अपने वशमें नहीं कर लेता। और यदि रसनेन्द्रियको वशमें कर लिया, तब तो मानो सभी इन्द्रियाँ वशमें हो गयीं॥ २१॥"},{"id":"11.8.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/22/","page":766,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["पिंगला नाम वेश्याऽऽसीद् विदेहनगरे पुरा।","तस्या मे शिक्षितं किंचिन्‍निबोध नृपनन्दन॥ २२"],"iast":["piṃgalā nāma veśyā''sīd videhanagare purā|","tasyā me śikṣitaṃ kiṃcinnibodha nṛpanandana|| 22"],"meaning":"नृपनन्दन! प्राचीन कालकी बात है, विदेहनगरी मिथिलामें एक वेश्या रहती थी। उसका नाम था पिंगला। मैंने उससे जो कुछ शिक्षा ग्रहण की, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ; सावधान होकर सुनो॥ २२॥"},{"id":"11.8.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/23/","page":766,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["सा स्वैरिण्येकदा कान्तं संकेत उपनेष्यती।","अभूत् काले बहिर्द्वारि बिभ्रती रूपमुत्तमम्॥ २३"],"iast":["sā svairiṇyekadā kāntaṃ saṃketa upaneṣyatī|","abhūt kāle bahirdvāri bibhratī rūpamuttamam|| 23"],"meaning":"वह स्वेच्छाचारिणी तो थी ही, रूपवती भी थी। एक दिन रात्रिके समय किसी पुरुषको अपने रमणस्थानमें लानेके लिये खूब बन-ठनकर—उत्तम वस्त्राभूषणोंसे सजकर बहुत देरतक अपने घरके बाहरी दरवाजेपर खड़ी रही॥ २३॥"},{"id":"11.8.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/24/","page":766,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान् पुरुषर्षभ।","ताञ्छुल्कदान् वित्तवतः कान्तान् मेनेऽर्थकामुका॥ २४"],"iast":["mārga āgacchato vīkṣya puruṣān puruṣarṣabha|","tāñchulkadān vittavataḥ kāntān mene'rthakāmukā|| 24"],"meaning":"नररत्‍न! उसे पुरुषकी नहीं, धनकी कामना थी और उसके मनमें यह कामना इतनी दृढ़मूल हो गयी थी कि वह किसी भी पुरुषको उधरसे आते-जाते देखकर यही सोचती कि यह कोई धनी है और मुझे धन देकर उपभोग करनेके लिये ही आ रहा है॥ २४॥"},{"id":"11.8.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/25/","page":766,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["आगतेष्वपयातेषु सा संकेतोपजीविनी।","अप्यन्यो वित्तवान् कोऽपि मामुपैष्यति भूरिदः॥ २५"],"iast":["āgateṣvapayāteṣu sā saṃketopajīvinī|","apyanyo vittavān ko'pi māmupaiṣyati bhūridaḥ|| 25"],"meaning":"जब आने-जानेवाले आगे बढ़ जाते, तब फिर वह संकेतजीविनी वेश्या यही सोचती कि अवश्य ही अबकी बार कोई ऐसा धनी मेरे पास आवेगा जो मुझे बहुत-सा धन देगा॥ २५॥"},{"id":"11.8.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/26/","page":766,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती।","निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत॥ २६"],"iast":["evaṃ durāśayā dhvastanidrā dvāryavalambatī|","nirgacchantī praviśatī niśīthaṃ samapadyata|| 26"],"meaning":"उसके चित्तकी यह दुराशा बढ़ती ही जाती थी। वह दरवाजेपर बहुत देरतक टँगी रही। उसकी नींद भी जाती रही। वह कभी बाहर आती तो कभी भीतर जाती। इस प्रकार आधी रात हो गयी॥ २६॥"},{"id":"11.8.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/27/","page":767,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतसः।","निर्वेदः परमो जज्ञे चिन्ताहेतुः सुखावहः॥ २७"],"iast":["tasyā vittāśayā śuṣyadvaktrāyā dīnacetasaḥ|","nirvedaḥ paramo jajñe cintāhetuḥ sukhāvahaḥ|| 27"],"meaning":"राजन्! सचमुच आशा और सो भी धनकी—बहुत बुरी है। धनीकी बाट जोहते-जोहते उसका मुँह सूख गया, चित्त व्याकुल हो गया। अब उसे इस वृत्तिसे बड़ा वैराग्य हुआ। उसमें दुःख-बुद्धि हो गयी। इसमें सन्देह नहीं कि इस वैराग्यका कारण चिन्ता ही थी। परन्तु ऐसा वैराग्य भी है तो सुखका ही हेतु॥ २७॥"},{"id":"11.8.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/28/","page":767,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तस्या निर्विण्णचित्ताया गीतं शृणु यथा मम।","निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसिः॥ २८"],"iast":["tasyā nirviṇṇacittāyā gītaṃ śṛṇu yathā mama|","nirveda āśāpāśānāṃ puruṣasya yathā hyasiḥ|| 28"],"meaning":"जब पिंगलाके चित्तमें इस प्रकार वैराग्यकी भावना जाग्रत् हुई, तब उसने एक गीत गाया। वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। राजन्! मनुष्य आशाकी फाँसीपर लटक रहा है। इसको तलवारकी तरह काटनेवाली यदि कोई वस्तु है तो वह केवल वैराग्य है॥ २८॥"},{"id":"11.8.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/29/","page":767,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["न ह्यंगाजातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति।","यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप॥ २९"],"iast":["na hyaṃgājātanirvedo dehabandhaṃ jihāsati|","yathā vijñānarahito manujo mamatāṃ nṛpa|| 29"],"meaning":"प्रिय राजन्! जिसे वैराग्य नहीं हुआ है, जो इन बखेड़ोंसे ऊबा नहीं है, वह शरीर और इसके बन्धनसे उसी प्रकार मुक्त नहीं होना चाहता, जैसे अज्ञानी पुरुष ममता छोड़नेकी इच्छा भी नहीं करता॥ २९॥"},{"id":"11.8.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/30/","page":767,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मनः।","या कान्तादसतः कामं कामये येन बालिशा॥ ३०"],"iast":["aho me mohavitatiṃ paśyatāvijitātmanaḥ|","yā kāntādasataḥ kāmaṃ kāmaye yena bāliśā|| 30"],"meaning":"पिंगलाने यह गीत गाया था—हाय! हाय! मैं इन्द्रियोंके अधीन हो गयी। भला! मेरे मोहका विस्तार तो देखो, मैं इन दुष्ट पुरुषोंसे, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, विषयसुखकी लालसा करती हूँ। कितने दुःखकी बात है! मैं सचमुच मूर्ख हूँ॥ ३०॥"},{"id":"11.8.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/31/","page":767,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं","वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।","अकामदं दुःखभयाधिशोक-","मोहप्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा॥ ३१"],"iast":["santaṃ samīpe ramaṇaṃ ratipradaṃ","vittapradaṃ nityamimaṃ vihāya|","akāmadaṃ duḥkhabhayādhiśoka-","mohapradaṃ tucchamahaṃ bhaje'jñā|| 31"],"meaning":"देखो तो सही, मेरे निकट-से-निकट हृदयमें ही मेरे सच्चे स्वामी भगवान् विराजमान हैं। वे वास्तविक प्रेम, सुख और परमार्थका सच्चा धन भी देनेवाले हैं। जगत‍्के पुरुष अनित्य हैं और वे नित्य हैं। हाय! हाय! मैंने उनको तो छोड़ दिया और उन तुच्छ मनुष्योंका सेवन किया जो मेरी एक भी कामना पूरी नहीं कर सकते; उलटे दुःख-भय, आधि-व्याधि, शोक और मोह ही देते हैं। यह मेरी मूर्खताकी हद है कि मैं उनका सेवन करती हूँ॥ ३१॥"},{"id":"11.8.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/32/","page":767,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा","सांकेत्यवृत्त्यातिविगर्ह्यवार्तया ।","स्त्रैणान्‍नराद् यार्थतृषोऽनुशोच्यात्","क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती॥ ३२"],"iast":["aho mayā''tmā paritāpito vṛthā","sāṃketyavṛttyātivigarhyavārtayā |","straiṇānnarād yārthatṛṣo'nuśocyāt","krītena vittaṃ ratimātmanecchatī|| 32"],"meaning":"बड़े खेदकी बात है, मैंने अत्यन्त निन्दनीय आजीविका वेश्यावृत्तिका आश्रय लिया और व्यर्थमें अपने शरीर और मनको क्लेश दिया, पीड़ा पहुँचायी। मेरा यह शरीर बिक गया है। लम्पट, लोभी और निन्दनीय मनुष्योंने इसे खरीद लिया है और मैं इतनी मूर्ख हूँ कि इसी शरीरसे धन और रति-सुख चाहती हूँ। मुझे धिक्कार है!॥ ३२॥"},{"id":"11.8.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/33/","page":768,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंश्यस्थूणं त्वचा रोमनखैः पिनद्धम्।","क्षरन्‍नवद्वारमगारमेतद् विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या॥ ३३"],"iast":["yadasthibhirnirmitavaṃśavaṃśyasthūṇaṃ tvacā romanakhaiḥ pinaddham|","kṣarannavadvāramagārametad viṇmūtrapūrṇaṃ madupaiti kānyā|| 33"],"meaning":"यह शरीर एक घर है। इसमें हड्डियोंके टेढ़े-तिरछे बाँस और खंभे लगे हुए हैं; चाम, रोएँ और नाखूनोंसे यह छाया गया है। इसमें नौ दरवाजे हैं, जिनसे मल निकलते ही रहते हैं। इसमें संचित सम्पत्तिके नामपर केवल मल और मूत्र हैं। मेरे अतिरिक्त ऐसी कौन स्त्री है जो इस स्थूल शरीरको अपना प्रिय समझकर सेवन करेगी॥ ३३॥"},{"id":"11.8.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/34/","page":768,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्‍नहमेकैव मूढधीः।","यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात्॥ ३४"],"iast":["videhānāṃ pure hyasminnahamekaiva mūḍhadhīḥ|","yānyamicchantyasatyasmādātmadāt kāmamacyutāt|| 34"],"meaning":"यों तो यह विदेहोंकी—जीवन्मुक्तोंकी नगरी है, परन्तु इसमें मैं ही सबसे मूर्ख और दुष्ट हूँ; क्योंकि अकेली मैं ही तो आत्मदानी, अविनाशी एवं परमप्रियतम परमात्माको छोड़कर दूसरे पुरुषकी अभिलाषा करती हूँ॥ ३४॥"},{"id":"11.8.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/35/","page":768,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["सुहृत् प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्।","तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा॥ ३५"],"iast":["suhṛt preṣṭhatamo nātha ātmā cāyaṃ śarīriṇām|","taṃ vikrīyātmanaivāhaṃ rame'nena yathā ramā|| 35"],"meaning":"मेरे हृदयमें विराजमान प्रभु, समस्त प्राणियोंके हितैषी, सुहृद्, प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं। अब मैं अपने-आपको देकर इन्हें खरीद लूँगी और इनके साथ वैसे ही विहार करूँगी, जैसे लक्ष्मीजी करती हैं॥ ३५॥"},{"id":"11.8.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/36/","page":768,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["कियत् प्रियं ते व्यभजन् कामा ये कामदा नराः।","आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्रुताः॥ ३६"],"iast":["kiyat priyaṃ te vyabhajan kāmā ye kāmadā narāḥ|","ādyantavanto bhāryāyā devā vā kālavidrutāḥ|| 36"],"meaning":"मेरे मूर्ख चित्त! तू बतला तो सही, जगत‍्के विषयभोगोंने और उनको देनेवाले पुरुषोंने तुझे कितना सुख दिया है। अरे! वे तो स्वयं ही पैदा होते और मरते रहते हैं। मैं केवल अपनी ही बात नहीं कहती, केवल मनुष्योंकी भी नहीं; क्या देवताओंने भी भोगोंके द्वारा अपनी पत्‍नियोंको सन्तुष्ट किया है? वे बेचारे तो स्वयं कालके गालमें पड़े-पड़े कराह रहे हैं॥ ३६॥"},{"id":"11.8.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/37/","page":768,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["नूनं मे भगवान् प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा।","निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः॥ ३७"],"iast":["nūnaṃ me bhagavān prīto viṣṇuḥ kenāpi karmaṇā|","nirvedo'yaṃ durāśāyā yanme jātaḥ sukhāvahaḥ|| 37"],"meaning":"अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्मसे विष्णुभगवान् मुझपर प्रसन्‍न हैं, तभी तो दुराशासे मुझे इस प्रकार वैराग्य हुआ है। अवश्य ही मेरा यह वैराग्य सुख देनेवाला होगा॥ ३७॥"},{"id":"11.8.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/38/","page":768,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["मैवं स्युर्मन्दभाग्यायाः क्लेशा निर्वेदहेतवः।","येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुषः शममृच्छति॥ ३८"],"iast":["maivaṃ syurmandabhāgyāyāḥ kleśā nirvedahetavaḥ|","yenānubandhaṃ nirhṛtya puruṣaḥ śamamṛcchati|| 38"],"meaning":"यदि मैं मन्दभागिनी होती तो मुझे ऐसे दुःख ही न उठाने पड़ते, जिनसे वैराग्य होता है। मनुष्य वैराग्यके द्वारा ही घर आदिके सब बन्धनोंको काटकर शान्तिलाभ करता है॥ ३८॥"},{"id":"11.8.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/39/","page":768,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसंगताः।","त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्‍वरम्॥ ३९"],"iast":["tenopakṛtamādāya śirasā grāmyasaṃgatāḥ|","tyaktvā durāśāḥ śaraṇaṃ vrajāmi tamadhīśvaram|| 39"],"meaning":"अब मैं भगवान्‌का यह उपकार आदरपूर्वक सिर झुकाकर स्वीकार करती हूँ और विषयभोगोंकी दुराशा छोड़कर उन्हीं जगदीश्‍वरकी शरण ग्रहण करती हूँ॥ ३९॥"},{"id":"11.8.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/40/","page":768,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["सन्तुष्टा श्रद्दधत्येतद्यथालाभेन जीवती।","विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै॥ ४०"],"iast":["santuṣṭā śraddadhatyetadyathālābhena jīvatī|","viharāmyamunaivāhamātmanā ramaṇena vai|| 40"],"meaning":"अब मुझे प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जायगा उसीसे निर्वाह कर लूँगी और बड़े सन्तोष तथा श्रद्धाके साथ रहूँगी। मैं अब किसी दूसरे पुरुषकी ओर न ताककर अपने हृदयेश्‍वर, आत्मस्वरूप प्रभुके साथ ही विहार करूँगी॥ ४०॥"},{"id":"11.8.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/41/","page":769,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम्।","ग्रस्तं कालाहिनाऽऽत्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्‍वरः॥ ४१"],"iast":["saṃsārakūpe patitaṃ viṣayairmuṣitekṣaṇam|","grastaṃ kālāhinā''tmānaṃ ko'nyastrātumadhīśvaraḥ|| 41"],"meaning":"यह जीव संसारके कूएँमें गिरा हुआ है। विषयोंने इसे अंधा बना दिया है, कालरूपी अजगरने इसे अपने मुँहमें दबा रखा है। अब भगवान्‌को छोड़कर इसकी रक्षा करनेमें दूसरा कौन समर्थ है॥ ४१॥"},{"id":"11.8.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/42/","page":769,"speaker":"पिंगलोवाच","sanskrit":["आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात्।","अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत्॥ ४२"],"iast":["ātmaiva hyātmano goptā nirvidyeta yadākhilāt|","apramatta idaṃ paśyed grastaṃ kālāhinā jagat|| 42"],"meaning":"जिस समय जीव समस्त विषयोंसे विरक्त हो जाता है, उस समय वह स्वयं ही अपनी रक्षा कर लेता है। इसलिये बड़ी सावधानीके साथ यह देखते रहना चाहिये कि सारा जगत् कालरूपी अजगरसे ग्रस्त है॥ ४२॥"},{"id":"11.8.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/43/","page":769,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["एवं व्यवसितमतिर्दुराशां कान्ततर्षजाम्।","छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा॥ ४३"],"iast":["evaṃ vyavasitamatirdurāśāṃ kāntatarṣajām|","chittvopaśamamāsthāya śayyāmupaviveśa sā|| 43"],"meaning":"अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं—राजन्! पिंगला वेश्याने ऐसा निश्‍चय करके अपने प्रिय धनियोंकी दुराशा, उनसे मिलनेकी लालसाका परित्याग कर दिया और शान्तभावसे जाकर वह अपनी सेजपर सो रही॥ ४३॥"},{"id":"11.8.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/44/","page":769,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।","यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिंगला॥ ४४"],"iast":["āśā hi paramaṃ duḥkhaṃ nairāśyaṃ paramaṃ sukham|","yathā sañchidya kāntāśāṃ sukhaṃ suṣvāpa piṃgalā|| 44"],"meaning":"सचमुच आशा ही सबसे बड़ा दुःख है और निराशा ही सबसे बड़ा सुख है; क्योंकि पिंगला वेश्याने जब पुरुषकी आशा त्याग दी, तभी वह सुखसे सो सकी॥ ४४॥"}],"text":[{"b":39292,"kind":"adhyaya_heading","page":763,"text":"अथाष्टमोऽध्यायः"},{"b":39293,"kind":"topic_heading","page":763,"text":"अवधूतोपाख्यान—अजगरसे लेकर पिंगलातक नौ गुरुओंकी कथा"},{"b":39294,"kind":"topic_heading","page":763,"text":"ब्राह्मण उवाच"},{"b":39295,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.1"],"text":"सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च।"},{"b":39296,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.1"],"text":"देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्‍नेच्छेत तद् बुधः॥ १"},{"b":39297,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.2"],"text":"ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेव वा।"},{"b":39298,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.2"],"text":"यदृच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोऽक्रियः॥ २"},{"b":39299,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.3"],"text":"शयीताहानि भूरीणि निराहारोऽनुपक्रमः।"},{"b":39300,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.3"],"text":"यदि नोपनमेद् ग्रासो महाहिरिव दिष्टभुक्॥ ३"},{"b":39301,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.4"],"text":"ओजःसहोबलयुतं बिभ्रद् देहमकर्मकम्।"},{"b":39302,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.4"],"text":"शयानो वीतनिद्रश्‍च नेहेतेन्द्रियवानपि॥ ४"},{"b":39303,"kind":"hindi_commentary","page":763,"explains":["11.8.1","11.8.2","11.8.3","11.8.4"],"text":"अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं—राजन्! प्राणियोंको जैसे बिना इच्छाके, बिना किसी प्रयत्‍नके, रोकनेकी चेष्टा करनेपर भी पूर्वकर्मानुसार दुःख प्राप्त होते हैं, वैसे ही स्वर्गमें या नरकमें—कहीं भी रहें, उन्हें इन्द्रियसम्बन्धी सुख भी प्राप्त होते ही हैं। इसलिये सुख और दुःखका रहस्य जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि इनके लिये इच्छा अथवा किसी प्रकारका प्रयत्‍न न करे॥ १॥ बिना माँगे, बिना इच्छा किये स्वयं ही अनायास जो कुछ मिल जाय—वह चाहे रूखा-सूखा हो, चाहे बहुत मधुर और स्वादिष्ट, अधिक हो या थोड़ा—बुद्धिमान् पुरुष अजगरके समान उसे ही खाकर जीवन-निर्वाह कर ले और उदासीन रहे॥ २॥ यदि भोजन न मिले तो उसे भी प्रारब्ध-भोग समझकर किसी प्रकारकी चेष्टा न करे, बहुत दिनोंतक भूखा ही पड़ा रहे। उसे चाहिये कि अजगरके समान केवल प्रारब्धके अनुसार प्राप्त हुए भोजनमें ही सन्तुष्ट रहे॥ ३॥ उसके शरीरमें मनोबल, इन्द्रियबल और देहबल तीनों हों तब भी वह निश्‍चेष्ट ही रहे। निद्रारहित होनेपर भी सोया हुआ-सा रहे और कर्मेन्द्रियोंके होनेपर भी उनसे कोई चेष्टा न करे। राजन्! मैंने अजगरसे यही शिक्षा ग्रहण की है॥ ४॥"},{"b":39304,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.5"],"text":"मुनिः प्रसन्‍नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्ययः।"},{"b":39305,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.5"],"text":"अनन्तपारो ह्यक्षोभ्यः स्तिमितोद इवार्णवः॥ ५"},{"b":39306,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.6"],"text":"समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनिः।"},{"b":39307,"kind":"sanskrit_shloka","page":763,"verses":["11.8.6"],"text":"नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागरः॥ ६"},{"b":39308,"kind":"hindi_translation","page":763,"explains":["11.8.5","11.8.6"],"text":"समुद्रसे मैंने यह सीखा है कि साधकको सर्वदा प्रसन्‍न और गम्भीर रहना चाहिये, उसका भाव अथाह, अपार और असीम होना चाहिये तथा किसी भी निमित्तसे उसे क्षोभ न होना चाहिये। उसे ठीक वैसे ही रहना चाहिये, जैसे ज्वार-भाटे और तरंगोंसे रहित शान्त समुद्र॥ ५॥ देखो, समुद्र वर्षाऋतुमें नदियोंकी बाढ़के कारण बढ़ता नहीं और न ग्रीष्म-ऋतुमें घटता ही है; वैसे ही भगवत्परायण साधकको भी सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिसे प्रफुल्लित न होना चाहिये और न उनके घटनेसे उदास ही होना चाहिये॥ ६॥"},{"b":39309,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.7"],"text":"दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः।"},{"b":39310,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.7"],"text":"प्रलोभितः पतत्यन्धे तमस्य‌ग्‍नौ पतंगवत्॥ ७"},{"b":39311,"kind":"hindi_commentary","page":764,"verses":["11.8.8"],"text":"योषिद्धिरण्याभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः।"},{"b":39312,"kind":"hindi_translation","page":764,"verses":["11.8.8"],"text":"प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतंगवन्‍नश्यति नष्टदृष्टिः॥ ८"},{"b":39313,"kind":"hindi_translation","page":764,"explains":["11.8.7","11.8.8"],"text":"राजन्! मैंने पतिंगेसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह रूपपर मोहित होकर आगमें कूद पड़ता है और जल मरता है, वैसे ही अपनी इन्द्रियोंको वशमें न रखनेवाला पुरुष जब स्त्रीको देखता है तो उसके हाव-भावपर लट्टू हो जाता है और घोर अन्धकारमें, नरकमें गिरकर अपना सत्यानाश कर लेता है। सचमुच स्त्री देवताओंकी वह माया है, जिससे जीव भगवान् या मोक्षकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाता है॥ ७॥ जो मूढ़ कामिनी-कंचन, गहने-कपड़े आदि नाशवान् मायिक पदार्थोंमें फँसा हुआ है और जिसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्ति उनके उपभोगके लिये ही लालायित है, वह अपनी विवेकबुद्धि खोकर पतिंगेके समान नष्ट हो जाता है॥ ८॥"},{"b":39314,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.9"],"text":"स्तोकं स्तोकं ग्रसेद् ग्रासं देहो वर्तेत यावता।"},{"b":39315,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.9"],"text":"गृहानहिंसन्‍नातिष्ठेद् वृत्तिं माधुकरीं मुनिः॥ ९"},{"b":39316,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.10"],"text":"अणुभ्यश्‍च महद‍्भ्यश्‍च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः।"},{"b":39317,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.10"],"text":"सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥ १०"},{"b":39318,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.11"],"text":"सायन्तनं श्‍वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षितम्।"