{"id":"11.24","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 24","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथ चतुर्विंशोऽध्यायः","topics":["सांख्ययोग"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.24.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[862,866]},"verses":[{"id":"11.24.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/1/","page":863,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अथ ते संप्रवक्ष्यामि सांख्यं पूर्वैर्विनिश्‍चितम्।","यद् विज्ञाय पुमान् सद्यो जह्याद् वैकल्पिकं भ्रमम्॥ १"],"iast":["atha te saṃpravakṣyāmi sāṃkhyaṃ pūrvairviniścitam|","yad vijñāya pumān sadyo jahyād vaikalpikaṃ bhramam|| 1"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्यारे उद्धव! अब मैं तुम्हें सांख्यशास्त्रका निर्णय सुनाता हूँ। प्राचीन कालके बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंने इसका निश्‍चय किया है। जब जीव इसे भलीभाँति समझ लेता है तो वह भेदबुद्धिमूलक सुख-दुःखादिरूप भ्रमका तत्काल त्याग कर देता है॥ १॥"},{"id":"11.24.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/2/","page":863,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।","यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगेऽयुगे॥ २"],"iast":["āsījjñānamatho hyartha ekamevāvikalpitam|","yadā vivekanipuṇā ādau kṛtayuge'yuge|| 2"],"meaning":"युगोंसे पूर्व प्रलयकालमें आदिसत्ययुगमें और जब कभी मनुष्य विवेकनिपुण होते हैं—इन सभी अवस्थाओंमें यह सम्पूर्ण दृश्य और द्रष्टा, जगत् और जीव विकल्पशून्य किसी प्रकारके भेदभावसे रहित केवल ब्रह्म ही होते हैं॥ २॥"},{"id":"11.24.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/3/","page":863,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तन्मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम्।","वाङ्मनोऽगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत्॥ ३"],"iast":["tanmāyāphalarūpeṇa kevalaṃ nirvikalpitam|","vāṅmano'gocaraṃ satyaṃ dvidhā samabhavad bṛhat|| 3"],"meaning":"इसमें सन्देह नहीं कि ब्रह्ममें किसी प्रकारका विकल्प नहीं है, वह केवल—अद्वितीय सत्य है; मन और वाणीकी उसमें गति नहीं है। वह ब्रह्म ही माया और उसमें प्रतिबिम्बित जीवके रूपमें—दृश्य और द्रष्टाके रूपमें—दो भागोंमें विभक्त-सा हो गया॥ ३॥"},{"id":"11.24.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/4/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका।","ज्ञानं त्वन्यतमो भावः पुरुषः सोऽभिधीयते॥ ४"],"iast":["tayorekataro hyarthaḥ prakṛtiḥ sobhayātmikā|","jñānaṃ tvanyatamo bhāvaḥ puruṣaḥ so'bhidhīyate|| 4"],"meaning":"उनमेंसे एक वस्तुको प्रकृति कहते हैं। उसीने जगत‍्में कार्य और कारणका रूप धारण किया है। दूसरी वस्तुको, जो ज्ञानस्वरूप है, पुरुष कहते हैं॥ ४॥"},{"id":"11.24.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/5/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः।","मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन च॥ ५"],"iast":["tamo rajaḥ sattvamiti prakṛterabhavan guṇāḥ|","mayā prakṣobhyamāṇāyāḥ puruṣānumatena ca|| 5"],"meaning":"उद्धवजी! मैंने ही जीवोंके शुभ-अशुभ कर्मोंके अनुसार प्रकृतिको क्षुब्ध किया। तब उससे सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण प्रकट हुए॥ ५॥"},{"id":"11.24.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/6/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तेभ्यः समभवत् सूत्रं महान् सूत्रेण संयुतः।","ततो विकुर्वतो जातोऽहंकारो यो विमोहनः॥ ६"],"iast":["tebhyaḥ samabhavat sūtraṃ mahān sūtreṇa saṃyutaḥ|","tato vikurvato jāto'haṃkāro yo vimohanaḥ|| 6"],"meaning":"उनसे क्रिया-शक्तिप्रधान सूत्र और ज्ञानशक्तिप्रधान महत्तत्त्व प्रकट हुए। वे दोनों परस्पर मिले हुए ही हैं। महत्तत्त्वमें विकार होनेपर अहंकार व्यक्त हुआ। यह अहंकार ही जीवोंको मोहमें डालनेवाला है॥ ६॥"},{"id":"11.24.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/7/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वैकारिकस्तैजसश्‍च तामसश्‍चेत्यहं त्रिवृत्।","तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः॥ ७"],"iast":["vaikārikastaijasaśca tāmasaścetyahaṃ trivṛt|","tanmātrendriyamanasāṃ kāraṇaṃ cidacinmayaḥ|| 7"],"meaning":"वह तीन प्रकारका है—सात्त्विक, राजस और तामस। अहंकार पंचतन्मात्रा, इन्द्रिय और मनका कारण है; इसलिये वह जड-चेतन—उभयात्मक है॥ ७॥"},{"id":"11.24.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/8/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अर्थस्तन्मात्रिकाज्जज्ञे तामसादिन्द्रियाणि च।","तैजसाद् देवता आसन्‍नेकादश च वैकृतात्॥ ८"],"iast":["arthastanmātrikājjajñe tāmasādindriyāṇi ca|","taijasād devatā āsannekādaśa ca vaikṛtāt|| 8"],"meaning":"तामस अहंकारसे पंचतन्मात्राएँ और उनसे पाँच भूतोंकी उत्पत्ति हुई। तथा राजस अहंकारसे इन्द्रियाँ और सात्त्विक अहंकारसे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ग्यारह देवता प्रकट हुए॥ ८॥"},{"id":"11.24.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/9/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मया संचोदिता भावाः सर्वे संहत्यकारिणः।","अण्डमुत्पादयामासुर्ममायतनमुत्तमम् ॥ ९"],"iast":["mayā saṃcoditā bhāvāḥ sarve saṃhatyakāriṇaḥ|","aṇḍamutpādayāmāsurmamāyatanamuttamam || 9"],"meaning":"ये सभी पदार्थ मेरी प्रेरणासे एकत्र होकर परस्पर मिल गये और इन्होंने यह ब्रह्माण्ड-रूप अण्ड उत्पन्‍न किया। यह अण्ड मेरा उत्तम निवास-स्थान है॥ ९॥"},{"id":"11.24.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/10/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्मिन्‍नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थितौ।","मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्‍वाख्यं तत्र चात्मभूः॥ १०"],"iast":["tasminnahaṃ samabhavamaṇḍe salilasaṃsthitau|","mama nābhyāmabhūt padmaṃ viśvākhyaṃ tatra cātmabhūḥ|| 10"],"meaning":"जब वह अण्ड जलमें स्थित हो गया, तब मैं नारायणरूपसे इसमें विराजमान हो गया। मेरी नाभिसे विश्‍वकमलकी उत्पत्ति हुई। उसीपर ब्रह्माका आविर्भाव हुआ॥ १०॥"},{"id":"11.24.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/11/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सोऽसृजत्तपसा युक्तो रजसा मदनुग्रहात्।","लोकान् सपालान् विश्‍वात्मा भूर्भुवः स्वरिति त्रिधा॥ ११"],"iast":["so'sṛjattapasā yukto rajasā madanugrahāt|","lokān sapālān viśvātmā bhūrbhuvaḥ svariti tridhā|| 11"],"meaning":"विश्‍वसमष्टिके अन्तःकरण ब्रह्माने पहले बहुत बड़ी तपस्या की। उसके बाद मेरा कृपा-प्रसाद प्राप्त करके रजोगुणके द्वारा भूः, भुवः, स्वः अर्थात् पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग—इन तीन लोकोंकी और इनके लोकपालोंकी रचना की॥ ११॥"},{"id":"11.24.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/12/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["देवानामोक आसीत् स्वर्भूतानां च भुवः पदम्।","मर्त्यादीनां च भूर्लोकः सिद्धानां त्रितयात् परम्॥ १२"],"iast":["devānāmoka āsīt svarbhūtānāṃ ca bhuvaḥ padam|","martyādīnāṃ ca bhūrlokaḥ siddhānāṃ tritayāt param|| 12"],"meaning":"देवताओंके निवासके लिये स्वर्लोक, भूत-प्रेतादिके लिये भुवर्लोक (अन्तरिक्ष) और मनुष्य आदिके लिये भूर्लोक (पृथ्वीलोक) का निश्‍चय किया गया। इन तीनों लोकोंसे ऊपर महर्लोक, तपलोक आदि सिद्धोंके निवासस्थान हुए॥ १२॥"},{"id":"11.24.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/13/","page":864,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अधोऽसुराणां नागानां भूमेरोकोऽसृजत् प्रभुः।","त्रिलोक्यां गतयः सर्वाः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्॥ १३"],"iast":["adho'surāṇāṃ nāgānāṃ bhūmeroko'sṛjat prabhuḥ|","trilokyāṃ gatayaḥ sarvāḥ karmaṇāṃ triguṇātmanām|| 13"],"meaning":"सृष्टिकार्यमें समर्थ ब्रह्माजीने असुर और नागोंके लिये पृथ्वीके नीचे अतल, वितल, सुतल आदि सात पाताल बनाये। इन्हीं तीनों लोकोंमें त्रिगुणात्मक कर्मोंके अनुसार विविध गतियाँ प्राप्त होती हैं॥ १३॥"},{"id":"11.24.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/14/","page":865,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["योगस्य तपसश्‍चैव न्यासस्य गतयोऽमलाः।","महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः॥ १४"],"iast":["yogasya tapasaścaiva nyāsasya gatayo'malāḥ|","maharjanastapaḥ satyaṃ bhaktiyogasya madgatiḥ|| 14"],"meaning":"योग, तपस्या और संन्यासके द्वारा महर्लोक, जनलोक, तपलोक और सत्यलोकरूप उत्तम गति प्राप्त होती है तथा भक्तियोगसे मेरा परम धाम मिलता है॥ १४॥"},{"id":"11.24.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/15/","page":865,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत्।","गुणप्रवाह एतस्मिन्‍नुन्मज्जति निमज्जति॥ १५"],"iast":["mayā kālātmanā dhātrā karmayuktamidaṃ jagat|","guṇapravāha etasminnunmajjati nimajjati|| 15"],"meaning":"यह सारा जगत् कर्म और उनके संस्कारोंसे युक्त है। मैं ही कालरूपसे कर्मोंके अनुसार उनके फलका विधान करता हूँ। इस गुणप्रवाहमें पड़कर जीव कभी डूब जाता है और कभी ऊपर आ जाता है—कभी उसकी अधोगति होती है और कभी उसे पुण्यवश उच्चगति प्राप्त हो जाती है॥ १५॥"},{"id":"11.24.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/16/","page":865,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अणुर्बृहत् कृशः स्थूलो यो यो भावः प्रसिध्यति।","सर्वोऽप्युभयसंयुक्तः प्रकृत्या पुरुषेण च॥ १६"],"iast":["aṇurbṛhat kṛśaḥ sthūlo yo yo bhāvaḥ prasidhyati|","sarvo'pyubhayasaṃyuktaḥ prakṛtyā puruṣeṇa ca|| 16"],"meaning":"जगत‍्में छोटे-बड़े, मोटे-पतले—जितने भी पदार्थ बनते हैं, सब प्रकृति और पुरुष दोनोंके संयोगसे ही सिद्ध होते है॥ १६॥"},{"id":"11.24.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/17/","page":865,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यस्तु यस्यादिरन्तश्‍च स वै मध्यं च तस्य सन्।","विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः॥ १७"],"iast":["yastu yasyādirantaśca sa vai madhyaṃ ca tasya san|","vikāro vyavahārārtho yathā taijasapārthivāḥ|| 17"],"meaning":"जिसके आदि और अन्तमें जो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है। विकार तो केवल व्यवहारके लिये की हुई कल्पनामात्र है। जैसे कंगन-कुण्डल आदि सोनेके विकार और घड़े-सकोरे आदि मिट्टीके विकार पहले सोना या मिट्टी ही थे, बादमें भी सोना या मिट्टी ही रहेंगे। अतः बीचमें भी वे सोना या मिट्टी ही हैं। पूर्ववर्ती कारण (महत्तत्त्व आदि) भी जिस परम कारणको उपादान बनाकर अपर (अहंकार आदि) कार्य-वर्गकी सृष्टि करते हैं, वही उनकी अपेक्षा भी परम सत्य है। तात्पर्य यह कि जब जो जिस किसी भी कार्यके आदि और अन्तमें विद्यमान रहता है, वही सत्य है॥ १७-१८॥","meaning_covers":[17,18]},{"id":"11.24.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/18/","page":865,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुतेऽपरम्।","आदिरन्तो यदा यस्य तत् सत्यमभिधीयते॥ १८"],"iast":["yadupādāya pūrvastu bhāvo vikurute'param|","ādiranto yadā yasya tat satyamabhidhīyate|| 18"],"meaning":"जिसके आदि और अन्तमें जो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है। विकार तो केवल व्यवहारके लिये की हुई कल्पनामात्र है। जैसे कंगन-कुण्डल आदि सोनेके विकार और घड़े-सकोरे आदि मिट्टीके विकार पहले सोना या मिट्टी ही थे, बादमें भी सोना या मिट्टी ही रहेंगे। अतः बीचमें भी वे सोना या मिट्टी ही हैं। पूर्ववर्ती कारण (महत्तत्त्व आदि) भी जिस परम कारणको उपादान बनाकर अपर (अहंकार आदि) कार्य-वर्गकी सृष्टि करते हैं, वही उनकी अपेक्षा भी परम सत्य है। तात्पर्य यह कि जब जो जिस किसी भी कार्यके आदि और अन्तमें विद्यमान रहता है, वही सत्य है॥ १७-१८॥","meaning_covers":[17,18]},{"id":"11.24.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/19/","page":865,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः।","सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत्त्रितयं त्वहम्॥ १९"],"iast":["prakṛtirhyasyopādānamādhāraḥ puruṣaḥ paraḥ|","sato'bhivyañjakaḥ kālo brahma tattritayaṃ tvaham|| 19"],"meaning":"इस प्रपंचका उपादान-कारण प्रकृति है, परमात्मा अधिष्ठान है और इसको प्रकट करनेवाला काल है। व्यवहार-कालकी यह त्रिविधता वस्तुतः ब्रह्मस्वरूप है और मैं वही शुद्ध ब्रह्म हूँ॥ १९॥"},{"id":"11.24.