{"id":"11.4","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 4","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथ चतुर्थोऽध्यायः","topics":["भगवान्‌के अवतारोंका वर्णन"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.4.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[732,736]},"verses":[{"id":"11.4.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/1/","page":732,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["यानि यानीह कर्माणि यैर्यैः स्वच्छन्दजन्मभिः।","चक्रे करोति कर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तु नः॥ १"],"iast":["yāni yānīha karmāṇi yairyaiḥ svacchandajanmabhiḥ|","cakre karoti kartā vā haristāni bruvantu naḥ|| 1"],"meaning":"राजा निमिने पूछा—योगीश्‍वरो! भगवान् स्वतन्त्रतासे अपने भक्तोंकी भक्तिके वश होकर अनेकों प्रकारके अवतार ग्रहण करते हैं और अनेकों लीलाएँ करते हैं। आपलोग कृपा करके भगवान्‌की उन लीलाओंका वर्णन कीजिये, जो वे अबतक कर चुके हैं, कर रहे हैं या करेंगे॥ १॥"},{"id":"11.4.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/2/","page":732,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ता-","ननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धिः।","रजांसि भूमेर्गणयेत् कथंचित्","कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्‍नः॥ २"],"iast":["yo vā anantasya guṇānanantā-","nanukramiṣyan sa tu bālabuddhiḥ|","rajāṃsi bhūmergaṇayet kathaṃcit","kālena naivākhilaśaktidhāmnaḥ|| 2"],"meaning":"अब सातवें योगीश्‍वर द्रुमिलजीने कहा—राजन्! भगवान् अनन्त हैं। उनके गुण भी अनन्त हैं। जो यह सोचता है कि मैं उनके गुणोंको गिन लूँगा, वह मूर्ख है, बालक है। यह तो सम्भव है कि कोई किसी प्रकार पृथ्वीके धूलि-कणोंको गिन ले, परन्तु समस्त शक्तियोंके आश्रय भगवान्‌के अनन्त गुणोंका कोई कभी किसी प्रकार पार नहीं पा सकता॥ २॥"},{"id":"11.4.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/3/","page":732,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["भूतैर्यदा पंचभिरात्मसृष्टैः","पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन्।","स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधान-","मवाप नारायण आदिदेवः॥ ३"],"iast":["bhūtairyadā paṃcabhirātmasṛṣṭaiḥ","puraṃ virājaṃ viracayya tasmin|","svāṃśena viṣṭaḥ puruṣābhidhāna-","mavāpa nārāyaṇa ādidevaḥ|| 3"],"meaning":"भगवान्‌ने ही पृथ्वी, जल, अग्‍नि, वायु, आकाश—इन पाँच भूतोंकी अपने-आपसे अपने-आपमें सृष्टि की है। जब वे इनके द्वारा विराट् शरीर, ब्रह्माण्डका निर्माण करके उसमें लीलासे अपने अंश अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश करते हैं, (भोक्तारूपसे नहीं, क्योंकि भोक्ता तो अपने पुण्योंके फलस्वरूप जीव ही होता है) तब उन आदिदेव नारायणको ‘पुरुष’ नामसे कहते हैं, यही उनका पहला अवतार है॥ ३॥"},{"id":"11.4.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/4/","page":732,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["यत्काय एष भुवनत्रयसन्‍निवेशो","यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि।","ज्ञानं स्वतः श्‍वसनतो बलमोज ईहा","सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता॥ ४"],"iast":["yatkāya eṣa bhuvanatrayasanniveśo","yasyendriyaistanubhṛtāmubhayendriyāṇi|","jñānaṃ svataḥ śvasanato balamoja īhā","sattvādibhiḥ sthitilayodbhava ādikartā|| 4"],"meaning":"उन्हींके इस विराट् ब्रह्माण्ड शरीरमें तीनों लोक स्थित हैं। उन्हींकी इन्द्रियोंसे समस्त देहधारियोंकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ बनी हैं। उनके स्वरूपसे ही स्वतःसिद्ध ज्ञानका संचार होता है। उनके श्‍वास-प्रश्‍वाससे सब शरीरोंमें बल आता है तथा इन्द्रियोंमें ओज (इन्द्रियोंकी शक्ति) और कर्म करनेकी शक्ति प्राप्त होती है। उन्हींके सत्त्व आदि गुणोंसे संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय होते हैं। इस विराट् शरीरके जो शरीरी हैं, वे ही आदिकर्ता नारायण हैं॥ ४॥"},{"id":"11.4.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/5/","page":732,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["आदावभूच्छतधृती रजसास्य सर्गे","विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः।","रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य","इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु॥ ५"],"iast":["ādāvabhūcchatadhṛtī rajasāsya sarge","viṣṇuḥ sthitau kratupatirdvijadharmasetuḥ|","rudro'pyayāya tamasā puruṣaḥ sa ādya","ityudbhavasthitilayāḥ satataṃ prajāsu|| 5"],"meaning":"पहले-पहल जगत‍्की उत्पत्तिके लिये उनके रजोगुणके अंशसे ब्रह्मा हुए, फिर वे आदिपुरुष ही संसारकी स्थितिके लिये अपने सत्त्वांशसे धर्म तथा ब्राह्मणोंके रक्षक यज्ञपति विष्णु बन गये। फिर वे ही तमोगुणके अंशसे जगत‍्के संहारके लिये रुद्र बने। इस प्रकार निरन्तर उन्हींसे परिवर्तनशील प्रजाकी उत्पत्ति-स्थिति और संहार होते रहते हैं॥ ५॥"},{"id":"11.4.