{"id":"11.7","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 7","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथ सप्तमोऽध्यायः","topics":["अवधूतोपाख्यान—पृथ्वीसे लेकर कबूतरतक आठ गुरुओंकी कथा"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[751,762]},"verses":[{"id":"11.7.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/1/","page":752,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदात्थ मां महाभाग तच्चिकीर्षितमेव मे।","ब्रह्मा भवो लोकपालाः स्वर्वासं मेऽभिकांक्षिणः॥ १"],"iast":["yadāttha māṃ mahābhāga taccikīrṣitameva me|","brahmā bhavo lokapālāḥ svarvāsaṃ me'bhikāṃkṣiṇaḥ|| 1"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाभाग्यवान् उद्धव! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है, मैं वही करना चाहता हूँ। ब्रह्मा, शंकर और इन्द्रादि लोकपाल भी अब यही चाहते हैं कि मैं उनके लोकोंमें होकर अपने धामको चला जाऊँ॥ १॥"},{"id":"11.7.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/2/","page":752,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मया निष्पादितं ह्यत्र देवकार्यमशेषतः।","यदर्थमवतीर्णोऽहमंशेन ब्रह्मणार्थितः॥ २"],"iast":["mayā niṣpāditaṃ hyatra devakāryamaśeṣataḥ|","yadarthamavatīrṇo'hamaṃśena brahmaṇārthitaḥ|| 2"],"meaning":"पृथ्वीपर देवताओंका जितना काम करना था, उसे मैं पूरा कर चुका। इसी कामके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे मैं बलरामजीके साथ अवतीर्ण हुआ था॥ २॥"},{"id":"11.7.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/3/","page":752,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कुलं वै शापनिर्दग्धं नंक्ष्यत्यन्योन्यविग्रहात्।","समुद्रः सप्तमेऽह्न्येतां पुरीं च प्लावयिष्यति॥ ३"],"iast":["kulaṃ vai śāpanirdagdhaṃ naṃkṣyatyanyonyavigrahāt|","samudraḥ saptame'hnyetāṃ purīṃ ca plāvayiṣyati|| 3"],"meaning":"अब यह यदुवंश, जो ब्राह्मणोंके शापसे भस्म हो चुका है, पारस्परिक फूट और युद्धसे नष्ट हो जायगा। आजके सातवें दिन समुद्र इस पुरी—द्वारकाको डुबो देगा॥ ३॥"},{"id":"11.7.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/4/","page":752,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यर्ह्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयं नष्टमंगलः।","भविष्यत्यचिरात् साधो कलिनापि निराकृतः॥ ४"],"iast":["yarhyevāyaṃ mayā tyakto loko'yaṃ naṣṭamaṃgalaḥ|","bhaviṣyatyacirāt sādho kalināpi nirākṛtaḥ|| 4"],"meaning":"प्यारे उद्धव! जिस क्षण मैं मर्त्यलोकका परित्याग कर दूँगा, उसी क्षण इसके सारे मंगल नष्ट हो जायँगे और थोड़े ही दिनोंमें पृथ्वीपर कलियुगका बोलबाला हो जायगा॥ ४॥"},{"id":"11.7.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/5/","page":752,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले।","जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे॥ ५"],"iast":["na vastavyaṃ tvayaiveha mayā tyakte mahītale|","jano'dharmarucirbhadra bhaviṣyati kalau yuge|| 5"],"meaning":"जब मैं इस पृथ्वीका त्याग कर दूँ तब तुम इसपर मत रहना; क्योंकि साधु उद्धव! कलियुगमें अधिकांश लोगोंकी रुचि अधर्ममें ही होगी॥ ५॥"},{"id":"11.7.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/6/","page":752,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु।","मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग् विचरस्व गाम्॥ ६"],"iast":["tvaṃ tu sarvaṃ parityajya snehaṃ svajanabandhuṣu|","mayyāveśya manaḥ samyak samadṛg vicarasva gām|| 6"],"meaning":"अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवोंका स्नेह-सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्यप्रेमसे मुझमें अपना मन लगाकर समदृष्टिसे पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरण करो॥ ६॥"},{"id":"11.7.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/7/","page":752,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।","नश्‍वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्॥ ७"],"iast":["yadidaṃ manasā vācā cakṣurbhyāṃ śravaṇādibhiḥ|","naśvaraṃ gṛhyamāṇaṃ ca viddhi māyāmanomayam|| 7"],"meaning":"इस जगत‍्में जो कुछ मनसे सोचा जाता है, वाणीसे कहा जाता है, नेत्रोंसे देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियोंसे अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान् है। सपनेकी तरह मनका विलास है। इसलिये मायामात्र है, मिथ्या है—ऐसा समझ लो॥ ७॥"},{"id":"11.7.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/8/","page":752,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः स गुणदोषभाक्।","कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा॥ ८"],"iast":["puṃso'yuktasya nānārtho bhramaḥ sa guṇadoṣabhāk|","karmākarmavikarmeti guṇadoṣadhiyo bhidā|| 8"],"meaning":"जिस पुरुषका मन अशान्त है, असंयत है, उसीको पागलकी तरह अनेकों वस्तुएँ मालूम पड़ती हैं; वास्तवमें यह चित्तका भ्रम ही है। नानात्वका भ्रम हो जानेपर ही ‘यह गुण है’ और ‘यह दोष’ इस प्रकारकी कल्पना करनी पड़ती है । जिसकी बुद्धिमें गुण और दोषका भेद बैठ गया है, दृढ़मूल हो गया है, उसीके लिये कर्म, अकर्म और विकर्मरूप भेदका प्रतिपादन हुआ है॥ ८॥"},{"id":"11.7.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/9/","page":753,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्माद् युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्।","आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्‍वरे॥ ९"],"iast":["tasmād yuktendriyagrāmo yuktacitta idaṃ jagat|","ātmanīkṣasva vitatamātmānaṃ mayyadhīśvare|| 9"],"meaning":"इसलिये उद्धव! तुम पहले अपनी समस्त इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लो, उनकी बागडोर अपने हाथमें ले लो और केवल इन्द्रियोंको ही नहीं, चित्तकी समस्त वृत्तियोंको भी रोक लो और फिर ऐसा अनुभव करो कि यह सारा जगत् अपने आत्मामें ही फैला हुआ है और आत्मा मुझ सर्वात्मा इन्द्रियातीत ब्रह्मसे एक है, अभिन्‍न है॥ ९॥"},{"id":"11.7.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/10/","page":753,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम्।","आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे॥ १०"],"iast":["jñānavijñānasaṃyukta ātmabhūtaḥ śarīriṇām|","ātmānubhavatuṣṭātmā nāntarāyairvihanyase|| 10"],"meaning":"जब वेदोंके मुख्य तात्पर्य—निश्‍चयरूप ज्ञान और अनुभवरूप विज्ञानसे भलीभाँति सम्पन्‍न होकर तुम अपने आत्माके अनुभवमें ही आनन्दम‌ग्‍न रहोगे और सम्पूर्ण देवता आदि शरीरधारियोंके आत्मा हो जाओगे। इसलिये किसी भी विघ्नसे तुम पीडित नहीं हो सकोगे; क्योंकि उन विघ्नों और विघ्न करनेवालोंकी आत्मा भी तुम्हीं होगे॥ १०॥"},{"id":"11.7.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/11/","page":753,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्‍न निवर्तते।","गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथार्भकः॥ ११"],"iast":["doṣabuddhyobhayātīto niṣedhānna nivartate|","guṇabuddhyā ca vihitaṃ na karoti yathārbhakaḥ|| 11"],"meaning":"जो पुरुष गुण और दोष-बुद्धिसे अतीत हो जाता है वह बालकके समान निषिद्ध कर्मसे निवृत्त होता है, परन्तु दोष-बुद्धिसे नहीं। वह विहित कर्मका अनुष्ठान भी करता है, परन्तु गुणबुद्धिसे नहीं॥ ११॥"},{"id":"11.7.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/12/","page":753,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्‍चयः।","पश्यन् मदात्मकं विश्‍वं न विपद्येत वै पुनः॥ १२"],"iast":["sarvabhūtasuhṛcchānto jñānavijñānaniścayaḥ|","paśyan madātmakaṃ viśvaṃ na vipadyeta vai punaḥ|| 12"],"meaning":"जिसने श्रुतियोंके तात्पर्यका यथार्थ ज्ञान ही नहीं प्राप्त कर लिया, बल्कि उनका साक्षात्कार भी कर लिया है और इस प्रकार जो अटल निश्‍चयसे सम्पन्‍न हो गया है वह समस्त प्राणियोंका हितैषी सुहृद् होता है और उसकी वृत्तियाँ सर्वथा शान्त रहती हैं। वह समस्त प्रतीयमान विश्‍वको मेरा ही स्वरूप—आत्मस्वरूप देखता है; इसलिये उसे फिर कभी जन्म-मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ना पड़ता॥ १२॥"},{"id":"11.7.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/13/","page":753,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्यादिष्टो भगवता महाभागवतो नृप।","उद्धवः प्रणिपत्याह तत्त्वजिज्ञासुरच्युतम्॥ १३"],"iast":["ityādiṣṭo bhagavatā mahābhāgavato nṛpa|","uddhavaḥ praṇipatyāha tattvajijñāsuracyutam|| 13"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार आदेश दिया, तब भगवान्‌के परम प्रेमी उद्धवजीने उन्हें प्रणाम करके तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिकी इच्छासे यह प्रश्‍न किया॥ १३॥"},{"id":"11.7.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/14/","page":753,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["योगेश योगविन्यास योगात्मन् योगसम्भव।","निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षणः॥ १४"],"iast":["yogeśa yogavinyāsa yogātman yogasambhava|","niḥśreyasāya me proktastyāgaḥ saṃnyāsalakṣaṇaḥ|| 14"],"meaning":"उद्धवजीने कहा—भगवन्! आप ही समस्त योगियोंकी गुप्त पूँजी योगोंके कारण और योगेश्‍वर हैं। आप ही समस्त योगोंके आधार, उनके कारण और योगस्वरूप भी हैं। आपने मेरे परम-कल्याणके लिये उस संन्यासरूप त्यागका उपदेश किया है॥ १४॥"},{"id":"11.7.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/15/","page":753,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["त्यागोऽयं दुष्करो भूमन् कामानां विषयात्मभिः।","सुतरां त्वयि सर्वात्मन्‍नभक्तैरिति मे मतिः॥ १५"],"iast":["tyāgo'yaṃ duṣkaro bhūman kāmānāṃ viṣayātmabhiḥ|","sutarāṃ tvayi sarvātmannabhaktairiti me matiḥ|| 15"],"meaning":"परन्तु अनन्त! जो लोग विषयोंके चिन्तन और सेवनमें घुल-मिल गये हैं, विषयात्मा हो गये हैं, उनके लिये विषय-भोगों और कामनाओंका त्याग अत्यन्त कठिन है। सर्वस्वरूप! उनमें भी जो लोग आपसे विमुख हैं, उनके लिये तो इस प्रकारका त्याग सर्वथा असम्भव ही है ऐसा मेरा निश्‍चय है॥ १५॥"},{"id":"11.7.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/16/","page":754,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["सोऽहं ममाहमिति मूढमतिर्विगाढ-","स्त्वन्मायया विरचितात्मनि सानुबन्धे।","तत्त्वञ्जसा निगदितं भवता यथाहं","संसाधयामि भगवन्‍ननुशाधि भृत्यम्॥ १६"],"iast":["so'haṃ mamāhamiti mūḍhamatirvigāḍha-","stvanmāyayā viracitātmani sānubandhe|","tattvañjasā nigaditaṃ bhavatā yathāhaṃ","saṃsādhayāmi bhagavannanuśādhi bhṛtyam|| 16"],"meaning":"प्रभो! मैं भी ऐसा ही हूँ; मेरी मति इतनी मूढ़ हो गयी है कि ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है’ इस भावसे मैं आपकी मायाके खेल, देह और देहके सम्बन्धी स्त्री, पुत्र, धन आदिमें डूब रहा हूँ। अतः भगवन्! आपने जिस संन्यासका उपदेश किया है, उसका तत्त्व मुझ सेवकको इस प्रकार समझाइये कि मैं सुगमतापूर्वक उसका साधन कर सकूँ॥ १६॥"},{"id":"11.7.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/17/","page":754,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं","वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे।","सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे","ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः॥ १७"],"iast":["satyasya te svadṛśa ātmana ātmano'nyaṃ","vaktāramīśa vibudheṣvapi nānucakṣe|","sarve vimohitadhiyastava māyayeme","brahmādayastanubhṛto bahirarthabhāvāḥ|| 17"],"meaning":"मेरे प्रभो! आप भूत, भविष्य, वर्तमान इन तीनों कालोंसे अबाधित, एकरस सत्य हैं। आप दूसरेके द्वारा प्रकाशित नहीं, स्वयंप्रकाश आत्मस्वरूप हैं। प्रभो! मैं समझता हूँ कि मेरे लिये आत्मतत्त्वका उपदेश करनेवाला आपके अतिरिक्त देवताओंमें भी कोई नहीं है। ब्रह्मा आदि जितने बड़े-बड़े देवता हैं, वे सब शरीराभिमानी होनेके कारण आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं। उनकी बुद्धि मायाके वशमें हो गयी है। यही कारण है कि वे इन्द्रियोंसे अनुभव किये जानेवाले बाह्य विषयोंको सत्य मानते हैं। इसीलिये मुझे तो आप ही उपदेश कीजिये॥ १७॥"},{"id":"11.7.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/18/","page":754,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं","सर्वज्ञमीश्‍वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम्।","निर्विण्णधीरहमु ह वृजिनाभितप्तो","नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये॥ १८"],"iast":["tasmād bhavantamanavadyamanantapāraṃ","sarvajñamīśvaramakuṇṭhavikuṇṭhadhiṣṇyam|","nirviṇṇadhīrahamu ha vṛjinābhitapto","nārāyaṇaṃ narasakhaṃ śaraṇaṃ prapadye|| 18"],"meaning":"भगवन्! इसीसे चारों ओरसे दुःखोंकी दावाग्‍निसे जलकर और विरक्त होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप निर्दोष देश-कालसे अपरिच्छिन्‍न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और अविनाशी वैकुण्ठलोकके निवासी एवं नरके नित्य सखा नारायण हैं। (अतः आप ही मुझे उपदेश कीजिये)॥ १८॥"},{"id":"11.7.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/19/","page":754,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणाः।","समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात्॥ १९"],"iast":["prāyeṇa manujā loke lokatattvavicakṣaṇāḥ|","samuddharanti hyātmānamātmanaivāśubhāśayāt|| 19"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धव! संसारमें जो मनुष्य ‘यह जगत् क्या है? इसमें क्या हो रहा है?’ इत्यादि बातोंका विचार करनेमें निपुण हैं, वे चित्तमें भरी हुई अशुभ वासनाओंसे अपने-आपको स्वयं अपनी विवेक-शक्तिसे ही प्रायः बचा लेते हैं॥ १९॥"},{"id":"11.7.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/20/","page":754,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः।","यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते॥ २०"],"iast":["ātmano gururātmaiva puruṣasya viśeṣataḥ|","yat pratyakṣānumānābhyāṃ śreyo'sāvanuvindate|| 20"],"meaning":"समस्त प्राणियोंका विशेषकर मनुष्यका आत्मा अपने हित और अहितका उपदेशक गुरु है। क्योंकि मनुष्य अपने प्रत्यक्ष अनुभव और अनुमानके द्वारा अपने हित-अहितका निर्णय करनेमें पूर्णतः समर्थ है॥ २०॥"},{"id":"11.7.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/21/","page":754,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पुरुषत्वे च मां धीराः सांख्ययोगविशारदाः।","आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम्॥ २१"],"iast":["puruṣatve ca māṃ dhīrāḥ sāṃkhyayogaviśāradāḥ|","āvistarāṃ prapaśyanti sarvaśaktyupabṛṃhitam|| 21"],"meaning":"सांख्य-योगविशारद धीर पुरुष इस मनुष्ययोनिमें इन्द्रियशक्ति, मनःशक्ति आदिके आश्रयभूत मुझ आत्मतत्त्वको पूर्णतः प्रकटरूपसे साक्षात्कार कर लेते हैं॥ २१॥"},{"id":"11.7.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/22/","page":755,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एकद्वित्रिचतुष्पादो बहुपादस्तथापदः।","बह्व्यः सन्ति पुरः सृष्टास्तासां मे पौरुषी प्रिया॥ २२"],"iast":["ekadvitricatuṣpādo bahupādastathāpadaḥ|","bahvyaḥ santi puraḥ sṛṣṭāstāsāṃ me pauruṣī priyā|| 22"],"meaning":"मैंने एक पैरवाले, दो पैरवाले, तीन पैरवाले, चार पैरवाले, चारसे अधिक पैरवाले और बिना पैरके—इत्यादि अनेक प्रकारके शरीरोंका निर्माण किया है। उनमें मुझे सबसे अधिक प्रिय मनुष्यका ही शरीर है॥ २२॥"},{"id":"11.7.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/23/","page":755,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अत्र मां मार्गयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरीश्‍वरम्।","गृह्यमाणैर्गुणैर्लिङ्गैरग्राह्यमनुमानतः ॥ २३"],"iast":["atra māṃ mārgayantyaddhā yuktā hetubhirīśvaram|","gṛhyamāṇairguṇairliṅgairagrāhyamanumānataḥ || 23"],"meaning":"इस मनुष्य-शरीरमें एकाग्रचित्त तीक्ष्णबुद्धि पुरुष बुद्धि आदि ग्रहण किये जानेवाले हेतुओंसे जिनसे कि अनुमान भी होता है, अनुमानसे अग्राह्य अर्थात् अहंकार आदि विषयोंसे भिन्‍न मुझ सर्वप्रवर्त्तक ईश्‍वरको साक्षात् अनुभव करते हैं॥ २३॥"},{"id":"11.7.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/24/","page":755,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।","अवधूतस्य संवादं यदोरमिततेजसः॥ २४"],"iast":["atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam|","avadhūtasya saṃvādaṃ yadoramitatejasaḥ|| 24"],"meaning":"इस विषयमें महात्मा-लोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास परम तेजस्वी अवधूत दत्तात्रेय और राजा यदुके संवादके रूपमें है॥ २४॥"},{"id":"11.7.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/25/","page":755,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अवधूतं द्विजं कंचिच्चरन्तमकुतोभयम्।","कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित्॥ २५"],"iast":["avadhūtaṃ dvijaṃ kaṃciccarantamakutobhayam|","kaviṃ nirīkṣya taruṇaṃ yaduḥ papraccha dharmavit|| 25"],"meaning":"एक बार धर्मके मर्मज्ञ राजा यदुने देखा कि एक त्रिकालदर्शी तरुण अवधूत ब्राह्मण निर्भय विचर रहे हैं। तब उन्होंने उनसे यह प्रश्‍न किया॥ २५॥"},{"id":"11.7.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/26/","page":755,"speaker":"यदुरुवाच","sanskrit":["कुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्‍नकर्तुः सुविशारदा।","यामासाद्य भवाँल्लोकं विद्वांश्‍चरति बालवत्॥ २६"],"iast":["kuto buddhiriyaṃ brahmannakartuḥ suviśāradā|","yāmāsādya bhavām̐llokaṃ vidvāṃścarati bālavat|| 26"],"meaning":"राजा यदुने पूछा—ब्रह्मन्! आप कर्म तो करते नहीं, फिर आपको यह अत्यन्त निपुण बुद्धि कहाँसे प्राप्त हुई? जिसका आश्रय लेकर आप परम विद्वान् होनेपर भी बालकके समान संसारमें विचरते रहते हैं॥ २६॥"},{"id":"11.7.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/27/","page":755,"speaker":"यदुरुवाच","sanskrit":["प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवाः।","हेतुनैव समीहन्ते आयुषो यशसः श्रियः॥ २७"],"iast":["prāyo dharmārthakāmeṣu vivitsāyāṃ ca mānavāḥ|","hetunaiva samīhante āyuṣo yaśasaḥ śriyaḥ|| 27"],"meaning":"ऐसा देखा जाता है कि मनुष्य आयु, यश अथवा सौन्दर्य-सम्पत्ति आदिकी अभिलाषा लेकर ही धर्म, अर्थ, काम अथवा तत्त्व-जिज्ञासामें प्रवृत्त होते हैं; अकारण कहीं किसीकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती॥ २७॥"},{"id":"11.7.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/28/","page":755,"speaker":"यदुरुवाच","sanskrit":["त्वं तु कल्पः कविर्दक्षः सुभगोऽमृतभाषणः।","न कर्ता नेहसे किंचिज्जडोन्मत्तपिशाचवत्॥ २८"],"iast":["tvaṃ tu kalpaḥ kavirdakṣaḥ subhago'mṛtabhāṣaṇaḥ|","na kartā nehase kiṃcijjaḍonmattapiśācavat|| 28"],"meaning":"मैं देख रहा हूँ कि आप कर्म करनेमें समर्थ, विद्वान् और निपुण हैं। आपका भाग्य और सौन्दर्य भी प्रशंसनीय है। आपकी वाणीसे तो मानो अमृत टपक रहा है। फिर भी आप जड, उन्मत्त अथवा पिशाचके समान रहते हैं; न तो कुछ करते हैं और न चाहते ही हैं॥ २८॥"},{"id":"11.7.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/29/","page":755,"speaker":"यदुरुवाच","sanskrit":["जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्‍निना।","न तप्यसेऽग्‍निना मुक्तो गंगाम्भःस्थ इव द्विपः॥ २९"],"iast":["janeṣu dahyamāneṣu kāmalobhadavāgninā|","na tapyase'gninā mukto gaṃgāmbhaḥstha iva dvipaḥ|| 29"],"meaning":"संसारके अधिकांश लोग काम और लोभके दावानलसे जल रहे हैं। परन्तु आपको देखकर ऐसा मालूम होता है कि आप मुक्त हैं, आपतक उसकी आँच भी नहीं पहुँच पाती; ठीक वैसे ही जैसे कोई हाथी वनमें दावाग्‍नि लगनेपर उससे छूटकर गंगाजलमें खड़ा हो॥ २९॥"},{"id":"11.7.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/30/","page":756,"speaker":"यदुरुवाच","sanskrit":["त्वं हि नः पृच्छतां ब्रह्मन्‍नात्मन्यानन्दकारणम्।","ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः॥ ३०"],"iast":["tvaṃ hi naḥ pṛcchatāṃ brahmannātmanyānandakāraṇam|","brūhi sparśavihīnasya bhavataḥ kevalātmanaḥ|| 30"],"meaning":"ब्रह्मन्! आप पुत्र, स्त्री, धन आदि संसारके स्पर्शसे भी रहित हैं। आप सदा-सर्वदा अपने केवल स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। हम आपसे यह पूछना चाहते हैं कि आपको अपने आत्मामें ही ऐसे अनिर्वचनीय आनन्दका अनुभव कैसे होता है? आप कृपा करके अवश्य बतलाइये॥ ३०॥"},{"id":"11.7.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/31/","page":756,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदुनैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।","पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः॥ ३१"],"iast":["yadunaivaṃ mahābhāgo brahmaṇyena sumedhasā|","pṛṣṭaḥ sabhājitaḥ prāha praśrayāvanataṃ dvijaḥ|| 31"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धव! हमारे पूर्वज महाराज यदुकी बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदयमें ब्राह्मण-भक्ति थी। उन्होंने परमभाग्यवान् दत्तात्रेयजीका अत्यन्त सत्कार करके यह प्रश्‍न पूछा और बड़े विनम्रभावसे सिर झुकाकर वे उनके सामने खड़े हो गये। अब दत्तात्रेयजीने कहा॥ ३१॥"},{"id":"11.7.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/32/","page":756,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["सन्ति मे गुरवो राजन् बहवो बुद्ध्युपाश्रिताः।","यतो बुद्धिमुपादाय मुक्तोऽटामीह ताञ्छृणु॥ ३२"],"iast":["santi me guravo rājan bahavo buddhyupāśritāḥ|","yato buddhimupādāya mukto'ṭāmīha tāñchṛṇu|| 32"],"meaning":"ब्रह्मवेत्ता दत्तात्रेयजीने कहा—राजन्! मैंने अपनी बुद्धिसे बहुत-से गुरुओंका आश्रय लिया है, उनसे शिक्षा ग्रहण करके मैं इस जगत‍्में मुक्तभावसे स्वच्छन्द विचरता हूँ। तुम उन गुरुओंके नाम और उनसे ग्रहण की हुई शिक्षा सुनो॥ ३२॥"},{"id":"11.7.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/33/","page":756,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["पृथिवी वायुराकाशमापोऽग्‍निश्‍चन्द्रमा रविः।","कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतंगो मधुकृद् गजः॥ ३३"],"iast":["pṛthivī vāyurākāśamāpo'gniścandramā raviḥ|","kapoto'jagaraḥ sindhuḥ pataṃgo madhukṛd gajaḥ|| 33"],"meaning":"मेरे गुरुओंके नाम हैं—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्‍नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा या मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालनेवाला, हरिन, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुँआरी कन्या, बाण बनानेवाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट॥ ३३-३४॥","meaning_covers":[33,34]},{"id":"11.7.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/34/","page":756,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["मधुहा हरिणो मीनः पिंगला कुररोऽर्भकः।","कुमारी शरकृत् सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत्॥ ३४"],"iast":["madhuhā hariṇo mīnaḥ piṃgalā kuraro'rbhakaḥ|","kumārī śarakṛt sarpa ūrṇanābhiḥ supeśakṛt|| 34"],"meaning":"मेरे गुरुओंके नाम हैं—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्‍नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा या मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालनेवाला, हरिन, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुँआरी कन्या, बाण बनानेवाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट॥ ३३-३४॥","meaning_covers":[33,34]},{"id":"11.7.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/35/","page":756,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["एते मे गुरवो राजंश्‍चतुर्विंशतिराश्रिताः।","शिक्षा वृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षमिहात्मनः॥ ३५"],"iast":["ete me guravo rājaṃścaturviṃśatirāśritāḥ|","śikṣā vṛttibhireteṣāmanvaśikṣamihātmanaḥ|| 35"],"meaning":"राजन्! मैंने इन चौबीस गुरुओंका आश्रय लिया है और इन्हींके आचरणसे इस लोकमें अपने लिये शिक्षा ग्रहण की है॥ ३५॥"},{"id":"11.7.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/36/","page":756,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["यतो यदनुशिक्षामि यथा वा नाहुषात्मज।","तत्तथा पुरुषव्याघ्र निबोध कथयामि ते॥ ३६"],"iast":["yato yadanuśikṣāmi yathā vā nāhuṣātmaja|","tattathā puruṣavyāghra nibodha kathayāmi te|| 36"],"meaning":"वीरवर ययातिनन्दन! मैंने जिससे जिस प्रकार जो कुछ सीखा है, वह सब ज्यों-का-त्यों तुमसे कहता हूँ, सुनो॥ ३६॥"},{"id":"11.7.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/37/","page":756,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["भूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगैः।","तद् विद्वान्‍न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेर्व्रतम्॥ ३७"],"iast":["bhūtairākramyamāṇo'pi dhīro daivavaśānugaiḥ|","tad vidvānna calenmārgādanvaśikṣaṃ kṣitervratam|| 37"],"meaning":"मैंने पृथ्वीसे उसके धैर्यकी, क्षमाकी शिक्षा ली है। लोग पृथ्वीपर कितना आघात और क्या-क्या उत्पात नहीं करते; परन्तु वह न तो किसीसे बदला लेती है और न रोती-चिल्लाती है। संसारके सभी प्राणी अपने-अपने प्रारब्धके अनुसार चेष्टा कर रहे हैं, वे समय-समयपर भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारसे जान या अनजानमें आक्रमण कर बैठते हैं। धीर पुरुषको चाहिये कि उनकी विवशता समझे, न तो अपना धीरज खोवे और न क्रोध करे। अपने मार्गपर ज्यों-का-त्यों चलता रहे॥ ३७॥"},{"id":"11.7.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/38/","page":757,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["शश्‍वत्परार्थसर्वेहः परार्थैकान्तसम्भवः।","साधुः शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्यः परात्मताम्॥ ३८"],"iast":["śaśvatparārthasarvehaḥ parārthaikāntasambhavaḥ|","sādhuḥ śikṣeta bhūbhṛtto nagaśiṣyaḥ parātmatām|| 38"],"meaning":"पृथ्वीके ही विकार पर्वत और वृक्षसे मैंने यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे उनकी सारी चेष्टाएँ सदा-सर्वदा दूसरोंके हितके लिये ही होती हैं, बल्कि यों कहना चाहिये कि उनका जन्म ही एकमात्र दूसरोंका हित करनेके लिये ही हुआ है, साधु पुरुषको चाहिये कि उनकी शिष्यता स्वीकार करके उनसे परोपकारकी शिक्षा ग्रहण करे॥ ३८॥"},{"id":"11.7.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/39/","page":757,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः।","ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः॥ ३९"],"iast":["prāṇavṛttyaiva santuṣyenmunirnaivendriyapriyaiḥ|","jñānaṃ yathā na naśyeta nāvakīryeta vāṅmanaḥ|| 39"],"meaning":"मैंने शरीरके भीतर रहनेवाले वायु—प्राणवायुसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह आहारमात्रकी इच्छा रखता है और उसकी प्राप्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधकको भी चाहिये कि जितनेसे जीवन-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन कर ले। इन्द्रियोंको तृप्त करनेके लिये बहुत-से विषय न चाहे। संक्षेपमें उतने ही विषयोंका उपयोग करना चाहिये जिनसे बुद्धि विकृत न हो, मन चंचल न हो और वाणी व्यर्थकी बातोंमें न लग जाय॥ ३९॥"},{"id":"11.7.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/40/","page":757,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["विषयेष्वाविशन् योगी नानाधर्मेषु सर्वतः।","गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत्॥ ४०"],"iast":["viṣayeṣvāviśan yogī nānādharmeṣu sarvataḥ|","guṇadoṣavyapetātmā na viṣajjeta vāyuvat|| 40"],"meaning":"शरीरके बाहर रहनेवाले वायुसे मैंने यह सीखा है कि जैसे वायुको अनेक स्थानोंमें जाना पड़ता है, परन्तु वह कहीं भी आसक्त नहीं होता, किसीका भी गुण-दोष नहीं अपनाता, वैसे ही साधक पुरुष भी आवश्यकता होनेपर विभिन्न प्रकारके धर्म और स्वभाववाले विषयोंमें जाय, परन्तु अपने लक्ष्यपर स्थिर रहे। किसीके गुण या दोषकी ओर झुक न जाय, किसीसे आसक्ति या द्वेष न कर बैठे॥ ४०॥"},{"id":"11.7.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/41/","page":757,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["पार्थिवेष्विह देहेषु प्रविष्टस्तद्गुणाश्रयः।","गुणैर्न युज्यते योगी गन्धैर्वायुरिवात्मदृक्॥ ४१"],"iast":["pārthiveṣviha deheṣu praviṣṭastadguṇāśrayaḥ|","guṇairna yujyate yogī gandhairvāyurivātmadṛk|| 41"],"meaning":"गन्ध वायुका गुण नहीं, पृथ्वीका गुण है। परन्तु वायुको गन्धका वहन करना पड़ता है। ऐसा करनेपर भी वायु शुद्ध ही रहता है, गन्धसे उसका सम्पर्क नहीं होता। वैसे ही साधकका जबतक इस पार्थिव शरीरसे सम्बन्ध है, तबतक उसे इसकी व्याधि-पीड़ा और भूख-प्यास आदिका भी वहन करना पड़ता है। परन्तु अपनेको शरीर नहीं, आत्माके रूपमें देखनेवाला साधक शरीर और उसके गुणोंका आश्रय होनेपर भी उनसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है॥ ४१॥"},{"id":"11.7.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/42/","page":757,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["अन्तर्हितश्‍च स्थिरजंगमेषु","ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन।","व्याप्त्याव्यवच्छेदमसंगमात्मनो","मुनिर्नभस्त्वं विततस्य भावयेत्॥ ४२"],"iast":["antarhitaśca sthirajaṃgameṣu","brahmātmabhāvena samanvayena|","vyāptyāvyavacchedamasaṃgamātmano","munirnabhastvaṃ vitatasya bhāvayet|| 42"],"meaning":"राजन्! जितने भी घट-मठ आदि पदार्थ हैं, वे चाहे चल हों या अचल, उनके कारण भिन्‍न-भिन्‍न प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें आकाश एक और अपरिच्छिन्‍न (अखण्ड) ही है। वैसे ही चर-अचर जितने भी सूक्ष्म-स्थूल शरीर हैं, उनमें आत्मारूपसे सर्वत्र स्थित होनेके कारण ब्रह्म सभीमें है। साधकको चाहिये कि सूतके मनियोंमें व्याप्त सूतके समान आत्माको अखण्ड और असंगरूपसे देखे। वह इतना विस्तृत है कि उसकी तुलना कुछ-कुछ आकाशसे ही की जा सकती है। इसलिये साधकको आत्माकी आकाशरूपताकी भावना करनी चाहिये॥ ४२॥"},{"id":"11.7.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/43/","page":758,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तेजोऽबन्‍नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः ।","न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान्॥ ४३"],"iast":["tejo'bannamayairbhāvairmeghādyairvāyuneritaiḥ |","na spṛśyate nabhastadvat kālasṛṣṭairguṇaiḥ pumān|| 43"],"meaning":"आग लगती है, पानी बरसता है, अन्‍न आदि पैदा होते और नष्ट होते हैं, वायुकी प्रेरणासे बादल आदि आते और चले जाते हैं; यह सब होनेपर भी आकाश अछूता रहता है। आकाशकी दृष्टिसे यह सब कुछ है ही नहीं। इसी प्रकार भूत, वर्तमान और भविष्यके चक्करमें न जाने किन-किन नामरूपोंकी सृष्टि और प्रलय होते हैं; परन्तु आत्माके साथ उनका कोई संस्पर्श नहीं है॥ ४३॥"},{"id":"11.7.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/44/","page":758,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूर्नृणाम्।","मुनिः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनैः॥ ४४"],"iast":["svacchaḥ prakṛtitaḥ snigdho mādhuryastīrthabhūrnṛṇām|","muniḥ punātyapāṃ mitramīkṣopasparśakīrtanaiḥ|| 44"],"meaning":"जिस प्रकार जल स्वभावसे ही स्वच्छ, चिकना, मधुर और पवित्र करनेवाला होता है तथा गंगा आदि तीर्थोंके दर्शन, स्पर्श और नामोच्चारणसे भी लोग पवित्र हो जाते हैं—वैसे ही साधकको भी स्वभावसे ही शुद्ध, स्निग्ध, मधुरभाषी और लोकपावन होना चाहिये। जलसे शिक्षा ग्रहण करनेवाला अपने दर्शन, स्पर्श और नामोच्चारणसे लोगोंको पवित्र कर देता है॥ ४४॥"},{"id":"11.7.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/45/","page":758,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षोदरभाजनः।","सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्‍निवत्॥ ४५"],"iast":["tejasvī tapasā dīpto durdharṣodarabhājanaḥ|","sarvabhakṣo'pi yuktātmā nādatte malamagnivat|| 45"],"meaning":"राजन्! मैंने अग्‍निसे यह शिक्षा ली है कि जैसे वह तेजस्वी और ज्योतिर्मय होती है, जैसे उसे कोई अपने तेजसे दबा नहीं सकता, जैसे उसके पास संग्रह-परिग्रहके लिये कोई पात्र नहीं—सब कुछ अपने पेटमें रख लेती है, और जैसे सब कुछ खा-पी लेनेपर भी विभिन्‍न वस्तुओंके दोषोंसे वह लिप्त नहीं होती वैसे ही साधक भी परम तेजस्वी, तपस्यासे देदीप्यमान, इन्द्रियोंसे अपराभूत, भोजनमात्रका संग्रही और यथायोग्य सभी विषयोंका उपभोग करता हुआ भी अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे, किसीका दोष अपनेमें न आने दे॥ ४५॥"},{"id":"11.7.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/46/","page":759,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["क्वचिच्छन्‍नः क्‍वचित् स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम्।","भुङ्क्ते सर्वत्र दातॄणां दहन् प्रागुत्तराशुभम्॥ ४६"],"iast":["kvacicchannaḥ kvacit spaṣṭa upāsyaḥ śreya icchatām|","bhuṅkte sarvatra dātṝṇāṃ dahan prāguttarāśubham|| 46"],"meaning":"जैसे अग्‍नि कहीं (लकड़ी आदिमें) अप्रकट रहती है और कहीं प्रकट, वैसे ही साधक भी कहीं गुप्त रहे और कहीं प्रकट हो जाय। वह कहीं-कहीं ऐसे रूपमें भी प्रकट हो जाता है, जिससे कल्याणकामी पुरुष उसकी उपासना कर सकें। वह अग्‍निके समान ही भिक्षारूप हवन करनेवालोंके अतीत और भावी अशुभको भस्म कर देता है तथा सर्वत्र अन्‍न ग्रहण करता है॥ ४६॥"},{"id":"11.7.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/47/","page":759,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः।","प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्‍निरिवैधसि॥ ४७"],"iast":["svamāyayā sṛṣṭamidaṃ sadasallakṣaṇaṃ vibhuḥ|","praviṣṭa īyate tattatsvarūpo'gnirivaidhasi|| 47"],"meaning":"साधक पुरुषको इसका विचार करना चाहिये कि जैसे अग्‍नि लम्बी-चौड़ी, टेढ़ी-सीधी लकड़ियोंमें रहकर उनके समान ही सीधी-टेढ़ी या लम्बी-चौड़ी दिखायी पड़ती है—वास्तवमें वह वैसी है नहीं; वैसे ही सर्वव्यापक आत्मा भी अपनी मायासे रचे हुए कार्य-कारणरूप जगत‍्में व्याप्त होनेके कारण उन-उन वस्तुओंके नाम-रूपसे कोई सम्बन्ध न होनेपर भी उनके रूपमें प्रतीत होने लगता है॥ ४७॥"},{"id":"11.7.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/48/","page":759,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["विसर्गाद्याः श्मशानान्ता भावा देहस्य नात्मनः।","कलानामिव चन्द्रस्य कालेनाव्यक्तवर्त्मना॥ ४८"],"iast":["visargādyāḥ śmaśānāntā bhāvā dehasya nātmanaḥ|","kalānāmiva candrasya kālenāvyaktavartmanā|| 48"],"meaning":"मैंने चन्द्रमासे यह शिक्षा ग्रहण की है कि यद्यपि जिसकी गति नहीं जानी जा सकती, उस कालके प्रभावसे चन्द्रमाकी कलाएँ घटती-बढ़ती रहती हैं, तथापि चन्द्रमा तो चन्द्रमा ही है, वह न घटता है और न बढ़ता ही है; वैसे ही जन्मसे लेकर मृत्यु पर्यन्त जितनी भी अवस्थाएँ हैं, सब शरीरकी हैं, आत्मासे उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं है॥ ४८॥"},{"id":"11.7.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/49/","page":759,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["कालेन ह्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ।","नित्यावपि न दृश्येते आत्मनोऽ‌ग्‍नेर्यथार्चिषाम्॥ ४९"],"iast":["kālena hyoghavegena bhūtānāṃ prabhavāpyayau|","nityāvapi na dṛśyete ātmano'gneryathārciṣām|| 49"],"meaning":"जैसे आगकी लपट अथवा दीपककी लौ क्षण-क्षणमें उत्पन्‍न और नष्ट होती रहती है—उनका यह क्रम निरन्तर चलता रहता है, परन्तु दीख नहीं पड़ता—वैसे ही जलप्रवाहके समान वेगवान् कालके द्वारा क्षण-क्षणमें प्राणियोंके शरीरकी उत्पत्ति और विनाश होता रहता है, परन्तु अज्ञानवश वह दिखायी नहीं पड़ता॥ ४९॥"},{"id":"11.7.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/50/","page":759,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति।","न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः॥ ५०"],"iast":["guṇairguṇānupādatte yathākālaṃ vimuñcati|","na teṣu yujyate yogī gobhirgā iva gopatiḥ|| 50"],"meaning":"राजन्! मैंने सूर्यसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वे अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल खींचते और समयपर उसे बरसा देते हैं, वैसे ही योगी पुरुष इन्द्रियोंके द्वारा समयपर विषयोंका ग्रहण करता है और समय आनेपर उनका त्याग—उनका दान भी कर देता है। किसी भी समय उसे इन्द्रियके किसी भी विषयमें आसक्ति नहीं होती॥ ५०॥"},{"id":"11.7.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/51/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["बुध्यते स्वे न भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गतः।","लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत्॥ ५१"],"iast":["budhyate sve na bhedena vyaktistha iva tadgataḥ|","lakṣyate sthūlamatibhirātmā cāvasthito'rkavat|| 51"],"meaning":"स्थूलबुद्धि पुरुषोंको जलके विभिन्‍न पात्रोंमें प्रतिबिम्बित हुआ सूर्य उन्हींमें प्रविष्ट-सा होकर भिन्‍न-भिन्‍न दिखायी पड़ता है। परन्तु इससे स्वरूपतः सूर्य अनेक नहीं हो जाता; वैसे ही चल-अचल उपाधियोंके भेदसे ऐसा जान पड़ता है कि प्रत्येक व्यक्तिमें आत्मा अलग-अलग है। परन्तु जिनको ऐसा मालूम होता है, उनकी बुद्धि मोटी है। असल बात तो यह है कि आत्मा सूर्यके समान एक ही है। स्वरूपतः उसमें कोई भेद नहीं है॥ ५१॥"},{"id":"11.7.