{"id":"10.82","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 82","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः","topics":["भगवान् श्रीकृष्ण-बलरामसे गोप-गोपियोंकी भेंट"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.82.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[629,636]},"verses":[{"id":"10.82.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/1/","page":629,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथैकदा द्वारवत्यां वसतो रामकृष्णयोः।","सूर्योपरागः सुमहानासीत् कल्पक्षये यथा॥ १"],"iast":["athaikadā dvāravatyāṃ vasato rāmakṛṣṇayoḥ|","sūryoparāgaḥ sumahānāsīt kalpakṣaye yathā|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी द्वारकामें निवास कर रहे थे। एक बार सर्वग्रास सूर्यग्रहण लगा, जैसा कि प्रलयके समय लगा करता है॥ १॥"},{"id":"10.82.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/2/","page":630,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं ज्ञात्वा मनुजा राजन् पुरस्तादेव सर्वतः।","समन्तपंचकं क्षेत्रं ययुः श्रेयोविधित्सया॥ २"],"iast":["taṃ jñātvā manujā rājan purastādeva sarvataḥ|","samantapaṃcakaṃ kṣetraṃ yayuḥ śreyovidhitsayā|| 2"],"meaning":"परीक्षित्! मनुष्योंको ज्योतिषियोंके द्वारा उस ग्रहणका पता पहलेसे ही चल गया था, इसलिये सब लोग अपने-अपने कल्याणके उद्देश्यसे पुण्य आदि उपार्जन करनेके लिये समन्तपंचक-तीर्थ कुरुक्षेत्रमें आये॥ २॥"},{"id":"10.82.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/3/","page":630,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निःक्षत्रियां महीं कुर्वन् रामः शस्त्रभृतां वरः।","नृपाणां रुधिरौघेण यत्र चक्रे महाह्रदान्॥ ३"],"iast":["niḥkṣatriyāṃ mahīṃ kurvan rāmaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ|","nṛpāṇāṃ rudhiraugheṇa yatra cakre mahāhradān|| 3"],"meaning":"समन्तपंचक क्षेत्र वह है, जहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने सारी पृथ्वीको क्षत्रियहीन करके राजाओंकी रुधिरधारासे पाँच बड़े-बड़े कुण्ड बना दिये थे॥ ३॥"},{"id":"10.82.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/4/","page":630,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ईजे च भगवान् रामो यत्रास्पृष्टोऽपि कर्मणा।","लोकस्य ग्राहयन्‍नीशो यथान्योऽघापनुत्तये॥ ४"],"iast":["īje ca bhagavān rāmo yatrāspṛṣṭo'pi karmaṇā|","lokasya grāhayannīśo yathānyo'ghāpanuttaye|| 4"],"meaning":"जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने पापकी निवृत्तिके लिये प्रायश्‍चित्त करता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् परशुरामने अपने साथ कर्मका कुछ सम्बन्ध न होनेपर भी लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये वहींपर यज्ञ किया था॥ ४॥"},{"id":"10.82.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/5/","page":630,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["महत्यां तीर्थयात्रायां तत्रागन् भारतीः प्रजाः।","वृष्णयश्‍च तथाक्रूरवसुदेवाहुकादयः॥ ५"],"iast":["mahatyāṃ tīrthayātrāyāṃ tatrāgan bhāratīḥ prajāḥ|","vṛṣṇayaśca tathākrūravasudevāhukādayaḥ|| 5"],"meaning":"परीक्षित्! इस महान् तीर्थयात्राके अवसरपर भारतवर्षके सभी प्रान्तोंकी जनता कुरुक्षेत्र आयी थी। उनमें अक्रूर, वसुदेव, उग्रसेन आदि बड़े-बूढ़े तथा गद, प्रद्युम्‍न, साम्ब आदि अन्य यदुवंशी भी अपने-अपने पापोंका नाश करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये थे। प्रद्युम्‍ननन्दन अनिरुद्ध और यदुवंशी सेनापति कृतवर्मा—ये दोनों सुचन्द्र, शुक, सारण आदिके साथ नगरकी रक्षाके लिये द्वारकामें रह गये थे। यदुवंशी एक तो स्वभावसे ही परम तेजस्वी थे; दूसरे गलेमें सोनेकी माला, दिव्य पुष्पोंके हार, बहुमूल्य वस्त्र और कवचोंसे सुसज्जित होनेके कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे तीर्थयात्राके पथमें देवताओंके विमानके समान रथों, समुद्रकी तरंगके समान चलनेवाले घोड़ों, बादलोंके समान विशालकाय एवं गर्जना करते हुए हाथियों तथा विद्याधरोंके समान मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकियोंपर अपनी पत्‍नियोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, मानो स्वर्गके देवता ही यात्रा कर रहे हों। महाभाग्यवान् यदुवंशियोंने कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर एकाग्रचित्तसे संयमपूर्वक स्नान किया और ग्रहणके उपलक्ष्यमें निश्‍चित कालतक उपवास किया॥ ५—९॥","meaning_covers":[5,9]},{"id":"10.82.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/6/","page":630,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ययुर्भारत तत् क्षेत्रं स्वमघं क्षपयिष्णवः।","गदप्रद्युम्‍नसाम्बाद्याः सुचन्द्रशुकसारणैः॥ ६"],"iast":["yayurbhārata tat kṣetraṃ svamaghaṃ kṣapayiṣṇavaḥ|","gadapradyumnasāmbādyāḥ sucandraśukasāraṇaiḥ|| 6"],"meaning":"परीक्षित्! इस महान् तीर्थयात्राके अवसरपर भारतवर्षके सभी प्रान्तोंकी जनता कुरुक्षेत्र आयी थी। उनमें अक्रूर, वसुदेव, उग्रसेन आदि बड़े-बूढ़े तथा गद, प्रद्युम्‍न, साम्ब आदि अन्य यदुवंशी भी अपने-अपने पापोंका नाश करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये थे। प्रद्युम्‍ननन्दन अनिरुद्ध और यदुवंशी सेनापति कृतवर्मा—ये दोनों सुचन्द्र, शुक, सारण आदिके साथ नगरकी रक्षाके लिये द्वारकामें रह गये थे। यदुवंशी एक तो स्वभावसे ही परम तेजस्वी थे; दूसरे गलेमें सोनेकी माला, दिव्य पुष्पोंके हार, बहुमूल्य वस्त्र और कवचोंसे सुसज्जित होनेके कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे तीर्थयात्राके पथमें देवताओंके विमानके समान रथों, समुद्रकी तरंगके समान चलनेवाले घोड़ों, बादलोंके समान विशालकाय एवं गर्जना करते हुए हाथियों तथा विद्याधरोंके समान मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकियोंपर अपनी पत्‍नियोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, मानो स्वर्गके देवता ही यात्रा कर रहे हों। महाभाग्यवान् यदुवंशियोंने कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर एकाग्रचित्तसे संयमपूर्वक स्नान किया और ग्रहणके उपलक्ष्यमें निश्‍चित कालतक उपवास किया॥ ५—९॥","meaning_covers":[5,9]},{"id":"10.82.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/7/","page":630,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आस्तेऽनिरुद्धो रक्षायां कृतवर्मा च यूथपः।","ते रथैर्देवधिष्ण्याभैर्हयैश्‍च तरलप्लवैः॥ ७"],"iast":["āste'niruddho rakṣāyāṃ kṛtavarmā ca yūthapaḥ|","te rathairdevadhiṣṇyābhairhayaiśca taralaplavaiḥ|| 7"],"meaning":"परीक्षित्! इस महान् तीर्थयात्राके अवसरपर भारतवर्षके सभी प्रान्तोंकी जनता कुरुक्षेत्र आयी थी। उनमें अक्रूर, वसुदेव, उग्रसेन आदि बड़े-बूढ़े तथा गद, प्रद्युम्‍न, साम्ब आदि अन्य यदुवंशी भी अपने-अपने पापोंका नाश करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये थे। प्रद्युम्‍ननन्दन अनिरुद्ध और यदुवंशी सेनापति कृतवर्मा—ये दोनों सुचन्द्र, शुक, सारण आदिके साथ नगरकी रक्षाके लिये द्वारकामें रह गये थे। यदुवंशी एक तो स्वभावसे ही परम तेजस्वी थे; दूसरे गलेमें सोनेकी माला, दिव्य पुष्पोंके हार, बहुमूल्य वस्त्र और कवचोंसे सुसज्जित होनेके कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे तीर्थयात्राके पथमें देवताओंके विमानके समान रथों, समुद्रकी तरंगके समान चलनेवाले घोड़ों, बादलोंके समान विशालकाय एवं गर्जना करते हुए हाथियों तथा विद्याधरोंके समान मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकियोंपर अपनी पत्‍नियोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, मानो स्वर्गके देवता ही यात्रा कर रहे हों। महाभाग्यवान् यदुवंशियोंने कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर एकाग्रचित्तसे संयमपूर्वक स्नान किया और ग्रहणके उपलक्ष्यमें निश्‍चित कालतक उपवास किया॥ ५—९॥","meaning_covers":[5,9]},{"id":"10.82.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/8/","page":630,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गजैर्नदद्भिरभ्राभैर्नृभिर्विद्याधरद्युभिः ।","व्यरोचन्त महातेजाः पथि कांचनमालिनः॥ ८"],"iast":["gajairnadadbhirabhrābhairnṛbhirvidyādharadyubhiḥ |","vyarocanta mahātejāḥ pathi kāṃcanamālinaḥ|| 8"],"meaning":"परीक्षित्! इस महान् तीर्थयात्राके अवसरपर भारतवर्षके सभी प्रान्तोंकी जनता कुरुक्षेत्र आयी थी। उनमें अक्रूर, वसुदेव, उग्रसेन आदि बड़े-बूढ़े तथा गद, प्रद्युम्‍न, साम्ब आदि अन्य यदुवंशी भी अपने-अपने पापोंका नाश करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये थे। प्रद्युम्‍ननन्दन अनिरुद्ध और यदुवंशी सेनापति कृतवर्मा—ये दोनों सुचन्द्र, शुक, सारण आदिके साथ नगरकी रक्षाके लिये द्वारकामें रह गये थे। यदुवंशी एक तो स्वभावसे ही परम तेजस्वी थे; दूसरे गलेमें सोनेकी माला, दिव्य पुष्पोंके हार, बहुमूल्य वस्त्र और कवचोंसे सुसज्जित होनेके कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे तीर्थयात्राके पथमें देवताओंके विमानके समान रथों, समुद्रकी तरंगके समान चलनेवाले घोड़ों, बादलोंके समान विशालकाय एवं गर्जना करते हुए हाथियों तथा विद्याधरोंके समान मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकियोंपर अपनी पत्‍नियोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, मानो स्वर्गके देवता ही यात्रा कर रहे हों। महाभाग्यवान् यदुवंशियोंने कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर एकाग्रचित्तसे संयमपूर्वक स्नान किया और ग्रहणके उपलक्ष्यमें निश्‍चित कालतक उपवास किया॥ ५—९॥","meaning_covers":[5,9]},{"id":"10.82.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/9/","page":630,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिव्यस्रग्वस्त्रसन्‍नाहाः कलत्रैः खेचरा इव।","तत्र स्नात्वा महाभागा उपोष्य सुसमाहिताः॥ ९"],"iast":["divyasragvastrasannāhāḥ kalatraiḥ khecarā iva|","tatra snātvā mahābhāgā upoṣya susamāhitāḥ|| 9"],"meaning":"परीक्षित्! इस महान् तीर्थयात्राके अवसरपर भारतवर्षके सभी प्रान्तोंकी जनता कुरुक्षेत्र आयी थी। उनमें अक्रूर, वसुदेव, उग्रसेन आदि बड़े-बूढ़े तथा गद, प्रद्युम्‍न, साम्ब आदि अन्य यदुवंशी भी अपने-अपने पापोंका नाश करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये थे। प्रद्युम्‍ननन्दन अनिरुद्ध और यदुवंशी सेनापति कृतवर्मा—ये दोनों सुचन्द्र, शुक, सारण आदिके साथ नगरकी रक्षाके लिये द्वारकामें रह गये थे। यदुवंशी एक तो स्वभावसे ही परम तेजस्वी थे; दूसरे गलेमें सोनेकी माला, दिव्य पुष्पोंके हार, बहुमूल्य वस्त्र और कवचोंसे सुसज्जित होनेके कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे तीर्थयात्राके पथमें देवताओंके विमानके समान रथों, समुद्रकी तरंगके समान चलनेवाले घोड़ों, बादलोंके समान विशालकाय एवं गर्जना करते हुए हाथियों तथा विद्याधरोंके समान मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकियोंपर अपनी पत्‍नियोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, मानो स्वर्गके देवता ही यात्रा कर रहे हों। महाभाग्यवान् यदुवंशियोंने कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर एकाग्रचित्तसे संयमपूर्वक स्नान किया और ग्रहणके उपलक्ष्यमें निश्‍चित कालतक उपवास किया॥ ५—९॥","meaning_covers":[5,9]},{"id":"10.82.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/10/","page":631,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ब्राह्मणेभ्यो ददुर्धेनूर्वासःस्रग्रुक्ममालिनीः।","रामह्रदेषु विधिवत् पुनराप्लुत्य वृष्णयः॥ १०"],"iast":["brāhmaṇebhyo dadurdhenūrvāsaḥsragrukmamālinīḥ|","rāmahradeṣu vidhivat punarāplutya vṛṣṇayaḥ|| 10"],"meaning":"उन्होंने ब्राह्मणोंको गोदान किया। ऐसी गौओंका दान किया जिन्हें वस्त्रोंकी सुन्दर-सुन्दर झूलें, पुष्पमालाएँ एवं सोनेकी जंजीरें पहना दी गयी थीं। इसके बाद ग्रहणका मोक्ष हो जानेपर परशुरामजीके बनाये हुए कुण्डोंमें यदुवंशियोंने विधिपूर्वक स्नान किया और सत्पात्र ब्राह्मणोंको सुन्दर-सुन्दर पकवानोंका भोजन कराया। उन्होंने अपने मनमें यह संकल्प किया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें हमारी प्रेमभक्ति बनी रहे। भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना आदर्श और इष्टदेव माननेवाले यदुवंशियोंने ब्राह्मणोंसे अनुमति लेकर तब स्वयं भोजन किया और फिर घनी एवं ठंडी छायावाले वृक्षोंके नीचे अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार डेरा डालकर ठहर गये। परीक्षित्! विश्राम कर लेनेके बाद यदुवंशियोंने अपने सुहृद् और सम्बन्धी राजाओंसे मिलना-भेंटना शुरू किया॥ १०—१२॥","meaning_covers":[10,12]},{"id":"10.82.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/11/","page":631,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ददुः स्वन्‍नं द्विजाग्र्येभ्यः कृष्णे नो भक्तिरस्त्विति।","स्वयं च तदनुज्ञाता वृष्णयः कृष्णदेवताः॥ ११"],"iast":["daduḥ svannaṃ dvijāgryebhyaḥ kṛṣṇe no bhaktirastviti|","svayaṃ ca tadanujñātā vṛṣṇayaḥ kṛṣṇadevatāḥ|| 11"],"meaning":"उन्होंने ब्राह्मणोंको गोदान किया। ऐसी गौओंका दान किया जिन्हें वस्त्रोंकी सुन्दर-सुन्दर झूलें, पुष्पमालाएँ एवं सोनेकी जंजीरें पहना दी गयी थीं। इसके बाद ग्रहणका मोक्ष हो जानेपर परशुरामजीके बनाये हुए कुण्डोंमें यदुवंशियोंने विधिपूर्वक स्नान किया और सत्पात्र ब्राह्मणोंको सुन्दर-सुन्दर पकवानोंका भोजन कराया। उन्होंने अपने मनमें यह संकल्प किया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें हमारी प्रेमभक्ति बनी रहे। भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना आदर्श और इष्टदेव माननेवाले यदुवंशियोंने ब्राह्मणोंसे अनुमति लेकर तब स्वयं भोजन किया और फिर घनी एवं ठंडी छायावाले वृक्षोंके नीचे अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार डेरा डालकर ठहर गये। परीक्षित्! विश्राम कर लेनेके बाद यदुवंशियोंने अपने सुहृद् और सम्बन्धी राजाओंसे मिलना-भेंटना शुरू किया॥ १०—१२॥","meaning_covers":[10,12]},{"id":"10.82.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/12/","page":631,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भुक्त्वोपविविशुः कामं स्निग्धच्छायाङ्‌घ्रिपाङ्‌घ्रिषु।","तत्रागतांस्ते ददृशुः सुहृत्सम्बन्धिनो नृपान्॥ १२"],"iast":["bhuktvopaviviśuḥ kāmaṃ snigdhacchāyāṅghripāṅghriṣu|","tatrāgatāṃste dadṛśuḥ suhṛtsambandhino nṛpān|| 12"],"meaning":"उन्होंने ब्राह्मणोंको गोदान किया। ऐसी गौओंका दान किया जिन्हें वस्त्रोंकी सुन्दर-सुन्दर झूलें, पुष्पमालाएँ एवं सोनेकी जंजीरें पहना दी गयी थीं। इसके बाद ग्रहणका मोक्ष हो जानेपर परशुरामजीके बनाये हुए कुण्डोंमें यदुवंशियोंने विधिपूर्वक स्नान किया और सत्पात्र ब्राह्मणोंको सुन्दर-सुन्दर पकवानोंका भोजन कराया। उन्होंने अपने मनमें यह संकल्प किया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें हमारी प्रेमभक्ति बनी रहे। भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना आदर्श और इष्टदेव माननेवाले यदुवंशियोंने ब्राह्मणोंसे अनुमति लेकर तब स्वयं भोजन किया और फिर घनी एवं ठंडी छायावाले वृक्षोंके नीचे अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार डेरा डालकर ठहर गये। परीक्षित्! विश्राम कर लेनेके बाद यदुवंशियोंने अपने सुहृद् और सम्बन्धी राजाओंसे मिलना-भेंटना शुरू किया॥ १०—१२॥","meaning_covers":[10,12]},{"id":"10.82.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/13/","page":631,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मत्स्योशीनरकौसल्यविदर्भकुरुसृंजयान् ।","काम्बोजकैकयान् मद्रान् कुन्तीनानर्तकेरलान्॥ १३"],"iast":["matsyośīnarakausalyavidarbhakurusṛṃjayān |","kāmbojakaikayān madrān kuntīnānartakeralān|| 13"],"meaning":"वहाँ मत्स्य, उशीनर, कोसल, विदर्भ, कुरु, सृंजय, काम्बोज, कैकय, मद्र, कुन्ति, आनर्त, केरल एवं दूसरे अनेकों देशोंके—अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके—सैकड़ों नरपति आये हुए थे। परीक्षित्! इनके अतिरिक्त यदुवंशियोंके परम हितैषी बन्धु नन्द आदि गोप तथा भगवान्‌के दर्शनके लिये चिरकालसे उत्कण्ठित गोपियाँ भी वहाँ आयी हुई थीं। यादवोंने इन सबको देखा॥ १३-१४॥","meaning_covers":[13,14]},{"id":"10.82.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/14/","page":631,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्यांश्‍चैवात्मपक्षीयान् परांश्‍च शतशो नृप।","नन्दादीन् सुहृदो गोपान् गोपीश्‍चोत्कण्ठिताश्‍चिरम्॥ १४"],"iast":["anyāṃścaivātmapakṣīyān parāṃśca śataśo nṛpa|","nandādīn suhṛdo gopān gopīścotkaṇṭhitāściram|| 14"],"meaning":"वहाँ मत्स्य, उशीनर, कोसल, विदर्भ, कुरु, सृंजय, काम्बोज, कैकय, मद्र, कुन्ति, आनर्त, केरल एवं दूसरे अनेकों देशोंके—अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके—सैकड़ों नरपति आये हुए थे। परीक्षित्! इनके अतिरिक्त यदुवंशियोंके परम हितैषी बन्धु नन्द आदि गोप तथा भगवान्‌के दर्शनके लिये चिरकालसे उत्कण्ठित गोपियाँ भी वहाँ आयी हुई थीं। यादवोंने इन सबको देखा॥ १३-१४॥","meaning_covers":[13,14]},{"id":"10.82.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/15/","page":631,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्योन्यसन्दर्शनहर्षरंहसा प्रोत्फुल्लहृद्वक्त्रसरोरुहश्रियः ।","आश्‍लिष्य गाढं नयनैः स्रवज्जला हृष्यत्त्वचो रुद्धगिरो ययुर्मुदम्॥ १५"],"iast":["anyonyasandarśanaharṣaraṃhasā protphullahṛdvaktrasaroruhaśriyaḥ |","āśliṣya gāḍhaṃ nayanaiḥ sravajjalā hṛṣyattvaco ruddhagiro yayurmudam|| 15"],"meaning":"परीक्षित्! एक-दूसरेके दर्शन, मिलन और वार्तालापसे सभीको बड़ा आनन्द हुआ। सभीके हृदय-कमल एवं मुख-कमल खिल उठे। सब एक-दूसरेको भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगाते, उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी झड़ी लग जाती, रोम-रोम खिल उठता, प्रेमके आवेगसे बोली बंद हो जाती और सब-के-सब आनन्द-समुद्रमें डूबने-उतराने लगते॥ १५॥"},{"id":"10.82.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/16/","page":631,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्त्रियश्‍च संवीक्ष्य मिथोऽतिसौहृद-","स्मितामलापांगदृशोऽभिरेभिरे ।","स्तनैः स्तनान् कुंकुमपंकरूषितान्","निहत्य दोर्भिः प्रणयाश्रुलोचनाः॥ १६"],"iast":["striyaśca saṃvīkṣya mitho'tisauhṛda-","smitāmalāpāṃgadṛśo'bhirebhire |","stanaiḥ stanān kuṃkumapaṃkarūṣitān","nihatya dorbhiḥ praṇayāśrulocanāḥ|| 16"],"meaning":"पुरुषोंकी भाँति स्त्रियाँ भी एक-दूसरेको देखकर प्रेम और आनन्दसे भर गयीं। वे अत्यन्त सौहार्द, मन्द-मन्द मुसकान, परम पवित्र तिरछी चितवनसे देख-देखकर परस्पर भेंट-अँकवार भरने लगीं। वे अपनी भुजाओंमें भरकर केसर लगे हुए वक्षःस्थलोंको दूसरी स्त्रियोंके वक्षःस्थलोंसे दबातीं और अत्यन्त आनन्दका अनुभव करतीं। उस समय उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू छलकने लगते॥ १६॥"},{"id":"10.82.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/17/","page":632,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽभिवाद्य ते वृद्धान् यविष्ठैरभिवादिताः।","स्वागतं कुशलं पृष्ट्वा चक्रुः कृष्णकथा मिथः॥ १७"],"iast":["tato'bhivādya te vṛddhān yaviṣṭhairabhivāditāḥ|","svāgataṃ kuśalaṃ pṛṣṭvā cakruḥ kṛṣṇakathā mithaḥ|| 17"],"meaning":"अवस्था आदिमें छोटोंने बड़े-बूढ़ोंको प्रणाम किया और उन्होंने अपनेसे छोटोंका प्रणाम स्वीकार किया। वे एक-दूसरेका स्वागत करके तथा कुशल-मंगल आदि पूछकर फिर श्रीकृष्णकी मधुर लीलाएँ आपसमें कहने-सुनने लगे॥ १७॥"},{"id":"10.82.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/18/","page":632,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पृथा भ्रातॄन् स्वसॄर्वीक्ष्य तत्पुत्रान् पितरावपि।","भ्रातृपत्‍नीर्मुकुन्दं च जहौ संकथया शुचः॥ १८"],"iast":["pṛthā bhrātṝn svasṝrvīkṣya tatputrān pitarāvapi|","bhrātṛpatnīrmukundaṃ ca jahau saṃkathayā śucaḥ|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! कुन्ती वसुदेव आदि अपने भाइयों, बहिनों, उनके पुत्रों, माता-पिता, भाभियों और भगवान् श्रीकृष्णको देखकर तथा उनसे बातचीत करके अपना सारा दुःख भूल गयीं॥ १८॥"},{"id":"10.82.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/19/","page":632,"speaker":"कुन्त्युवाच","sanskrit":["आर्य भ्रातरहं मन्ये आत्मानमकृताशिषम्।","यद् वा आपत्सु मद्वार्तां नानुस्मरथ सत्तमाः॥ १९"],"iast":["ārya bhrātarahaṃ manye ātmānamakṛtāśiṣam|","yad vā āpatsu madvārtāṃ nānusmaratha sattamāḥ|| 19"],"meaning":"कुन्तीने वसुदेवजीसे कहा—भैया! मैं सचमुच बड़ी अभागिन हूँ। मेरी एक भी साध पूरी न हुई। आप-जैसे साधु-स्वभाव सज्जन भाई आपत्तिके समय मेरी सुधि भी न लें, इससे बढ़कर दुःखकी बात क्या होगी?॥ १९॥"},{"id":"10.82.