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/6/","page":733,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां","नारायणो नर ऋषिप्रवरः प्रशान्तः।","नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार कर्म","योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्‌घ्रिः॥ ६"],"iast":["dharmasya dakṣaduhitaryajaniṣṭa mūrtyāṃ","nārāyaṇo nara ṛṣipravaraḥ praśāntaḥ|","naiṣkarmyalakṣaṇamuvāca cacāra karma","yo'dyāpi cāsta ṛṣivaryaniṣevitāṅghriḥ|| 6"],"meaning":"दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम था मूर्ति। वह धर्मकी पत्‍नी थी। उसके गर्भसे भगवान्‌ने ऋषिश्रेष्ठ शान्तात्मा ‘नर’ और ‘नारायण’ के रूपमें अवतार लिया । उन्होंने आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले उस भगवदाराधनरूप कर्मका उपदेश किया, जो वास्तवमें कर्मबन्धनसे छुड़ानेवाला और नैष्कर्म्य स्थितिको प्राप्त करानेवाला है। उन्होंने स्वयं भी वैसे ही कर्मका अनुष्ठान किया। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं। वे आज भी बदरिकाश्रममें उसी कर्मका आचरण करते हुए विराजमान हैं॥ ६॥"},{"id":"11.4.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/7/","page":733,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["इन्द्रो विशङ्‌क्य मम धाम जिघृक्षतीति","कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम्।","गत्वाप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः","स्त्रीप्रेक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः॥ ७"],"iast":["indro viśaṅkya mama dhāma jighṛkṣatīti","kāmaṃ nyayuṅkta sagaṇaṃ sa badaryupākhyam|","gatvāpsarogaṇavasantasumandavātaiḥ","strīprekṣaṇeṣubhiravidhyadatanmahijñaḥ|| 7"],"meaning":"ये अपनी घोर तपस्याके द्वारा मेरा धाम छीनना चाहते हैं—इन्द्रने ऐसी आशंका करके स्त्री, वसन्त आदि दल-बलके साथ कामदेवको उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये भेजा। कामदेवको भगवान्‌की महिमाका ज्ञान न था; इसलिये वह अप्सरागण, वसन्त तथा मन्द-सुगन्ध वायुके साथ बदरिकाश्रममें जाकर स्त्रियोंके कटाक्ष बाणोंसे उन्हें घायल करनेकी चेष्टा करने लगा॥ ७॥"},{"id":"11.4.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/8/","page":733,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["विज्ञाय शक्रकृतमक्रममादिदेवः","प्राह प्रहस्य गतविस्मय एजमानान्।","मा भैष्ट भो मदन मारुत देववध्वो","गृह्णीत नो बलिमशून्यमिमं कुरुध्वम्॥ ८"],"iast":["vijñāya śakrakṛtamakramamādidevaḥ","prāha prahasya gatavismaya ejamānān|","mā bhaiṣṭa bho madana māruta devavadhvo","gṛhṇīta no balimaśūnyamimaṃ kurudhvam|| 8"],"meaning":"आदिदेव नर-नारायणने यह जानकर कि यह इन्द्रका कुचक्र है, भयसे काँपते हुए काम आदिकोंसे हँसकर कहा—उस समय उनके मनमें किसी प्रकारका अभिमान या आश्‍चर्य नहीं था। ‘कामदेव, मलय-मारुत और देवांगनाओ! तुमलोग डरो मत; हमारा आतिथ्य स्वीकार करो। अभी यहीं ठहरो, हमारा आश्रम सूना मत करो’॥ ८॥"},{"id":"11.4.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/9/","page":733,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवाः","सव्रीडनम्रशिरसः सघृणं तमूचुः।","नैतद् विभो त्वयि परेऽविकृते विचित्रं","स्वारामधीरनिकरानतपादपद्मे ॥ ९"],"iast":["itthaṃ bruvatyabhayade naradeva devāḥ","savrīḍanamraśirasaḥ saghṛṇaṃ tamūcuḥ|","naitad vibho tvayi pare'vikṛte vicitraṃ","svārāmadhīranikarānatapādapadme || 9"],"meaning":"राजन्! जब नर-नारायण ऋषिने उन्हें अभयदान देते हुए इस प्रकार कहा, तब कामदेव आदिके सिर लज्जासे झुक गये। उन्होंने दयालु भगवान् नर-नारायणसे कहा—‘प्रभो! आपके लिये यह कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि आप मायासे परे और निर्विकार हैं। बड़े-बड़े आत्माराम और धीर पुरुष निरन्तर आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करते रहते हैं॥ ९॥"},{"id":"11.4.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/10/","page":734,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः","स्वौको विलङ्‌घ्य परमं व्रजतां पदं ते।","नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददतः स्वभागान्","धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि॥ १०"],"iast":["tvāṃ sevatāṃ surakṛtā bahavo'ntarāyāḥ","svauko vilaṅghya paramaṃ vrajatāṃ padaṃ te|","nānyasya barhiṣi balīn dadataḥ svabhāgān","dhatte padaṃ tvamavitā yadi vighnamūrdhni|| 10"],"meaning":"आपके भक्त आपकी भक्तिके प्रभावसे देवताओंकी राजधानी अमरावतीका उल्लंघन करके आपके परमपदको प्राप्त होते हैं। इसलिये जब वे भजन करने लगते हैं, तब देवतालोग तरह-तरहसे उनकी साधनामें विघ्न डालते हैं। किन्तु जो लोग केवल कर्मकाण्डमें लगे रहकर यज्ञादिके द्वारा देवताओंको बलिके रूपमें उनका भाग देते रहते हैं, उन लोगोंके मार्गमें वे किसी प्रकारका विघ्न नहीं डालते। परन्तु प्रभो! आपके भक्तजन उनके द्वारा उपस्थित की हुई विघ्न-बाधाओंसे गिरते नहीं। बल्कि आपके करकमलोंकी छत्रछायामें रहते हुए वे विघ्नोंके सिरपर पैर रखकर आगे बढ़ जाते हैं, अपने लक्ष्यसे च्युत नहीं होते॥ १०॥"},{"id":"11.4.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/11/","page":734,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["क्षुत्तृट्त्रिकालगुणमारुतजैह्व्यशैश्‍न्या-","नस्मानपारजलधीनतितीर्य केचित्।","क्रोधस्य यान्ति विफलस्य वशं पदे गो-","र्मज्जन्ति दुश्‍चरतपश्‍च वृथोत्सृजन्ति॥ ११"],"iast":["kṣuttṛṭtrikālaguṇamārutajaihvyaśaiśnyā-","nasmānapārajaladhīnatitīrya kecit|","krodhasya yānti viphalasya vaśaṃ pade go-","rmajjanti duścaratapaśca vṛthotsṛjanti|| 11"],"meaning":"बहुत-से लोग तो ऐसे होते हैं जो भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी एवं आँधी-पानीके कष्टोंको तथा रसनेन्द्रिय और जननेन्द्रियके वेगोंको, जो अपार समुद्रोंके समान हैं, सह लेते हैं—पार कर जाते हैं। परन्तु फिर भी वे उस क्रोधके वशमें हो जाते हैं, जो गायके खुरसे बने गड्ढेके समान है और जिससे कोई लाभ नहीं है—आत्मनाशक है। और प्रभो! वे इस प्रकार अपनी कठिन तपस्याको खो बैठते हैं॥ ११॥"},{"id":"11.4.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/12/","page":734,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["इति प्रगृणतां तेषां स्त्रियोऽत्यद्भुतदर्शनाः।","दर्शयामास शुश्रूषां स्वर्चिताः कुर्वतीर्विभुः॥ १२"],"iast":["iti pragṛṇatāṃ teṣāṃ striyo'tyadbhutadarśanāḥ|","darśayāmāsa śuśrūṣāṃ svarcitāḥ kurvatīrvibhuḥ|| 12"],"meaning":"जब कामदेव, वसन्त आदि देवताओंने इस प्रकार स्तुति की तब सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ने अपने योगबलसे उनके सामने बहुत-सी ऐसी रमणियाँ प्रकट करके दिखलायीं, जो अद्भुत रूप-लावण्यसे सम्पन्‍न और विचित्र वस्त्रालंकारोंसे सुसज्जित थीं तथा भगवान्‌की सेवा कर रही थीं॥ १२॥"},{"id":"11.4.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/13/","page":734,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["ते देवानुचरा दृष्ट्वा स्त्रियः श्रीरिव रूपिणीः।","गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतश्रियः॥ १३"],"iast":["te devānucarā dṛṣṭvā striyaḥ śrīriva rūpiṇīḥ|","gandhena mumuhustāsāṃ rūpaudāryahataśriyaḥ|| 13"],"meaning":"जब देवराज इन्द्रके अनुचरोंने उन लक्ष्मीजीके समान रूपवती स्त्रियोंको देखा, तब उनके महान् सौन्दर्यके सामने उनका चेहरा फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीरसे निकलनेवाली दिव्य सुगन्धसे मोहित हो गये॥ १३॥"},{"id":"11.4.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/14/","page":734,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["तानाह देवदेवेशः प्रणतान् प्रहसन्‍निव।","आसामेकतमां वृङ्ध्वं सवर्णां स्वर्गभूषणाम्॥ १४"],"iast":["tānāha devadeveśaḥ praṇatān prahasanniva|","āsāmekatamāṃ vṛṅdhvaṃ savarṇāṃ svargabhūṣaṇām|| 14"],"meaning":"अब उनका सिर झुक गया। देवदेवेश भगवान् नारायण हँसते हुए-से उनसे बोले—‘तुमलोग इनमेंसे किसी एक स्त्रीको, जो तुम्हारे अनुरूप हो, ग्रहण कर लो। वह तुम्हारे स्वर्गलोककी शोभा बढ़ानेवाली होगी॥ १४॥"},{"id":"11.4.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/15/","page":734,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["ओमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिनः।","उर्वशीमप्सरःश्रेष्ठां पुरस्कृत्य दिवं ययुः॥ १५"],"iast":["omityādeśamādāya natvā taṃ suravandinaḥ|","urvaśīmapsaraḥśreṣṭhāṃ puraskṛtya divaṃ yayuḥ|| 15"],"meaning":"देवराज इन्द्रके अनुचरोंने ‘जो आज्ञा’ कहकर भगवान्‌के आदेशको स्वीकार किया तथा उन्हें नमस्कार किया। फिर उनके द्वारा बनायी हुई स्त्रियोंमेंसे श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशीको आगे करके वे स्वर्गलोकमें गये॥ १५॥"},{"id":"11.4.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/16/","page":735,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["इन्द्रायानम्य सदसि शृण्वतां त्रिदिवौकसाम्।","ऊचुर्नारायणबलं शक्रस्तत्रास विस्मितः॥ १६"],"iast":["indrāyānamya sadasi śṛṇvatāṃ tridivaukasām|","ūcurnārāyaṇabalaṃ śakrastatrāsa vismitaḥ|| 16"],"meaning":"वहाँ पहुँचकर उन्होंने इन्द्रको नमस्कार किया तथा भरी सभामें देवताओंके सामने भगवान् नर-नारायणके बल और प्रभावका वर्णन किया। उसे सुनकर देवराज इन्द्र अत्यन्त भयभीत और चकित हो गये॥ १६॥"},{"id":"11.4.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/17/","page":735,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं","दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः।","विष्णुः शिवाय जगतां कलयावतीर्ण-","स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये॥ १७"],"iast":["haṃsasvarūpyavadadacyuta ātmayogaṃ","dattaḥ kumāra ṛṣabho bhagavān pitā naḥ|","viṣṇuḥ śivāya jagatāṃ kalayāvatīrṇa-","stenāhṛtā madhubhidā śrutayo hayāsye|| 17"],"meaning":"भगवान् विष्णुने अपने स्वरूपमें एकरस स्थित रहते हुए भी सम्पूर्ण जगत‍्के कल्याणके लिये बहुत-से कलावतार ग्रहण किये हैं। विदेहराज! हंस, दत्तात्रेय, सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार और हमारे पिता ऋषभके रूपमें अवतीर्ण होकर उन्होंने आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका उपदेश किया है। उन्होंने ही हयग्रीव-अवतार लेकर मधु-कैटभ नामक असुरोंका संहार करके उन लोगोंके द्वारा चुराये हुए वेदोंका उद्धार किया है॥ १७॥"},{"id":"11.4.