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/52/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["नातिस्नेहः प्रसंगो वा कर्तव्यः क्वापि केनचित्।","कुर्वन् विन्देत सन्तापं कपोत इव दीनधीः॥ ५२"],"iast":["nātisnehaḥ prasaṃgo vā kartavyaḥ kvāpi kenacit|","kurvan vindeta santāpaṃ kapota iva dīnadhīḥ|| 52"],"meaning":"राजन्! कहीं किसीके साथ अत्यन्त स्नेह अथवा आसक्ति न करनी चाहिये, अन्यथा उसकी बुद्धि अपना स्वातन्त्र्य खोकर दीन हो जायगी और उसे कबूतरकी तरह अत्यन्त क्लेश उठाना पड़ेगा॥ ५२॥"},{"id":"11.7.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/53/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["कपोतः कश्‍चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ।","कपोत्या भार्यया सार्धमुवास कतिचित् समाः॥ ५३"],"iast":["kapotaḥ kaścanāraṇye kṛtanīḍo vanaspatau|","kapotyā bhāryayā sārdhamuvāsa katicit samāḥ|| 53"],"meaning":"राजन्! किसी जंगलमें एक कबूतर रहता था, उसने एक पेड़पर अपना घोंसला बना रखा था। अपनी मादा कबूतरीके साथ वह कई वर्षोंतक उसी घोंसलेमें रहा॥ ५३॥"},{"id":"11.7.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/54/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["कपोतौ स्नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ।","दृष्टिं दृष्ट्यांगमंगेन बुद्धिं बुद्ध्या बबन्धतुः॥ ५४"],"iast":["kapotau snehaguṇitahṛdayau gṛhadharmiṇau|","dṛṣṭiṃ dṛṣṭyāṃgamaṃgena buddhiṃ buddhyā babandhatuḥ|| 54"],"meaning":"उस कबूतरके जोड़ेके हृदयमें निरन्तर एक-दूसरेके प्रति स्नेहकी वृद्धि होती जाती थी। वे गृहस्थधर्ममें इतने आसक्त हो गये थे कि उन्होंने एक-दूसरेकी दृष्टि-से-दृष्टि, अंग-से-अंग और बुद्धिसे-बुद्धिको बाँध रखा था॥ ५४॥"},{"id":"11.7.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/55/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["शय्यासनाटनस्थानवार्ताक्रीडाशनादिकम्।","मिथुनीभूय विस्रब्धौ चेरतुर्वनराजिषु॥ ५५"],"iast":["śayyāsanāṭanasthānavārtākrīḍāśanādikam|","mithunībhūya visrabdhau ceraturvanarājiṣu|| 55"],"meaning":"उनका एक-दूसरेपर इतना विश्‍वास हो गया था कि वे निःशंक होकर वहाँकी वृक्षावलीमें एक साथ सोते, बैठते, घूमते-फिरते, ठहरते, बातचीत करते, खेलते और खाते-पीते थे॥ ५५॥"},{"id":"11.7.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/56/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["यं यं वाञ्छति सा राजंस्तर्पयन्त्यनुकम्पिता।","तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः॥ ५६"],"iast":["yaṃ yaṃ vāñchati sā rājaṃstarpayantyanukampitā|","taṃ taṃ samanayat kāmaṃ kṛcchreṇāpyajitendriyaḥ|| 56"],"meaning":"राजन्! कबूतरीपर कबूतरका इतना प्रेम था कि वह जो कुछ चाहती, कबूतर बड़े-से-बड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना पूर्ण करता; वह कबूतरी भी अपने कामुक पतिकी कामनाएँ पूर्ण करती॥ ५६॥"},{"id":"11.7.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/57/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["कपोती प्रथमं गर्भं गृह्णती काल आगते।","अण्डानि सुषुवे नीडे स्वपत्युः सन्‍निधौ सती॥ ५७"],"iast":["kapotī prathamaṃ garbhaṃ gṛhṇatī kāla āgate|","aṇḍāni suṣuve nīḍe svapatyuḥ sannidhau satī|| 57"],"meaning":"समय आनेपर कबूतरीको पहला गर्भ रहा। उसने अपने पतिके पास ही घोंसलेमें अंडे दिये॥ ५७॥"},{"id":"11.7.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/58/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तेषु काले व्यजायन्त रचितावयवा हरेः।","शक्तिभिर्दुर्विभाव्याभिः कोमलांगतनूरुहाः॥ ५८"],"iast":["teṣu kāle vyajāyanta racitāvayavā hareḥ|","śaktibhirdurvibhāvyābhiḥ komalāṃgatanūruhāḥ|| 58"],"meaning":"भगवान्‌की अचिन्त्य शक्तिसे समय आनेपर वे अंडे फूट गये और उनमेंसे हाथ-पैरवाले बच्चे निकल आये। उनका एक-एक अंग और रोएँ अत्यन्त कोमल थे॥ ५८॥"},{"id":"11.7.59","number":59,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/59/","page":760,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["प्रजाः पुपुषतुः प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ।","शृण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृतौ कलभाषितैः॥ ५९"],"iast":["prajāḥ pupuṣatuḥ prītau dampatī putravatsalau|","śṛṇvantau kūjitaṃ tāsāṃ nirvṛtau kalabhāṣitaiḥ|| 59"],"meaning":"अब उन कबूतर-कबूतरीकी आँखें अपने बच्चोंपर लग गयीं, वे बड़े प्रेम और आनन्दसे अपने बच्चोंका लालन-पालन, लाड़-प्यार करते और उनकी मीठी बोली, उनकी गुटर-गूँ सुन-सुनकर आनन्दम‌ग्‍न हो जाते॥ ५९॥"},{"id":"11.7.60","number":60,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/60/","page":761,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तासां पतत्त्रैः सुस्पर्शैः कूजितैर्मुग्धचेष्टितैः।","प्रत्युद्गमैरदीनानां पितरौ मुदमापतुः॥ ६०"],"iast":["tāsāṃ patattraiḥ susparśaiḥ kūjitairmugdhaceṣṭitaiḥ|","pratyudgamairadīnānāṃ pitarau mudamāpatuḥ|| 60"],"meaning":"बच्चे तो सदा-सर्वदा प्रसन्‍न रहते ही हैं; वे जब अपने सुकुमार पंखोंसे माँ-बापका स्पर्श करते, कूजते, भोली-भाली चेष्टाएँ करते और फुदक-फुदककर अपने माँ-बापके पास दौड़ आते तब कबूतर-कबूतरी आनन्दम‌ग्‍न हो जाते॥ ६०॥"},{"id":"11.7.61","number":61,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/61/","page":761,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["स्नेहानुबद्धहृदयावन्योन्यं विष्णुमायया।","विमोहितौ दीनधियौ शिशून् पुपुषतुः प्रजाः॥ ६१"],"iast":["snehānubaddhahṛdayāvanyonyaṃ viṣṇumāyayā|","vimohitau dīnadhiyau śiśūn pupuṣatuḥ prajāḥ|| 61"],"meaning":"राजन्! सच पूछो तो वे कबूतर-कबूतरी भगवान्‌की मायासे मोहित हो रहे थे। उनका हृदय एक-दूसरेके स्नेहबन्धनसे बँध रहा था। वे अपने नन्हें-नन्हें बच्चोंके पालन-पोषणमें इतने व्यग्र रहते कि उन्हें दीन-दुनिया, लोक-परलोककी याद ही न आती॥ ६१॥"},{"id":"11.7.62","number":62,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/62/","page":761,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["एकदा जग्मतुस्तासामन्‍नार्थं तौ कुटुम्बिनौ।","परितः कानने तस्मिन्‍नर्थिनौ चेरतुश्‍चिरम्॥ ६२"],"iast":["ekadā jagmatustāsāmannārthaṃ tau kuṭumbinau|","paritaḥ kānane tasminnarthinau ceratuściram|| 62"],"meaning":"एक दिन दोनों नर-मादा अपने बच्चोंके लिये चारा लाने जंगलमें गये हुए थे। क्योंकि अब उनका कुटुम्ब बहुत बढ़ गया था। वे चारेके लिये चिरकालतक जंगलमें चारों ओर विचरते रहे॥ ६२॥"},{"id":"11.7.63","number":63,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/63/","page":761,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा ताँल्लुब्धकः कश्‍चिद् यदृच्छातो वनेचरः।","जगृहे जालमातत्य चरतः स्वालयान्तिके॥ ६३"],"iast":["dṛṣṭvā tām̐llubdhakaḥ kaścid yadṛcchāto vanecaraḥ|","jagṛhe jālamātatya carataḥ svālayāntike|| 63"],"meaning":"इधर एक बहेलिया घूमता-घूमता संयोगवश उनके घोंसलेकी ओर आ निकला। उसने देखा कि घोंसलेके आस-पास कबूतरके बच्चे फुदक रहे हैं; उसने जाल फैलाकर उन्हें पकड़ लिया॥ ६३॥"},{"id":"11.7.64","number":64,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/64/","page":761,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["कपोतश्‍च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकौ।","गतौ पोषणमादाय स्वनीडमुपजग्मतुः॥ ६४"],"iast":["kapotaśca kapotī ca prajāpoṣe sadotsukau|","gatau poṣaṇamādāya svanīḍamupajagmatuḥ|| 64"],"meaning":"कबूतर-कबूतरी बच्चोंको खिलाने-पिलानेके लिये हर समय उत्सुक रहा करते थे। अब वे चारा लेकर अपने घोंसलेके पास आये॥ ६४॥"},{"id":"11.7.65","number":65,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/65/","page":761,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["कपोती स्वात्मजान् वीक्ष्य बालकान् जालसंवृतान्।","तानभ्यधावत् क्रोशन्ती क्रोशतो भृशदुःखिता॥ ६५"],"iast":["kapotī svātmajān vīkṣya bālakān jālasaṃvṛtān|","tānabhyadhāvat krośantī krośato bhṛśaduḥkhitā|| 65"],"meaning":"कबूतरीने देखा कि उसके नन्हें-नन्हें बच्चे, उसके हृदयके टुकड़े जालमें फँसे हुए हैं और दुःखसे चें-चें कर रहे हैं। उन्हें ऐसी स्थितिमें देखकर कबूतरीके दुःखकी सीमा न रही। वह रोती-चिल्लाती उनके पास दौड़ गयी॥ ६५॥"},{"id":"11.7.66","number":66,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/66/","page":761,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["सासकृत्स्नेहगुणिता दीनचित्ताजमायया।","स्वयं चाबध्यत शिचा बद्धान् पश्यन्त्यपस्मृतिः॥ ६६"],"iast":["sāsakṛtsnehaguṇitā dīnacittājamāyayā|","svayaṃ cābadhyata śicā baddhān paśyantyapasmṛtiḥ|| 66"],"meaning":"भगवान्‌की मायासे उसका चित्त अत्यन्त दीन-दुःखी हो रहा था। वह उमड़ते हुए स्नेहकी रस्सीसे जकड़ी हुई थी; अपने बच्चोंको जालमें फँसा देखकर उसे अपने शरीरकी भी सुध-बुध न रही। और वह स्वयं ही जाकर जालमें फँस गयी॥ ६६॥"},{"id":"11.7.67","number":67,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/67/","page":761,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["कपोतश्‍चात्मजान् बद्धानात्मनोऽप्यधिकान् प्रियान्।","भार्यां चात्मसमां दीनो विललापातिदुःखितः॥ ६७"],"iast":["kapotaścātmajān baddhānātmano'pyadhikān priyān|","bhāryāṃ cātmasamāṃ dīno vilalāpātiduḥkhitaḥ|| 67"],"meaning":"जब कबूतरने देखा कि मेरे प्राणोंसे भी प्यारे बच्चे जालमें फँस गये और मेरी प्राणप्रिया पत्‍नी भी उसी दशामें पहुँच गयी, तब वह अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगा। सचमुच उस समय उसकी दशा अत्यन्त दयनीय थी॥ ६७॥"},{"id":"11.7.68","number":68,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/68/","page":762,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["अहो मे पश्यतापायमल्पपुण्यस्य दुर्मतेः।","अतृप्तस्याकृतार्थस्य गृहस्त्रैवर्गिको हतः॥ ६८"],"iast":["aho me paśyatāpāyamalpapuṇyasya durmateḥ|","atṛptasyākṛtārthasya gṛhastraivargiko hataḥ|| 68"],"meaning":"‘मैं अभागा हूँ, दुर्मति हूँ। हाय, हाय! मेरा तो सत्यानाश हो गया। देखो, देखो, न मुझे अभी तृप्ति हुई और न मेरी आशाएँ ही पूरी हुईं। तबतक मेरा धर्म, अर्थ और कामका मूल यह गृहस्थाश्रम ही नष्ट हो गया॥ ६८॥"},{"id":"11.7.69","number":69,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/69/","page":762,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["अनुरूपानुकूला च यस्य मे पतिदेवता।","शून्ये गृहे मां सन्त्यज्य पुत्रैः स्वर्याति साधुभिः॥ ६९"],"iast":["anurūpānukūlā ca yasya me patidevatā|","śūnye gṛhe māṃ santyajya putraiḥ svaryāti sādhubhiḥ|| 69"],"meaning":"हाय! मेरी प्राणप्यारी मुझे ही अपना इष्टदेव समझती थी; मेरी एक-एक बात मानती थी, मेरे इशारेपर नाचती थी, सब तरहसे मेरे योग्य थी। आज वह मुझे सूने घरमें छोड़कर हमारे सीधे-सादे निश्छल बच्चोंके साथ स्वर्ग सिधार रही है॥ ६९॥"},{"id":"11.7.70","number":70,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/70/","page":762,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["सोऽहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रजः।","जिजीविषे किमर्थं वा विधुरो दुःखजीवितः॥ ७०"],"iast":["so'haṃ śūnye gṛhe dīno mṛtadāro mṛtaprajaḥ|","jijīviṣe kimarthaṃ vā vidhuro duḥkhajīvitaḥ|| 70"],"meaning":"मेरे बच्चे मर गये। मेरी पत्‍नी जाती रही। मेरा अब संसारमें क्या काम है? मुझ दीनका यह विधुर जीवन—बिना गृहिणीका जीवन जलनका—व्यथाका जीवन है। अब मैं इस सूने घरमें किसके लिये जीऊँ?॥ ७०॥"},{"id":"11.7.71","number":71,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/71/","page":762,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तांस्तथैवावृताञ्छिग्भिर्मृत्युग्रस्तान् विचेष्टतः।","स्वयं च कृपणः शिक्षु पश्यन्‍नप्यबुधोऽपतत्॥ ७१"],"iast":["tāṃstathaivāvṛtāñchigbhirmṛtyugrastān viceṣṭataḥ|","svayaṃ ca kṛpaṇaḥ śikṣu paśyannapyabudho'patat|| 71"],"meaning":"राजन्! कबूतरके बच्चे जालमें फँसकर तड़फड़ा रहे थे, स्पष्ट दीख रहा था कि वे मौतके पंजेमें हैं, परन्तु वह मूर्ख कबूतर यह सब देखते हुए भी इतना दीन हो रहा था कि स्वयं जान-बूझकर जालमें कूद पड़ा॥ ७१॥"},{"id":"11.7.72","number":72,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/72/","page":762,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["तं लब्ध्वा लुब्धकः क्रूरः कपोतं गृहमेधिनम्।","कपोतकान् कपोतीं च सिद्धार्थः प्रययौ गृहम्॥ ७२"],"iast":["taṃ labdhvā lubdhakaḥ krūraḥ kapotaṃ gṛhamedhinam|","kapotakān kapotīṃ ca siddhārthaḥ prayayau gṛham|| 72"],"meaning":"राजन्! वह बहेलिया बड़ा क्रूर था। गृहस्थाश्रमी कबूतर-कबूतरी और उनके बच्चोंके मिल जानेसे उसे बड़ी प्रसन्‍नता हुई; उसने समझा मेरा काम बन गया और वह उन्हें लेकर चलता बना॥ ७२॥"},{"id":"11.7.73","number":73,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/73/","page":762,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वारामः पतत्त्रिवत्।","पुष्णन् कुटुम्बं कृपणः सानुबन्धोऽवसीदति॥ ७३"],"iast":["evaṃ kuṭumbyaśāntātmā dvandvārāmaḥ patattrivat|","puṣṇan kuṭumbaṃ kṛpaṇaḥ sānubandho'vasīdati|| 73"],"meaning":"जो कुटुम्बी है, विषयों और लोगोंके संग-साथमें ही जिसे सुख मिलता है एवं अपने कुटुम्बके भरण-पोषणमें ही जो सारी सुध-बुध खो बैठा है, उसे कभी शान्ति नहीं मिल सकती। वह उसी कबूतरके समान अपने कुटुम्बके साथ कष्ट पाता है॥ ७३॥"},{"id":"11.7.74","number":74,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/74/","page":762,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["यः प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिद्वारमपावृतम्।","गृहेषु खगवत् सक्तस्तमारूढच्युतं विदुः॥ ७४"],"iast":["yaḥ prāpya mānuṣaṃ lokaṃ muktidvāramapāvṛtam|","gṛheṣu khagavat saktastamārūḍhacyutaṃ viduḥ|| 74"],"meaning":"यह मनुष्य-शरीर मुक्तिका खुला हुआ द्वार है। इसे पाकर भी जो कबूतरकी तरह अपनी घर-गृहस्थीमें ही फँसा हुआ है, वह बहुत ऊँचेतक चढ़कर गिर रहा है। शास्त्रकी भाषामें वह ‘आरूढ़च्युत’ है॥ ७४॥"}],"text":[{"b":39102,"kind":"adhyaya_heading","page":752,"text":"अथ सप्तमोऽध्यायः"},{"b":39103,"kind":"topic_heading","page":752,"text":"अवधूतोपाख्यान—पृथ्वीसे लेकर कबूतरतक आठ गुरुओंकी कथा"},{"b":39104,"kind":"topic_heading","page":752,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":39105,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.1"],"text":"यदात्थ मां महाभाग तच्चिकीर्षितमेव मे।"},{"b":39106,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.1"],"text":"ब्रह्मा भवो लोकपालाः स्वर्वासं मेऽभिकांक्षिणः॥ १"},{"b":39107,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.2"],"text":"मया निष्पादितं ह्यत्र देवकार्यमशेषतः।"},{"b":39108,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.2"],"text":"यदर्थमवतीर्णोऽहमंशेन ब्रह्मणार्थितः॥ २"},{"b":39109,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.3"],"text":"कुलं वै शापनिर्दग्धं नंक्ष्यत्यन्योन्यविग्रहात्।"},{"b":39110,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.3"],"text":"समुद्रः सप्तमेऽह्न्येतां पुरीं च प्लावयिष्यति॥ ३"},{"b":39111,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.4"],"text":"यर्ह्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयं नष्टमंगलः।"},{"b":39112,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.4"],"text":"भविष्यत्यचिरात् साधो कलिनापि निराकृतः॥ ४"},{"b":39113,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.5"],"text":"न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले।"},{"b":39114,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.5"],"text":"जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे॥ ५"},{"b":39115,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.6"],"text":"त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु।"},{"b":39116,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.6"],"text":"मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग् विचरस्व गाम्॥ ६"},{"b":39117,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.7"],"text":"यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।"},{"b":39118,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.7"],"text":"नश्‍वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्॥ ७"},{"b":39119,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.8"],"text":"पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः स गुणदोषभाक्।"},{"b":39120,"kind":"sanskrit_shloka","page":752,"verses":["11.7.8"],"text":"कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा॥ ८"},{"b":39121,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.9"],"text":"तस्माद् युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्।"},{"b":39122,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.9"],"text":"आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्‍वरे॥ ९"},{"b":39123,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.10"],"text":"ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम्।"},{"b":39124,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.10"],"text":"आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे॥ १०"},{"b":39125,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.11"],"text":"दोषबुद्ध्योभयातीतो निषेधान्‍न निवर्तते।"},{"b":39126,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.11"],"text":"गुणबुद्ध्या च विहितं न करोति यथार्भकः॥ ११"},{"b":39127,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.12"],"text":"सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्‍चयः।"},{"b":39128,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.12"],"text":"पश्यन् मदात्मकं विश्‍वं न विपद्येत वै पुनः॥ १२"},{"b":39129,"kind":"hindi_translation","page":751,"explains":["11.7.1","11.7.2","11.7.3","11.7.4","11.7.5","11.7.6","11.7.7","11.7.8","11.7.9","11.7.10","11.7.11","11.7.12"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाभाग्यवान् उद्धव! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है, मैं वही करना चाहता हूँ। ब्रह्मा, शंकर और इन्द्रादि लोकपाल भी अब यही चाहते हैं कि मैं उनके लोकोंमें होकर अपने धामको चला जाऊँ॥ १॥ पृथ्वीपर देवताओंका जितना काम करना था, उसे मैं पूरा कर चुका। इसी कामके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे मैं बलरामजीके साथ अवतीर्ण हुआ था॥ २॥ अब यह यदुवंश, जो ब्राह्मणोंके शापसे भस्म हो चुका है, पारस्परिक फूट और युद्धसे नष्ट हो जायगा। आजके सातवें दिन समुद्र इस पुरी—द्वारकाको डुबो देगा॥ ३॥ प्यारे उद्धव! जिस क्षण मैं मर्त्यलोकका परित्याग कर दूँगा, उसी क्षण इसके सारे मंगल नष्ट हो जायँगे और थोड़े ही दिनोंमें पृथ्वीपर कलियुगका बोलबाला हो जायगा॥ ४॥ जब मैं इस पृथ्वीका त्याग कर दूँ तब तुम इसपर मत रहना; क्योंकि साधु उद्धव! कलियुगमें अधिकांश लोगोंकी रुचि अधर्ममें ही होगी॥ ५॥ अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवोंका स्नेह-सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्यप्रेमसे मुझमें अपना मन लगाकर समदृष्टिसे पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरण करो॥ ६॥ इस जगत‍्में जो कुछ मनसे सोचा जाता है, वाणीसे कहा जाता है, नेत्रोंसे देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियोंसे अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान् है। सपनेकी तरह मनका विलास है। इसलिये मायामात्र है, मिथ्या है—ऐसा समझ लो॥ ७॥ जिस पुरुषका मन अशान्त है, असंयत है, उसीको पागलकी तरह अनेकों वस्तुएँ मालूम पड़ती हैं; वास्तवमें यह चित्तका भ्रम ही है। नानात्वका भ्रम हो जानेपर ही ‘यह गुण है’ और ‘यह दोष’ इस प्रकारकी कल्पना करनी पड़ती है । जिसकी बुद्धिमें गुण और दोषका भेद बैठ गया है, दृढ़मूल हो गया है, उसीके लिये कर्म, अकर्म और विकर्मरूप भेदका प्रतिपादन हुआ है॥ ८॥ इसलिये उद्धव! तुम पहले अपनी समस्त इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लो, उनकी बागडोर अपने हाथमें ले लो और केवल इन्द्रियोंको ही नहीं, चित्तकी समस्त वृत्तियोंको भी रोक लो और फिर ऐसा अनुभव करो कि यह सारा जगत् अपने आत्मामें ही फैला हुआ है और आत्मा मुझ सर्वात्मा इन्द्रियातीत ब्रह्मसे एक है, अभिन्‍न है॥ ९॥ जब वेदोंके मुख्य तात्पर्य—निश्‍चयरूप ज्ञान और अनुभवरूप विज्ञानसे भलीभाँति सम्पन्‍न होकर तुम अपने आत्माके अनुभवमें ही आनन्दम‌ग्‍न रहोगे और सम्पूर्ण देवता आदि शरीरधारियोंके आत्मा हो जाओगे। इसलिये किसी भी विघ्नसे तुम पीडित नहीं हो सकोगे; क्योंकि उन विघ्नों और विघ्न करनेवालोंकी आत्मा भी तुम्हीं होगे॥ १०॥ जो पुरुष गुण और दोष-बुद्धिसे अतीत हो जाता है वह बालकके समान निषिद्ध कर्मसे निवृत्त होता है, परन्तु दोष-बुद्धिसे नहीं। वह विहित कर्मका अनुष्ठान भी करता है, परन्तु गुणबुद्धिसे नहीं॥ ११॥ जिसने श्रुतियोंके तात्पर्यका यथार्थ ज्ञान ही नहीं प्राप्त कर लिया, बल्कि उनका साक्षात्कार भी कर लिया है और इस प्रकार जो अटल निश्‍चयसे सम्पन्‍न हो गया है वह समस्त प्राणियोंका हितैषी सुहृद् होता है और उसकी वृत्तियाँ सर्वथा शान्त रहती हैं। वह समस्त प्रतीयमान विश्‍वको मेरा ही स्वरूप—आत्मस्वरूप देखता है; इसलिये उसे फिर कभी जन्म-मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ना पड़ता॥ १२॥"},{"b":39130,"kind":"topic_heading","page":753,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":39131,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.13"],"text":"इत्यादिष्टो भगवता महाभागवतो नृप।"},{"b":39132,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.13"],"text":"उद्धवः प्रणिपत्याह तत्त्वजिज्ञासुरच्युतम्॥ १३"},{"b":39133,"kind":"hindi_translation","page":753,"explains":["11.7.13"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार आदेश दिया, तब भगवान्‌के परम प्रेमी उद्धवजीने उन्हें प्रणाम करके तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिकी इच्छासे यह प्रश्‍न किया॥ १३॥"},{"b":39134,"kind":"topic_heading","page":753,"text":"उद्धव उवाच"},{"b":39135,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.14"],"text":"योगेश योगविन्यास योगात्मन् योगसम्भव।"},{"b":39136,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.14"],"text":"निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षणः॥ १४"},{"b":39137,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.15"],"text":"त्यागोऽयं दुष्करो भूमन् कामानां विषयात्मभिः।"},{"b":39138,"kind":"sanskrit_shloka","page":753,"verses":["11.7.15"],"text":"सुतरां त्वयि सर्वात्मन्‍नभक्तैरिति मे मतिः॥ १५"},{"b":39139,"kind":"hindi_commentary","page":754,"verses":["11.7.16"],"text":"सोऽहं ममाहमिति मूढमतिर्विगाढ-"},{"b":39140,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.16"],"text":"स्त्वन्मायया विरचितात्मनि सानुबन्धे।"},{"b":39141,"kind":"hindi_commentary","page":754,"verses":["11.7.16"],"text":"तत्त्वञ्जसा निगदितं भवता यथाहं"},{"b":39142,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.16"],"text":"संसाधयामि भगवन्‍ननुशाधि भृत्यम्॥ १६"},{"b":39143,"kind":"hindi_commentary","page":754,"verses":["11.7.17"],"text":"सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं"},{"b":39144,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.17"],"text":"वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे।"},{"b":39145,"kind":"hindi_commentary","page":754,"verses":["11.7.17"],"text":"सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे"},{"b":39146,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.17"],"text":"ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः॥ १७"},{"b":39147,"kind":"hindi_commentary","page":754,"verses":["11.7.18"],"text":"तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं"},{"b":39148,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.18"],"text":"सर्वज्ञमीश्‍वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम्।"},{"b":39149,"kind":"hindi_commentary","page":754,"verses":["11.7.18"],"text":"निर्विण्णधीरहमु ह वृजिनाभितप्तो"},{"b":39150,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.18"],"text":"नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये॥ १८"},{"b":39151,"kind":"hindi_commentary","page":753,"explains":["11.7.14","11.7.15","11.7.16","11.7.17","11.7.18"],"text":"उद्धवजीने कहा—भगवन्! आप ही समस्त योगियोंकी गुप्त पूँजी योगोंके कारण और योगेश्‍वर हैं। आप ही समस्त योगोंके आधार, उनके कारण और योगस्वरूप भी हैं। आपने मेरे परम-कल्याणके लिये उस संन्यासरूप त्यागका उपदेश किया है॥ १४॥ परन्तु अनन्त! जो लोग विषयोंके चिन्तन और सेवनमें घुल-मिल गये हैं, विषयात्मा हो गये हैं, उनके लिये विषय-भोगों और कामनाओंका त्याग अत्यन्त कठिन है। सर्वस्वरूप! उनमें भी जो लोग आपसे विमुख हैं, उनके लिये तो इस प्रकारका त्याग सर्वथा असम्भव ही है ऐसा मेरा निश्‍चय है॥ १५॥ प्रभो! मैं भी ऐसा ही हूँ; मेरी मति इतनी मूढ़ हो गयी है कि ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है’ इस भावसे मैं आपकी मायाके खेल, देह और देहके सम्बन्धी स्त्री, पुत्र, धन आदिमें डूब रहा हूँ। अतः भगवन्! आपने जिस संन्यासका उपदेश किया है, उसका तत्त्व मुझ सेवकको इस प्रकार समझाइये कि मैं सुगमतापूर्वक उसका साधन कर सकूँ॥ १६॥ मेरे प्रभो! आप भूत, भविष्य, वर्तमान इन तीनों कालोंसे अबाधित, एकरस सत्य हैं। आप दूसरेके द्वारा प्रकाशित नहीं, स्वयंप्रकाश आत्मस्वरूप हैं। प्रभो! मैं समझता हूँ कि मेरे लिये आत्मतत्त्वका उपदेश करनेवाला आपके अतिरिक्त देवताओंमें भी कोई नहीं है। ब्रह्मा आदि जितने बड़े-बड़े देवता हैं, वे सब शरीराभिमानी होनेके कारण आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं। उनकी बुद्धि मायाके वशमें हो गयी है। यही कारण है कि वे इन्द्रियोंसे अनुभव किये जानेवाले बाह्य विषयोंको सत्य मानते हैं। इसीलिये मुझे तो आप ही उपदेश कीजिये॥ १७॥ भगवन्! इसीसे चारों ओरसे दुःखोंकी दावाग्‍निसे जलकर और विरक्त होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप निर्दोष देश-कालसे अपरिच्छिन्‍न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और अविनाशी वैकुण्ठलोकके निवासी एवं नरके नित्य सखा नारायण हैं। (अतः आप ही मुझे उपदेश कीजिये)॥ १८॥"},{"b":39152,"kind":"topic_heading","page":754,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":39153,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.19"],"text":"प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणाः।"},{"b":39154,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.19"],"text":"समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात्॥ १९"},{"b":39155,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.20"],"text":"आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः।"},{"b":39156,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.20"],"text":"यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते॥ २०"},{"b":39157,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.21"],"text":"पुरुषत्वे च मां धीराः सांख्ययोगविशारदाः।"},{"b":39158,"kind":"sanskrit_shloka","page":754,"verses":["11.7.21"],"text":"आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम्॥ २१"},{"b":39159,"kind":"hindi_commentary","page":754,"explains":["11.7.19","11.7.20","11.7.21"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धव! संसारमें जो मनुष्य ‘यह जगत् क्या है? इसमें क्या हो रहा है?’ इत्यादि बातोंका विचार करनेमें निपुण हैं, वे चित्तमें भरी हुई अशुभ वासनाओंसे अपने-आपको स्वयं अपनी विवेक-शक्तिसे ही प्रायः बचा लेते हैं॥ १९॥ समस्त प्राणियोंका विशेषकर मनुष्यका आत्मा अपने हित और अहितका उपदेशक गुरु है। क्योंकि मनुष्य अपने प्रत्यक्ष अनुभव और अनुमानके द्वारा अपने हित-अहितका निर्णय करनेमें पूर्णतः समर्थ है॥ २०॥ सांख्य-योगविशारद धीर पुरुष इस मनुष्ययोनिमें इन्द्रियशक्ति, मनःशक्ति आदिके आश्रयभूत मुझ आत्मतत्त्वको पूर्णतः प्रकटरूपसे साक्षात्कार कर लेते हैं॥ २१॥"},{"b":39160,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.22"],"text":"एकद्वित्रिचतुष्पादो बहुपादस्तथापदः।"},{"b":39161,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.22"],"text":"बह्व्यः सन्ति पुरः सृष्टास्तासां मे पौरुषी प्रिया॥ २२"},{"b":39162,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.23"],"text":"अत्र मां मार्गयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरीश्‍वरम्।"},{"b":39163,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.23"],"text":"गृह्यमाणैर्गुणैर्लिङ्गैरग्राह्यमनुमानतः ॥ २३"},{"b":39164,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.24"],"text":"अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।"},{"b":39165,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.24"],"text":"अवधूतस्य संवादं यदोरमिततेजसः॥ २४"},{"b":39166,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.25"],"text":"अवधूतं द्विजं कंचिच्चरन्तमकुतोभयम्।"},{"b":39167,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.25"],"text":"कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित्॥ २५"},{"b":39168,"kind":"hindi_translation","page":755,"explains":["11.7.22","11.7.23","11.7.24","11.7.25"],"text":"मैंने एक पैरवाले, दो पैरवाले, तीन पैरवाले, चार पैरवाले, चारसे अधिक पैरवाले और बिना पैरके—इत्यादि अनेक प्रकारके शरीरोंका निर्माण किया है। उनमें मुझे सबसे अधिक प्रिय मनुष्यका ही शरीर है॥ २२॥ इस मनुष्य-शरीरमें एकाग्रचित्त तीक्ष्णबुद्धि पुरुष बुद्धि आदि ग्रहण किये जानेवाले हेतुओंसे जिनसे कि अनुमान भी होता है, अनुमानसे अग्राह्य अर्थात् अहंकार आदि विषयोंसे भिन्‍न मुझ सर्वप्रवर्त्तक ईश्‍वरको साक्षात् अनुभव करते हैं॥ २३॥ इस विषयमें महात्मा-लोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास परम तेजस्वी अवधूत दत्तात्रेय और राजा यदुके संवादके रूपमें है॥ २४॥ एक बार धर्मके मर्मज्ञ राजा यदुने देखा कि एक त्रिकालदर्शी तरुण अवधूत ब्राह्मण निर्भय विचर रहे हैं। तब उन्होंने उनसे यह प्रश्‍न किया॥ २५॥"},{"b":39169,"kind":"topic_heading","page":755,"text":"यदुरुवाच"},{"b":39170,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.26"],"text":"कुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्‍नकर्तुः सुविशारदा।"},{"b":39171,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.26"],"text":"यामासाद्य भवाँल्लोकं विद्वांश्‍चरति बालवत्॥ २६"},{"b":39172,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.27"],"text":"प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवाः।"},{"b":39173,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.27"],"text":"हेतुनैव समीहन्ते आयुषो यशसः श्रियः॥ २७"},{"b":39174,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.28"],"text":"त्वं तु कल्पः कविर्दक्षः सुभगोऽमृतभाषणः।"},{"b":39175,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.28"],"text":"न कर्ता नेहसे किंचिज्जडोन्मत्तपिशाचवत्॥ २८"},{"b":39176,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.29"],"text":"जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्‍निना।"},{"b":39177,"kind":"sanskrit_shloka","page":755,"verses":["11.7.29"],"text":"न तप्यसेऽग्‍निना मुक्तो गंगाम्भःस्थ इव द्विपः॥ २९"},{"b":39178,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.30"],"text":"त्वं हि नः पृच्छतां ब्रह्मन्‍नात्मन्यानन्दकारणम्।"},{"b":39179,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.30"],"text":"ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः॥ ३०"},{"b":39180,"kind":"hindi_translation","page":755,"explains":["11.7.26","11.7.27","11.7.28","11.7.29","11.7.30"],"text":"राजा यदुने पूछा—ब्रह्मन्! आप कर्म तो करते नहीं, फिर आपको यह अत्यन्त निपुण बुद्धि कहाँसे प्राप्त हुई? जिसका आश्रय लेकर आप परम विद्वान् होनेपर भी बालकके समान संसारमें विचरते रहते हैं॥ २६॥ ऐसा देखा जाता है कि मनुष्य आयु, यश अथवा सौन्दर्य-सम्पत्ति आदिकी अभिलाषा लेकर ही धर्म, अर्थ, काम अथवा तत्त्व-जिज्ञासामें प्रवृत्त होते हैं; अकारण कहीं किसीकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती॥ २७॥ मैं देख रहा हूँ कि आप कर्म करनेमें समर्थ, विद्वान् और निपुण हैं। आपका भाग्य और सौन्दर्य भी प्रशंसनीय है। आपकी वाणीसे तो मानो अमृत टपक रहा है। फिर भी आप जड, उन्मत्त अथवा पिशाचके समान रहते हैं; न तो कुछ करते हैं और न चाहते ही हैं॥ २८॥ संसारके अधिकांश लोग काम और लोभके दावानलसे जल रहे हैं। परन्तु आपको देखकर ऐसा मालूम होता है कि आप मुक्त हैं, आपतक उसकी आँच भी नहीं पहुँच पाती; ठीक वैसे ही जैसे कोई हाथी वनमें दावाग्‍नि लगनेपर उससे छूटकर गंगाजलमें खड़ा हो॥ २९॥ ब्रह्मन्! आप पुत्र, स्त्री, धन आदि संसारके स्पर्शसे भी रहित हैं। आप सदा-सर्वदा अपने केवल स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। हम आपसे यह पूछना चाहते हैं कि आपको अपने आत्मामें ही ऐसे अनिर्वचनीय आनन्दका अनुभव कैसे होता है? आप कृपा करके अवश्य बतलाइये॥ ३०॥"},{"b":39181,"kind":"topic_heading","page":756,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":39182,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.31"],"text":"यदुनैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।"},{"b":39183,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.31"],"text":"पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः॥ ३१"},{"b":39184,"kind":"hindi_commentary","page":756,"explains":["11.7.31"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धव! हमारे पूर्वज महाराज यदुकी बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदयमें ब्राह्मण-भक्ति थी। उन्होंने परमभाग्यवान् दत्तात्रेयजीका अत्यन्त सत्कार करके यह प्रश्‍न पूछा और बड़े विनम्रभावसे सिर झुकाकर वे उनके सामने खड़े हो गये। अब दत्तात्रेयजीने कहा॥ ३१॥"},{"b":39185,"kind":"topic_heading","page":756,"text":"ब्राह्मण उवाच"},{"b":39186,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.32"],"text":"सन्ति मे गुरवो राजन् बहवो बुद्ध्युपाश्रिताः।"},{"b":39187,"kind":"topic_heading","page":756,"verses":["11.7.32"],"text":"यतो बुद्धिमुपादाय मुक्तोऽटामीह ताञ्छृणु॥ ३२"},{"b":39188,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.33"],"text":"पृथिवी वायुराकाशमापोऽग्‍निश्‍चन्द्रमा रविः।"},{"b":39189,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.33"],"text":"कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतंगो मधुकृद् गजः॥ ३३"},{"b":39190,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.34"],"text":"मधुहा हरिणो मीनः पिंगला कुररोऽर्भकः।"},{"b":39191,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.34"],"text":"कुमारी शरकृत् सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत्॥ ३४"},{"b":39192,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.35"],"text":"एते मे गुरवो राजंश्‍चतुर्विंशतिराश्रिताः।"},{"b":39193,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.35"],"text":"शिक्षा वृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षमिहात्मनः॥ ३५"},{"b":39194,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.36"],"text":"यतो यदनुशिक्षामि यथा वा नाहुषात्मज।"},{"b":39195,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.36"],"text":"तत्तथा पुरुषव्याघ्र निबोध कथयामि ते॥ ३६"},{"b":39196,"kind":"hindi_commentary","page":756,"explains":["11.7.32","11.7.33","11.7.34","11.7.35","11.7.36"],"text":"ब्रह्मवेत्ता दत्तात्रेयजीने कहा—राजन्! मैंने अपनी बुद्धिसे बहुत-से गुरुओंका आश्रय लिया है, उनसे शिक्षा ग्रहण करके मैं इस जगत‍्में मुक्तभावसे स्वच्छन्द विचरता हूँ। तुम उन गुरुओंके नाम और उनसे ग्रहण की हुई शिक्षा सुनो॥ ३२॥ मेरे गुरुओंके नाम हैं—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्‍नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा या मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालनेवाला, हरिन, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुँआरी कन्या, बाण बनानेवाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट॥ ३३-३४॥ राजन्! मैंने इन चौबीस गुरुओंका आश्रय लिया है और इन्हींके आचरणसे इस लोकमें अपने लिये शिक्षा ग्रहण की है॥ ३५॥ वीरवर ययातिनन्दन! मैंने जिससे जिस प्रकार जो कुछ सीखा है, वह सब ज्यों-का-त्यों तुमसे कहता हूँ, सुनो॥ ३६॥"},{"b":39197,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.37"],"text":"भूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगैः।"},{"b":39198,"kind":"sanskrit_shloka","page":756,"verses":["11.7.37"],"text":"तद् विद्वान्‍न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेर्व्रतम्॥ ३७"},{"b":39199,"kind":"hindi_commentary","page":756,"explains":["11.7.37"],"text":"मैंने पृथ्वीसे उसके धैर्यकी, क्षमाकी शिक्षा ली है। लोग पृथ्वीपर कितना आघात और क्या-क्या उत्पात नहीं करते; परन्तु वह न तो किसीसे बदला लेती है और न रोती-चिल्लाती है। संसारके सभी प्राणी अपने-अपने प्रारब्धके अनुसार चेष्टा कर रहे हैं, वे समय-समयपर भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारसे जान या अनजानमें आक्रमण कर बैठते हैं। धीर पुरुषको चाहिये कि उनकी विवशता समझे, न तो अपना धीरज खोवे और न क्रोध करे। अपने मार्गपर ज्यों-का-त्यों चलता रहे॥ ३७॥"},{"b":39200,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.38"],"text":"शश्‍वत्परार्थसर्वेहः परार्थैकान्तसम्भवः।"},{"b":39201,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.38"],"text":"साधुः शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्यः परात्मताम्॥ ३८"},{"b":39202,"kind":"hindi_commentary","page":757,"explains":["11.7.38"],"text":"पृथ्वीके ही विकार पर्वत और वृक्षसे मैंने यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे उनकी सारी चेष्टाएँ सदा-सर्वदा दूसरोंके हितके लिये ही होती हैं, बल्कि यों कहना चाहिये कि उनका जन्म ही एकमात्र दूसरोंका हित करनेके लिये ही हुआ है, साधु पुरुषको चाहिये कि उनकी शिष्यता स्वीकार करके उनसे परोपकारकी शिक्षा ग्रहण करे॥ ३८॥"},{"b":39203,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.39"],"text":"प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः।"},{"b":39204,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.39"],"text":"ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः॥ ३९"},{"b":39205,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.40"],"text":"विषयेष्वाविशन् योगी नानाधर्मेषु सर्वतः।"},{"b":39206,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.40"],"text":"गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत्॥ ४०"},{"b":39207,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.41"],"text":"पार्थिवेष्विह देहेषु प्रविष्टस्तद्गुणाश्रयः।"},{"b":39208,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.41"],"text":"गुणैर्न युज्यते योगी गन्धैर्वायुरिवात्मदृक्॥ ४१"},{"b":44842,"kind":"hindi_commentary","page":757,"explains":["11.7.39","11.7.40","11.7.41"],"text":"मैंने शरीरके भीतर रहनेवाले वायु—प्राणवायुसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह आहारमात्रकी इच्छा रखता है और उसकी प्राप्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधकको भी चाहिये कि जितनेसे जीवन-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन कर ले। इन्द्रियोंको तृप्त करनेके लिये बहुत-से विषय न चाहे। संक्षेपमें उतने ही विषयोंका उपयोग करना चाहिये जिनसे बुद्धि विकृत न हो, मन चंचल न हो और वाणी व्यर्थकी बातोंमें न लग जाय॥ ३९॥ शरीरके बाहर रहनेवाले वायुसे मैंने यह सीखा है कि जैसे वायुको अनेक स्थानोंमें जाना पड़ता है, परन्तु वह कहीं भी आसक्त नहीं होता, किसीका भी गुण-दोष नहीं अपनाता, वैसे ही साधक पुरुष भी आवश्यकता होनेपर विभिन्न प्रकारके धर्म और स्वभाववाले विषयोंमें जाय, परन्तु अपने लक्ष्यपर स्थिर रहे। किसीके गुण या दोषकी ओर झुक न जाय, किसीसे आसक्ति या द्वेष न कर बैठे॥ ४०॥ गन्ध वायुका गुण नहीं, पृथ्वीका गुण है। परन्तु वायुको गन्धका वहन करना पड़ता है। ऐसा करनेपर भी वायु शुद्ध ही रहता है, गन्धसे उसका सम्पर्क नहीं होता। वैसे ही साधकका जबतक इस पार्थिव शरीरसे सम्बन्ध है, तबतक उसे इसकी व्याधि-पीड़ा और भूख-प्यास आदिका भी वहन करना पड़ता है। परन्तु अपनेको शरीर नहीं, आत्माके रूपमें देखनेवाला साधक शरीर और उसके गुणोंका आश्रय होनेपर भी उनसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है॥ ४१॥"},{"b":39209,"kind":"hindi_commentary","page":757,"verses":["11.7.42"],"text":"अन्तर्हितश्‍च स्थिरजंगमेषु"},{"b":39210,"kind":"sanskrit_shloka","page":757,"verses":["11.7.42"],"text":"ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन।"},{"b":39211,"kind":"hindi_commentary","page":758,"verses":["11.7.42"],"text":"व्याप्त्याव्यवच्छेदमसंगमात्मनो"},{"b":39212,"kind":"sanskrit_shloka","page":758,"verses":["11.7.42"],"text":"मुनिर्नभस्त्वं विततस्य भावयेत्॥ ४२"},{"b":39213,"kind":"sanskrit_shloka","page":758,"verses":["11.7.43"],"text":"तेजोऽबन्‍नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः ।"},{"b":39214,"kind":"sanskrit_shloka","page":758,"verses":["11.7.43"],"text":"न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान्॥ ४३"},{"b":39215,"kind":"hindi_commentary","page":757,"explains":["11.7.42","11.7.43"],"text":"राजन्! जितने भी घट-मठ आदि पदार्थ हैं, वे चाहे चल हों या अचल, उनके कारण भिन्‍न-भिन्‍न प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें आकाश एक और अपरिच्छिन्‍न (अखण्ड) ही है। वैसे ही चर-अचर जितने भी सूक्ष्म-स्थूल शरीर हैं, उनमें आत्मारूपसे सर्वत्र स्थित होनेके कारण ब्रह्म सभीमें है। साधकको चाहिये कि सूतके मनियोंमें व्याप्त सूतके समान आत्माको अखण्ड और असंगरूपसे देखे। वह इतना विस्तृत है कि उसकी तुलना कुछ-कुछ आकाशसे ही की जा सकती है। इसलिये साधकको आत्माकी आकाशरूपताकी भावना करनी चाहिये॥ ४२॥ आग लगती है, पानी बरसता है, अन्‍न आदि पैदा होते और नष्ट होते हैं, वायुकी प्रेरणासे बादल आदि आते और चले जाते हैं; यह सब होनेपर भी आकाश अछूता रहता है। आकाशकी दृष्टिसे यह सब कुछ है ही नहीं। इसी प्रकार भूत, वर्तमान और भविष्यके चक्करमें न जाने किन-किन नामरूपोंकी सृष्टि और प्रलय होते हैं; परन्तु आत्माके साथ उनका कोई संस्पर्श नहीं है॥ ४३॥"},{"b":39216,"kind":"sanskrit_shloka","page":758,"verses":["11.7.44"],"text":"स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूर्नृणाम्।"},{"b":39217,"kind":"sanskrit_shloka","page":758,"verses":["11.7.44"],"text":"मुनिः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनैः॥ ४४"},{"b":39218,"kind":"hindi_commentary","page":758,"explains":["11.7.44"],"text":"जिस प्रकार जल स्वभावसे ही स्वच्छ, चिकना, मधुर और पवित्र करनेवाला होता है तथा गंगा आदि तीर्थोंके दर्शन, स्पर्श और नामोच्चारणसे भी लोग पवित्र हो जाते हैं—वैसे ही साधकको भी स्वभावसे ही शुद्ध, स्निग्ध, मधुरभाषी और लोकपावन होना चाहिये। जलसे शिक्षा ग्रहण करनेवाला अपने दर्शन, स्पर्श और नामोच्चारणसे लोगोंको पवित्र कर देता है॥ ४४॥"},{"b":39219,"kind":"sanskrit_shloka","page":758,"verses":["11.7.45"],"text":"तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षोदरभाजनः।"},{"b":39220,"kind":"sanskrit_shloka","page":758,"verses":["11.7.45"],"text":"सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्‍निवत्॥ ४५"},{"b":39221,"kind":"hindi_commentary","page":758,"explains":["11.7.45"],"text":"राजन्! मैंने अग्‍निसे यह शिक्षा ली है कि जैसे वह तेजस्वी और ज्योतिर्मय होती है, जैसे उसे कोई अपने तेजसे दबा नहीं सकता, जैसे उसके पास संग्रह-परिग्रहके लिये कोई पात्र नहीं—सब कुछ अपने पेटमें रख लेती है, और जैसे सब कुछ खा-पी लेनेपर भी विभिन्‍न वस्तुओंके दोषोंसे वह लिप्त नहीं होती वैसे ही साधक भी परम तेजस्वी, तपस्यासे देदीप्यमान, इन्द्रियोंसे अपराभूत, भोजनमात्रका संग्रही और यथायोग्य सभी विषयोंका उपभोग करता हुआ भी अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे, किसीका दोष अपनेमें न आने दे॥ ४५॥"},{"b":39222,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.46"],"text":"क्वचिच्छन्‍नः क्‍वचित् स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम्।"},{"b":39223,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.46"],"text":"भुङ्क्ते सर्वत्र दातॄणां दहन् प्रागुत्तराशुभम्॥ ४६"},{"b":39224,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.47"],"text":"स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः।"},{"b":39225,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.47"],"text":"प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्‍निरिवैधसि॥ ४७"},{"b":39226,"kind":"hindi_commentary","page":759,"explains":["11.7.46","11.7.47"],"text":"जैसे अग्‍नि कहीं (लकड़ी आदिमें) अप्रकट रहती है और कहीं प्रकट, वैसे ही साधक भी कहीं गुप्त रहे और कहीं प्रकट हो जाय। वह कहीं-कहीं ऐसे रूपमें भी प्रकट हो जाता है, जिससे कल्याणकामी पुरुष उसकी उपासना कर सकें। वह अग्‍निके समान ही भिक्षारूप हवन करनेवालोंके अतीत और भावी अशुभको भस्म कर देता है तथा सर्वत्र अन्‍न ग्रहण करता है॥ ४६॥ साधक पुरुषको इसका विचार करना चाहिये कि जैसे अग्‍नि लम्बी-चौड़ी, टेढ़ी-सीधी लकड़ियोंमें रहकर उनके समान ही सीधी-टेढ़ी या लम्बी-चौड़ी दिखायी पड़ती है—वास्तवमें वह वैसी है नहीं; वैसे ही सर्वव्यापक आत्मा भी अपनी मायासे रचे हुए कार्य-कारणरूप जगत‍्में व्याप्त होनेके कारण उन-उन वस्तुओंके नाम-रूपसे कोई सम्बन्ध न होनेपर भी उनके रूपमें प्रतीत होने लगता है॥ ४७॥"},{"b":39227,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.48"],"text":"विसर्गाद्याः श्मशानान्ता भावा देहस्य नात्मनः।"},{"b":39228,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.48"],"text":"कलानामिव चन्द्रस्य कालेनाव्यक्तवर्त्मना॥ ४८"},{"b":39229,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.49"],"text":"कालेन ह्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ।"},{"b":39230,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.49"],"text":"नित्यावपि न दृश्येते आत्मनोऽ‌ग्‍नेर्यथार्चिषाम्॥ ४९"},{"b":39231,"kind":"hindi_commentary","page":759,"explains":["11.7.48","11.7.49"],"text":"मैंने चन्द्रमासे यह शिक्षा ग्रहण की है कि यद्यपि जिसकी गति नहीं जानी जा सकती, उस कालके प्रभावसे चन्द्रमाकी कलाएँ घटती-बढ़ती रहती हैं, तथापि चन्द्रमा तो चन्द्रमा ही है, वह न घटता है और न बढ़ता ही है; वैसे ही जन्मसे लेकर मृत्यु पर्यन्त जितनी भी अवस्थाएँ हैं, सब शरीरकी हैं, आत्मासे उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं है॥ ४८॥ जैसे आगकी लपट अथवा दीपककी लौ क्षण-क्षणमें उत्पन्‍न और नष्ट होती रहती है—उनका यह क्रम निरन्तर चलता रहता है, परन्तु दीख नहीं पड़ता—वैसे ही जलप्रवाहके समान वेगवान् कालके द्वारा क्षण-क्षणमें प्राणियोंके शरीरकी उत्पत्ति और विनाश होता रहता है, परन्तु अज्ञानवश वह दिखायी नहीं पड़ता॥ ४९॥"},{"b":39232,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.50"],"text":"गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति।"},{"b":39233,"kind":"sanskrit_shloka","page":759,"verses":["11.7.50"],"text":"न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः॥ ५०"},{"b":39234,"kind":"hindi_commentary","page":759,"explains":["11.7.50"],"text":"राजन्! मैंने सूर्यसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वे अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल खींचते और समयपर उसे बरसा देते हैं, वैसे ही योगी पुरुष इन्द्रियोंके द्वारा समयपर विषयोंका ग्रहण करता है और समय आनेपर उनका त्याग—उनका दान भी कर देता है। किसी भी समय उसे इन्द्रियके किसी भी विषयमें आसक्ति नहीं होती॥ ५०॥"},{"b":39235,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.51"],"text":"बुध्यते स्वे न भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गतः।"},{"b":39236,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.51"],"text":"लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत्॥ ५१"},{"b":39237,"kind":"hindi_translation","page":760,"explains":["11.7.51"],"text":"स्थूलबुद्धि पुरुषोंको जलके विभिन्‍न पात्रोंमें प्रतिबिम्बित हुआ सूर्य उन्हींमें प्रविष्ट-सा होकर भिन्‍न-भिन्‍न दिखायी पड़ता है। परन्तु इससे स्वरूपतः सूर्य अनेक नहीं हो जाता; वैसे ही चल-अचल उपाधियोंके भेदसे ऐसा जान पड़ता है कि प्रत्येक व्यक्तिमें आत्मा अलग-अलग है। परन्तु जिनको ऐसा मालूम होता है, उनकी बुद्धि मोटी है। असल बात तो यह है कि आत्मा सूर्यके समान एक ही है। स्वरूपतः उसमें कोई भेद नहीं है॥ ५१॥"},{"b":39238,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.52"],"text":"नातिस्नेहः प्रसंगो वा कर्तव्यः क्वापि केनचित्।"},{"b":39239,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.52"],"text":"कुर्वन् विन्देत सन्तापं कपोत इव दीनधीः॥ ५२"},{"b":39240,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.53"],"text":"कपोतः कश्‍चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ।"},{"b":39241,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.53"],"text":"कपोत्या भार्यया सार्धमुवास कतिचित् समाः॥ ५३"},{"b":39242,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.54"],"text":"कपोतौ स्नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ।"},{"b":39243,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.54"],"text":"दृष्टिं दृष्ट्यांगमंगेन बुद्धिं बुद्ध्या बबन्धतुः॥ ५४"},{"b":39244,"kind":"hindi_translation","page":760,"explains":["11.7.52","11.7.53","11.7.54"],"text":"राजन्! कहीं किसीके साथ अत्यन्त स्नेह अथवा आसक्ति न करनी चाहिये, अन्यथा उसकी बुद्धि अपना स्वातन्त्र्य खोकर दीन हो जायगी और उसे कबूतरकी तरह अत्यन्त क्लेश उठाना पड़ेगा॥ ५२॥ राजन्! किसी जंगलमें एक कबूतर रहता था, उसने एक पेड़पर अपना घोंसला बना रखा था। अपनी मादा कबूतरीके साथ वह कई वर्षोंतक उसी घोंसलेमें रहा॥ ५३॥ उस कबूतरके जोड़ेके हृदयमें निरन्तर एक-दूसरेके प्रति स्नेहकी वृद्धि होती जाती थी। वे गृहस्थधर्ममें इतने आसक्त हो गये थे कि उन्होंने एक-दूसरेकी दृष्टि-से-दृष्टि, अंग-से-अंग और बुद्धिसे-बुद्धिको बाँध रखा था॥ ५४॥"},{"b":39245,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.55"],"text":"शय्यासनाटनस्थानवार्ताक्रीडाशनादिकम्।"},{"b":39246,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.55"],"text":"मिथुनीभूय विस्रब्धौ चेरतुर्वनराजिषु॥ ५५"},{"b":39247,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.56"],"text":"यं यं वाञ्छति सा राजंस्तर्पयन्त्यनुकम्पिता।"},{"b":39248,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.56"],"text":"तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः॥ ५६"},{"b":39249,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.57"],"text":"कपोती प्रथमं गर्भं गृह्णती काल आगते।"},{"b":39250,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.57"],"text":"अण्डानि सुषुवे नीडे स्वपत्युः सन्‍निधौ सती॥ ५७"},{"b":39251,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.58"],"text":"तेषु काले व्यजायन्त रचितावयवा हरेः।"},{"b":39252,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.58"],"text":"शक्तिभिर्दुर्विभाव्याभिः कोमलांगतनूरुहाः॥ ५८"},{"b":39253,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.59"],"text":"प्रजाः पुपुषतुः प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ।"},{"b":39254,"kind":"sanskrit_shloka","page":760,"verses":["11.7.59"],"text":"शृण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृतौ कलभाषितैः॥ ५९"},{"b":39255,"kind":"hindi_translation","page":760,"explains":["11.7.55","11.7.56","11.7.57","11.7.58","11.7.59"],"text":"उनका एक-दूसरेपर इतना विश्‍वास हो गया था कि वे निःशंक होकर वहाँकी वृक्षावलीमें एक साथ सोते, बैठते, घूमते-फिरते, ठहरते, बातचीत करते, खेलते और खाते-पीते थे॥ ५५॥ राजन्! कबूतरीपर कबूतरका इतना प्रेम था कि वह जो कुछ चाहती, कबूतर बड़े-से-बड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना पूर्ण करता; वह कबूतरी भी अपने कामुक पतिकी कामनाएँ पूर्ण करती॥ ५६॥ समय आनेपर कबूतरीको पहला गर्भ रहा। उसने अपने पतिके पास ही घोंसलेमें अंडे दिये॥ ५७॥ भगवान्‌की अचिन्त्य शक्तिसे समय आनेपर वे अंडे फूट गये और उनमेंसे हाथ-पैरवाले बच्चे निकल आये। उनका एक-एक अंग और रोएँ अत्यन्त कोमल थे॥ ५८॥ अब उन कबूतर-कबूतरीकी आँखें अपने बच्चोंपर लग गयीं, वे बड़े प्रेम और आनन्दसे अपने बच्चोंका लालन-पालन, लाड़-प्यार करते और उनकी मीठी बोली, उनकी गुटर-गूँ सुन-सुनकर आनन्दम‌ग्‍न हो जाते॥ ५९॥"},{"b":39256,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.60"],"text":"तासां पतत्त्रैः सुस्पर्शैः कूजितैर्मुग्धचेष्टितैः।"},{"b":39257,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.60"],"text":"प्रत्युद्गमैरदीनानां पितरौ मुदमापतुः॥ ६०"},{"b":39258,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.61"],"text":"स्नेहानुबद्धहृदयावन्योन्यं विष्णुमायया।"},{"b":39259,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.61"],"text":"विमोहितौ दीनधियौ शिशून् पुपुषतुः प्रजाः॥ ६१"},{"b":39260,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.62"],"text":"एकदा जग्मतुस्तासामन्‍नार्थं तौ कुटुम्बिनौ।"},{"b":39261,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.62"],"text":"परितः कानने तस्मिन्‍नर्थिनौ चेरतुश्‍चिरम्॥ ६२"},{"b":39262,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.63"],"text":"दृष्ट्वा ताँल्लुब्धकः कश्‍चिद् यदृच्छातो वनेचरः।"},{"b":39263,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.63"],"text":"जगृहे जालमातत्य चरतः स्वालयान्तिके॥ ६३"},{"b":39264,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.64"],"text":"कपोतश्‍च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकौ।"},{"b":39265,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.64"],"text":"गतौ पोषणमादाय स्वनीडमुपजग्मतुः॥ ६४"},{"b":39266,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.65"],"text":"कपोती स्वात्मजान् वीक्ष्य बालकान् जालसंवृतान्।"},{"b":39267,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.65"],"text":"तानभ्यधावत् क्रोशन्ती क्रोशतो भृशदुःखिता॥ ६५"},{"b":39268,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"explains":["11.7.60","11.7.61","11.7.62","11.7.63","11.7.64","11.7.65"],"text":"बच्चे तो सदा-सर्वदा प्रसन्‍न रहते ही हैं; वे जब अपने सुकुमार पंखोंसे माँ-बापका स्पर्श करते, कूजते, भोली-भाली चेष्टाएँ करते और फुदक-फुदककर अपने माँ-बापके पास दौड़ आते तब कबूतर-कबूतरी आनन्दम‌ग्‍न हो जाते॥ ६०॥ राजन्! सच पूछो तो वे कबूतर-कबूतरी भगवान्‌की मायासे मोहित हो रहे थे। उनका हृदय एक-दूसरेके स्नेहबन्धनसे बँध रहा था। वे अपने नन्हें-नन्हें बच्चोंके पालन-पोषणमें इतने व्यग्र रहते कि उन्हें दीन-दुनिया, लोक-परलोककी याद ही न आती॥ ६१॥ एक दिन दोनों नर-मादा अपने बच्चोंके लिये चारा लाने जंगलमें गये हुए थे। क्योंकि अब उनका कुटुम्ब बहुत बढ़ गया था। वे चारेके लिये चिरकालतक जंगलमें चारों ओर विचरते रहे॥ ६२॥ इधर एक बहेलिया घूमता-घूमता संयोगवश उनके घोंसलेकी ओर आ निकला। उसने देखा कि घोंसलेके आस-पास कबूतरके बच्चे फुदक रहे हैं; उसने जाल फैलाकर उन्हें पकड़ लिया॥ ६३॥ कबूतर-कबूतरी बच्चोंको खिलाने-पिलानेके लिये हर समय उत्सुक रहा करते थे। अब वे चारा लेकर अपने घोंसलेके पास आये॥ ६४॥ कबूतरीने देखा कि उसके नन्हें-नन्हें बच्चे, उसके हृदयके टुकड़े जालमें फँसे हुए हैं और दुःखसे चें-चें कर रहे हैं। उन्हें ऐसी स्थितिमें देखकर कबूतरीके दुःखकी सीमा न रही। वह रोती-चिल्लाती उनके पास दौड़ गयी॥ ६५॥"},{"b":39269,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.66"],"text":"सासकृत्स्नेहगुणिता दीनचित्ताजमायया।"},{"b":39270,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.66"],"text":"स्वयं चाबध्यत शिचा बद्धान् पश्यन्त्यपस्मृतिः॥ ६६"},{"b":39271,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.67"],"text":"कपोतश्‍चात्मजान् बद्धानात्मनोऽप्यधिकान् प्रियान्।"},{"b":39272,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"verses":["11.7.67"],"text":"भार्यां चात्मसमां दीनो विललापातिदुःखितः॥ ६७"},{"b":39273,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.68"],"text":"अहो मे पश्यतापायमल्पपुण्यस्य दुर्मतेः।"},{"b":39274,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.68"],"text":"अतृप्तस्याकृतार्थस्य गृहस्त्रैवर्गिको हतः॥ ६८"},{"b":39275,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.69"],"text":"अनुरूपानुकूला च यस्य मे पतिदेवता।"},{"b":39276,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.69"],"text":"शून्ये गृहे मां सन्त्यज्य पुत्रैः स्वर्याति साधुभिः॥ ६९"},{"b":39277,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.70"],"text":"सोऽहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रजः।"},{"b":39278,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.70"],"text":"जिजीविषे किमर्थं वा विधुरो दुःखजीवितः॥ ७०"},{"b":39279,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.71"],"text":"तांस्तथैवावृताञ्छिग्भिर्मृत्युग्रस्तान् विचेष्टतः।"},{"b":39280,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.71"],"text":"स्वयं च कृपणः शिक्षु पश्यन्‍नप्यबुधोऽपतत्॥ ७१"},{"b":39281,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.72"],"text":"तं लब्ध्वा लुब्धकः क्रूरः कपोतं गृहमेधिनम्।"},{"b":39282,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.72"],"text":"कपोतकान् कपोतीं च सिद्धार्थः प्रययौ गृहम्॥ ७२"},{"b":39283,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.73"],"text":"एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वारामः पतत्त्रिवत्।"},{"b":39284,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.73"],"text":"पुष्णन् कुटुम्बं कृपणः सानुबन्धोऽवसीदति॥ ७३"},{"b":39285,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.74"],"text":"यः प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिद्वारमपावृतम्।"},{"b":39286,"kind":"sanskrit_shloka","page":762,"verses":["11.7.74"],"text":"गृहेषु खगवत् सक्तस्तमारूढच्युतं विदुः॥ ७४"},{"b":39287,"kind":"sanskrit_shloka","page":761,"explains":["11.7.66","11.7.67","11.7.68","11.7.69","11.7.70","11.7.71","11.7.72","11.7.73","11.7.74"],"text":"भगवान्‌की मायासे उसका चित्त अत्यन्त दीन-दुःखी हो रहा था। वह उमड़ते हुए स्नेहकी रस्सीसे जकड़ी हुई थी; अपने बच्चोंको जालमें फँसा देखकर उसे अपने शरीरकी भी सुध-बुध न रही। और वह स्वयं ही जाकर जालमें फँस गयी॥ ६६॥ जब कबूतरने देखा कि मेरे प्राणोंसे भी प्यारे बच्चे जालमें फँस गये और मेरी प्राणप्रिया पत्‍नी भी उसी दशामें पहुँच गयी, तब वह अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगा। सचमुच उस समय उसकी दशा अत्यन्त दयनीय थी॥ ६७॥‘मैं अभागा हूँ, दुर्मति हूँ। हाय, हाय! मेरा तो सत्यानाश हो गया। देखो, देखो, न मुझे अभी तृप्ति हुई और न मेरी आशाएँ ही पूरी हुईं। तबतक मेरा धर्म, अर्थ और कामका मूल यह गृहस्थाश्रम ही नष्ट हो गया॥ ६८॥ हाय! मेरी प्राणप्यारी मुझे ही अपना इष्टदेव समझती थी; मेरी एक-एक बात मानती थी, मेरे इशारेपर नाचती थी, सब तरहसे मेरे योग्य थी। आज वह मुझे सूने घरमें छोड़कर हमारे सीधे-सादे निश्छल बच्चोंके साथ स्वर्ग सिधार रही है॥ ६९॥ मेरे बच्चे मर गये। मेरी पत्‍नी जाती रही। मेरा अब संसारमें क्या काम है? मुझ दीनका यह विधुर जीवन—बिना गृहिणीका जीवन जलनका—व्यथाका जीवन है। अब मैं इस सूने घरमें किसके लिये जीऊँ?॥ ७०॥ राजन्! कबूतरके बच्चे जालमें फँसकर तड़फड़ा रहे थे, स्पष्ट दीख रहा था कि वे मौतके पंजेमें हैं, परन्तु वह मूर्ख कबूतर यह सब देखते हुए भी इतना दीन हो रहा था कि स्वयं जान-बूझकर जालमें कूद पड़ा॥ ७१॥ राजन्! वह बहेलिया बड़ा क्रूर था। गृहस्थाश्रमी कबूतर-कबूतरी और उनके बच्चोंके मिल जानेसे उसे बड़ी प्रसन्‍नता हुई; उसने समझा मेरा काम बन गया और वह उन्हें लेकर चलता बना॥ ७२॥ जो कुटुम्बी है, विषयों और लोगोंके संग-साथमें ही जिसे सुख मिलता है एवं अपने कुटुम्बके भरण-पोषणमें ही जो सारी सुध-बुध खो बैठा है, उसे कभी शान्ति नहीं मिल सकती। वह उसी कबूतरके समान अपने कुटुम्बके साथ कष्ट पाता है॥ ७३॥ यह मनुष्य-शरीर मुक्तिका खुला हुआ द्वार है। इसे पाकर भी जो कबूतरकी तरह अपनी घर-गृहस्थीमें ही फँसा हुआ है, वह बहुत ऊँचेतक चढ़कर गिर रहा है। शास्त्रकी भाषामें वह ‘आरूढ़च्युत’ है॥ ७४॥"},{"b":39288,"kind":"hindi_translation","page":762,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥"}],"notes":[{"id":"v2:379","mark":"*","page":752,"after_verse":"11.7.12","text":"विहित कर्म।"},{"id":"v2:380","mark":"†","page":752,"after_verse":"11.7.12","text":"विहित कर्मका लोप।"},{"id":"v2:381","mark":"‡","page":752,"after_verse":"11.7.12","text":"निषिद्ध कर्म।"},{"id":"v2:382","mark":"*","page":755,"after_verse":"11.7.25","text":"अनुसन्धानके दो प्रकार हैं—(१) एक स्वप्रकाश तत्त्वके बिना बुद्धि आदि जड पदार्थोंका प्रकाश नहीं हो सकता। इस प्रकार अर्थापत्तिके द्वारा और (२) जैसे बसूला आदि औजार किसी कर्ताके द्वारा प्रयुक्त होते हैं। इसी प्रकार यह बुद्धि आदि औजार किसी कर्ताके द्वारा ही प्रयुक्त हो रहे हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि आत्मा आनुमानिक है। यह तो देहादिसे विलक्षण त्वम् पदार्थके शोधनकी युक्तिमात्र है।"}],"corrections":{"count":7,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}