{"id":"11.18","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 18","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथाष्टादशोऽध्यायः","topics":["वानप्रस्थ और संन्यासीके धर्म"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.18.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[821,827]},"verses":[{"id":"11.18.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/1/","page":821,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वनं विविक्षुः पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा।","वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुषः॥ १"],"iast":["vanaṃ vivikṣuḥ putreṣu bhāryāṃ nyasya sahaiva vā|","vana eva vasecchāntastṛtīyaṃ bhāgamāyuṣaḥ|| 1"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! यदि गृहस्थ मनुष्य वानप्रस्थ आश्रममें जाना चाहे, तो अपनी पत्‍नीको पुत्रोंके हाथ सौंप दे अथवा अपने साथ ही ले ले और फिर शान्त चित्तसे अपनी आयुका तीसरा भाग वनमें ही रहकर व्यतीत करे॥ १॥"},{"id":"11.18.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/2/","page":821,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कन्दमूलफलैर्वन्यैर्मेध्यैर्वृत्तिं प्रकल्पयेत्।","वसीत वल्कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि च॥ २"],"iast":["kandamūlaphalairvanyairmedhyairvṛttiṃ prakalpayet|","vasīta valkalaṃ vāsastṛṇaparṇājināni ca|| 2"],"meaning":"उसे वनके पवित्र कन्द-मूल और फलोंसे ही शरीर-निर्वाह करना चाहिये; वस्त्रकी जगह वृक्षोंकी छाल पहिने अथवा घास-पात और मृगछालासे ही काम निकाल ले॥ २॥"},{"id":"11.18.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/3/","page":821,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["केशरोमनखश्मश्रुमलानि बिभृयाद् दतः।","न धावेदप्सु मज्जेत त्रिकालं स्थण्डिलेशयः॥ ३"],"iast":["keśaromanakhaśmaśrumalāni bibhṛyād dataḥ|","na dhāvedapsu majjeta trikālaṃ sthaṇḍileśayaḥ|| 3"],"meaning":"केश, रोएँ, नख और मूँछ-दाढ़ीरूप शरीरके मलको हटावे नहीं। दातुन न करे। जलमें घुसकर त्रिकाल स्नान करे और धरतीपर ही पड़ रहे॥ ३॥"},{"id":"11.18.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/4/","page":821,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ग्रीष्मे तप्येत पंचा‌ग्‍नीन् वर्षास्वासारषाड् जले।","आकण्ठम‌ग्‍नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्‍चरेत्॥ ४"],"iast":["grīṣme tapyeta paṃcāgnīn varṣāsvāsāraṣāḍ jale|","ākaṇṭhamagnaḥ śiśire evaṃvṛttastapaścaret|| 4"],"meaning":"ग्रीष्म ऋतुमें पंचाग्‍नि तपे, वर्षा ऋतुमें खुले मैदानमें रहकर वर्षाकी बौछार सहे। जाड़ेके दिनोंमें गलेतक जलमें डूबा रहे। इस प्रकार घोर तपस्यामय जीवन व्यतीत करे॥ ४॥"},{"id":"11.18.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/5/","page":821,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अग्‍निपक्वं समश्‍नीयात् कालपक्वमथापि वा।","उलूखलाश्मकुट्टो वा दन्तोलूखल एव वा॥ ५"],"iast":["agnipakvaṃ samaśnīyāt kālapakvamathāpi vā|","ulūkhalāśmakuṭṭo vā dantolūkhala eva vā|| 5"],"meaning":"कन्द-मूलोंको केवल आगमें भूनकर खा ले अथवा समयानुसार पके हुए फल आदिके द्वारा ही काम चला ले। उन्हें कूटनेकी आवश्यकता हो तो ओखलीमें या सिलपर कूट ले, अन्यथा दाँतोंसे ही चबा-चबाकर खा ले॥ ५॥"},{"id":"11.18.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/6/","page":822,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वयं संचिनुयात् सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम्।","देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाऽऽहृतम्॥ ६"],"iast":["svayaṃ saṃcinuyāt sarvamātmano vṛttikāraṇam|","deśakālabalābhijño nādadītānyadā''hṛtam|| 6"],"meaning":"वानप्रस्थाश्रमीको चाहिये कि कौन-सा पदार्थ कहाँसे लाना चाहिये, किस समय लाना चाहिये, कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं—इन बातोंको जानकर अपने जीवन-निर्वाहके लिये स्वयं ही सब प्रकारके कन्द-मूल-फल आदि ले आवे। देश-काल आदिसे अनभिज्ञ लोगोंसे लाये हुए अथवा दूसरे समयके संचित पदार्थोंको अपने काममें न ले॥ ६॥"},{"id":"11.18.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/7/","page":822,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वन्यैश्‍चरुपुरोडाशैर्निर्वपेत् कालचोदितान्।","न तु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी॥ ७"],"iast":["vanyaiścarupuroḍāśairnirvapet kālacoditān|","na tu śrautena paśunā māṃ yajeta vanāśramī|| 7"],"meaning":"नीवार आदि जंगली अन्‍नसे ही चरु-पुरोडाश आदि तैयार करे और उन्हींसे समयोचित आग्रयण आदि वैदिक कर्म करे। वानप्रस्थ हो जानेपर वेदविहित पशुओंद्वारा मेरा यजन न करे॥ ७॥"},{"id":"11.18.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/8/","page":822,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अग्‍निहोत्रं च दर्शश्‍च पूर्णमासश्‍च पूर्ववत्।","चातुर्मास्यानि च मुनेराम्‍नातानि च नैगमैः॥ ८"],"iast":["agnihotraṃ ca darśaśca pūrṇamāsaśca pūrvavat|","cāturmāsyāni ca munerāmnātāni ca naigamaiḥ|| 8"],"meaning":"वेदवेत्ताओंने वानप्रस्थीके लिये अग्‍निहोत्र, दर्श, पौर्णमास और चातुर्मास्य आदिका वैसा ही विधान किया है, जैसा गृहस्थोंके लिये है॥ ८॥"},{"id":"11.18.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/9/","page":822,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसन्ततः।","मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैति माम्॥ ९"],"iast":["evaṃ cīrṇena tapasā munirdhamanisantataḥ|","māṃ tapomayamārādhya ṛṣilokādupaiti mām|| 9"],"meaning":"इस प्रकार घोर तपस्या करते-करते मांस सूख जानेके कारण वानप्रस्थीकी एक-एक नस दीखने लगती है। वह इस तपस्याके द्वारा मेरी आराधना करके पहले तो ऋषियोंके लोकमें जाता है और वहाँसे फिर मेरे पास आ जाता है; क्योंकि तप मेरा ही स्वरूप है॥ ९॥"},{"id":"11.18.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/10/","page":822,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यस्त्वेतत् कृच्छ्रतश्‍चीर्णं तपो निःश्रेयसं महत्।","कामायाल्पीयसे युञ्ज्याद् बालिशः कोऽपरस्ततः॥ १०"],"iast":["yastvetat kṛcchrataścīrṇaṃ tapo niḥśreyasaṃ mahat|","kāmāyālpīyase yuñjyād bāliśaḥ ko'parastataḥ|| 10"],"meaning":"प्रिय उद्धव! जो पुरुष बड़े कष्टसे किये हुए और मोक्ष देनेवाले इस महान् तपस्याको स्वर्ग, ब्रह्मलोक आदि छोटे-मोटे फलोंकी प्राप्तिके लिये करता है, उससे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा? इसलिये तपस्याका अनुष्ठान निष्कामभावसे ही करना चाहिये॥ १०॥"},{"id":"11.18.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/11/","page":822,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदासौ नियमेऽकल्पो जरया जातवेपथुः।","आत्मन्य‌ग्‍नीन् समारोप्य मच्चित्तोऽग्‍निं समाविशेत्॥ ११"],"iast":["yadāsau niyame'kalpo jarayā jātavepathuḥ|","ātmanyagnīn samāropya maccitto'gniṃ samāviśet|| 11"],"meaning":"प्यारे उद्धव! वानप्रस्थी जब अपने आश्रमोचित नियमोंका पालन करनेमें असमर्थ हो जाय, बुढ़ापेके कारण उसका शरीर काँपने लगे, तब यज्ञाग्‍नियोंको भावनाके द्वारा अपने अन्तःकरणमें आरोपित कर ले और अपना मन मुझमें लगाकर अग्‍निमें प्रवेश कर जाय। (यह विधान केवल उनके लिये है, जो विरक्त नहीं हैं)॥ ११॥"},{"id":"11.18.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/12/","page":823,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु।","विरागो जायते सम्यङ् न्यस्ताग्‍निः प्रव्रजेत्ततः॥ १२"],"iast":["yadā karmavipākeṣu lokeṣu nirayātmasu|","virāgo jāyate samyaṅ nyastāgniḥ pravrajettataḥ|| 12"],"meaning":"यदि उसकी समझमें यह बात आ जाय कि काम्य कर्मोंसे उनके फलस्वरूप जो लोक प्राप्त होते हैं, वे नरकोंके समान ही दुःखपूर्ण हैं और मनमें लोक-परलोकसे पूरा वैराग्य हो जाय तो विधिपूर्वक यज्ञाग्‍नियोंका परित्याग करके संन्यास ले ले॥ १२॥"},{"id":"11.18.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/13/","page":823,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे।","अ‌ग्‍नीन् स्वप्राण आवेश्य निरपेक्षः परिव्रजेत्॥ १३"],"iast":["iṣṭvā yathopadeśaṃ māṃ dattvā sarvasvamṛtvije|","agnīn svaprāṇa āveśya nirapekṣaḥ parivrajet|| 13"],"meaning":"जो वानप्रस्थी संन्यासी होना चाहे, वह पहले वेदविधिके अनुसार आठों प्रकारके श्राद्ध और प्राजापत्य यज्ञसे मेरा यजन करे। इसके बाद अपना सर्वस्व ऋत्विजको दे दे। यज्ञाग्‍नियोंको अपने प्राणोंमें लीन कर ले और फिर किसी भी स्थान, वस्तु और व्यक्तियोंकी अपेक्षा न रखकर स्वच्छन्द विचरण करे॥ १३॥"},{"id":"11.18.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/14/","page":823,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः।","विघ्नान् कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम्॥ १४"],"iast":["viprasya vai saṃnyasato devā dārādirūpiṇaḥ|","vighnān kurvantyayaṃ hyasmānākramya samiyāt param|| 14"],"meaning":"उद्धवजी! जब ब्राह्मण संन्यास लेने लगता है, तब देवतालोग स्त्री-पुत्रादि सगे-सम्बन्धियोंका रूप धारण करके उसके संन्यास-ग्रहणमें विघ्न डालते हैं। वे सोचते हैं कि ‘अरे! यह तो हमलोगोंकी अवहेलना कर, हमलोगोंको लाँघकर परमात्माको प्राप्त होने जा रहा है’॥ १४॥"},{"id":"11.18.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/15/","page":823,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["बिभृयाच्चेन्मुनिर्वासः कौपीनाच्छादनं परम्।","त्यक्तं न दण्डपात्राभ्यामन्यत् किंचिदनापदि॥ १५"],"iast":["bibhṛyāccenmunirvāsaḥ kaupīnācchādanaṃ param|","tyaktaṃ na daṇḍapātrābhyāmanyat kiṃcidanāpadi|| 15"],"meaning":"यदि संन्यासी वस्त्र धारण करे तो केवल लँगोटी लगा ले और अधिक-से-अधिक उसके ऊपर एक ऐसा छोटा-सा टुकड़ा लपेट ले कि जिसमें लँगोटी ढक जाय। तथा आश्रमोचित दण्ड और कमण्डलुके अतिरिक्त और कोई भी वस्तु अपने पास न रखे। यह नियम आपत्तिकालको छोड़कर सदाके लिये है॥ १५॥"},{"id":"11.18.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/16/","page":823,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्।","सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥ १६"],"iast":["dṛṣṭipūtaṃ nyaset pādaṃ vastrapūtaṃ pibejjalam|","satyapūtāṃ vaded vācaṃ manaḥpūtaṃ samācaret|| 16"],"meaning":"नेत्रोंसे धरती देखकर पैर रखे, कपड़ेसे छानकर जल पिये, मुँहसे प्रत्येक बात सत्यपूत—सत्यसे पवित्र हुई ही निकाले और शरीरसे जितने भी काम करे, बुद्धि-पूर्वक—सोच-विचार कर ही करे॥ १६॥"},{"id":"11.18.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/17/","page":823,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मौनानीहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम्।","न ह्येते यस्य सन्त्यंग वेणुभिर्न भवेद् यतिः॥ १७"],"iast":["maunānīhānilāyāmā daṇḍā vāgdehacetasām|","na hyete yasya santyaṃga veṇubhirna bhaved yatiḥ|| 17"],"meaning":"वाणीके लिये मौन, शरीरके लिये निश्‍चेष्ट स्थिति और मनके लिये प्राणायाम दण्ड हैं। जिसके पास ये तीनों दण्ड नहीं हैं, वह केवल शरीरपर बाँसके दण्ड धारण करनेसे दण्डी स्वामी नहीं हो जाता॥ १७॥"},{"id":"11.18.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/18/","page":823,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विगर्ह्यान् वर्जयंश्‍चरेत्।","सप्तागारानसंक्लृप्तांस्तुष्येल्लब्धेन तावता॥ १८"],"iast":["bhikṣāṃ caturṣu varṇeṣu vigarhyān varjayaṃścaret|","saptāgārānasaṃklṛptāṃstuṣyellabdhena tāvatā|| 18"],"meaning":"संन्यासीको चाहिये कि जातिच्युत और गोघाती आदि पतितोंको छोड़कर चारों वर्णोंकी भिक्षा ले। केवल अनिश्‍चित सात घरोंसे जितना मिल जाय, उतनेसे ही सन्तोष कर ले॥ १८॥"},{"id":"11.18.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/19/","page":824,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः।","विभज्य पावितं शेषं भुंजीताशेषमाहृतम्॥ १९"],"iast":["bahirjalāśayaṃ gatvā tatropaspṛśya vāgyataḥ|","vibhajya pāvitaṃ śeṣaṃ bhuṃjītāśeṣamāhṛtam|| 19"],"meaning":"इस प्रकार भिक्षा लेकर बस्तीके बाहर जलाशयपर जाय, वहाँ हाथ-पैर धोकर जलके द्वारा भिक्षा पवित्र कर ले; फिर शास्त्रोक्त पद्धतिसे जिन्हें भिक्षाका भाग देना चाहिये, उन्हें देकर जो कुछ बचे उसे मौन होकर खा ले। दूसरे समयके लिये बचाकर न रखे और न अधिक माँगकर ही लाये॥ १९॥"},{"id":"11.18.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/20/","page":824,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एकश्‍चरेन्महीमेतां निःसंगः संयतेन्द्रियः।","आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शनः॥ २०"],"iast":["ekaścarenmahīmetāṃ niḥsaṃgaḥ saṃyatendriyaḥ|","ātmakrīḍa ātmarata ātmavān samadarśanaḥ|| 20"],"meaning":"संन्यासीको पृथ्वीपर अकेले ही विचरना चाहिये। उसकी कहीं भी आसक्ति न हो, सब इन्द्रियाँ अपने वशमें हों। वह अपने-आपमें ही मस्त रहे, आत्म-प्रेममें ही तन्मय रहे, प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितियोंमें भी धैर्य रखे और सर्वत्र समानरूपसे स्थित परमात्माका अनुभव करता रहे॥ २०॥"},{"id":"11.18.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/21/","page":824,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाशयः।","आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनिः॥ २१"],"iast":["viviktakṣemaśaraṇo madbhāvavimalāśayaḥ|","ātmānaṃ cintayedekamabhedena mayā muniḥ|| 21"],"meaning":"संन्यासीको निर्जन और निर्भय एकान्त-स्थानमें रहना चाहिये। उसका हृदय निरन्तर मेरी भावनासे विशुद्ध बना रहे। वह अपने-आपको मुझसे अभिन्‍न और अद्वितीय, अखण्डके रूपमें चिन्तन करे॥ २१॥"},{"id":"11.18.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/22/","page":824,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया।","बन्ध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः॥ २२"],"iast":["anvīkṣetātmano bandhaṃ mokṣaṃ ca jñānaniṣṭhayā|","bandha indriyavikṣepo mokṣa eṣāṃ ca saṃyamaḥ|| 22"],"meaning":"वह अपनी ज्ञाननिष्ठासे चित्तके बन्धन और मोक्षपर विचार करे तथा निश्‍चय करे कि इन्द्रियोंका विषयोंके लिये विक्षिप्त होना—चंचल होना बन्धन है और उनको संयममें रखना ही मोक्ष है॥ २२॥"},{"id":"11.18.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/23/","page":824,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्मान्‍नियम्य षड्वर्गं मद्भावेन चरेन्मुनिः।","विरक्तः क्षुल्लकामेभ्यो लब्ध्वाऽऽत्मनि सुखं महत्॥ २३"],"iast":["tasmānniyamya ṣaḍvargaṃ madbhāvena carenmuniḥ|","viraktaḥ kṣullakāmebhyo labdhvā''tmani sukhaṃ mahat|| 23"],"meaning":"इसलिये संन्यासीको चाहिये कि मन एवं पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको जीत ले, भोगोंकी क्षुद्रता समझकर उनकी ओरसे सर्वथा मुँह मोड़ ले और अपने-आपमें ही परम आनन्दका अनुभव करे। इस प्रकार वह मेरी भावनासे भरकर पृथ्वीमें विचरता रहे॥ २३॥"},{"id":"11.18.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/24/","page":824,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पुरग्रामव्रजान् सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्‍चरेत्।","पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम्॥ २४"],"iast":["puragrāmavrajān sārthān bhikṣārthaṃ praviśaṃścaret|","puṇyadeśasaricchailavanāśramavatīṃ mahīm|| 24"],"meaning":"केवल भिक्षाके लिये ही नगर, गाँव, अहीरोंकी बस्ती या यात्रियोंकी टोलीमें जाय। पवित्र देश, नदी, पर्वत, वन और आश्रमोंसे पूर्ण पृथ्वीमें बिना कहीं ममता जोड़े घूमता-फिरता रहे॥ २४॥"},{"id":"11.18.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/25/","page":824,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत्।","संसिध्यत्याश्‍वसंमोहः शुद्धसत्त्वः शिलान्धसा॥ २५"],"iast":["vānaprasthāśramapadeṣvabhīkṣṇaṃ bhaikṣyamācaret|","saṃsidhyatyāśvasaṃmohaḥ śuddhasattvaḥ śilāndhasā|| 25"],"meaning":"भिक्षा भी अधिकतर वानप्रस्थियोंके आश्रमसे ही ग्रहण करे; क्योंकि कटे हुए खेतोंके दानेसे बनी हुई भिक्षा शीघ्र ही चित्तको शुद्ध कर देती है और उससे बचा-खुचा मोह दूर होकर सिद्धि प्राप्त हो जाती है॥ २५॥"},{"id":"11.18.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/26/","page":824,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नैतद् वस्तुतया पश्येद् दृश्यमानं विनश्यति।","असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात्॥ २६"],"iast":["naitad vastutayā paśyed dṛśyamānaṃ vinaśyati|","asaktacitto viramedihāmutra cikīrṣitāt|| 26"],"meaning":"विचारवान् संन्यासी दृश्यमान जगत‍्को सत्य वस्तु कभी न समझे; क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष ही नाशवान् है। इस जगत‍्में कहीं भी अपने चित्तको लगाये नहीं। इस लोक और परलोकमें जो कुछ करने-पानेकी इच्छा हो, उससे विरक्त हो जाय॥ २६॥"},{"id":"11.18.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/27/","page":825,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसंहतम्।","सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत्॥ २७"],"iast":["yadetadātmani jaganmanovākprāṇasaṃhatam|","sarvaṃ māyeti tarkeṇa svasthastyaktvā na tat smaret|| 27"],"meaning":"संन्यासी विचार करे कि आत्मामें जो मन, वाणी और प्राणोंका संघातरूप यह जगत् है, वह सारा-का-सारा माया ही है। इस विचारके द्वारा इसका बाध करके अपने स्वरूपमें स्थित हो जाय और फिर कभी उसका स्मरण भी न करे॥ २७॥"},{"id":"11.18.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/28/","page":825,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः।","सलिंगानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः॥ २८"],"iast":["jñānaniṣṭho virakto vā madbhakto vānapekṣakaḥ|","saliṃgānāśramāṃstyaktvā caredavidhigocaraḥ|| 28"],"meaning":"ज्ञाननिष्ठ, विरक्त, मुमुक्षु और मोक्षकी भी अपेक्षा न रखनेवाला मेरा भक्त आश्रमोंकी मर्यादामें बद्ध नहीं है। वह चाहे तो आश्रमों और उनके चिह्नोंको छोड़-छाड़कर, वेद-शास्त्रके विधि-निषेधोंसे परे होकर स्वच्छन्द विचरे॥ २८॥"},{"id":"11.18.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/29/","page":825,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["बुधो बालकवत् क्रीडेत् कुशलो जडवच्चरेत्।","वदेदुन्मत्तवद् विद्वान् गोचर्यां नैगमश्‍चरेत्॥ २९"],"iast":["budho bālakavat krīḍet kuśalo jaḍavaccaret|","vadedunmattavad vidvān gocaryāṃ naigamaścaret|| 29"],"meaning":"वह बुद्धिमान् होकर भी बालकोंके समान खेले। निपुण होकर भी जडवत् रहे, विद्वान् होकर भी पागलकी तरह बातचीत करे और समस्त वेद-विधियोंका जानकार होकर भी पशुवृत्तिसे (अनियत आचारवान्) रहे॥ २९॥"},{"id":"11.18.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/30/","page":825,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वेदवादरतो न स्यान्‍न पाखण्डी न हैतुकः।","शुष्कवादविवादे न कंचित् पक्षं समाश्रयेत्॥ ३०"],"iast":["vedavādarato na syānna pākhaṇḍī na haitukaḥ|","śuṣkavādavivāde na kaṃcit pakṣaṃ samāśrayet|| 30"],"meaning":"उसे चाहिये कि वेदोंके कर्मकाण्ड-भागकी व्याख्यामें न लगे, पाखण्ड न करे, तर्क-वितर्कसे बचे और जहाँ कोरा वाद-विवाद हो रहा हो, वहाँ कोई पक्ष न ले॥ ३०॥"},{"id":"11.18.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/31/","page":825,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नोद्विजेत जनाद् धीरो जनं चोद्वेजयेन्‍न तु।","अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचन।","देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्‍न केनचित्॥ ३१"],"iast":["nodvijeta janād dhīro janaṃ codvejayenna tu|","ativādāṃstitikṣeta nāvamanyeta kaṃcana|","dehamuddiśya paśuvad vairaṃ kuryānna kenacit|| 31"],"meaning":"वह इतना धैर्यवान् हो कि उसके मनमें किसी भी प्राणीसे उद्वेग न हो और वह स्वयं भी किसी प्राणीको उद्वि‌ग्‍न न करे। उसकी कोई निन्दा करे, तो प्रसन्‍नतासे सह ले; किसीका अपमान न करे। प्रिय उद्धव! संन्यासी इस शरीरके लिये किसीसे भी वैर न करे। ऐसा वैर तो पशु करते हैं॥ ३१॥"},{"id":"11.18.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/32/","page":825,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः।","यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च॥ ३२"],"iast":["eka eva paro hyātmā bhūteṣvātmanyavasthitaḥ|","yathendurudapātreṣu bhūtānyekātmakāni ca|| 32"],"meaning":"जैसे एक ही चन्द्रमा जलसे भरे हुए विभिन्‍न पात्रोंमें अलग-अलग दिखायी देता है, वैसे ही एक ही परमात्मा समस्त प्राणियोंमें और अपनेमें भी स्थित है। सबकी आत्मा तो एक है ही, पंचभूतोंसे बने हुए शरीर भी सबके एक ही हैं, क्योंकि सब पांचभौतिक ही तो हैं। (ऐसी अवस्थामें किसीसे भी वैर-विरोध करना अपना ही वैर-विरोध है)॥ ३२॥"},{"id":"11.18.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/33/","page":825,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्‍वचित्।","लब्ध्वा न हृष्येद् धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम्॥ ३३"],"iast":["alabdhvā na viṣīdeta kāle kāle'śanaṃ kvacit|","labdhvā na hṛṣyed dhṛtimānubhayaṃ daivatantritam|| 33"],"meaning":"प्रिय उद्धव! संन्यासीको किसी दिन यदि समयपर भोजन न मिले, तो उसे दुःखी नहीं होना चाहिये और यदि बराबर मिलता रहे, तो हर्षित न होना चाहिये। उसे चाहिये कि वह धैर्य रखे। मनमें हर्ष और विषाद दोनों प्रकारके विकार न आने दे; क्योंकि भोजन मिलना और न मिलना दोनों ही प्रारब्धके अधीन हैं॥ ३३॥"},{"id":"11.18.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/34/","page":826,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आहारार्थं समीहेत युक्तं तत् प्राणधारणम्।","तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते॥ ३४"],"iast":["āhārārthaṃ samīheta yuktaṃ tat prāṇadhāraṇam|","tattvaṃ vimṛśyate tena tad vijñāya vimucyate|| 34"],"meaning":"भिक्षा अवश्य माँगनी चाहिये, ऐसा करना उचित ही है; क्योंकि भिक्षासे ही प्राणोंकी रक्षा होती है। प्राण रहनेसे ही तत्त्वका विचार होता है और तत्त्वविचारसे तत्त्वज्ञान होकर मुक्ति मिलती है॥ ३४॥"},{"id":"11.18.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/35/","page":826,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदृच्छयोपपन्‍नान्‍नमद्याच्छ्रेष्ठमुतापरम् ।","तथा वासस्तथा शय्यां प्राप्तं प्राप्तं भजेन्मुनिः॥ ३५"],"iast":["yadṛcchayopapannānnamadyācchreṣṭhamutāparam |","tathā vāsastathā śayyāṃ prāptaṃ prāptaṃ bhajenmuniḥ|| 35"],"meaning":"संन्यासीको प्रारब्धके अनुसार अच्छी या बुरी—जैसी भी भिक्षा मिल जाय, उसीसे पेट भर ले। वस्त्र और बिछौने भी जैसे मिल जायँ, उन्हींसे काम चला ले। उनमें अच्छेपन या बुरेपनकी कल्पना न करे॥ ३५॥"},{"id":"11.18.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/36/","page":826,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत्।","अन्यांश्‍च नियमान् ज्ञानी यथाहं लीलयेश्‍वरः॥ ३६"],"iast":["śaucamācamanaṃ snānaṃ na tu codanayā caret|","anyāṃśca niyamān jñānī yathāhaṃ līlayeśvaraḥ|| 36"],"meaning":"जैसे मैं परमेश्‍वर होनेपर भी अपनी लीलासे ही शौच आदि शास्त्रोक्त नियमोंका पालन करता हूँ, वैसे ही ज्ञाननिष्ठ पुरुष भी शौच, आचमन, स्नान और दूसरे नियमोंका लीलासे ही आचरण करे। वह शास्त्रविधिके अधीन होकर—विधि-किंकर होकर न करे॥ ३६॥"},{"id":"11.18.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/37/","page":826,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता।","आदेहान्तात् क्‍वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया॥ ३७"],"iast":["na hi tasya vikalpākhyā yā ca madvīkṣayā hatā|","ādehāntāt kvacit khyātistataḥ sampadyate mayā|| 37"],"meaning":"क्योंकि ज्ञाननिष्ठ पुरुषको भेदकी प्रतीति ही नहीं होती। जो पहले थी, वह भी मुझ सर्वात्माके साक्षात्कारसे नष्ट हो गयी। यदि कभी-कभी मरणपर्यन्त बाधित भेदकी प्रतीति भी होती है, तब भी देहपात हो जानेपर वह मुझसे एक हो जाता है॥ ३७॥"},{"id":"11.18.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/38/","page":826,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दुःखोदर्केषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान्।","अजिज्ञासितमद्धर्मो गुरुं मुनिमुपाव्रजेत्॥ ३८"],"iast":["duḥkhodarkeṣu kāmeṣu jātanirveda ātmavān|","ajijñāsitamaddharmo guruṃ munimupāvrajet|| 38"],"meaning":"उद्धवजी! (यह तो हुई ज्ञानवान्की बात, अब केवल वैराग्यवान्की बात सुनो।) जितेन्द्रिय पुरुष, जब यह निश्‍चय हो जाय कि संसारके विषयोंके भोगका फल दुःख-ही-दुःख है, तब वह विरक्त हो जाय और यदि वह मेरी प्राप्तिके साधनोंको न जानता हो तो भगवच्चिन्तनमें तन्मय रहनेवाले ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुकी शरण ग्रहण करे॥ ३८॥"},{"id":"11.18.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/39/","page":826,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः।","यावद् ब्रह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः॥ ३९"],"iast":["tāvat paricared bhaktaḥ śraddhāvānanasūyakaḥ|","yāvad brahma vijānīyānmāmeva gurumādṛtaḥ|| 39"],"meaning":"वह गुरुकी दृढ़ भक्ति करे, श्रद्धा रखे और उनमें दोष कभी न निकाले। जबतक ब्रह्मका ज्ञान हो, तबतक बड़े आदरसे मुझे ही गुरुके रूपमें समझता हुआ उनकी सेवा करे॥ ३९॥"},{"id":"11.18.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/40/","page":826,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यस्त्वसंयतषड्वर्गः प्रचण्डेन्द्रियसारथिः।","ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीवति ॥ ४०"],"iast":["yastvasaṃyataṣaḍvargaḥ pracaṇḍendriyasārathiḥ|","jñānavairāgyarahitastridaṇḍamupajīvati || 40"],"meaning":"किन्तु जिसने पाँच इन्द्रियाँ और मन, इन छहोंपर विजय नहीं प्राप्त की है, जिसके इन्द्रियरूपी घोड़े और बुद्धिरूपी सारथि बिगड़े हुए हैं और जिसके हृदयमें न ज्ञान है और न तो वैराग्य, वह यदि त्रिदण्डी संन्यासीका वेष धारणकर पेट पालता है तो वह संन्यासधर्मका सत्तानाश ही कर रहा है और अपने पूज्य देवताओंको, अपने-आपको और अपने हृदयमें स्थित मुझको ठगनेकी चेष्टा करता है। अभी उस वेषमात्रके संन्यासीकी वासनाएँ क्षीण नहीं हुई हैं; इसलिये वह इस लोक और परलोक दोनोंसे हाथ धो बैठता है॥ ४०-४१॥","meaning_covers":[40,41]},{"id":"11.18.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/41/","page":827,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सुरानात्मानमात्मस्थं निह्नुते मां च धर्महा।","अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते॥ ४१"],"iast":["surānātmānamātmasthaṃ nihnute māṃ ca dharmahā|","avipakvakaṣāyo'smādamuṣmācca vihīyate|| 41"],"meaning":"किन्तु जिसने पाँच इन्द्रियाँ और मन, इन छहोंपर विजय नहीं प्राप्त की है, जिसके इन्द्रियरूपी घोड़े और बुद्धिरूपी सारथि बिगड़े हुए हैं और जिसके हृदयमें न ज्ञान है और न तो वैराग्य, वह यदि त्रिदण्डी संन्यासीका वेष धारणकर पेट पालता है तो वह संन्यासधर्मका सत्तानाश ही कर रहा है और अपने पूज्य देवताओंको, अपने-आपको और अपने हृदयमें स्थित मुझको ठगनेकी चेष्टा करता है। अभी उस वेषमात्रके संन्यासीकी वासनाएँ क्षीण नहीं हुई हैं; इसलिये वह इस लोक और परलोक दोनोंसे हाथ धो बैठता है॥ ४०-४१॥","meaning_covers":[40,41]},{"id":"11.18.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/42/","page":827,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भिक्षोर्धर्मः शमोऽहिंसा तप ईक्षा वनौकसः।","गृहिणो भूतरक्षेज्या द्विजस्याचार्यसेवनम्॥ ४२"],"iast":["bhikṣordharmaḥ śamo'hiṃsā tapa īkṣā vanaukasaḥ|","gṛhiṇo bhūtarakṣejyā dvijasyācāryasevanam|| 42"],"meaning":"संन्यासीका मुख्य धर्म है—शान्ति और अहिंसा। वानप्रस्थीका मुख्य धर्म है—तपस्या और भगवद्भाव। गृहस्थका मुख्य धर्म है—प्राणियोंकी रक्षा और यज्ञ-याग तथा ब्रह्मचारीका मुख्य धर्म है—आचार्यकी सेवा॥ ४२॥"},{"id":"11.18.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/43/","page":827,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ब्रह्मचर्यं तपः शौचं सन्तोषो भूतसौहृदम्।","गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तुः सर्वेषां मदुपासनम्॥ ४३"],"iast":["brahmacaryaṃ tapaḥ śaucaṃ santoṣo bhūtasauhṛdam|","gṛhasthasyāpyṛtau gantuḥ sarveṣāṃ madupāsanam|| 43"],"meaning":"गृहस्थ भी केवल ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रीका सहवास करे। उसके लिये भी ब्रह्मचर्य, तपस्या, शौच, सन्तोष और समस्त प्राणियोंके प्रति प्रेमभाव—ये मुख्य धर्म हैं। मेरी उपासना तो सभीको करनी चाहिये॥ ४३॥"},{"id":"11.18.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/44/","page":827,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इति मां यः स्वधर्मेण भजन् नित्यमनन्यभाक्।","सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम्॥ ४४"],"iast":["iti māṃ yaḥ svadharmeṇa bhajan nityamananyabhāk|","sarvabhūteṣu madbhāvo madbhaktiṃ vindate dṛḍhām|| 44"],"meaning":"जो पुरुष इस प्रकार अनन्यभावसे अपने वर्णाश्रमधर्मके द्वारा मेरी सेवामें लगा रहता है और समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करता रहता है, उसे मेरी अविचल भक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ४४॥"},{"id":"11.18.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/45/","page":827,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भक्त्योद्धवानपायिन्या सर्वलोकमहेश्‍वरम्।","सर्वोत्पत्त्यप्ययं ब्रह्म कारणं मोपयाति सः॥ ४५"],"iast":["bhaktyoddhavānapāyinyā sarvalokamaheśvaram|","sarvotpattyapyayaṃ brahma kāraṇaṃ mopayāti saḥ|| 45"],"meaning":"उद्धवजी! मैं सम्पूर्ण लोकोंका एकमात्र स्वामी, सबकी उत्पत्ति और प्रलयका परम कारण ब्रह्म हूँ। नित्य-निरन्तर बढ़नेवाली अखण्ड भक्तिके द्वारा वह मुझे प्राप्त कर लेता है॥ ४५॥"},{"id":"11.18.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/46/","page":827,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इति स्वधर्मनिर्णिक्तसत्त्वो निर्ज्ञातमद्गतिः।","ज्ञानविज्ञानसम्पन्‍नो नचिरात् समुपैति माम्॥ ४६"],"iast":["iti svadharmanirṇiktasattvo nirjñātamadgatiḥ|","jñānavijñānasampanno nacirāt samupaiti mām|| 46"],"meaning":"इस प्रकार वह गृहस्थ अपने धर्मपालनके द्वारा अन्तःकरणको शुद्ध करके मेरे ऐश्‍वर्यको—मेरे स्वरूपको जान लेता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्‍न होकर शीघ्र ही मुझे प्राप्त कर लेता है॥ ४६॥"},{"id":"11.18.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/47/","page":827,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वर्णाश्रमवतां धर्म एष आचारलक्षणः।","स एव मद्भक्तियुतो निःश्रेयसकरः परः॥ ४७"],"iast":["varṇāśramavatāṃ dharma eṣa ācāralakṣaṇaḥ|","sa eva madbhaktiyuto niḥśreyasakaraḥ paraḥ|| 47"],"meaning":"मैंने तुम्हें यह सदाचाररूप वर्णाश्रमियोंका धर्म बतलाया है। यदि इस धर्मानुष्ठानमें मेरी भक्तिका पुट लग जाय, तब तो इससे अनायास ही परम कल्याणस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति हो जाय॥ ४७॥"},{"id":"11.18.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/48/","page":827,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतत्तेऽभिहितं साधो भवान् पृच्छति यच्च माम्।","यथा स्वधर्मसंयुक्तो भक्तो मां समियात् परम्॥ ४८"],"iast":["etatte'bhihitaṃ sādho bhavān pṛcchati yacca mām|","yathā svadharmasaṃyukto bhakto māṃ samiyāt param|| 48"],"meaning":"साधुस्वभाव उद्धव! तुमने मुझसे जो प्रश्‍न किया था, उसका उत्तर मैंने दे दिया और यह बतला दिया कि अपने धर्मका पालन करनेवाला भक्त मुझ परब्रह्म-स्वरूपको किस प्रकार प्राप्त होता है॥ ४८॥"}],"text":[{"b":40373,"kind":"adhyaya_heading","page":821,"text":"अथाष्टादशोऽध्यायः"},{"b":40374,"kind":"topic_heading","page":821,"text":"वानप्रस्थ और संन्यासीके धर्म"},{"b":40375,"kind":"topic_heading","page":821,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":40376,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.1"],"text":"वनं विविक्षुः पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा।"},{"b":40377,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.1"],"text":"वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुषः॥ १"},{"b":40378,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.2"],"text":"कन्दमूलफलैर्वन्यैर्मेध्यैर्वृत्तिं प्रकल्पयेत्।"},{"b":40379,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.2"],"text":"वसीत वल्कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि च॥ २"},{"b":40380,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.3"],"text":"केशरोमनखश्मश्रुमलानि बिभृयाद् दतः।"},{"b":40381,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.3"],"text":"न धावेदप्सु मज्जेत त्रिकालं स्थण्डिलेशयः॥ ३"},{"b":40382,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.4"],"text":"ग्रीष्मे तप्येत पंचा‌ग्‍नीन् वर्षास्वासारषाड् जले।"},{"b":40383,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.4"],"text":"आकण्ठम‌ग्‍नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्‍चरेत्॥ ४"},{"b":40384,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.5"],"text":"अग्‍निपक्वं समश्‍नीयात् कालपक्वमथापि वा।"},{"b":40385,"kind":"sanskrit_shloka","page":821,"verses":["11.18.5"],"text":"उलूखलाश्मकुट्टो वा दन्तोलूखल एव वा॥ ५"},{"b":40386,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.6"],"text":"स्वयं संचिनुयात् सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम्।"},{"b":40387,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.6"],"text":"देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाऽऽहृतम्॥ ६"},{"b":40388,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.7"],"text":"वन्यैश्‍चरुपुरोडाशैर्निर्वपेत् कालचोदितान्।"},{"b":40389,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.7"],"text":"न तु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी॥ ७"},{"b":40390,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.8"],"text":"अग्‍निहोत्रं च दर्शश्‍च पूर्णमासश्‍च पूर्ववत्।"},{"b":40391,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.8"],"text":"चातुर्मास्यानि च मुनेराम्‍नातानि च नैगमैः॥ ८"},{"b":40392,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.9"],"text":"एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसन्ततः।"},{"b":40393,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.9"],"text":"मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैति माम्॥ ९"},{"b":40394,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.10"],"text":"यस्त्वेतत् कृच्छ्रतश्‍चीर्णं तपो निःश्रेयसं महत्।"},{"b":40395,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.10"],"text":"कामायाल्पीयसे युञ्ज्याद् बालिशः कोऽपरस्ततः॥ १०"},{"b":40396,"kind":"hindi_commentary","page":821,"explains":["11.18.1","11.18.2","11.18.3","11.18.4","11.18.5","11.18.6","11.18.7","11.18.8","11.18.9","11.18.10"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! यदि गृहस्थ मनुष्य वानप्रस्थ आश्रममें जाना चाहे, तो अपनी पत्‍नीको पुत्रोंके हाथ सौंप दे अथवा अपने साथ ही ले ले और फिर शान्त चित्तसे अपनी आयुका तीसरा भाग वनमें ही रहकर व्यतीत करे॥ १॥ उसे वनके पवित्र कन्द-मूल और फलोंसे ही शरीर-निर्वाह करना चाहिये; वस्त्रकी जगह वृक्षोंकी छाल पहिने अथवा घास-पात और मृगछालासे ही काम निकाल ले॥ २॥ केश, रोएँ, नख और मूँछ-दाढ़ीरूप शरीरके मलको हटावे नहीं। दातुन न करे। जलमें घुसकर त्रिकाल स्नान करे और धरतीपर ही पड़ रहे॥ ३॥ ग्रीष्म ऋतुमें पंचाग्‍नि तपे, वर्षा ऋतुमें खुले मैदानमें रहकर वर्षाकी बौछार सहे। जाड़ेके दिनोंमें गलेतक जलमें डूबा रहे। इस प्रकार घोर तपस्यामय जीवन व्यतीत करे॥ ४॥ कन्द-मूलोंको केवल आगमें भूनकर खा ले अथवा समयानुसार पके हुए फल आदिके द्वारा ही काम चला ले। उन्हें कूटनेकी आवश्यकता हो तो ओखलीमें या सिलपर कूट ले, अन्यथा दाँतोंसे ही चबा-चबाकर खा ले॥ ५॥ वानप्रस्थाश्रमीको चाहिये कि कौन-सा पदार्थ कहाँसे लाना चाहिये, किस समय लाना चाहिये, कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं—इन बातोंको जानकर अपने जीवन-निर्वाहके लिये स्वयं ही सब प्रकारके कन्द-मूल-फल आदि ले आवे। देश-काल आदिसे अनभिज्ञ लोगोंसे लाये हुए अथवा दूसरे समयके संचित पदार्थोंको अपने काममें न ले॥ ६॥ नीवार आदि जंगली अन्‍नसे ही चरु-पुरोडाश आदि तैयार करे और उन्हींसे समयोचित आग्रयण आदि वैदिक कर्म करे। वानप्रस्थ हो जानेपर वेदविहित पशुओंद्वारा मेरा यजन न करे॥ ७॥ वेदवेत्ताओंने वानप्रस्थीके लिये अग्‍निहोत्र, दर्श, पौर्णमास और चातुर्मास्य आदिका वैसा ही विधान किया है, जैसा गृहस्थोंके लिये है॥ ८॥ इस प्रकार घोर तपस्या करते-करते मांस सूख जानेके कारण वानप्रस्थीकी एक-एक नस दीखने लगती है। वह इस तपस्याके द्वारा मेरी आराधना करके पहले तो ऋषियोंके लोकमें जाता है और वहाँसे फिर मेरे पास आ जाता है; क्योंकि तप मेरा ही स्वरूप है॥ ९॥ प्रिय उद्धव! जो पुरुष बड़े कष्टसे किये हुए और मोक्ष देनेवाले इस महान् तपस्याको स्वर्ग, ब्रह्मलोक आदि छोटे-मोटे फलोंकी प्राप्तिके लिये करता है, उससे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा? इसलिये तपस्याका अनुष्ठान निष्कामभावसे ही करना चाहिये॥ १०॥"},{"b":40397,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.11"],"text":"यदासौ नियमेऽकल्पो जरया जातवेपथुः।"},{"b":40398,"kind":"sanskrit_shloka","page":822,"verses":["11.18.11"],"text":"आत्मन्य‌ग्‍नीन् समारोप्य मच्चित्तोऽग्‍निं समाविशेत्॥ ११"},{"b":40399,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.12"],"text":"यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु।"},{"b":40400,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.12"],"text":"विरागो जायते सम्यङ् न्यस्ताग्‍निः प्रव्रजेत्ततः॥ १२"},{"b":40401,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.13"],"text":"इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे।"},{"b":40402,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.13"],"text":"अ‌ग्‍नीन् स्वप्राण आवेश्य निरपेक्षः परिव्रजेत्॥ १३"},{"b":40403,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.14"],"text":"विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः।"},{"b":40404,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.14"],"text":"विघ्नान् कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम्॥ १४"},{"b":40405,"kind":"hindi_commentary","page":822,"explains":["11.18.11","11.18.12","11.18.13","11.18.14"],"text":"प्यारे उद्धव! वानप्रस्थी जब अपने आश्रमोचित नियमोंका पालन करनेमें असमर्थ हो जाय, बुढ़ापेके कारण उसका शरीर काँपने लगे, तब यज्ञाग्‍नियोंको भावनाके द्वारा अपने अन्तःकरणमें आरोपित कर ले और अपना मन मुझमें लगाकर अग्‍निमें प्रवेश कर जाय। (यह विधान केवल उनके लिये है, जो विरक्त नहीं हैं)॥ ११॥ यदि उसकी समझमें यह बात आ जाय कि काम्य कर्मोंसे उनके फलस्वरूप जो लोक प्राप्त होते हैं, वे नरकोंके समान ही दुःखपूर्ण हैं और मनमें लोक-परलोकसे पूरा वैराग्य हो जाय तो विधिपूर्वक यज्ञाग्‍नियोंका परित्याग करके संन्यास ले ले॥ १२॥ जो वानप्रस्थी संन्यासी होना चाहे, वह पहले वेदविधिके अनुसार आठों प्रकारके श्राद्ध और प्राजापत्य यज्ञसे मेरा यजन करे। इसके बाद अपना सर्वस्व ऋत्विजको दे दे। यज्ञाग्‍नियोंको अपने प्राणोंमें लीन कर ले और फिर किसी भी स्थान, वस्तु और व्यक्तियोंकी अपेक्षा न रखकर स्वच्छन्द विचरण करे॥ १३॥ उद्धवजी! जब ब्राह्मण संन्यास लेने लगता है, तब देवतालोग स्त्री-पुत्रादि सगे-सम्बन्धियोंका रूप धारण करके उसके संन्यास-ग्रहणमें विघ्न डालते हैं। वे सोचते हैं कि ‘अरे! यह तो हमलोगोंकी अवहेलना कर, हमलोगोंको लाँघकर परमात्माको प्राप्त होने जा रहा है’॥ १४॥"},{"b":40406,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.15"],"text":"बिभृयाच्चेन्मुनिर्वासः कौपीनाच्छादनं परम्।"},{"b":40407,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.15"],"text":"त्यक्तं न दण्डपात्राभ्यामन्यत् किंचिदनापदि॥ १५"},{"b":40408,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.16"],"text":"दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्।"},{"b":40409,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.16"],"text":"सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥ १६"},{"b":40410,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.17"],"text":"मौनानीहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम्।"},{"b":40411,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.17"],"text":"न ह्येते यस्य सन्त्यंग वेणुभिर्न भवेद् यतिः॥ १७"},{"b":40412,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.18"],"text":"भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विगर्ह्यान् वर्जयंश्‍चरेत्।"},{"b":40413,"kind":"sanskrit_shloka","page":823,"verses":["11.18.18"],"text":"सप्तागारानसंक्लृप्तांस्तुष्येल्लब्धेन तावता॥ १८"},{"b":40414,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.19"],"text":"बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः।"},{"b":40415,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.19"],"text":"विभज्य पावितं शेषं भुंजीताशेषमाहृतम्॥ १९"},{"b":40416,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.20"],"text":"एकश्‍चरेन्महीमेतां निःसंगः संयतेन्द्रियः।"},{"b":40417,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.20"],"text":"आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शनः॥ २०"},{"b":40418,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.21"],"text":"विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाशयः।"},{"b":40419,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.21"],"text":"आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनिः॥ २१"},{"b":40420,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.22"],"text":"अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया।"},{"b":40421,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.22"],"text":"बन्ध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः॥ २२"},{"b":40422,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.23"],"text":"तस्मान्‍नियम्य षड्वर्गं मद्भावेन चरेन्मुनिः।"},{"b":40423,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.23"],"text":"विरक्तः क्षुल्लकामेभ्यो लब्ध्वाऽऽत्मनि सुखं महत्॥ २३"},{"b":40424,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.24"],"text":"पुरग्रामव्रजान् सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्‍चरेत्।"},{"b":40425,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.24"],"text":"पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम्॥ २४"},{"b":40426,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.25"],"text":"वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत्।"},{"b":40427,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.25"],"text":"संसिध्यत्याश्‍वसंमोहः शुद्धसत्त्वः शिलान्धसा॥ २५"},{"b":40428,"kind":"hindi_translation","page":823,"explains":["11.18.15","11.18.16","11.18.17","11.18.18","11.18.19","11.18.20","11.18.21","11.18.22","11.18.23","11.18.24","11.18.25"],"text":"यदि संन्यासी वस्त्र धारण करे तो केवल लँगोटी लगा ले और अधिक-से-अधिक उसके ऊपर एक ऐसा छोटा-सा टुकड़ा लपेट ले कि जिसमें लँगोटी ढक जाय। तथा आश्रमोचित दण्ड और कमण्डलुके अतिरिक्त और कोई भी वस्तु अपने पास न रखे। यह नियम आपत्तिकालको छोड़कर सदाके लिये है॥ १५॥ नेत्रोंसे धरती देखकर पैर रखे, कपड़ेसे छानकर जल पिये, मुँहसे प्रत्येक बात सत्यपूत—सत्यसे पवित्र हुई ही निकाले और शरीरसे जितने भी काम करे, बुद्धि-पूर्वक—सोच-विचार कर ही करे॥ १६॥ वाणीके लिये मौन, शरीरके लिये निश्‍चेष्ट स्थिति और मनके लिये प्राणायाम दण्ड हैं। जिसके पास ये तीनों दण्ड नहीं हैं, वह केवल शरीरपर बाँसके दण्ड धारण करनेसे दण्डी स्वामी नहीं हो जाता॥ १७॥ संन्यासीको चाहिये कि जातिच्युत और गोघाती आदि पतितोंको छोड़कर चारों वर्णोंकी भिक्षा ले। केवल अनिश्‍चित सात घरोंसे जितना मिल जाय, उतनेसे ही सन्तोष कर ले॥ १८॥ इस प्रकार भिक्षा लेकर बस्तीके बाहर जलाशयपर जाय, वहाँ हाथ-पैर धोकर जलके द्वारा भिक्षा पवित्र कर ले; फिर शास्त्रोक्त पद्धतिसे जिन्हें भिक्षाका भाग देना चाहिये, उन्हें देकर जो कुछ बचे उसे मौन होकर खा ले। दूसरे समयके लिये बचाकर न रखे और न अधिक माँगकर ही लाये॥ १९॥ संन्यासीको पृथ्वीपर अकेले ही विचरना चाहिये। उसकी कहीं भी आसक्ति न हो, सब इन्द्रियाँ अपने वशमें हों। वह अपने-आपमें ही मस्त रहे, आत्म-प्रेममें ही तन्मय रहे, प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितियोंमें भी धैर्य रखे और सर्वत्र समानरूपसे स्थित परमात्माका अनुभव करता रहे॥ २०॥ संन्यासीको निर्जन और निर्भय एकान्त-स्थानमें रहना चाहिये। उसका हृदय निरन्तर मेरी भावनासे विशुद्ध बना रहे। वह अपने-आपको मुझसे अभिन्‍न और अद्वितीय, अखण्डके रूपमें चिन्तन करे॥ २१॥ वह अपनी ज्ञाननिष्ठासे चित्तके बन्धन और मोक्षपर विचार करे तथा निश्‍चय करे कि इन्द्रियोंका विषयोंके लिये विक्षिप्त होना—चंचल होना बन्धन है और उनको संयममें रखना ही मोक्ष है॥ २२॥ इसलिये संन्यासीको चाहिये कि मन एवं पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको जीत ले, भोगोंकी क्षुद्रता समझकर उनकी ओरसे सर्वथा मुँह मोड़ ले और अपने-आपमें ही परम आनन्दका अनुभव करे। इस प्रकार वह मेरी भावनासे भरकर पृथ्वीमें विचरता रहे॥ २३॥ केवल भिक्षाके लिये ही नगर, गाँव, अहीरोंकी बस्ती या यात्रियोंकी टोलीमें जाय। पवित्र देश, नदी, पर्वत, वन और आश्रमोंसे पूर्ण पृथ्वीमें बिना कहीं ममता जोड़े घूमता-फिरता रहे॥ २४॥ भिक्षा भी अधिकतर वानप्रस्थियोंके आश्रमसे ही ग्रहण करे; क्योंकि कटे हुए खेतोंके दानेसे बनी हुई भिक्षा शीघ्र ही चित्तको शुद्ध कर देती है और उससे बचा-खुचा मोह दूर होकर सिद्धि प्राप्त हो जाती है॥ २५॥"},{"b":40429,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.26"],"text":"नैतद् वस्तुतया पश्येद् दृश्यमानं विनश्यति।"},{"b":40430,"kind":"sanskrit_shloka","page":824,"verses":["11.18.26"],"text":"असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात्॥ २६"},{"b":40431,"kind":"hindi_commentary","page":824,"explains":["11.18.26"],"text":"विचारवान् संन्यासी दृश्यमान जगत‍्को सत्य वस्तु कभी न समझे; क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष ही नाशवान् है। इस जगत‍्में कहीं भी अपने चित्तको लगाये नहीं। इस लोक और परलोकमें जो कुछ करने-पानेकी इच्छा हो, उससे विरक्त हो जाय॥ २६॥"},{"b":40432,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.27"],"text":"यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसंहतम्।"},{"b":40433,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.27"],"text":"सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत्॥ २७"},{"b":40434,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.28"],"text":"ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः।"},{"b":40435,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.28"],"text":"सलिंगानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः॥ २८"},{"b":40436,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.29"],"text":"बुधो बालकवत् क्रीडेत् कुशलो जडवच्चरेत्।"},{"b":40437,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.29"],"text":"वदेदुन्मत्तवद् विद्वान् गोचर्यां नैगमश्‍चरेत्॥ २९"},{"b":40438,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.30"],"text":"वेदवादरतो न स्यान्‍न पाखण्डी न हैतुकः।"},{"b":40439,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.30"],"text":"शुष्कवादविवादे न कंचित् पक्षं समाश्रयेत्॥ ३०"},{"b":40440,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.31"],"text":"नोद्विजेत जनाद् धीरो जनं चोद्वेजयेन्‍न तु।"},{"b":40441,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.31"],"text":"अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचन।"},{"b":40442,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.31"],"text":"देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्‍न केनचित्॥ ३१"},{"b":40443,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.32"],"text":"एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः।"},{"b":40444,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.32"],"text":"यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च॥ ३२"},{"b":40445,"kind":"hindi_commentary","page":825,"explains":["11.18.27","11.18.28","11.18.29","11.18.30","11.18.31","11.18.32"],"text":"संन्यासी विचार करे कि आत्मामें जो मन, वाणी और प्राणोंका संघातरूप यह जगत् है, वह सारा-का-सारा माया ही है। इस विचारके द्वारा इसका बाध करके अपने स्वरूपमें स्थित हो जाय और फिर कभी उसका स्मरण भी न करे॥ २७॥ ज्ञाननिष्ठ, विरक्त, मुमुक्षु और मोक्षकी भी अपेक्षा न रखनेवाला मेरा भक्त आश्रमोंकी मर्यादामें बद्ध नहीं है। वह चाहे तो आश्रमों और उनके चिह्नोंको छोड़-छाड़कर, वेद-शास्त्रके विधि-निषेधोंसे परे होकर स्वच्छन्द विचरे॥ २८॥ वह बुद्धिमान् होकर भी बालकोंके समान खेले। निपुण होकर भी जडवत् रहे, विद्वान् होकर भी पागलकी तरह बातचीत करे और समस्त वेद-विधियोंका जानकार होकर भी पशुवृत्तिसे (अनियत आचारवान्) रहे॥ २९॥ उसे चाहिये कि वेदोंके कर्मकाण्ड-भागकी व्याख्यामें न लगे, पाखण्ड न करे, तर्क-वितर्कसे बचे और जहाँ कोरा वाद-विवाद हो रहा हो, वहाँ कोई पक्ष न ले॥ ३०॥ वह इतना धैर्यवान् हो कि उसके मनमें किसी भी प्राणीसे उद्वेग न हो और वह स्वयं भी किसी प्राणीको उद्वि‌ग्‍न न करे। उसकी कोई निन्दा करे, तो प्रसन्‍नतासे सह ले; किसीका अपमान न करे। प्रिय उद्धव! संन्यासी इस शरीरके लिये किसीसे भी वैर न करे। ऐसा वैर तो पशु करते हैं॥ ३१॥ जैसे एक ही चन्द्रमा जलसे भरे हुए विभिन्‍न पात्रोंमें अलग-अलग दिखायी देता है, वैसे ही एक ही परमात्मा समस्त प्राणियोंमें और अपनेमें भी स्थित है। सबकी आत्मा तो एक है ही, पंचभूतोंसे बने हुए शरीर भी सबके एक ही हैं, क्योंकि सब पांचभौतिक ही तो हैं। (ऐसी अवस्थामें किसीसे भी वैर-विरोध करना अपना ही वैर-विरोध है)॥ ३२॥"},{"b":40446,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.33"],"text":"अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्‍वचित्।"},{"b":40447,"kind":"sanskrit_shloka","page":825,"verses":["11.18.33"],"text":"लब्ध्वा न हृष्येद् धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम्॥ ३३"},{"b":40448,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.34"],"text":"आहारार्थं समीहेत युक्तं तत् प्राणधारणम्।"},{"b":40449,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.34"],"text":"तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते॥ ३४"},{"b":40450,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.35"],"text":"यदृच्छयोपपन्‍नान्‍नमद्याच्छ्रेष्ठमुतापरम् ।"},{"b":40451,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.35"],"text":"तथा वासस्तथा शय्यां प्राप्तं प्राप्तं भजेन्मुनिः॥ ३५"},{"b":40452,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.36"],"text":"शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत्।"},{"b":40453,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.36"],"text":"अन्यांश्‍च नियमान् ज्ञानी यथाहं लीलयेश्‍वरः॥ ३६"},{"b":40454,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.37"],"text":"न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता।"},{"b":40455,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.37"],"text":"आदेहान्तात् क्‍वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया॥ ३७"},{"b":40456,"kind":"hindi_commentary","page":825,"explains":["11.18.33","11.18.34","11.18.35","11.18.36","11.18.37"],"text":"प्रिय उद्धव! संन्यासीको किसी दिन यदि समयपर भोजन न मिले, तो उसे दुःखी नहीं होना चाहिये और यदि बराबर मिलता रहे, तो हर्षित न होना चाहिये। उसे चाहिये कि वह धैर्य रखे। मनमें हर्ष और विषाद दोनों प्रकारके विकार न आने दे; क्योंकि भोजन मिलना और न मिलना दोनों ही प्रारब्धके अधीन हैं॥ ३३॥ भिक्षा अवश्य माँगनी चाहिये, ऐसा करना उचित ही है; क्योंकि भिक्षासे ही प्राणोंकी रक्षा होती है। प्राण रहनेसे ही तत्त्वका विचार होता है और तत्त्वविचारसे तत्त्वज्ञान होकर मुक्ति मिलती है॥ ३४॥ संन्यासीको प्रारब्धके अनुसार अच्छी या बुरी—जैसी भी भिक्षा मिल जाय, उसीसे पेट भर ले। वस्त्र और बिछौने भी जैसे मिल जायँ, उन्हींसे काम चला ले। उनमें अच्छेपन या बुरेपनकी कल्पना न करे॥ ३५॥ जैसे मैं परमेश्‍वर होनेपर भी अपनी लीलासे ही शौच आदि शास्त्रोक्त नियमोंका पालन करता हूँ, वैसे ही ज्ञाननिष्ठ पुरुष भी शौच, आचमन, स्नान और दूसरे नियमोंका लीलासे ही आचरण करे। वह शास्त्रविधिके अधीन होकर—विधि-किंकर होकर न करे॥ ३६॥ क्योंकि ज्ञाननिष्ठ पुरुषको भेदकी प्रतीति ही नहीं होती। जो पहले थी, वह भी मुझ सर्वात्माके साक्षात्कारसे नष्ट हो गयी। यदि कभी-कभी मरणपर्यन्त बाधित भेदकी प्रतीति भी होती है, तब भी देहपात हो जानेपर वह मुझसे एक हो जाता है॥ ३७॥"},{"b":40457,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.38"],"text":"दुःखोदर्केषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान्।"},{"b":40458,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.38"],"text":"अजिज्ञासितमद्धर्मो गुरुं मुनिमुपाव्रजेत्॥ ३८"},{"b":40459,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.39"],"text":"तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः।"},{"b":40460,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.39"],"text":"यावद् ब्रह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः॥ ३९"},{"b":40461,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.40"],"text":"यस्त्वसंयतषड्वर्गः प्रचण्डेन्द्रियसारथिः।"},{"b":40462,"kind":"sanskrit_shloka","page":826,"verses":["11.18.40"],"text":"ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीवति ॥ ४०"},{"b":40463,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.41"],"text":"सुरानात्मानमात्मस्थं निह्नुते मां च धर्महा।"},{"b":40464,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.41"],"text":"अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते॥ ४१"},{"b":40465,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.42"],"text":"भिक्षोर्धर्मः शमोऽहिंसा तप ईक्षा वनौकसः।"},{"b":40466,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.42"],"text":"गृहिणो भूतरक्षेज्या द्विजस्याचार्यसेवनम्॥ ४२"},{"b":40467,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.43"],"text":"ब्रह्मचर्यं तपः शौचं सन्तोषो भूतसौहृदम्।"},{"b":40468,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.43"],"text":"गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तुः सर्वेषां मदुपासनम्॥ ४३"},{"b":40469,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.44"],"text":"इति मां यः स्वधर्मेण भजन् नित्यमनन्यभाक्।"},{"b":40470,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.44"],"text":"सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम्॥ ४४"},{"b":40471,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.45"],"text":"भक्त्योद्धवानपायिन्या सर्वलोकमहेश्‍वरम्।"},{"b":40472,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.45"],"text":"सर्वोत्पत्त्यप्ययं ब्रह्म कारणं मोपयाति सः॥ ४५"},{"b":40473,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.46"],"text":"इति स्वधर्मनिर्णिक्तसत्त्वो निर्ज्ञातमद्गतिः।"},{"b":40474,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.46"],"text":"ज्ञानविज्ञानसम्पन्‍नो नचिरात् समुपैति माम्॥ ४६"},{"b":40475,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.47"],"text":"वर्णाश्रमवतां धर्म एष आचारलक्षणः।"},{"b":40476,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.47"],"text":"स एव मद्भक्तियुतो निःश्रेयसकरः परः॥ ४७"},{"b":40477,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.48"],"text":"एतत्तेऽभिहितं साधो भवान् पृच्छति यच्च माम्।"},{"b":40478,"kind":"sanskrit_shloka","page":827,"verses":["11.18.48"],"text":"यथा स्वधर्मसंयुक्तो भक्तो मां समियात् परम्॥ ४८"},{"b":40479,"kind":"hindi_commentary","page":826,"explains":["11.18.38","11.18.39","11.18.40","11.18.41","11.18.42","11.18.43","11.18.44","11.18.45","11.18.46","11.18.47","11.18.48"],"text":"उद्धवजी! (यह तो हुई ज्ञानवान्की बात, अब केवल वैराग्यवान्की बात सुनो।) जितेन्द्रिय पुरुष, जब यह निश्‍चय हो जाय कि संसारके विषयोंके भोगका फल दुःख-ही-दुःख है, तब वह विरक्त हो जाय और यदि वह मेरी प्राप्तिके साधनोंको न जानता हो तो भगवच्चिन्तनमें तन्मय रहनेवाले ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुकी शरण ग्रहण करे॥ ३८॥ वह गुरुकी दृढ़ भक्ति करे, श्रद्धा रखे और उनमें दोष कभी न निकाले। जबतक ब्रह्मका ज्ञान हो, तबतक बड़े आदरसे मुझे ही गुरुके रूपमें समझता हुआ उनकी सेवा करे॥ ३९॥ किन्तु जिसने पाँच इन्द्रियाँ और मन, इन छहोंपर विजय नहीं प्राप्त की है, जिसके इन्द्रियरूपी घोड़े और बुद्धिरूपी सारथि बिगड़े हुए हैं और जिसके हृदयमें न ज्ञान है और न तो वैराग्य, वह यदि त्रिदण्डी संन्यासीका वेष धारणकर पेट पालता है तो वह संन्यासधर्मका सत्तानाश ही कर रहा है और अपने पूज्य देवताओंको, अपने-आपको और अपने हृदयमें स्थित मुझको ठगनेकी चेष्टा करता है। अभी उस वेषमात्रके संन्यासीकी वासनाएँ क्षीण नहीं हुई हैं; इसलिये वह इस लोक और परलोक दोनोंसे हाथ धो बैठता है॥ ४०-४१॥ संन्यासीका मुख्य धर्म है—शान्ति और अहिंसा। वानप्रस्थीका मुख्य धर्म है—तपस्या और भगवद्भाव। गृहस्थका मुख्य धर्म है—प्राणियोंकी रक्षा और यज्ञ-याग तथा ब्रह्मचारीका मुख्य धर्म है—आचार्यकी सेवा॥ ४२॥ गृहस्थ भी केवल ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रीका सहवास करे। उसके लिये भी ब्रह्मचर्य, तपस्या, शौच, सन्तोष और समस्त प्राणियोंके प्रति प्रेमभाव—ये मुख्य धर्म हैं। मेरी उपासना तो सभीको करनी चाहिये॥ ४३॥ जो पुरुष इस प्रकार अनन्यभावसे अपने वर्णाश्रमधर्मके द्वारा मेरी सेवामें लगा रहता है और समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करता रहता है, उसे मेरी अविचल भक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ४४॥ उद्धवजी! मैं सम्पूर्ण लोकोंका एकमात्र स्वामी, सबकी उत्पत्ति और प्रलयका परम कारण ब्रह्म हूँ। नित्य-निरन्तर बढ़नेवाली अखण्ड भक्तिके द्वारा वह मुझे प्राप्त कर लेता है॥ ४५॥ इस प्रकार वह गृहस्थ अपने धर्मपालनके द्वारा अन्तःकरणको शुद्ध करके मेरे ऐश्‍वर्यको—मेरे स्वरूपको जान लेता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्‍न होकर शीघ्र ही मुझे प्राप्त कर लेता है॥ ४६॥ मैंने तुम्हें यह सदाचाररूप वर्णाश्रमियोंका धर्म बतलाया है। यदि इस धर्मानुष्ठानमें मेरी भक्तिका पुट लग जाय, तब तो इससे अनायास ही परम कल्याणस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति हो जाय॥ ४७॥ साधुस्वभाव उद्धव! तुमने मुझसे जो प्रश्‍न किया था, उसका उत्तर मैंने दे दिया और यह बतला दिया कि अपने धर्मका पालन करनेवाला भक्त मुझ परब्रह्म-स्वरूपको किस प्रकार प्राप्त होता है॥ ४८॥"},{"b":40480,"kind":"hindi_commentary","page":827,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे अष्टादशोऽध्यायः"},{"b":40481,"kind":"hindi_translation","page":827,"text":"॥ १८॥"}],"notes":[{"id":"v2:415","mark":"१","page":822,"after_verse":"11.18.7","text":"कालचोदितम्।"},{"id":"v2:416","mark":"२","page":822,"after_verse":"11.18.8","text":"पौर्णमासः।"},{"id":"v2:417","mark":"*","page":822,"after_verse":"11.18.10","text":"अर्थात् मुनि इस बातको जानकर कि अमुक पदार्थ कहाँसे लाना चाहिये, किस समय लाना चाहिये और कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं, स्वयं ही नवीन-नवीन कन्द-मूल-फल आदिका संचय करे। देश-कालादिसे अनभिज्ञ अन्य जनोंके लाये हुए अथवा कालान्तरमें संचय किये हुए पदार्थोंके सेवनसे व्याधि आदिके कारण तपस्यामें विघ्न होनेकी आशंका है।"}],"corrections":{"count":0,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}