},{"b":39319,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.11"],"text":"पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न सङ्ग्रही॥ ११"},{"b":39320,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.12"],"text":"सायन्तनं श्‍वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षुकः।"},{"b":39321,"kind":"sanskrit_shloka","page":764,"verses":["11.8.12"],"text":"मक्षिका इव संगृह्णन् सह तेन विनश्यति॥ १२"},{"b":39322,"kind":"hindi_translation","page":764,"explains":["11.8.9","11.8.10","11.8.11","11.8.12"],"text":"राजन्! संन्यासीको चाहिये कि गृहस्थोंको किसी प्रकारका कष्ट न देकर भौंरेकी तरह अपना जीवन-निर्वाह करे। वह अपने शरीरके लिये उपयोगी रोटीके कुछ टुकड़े कई घरोंसे माँग ले॥ ९॥ जिस प्रकार भौंरा विभिन्‍न पुष्पोंसे—चाहे वे छोटे हों या बड़े—उनका सार संग्रह करता है, वैसे ही बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि छोटे-बड़े सभी शास्त्रोंसे उनका सार—उनका रस निचोड़ ले॥ १०॥ राजन्! मैंने मधुमक्खीसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संन्यासीको सायंकाल अथवा दूसरे दिनके लिये भिक्षाका संग्रह न करना चाहिये। उसके पास भिक्षा लेनेको कोई पात्र हो तो केवल हाथ और रखनेके लिये कोई बर्तन हो तो पेट। वह कहीं संग्रह न कर बैठे, नहीं तो मधुमक्खियोंके समान उसका जीवन ही दूभर हो जायगा॥ ११॥ यह बात खूब समझ लेनी चाहिये कि संन्यासी सबेरे-शामके लिये किसी प्रकारका संग्रह न करे; यदि संग्रह करेगा तो मधुमक्खियोंके समान अपने संग्रहके साथ ही जीवन भी गँवा बैठेगा॥ १२॥"},{"b":39323,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.13"],"text":"पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि।"},{"b":39324,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.13"],"text":"स्पृशन् करीव बध्येत करिण्या अंगसंगतः॥ १३"},{"b":39325,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.14"],"text":"नाधिगच्छेत् स्त्रियं प्राज्ञः कर्हिचिन्मृत्युमात्मनः।"},{"b":39326,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.14"],"text":"बलाधिकैः स हन्येत गजैरन्यैर्गजो यथा॥ १४"},{"b":39327,"kind":"hindi_translation","page":765,"explains":["11.8.13","11.8.14"],"text":"राजन्! मैंने हाथीसे यह सीखा कि संन्यासीको कभी पैरसे भी काठकी बनी हुई स्त्रीका भी स्पर्श न करना चाहिये। यदि वह ऐसा करेगा तो जैसे हथिनीके अंग-संगसे हाथी बँध जाता है, वैसे ही वह भी बँध जायगा॥ १३॥ विवेकी पुरुष किसी भी स्त्रीको कभी भी भोग्यरूपसे स्वीकार न करे; क्योंकि यह उसकी मूर्तिमती मृत्यु है। यदि वह स्वीकार करेगा तो हाथियोंसे हाथीकी तरह अधिक बलवान् अन्य पुरुषोंके द्वारा मारा जायगा॥ १४॥"},{"b":39328,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.15"],"text":"न देयं नोपभोग्यं च लुब्धैर्यद् दुःखसंचितम्।"},{"b":39329,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.15"],"text":"भुङ्क्ते तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु॥ १५"},{"b":39330,"kind":"hindi_translation","page":765,"explains":["11.8.15"],"text":"मैंने मधु निकालनेवाले पुरुषसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संसारके लोभी पुरुष बड़ी कठिनाईसे धनका संचय तो करते रहते हैं, किन्तु वह संचित धन न किसीको दान करते हैं और न स्वयं उसका उपभोग ही करते हैं। बस, जैसे मधु निकालनेवाला मधुमक्खियोंद्वारा संचित रसको निकाल ले जाता है वैसे ही उनके संचित धनको भी उसकी टोह रखनेवाला कोई दूसरा पुरुष ही भोगता है॥ १५॥"},{"b":39331,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.16"],"text":"सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिषः।"},{"b":39332,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.16"],"text":"मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम्॥ १६"},{"b":39333,"kind":"hindi_translation","page":765,"explains":["11.8.16"],"text":"तुम देखते हो न कि मधुहारी मधुमक्खियोंका जोड़ा हुआ मधु उनके खानेसे पहले ही साफ कर जाता है; वैसे ही गृहस्थोंके बहुत कठिनाईसे संचित किये पदार्थोंको, जिनसे वे सुखभोगकी अभिलाषा रखते हैं, उनसे भी पहले संन्यासी और ब्रह्मचारी भोगते हैं। क्योंकि गृहस्थ तो पहले अतिथि-अभ्यागतोंको भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करेगा॥ १६॥"},{"b":39334,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.17"],"text":"ग्राम्यगीतं न शृणुयाद् यतिर्वनचरः क्‍वचित्।"},{"b":39335,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.17"],"text":"शिक्षेत हरिणाद् बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात्॥ १७"},{"b":39336,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.18"],"text":"नृत्यवादित्रगीतानि जुषन् ग्राम्याणि योषिताम्।"},{"b":39337,"kind":"sanskrit_shloka","page":765,"verses":["11.8.18"],"text":"आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यशृंगो मृगीसुतः॥ १८"},{"b":39338,"kind":"hindi_commentary","page":765,"explains":["11.8.17","11.8.18"],"text":"मैंने हरिनसे यह सीखा है कि वनवासी संन्यासीको कभी विषय-सम्बन्धी गीत नहीं सुनने चाहिये। वह इस बातकी शिक्षा उस हरिनसे ग्रहण करे जो व्याधके गीतसे मोहित होकर बँध जाता है॥ १७॥ तुम्हें इस बातका पता है कि हरिनीके गर्भसे पैदा हुए ऋष्यशृंग मुनि स्त्रियोंका विषय-सम्बन्धी गाना-बजाना, नाचना आदि देख-सुनकर उनके वशमें हो गये थे और उनके हाथकी कठपुतली बन गये थे॥ १८॥"},{"b":39339,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.19"],"text":"जिह्वयातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः।"},{"b":39340,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.19"],"text":"मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा॥ १९"},{"b":39341,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.20"],"text":"इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः।"},{"b":39342,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.20"],"text":"वर्जयित्वा तु रसनं तन्‍निरन्‍नस्य वर्धते॥ २०"},{"b":39343,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.21"],"text":"तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान्।"},{"b":39344,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.21"],"text":"न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे॥ २१"},{"b":39345,"kind":"hindi_commentary","page":766,"explains":["11.8.19","11.8.20","11.8.21"],"text":"अब मैं तुम्हें मछलीकी सीख सुनाता हूँ। जैसे मछली काँटेमें लगे हुए मांसके टुकड़ेके लोभसे अपने प्राण गँवा देती है, वैसे ही स्वादका लोभी दुर्बुद्धि मनुष्य भी मनको मथकर व्याकुल कर देनेवाली अपनी जिह्वाके वशमें हो जाता है और मारा जाता है॥ १९॥ विवेकी पुरुष भोजन बंद करके दूसरी इन्द्रियोंपर तो बहुत शीघ्र विजय प्राप्त कर लेते हैं, परन्तु इससे उनकी रसना-इन्द्रिय वशमें नहीं होती। वह तो भोजन बंद कर देनेसे और भी प्रबल हो जाती है॥ २०॥ मनुष्य और सब इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर लेनेपर भी तबतक जितेन्द्रिय नहीं हो सकता, जबतक रसनेन्द्रियको अपने वशमें नहीं कर लेता। और यदि रसनेन्द्रियको वशमें कर लिया, तब तो मानो सभी इन्द्रियाँ वशमें हो गयीं॥ २१॥"},{"b":39346,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.22"],"text":"पिंगला नाम वेश्याऽऽसीद् विदेहनगरे पुरा।"},{"b":39347,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.22"],"text":"तस्या मे शिक्षितं किंचिन्‍निबोध नृपनन्दन॥ २२"},{"b":39348,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.23"],"text":"सा स्वैरिण्येकदा कान्तं संकेत उपनेष्यती।"},{"b":39349,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.23"],"text":"अभूत् काले बहिर्द्वारि बिभ्रती रूपमुत्तमम्॥ २३"},{"b":39350,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.24"],"text":"मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान् पुरुषर्षभ।"},{"b":39351,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.24"],"text":"ताञ्छुल्कदान् वित्तवतः कान्तान् मेनेऽर्थकामुका॥ २४"},{"b":39352,"kind":"hindi_commentary","page":766,"explains":["11.8.22","11.8.23","11.8.24"],"text":"नृपनन्दन! प्राचीन कालकी बात है, विदेहनगरी मिथिलामें एक वेश्या रहती थी। उसका नाम था पिंगला। मैंने उससे जो कुछ शिक्षा ग्रहण की, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ; सावधान होकर सुनो॥ २२॥ वह स्वेच्छाचारिणी तो थी ही, रूपवती भी थी। एक दिन रात्रिके समय किसी पुरुषको अपने रमणस्थानमें लानेके लिये खूब बन-ठनकर—उत्तम वस्त्राभूषणोंसे सजकर बहुत देरतक अपने घरके बाहरी दरवाजेपर खड़ी रही॥ २३॥ नररत्‍न! उसे पुरुषकी नहीं, धनकी कामना थी और उसके मनमें यह कामना इतनी दृढ़मूल हो गयी थी कि वह किसी भी पुरुषको उधरसे आते-जाते देखकर यही सोचती कि यह कोई धनी है और मुझे धन देकर उपभोग करनेके लिये ही आ रहा है॥ २४॥"},{"b":39353,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.25"],"text":"आगतेष्वपयातेषु सा संकेतोपजीविनी।"},{"b":39354,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.25"],"text":"अप्यन्यो वित्तवान् कोऽपि मामुपैष्यति भूरिदः॥ २५"},{"b":39355,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.26"],"text":"एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती।"},{"b":39356,"kind":"sanskrit_shloka","page":766,"verses":["11.8.26"],"text":"निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत॥ २६"},{"b":39357,"kind":"hindi_commentary","page":766,"explains":["11.8.25","11.8.26"],"text":"जब आने-जानेवाले आगे बढ़ जाते, तब फिर वह संकेतजीविनी वेश्या यही सोचती कि अवश्य ही अबकी बार कोई ऐसा धनी मेरे पास आवेगा जो मुझे बहुत-सा धन देगा॥ २५॥ उसके चित्तकी यह दुराशा बढ़ती ही जाती थी। वह दरवाजेपर बहुत देरतक टँगी रही। उसकी नींद भी जाती रही। वह कभी बाहर आती तो कभी भीतर जाती। इस प्रकार आधी रात हो गयी॥ २६॥"},{"b":39358,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.27"],"text":"तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतसः।"},{"b":39359,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.27"],"text":"निर्वेदः परमो जज्ञे चिन्ताहेतुः सुखावहः॥ २७"},{"b":39360,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.28"],"text":"तस्या निर्विण्णचित्ताया गीतं शृणु यथा मम।"},{"b":39361,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.28"],"text":"निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसिः॥ २८"},{"b":39362,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.29"],"text":"न ह्यंगाजातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति।"},{"b":39363,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.29"],"text":"यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप॥ २९"},{"b":39364,"kind":"hindi_translation","page":767,"explains":["11.8.27","11.8.28","11.8.29"],"text":"राजन्! सचमुच आशा और सो भी धनकी—बहुत बुरी है। धनीकी बाट जोहते-जोहते उसका मुँह सूख गया, चित्त व्याकुल हो गया। अब उसे इस वृत्तिसे बड़ा वैराग्य हुआ। उसमें दुःख-बुद्धि हो गयी। इसमें सन्देह नहीं कि इस वैराग्यका कारण चिन्ता ही थी। परन्तु ऐसा वैराग्य भी है तो सुखका ही हेतु॥ २७॥ जब पिंगलाके चित्तमें इस प्रकार वैराग्यकी भावना जाग्रत् हुई, तब उसने एक गीत गाया। वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। राजन्! मनुष्य आशाकी फाँसीपर लटक रहा है। इसको तलवारकी तरह काटनेवाली यदि कोई वस्तु है तो वह केवल वैराग्य है॥ २८॥ प्रिय राजन्! जिसे वैराग्य नहीं हुआ है, जो इन बखेड़ोंसे ऊबा नहीं है, वह शरीर और इसके बन्धनसे उसी प्रकार मुक्त नहीं होना चाहता, जैसे अज्ञानी पुरुष ममता छोड़नेकी इच्छा भी नहीं करता॥ २९॥"},{"b":39365,"kind":"topic_heading","page":767,"text":"पिंगलोवाच"},{"b":39366,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.30"],"text":"अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मनः।"},{"b":39367,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.30"],"text":"या कान्तादसतः कामं कामये येन बालिशा॥ ३०"},{"b":39368,"kind":"hindi_commentary","page":767,"verses":["11.8.31"],"text":"सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं"},{"b":39369,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.31"],"text":"वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।"},{"b":39370,"kind":"hindi_commentary","page":767,"verses":["11.8.31"],"text":"अकामदं दुःखभयाधिशोक-"},{"b":39371,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.31"],"text":"मोहप्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा॥ ३१"},{"b":39372,"kind":"hindi_commentary","page":767,"verses":["11.8.32"],"text":"अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा"},{"b":39373,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.32"],"text":"सांकेत्यवृत्त्यातिविगर्ह्यवार्तया ।"},{"b":39374,"kind":"hindi_commentary","page":767,"verses":["11.8.32"],"text":"स्त्रैणान्‍नराद् यार्थतृषोऽनुशोच्यात्"},{"b":39375,"kind":"sanskrit_shloka","page":767,"verses":["11.8.32"],"text":"क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती॥ ३२"},{"b":39376,"kind":"hindi_commentary","page":767,"explains":["11.8.30","11.8.31","11.8.32"],"text":"पिंगलाने यह गीत गाया था—हाय! हाय! मैं इन्द्रियोंके अधीन हो गयी। भला! मेरे मोहका विस्तार तो देखो, मैं इन दुष्ट पुरुषोंसे, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, विषयसुखकी लालसा करती हूँ। कितने दुःखकी बात है! मैं सचमुच मूर्ख हूँ॥ ३०॥ देखो तो सही, मेरे निकट-से-निकट हृदयमें ही मेरे सच्चे स्वामी भगवान् विराजमान हैं। वे वास्तविक प्रेम, सुख और परमार्थका सच्चा धन भी देनेवाले हैं। जगत‍्के पुरुष अनित्य हैं और वे नित्य हैं। हाय! हाय! मैंने उनको तो छोड़ दिया और उन तुच्छ मनुष्योंका सेवन किया जो मेरी एक भी कामना पूरी नहीं कर सकते; उलटे दुःख-भय, आधि-व्याधि, शोक और मोह ही देते हैं। यह मेरी मूर्खताकी हद है कि मैं उनका सेवन करती हूँ॥ ३१॥ बड़े खेदकी बात है, मैंने अत्यन्त निन्दनीय आजीविका वेश्यावृत्तिका आश्रय लिया और व्यर्थमें अपने शरीर और मनको क्लेश दिया, पीड़ा पहुँचायी। मेरा यह शरीर बिक गया है। लम्पट, लोभी और निन्दनीय मनुष्योंने इसे खरीद लिया है और मैं इतनी मूर्ख हूँ कि इसी शरीरसे धन और रति-सुख चाहती हूँ। मुझे धिक्कार है!॥ ३२॥"},{"b":39377,"kind":"hindi_commentary","page":768,"verses":["11.8.33"],"text":"यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंश्यस्थूणं त्वचा रोमनखैः पिनद्धम्।"},{"b":39378,"kind":"hindi_translation","page":768,"verses":["11.8.33"],"text":"क्षरन्‍नवद्वारमगारमेतद् विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या॥ ३३"},{"b":39379,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.34"],"text":"विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्‍नहमेकैव मूढधीः।"},{"b":39380,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.34"],"text":"यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात्॥ ३४"},{"b":39381,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.35"],"text":"सुहृत् प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्।"},{"b":39382,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.35"],"text":"तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा॥ ३५"},{"b":39383,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.36"],"text":"कियत् प्रियं ते व्यभजन् कामा ये कामदा नराः।"},{"b":39384,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.36"],"text":"आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्रुताः॥ ३६"},{"b":39385,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.37"],"text":"नूनं मे भगवान् प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा।"},{"b":39386,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.37"],"text":"निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः॥ ३७"},{"b":39387,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.38"],"text":"मैवं स्युर्मन्दभाग्यायाः क्लेशा निर्वेदहेतवः।"