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/20/","page":865,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः।","महान् गुणविसर्गार्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्॥ २०"],"iast":["sargaḥ pravartate tāvat paurvāparyeṇa nityaśaḥ|","mahān guṇavisargārthaḥ sthityanto yāvadīkṣaṇam|| 20"],"meaning":"जबतक परमात्माकी ईक्षणशक्ति अपना काम करती रहती है, जबतक उनकी पालन-प्रवृत्ति बनी रहती है, तबतक जीवोंके कर्मभोगके लिये कारण-कार्यरूपसे अथवा पिता-पुत्रादिके रूपसे यह सृष्टिचक्र निरन्तर चलता रहता है॥ २०॥"},{"id":"11.24.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/21/","page":865,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः।","पंचत्वाय विशेषाय कल्पते भुवनैः सह॥ २१"],"iast":["virāṇmayā''sādyamāno lokakalpavikalpakaḥ|","paṃcatvāya viśeṣāya kalpate bhuvanaiḥ saha|| 21"],"meaning":"यह विराट् ही विविध लोकोंकी सृष्टि, स्थिति और संहारकी लीलाभूमि है। जब मैं कालरूपसे इसमें व्याप्त होता हूँ, प्रलयका संकल्प करता हूँ, तब यह भुवनोंके साथ विनाशरूप विभागके योग्य हो जाता है॥ २१॥"},{"id":"11.24.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/22/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अन्‍ने प्रलीयते मर्त्यमन्‍नं धानासु लीयते।","धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते॥ २२"],"iast":["anne pralīyate martyamannaṃ dhānāsu līyate|","dhānā bhūmau pralīyante bhūmirgandhe pralīyate|| 22"],"meaning":"उसके लीन होनेकी प्रक्रिया यह है कि प्राणियोंके शरीर अन्‍नमें, अन्‍न बीजमें, बीज भूमिमें और भूमि गन्ध-तन्मात्रामें लीन हो जाती है॥ २२॥"},{"id":"11.24.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/23/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अप्सु प्रलीयते गन्ध आपश्‍च स्वगुणे रसे।","लीयते ज्योतिषि रसो ज्योती रूपे प्रलीयते॥ २३"],"iast":["apsu pralīyate gandha āpaśca svaguṇe rase|","līyate jyotiṣi raso jyotī rūpe pralīyate|| 23"],"meaning":"गन्ध जलमें, जल अपने गुण रसमें, रस तेजमें और तेज रूपमें लीन हो जाता है॥ २३॥"},{"id":"11.24.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/24/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["रूपं वायौ स च स्पर्शे लीयते सोऽपि चाम्बरे।","अम्बरं शब्दतन्मात्र इन्द्रियाणि स्वयोनिषु॥ २४"],"iast":["rūpaṃ vāyau sa ca sparśe līyate so'pi cāmbare|","ambaraṃ śabdatanmātra indriyāṇi svayoniṣu|| 24"],"meaning":"रूप वायुमें, वायु स्पर्शमें, स्पर्श आकाशमें तथा आकाश शब्दतन्मात्रामें लीन हो जाता है। इन्द्रियाँ अपने कारण देवताओंमें और अन्ततः राजस अहंकारमें समा जाती हैं॥ २४॥"},{"id":"11.24.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/25/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्‍वरे।","शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः॥ २५"],"iast":["yonirvaikārike saumya līyate manasīśvare|","śabdo bhūtādimapyeti bhūtādirmahati prabhuḥ|| 25"],"meaning":"हे सौम्य! राजस अहंकार अपने नियन्ता सात्त्विक अहंकाररूप मनमें, शब्दतन्मात्रा पंचभूतोंके कारण तामस अहंकारमें और सारे जगत‍्को मोहित करनेमें समर्थ त्रिविध अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है॥ २५॥"},{"id":"11.24.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/26/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः।","तेऽव्यक्ते संप्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये॥ २६"],"iast":["sa līyate mahān sveṣu guṇeṣu guṇavattamaḥ|","te'vyakte saṃpralīyante tat kāle līyate'vyaye|| 26"],"meaning":"ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिप्रधान महत्तत्त्व अपने कारण गुणोंमें लीन हो जाता है। गुण अव्यक्त प्रकृतिमें और प्रकृति अपने प्रेरक अविनाशी कालमें लीन हो जाती है॥ २६॥"},{"id":"11.24.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/27/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे।","आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः॥ २७"],"iast":["kālo māyāmaye jīve jīva ātmani mayyaje|","ātmā kevala ātmastho vikalpāpāyalakṣaṇaḥ|| 27"],"meaning":"काल मायामय जीवमें और जीव मुझ अजन्मा आत्मामें लीन हो जाता है। आत्मा किसीमें लीन नहीं होता, वह उपाधिरहित अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है। वह जगत‍्की सृष्टि और लयका अधिष्ठान एवं अवधि है॥ २७॥"},{"id":"11.24.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/28/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रमः।","मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्‍नीवार्कोदये तमः॥ २८"],"iast":["evamanvīkṣamāṇasya kathaṃ vaikalpiko bhramaḥ|","manaso hṛdi tiṣṭheta vyomnīvārkodaye tamaḥ|| 28"],"meaning":"उद्धवजी! जो इस प्रकार विवेकदृष्टिसे देखता है उसके चित्तमें यह प्रपंचका भ्रम हो ही नहीं सकता। यदि कदाचित् उसकी स्फूर्ति हो भी जाय तो वह अधिक कालतक हृदयमें ठहर कैसे सकता है? क्या सूर्योदय होनेपर भी आकाशमें अन्धकार ठहर सकता है॥ २८॥"},{"id":"11.24.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/29/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एष सांख्यविधिः प्रोक्तः संशयग्रन्थिभेदनः।","प्रतिलोमानुलोमाभ्यां परावरदृशा मया॥ २९"],"iast":["eṣa sāṃkhyavidhiḥ proktaḥ saṃśayagranthibhedanaḥ|","pratilomānulomābhyāṃ parāvaradṛśā mayā|| 29"],"meaning":"उद्धवजी! मैं कार्य और कारण दोनोंका ही साक्षी हूँ। मैंने तुम्हें सृष्टिसे प्रलय और प्रलयसे सृष्टितककी सांख्यविधि बतला दी। इससे सन्देहकी गाँठ कट जाती है और पुरुष अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है॥ २९॥"}],"text":[{"b":41126,"kind":"adhyaya_heading","page":863,"text":"अथ चतुर्विंशोऽध्यायः"},{"b":41127,"kind":"topic_heading","page":863,"text":"सांख्ययोग"},{"b":41128,"kind":"topic_heading","page":862,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":41129,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.24.1"],"text":"अथ ते संप्रवक्ष्यामि सांख्यं पूर्वैर्विनिश्‍चितम्।"},{"b":41130,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.24.1"],"text":"यद् विज्ञाय पुमान् सद्यो जह्याद् वैकल्पिकं भ्रमम्॥ १"},{"b":41131,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.24.2"],"text":"आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।"},{"b":41132,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.24.2"],"text":"यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगेऽयुगे॥ २"},{"b":41133,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.24.3"],"text":"तन्मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम्।"},{"b":41134,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.24.3"],"text":"वाङ्मनोऽगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत्॥ ३"},{"b":41135,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.4"],"text":"तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका।"},{"b":41136,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.4"],"text":"ज्ञानं त्वन्यतमो भावः पुरुषः सोऽभिधीयते॥ ४"},{"b":41137,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.5"],"text":"तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः।"},{"b":41138,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.5"],"text":"मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन च॥ ५"},{"b":41139,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.6"],"text":"तेभ्यः समभवत् सूत्रं महान् सूत्रेण संयुतः।"},{"b":41140,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.6"],"text":"ततो विकुर्वतो जातोऽहंकारो यो विमोहनः॥ ६"},{"b":41141,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.7"],"text":"वैकारिकस्तैजसश्‍च तामसश्‍चेत्यहं त्रिवृत्।"},{"b":41142,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.7"],"text":"तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः॥ ७"},{"b":41143,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.8"],"text":"अर्थस्तन्मात्रिकाज्जज्ञे तामसादिन्द्रियाणि च।"},{"b":41144,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.8"],"text":"तैजसाद् देवता आसन्‍नेकादश च वैकृतात्॥ ८"},{"b":41145,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.9"],"text":"मया संचोदिता भावाः सर्वे संहत्यकारिणः।"},{"b":41146,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.9"],"text":"अण्डमुत्पादयामासुर्ममायतनमुत्तमम् ॥ ९"},{"b":41147,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.10"],"text":"तस्मिन्‍नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थितौ।"},{"b":41148,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.10"],"text":"मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्‍वाख्यं तत्र चात्मभूः॥ १०"},{"b":41149,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.11"],"text":"सोऽसृजत्तपसा युक्तो रजसा मदनुग्रहात्।"},{"b":41150,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.11"],"text":"लोकान् सपालान् विश्‍वात्मा भूर्भुवः स्वरिति त्रिधा॥ ११"},{"b":41151,"kind":"sanskrit_shloka","page":864,"verses":["11.24.12"],"text":"देवानामोक आसीत् स्वर्भूतानां च भुवः 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प्रसिध्यति।"},{"b":41160,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.16"],"text":"सर्वोऽप्युभयसंयुक्तः प्रकृत्या पुरुषेण च॥ १६"},{"b":41161,"kind":"hindi_commentary","page":863,"explains":["11.24.1","11.24.2","11.24.3","11.24.4","11.24.5","11.24.6","11.24.7","11.24.8","11.24.9","11.24.10","11.24.11","11.24.12","11.24.13","11.24.14","11.24.15","11.24.16"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्यारे उद्धव! अब मैं तुम्हें सांख्यशास्त्रका निर्णय सुनाता हूँ। प्राचीन कालके बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंने इसका निश्‍चय किया है। जब जीव इसे भलीभाँति समझ लेता है तो वह भेदबुद्धिमूलक सुख-दुःखादिरूप भ्रमका तत्काल त्याग कर देता है॥ १॥ युगोंसे पूर्व प्रलयकालमें आदिसत्ययुगमें और जब कभी मनुष्य विवेकनिपुण होते हैं—इन सभी अवस्थाओंमें यह सम्पूर्ण दृश्य और द्रष्टा, जगत् और जीव विकल्पशून्य किसी प्रकारके भेदभावसे रहित केवल ब्रह्म ही होते हैं॥ २॥ इसमें सन्देह नहीं कि ब्रह्ममें किसी प्रकारका विकल्प नहीं है, वह केवल—अद्वितीय सत्य है; मन और वाणीकी उसमें गति नहीं है। वह ब्रह्म ही माया और उसमें प्रतिबिम्बित जीवके रूपमें—दृश्य और द्रष्टाके रूपमें—दो भागोंमें विभक्त-सा हो गया॥ ३॥ उनमेंसे एक वस्तुको प्रकृति कहते हैं। उसीने जगत‍्में कार्य और कारणका रूप धारण किया है। दूसरी वस्तुको, जो ज्ञानस्वरूप है, पुरुष कहते हैं॥ ४॥ उद्धवजी! मैंने ही जीवोंके शुभ-अशुभ कर्मोंके अनुसार प्रकृतिको क्षुब्ध किया। तब उससे सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण प्रकट हुए॥ ५॥ उनसे क्रिया-शक्तिप्रधान सूत्र और ज्ञानशक्तिप्रधान महत्तत्त्व प्रकट हुए। वे दोनों परस्पर मिले हुए ही हैं। महत्तत्त्वमें विकार होनेपर अहंकार व्यक्त हुआ। यह अहंकार ही जीवोंको मोहमें डालनेवाला है॥ ६॥ वह तीन प्रकारका है—सात्त्विक, राजस और तामस। अहंकार पंचतन्मात्रा, इन्द्रिय और मनका कारण है; इसलिये वह जड-चेतन—उभयात्मक है॥ ७॥ तामस अहंकारसे पंचतन्मात्राएँ और उनसे पाँच भूतोंकी उत्पत्ति हुई। तथा राजस अहंकारसे इन्द्रियाँ और सात्त्विक अहंकारसे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ग्यारह देवता प्रकट हुए॥ ८॥ ये सभी पदार्थ मेरी प्रेरणासे एकत्र होकर परस्पर मिल गये और इन्होंने यह ब्रह्माण्ड-रूप अण्ड उत्पन्‍न किया। यह अण्ड मेरा उत्तम निवास-स्थान है॥ ९॥ जब वह अण्ड जलमें स्थित हो गया, तब मैं नारायणरूपसे इसमें विराजमान हो गया। मेरी नाभिसे विश्‍वकमलकी उत्पत्ति हुई। उसीपर ब्रह्माका आविर्भाव हुआ॥ १०॥ विश्‍वसमष्टिके अन्तःकरण ब्रह्माने पहले बहुत बड़ी तपस्या की। उसके बाद मेरा कृपा-प्रसाद प्राप्त करके रजोगुणके द्वारा भूः, भुवः, स्वः अर्थात् पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग—इन तीन लोकोंकी और इनके लोकपालोंकी रचना की॥ ११॥ देवताओंके निवासके लिये स्वर्लोक, भूत-प्रेतादिके लिये भुवर्लोक (अन्तरिक्ष) और मनुष्य आदिके लिये भूर्लोक (पृथ्वीलोक) का निश्‍चय किया गया। इन तीनों लोकोंसे ऊपर महर्लोक, तपलोक आदि सिद्धोंके निवासस्थान हुए॥ १२॥ सृष्टिकार्यमें समर्थ ब्रह्माजीने असुर और नागोंके लिये पृथ्वीके नीचे अतल, वितल, सुतल आदि सात पाताल बनाये। इन्हीं तीनों लोकोंमें त्रिगुणात्मक कर्मोंके अनुसार विविध गतियाँ प्राप्त होती हैं॥ १३॥ योग, तपस्या और संन्यासके द्वारा महर्लोक, जनलोक, तपलोक और सत्यलोकरूप उत्तम गति प्राप्त होती है तथा भक्तियोगसे मेरा परम धाम मिलता है॥ १४॥ यह सारा जगत् कर्म और उनके संस्कारोंसे युक्त है। मैं ही कालरूपसे कर्मोंके अनुसार उनके फलका विधान करता हूँ। इस गुणप्रवाहमें पड़कर जीव कभी डूब जाता है और कभी ऊपर आ जाता है—कभी उसकी अधोगति होती है और कभी उसे पुण्यवश उच्चगति प्राप्त हो जाती है॥ १५॥ जगत‍्में छोटे-बड़े, मोटे-पतले—जितने भी पदार्थ बनते हैं, सब प्रकृति और पुरुष दोनोंके संयोगसे ही सिद्ध होते है॥ १६॥"},{"b":41162,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.17"],"text":"यस्तु यस्यादिरन्तश्‍च स वै मध्यं च तस्य सन्।"},{"b":41163,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.17"],"text":"विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः॥ १७"},{"b":41164,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.18"],"text":"यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुतेऽपरम्।"},{"b":41165,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.18"],"text":"आदिरन्तो यदा यस्य तत् सत्यमभिधीयते॥ १८"},{"b":41166,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.19"],"text":"प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः।"},{"b":41167,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.19"],"text":"सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत्त्रितयं त्वहम्॥ १९"},{"b":41168,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.20"],"text":"सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः।"},{"b":41169,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.20"],"text":"महान् गुणविसर्गार्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्॥ २०"},{"b":41170,"kind":"hindi_commentary","page":865,"explains":["11.24.17","11.24.18","11.24.19","11.24.20"],"text":"जिसके आदि और अन्तमें जो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है। विकार तो केवल व्यवहारके लिये की हुई कल्पनामात्र है। जैसे कंगन-कुण्डल आदि सोनेके विकार और घड़े-सकोरे आदि मिट्टीके विकार पहले सोना या मिट्टी ही थे, बादमें भी सोना या मिट्टी ही रहेंगे। अतः बीचमें भी वे सोना या मिट्टी ही हैं। पूर्ववर्ती कारण (महत्तत्त्व आदि) भी जिस परम कारणको उपादान बनाकर अपर (अहंकार आदि) कार्य-वर्गकी सृष्टि करते हैं, वही उनकी अपेक्षा भी परम सत्य है। तात्पर्य यह कि जब जो जिस किसी भी कार्यके आदि और अन्तमें विद्यमान रहता है, वही सत्य है॥ १७-१८॥ इस प्रपंचका उपादान-कारण प्रकृति है, परमात्मा अधिष्ठान है और इसको प्रकट करनेवाला काल है। व्यवहार-कालकी यह त्रिविधता वस्तुतः ब्रह्मस्वरूप है और मैं वही शुद्ध ब्रह्म हूँ॥ १९॥ जबतक परमात्माकी ईक्षणशक्ति अपना काम करती रहती है, जबतक उनकी पालन-प्रवृत्ति बनी रहती है, तबतक जीवोंके कर्मभोगके लिये कारण-कार्यरूपसे अथवा पिता-पुत्रादिके रूपसे यह सृष्टिचक्र निरन्तर चलता रहता है॥ २०॥"},{"b":41171,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.21"],"text":"विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः।"},{"b":41172,"kind":"sanskrit_shloka","page":865,"verses":["11.24.21"],"text":"पंचत्वाय विशेषाय कल्पते भुवनैः सह॥ २१"},{"b":41173,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.22"],"text":"अन्‍ने प्रलीयते मर्त्यमन्‍नं धानासु लीयते।"},{"b":41174,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.22"],"text":"धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते॥ २२"},{"b":41175,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.23"],"text":"अप्सु प्रलीयते गन्ध आपश्‍च स्वगुणे रसे।"},{"b":41176,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.23"],"text":"लीयते ज्योतिषि रसो ज्योती रूपे प्रलीयते॥ २३"},{"b":41177,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.24"],"text":"रूपं वायौ स च स्पर्शे लीयते सोऽपि चाम्बरे।"},{"b":41178,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.24"],"text":"अम्बरं शब्दतन्मात्र इन्द्रियाणि स्वयोनिषु॥ २४"},{"b":41179,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.25"],"text":"योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्‍वरे।"},{"b":41180,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.25"],"text":"शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः॥ २५"},{"b":41181,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.26"],"text":"स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः।"},{"b":41182,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.26"],"text":"तेऽव्यक्ते संप्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये॥ २६"},{"b":41183,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.27"],"text":"कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे।"},{"b":41184,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.27"],"text":"आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः॥ २७"},{"b":41185,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.28"],"text":"एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रमः।"},{"b":41186,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.28"],"text":"मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्‍नीवार्कोदये तमः॥ २८"},{"b":41187,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.29"],"text":"एष सांख्यविधिः प्रोक्तः संशयग्रन्थिभेदनः।"},{"b":41188,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.24.29"],"text":"प्रतिलोमानुलोमाभ्यां परावरदृशा मया॥ २९"},{"b":41189,"kind":"hindi_commentary","page":865,"explains":["11.24.21","11.24.22","11.24.23","11.24.24","11.24.25","11.24.26","11.24.27","11.24.28","11.24.29"],"text":"यह विराट् ही विविध लोकोंकी सृष्टि, स्थिति और संहारकी लीलाभूमि है। जब मैं कालरूपसे इसमें व्याप्त होता हूँ, प्रलयका संकल्प करता हूँ, तब यह भुवनोंके साथ विनाशरूप विभागके योग्य हो जाता है॥ २१॥ उसके लीन होनेकी प्रक्रिया यह है कि प्राणियोंके शरीर अन्‍नमें, अन्‍न बीजमें, बीज भूमिमें और भूमि गन्ध-तन्मात्रामें लीन हो जाती है॥ २२॥ गन्ध जलमें, जल अपने गुण रसमें, रस तेजमें और तेज रूपमें लीन हो जाता है॥ २३॥ रूप वायुमें, वायु स्पर्शमें, स्पर्श आकाशमें तथा आकाश शब्दतन्मात्रामें लीन हो जाता है। इन्द्रियाँ अपने कारण देवताओंमें और अन्ततः राजस अहंकारमें समा जाती हैं॥ २४॥ हे सौम्य! राजस अहंकार अपने नियन्ता सात्त्विक अहंकाररूप मनमें, शब्दतन्मात्रा पंचभूतोंके कारण तामस अहंकारमें और सारे जगत‍्को मोहित करनेमें समर्थ त्रिविध अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है॥ २५॥ ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिप्रधान महत्तत्त्व अपने कारण गुणोंमें लीन हो जाता है। गुण अव्यक्त प्रकृतिमें और प्रकृति अपने प्रेरक अविनाशी कालमें लीन हो जाती है॥ २६॥ काल मायामय जीवमें और जीव मुझ अजन्मा आत्मामें लीन हो जाता है। आत्मा किसीमें लीन नहीं होता, वह उपाधिरहित अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है। वह जगत‍्की सृष्टि और लयका अधिष्ठान एवं अवधि है॥ २७॥ उद्धवजी! जो इस प्रकार विवेकदृष्टिसे देखता है उसके चित्तमें यह प्रपंचका भ्रम हो ही नहीं सकता। यदि कदाचित् उसकी स्फूर्ति हो भी जाय तो वह अधिक कालतक हृदयमें ठहर कैसे सकता है? क्या सूर्योदय होनेपर भी आकाशमें अन्धकार ठहर सकता है॥ २८॥ उद्धवजी! मैं कार्य और कारण दोनोंका ही साक्षी हूँ। मैंने तुम्हें सृष्टिसे प्रलय और प्रलयसे सृष्टितककी सांख्यविधि बतला दी। इससे सन्देहकी गाँठ कट जाती है और पुरुष अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है॥ २९॥"},{"b":41190,"kind":"hindi_commentary","page":866,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे चतुर्विंशोऽध्यायः"},{"b":41191,"kind":"hindi_translation","page":866,"text":"॥ २४॥"}],"notes":[{"id":"v2:420","mark":"*","page":864,"after_verse":"11.24.16","text":"पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन—इस प्रकार ग्यारह इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ग्यारह देवता हैं।"}],"corrections":{"count":1,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}