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/18/","page":735,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["गुप्तोऽप्यये मनुरिलौषधयश्‍च मात्स्ये","क्रौडे हतो दितिज उद्धरताम्भसः क्ष्माम्।","कौर्मे धृतोऽद्रिरमृतोन्मथने स्वपृष्ठे","ग्राहात् प्रपन्‍नमिभराजममुञ्चदार्तम्॥ १८"],"iast":["gupto'pyaye manurilauṣadhayaśca mātsye","krauḍe hato ditija uddharatāmbhasaḥ kṣmām|","kaurme dhṛto'driramṛtonmathane svapṛṣṭhe","grāhāt prapannamibharājamamuñcadārtam|| 18"],"meaning":"प्रलयके समय मत्स्यावतार लेकर उन्होंने भावी मनु सत्यव्रत, पृथ्वी और ओषधियोंकी—धान्यादिकी रक्षा की और वराहावतार ग्रहण करके पृथ्वीका रसातलसे उद्धार करते समय हिरण्याक्षका संहार किया। कूर्मावतार ग्रहण करके उन्हीं भगवान्‌ने अमृत-मन्थनका कार्य सम्पन्‍न करनेके लिये अपनी पीठपर मन्दराचल धारण किया और उन्हीं भगवान् विष्णुने अपने शरणागत एवं आर्त भक्त गजेन्द्रको ग्राहसे छुड़ाया॥ १८॥"},{"id":"11.4.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/19/","page":735,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["संस्तुन्वतोऽब्धिपतिताञ्छ्रमणानृषींश्‍च","शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम्।","देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा","जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे॥ १९"],"iast":["saṃstunvato'bdhipatitāñchramaṇānṛṣīṃśca","śakraṃ ca vṛtravadhatastamasi praviṣṭam|","devastriyo'suragṛhe pihitā anāthā","jaghne'surendramabhayāya satāṃ nṛsiṃhe|| 19"],"meaning":"एक बार वालखिल्य ऋषि तपस्या करते-करते अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। वे जब कश्यप ऋषिके लिये समिधा ला रहे थे तो थककर गायके खुरसे बने हुए गड्ढेमें गिर पड़े, मानो समुद्रमें गिर गये हों। उन्होंने जब स्तुति की, तब भगवान्‌ने अवतार लेकर उनका उद्धार किया। वृत्रासुरको मारनेके कारण जब इन्द्रको ब्रह्महत्या लगी और वे उसके भयसे भागकर छिप गये, तब भगवान्‌ने उस हत्यासे इन्द्रकी रक्षा की; और जब असुरोंने अनाथ देवांगनाओंको बंदी बना लिया, तब भी भगवान्‌ने ही उन्हें असुरोंके चंगुलसे छुड़ाया। जब हिरण्यकशिपुके कारण प्रह्लाद आदि संत पुरुषोंको भय पहुँचने लगा तब उनको निर्भय करनेके लिये भगवान्‌ने नृसिंहावतार ग्रहण किया और हिरण्यकशिपुको मार डाला॥ १९॥"},{"id":"11.4.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/20/","page":736,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["देवासुरे युधि च दैत्यपतीन् सुरार्थे","हत्वान्तरेषु भुवनान्यदधात् कलाभिः।","भूत्वाथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां","याच्ञाच्छलेन समदाददितेः सुतेभ्यः॥ २०"],"iast":["devāsure yudhi ca daityapatīn surārthe","hatvāntareṣu bhuvanānyadadhāt kalābhiḥ|","bhūtvātha vāmana imāmaharad baleḥ kṣmāṃ","yācñācchalena samadādaditeḥ sutebhyaḥ|| 20"],"meaning":"उन्होंने देवताओंकी रक्षाके लिये देवासुर संग्राममें दैत्यपतियोंका वध किया और विभिन्‍न मन्वन्तरोंमें अपनी शक्तिसे अनेकों कलावतार धारण करके त्रिभुवनकी रक्षा की। फिर वामन-अवतार ग्रहण करके उन्होंने याचनाके बहाने इस पृथ्वीको दैत्यराज बलिसे छीन लिया और अदितिनन्दन देवताओंको दे दिया॥ २०॥"},{"id":"11.4.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/21/","page":736,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["निःक्षत्रियामकृत गां च त्रिःसप्तकृत्वो","रामस्तु हैहयकुलाप्ययभार्गवाग्‍निः।","सोऽब्धिं बबन्ध दशवक्त्रमहन् सलङ्कं","सीतापतिर्जयति लोकमलघ्नकीर्तिः॥ २१"],"iast":["niḥkṣatriyāmakṛta gāṃ ca triḥsaptakṛtvo","rāmastu haihayakulāpyayabhārgavāgniḥ|","so'bdhiṃ babandha daśavaktramahan salaṅkaṃ","sītāpatirjayati lokamalaghnakīrtiḥ|| 21"],"meaning":"परशुराम-अवतार ग्रहण करके उन्होंने ही पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियहीन किया। परशुरामजी तो हैहयवंशका प्रलय करनेके लिये मानो भृगुवंशमें अग्‍नि रूपसे ही अवतीर्ण हुए थे। उन्हीं भगवान्‌ने रामावतारमें समुद्रपर पुल बाँधा एवं रावण और उसकी राजधानी लंकाको मटियामेट कर दिया। उनकी कीर्ति समस्त लोकोंके मलको नष्ट करनेवाली है। सीतापति भगवान् राम सदा-सर्वदा, सर्वत्र विजयी-ही-विजयी हैं॥ २१॥"},{"id":"11.4.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/22/","page":736,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा","जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।","वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान्","शूद्रान् कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते॥ २२"],"iast":["bhūmerbharāvataraṇāya yaduṣvajanmā","jātaḥ kariṣyati surairapi duṣkarāṇi|","vādairvimohayati yajñakṛto'tadarhān","śūdrān kalau kṣitibhujo nyahaniṣyadante|| 22"],"meaning":"राजन्! अजन्मा होनेपर भी पृथ्वीका भार उतारनेके लिये वे ही भगवान् यदुवंशमें जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते। फिर आगे चलकर भगवान् ही बुद्धके रूपमें प्रकट होंगे और यज्ञके अनधिकारियोंको यज्ञ करते देखकर अनेक प्रकारके तर्क-वितर्कोंसे मोहित कर लेंगे और कलियुगके अन्तमें कल्कि-अवतार लेकर वे ही शूद्र राजाओंका वध करेंगे॥ २२॥"},{"id":"11.4.