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/20/","page":632,"speaker":"कुन्त्युवाच","sanskrit":["सुहृदो ज्ञातयः पुत्रा भ्रातरः पितरावपि।","नानुस्मरन्ति स्वजनं यस्य दैवमदक्षिणम्॥ २०"],"iast":["suhṛdo jñātayaḥ putrā bhrātaraḥ pitarāvapi|","nānusmaranti svajanaṃ yasya daivamadakṣiṇam|| 20"],"meaning":"भैया! विधाता जिसके बाँयें हो जाता है उसे स्वजन-सम्बन्धी, पुत्र और माता-पिता भी भूल जाते हैं। इसमें आपलोगोंका कोई दोष नहीं॥ २०॥"},{"id":"10.82.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/21/","page":632,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["अम्ब मास्मानसूयेथा दैवक्रीडनकान् नरान्।","ईशस्य हि वशे लोकः कुरुते कार्यतेऽथवा॥ २१"],"iast":["amba māsmānasūyethā daivakrīḍanakān narān|","īśasya hi vaśe lokaḥ kurute kāryate'thavā|| 21"],"meaning":"वसुदेवजीने कहा—बहिन! उलाहना मत दो। हमसे बिलग न मानो। सभी मनुष्य दैवके खिलौने हैं। यह सम्पूर्ण लोक ईश्‍वरके वशमें रहकर कर्म करता है और उसका फल भोगता है॥ २१॥"},{"id":"10.82.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/22/","page":632,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["कंसप्रतापिताः सर्वे वयं याता दिशं दिशम्।","एतर्ह्येव पुनः स्थानं दैवेनासादिताः स्वसः॥ २२"],"iast":["kaṃsapratāpitāḥ sarve vayaṃ yātā diśaṃ diśam|","etarhyeva punaḥ sthānaṃ daivenāsāditāḥ svasaḥ|| 22"],"meaning":"बहिन! कंससे सताये जाकर हमलोग इधर-उधर अनेक दिशाओंमें भगे हुए थे। अभी कुछ ही दिन हुए, ईश्‍वरकृपासे हम सब पुनः अपना स्थान प्राप्त कर सके हैं॥ २२॥"},{"id":"10.82.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/23/","page":632,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसुदेवोग्रसेनाद्यैर्यदुभिस्तेऽर्चिता नृपाः।","आसन्‍नच्युतसन्दर्शपरमानन्दनिर्वृताः ॥ २३"],"iast":["vasudevograsenādyairyadubhiste'rcitā nṛpāḥ|","āsannacyutasandarśaparamānandanirvṛtāḥ || 23"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वहाँ जितने भी नरपति आये थे—वसुदेव, उग्रसेन आदि यदुवंशियोंने उनका खूब सम्मान-सत्कार किया। वे सब भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर परमानन्द और शान्तिका अनुभव करने लगे॥ २३॥"},{"id":"10.82.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/24/","page":632,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भीष्मो द्रोणोऽम्बिकापुत्रो गान्धारी ससुता तथा।","सदाराः पाण्डवाः कुन्ती सृंजयो विदुरः कृपः॥ २४"],"iast":["bhīṣmo droṇo'mbikāputro gāndhārī sasutā tathā|","sadārāḥ pāṇḍavāḥ kuntī sṛṃjayo viduraḥ kṛpaḥ|| 24"],"meaning":"परीक्षित्! भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधनादि पुत्रोंके साथ गान्धारी, पत्‍नियोंके सहित युधिष्ठिर आदि पाण्डव, कुन्ती, सृंजय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तिभोज, विराट, भीष्मक, महाराज न‌ग्‍नजित्, पुरुजित्, द्रुपद, शल्य, धृष्टकेतु, काशीनरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिलानरेश, मद्रनरेश, केकयनरेश, युधामन्यु, सुशर्मा, अपने पुत्रोंके साथ बाह्लीक और दूसरे भी युधिष्ठिरके अनुयायी नृपति भगवान् श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन विग्रह और उनकी रानियोंको देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये॥ २४—२७॥","meaning_covers":[24,27]},{"id":"10.82.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/25/","page":632,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कुन्तिभोजो विराटश्‍च भीष्मको न‌ग्‍नजिन्महान्।","पुरुजिद् द्रुपदः शल्यो धृष्टकेतुः सकाशिराट्॥ २५"],"iast":["kuntibhojo virāṭaśca bhīṣmako nagnajinmahān|","purujid drupadaḥ śalyo dhṛṣṭaketuḥ sakāśirāṭ|| 25"],"meaning":"परीक्षित्! भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधनादि पुत्रोंके साथ गान्धारी, पत्‍नियोंके सहित युधिष्ठिर आदि पाण्डव, कुन्ती, सृंजय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तिभोज, विराट, भीष्मक, महाराज न‌ग्‍नजित्, पुरुजित्, द्रुपद, शल्य, धृष्टकेतु, काशीनरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिलानरेश, मद्रनरेश, केकयनरेश, युधामन्यु, सुशर्मा, अपने पुत्रोंके साथ बाह्लीक और दूसरे भी युधिष्ठिरके अनुयायी नृपति भगवान् श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन विग्रह और उनकी रानियोंको देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये॥ २४—२७॥","meaning_covers":[24,27]},{"id":"10.82.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/26/","page":632,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दमघोषो विशालाक्षो मैथिलो मद्रकेकयौ।","युधामन्युः सुशर्मा च ससुता बाह्लिकादयः॥ २६"],"iast":["damaghoṣo viśālākṣo maithilo madrakekayau|","yudhāmanyuḥ suśarmā ca sasutā bāhlikādayaḥ|| 26"],"meaning":"परीक्षित्! भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधनादि पुत्रोंके साथ गान्धारी, पत्‍नियोंके सहित युधिष्ठिर आदि पाण्डव, कुन्ती, सृंजय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तिभोज, विराट, भीष्मक, महाराज न‌ग्‍नजित्, पुरुजित्, द्रुपद, शल्य, धृष्टकेतु, काशीनरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिलानरेश, मद्रनरेश, केकयनरेश, युधामन्यु, सुशर्मा, अपने पुत्रोंके साथ बाह्लीक और दूसरे भी युधिष्ठिरके अनुयायी नृपति भगवान् श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन विग्रह और उनकी रानियोंको देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये॥ २४—२७॥","meaning_covers":[24,27]},{"id":"10.82.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/27/","page":632,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजानो ये च राजेन्द्र युधिष्ठिरमनुव्रताः।","श्रीनिकेतं वपुः शौरेः सस्त्रीकं वीक्ष्य विस्मिताः॥ २७"],"iast":["rājāno ye ca rājendra yudhiṣṭhiramanuvratāḥ|","śrīniketaṃ vapuḥ śaureḥ sastrīkaṃ vīkṣya vismitāḥ|| 27"],"meaning":"परीक्षित्! भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधनादि पुत्रोंके साथ गान्धारी, पत्‍नियोंके सहित युधिष्ठिर आदि पाण्डव, कुन्ती, सृंजय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तिभोज, विराट, भीष्मक, महाराज न‌ग्‍नजित्, पुरुजित्, द्रुपद, शल्य, धृष्टकेतु, काशीनरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिलानरेश, मद्रनरेश, केकयनरेश, युधामन्यु, सुशर्मा, अपने पुत्रोंके साथ बाह्लीक और दूसरे भी युधिष्ठिरके अनुयायी नृपति भगवान् श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन विग्रह और उनकी रानियोंको देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये॥ २४—२७॥","meaning_covers":[24,27]},{"id":"10.82.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/28/","page":633,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ ते रामकृष्णाभ्यां सम्यक् प्राप्तसमर्हणाः।","प्रशशंसुर्मुदा युक्ता वृष्णीन् कृष्णपरिग्रहान्॥ २८"],"iast":["atha te rāmakṛṣṇābhyāṃ samyak prāptasamarhaṇāḥ|","praśaśaṃsurmudā yuktā vṛṣṇīn kṛṣṇaparigrahān|| 28"],"meaning":"अब वे बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्णसे भलीभाँति सम्मान प्राप्त करके बड़े आनन्दसे श्रीकृष्णके स्वजनों—यदुवंशियोंकी प्रशंसा करने लगे॥ २८॥"},{"id":"10.82.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/29/","page":633,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह।","यत् पश्यथासकृत् कृष्णं दुर्दर्शमपि योगिनाम्॥ २९"],"iast":["aho bhojapate yūyaṃ janmabhājo nṛṇāmiha|","yat paśyathāsakṛt kṛṣṇaṃ durdarśamapi yoginām|| 29"],"meaning":"उन लोगोंने मुख्यतया उग्रसेनजीको सम्बोधित कर कहा—‘भोजराज उग्रसेनजी! सच पूछिये तो इस जगत‍्के मनुष्योंमें आपलोगोंका जीवन ही सफल है, धन्य है! धन्य है! क्योंकि जिन श्रीकृष्णका दर्शन बड़े-बड़े योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, उन्हींको आपलोग नित्य-निरन्तर देखते रहते हैं॥ २९॥"},{"id":"10.82.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/30/","page":633,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यद्विश्रुतिः श्रुतिनुतेदमलं पुनाति","पादावनेजनपयश्‍च वचश्‍च शास्त्रम्।","भूः कालभर्जितभगापि यदङ्‌घ्रिपद्म-","स्पर्शोत्थशक्तिरभिवर्षति नोऽखिलार्थान्॥ ३०"],"iast":["yadviśrutiḥ śrutinutedamalaṃ punāti","pādāvanejanapayaśca vacaśca śāstram|","bhūḥ kālabharjitabhagāpi yadaṅghripadma-","sparśotthaśaktirabhivarṣati no'khilārthān|| 30"],"meaning":"वेदोंने बड़े आदरके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी कीर्तिका गान किया है। उनके चरणधोवनका जल गंगाजल, उनकी वाणी—शास्त्र और उनकी कीर्ति इस जगत‍्को अत्यन्त पवित्र कर रही है। अभी हमलोगोंके जीवनकी ही बात है, समयके फेरसे पृथ्वीका सारा सौभाग्य नष्ट हो चुका था; परन्तु उनके चरणकमलोंके स्पर्शसे पृथ्वीमें फिर समस्त शक्तियोंका संचार हो गया और अब वह फिर हमारी समस्त अभिलाषाओं—मनोरथोंको पूर्ण करने लगी॥ ३०॥"},{"id":"10.82.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/31/","page":633,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद्दर्शनस्पर्शनानुपथप्रजल्प-","शय्यासनाशनसयौनसपिण्डबन्धः।","येषां गृहे निरयवर्त्मनि वर्ततां वः","स्वर्गापवर्गविरमः स्वयमास विष्णुः॥ ३१"],"iast":["taddarśanasparśanānupathaprajalpa-","śayyāsanāśanasayaunasapiṇḍabandhaḥ|","yeṣāṃ gṛhe nirayavartmani vartatāṃ vaḥ","svargāpavargaviramaḥ svayamāsa viṣṇuḥ|| 31"],"meaning":"उग्रसेनजी! आपलोगोंका श्रीकृष्णके साथ वैवाहिक एवं गोत्रसम्बन्ध है। यही नहीं, आप हर समय उनका दर्शन और स्पर्श प्राप्त करते रहते हैं। उनके साथ चलते हैं, बोलते हैं, सोते हैं, बैठते हैं और खाते-पीते हैं। यों तो आपलोग गृहस्थीकी झंझटोंमें फँसे रहते हैं—जो नरकका मार्ग है, परन्तु आपलोगोंके घर वे सर्वव्यापक विष्णु भगवान् मूर्तिमान् रूपसे निवास करते हैं, जिनके दर्शनमात्रसे स्वर्ग और मोक्षतककी अभिलाषा मिट जाती है’॥ ३१॥"},{"id":"10.82.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/32/","page":633,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दस्तत्र यदून् प्राप्तान् ज्ञात्वा कृष्णपुरोगमान्।","तत्रागमद् वृतो गोपैरनःस्थार्थैर्दिदृक्षया॥ ३२"],"iast":["nandastatra yadūn prāptān jñātvā kṛṣṇapurogamān|","tatrāgamad vṛto gopairanaḥsthārthairdidṛkṣayā|| 32"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब नन्दबाबाको यह बात मालूम हुई कि श्रीकृष्ण आदि यदुवंशी कुरुक्षेत्रमें आये हुए हैं, तब वे गोपोंके साथ अपनी सारी सामग्री गाड़ियोंपर लादकर अपने प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण-बलराम आदिको देखनेके लिये वहाँ आये॥ ३२॥"},{"id":"10.82.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/33/","page":633,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं दृष्ट्वा वृष्णयो हृष्टास्तन्वः प्राणमिवोत्थिताः।","परिषस्वजिरे गाढं चिरदर्शनकातराः॥ ३३"],"iast":["taṃ dṛṣṭvā vṛṣṇayo hṛṣṭāstanvaḥ prāṇamivotthitāḥ|","pariṣasvajire gāḍhaṃ ciradarśanakātarāḥ|| 33"],"meaning":"नन्द आदि गोपोंको देखकर सब-के-सब यदुवंशी आनन्दसे भर गये। वे इस प्रकार उठ खड़े हुए, मानो मृत शरीरमें प्राणोंका संचार हो गया हो। वे लोग एक-दूसरेसे मिलनेके लिये बहुत दिनोंसे आतुर हो रहे थे। इसलिये एक-दूसरेको बहुत देरतक अत्यन्त गाढ़भावसे आलिंगन करते रहे॥ ३३॥"},{"id":"10.82.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/34/","page":634,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसुदेवः परिष्वज्य सम्प्रीतः प्रेमविह्वलः।","स्मरन् कंसकृतान् क्लेशान् पुत्रन्यासं च गोकुले॥ ३४"],"iast":["vasudevaḥ pariṣvajya samprītaḥ premavihvalaḥ|","smaran kaṃsakṛtān kleśān putranyāsaṃ ca gokule|| 34"],"meaning":"वसुदेवजीने अत्यन्त प्रेम और आनन्दसे विह्वल होकर नन्दजीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें एक-एक करके सारी बातें याद हो आयीं—कंस किस प्रकार उन्हें सताता था और किस प्रकार उन्होंने अपने पुत्रको गोकुलमें ले जाकर नन्दजीके घर रख दिया था॥ ३४॥"},{"id":"10.82.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/35/","page":634,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णरामौ परिष्वज्य पितरावभिवाद्य च।","न किंचनोचतुः प्रेम्णा साश्रुकण्ठौ कुरूद्वह॥ ३५"],"iast":["kