{"id":"11.20","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 20","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथ विंशोऽध्यायः","topics":["ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.20.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[833,838]},"verses":[{"id":"11.20.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/1/","page":833,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["विधिश्‍च प्रतिषेधश्‍च निगमो हीश्‍वरस्य ते।","अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम्॥ १"],"iast":["vidhiśca pratiṣedhaśca nigamo hīśvarasya te|","avekṣate'ravindākṣa guṇaṃ doṣaṃ ca karmaṇām|| 1"],"meaning":"उद्धवजीने कहा—कमलनयन श्रीकृष्ण! आप सर्वशक्तिमान् हैं। आपकी आज्ञा ही वेद है; उसमें कुछ कर्मोंको करनेकी विधि है और कुछके करनेका निषेध है। यह विधि-निषेध कर्मोंके गुण और दोषकी परीक्षा करके ही तो होता है॥ १॥"},{"id":"11.20.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/2/","page":834,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["वर्णाश्रमविकल्पं च प्रतिलोमानुलोमजम्।","द्रव्यदेशवयःकालान् स्वर्गं नरकमेव च॥ २"],"iast":["varṇāśramavikalpaṃ ca pratilomānulomajam|","dravyadeśavayaḥkālān svargaṃ narakameva ca|| 2"],"meaning":"वर्णाश्रम-भेद, प्रतिलोम और अनुलोमरूप वर्णसंकर, कर्मोंके उपयुक्त और अनुपयुक्त द्रव्य, देश, आयु और काल तथा स्वर्ग और नरकके भेदोंका बोध भी वेदोंसे ही होता है॥ २॥"},{"id":"11.20.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/3/","page":834,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["गुणदोषभिदादृष्टिमन्तरेण वचस्तव।","निःश्रेयसं कथं नॄणां निषेधविधिलक्षणम्॥ ३"],"iast":["guṇadoṣabhidādṛṣṭimantareṇa vacastava|","niḥśreyasaṃ kathaṃ nṝṇāṃ niṣedhavidhilakṣaṇam|| 3"],"meaning":"इसमें सन्देह नहीं कि आपकी वाणी ही वेद है, परन्तु उसमें विधि-निषेध ही तो भरा पड़ा है। यदि उसमें गुण और दोषमें भेद करनेवाली दृष्टि न हो, तो वह प्राणियोंका कल्याण करनेमें समर्थ ही कैसे हो?॥ ३॥"},{"id":"11.20.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/4/","page":834,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["पितृदेवमनुष्याणां वेदश्‍चक्षुस्तवेश्‍वर।","श्रेयस्त्वनुपलब्धेऽर्थे साध्यसाधनयोरपि॥ ४"],"iast":["pitṛdevamanuṣyāṇāṃ vedaścakṣustaveśvara|","śreyastvanupalabdhe'rthe sādhyasādhanayorapi|| 4"],"meaning":"सर्वशक्तिमान् परमेश्‍वर! आपकी वाणी वेद ही पितर, देवता और मनुष्योंके लिये श्रेष्ठ मार्ग-दर्शकका काम करता है; क्योंकि उसीके द्वारा स्वर्ग-मोक्ष आदि अदृष्ट वस्तुओंका बोध होता है और इस लोकमें भी किसका कौन-सा साध्य है और क्या साधन—इसका निर्णय भी उसीसे होता है॥ ४॥"},{"id":"11.20.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/5/","page":834,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["गुणदोषभिदादृष्टिर्निगमात्ते न हि स्वतः।","निगमेनापवादश्‍च भिदाया इति ह भ्रमः॥ ५"],"iast":["guṇadoṣabhidādṛṣṭirnigamātte na hi svataḥ|","nigamenāpavādaśca bhidāyā iti ha bhramaḥ|| 5"],"meaning":"प्रभो! इसमें सन्देह नहीं कि गुण और दोषोंमें भेददृष्टि आपकी वाणी वेदके ही अनुसार है, किसीकी अपनी कल्पना नहीं; परन्तु प्रश्‍न तो यह है कि आपकी वाणी ही भेदका निषेध भी करती है। यह विरोध देखकर मुझे भ्रम हो रहा है। आप कृपा करके मेरा यह भ्रम मिटाइये॥ ५॥"},{"id":"11.20.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/6/","page":834,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया।","ज्ञानं कर्म च भक्तिश्‍च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥ ६"],"iast":["yogāstrayo mayā proktā nṛṇāṃ śreyovidhitsayā|","jñānaṃ karma ca bhaktiśca nopāyo'nyo'sti kutracit|| 6"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! मैंने ही वेदोंमें एवं अन्यत्र भी मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये अधिकारिभेदसे तीन प्रकारके योगोंका उपदेश किया है। वे हैं—ज्ञान, कर्म और भक्ति। मनुष्यके परम कल्याणके लिये इनके अतिरिक्त और कोई उपाय कहीं नहीं है॥ ६॥"},{"id":"11.20.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/7/","page":834,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु।","तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥ ७"],"iast":["nirviṇṇānāṃ jñānayogo nyāsināmiha karmasu|","teṣvanirviṇṇacittānāṃ karmayogastu kāminām|| 7"],"meaning":"उद्धवजी! जो लोग कर्मों तथा उनके फलोंसे विरक्त हो गये हैं और उनका त्याग कर चुके हैं, वे ज्ञानयोगके अधिकारी हैं। इसके विपरीत जिनके चित्तमें कर्मों और उनके फलोंसे वैराग्य नहीं हुआ है, उनमें दुःखबुद्धि नहीं हुई है, वे सकाम व्यक्ति कर्मयोगके अधिकारी हैं॥ ७॥"},{"id":"11.20.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/8/","page":834,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्।","न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥ ८"],"iast":["yadṛcchayā matkathādau jātaśraddhastu yaḥ pumān|","na nirviṇṇo nātisakto bhaktiyogo'sya siddhidaḥ|| 8"],"meaning":"जो पुरुष न तो अत्यन्त विरक्त है और न अत्यन्त आसक्त ही है तथा किसी पूर्वजन्मके शुभकर्मसे सौभाग्यवश मेरी लीला-कथा आदिमें उसकी श्रद्धा हो गयी है, वह भक्तियोगका अधिकारी है। उसे भक्तियोगके द्वारा ही सिद्धि मिल सकती है॥ ८॥"},{"id":"11.20.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/9/","page":835,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।","मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्‍न जायते॥ ९"],"iast":["tāvat karmāṇi kurvīta na nirvidyeta yāvatā|","matkathāśravaṇādau vā śraddhā yāvanna jāyate|| 9"],"meaning":"कर्मके सम्बन्धमें जितने भी विधि-निषेध हैं, उनके अनुसार तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक कर्ममय जगत् और उससे प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि सुखोंसे वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी लीला-कथाके श्रवण-कीर्तन आदिमें श्रद्धा न हो जाय॥ ९॥"},{"id":"11.20.