},{"b":39388,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.38"],"text":"येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुषः शममृच्छति॥ ३८"},{"b":39389,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.39"],"text":"तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसंगताः।"},{"b":39390,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.39"],"text":"त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्‍वरम्॥ ३९"},{"b":39391,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.40"],"text":"सन्तुष्टा श्रद्दधत्येतद्यथालाभेन जीवती।"},{"b":39392,"kind":"sanskrit_shloka","page":768,"verses":["11.8.40"],"text":"विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै॥ ४०"},{"b":39393,"kind":"sanskrit_shloka","page":769,"verses":["11.8.41"],"text":"संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम्।"},{"b":39394,"kind":"sanskrit_shloka","page":769,"verses":["11.8.41"],"text":"ग्रस्तं कालाहिनाऽऽत्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्‍वरः॥ ४१"},{"b":39395,"kind":"sanskrit_shloka","page":769,"verses":["11.8.42"],"text":"आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात्।"},{"b":39396,"kind":"sanskrit_shloka","page":769,"verses":["11.8.42"],"text":"अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत्॥ ४२"},{"b":39397,"kind":"hindi_commentary","page":768,"explains":["11.8.33","11.8.34","11.8.35","11.8.36","11.8.37","11.8.38","11.8.39","11.8.40","11.8.41","11.8.42"],"text":"यह शरीर एक घर है। इसमें हड्डियोंके टेढ़े-तिरछे बाँस और खंभे लगे हुए हैं; चाम, रोएँ और नाखूनोंसे यह छाया गया है। इसमें नौ दरवाजे हैं, जिनसे मल निकलते ही रहते हैं। इसमें संचित सम्पत्तिके नामपर केवल मल और मूत्र हैं। मेरे अतिरिक्त ऐसी कौन स्त्री है जो इस स्थूल शरीरको अपना प्रिय समझकर सेवन करेगी॥ ३३॥ यों तो यह विदेहोंकी—जीवन्मुक्तोंकी नगरी है, परन्तु इसमें मैं ही सबसे मूर्ख और दुष्ट हूँ; क्योंकि अकेली मैं ही तो आत्मदानी, अविनाशी एवं परमप्रियतम परमात्माको छोड़कर दूसरे पुरुषकी अभिलाषा करती हूँ॥ ३४॥ मेरे हृदयमें विराजमान प्रभु, समस्त प्राणियोंके हितैषी, सुहृद्, प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं। अब मैं अपने-आपको देकर इन्हें खरीद लूँगी और इनके साथ वैसे ही विहार करूँगी, जैसे लक्ष्मीजी करती हैं॥ ३५॥ मेरे मूर्ख चित्त! तू बतला तो सही, जगत‍्के विषयभोगोंने और उनको देनेवाले पुरुषोंने तुझे कितना सुख दिया है। अरे! वे तो स्वयं ही पैदा होते और मरते रहते हैं। मैं केवल अपनी ही बात नहीं कहती, केवल मनुष्योंकी भी नहीं; क्या देवताओंने भी भोगोंके द्वारा अपनी पत्‍नियोंको सन्तुष्ट किया है? वे बेचारे तो स्वयं कालके गालमें पड़े-पड़े कराह रहे हैं॥ ३६॥ अवश्य ही मेरे किसी शुभकर्मसे विष्णुभगवान् मुझपर प्रसन्‍न हैं, तभी तो दुराशासे मुझे इस प्रकार वैराग्य हुआ है। अवश्य ही मेरा यह वैराग्य सुख देनेवाला होगा॥ ३७॥ यदि मैं मन्दभागिनी होती तो मुझे ऐसे दुःख ही न उठाने पड़ते, जिनसे वैराग्य होता है। मनुष्य वैराग्यके द्वारा ही घर आदिके सब बन्धनोंको काटकर शान्तिलाभ करता है॥ ३८॥ अब मैं भगवान्‌का यह उपकार आदरपूर्वक सिर झुकाकर स्वीकार करती हूँ और विषयभोगोंकी दुराशा छोड़कर उन्हीं जगदीश्‍वरकी शरण ग्रहण करती हूँ॥ ३९॥ अब मुझे प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जायगा उसीसे निर्वाह कर लूँगी और बड़े सन्तोष तथा श्रद्धाके साथ रहूँगी। मैं अब किसी दूसरे पुरुषकी ओर न ताककर अपने हृदयेश्‍वर, आत्मस्वरूप प्रभुके साथ ही विहार करूँगी॥ ४०॥ यह जीव संसारके कूएँमें गिरा हुआ है। विषयोंने इसे अंधा बना दिया है, कालरूपी अजगरने इसे अपने मुँहमें दबा रखा है। अब भगवान्‌को छोड़कर इसकी रक्षा करनेमें दूसरा कौन समर्थ है॥ ४१॥ जिस समय जीव समस्त विषयोंसे विरक्त हो जाता है, उस समय वह स्वयं ही अपनी रक्षा कर लेता है। इसलिये बड़ी सावधानीके साथ यह देखते रहना चाहिये कि सारा जगत् कालरूपी अजगरसे ग्रस्त है॥ ४२॥"},{"b":39398,"kind":"topic_heading","page":769,"text":"ब्राह्मण उवाच"},{"b":39399,"kind":"sanskrit_shloka","page":769,"verses":["11.8.43"],"text":"एवं व्यवसितमतिर्दुराशां कान्ततर्षजाम्।"},{"b":39400,"kind":"sanskrit_shloka","page":769,"verses":["11.8.43"],"text":"छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा॥ ४३"},{"b":39401,"kind":"sanskrit_shloka","page":769,"verses":["11.8.44"],"text":"आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।"},{"b":39402,"kind":"sanskrit_shloka","page":769,"verses":["11.8.44"],"text":"यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिंगला॥ ४४"},{"b":39403,"kind":"hindi_commentary","page":769,"explains":["11.8.43","11.8.44"],"text":"अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं—राजन्! पिंगला वेश्याने ऐसा निश्‍चय करके अपने प्रिय धनियोंकी दुराशा, उनसे मिलनेकी लालसाका परित्याग कर दिया और शान्तभावसे जाकर वह अपनी सेजपर सो रही॥ ४३॥ सचमुच आशा ही सबसे बड़ा दुःख है और निराशा ही सबसे बड़ा सुख है; क्योंकि पिंगला वेश्याने जब पुरुषकी आशा त्याग दी, तभी वह सुखसे सो सकी॥ ४४॥"},{"b":39404,"kind":"hindi_translation","page":769,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धेऽष्टमोऽध्यायः॥ 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