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/4/23/","page":736,"speaker":"द्रुमिल उवाच","sanskrit":["एवंविधानि कर्माणि जन्मानि च जगत्पतेः।","भूरीणि भूरियशसो वर्णितानि महाभुज॥ २३"],"iast":["evaṃvidhāni karmāṇi janmāni ca jagatpateḥ|","bhūrīṇi bhūriyaśaso varṇitāni mahābhuja|| 23"],"meaning":"महाबाहु विदेहराज! भगवान्‌की कीर्ति अनन्त है। महात्माओंने जगत्पति भगवान्‌के ऐसे-ऐसे अनेकों जन्म और कर्मोंका प्रचुरतासे गान भी किया है॥ २३॥"}],"text":[{"b":38709,"kind":"adhyaya_heading","page":732,"text":"अथ चतुर्थोऽध्यायः"},{"b":38710,"kind":"topic_heading","page":732,"text":"भगवान्‌के अवतारोंका वर्णन"},{"b":38711,"kind":"topic_heading","page":732,"text":"राजोवाच"},{"b":38712,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.1"],"text":"यानि यानीह कर्माणि यैर्यैः स्वच्छन्दजन्मभिः।"},{"b":38713,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.1"],"text":"चक्रे करोति कर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तु नः॥ १"},{"b":38714,"kind":"hindi_translation","page":732,"explains":["11.4.1"],"text":"राजा निमिने पूछा—योगीश्‍वरो! भगवान् स्वतन्त्रतासे अपने भक्तोंकी भक्तिके वश होकर अनेकों प्रकारके अवतार ग्रहण करते हैं और अनेकों लीलाएँ करते हैं। आपलोग कृपा करके भगवान्‌की उन लीलाओंका वर्णन कीजिये, जो वे अबतक कर चुके हैं, कर रहे हैं या करेंगे॥ १॥"},{"b":38715,"kind":"topic_heading","page":732,"text":"द्रुमिल उवाच"},{"b":38716,"kind":"hindi_commentary","page":732,"verses":["11.4.2"],"text":"यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ता-"},{"b":38717,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.2"],"text":"ननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धिः।"},{"b":38718,"kind":"hindi_commentary","page":732,"verses":["11.4.2"],"text":"रजांसि भूमेर्गणयेत् कथंचित्"},{"b":38719,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.2"],"text":"कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्‍नः॥ २"},{"b":38720,"kind":"hindi_commentary","page":732,"verses":["11.4.3"],"text":"भूतैर्यदा पंचभिरात्मसृष्टैः"},{"b":38721,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.3"],"text":"पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन्।"},{"b":38722,"kind":"hindi_commentary","page":732,"verses":["11.4.3"],"text":"स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधान-"},{"b":38723,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.3"],"text":"मवाप नारायण आदिदेवः॥ ३"},{"b":38724,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.4"],"text":"यत्काय एष भुवनत्रयसन्‍निवेशो"},{"b":38725,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.4"],"text":"यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि।"},{"b":38726,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.4"],"text":"ज्ञानं स्वतः श्‍वसनतो बलमोज ईहा"},{"b":38727,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.4"],"text":"सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता॥ ४"},{"b":38728,"kind":"hindi_commentary","page":732,"verses":["11.4.5"],"text":"आदावभूच्छतधृती रजसास्य सर्गे"},{"b":38729,"kind":"sanskrit_shloka","page":732,"verses":["11.4.5"],"text":"विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः।"},{"b":38730,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.5"],"text":"रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य"},{"b":38731,"kind":"sanskrit_shloka","page":733,"verses":["11.4.5"],"text":"इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु॥ ५"},{"b":38732,"kind":"hindi_translation","page":732,"explains":["11.4.2","11.4.3","11.4.4","11.4.5"],"text":"अब सातवें योगीश्‍वर द्रुमिलजीने कहा—राजन्! भगवान् अनन्त हैं। उनके गुण भी अनन्त हैं। जो यह सोचता है कि मैं उनके गुणोंको गिन लूँगा, वह मूर्ख है, बालक है। यह तो सम्भव है कि कोई किसी प्रकार पृथ्वीके धूलि-कणोंको गिन ले, परन्तु समस्त शक्तियोंके आश्रय भगवान्‌के अनन्त गुणोंका कोई कभी किसी प्रकार पार नहीं पा सकता॥ २॥ भगवान्‌ने ही पृथ्वी, जल, अग्‍नि, वायु, आकाश—इन पाँच भूतोंकी अपने-आपसे अपने-आपमें सृष्टि की है। जब वे इनके द्वारा विराट् शरीर, ब्रह्माण्डका निर्माण करके उसमें लीलासे अपने अंश अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश करते हैं, (भोक्तारूपसे नहीं, क्योंकि भोक्ता तो अपने पुण्योंके फलस्वरूप जीव ही होता है) तब उन आदिदेव नारायणको ‘पुरुष’ नामसे कहते हैं, यही उनका पहला अवतार है॥ ३॥ उन्हींके इस विराट् ब्रह्माण्ड शरीरमें तीनों लोक स्थित हैं। उन्हींकी इन्द्रियोंसे समस्त देहधारियोंकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ बनी हैं। उनके स्वरूपसे ही स्वतःसिद्ध ज्ञानका संचार होता है। उनके श्‍वास-प्रश्‍वाससे सब शरीरोंमें बल आता है तथा इन्द्रियोंमें ओज (इन्द्रियोंकी शक्ति) और कर्म करनेकी शक्ति प्राप्त होती है। उन्हींके सत्त्व आदि गुणोंसे संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय होते हैं। इस विराट् शरीरके जो शरीरी हैं, वे ही आदिकर्ता नारायण हैं॥ ४॥ पहले-पहल जगत‍्की उत्पत्तिके लिये उनके रजोगुणके अंशसे ब्रह्मा हुए, फिर वे आदिपुरुष ही संसारकी स्थितिके लिये अपने सत्त्वांशसे धर्म तथा ब्राह्मणोंके रक्षक यज्ञपति विष्णु बन गये। फिर वे ही तमोगुणके अंशसे जगत‍्के संहारके लिये रुद्र बने। इस प्रकार निरन्तर उन्हींसे परिवर्तनशील प्रजाकी उत्पत्ति-स्थिति और संहार होते रहते हैं॥ ५॥"},{"b":38733,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.6"],"text":"धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां"},{"b":38734,"kind":"sanskrit_shloka","page":733,"verses":["11.4.6"],"text":"नारायणो नर ऋषिप्रवरः प्रशान्तः।"},{"b":38735,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.6"],"text":"नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार कर्म"},{"b":38736,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.6"],"text":"योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्‌घ्रिः॥ ६"},{"b":38737,"kind":"sanskrit_shloka","page":733,"verses":["11.4.7"],"text":"इन्द्रो विशङ्‌क्य मम धाम जिघृक्षतीति"},{"b":38738,"kind":"sanskrit_shloka","page":733,"verses":["11.4.7"],"text":"कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम्।"},{"b":38739,"kind":"sanskrit_shloka","page":733,"verses":["11.4.7"],"text":"गत्वाप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः"},{"b":38740,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.7"],"text":"स्त्रीप्रेक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः॥ ७"},{"b":38741,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.8"],"text":"विज्ञाय शक्रकृतमक्रममादिदेवः"},{"b":38742,"kind":"sanskrit_shloka","page":733,"verses":["11.4.8"],"text":"प्राह प्रहस्य गतविस्मय एजमानान्।"},{"b":38743,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.8"],"text":"मा भैष्ट भो मदन मारुत देववध्वो"},{"b":38744,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.8"],"text":"गृह्णीत नो बलिमशून्यमिमं कुरुध्वम्॥ ८"},{"b":38745,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.9"],"text":"इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवाः"},{"b":38746,"kind":"sanskrit_shloka","page":733,"verses":["11.4.9"],"text":"सव्रीडनम्रशिरसः सघृणं तमूचुः।"},{"b":38747,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.9"],"text":"नैतद् विभो त्वयि परेऽविकृते विचित्रं"},{"b":38748,"kind":"hindi_commentary","page":733,"verses":["11.4.9"],"text":"स्वारामधीरनिकरानतपादपद्मे ॥ ९"},{"b":38749,"kind":"hindi_commentary","page":734,"verses":["11.4.10"],"text":"त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः"},{"b":38750,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.10"],"text":"स्वौको विलङ्‌घ्य परमं व्रजतां पदं ते।"},{"b":38751,"kind":"hindi_commentary","page":734,"verses":["11.4.10"],"text":"नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददतः स्वभागान्"},{"b":38752,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.10"],"text":"धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि॥ १०"},{"b":38753,"kind":"hindi_commentary","page":733,"explains":["11.4.6","11.4.7","11.4.8","11.4.9","11.4.10"],"text":"दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम था मूर्ति। वह धर्मकी पत्‍नी थी। उसके गर्भसे भगवान्‌ने ऋषिश्रेष्ठ शान्तात्मा ‘नर’ और ‘नारायण’ के रूपमें अवतार लिया । उन्होंने आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले उस भगवदाराधनरूप कर्मका उपदेश किया, जो वास्तवमें कर्मबन्धनसे छुड़ानेवाला और नैष्कर्म्य स्थितिको प्राप्त करानेवाला है। उन्होंने स्वयं भी वैसे ही कर्मका अनुष्ठान किया। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं। वे आज भी बदरिकाश्रममें उसी कर्मका आचरण करते हुए विराजमान हैं॥ ६॥ ये अपनी घोर तपस्याके द्वारा मेरा धाम छीनना चाहते हैं—इन्द्रने ऐसी आशंका करके स्त्री, वसन्त आदि दल-बलके साथ कामदेवको उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये भेजा। कामदेवको भगवान्‌की महिमाका ज्ञान न था; इसलिये वह अप्सरागण, वसन्त तथा मन्द-सुगन्ध वायुके साथ बदरिकाश्रममें जाकर स्त्रियोंके कटाक्ष बाणोंसे उन्हें घायल करनेकी चेष्टा करने लगा॥ ७॥ आदिदेव नर-नारायणने यह जानकर कि यह इन्द्रका कुचक्र है, भयसे काँपते हुए काम आदिकोंसे हँसकर कहा—उस समय उनके मनमें किसी प्रकारका अभिमान या आश्‍चर्य नहीं था। ‘कामदेव, मलय-मारुत और देवांगनाओ! तुमलोग डरो मत; हमारा आतिथ्य स्वीकार करो। अभी यहीं ठहरो, हमारा आश्रम सूना मत करो’॥ ८॥ राजन्! जब नर-नारायण ऋषिने उन्हें अभयदान देते हुए इस प्रकार कहा, तब कामदेव आदिके सिर लज्जासे झुक गये। उन्होंने दयालु भगवान् नर-नारायणसे कहा—‘प्रभो! आपके लिये यह कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि आप मायासे परे और निर्विकार हैं। बड़े-बड़े आत्माराम और धीर पुरुष निरन्तर आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करते रहते हैं॥ ९॥ आपके भक्त आपकी भक्तिके प्रभावसे देवताओंकी राजधानी अमरावतीका उल्लंघन करके आपके परमपदको प्राप्त होते हैं। इसलिये जब वे भजन करने लगते हैं, तब देवतालोग तरह-तरहसे उनकी साधनामें विघ्न डालते हैं। किन्तु जो लोग केवल कर्मकाण्डमें लगे रहकर यज्ञादिके द्वारा देवताओंको बलिके रूपमें उनका भाग देते रहते हैं, उन लोगोंके मार्गमें वे किसी प्रकारका विघ्न नहीं डालते। परन्तु प्रभो! आपके भक्तजन उनके द्वारा उपस्थित की हुई विघ्न-बाधाओंसे गिरते नहीं। बल्कि आपके करकमलोंकी छत्रछायामें रहते हुए वे विघ्नोंके सिरपर पैर रखकर आगे बढ़ जाते हैं, अपने लक्ष्यसे च्युत नहीं होते॥ १०॥"},{"b":38754,"kind":"hindi_commentary","page":734,"verses":["11.4.11"],"text":"क्षुत्तृट्त्रिकालगुणमारुतजैह्व्यशैश्‍न्या-"},{"b":38755,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.11"],"text":"नस्मानपारजलधीनतितीर्य केचित्।"},{"b":38756,"kind":"hindi_commentary","page":734,"verses":["11.4.11"],"text":"क्रोधस्य यान्ति विफलस्य वशं पदे गो-"},{"b":38757,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.11"],"text":"र्मज्जन्ति दुश्‍चरतपश्‍च वृथोत्सृजन्ति॥ ११"},{"b":38758,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.12"],"text":"इति प्रगृणतां तेषां स्त्रियोऽत्यद्भुतदर्शनाः।"},{"b":38759,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.12"],"text":"दर्शयामास शुश्रूषां स्वर्चिताः कुर्वतीर्विभुः॥ १२"},{"b":38760,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.13"],"text":"ते देवानुचरा दृष्ट्वा स्त्रियः श्रीरिव रूपिणीः।"},{"b":38761,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.13"],"text":"गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतश्रियः॥ १३"},{"b":38762,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.14"],"text":"तानाह देवदेवेशः प्रणतान् प्रहसन्‍निव।"},{"b":38763,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.14"],"text":"आसामेकतमां वृङ्ध्वं सवर्णां स्वर्गभूषणाम्॥ १४"},{"b":38764,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.15"],"text":"ओमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिनः।"},{"b":38765,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["11.4.15"],"text":"उर्वशीमप्सरःश्रेष्ठां पुरस्कृत्य दिवं ययुः॥ १५"},{"b":38766,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["11.4.16"],"text":"इन्द्रायानम्य सदसि शृण्वतां त्रिदिवौकसाम्।"},{"b":38767,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["11.4.16"],"text":"ऊचुर्नारायणबलं शक्रस्तत्रास विस्मितः॥ १६"},{"b":38768,"kind":"hindi_translation","page":734,"explains":["11.4.11","11.4.12","11.4.13","11.4.14","11.4.15","11.4.16"],"text":"बहुत-से लोग तो ऐसे होते हैं जो भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी एवं आँधी-पानीके कष्टोंको तथा रसनेन्द्रिय और जननेन्द्रियके वेगोंको, जो अपार समुद्रोंके समान हैं, सह लेते हैं—पार कर जाते हैं। परन्तु फिर भी वे उस क्रोधके वशमें हो जाते हैं, जो गायके खुरसे बने गड्ढेके समान है और जिससे कोई लाभ नहीं है—आत्मनाशक है। और प्रभो! वे इस प्रकार अपनी कठिन तपस्याको खो बैठते हैं॥ ११॥ जब कामदेव, वसन्त आदि देवताओंने इस प्रकार स्तुति की तब सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ने अपने योगबलसे उनके सामने बहुत-सी ऐसी रमणियाँ प्रकट करके दिखलायीं, जो अद्भुत रूप-लावण्यसे सम्पन्‍न और विचित्र वस्त्रालंकारोंसे सुसज्जित थीं तथा भगवान्‌की सेवा कर रही थीं॥ १२॥ जब देवराज इन्द्रके अनुचरोंने उन लक्ष्मीजीके समान रूपवती स्त्रियोंको देखा, तब उनके महान् सौन्दर्यके सामने उनका चेहरा फीका पड़ गया, वे श्रीहीन होकर उनके शरीरसे निकलनेवाली दिव्य सुगन्धसे मोहित हो गये॥ १३॥ अब उनका सिर झुक गया। देवदेवेश भगवान् नारायण हँसते हुए-से उनसे बोले—‘तुमलोग इनमेंसे किसी एक स्त्रीको, जो तुम्हारे अनुरूप हो, ग्रहण कर लो। वह तुम्हारे स्वर्गलोककी शोभा बढ़ानेवाली होगी॥ १४॥ देवराज इन्द्रके अनुचरोंने ‘जो आज्ञा’ कहकर भगवान्‌के आदेशको स्वीकार किया तथा उन्हें नमस्कार किया। फिर उनके द्वारा बनायी हुई स्त्रियोंमेंसे श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशीको आगे करके वे स्वर्गलोकमें गये॥ १५॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने इन्द्रको नमस्कार किया तथा भरी सभामें देवताओंके सामने भगवान् नर-नारायणके बल और प्रभावका वर्णन किया। उसे सुनकर देवराज इन्द्र अत्यन्त भयभीत और चकित हो गये॥ १६॥"},{"b":38769,"kind":"hindi_commentary","page":735,"verses":["11.4.17"],"text":"हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं"},{"b":38770,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["11.4.17"],"text":"दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः।"},{"b":38771,"kind":"hindi_commentary","page":735,"verses":["11.4.17"],"text":"विष्णुः शिवाय जगतां कलयावतीर्ण-"},{"b":38772,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["11.4.17"],"text":"स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये॥ १७"},{"b":38773,"kind":"hindi_commentary","page":735,"verses":["11.4.18"],"text":"गुप्तोऽप्यये मनुरिलौषधयश्‍च मात्स्ये"},{"b":38774,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["11.4.18"],"text":"क्रौडे हतो दितिज उद्धरताम्भसः क्ष्माम्।"