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/10/","page":835,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशीःकाम उद्धव।","न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्‍न समाचरेत्॥ १०"],"iast":["svadharmastho yajan yajñairanāśīḥkāma uddhava|","na yāti svarganarakau yadyanyanna samācaret|| 10"],"meaning":"उद्धव! इस प्रकार अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें स्थित रहकर यज्ञोंके द्वारा बिना किसी आशा और कामनाके मेरी आराधना करता रहे और निषिद्ध कर्मोंसे दूर रहकर केवल विहित कर्मोंका ही आचरण करे तो उसे स्वर्ग या नरकमें नहीं जाना पड़ता॥ १०॥"},{"id":"11.20.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/11/","page":835,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अस्मिँल्लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोऽनघः शुचिः।","ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया॥ ११"],"iast":["asmim̐lloke vartamānaḥ svadharmastho'naghaḥ śuciḥ|","jñānaṃ viśuddhamāpnoti madbhaktiṃ vā yadṛcchayā|| 11"],"meaning":"अपने धर्ममें निष्ठा रखनेवाला पुरुष इस शरीरमें रहते-रहते ही निषिद्ध कर्मका परित्याग कर देता है और रागादि मलोंसे भी मुक्त—पवित्र हो जाता है। इसीसे अनायास ही उसे आत्मसाक्षात्काररूप विशुद्ध तत्त्वज्ञान अथवा द्रुत-चित्त होनेपर मेरी भक्ति प्राप्त होती है॥ ११॥"},{"id":"11.20.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/12/","page":835,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वर्गिणोऽप्येतमिच्छन्ति लोकं निरयिणस्तथा।","साधकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तदसाधकम्॥ १२"],"iast":["svargiṇo'pyetamicchanti lokaṃ nirayiṇastathā|","sādhakaṃ jñānabhaktibhyāmubhayaṃ tadasādhakam|| 12"],"meaning":"यह विधि-निषेधरूप कर्मका अधिकारी मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकोंमें रहनेवाले जीव इसकी अभिलाषा करते रहते हैं; क्योंकि इसी शरीरमें अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर ज्ञान अथवा भक्तिकी प्राप्ति हो सकती है, स्वर्ग अथवा नरकका भोगप्रधान शरीर किसी भी साधनके उपयुक्त नहीं है। बुद्धिमान् पुरुषको न तो स्वर्गकी अभिलाषा करनी चाहिये और न नरककी ही। और तो क्या, इस मनुष्य-शरीरकी भी कामना न करनी चाहिये; क्योंकि किसी भी शरीरमें गुणबुद्धि और अभिमान हो जानेसे अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्तिके साधनमें प्रमाद होने लगता है॥ १२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"11.20.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/13/","page":835,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न नरः स्वर्गतिं कांक्षेन्‍नारकीं वा विचक्षणः।","नेमं लोकं च कांक्षेत देहावेशात् प्रमाद्यति॥ १३"],"iast":["na naraḥ svargatiṃ kāṃkṣennārakīṃ vā vicakṣaṇaḥ|","nemaṃ lokaṃ ca kāṃkṣeta dehāveśāt pramādyati|| 13"],"meaning":"यह विधि-निषेधरूप कर्मका अधिकारी मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकोंमें रहनेवाले जीव इसकी अभिलाषा करते रहते हैं; क्योंकि इसी शरीरमें अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर ज्ञान अथवा भक्तिकी प्राप्ति हो सकती है, स्वर्ग अथवा नरकका भोगप्रधान शरीर किसी भी साधनके उपयुक्त नहीं है। बुद्धिमान् पुरुषको न तो स्वर्गकी अभिलाषा करनी चाहिये और न नरककी ही। और तो क्या, इस मनुष्य-शरीरकी भी कामना न करनी चाहिये; क्योंकि किसी भी शरीरमें गुणबुद्धि और अभिमान हो जानेसे अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्तिके साधनमें प्रमाद होने लगता है॥ १२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"11.20.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/14/","page":835,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतद् विद्वान् पुरा मृत्योरभवाय घटेत सः।","अप्रमत्त इदं ज्ञात्वा मर्त्यमप्यर्थसिद्धिदम्॥ १४"],"iast":["etad vidvān purā mṛtyorabhavāya ghaṭeta saḥ|","apramatta idaṃ jñātvā martyamapyarthasiddhidam|| 14"],"meaning":"यद्यपि यह मनुष्य-शरीर है तो मृत्युग्रस्त ही, परन्तु इसके द्वारा परमार्थकी—सत्य वस्तुकी प्राप्ति हो सकती है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि यह बात जानकर मृत्यु होनेके पूर्व ही सावधान होकर ऐसी साधना कर ले, जिससे वह जन्म-मृत्युके चक्करसे सदाके लिये छूट जाय—मुक्त हो जाय॥ १४॥"},{"id":"11.20.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/15/","page":835,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["छिद्यमानं यमैरेतैः कृतनीडं वनस्पतिम्।","खगः स्वकेतमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलम्पटः॥ १५"],"iast":["chidyamānaṃ yamairetaiḥ kṛtanīḍaṃ vanaspatim|","khagaḥ svaketamutsṛjya kṣemaṃ yāti hyalampaṭaḥ|| 15"],"meaning":"यह शरीर एक वृक्ष है। इसमें घोंसला बनाकर जीवरूप पक्षी निवास करता है। इसे यमराजके दूत प्रतिक्षण काट रहे हैं। जैसे पक्षी कटते हुए वृक्षको छोड़कर उड़ जाता है, वैसे ही अनासक्त जीव भी इस शरीरको छोड़कर मोक्षका भागी बन जाता है। परन्तु आसक्त जीव दुःख ही भोगता रहता है॥ १५॥"},{"id":"11.20.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/16/","page":836,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद‍्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथुः।","मुक्तसंगः परं बुद‍्ध्वा निरीह उपशाम्यति॥ १६"],"iast":["ahorātraiśchidyamānaṃ buddhvā''yurbhayavepathuḥ|","muktasaṃgaḥ paraṃ buddhvā nirīha upaśāmyati|| 16"],"meaning":"प्रिय उद्धव! ये दिन और रात क्षण-क्षणमें शरीरकी आयुको क्षीण कर रहे हैं। यह जानकर जो भयसे काँप उठता है, वह व्यक्ति इसमें आसक्ति छोड़कर परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है और फिर इसके जीवन-मरणसे निरपेक्ष होकर अपने आत्मामें ही शान्त हो जाता है॥ १६॥"},{"id":"11.20.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/17/","page":836,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं","प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।","मयानुकूलेन नभस्वतेरितं","पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा॥ १७"],"iast":["nṛdehamādyaṃ sulabhaṃ sudurlabhaṃ","plavaṃ sukalpaṃ gurukarṇadhāram|","mayānukūlena nabhasvateritaṃ","pumān bhavābdhiṃ na taret sa ātmahā|| 17"],"meaning":"यह मनुष्य-शरीर समस्त शुभ फलोंकी प्राप्तिका मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी अनायास सुलभ हो गया है। इस संसार-सागरसे पार जानेके लिये यह एक सुदृढ़ नौका है। शरण-ग्रहणमात्रसे ही गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवारका संचालन करने लगते हैं और स्मरणमात्रसे ही मैं अनुकूल वायुके रूपमें इसे लक्ष्यकी ओर बढ़ाने लगता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो इस शरीरके द्वारा संसार-सागरसे पार नहीं हो जाता, वह तो अपने हाथों अपने आत्माका हनन—अधःपतन कर रहा है॥ १७॥"},{"id":"11.20.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/18/","page":836,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्तः संयतेन्द्रियः।","अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः॥ १८"],"iast":["yadā''rambheṣu nirviṇṇo viraktaḥ saṃyatendriyaḥ|","abhyāsenātmano yogī dhārayedacalaṃ manaḥ|| 18"],"meaning":"प्रिय उद्धव! जब पुरुष दोषदर्शनके कारण कर्मोंसे उद्वि‌ग्‍न और विरक्त हो जाय, तब जितेन्द्रिय होकर वह योगमें स्थित हो जाय और अभ्यास—आत्मानुसन्धानके द्वारा अपना मन मुझ परमात्मामें निश्‍चलरूपसे धारण करे॥ १८॥"},{"id":"11.20.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/19/","page":836,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्‍वनवस्थितम्।","अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्॥ १९"],"iast":["dhāryamāṇaṃ mano yarhi bhrāmyadāśvanavasthitam|","atandrito'nurodhena mārgeṇātmavaśaṃ nayet|| 19"],"meaning":"जब स्थिर करते समय मन चंचल होकर इधर-उधर भटकने लगे, तब झटपट बड़ी सावधानीसे उसे मनाकर, समझा-बुझाकर, फुसलाकर अपने वशमें कर ले॥ १९॥"},{"id":"11.20.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/20/","page":836,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मनोगतिं न विसृजेज्जितप्राणो जितेन्द्रियः।","सत्त्वसम्पन्‍नया बुद्ध्या मन आत्मवशं नयेत्॥ २०"],"iast":["manogatiṃ na visṛjejjitaprāṇo jitendriyaḥ|","sattvasampannayā buddhyā mana ātmavaśaṃ nayet|| 20"],"meaning":"इन्द्रियों और प्राणोंको अपने वशमें रखे और मनको एक क्षणके लिये भी स्वतन्त्र न छोड़े। उसकी एक-एक चाल, एक-एक हरकतको देखता रहे। इस प्रकार सत्त्वसम्पन्‍न बुद्धिके द्वारा धीरे-धीरे मनको अपने वशमें कर लेना चाहिये॥ २०॥"},{"id":"11.20.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/21/","page":836,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः।","हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवार्वतो मुहुः॥ २१"],"iast":["eṣa vai paramo yogo manasaḥ saṃgrahaḥ smṛtaḥ|","hṛdayajñatvamanvicchan damyasyevārvato muhuḥ|| 21"],"meaning":"जैसे सवार घोड़ेको अपने वशमें करते समय उसे अपने मनो-भावकी पहचान कराना चाहता है—अपनी इच्छाके अनुसार उसे चलाना चाहता है और बार-बार फुसलाकर उसे अपने वशमें कर लेता है, वैसे ही मनको फुसलाकर, उसे मीठी-मीठी बातें सुनाकर वशमें कर लेना भी परम योग है॥ २१॥"},{"id":"11.20.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/22/","page":837,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सांख्येन सर्वभावानां प्रतिलोमानुलोमतः।","भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत् प्रसीदति॥ २२"],"iast":["sāṃkhyena sarvabhāvānāṃ pratilomānulomataḥ|","bhavāpyayāvanudhyāyenmano yāvat prasīdati|| 22"],"meaning":"सांख्यशास्त्रमें प्रकृतिसे लेकर शरीरपर्यन्त सृष्टिका जो क्रम बतलाया गया है, उसके अनुसार सृष्टि-चिन्तन करना चाहिये और जिस क्रमसे शरीर आदिका प्रकृतिमें लय बताया गया है, उस प्रकार लय-चिन्तन करना चाहिये। यह क्रम तबतक जारी रखना चाहिये, जबतक मन शान्त—स्थिर न हो जाय॥ २२॥"},{"id":"11.20.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/23/","page":837,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिनः।","मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया॥ २३"],"iast":["nirviṇṇasya viraktasya puruṣasyoktavedinaḥ|","manastyajati daurātmyaṃ cintitasyānucintayā|| 23"],"meaning":"जो पुरुष संसारसे विरक्त हो गया है और जिसे संसारके पदार्थोंमें दुःख-बुद्धि हो गयी है, वह अपने गुरुजनोंके उपदेशको भलीभाँति समझकर बार-बार अपने स्वरूपके ही चिन्तनमें संल‌ग्‍न रहता है। इस अभ्याससे बहुत शीघ्र ही उसका मन अपनी वह चंचलता, जो अनात्मा शरीर आदिमें आत्मबुद्धि करनेसे हुई है, छोड़ देता है॥ २३॥"},{"id":"11.20.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/24/","page":837,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यमादिभिर्योगपथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया।","ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मनः॥ २४"],"iast":["yamādibhiryogapathairānvīkṣikyā ca vidyayā|","mamārcopāsanābhirvā nānyairyogyaṃ smarenmanaḥ|| 24"],"meaning":"यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि योगमार्गोंसे, वस्तुतत्त्वका निरीक्षण-परीक्षण करनेवाली आत्मविद्यासे तथा मेरी प्रतिमाकी उपासनासे—अर्थात् कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगसे मन परमात्माका चिन्तन करने लगता है; और कोई उपाय नहीं है॥ २४॥"},{"id":"11.20.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/25/","page":837,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदि कुर्यात् प्रमादेन योगी कर्म विगर्हितम्।","योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन॥ २५"],"iast":["yadi kuryāt pramādena yogī karma vigarhitam|","yogenaiva dahedaṃho nānyattatra kadācana|| 25"],"meaning":"उद्धवजी! वैसे तो योगी कभी कोई निन्दित कर्म करता ही नहीं; परन्तु यदि कभी उससे प्रमादवश कोई अपराध बन जाय तो योगके द्वारा ही उस पापको जला डाले, कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि दूसरे प्रायश्‍चित्त कभी न करे॥ २५॥"},{"id":"11.20.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/26/","page":837,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः।","कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः।","गुणदोषविधानेन संगानां त्याजनेच्छया॥ २६"],"iast":["sve sve'dhikāre yā niṣṭhā sa guṇaḥ parikīrtitaḥ|","karmaṇāṃ jātyaśuddhānāmanena niyamaḥ kṛtaḥ|","guṇadoṣavidhānena saṃgānāṃ tyājanecchayā|| 26"],"meaning":"अपने-अपने अधिकारमें जो निष्ठा है, वही गुण कहा गया है। इस गुण-दोष और विधि-निषेधके विधानसे यही तात्पर्य निकलता है कि किसी प्रकार विषयासक्तिका परित्याग हो जाय; क्योंकि कर्म तो जन्मसे ही अशुद्ध हैं, अनर्थके मूल हैं। शास्त्रका तात्पर्य उनका नियन्त्रण, नियम ही है। जहाँतक हो सके प्रवृत्तिका संकोच ही करना चाहिये॥ २६॥"},{"id":"11.20.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/27/","page":837,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्णः सर्वकर्मसु।","वेद दुःखात्मकान् कामान् परित्यागेऽप्यनीश्‍वरः॥ २७"],"iast":["jātaśraddho matkathāsu nirviṇṇaḥ sarvakarmasu|","veda duḥkhātmakān kāmān parityāge'pyanīśvaraḥ|| 27"],"meaning":"जो साधक समस्त कर्मोंसे विरक्त हो गया हो, उनमें दुःखबुद्धि रखता हो, मेरी लीलाकथाके प्रति श्रद्धालु हो और यह भी जानता हो कि सभी भोग और भोगवासनाएँ दुःखरूप हैं, किन्तु इतना सब जानकर भी जो उनके परित्यागमें समर्थ न हो, उसे चाहिये कि उन भोगोंको तो भोग ले; परन्तु उन्हें सच्चे हृदयसे दुःखजनक समझे और मन-ही-मन उनकी निन्दा करे तथा उसे अपना दुर्भाग्य ही समझे। साथ ही इस दुविधाकी स्थितिसे छुटकारा पानेके लिये श्रद्धा, दृढ़ निश्‍चय और प्रेमसे मेरा भजन करे॥ २७-२८॥","meaning_covers":[27,28]},{"id":"11.20.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/28/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ततो भजेत मां प्रीतः श्रद्धालुर्दृढनिश्‍चयः।","जुषमाणश्‍च तान् कामान् दुःखोदर्कांश्‍च गर्हयन्॥ २८"],"iast":["tato bhajeta māṃ prītaḥ śraddhālurdṛḍhaniścayaḥ|","juṣamāṇaśca tān kāmān duḥkhodarkāṃśca garhayan|| 28"],"meaning":"जो साधक समस्त कर्मोंसे विरक्त हो गया हो, उनमें दुःखबुद्धि रखता हो, मेरी लीलाकथाके प्रति श्रद्धालु हो और यह भी जानता हो कि सभी भोग और भोगवासनाएँ दुःखरूप हैं, किन्तु इतना सब जानकर भी जो उनके परित्यागमें समर्थ न हो, उसे चाहिये कि उन भोगोंको तो भोग ले; परन्तु उन्हें सच्चे हृदयसे दुःखजनक समझे और मन-ही-मन उनकी निन्दा करे तथा उसे अपना दुर्भाग्य ही समझे। साथ ही इस दुविधाकी स्थितिसे छुटकारा पानेके लिये श्रद्धा, दृढ़ निश्‍चय और प्रेमसे मेरा भजन करे॥ २७-२८॥","meaning_covers":[27,28]},{"id":"11.20.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/29/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रोक्तेन भक्तियोगेन भजतो मासकृन्मुनेः।","कामा हृदय्या नश्यन्ति सर्वे मयि हृदि स्थिते॥ २९"],"iast":["proktena bhaktiyogena bhajato māsakṛnmuneḥ|","kāmā hṛdayyā naśyanti sarve mayi hṛdi sthite|| 29"],"meaning":"इस प्रकार मेरे बतलाये हुए भक्तियोगके द्वारा निरन्तर मेरा भजन करनेसे मैं उस साधकके हृदयमें आकर बैठ जाता हूँ और मेरे विराजमान होते ही उसके हृदयकी सारी वासनाएँ अपने संस्कारोंके साथ नष्ट हो जाती हैं॥ २९॥"},{"id":"11.20.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/30/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।","क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि॥ ३०"],"iast":["bhidyate hṛdayagranthiśchidyante sarvasaṃśayāḥ|","kṣīyante cāsya karmāṇi mayi dṛṣṭe'khilātmani|| 30"],"meaning":"इस तरह जब उसे मुझ सर्वात्माका साक्षात्कार हो जाता है, तब तो उसके हृदयकी गाँठ टूट जाती है, उसके सारे संशय छिन्‍न-भिन्‍न हो जाते हैं और कर्म-वासनाएँ सर्वथा क्षीण हो जाती हैं॥ ३०॥"},{"id":"11.20.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/31/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः।","न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह॥ ३१"],"iast":["tasmānmadbhaktiyuktasya yogino vai madātmanaḥ|","na jñānaṃ na ca vairāgyaṃ prāyaḥ śreyo bhavediha|| 31"],"meaning":"इसीसे जो योगी मेरी भक्तिसे युक्त और मेरे चिन्तनमें म‌ग्‍न रहता है, उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्यकी आवश्यकता नहीं होती। उसका कल्याण तो प्रायः मेरी भक्तिके द्वारा ही हो जाता है॥ ३१॥"},{"id":"11.20.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/32/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यत् कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्‍च यत्।","योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि॥ ३२"],"iast":["yat karmabhiryattapasā jñānavairāgyataśca yat|","yogena dānadharmeṇa śreyobhiritarairapi|| 32"],"meaning":"कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योगाभ्यास, दान, धर्म और दूसरे कल्याणसाधनोंसे जो कुछ स्वर्ग, अपवर्ग, मेरा परम धाम अथवा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है, वह सब मेरा भक्त मेरे भक्तियोगके प्रभावसे ही, यदि चाहे तो, अनायास प्राप्त कर लेता है॥ ३२-३३॥","meaning_covers":[32,33]},{"id":"11.20.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/33/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा।","स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथंचिद् यदि वाञ्छति॥ ३३"],"iast":["sarvaṃ madbhaktiyogena madbhakto labhate'ñjasā|","svargāpavargaṃ maddhāma kathaṃcid yadi vāñchati|| 33"],"meaning":"कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योगाभ्यास, दान, धर्म और दूसरे कल्याणसाधनोंसे जो कुछ स्वर्ग, अपवर्ग, मेरा परम धाम अथवा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है, वह सब मेरा भक्त मेरे भक्तियोगके प्रभावसे ही, यदि चाहे तो, अनायास प्राप्त कर लेता है॥ ३२-३३॥","meaning_covers":[32,33]},{"id":"11.20.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/34/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न किंचित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम।","वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ ३४"],"iast":["na kiṃcit sādhavo dhīrā bhaktā hyekāntino mama|","vāñchantyapi mayā dattaṃ kaivalyamapunarbhavam|| 34"],"meaning":"मेरे अनन्यप्रेमी एवं धैर्यवान् साधु भक्त स्वयं तो कुछ चाहते ही नहीं; यदि मैं उन्हें देना चाहता हूँ और देता भी हूँ तो भी दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या—वे कैवल्य-मोक्ष भी नहीं लेना चाहते॥ ३४॥"},{"id":"11.20.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/35/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमनल्पकम्।","तस्मान्‍निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत्॥ ३५"],"iast":["nairapekṣyaṃ paraṃ prāhurniḥśreyasamanalpakam|","tasmānnirāśiṣo bhaktirnirapekṣasya me bhavet|| 35"],"meaning":"उद्धवजी! सबसे श्रेष्ठ एवं महान् निःश्रेयस (परम कल्याण) तो निरपेक्षताका ही दूसरा नाम है। इसलिये जो निष्काम और निरपेक्ष होता है, उसीको मेरी भक्ति प्राप्त होती है॥ ३५॥"},{"id":"11.20.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/36/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः।","साधूनां समचित्तानां बुद्धेः परमुपेयुषाम्॥ ३६"],"iast":["na mayyekāntabhaktānāṃ guṇadoṣodbhavā guṇāḥ|","sādhūnāṃ samacittānāṃ buddheḥ paramupeyuṣām|| 36"],"meaning":"मेरे अनन्यप्रेमी भक्तोंका और उन समदर्शी महात्माओंका; जो बुद्धिसे अतीत परमतत्त्वको प्राप्त हो चुके हैं, इन विधि और निषेधसे होनेवाले पुण्य और पापसे कोई सम्बन्ध ही नहीं होता॥ ३६॥"},{"id":"11.20.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/37/","page":838,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः।","क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः॥ ३७"],"iast":["evametān mayā''diṣṭānanutiṣṭhanti me pathaḥ|","kṣemaṃ vindanti matsthānaṃ yad brahma paramaṃ viduḥ|| 37"],"meaning":"इस प्रकार जो लोग मेरे बतलाये हुए इन ज्ञान, भक्ति और कर्ममार्गोंका आश्रय लेते हैं, वे मेरे परम कल्याणस्वरूप धामको प्राप्त होते हैं, क्योंकि वे परब्रह्मतत्त्वको जान लेते हैं॥ ३७॥"}],"text":[{"b":40602,"kind":"adhyaya_heading","page":833,"text":"अथ विंशोऽध्यायः"},{"b":40603,"kind":"topic_heading","page":833,"text":"ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग"},{"b":40604,"kind":"topic_heading","page":833,"text":"उद्धव उवाच"},{"b":40605,"kind":"sanskrit_shloka","page":833,"verses":["11.20.1"],"text":"विधिश्‍च प्रतिषेधश्‍च निगमो हीश्‍वरस्य ते।"},{"b":40606,"kind":"sanskrit_shloka","page":833,"verses":["11.20.1"],"text":"अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम्॥ १"},{"b":40607,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.2"],"text":"वर्णाश्रमविकल्पं च प्रतिलोमानुलोमजम्।"},{"b":40608,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.2"],"text":"द्रव्यदेशवयःकालान् स्वर्गं नरकमेव च॥ २"},{"b":40609,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.3"],"text":"गुणदोषभिदादृष्टिमन्तरेण वचस्तव।"},{"b":40610,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.3"],"text":"निःश्रेयसं कथं नॄणां निषेधविधिलक्षणम्॥ ३"},{"b":40611,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.4"],"text":"पितृदेवमनुष्याणां वेदश्‍चक्षुस्तवेश्‍वर।"},{"b":40612,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.4"],"text":"श्रेयस्त्वनुपलब्धेऽर्थे साध्यसाधनयोरपि॥ ४"},{"b":40613,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.5"],"text":"गुणदोषभिदादृष्टिर्निगमात्ते न हि स्वतः।"},{"b":40614,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.5"],"text":"निगमेनापवादश्‍च भिदाया इति ह भ्रमः॥ ५"},{"b":40615,"kind":"hindi_commentary","page":833,"explains":["11.20.1","11.20.2","11.20.3","11.20.4","11.20.5"],"text":"उद्धवजीने कहा—कमलनयन श्रीकृष्ण! आप सर्वशक्तिमान् हैं। आपकी आज्ञा ही वेद है; उसमें कुछ कर्मोंको करनेकी विधि है और कुछके करनेका निषेध है। यह विधि-निषेध कर्मोंके गुण और दोषकी परीक्षा करके ही तो होता है॥ १॥ वर्णाश्रम-भेद, प्रतिलोम और अनुलोमरूप वर्णसंकर, कर्मोंके उपयुक्त और अनुपयुक्त द्रव्य, देश, आयु और काल तथा स्वर्ग और नरकके भेदोंका बोध भी वेदोंसे ही होता है॥ २॥ इसमें सन्देह नहीं कि आपकी वाणी ही वेद है, परन्तु उसमें विधि-निषेध ही तो भरा पड़ा है। यदि उसमें गुण और दोषमें भेद करनेवाली दृष्टि न हो, तो वह प्राणियोंका कल्याण करनेमें समर्थ ही कैसे हो?॥ ३॥ सर्वशक्तिमान् परमेश्‍वर! आपकी वाणी वेद ही पितर, देवता और मनुष्योंके लिये श्रेष्ठ मार्ग-दर्शकका काम करता है; क्योंकि उसीके द्वारा स्वर्ग-मोक्ष आदि अदृष्ट वस्तुओंका बोध होता है और इस लोकमें भी किसका कौन-सा साध्य है और क्या साधन—इसका निर्णय भी उसीसे होता है॥ ४॥ प्रभो! इसमें सन्देह नहीं कि गुण और दोषोंमें भेददृष्टि आपकी वाणी वेदके ही अनुसार है, किसीकी अपनी कल्पना नहीं; परन्तु प्रश्‍न तो यह है कि आपकी वाणी ही भेदका निषेध भी करती है। यह विरोध देखकर मुझे भ्रम हो रहा है। आप कृपा करके मेरा यह भ्रम मिटाइये॥ ५॥"},{"b":40616,"kind":"topic_heading","page":834,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":40617,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.6"],"text":"योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया।"},{"b":40618,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.6"],"text":"ज्ञानं कर्म च भक्तिश्‍च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥ ६"},{"b":40619,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.7"],"text":"निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु।"},{"b":40620,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.7"],"text":"तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥ ७"},{"b":40621,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.8"],"text":"यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्।"},{"b":40622,"kind":"sanskrit_shloka","page":834,"verses":["11.20.8"],"text":"न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥ ८"},{"b":40623,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.9"],"text":"तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।"},{"b":40624,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.9"],"text":"मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्‍न जायते॥ ९"},{"b":40625,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.10"],"text":"स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशीःकाम उद्धव।"},{"b":40626,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.10"],"text":"न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्‍न समाचरेत्॥ १०"},{"b":40627,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.11"],"text":"अस्मिँल्लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोऽनघः शुचिः।"},{"b":40628,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.11"],"text":"ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया॥ ११"},{"b":40629,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.12"],"text":"स्वर्गिणोऽप्येतमिच्छन्ति लोकं निरयिणस्तथा।"},{"b":40630,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.12"],"text":"साधकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तदसाधकम्॥ १२"},{"b":40631,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.13"],"text":"न नरः स्वर्गतिं कांक्षेन्‍नारकीं वा विचक्षणः।"},{"b":40632,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.13"],"text":"नेमं लोकं च कांक्षेत देहावेशात् प्रमाद्यति॥ १३"},{"b":40633,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.14"],"text":"एतद् विद्वान् पुरा मृत्योरभवाय घटेत सः।"},{"b":40634,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.14"],"text":"अप्रमत्त इदं ज्ञात्वा मर्त्यमप्यर्थसिद्धिदम्॥ १४"},{"b":40635,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.15"],"text":"छिद्यमानं यमैरेतैः कृतनीडं वनस्पतिम्।"},{"b":40636,"kind":"sanskrit_shloka","page":835,"verses":["11.20.15"],"text":"खगः स्वकेतमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलम्पटः॥ १५"},{"b":40637,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.16"],"text":"अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद‍्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथुः।"},{"b":40638,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.16"],"text":"मुक्तसंगः परं बुद‍्ध्वा निरीह उपशाम्यति॥ १६"},{"b":40639,"kind":"hindi_commentary","page":836,"verses":["11.20.17"],"text":"नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं"},{"b":40640,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.17"],"text":"प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।"},{"b":40641,"kind":"hindi_commentary","page":836,"verses":["11.20.17"],"text":"मयानुकूलेन नभस्वतेरितं"},{"b":40642,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.17"],"text":"पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा॥ १७"},{"b":40643,"kind":"hindi_commentary","page":834,"explains":["11.20.6","11.20.7","11.20.8","11.20.9","11.20.10","11.20.11","11.20.12","11.20.13","11.20.14","11.20.15","11.20.16","11.20.17"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! मैंने ही वेदोंमें एवं अन्यत्र भी मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये अधिकारिभेदसे तीन प्रकारके योगोंका उपदेश किया है। वे हैं—ज्ञान, कर्म और भक्ति। मनुष्यके परम कल्याणके लिये इनके अतिरिक्त और कोई उपाय कहीं नहीं है॥ ६॥ उद्धवजी! जो लोग कर्मों तथा उनके फलोंसे विरक्त हो गये हैं और उनका त्याग कर चुके हैं, वे ज्ञानयोगके अधिकारी हैं। इसके विपरीत जिनके चित्तमें कर्मों और उनके फलोंसे वैराग्य नहीं हुआ है, उनमें दुःखबुद्धि नहीं हुई है, वे सकाम व्यक्ति कर्मयोगके अधिकारी हैं॥ ७॥ जो पुरुष न तो अत्यन्त विरक्त है और न अत्यन्त आसक्त ही है तथा किसी पूर्वजन्मके शुभकर्मसे सौभाग्यवश मेरी लीला-कथा आदिमें उसकी श्रद्धा हो गयी है, वह भक्तियोगका अधिकारी है। उसे भक्तियोगके द्वारा ही सिद्धि मिल सकती है॥ ८॥ कर्मके सम्बन्धमें जितने भी विधि-निषेध हैं, उनके अनुसार तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक कर्ममय जगत् और उससे प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि सुखोंसे वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी लीला-कथाके श्रवण-कीर्तन आदिमें श्रद्धा न हो जाय॥ ९॥ उद्धव! इस प्रकार अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें स्थित रहकर यज्ञोंके द्वारा बिना किसी आशा और कामनाके मेरी आराधना करता रहे और निषिद्ध कर्मोंसे दूर रहकर केवल विहित कर्मोंका ही आचरण करे तो उसे स्वर्ग या नरकमें नहीं जाना पड़ता॥ १०॥ अपने धर्ममें निष्ठा रखनेवाला पुरुष इस शरीरमें रहते-रहते ही निषिद्ध कर्मका परित्याग कर देता है और रागादि मलोंसे भी मुक्त—पवित्र हो जाता है। इसीसे अनायास ही उसे आत्मसाक्षात्काररूप विशुद्ध तत्त्वज्ञान अथवा द्रुत-चित्त होनेपर मेरी भक्ति प्राप्त होती है॥ ११॥ यह विधि-निषेधरूप कर्मका अधिकारी मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकोंमें रहनेवाले जीव इसकी अभिलाषा करते रहते हैं; क्योंकि इसी शरीरमें अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर ज्ञान अथवा भक्तिकी प्राप्ति हो सकती है, स्वर्ग अथवा नरकका भोगप्रधान शरीर किसी भी साधनके उपयुक्त नहीं है। बुद्धिमान् पुरुषको न तो स्वर्गकी अभिलाषा करनी चाहिये और न नरककी ही। और तो क्या, इस मनुष्य-शरीरकी भी कामना न करनी चाहिये; क्योंकि किसी भी शरीरमें गुणबुद्धि और अभिमान हो जानेसे अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्तिके साधनमें प्रमाद होने लगता है॥ १२-१३॥ यद्यपि यह मनुष्य-शरीर है तो मृत्युग्रस्त ही, परन्तु इसके द्वारा परमार्थकी—सत्य वस्तुकी प्राप्ति हो सकती है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि यह बात जानकर मृत्यु होनेके पूर्व ही सावधान होकर ऐसी साधना कर ले, जिससे वह जन्म-मृत्युके चक्करसे सदाके लिये छूट जाय—मुक्त हो जाय॥ १४॥ यह शरीर एक वृक्ष है। इसमें घोंसला बनाकर जीवरूप पक्षी निवास करता है। इसे यमराजके दूत प्रतिक्षण काट रहे हैं। जैसे पक्षी कटते हुए वृक्षको छोड़कर उड़ जाता है, वैसे ही अनासक्त जीव भी इस शरीरको छोड़कर मोक्षका भागी बन जाता है। परन्तु आसक्त जीव दुःख ही भोगता रहता है॥ १५॥ प्रिय उद्धव! ये दिन और रात क्षण-क्षणमें शरीरकी आयुको क्षीण कर रहे हैं। यह जानकर जो भयसे काँप उठता है, वह व्यक्ति इसमें आसक्ति छोड़कर परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है और फिर इसके जीवन-मरणसे निरपेक्ष होकर अपने आत्मामें ही शान्त हो जाता है॥ १६॥ यह मनुष्य-शरीर समस्त शुभ फलोंकी प्राप्तिका मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी अनायास सुलभ हो गया है। इस संसार-सागरसे पार जानेके लिये यह एक सुदृढ़ नौका है। शरण-ग्रहणमात्रसे ही गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवारका संचालन करने लगते हैं और स्मरणमात्रसे ही मैं अनुकूल वायुके रूपमें इसे लक्ष्यकी ओर बढ़ाने लगता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो इस शरीरके द्वारा संसार-सागरसे पार नहीं हो जाता, वह तो अपने हाथों अपने आत्माका हनन—अधःपतन कर रहा है॥ १७॥"},{"b":40644,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.18"],"text":"यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्तः संयतेन्द्रियः।"},{"b":40645,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.18"],"text":"अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः॥ १८"},{"b":40646,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.19"],"text":"धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्‍वनवस्थितम्।"},{"b":40647,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.19"],"text":"अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्॥ १९"},{"b":40648,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.20"],"text":"मनोगतिं न विसृजेज्जितप्राणो जितेन्द्रियः।"},{"b":40649,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.20"],"text":"सत्त्वसम्पन्‍नया बुद्ध्या मन आत्मवशं नयेत्॥ २०"},{"b":40650,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.21"],"text":"एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः।"},{"b":40651,"kind":"sanskrit_shloka","page":836,"verses":["11.20.21"],"text":"हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवार्वतो मुहुः॥ २१"},{"b":40652,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.22"],"text":"सांख्येन सर्वभावानां प्रतिलोमानुलोमतः।"},{"b":40653,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.22"],"text":"भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत् प्रसीदति॥ २२"},{"b":40654,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.23"],"text":"निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिनः।"},{"b":40655,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.23"],"text":"मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया॥ २३"},{"b":40656,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.24"],"text":"यमादिभिर्योगपथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया।"},{"b":40657,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.24"],"text":"ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मनः॥ २४"},{"b":40658,"kind":"hindi_commentary","page":836,"explains":["11.20.18","11.20.19","11.20.20","11.20.21","11.20.22","11.20.23","11.20.24"],"text":"प्रिय उद्धव! जब पुरुष दोषदर्शनके कारण कर्मोंसे उद्वि‌ग्‍न और विरक्त हो जाय, तब जितेन्द्रिय होकर वह योगमें स्थित हो जाय और अभ्यास—आत्मानुसन्धानके द्वारा अपना मन मुझ परमात्मामें निश्‍चलरूपसे धारण करे॥ १८॥ जब स्थिर करते समय मन चंचल होकर इधर-उधर भटकने लगे, तब झटपट बड़ी सावधानीसे उसे मनाकर, समझा-बुझाकर, फुसलाकर अपने वशमें कर ले॥ १९॥ इन्द्रियों और प्राणोंको अपने वशमें रखे और मनको एक क्षणके लिये भी स्वतन्त्र न छोड़े। उसकी एक-एक चाल, एक-एक हरकतको देखता रहे। इस प्रकार सत्त्वसम्पन्‍न बुद्धिके द्वारा धीरे-धीरे मनको अपने वशमें कर लेना चाहिये॥ २०॥ जैसे सवार घोड़ेको अपने वशमें करते समय उसे अपने मनो-भावकी पहचान कराना चाहता है—अपनी इच्छाके अनुसार उसे चलाना चाहता है और बार-बार फुसलाकर उसे अपने वशमें कर लेता है, वैसे ही मनको फुसलाकर, उसे मीठी-मीठी बातें सुनाकर वशमें कर लेना भी परम योग है॥ २१॥ सांख्यशास्त्रमें प्रकृतिसे लेकर शरीरपर्यन्त सृष्टिका जो क्रम बतलाया गया है, उसके अनुसार सृष्टि-चिन्तन करना चाहिये और जिस क्रमसे शरीर आदिका प्रकृतिमें लय बताया गया है, उस प्रकार लय-चिन्तन करना चाहिये। यह क्रम तबतक जारी रखना चाहिये, जबतक मन शान्त—स्थिर न हो जाय॥ २२॥ जो पुरुष संसारसे विरक्त हो गया है और जिसे संसारके पदार्थोंमें दुःख-बुद्धि हो गयी है, वह अपने गुरुजनोंके उपदेशको भलीभाँति समझकर बार-बार अपने स्वरूपके ही चिन्तनमें संल‌ग्‍न रहता है। इस अभ्याससे बहुत शीघ्र ही उसका मन अपनी वह चंचलता, जो अनात्मा शरीर आदिमें आत्मबुद्धि करनेसे हुई है, छोड़ देता है॥ २३॥ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि योगमार्गोंसे, वस्तुतत्त्वका निरीक्षण-परीक्षण करनेवाली आत्मविद्यासे तथा मेरी प्रतिमाकी उपासनासे—अर्थात् कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगसे मन परमात्माका चिन्तन करने लगता है; और कोई उपाय नहीं है॥ २४॥"},{"b":40659,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.25"],"text":"यदि कुर्यात् प्रमादेन योगी कर्म विगर्हितम्।"},{"b":40660,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.25"],"text":"योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन॥ २५"},{"b":40661,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.26"],"text":"स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः।"},{"b":40662,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.26"],"text":"कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः।"},{"b":40663,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.26"],"text":"गुणदोषविधानेन संगानां त्याजनेच्छया॥ २६"},{"b":40664,"kind":"hindi_commentary","page":837,"explains":["11.20.25","11.20.26"],"text":"उद्धवजी! वैसे तो योगी कभी कोई निन्दित कर्म करता ही नहीं; परन्तु यदि कभी उससे प्रमादवश कोई अपराध बन जाय तो योगके द्वारा ही उस पापको जला डाले, कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि दूसरे प्रायश्‍चित्त कभी न करे॥ २५॥ अपने-अपने अधिकारमें जो निष्ठा है, वही गुण कहा गया है। इस गुण-दोष और विधि-निषेधके विधानसे यही तात्पर्य निकलता है कि किसी प्रकार विषयासक्तिका परित्याग हो जाय; क्योंकि कर्म तो जन्मसे ही अशुद्ध हैं, अनर्थके मूल हैं। शास्त्रका तात्पर्य उनका नियन्त्रण, नियम ही है। जहाँतक हो सके प्रवृत्तिका संकोच ही करना चाहिये॥ २६॥"},{"b":40665,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.27"],"text":"जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्णः सर्वकर्मसु।"},{"b":40666,"kind":"sanskrit_shloka","page":837,"verses":["11.20.27"],"text":"वेद दुःखात्मकान् कामान् परित्यागेऽप्यनीश्‍वरः॥ २७"},{"b":40667,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.28"],"text":"ततो भजेत मां प्रीतः श्रद्धालुर्दृढनिश्‍चयः।"},{"b":40668,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.28"],"text":"जुषमाणश्‍च तान् कामान् दुःखोदर्कांश्‍च गर्हयन्॥ २८"},{"b":40669,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.29"],"text":"प्रोक्तेन भक्तियोगेन भजतो मासकृन्मुनेः।"},{"b":40670,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.29"],"text":"कामा हृदय्या नश्यन्ति सर्वे मयि हृदि स्थिते॥ २९"},{"b":40671,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.30"],"text":"भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।"},{"b":40672,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.30"],"text":"क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि॥ ३०"},{"b":40673,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.31"],"text":"तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः।"},{"b":40674,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.31"],"text":"न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह॥ ३१"},{"b":40675,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.32"],"text":"यत् कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्‍च यत्।"},{"b":40676,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.32"],"text":"योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि॥ ३२"},{"b":40677,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.33"],"text":"सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा।"},{"b":40678,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.33"],"text":"स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथंचिद् यदि वाञ्छति॥ ३३"},{"b":40679,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.34"],"text":"न किंचित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम।"},{"b":40680,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.34"],"text":"वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ ३४"},{"b":40681,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.35"],"text":"नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमनल्पकम्।"},{"b":40682,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.35"],"text":"तस्मान्‍निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत्॥ ३५"},{"b":40683,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.36"],"text":"न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः।"},{"b":40684,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.36"],"text":"साधूनां समचित्तानां बुद्धेः परमुपेयुषाम्॥ ३६"},{"b":40685,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.37"],"text":"एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः।"},{"b":40686,"kind":"sanskrit_shloka","page":838,"verses":["11.20.37"],"text":"क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः॥ ३७"},{"b":40687,"kind":"hindi_commentary","page":837,"explains":["11.20.27","11.20.28","11.20.29","11.20.30","11.20.31","11.20.32","11.20.33","11.20.34","11.20.35","11.20.36","11.20.37"],"text":"जो साधक समस्त कर्मोंसे विरक्त हो गया हो, उनमें दुःखबुद्धि रखता हो, मेरी लीलाकथाके प्रति श्रद्धालु हो और यह भी जानता हो कि सभी भोग और भोगवासनाएँ दुःखरूप हैं, किन्तु इतना सब जानकर भी जो उनके परित्यागमें समर्थ न हो, उसे चाहिये कि उन भोगोंको तो भोग ले; परन्तु उन्हें सच्चे हृदयसे दुःखजनक समझे और मन-ही-मन उनकी निन्दा करे तथा उसे अपना दुर्भाग्य ही समझे। साथ ही इस दुविधाकी स्थितिसे छुटकारा पानेके लिये श्रद्धा, दृढ़ निश्‍चय और प्रेमसे मेरा भजन करे॥ २७-२८॥ इस प्रकार मेरे बतलाये हुए भक्तियोगके द्वारा निरन्तर मेरा भजन करनेसे मैं उस साधकके हृदयमें आकर बैठ जाता हूँ और मेरे विराजमान होते ही उसके हृदयकी सारी वासनाएँ अपने संस्कारोंके साथ नष्ट हो जाती हैं॥ २९॥ इस तरह जब उसे मुझ सर्वात्माका साक्षात्कार हो जाता है, तब तो उसके हृदयकी गाँठ टूट जाती है, उसके सारे संशय छिन्‍न-भिन्‍न हो जाते हैं और कर्म-वासनाएँ सर्वथा क्षीण हो जाती हैं॥ ३०॥ इसीसे जो योगी मेरी भक्तिसे युक्त और मेरे चिन्तनमें म‌ग्‍न रहता है, उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्यकी आवश्यकता नहीं होती। उसका कल्याण तो प्रायः मेरी भक्तिके द्वारा ही हो जाता है॥ ३१॥ कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योगाभ्यास, दान, धर्म और दूसरे कल्याणसाधनोंसे जो कुछ स्वर्ग, अपवर्ग, मेरा परम धाम अथवा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है, वह सब मेरा भक्त मेरे भक्तियोगके प्रभावसे ही, यदि चाहे तो, अनायास प्राप्त कर लेता है॥ ३२-३३॥ मेरे अनन्यप्रेमी एवं धैर्यवान् साधु भक्त स्वयं तो कुछ चाहते ही नहीं; यदि मैं उन्हें देना चाहता हूँ और देता भी हूँ तो भी दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या—वे कैवल्य-मोक्ष भी नहीं लेना चाहते॥ ३४॥ उद्धवजी! सबसे श्रेष्ठ एवं महान् निःश्रेयस (परम कल्याण) तो निरपेक्षताका ही दूसरा नाम है। इसलिये जो निष्काम और निरपेक्ष होता है, उसीको मेरी भक्ति प्राप्त होती है॥ ३५॥ मेरे अनन्यप्रेमी भक्तोंका और उन समदर्शी महात्माओंका; जो बुद्धिसे अतीत परमतत्त्वको प्राप्त हो चुके हैं, इन विधि और निषेधसे होनेवाले पुण्य और पापसे कोई सम्बन्ध ही नहीं होता॥ ३६॥ इस प्रकार जो लोग मेरे बतलाये हुए इन ज्ञान, भक्ति और कर्ममार्गोंका आश्रय लेते हैं, वे मेरे परम कल्याणस्वरूप धामको प्राप्त होते हैं, क्योंकि वे परब्रह्मतत्त्वको जान लेते हैं॥ ३७॥"},{"b":40688,"kind":"hindi_translation","page":838,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे विंशोऽध्यायः॥ २०॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}