},{"b":38775,"kind":"hindi_commentary","page":735,"verses":["11.4.18"],"text":"कौर्मे धृतोऽद्रिरमृतोन्मथने स्वपृष्ठे"},{"b":38776,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["11.4.18"],"text":"ग्राहात् प्रपन्‍नमिभराजममुञ्चदार्तम्॥ १८"},{"b":38777,"kind":"hindi_commentary","page":735,"explains":["11.4.17","11.4.18"],"text":"भगवान् विष्णुने अपने स्वरूपमें एकरस स्थित रहते हुए भी सम्पूर्ण जगत‍्के कल्याणके लिये बहुत-से कलावतार ग्रहण किये हैं। विदेहराज! हंस, दत्तात्रेय, सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार और हमारे पिता ऋषभके रूपमें अवतीर्ण होकर उन्होंने आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका उपदेश किया है। उन्होंने ही हयग्रीव-अवतार लेकर मधु-कैटभ नामक असुरोंका संहार करके उन लोगोंके द्वारा चुराये हुए वेदोंका उद्धार किया है॥ १७॥ प्रलयके समय मत्स्यावतार लेकर उन्होंने भावी मनु सत्यव्रत, पृथ्वी और ओषधियोंकी—धान्यादिकी रक्षा की और वराहावतार ग्रहण करके पृथ्वीका रसातलसे उद्धार करते समय हिरण्याक्षका संहार किया। कूर्मावतार ग्रहण करके उन्हीं भगवान्‌ने अमृत-मन्थनका कार्य सम्पन्‍न करनेके लिये अपनी पीठपर मन्दराचल धारण किया और उन्हीं भगवान् विष्णुने अपने शरणागत एवं आर्त भक्त गजेन्द्रको ग्राहसे छुड़ाया॥ १८॥"},{"b":38778,"kind":"hindi_commentary","page":735,"verses":["11.4.19"],"text":"संस्तुन्वतोऽब्धिपतिताञ्छ्रमणानृषींश्‍च"},{"b":38779,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["11.4.19"],"text":"शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम्।"},{"b":38780,"kind":"hindi_commentary","page":735,"verses":["11.4.19"],"text":"देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा"},{"b":38781,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["11.4.19"],"text":"जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे॥ १९"},{"b":38782,"kind":"hindi_commentary","page":736,"verses":["11.4.20"],"text":"देवासुरे युधि च दैत्यपतीन् सुरार्थे"},{"b":38783,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["11.4.20"],"text":"हत्वान्तरेषु भुवनान्यदधात् कलाभिः।"},{"b":38784,"kind":"hindi_commentary","page":736,"verses":["11.4.20"],"text":"भूत्वाथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां"},{"b":38785,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["11.4.20"],"text":"याच्ञाच्छलेन समदाददितेः सुतेभ्यः॥ २०"},{"b":38786,"kind":"hindi_commentary","page":736,"verses":["11.4.21"],"text":"निःक्षत्रियामकृत गां च त्रिःसप्तकृत्वो"},{"b":38787,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["11.4.21"],"text":"रामस्तु हैहयकुलाप्ययभार्गवाग्‍निः।"},{"b":38788,"kind":"hindi_commentary","page":736,"verses":["11.4.21"],"text":"सोऽब्धिं बबन्ध दशवक्त्रमहन् सलङ्कं"},{"b":38789,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["11.4.21"],"text":"सीतापतिर्जयति लोकमलघ्नकीर्तिः॥ २१"},{"b":38790,"kind":"hindi_commentary","page":736,"verses":["11.4.22"],"text":"भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा"},{"b":38791,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["11.4.22"],"text":"जातः करिष्यति सुरैरपि 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बंदी बना लिया, तब भी भगवान्‌ने ही उन्हें असुरोंके चंगुलसे छुड़ाया। जब हिरण्यकशिपुके कारण प्रह्लाद आदि संत पुरुषोंको भय पहुँचने लगा तब उनको निर्भय करनेके लिये भगवान्‌ने नृसिंहावतार ग्रहण किया और हिरण्यकशिपुको मार डाला॥ १९॥ उन्होंने देवताओंकी रक्षाके लिये देवासुर संग्राममें दैत्यपतियोंका वध किया और विभिन्‍न मन्वन्तरोंमें अपनी शक्तिसे अनेकों कलावतार धारण करके त्रिभुवनकी रक्षा की। फिर वामन-अवतार ग्रहण करके उन्होंने याचनाके बहाने इस पृथ्वीको दैत्यराज बलिसे छीन लिया और अदितिनन्दन देवताओंको दे दिया॥ २०॥ परशुराम-अवतार ग्रहण करके उन्होंने ही पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियहीन किया। परशुरामजी तो हैहयवंशका प्रलय करनेके लिये मानो भृगुवंशमें अग्‍नि रूपसे ही अवतीर्ण हुए थे। उन्हीं भगवान्‌ने रामावतारमें समुद्रपर पुल बाँधा एवं रावण और उसकी राजधानी लंकाको मटियामेट कर दिया। उनकी कीर्ति समस्त लोकोंके मलको नष्ट करनेवाली है। सीतापति भगवान् राम सदा-सर्वदा, सर्वत्र विजयी-ही-विजयी हैं॥ २१॥ राजन्! अजन्मा होनेपर भी पृथ्वीका भार उतारनेके लिये वे ही भगवान् यदुवंशमें जन्म लेंगे और ऐसे-ऐसे कर्म करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते। फिर आगे चलकर भगवान् ही बुद्धके रूपमें प्रकट होंगे और यज्ञके अनधिकारियोंको यज्ञ करते देखकर अनेक प्रकारके तर्क-वितर्कोंसे मोहित कर लेंगे और कलियुगके अन्तमें कल्कि-अवतार लेकर वे ही शूद्र राजाओंका वध करेंगे॥ २२॥ महाबाहु विदेहराज! भगवान्‌की कीर्ति अनन्त है। महात्माओंने जगत्पति भगवान्‌के ऐसे-ऐसे अनेकों जन्म और कर्मोंका प्रचुरतासे गान भी किया है॥ २३॥"},{"b":38797,"kind":"hindi_translation","page":736,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}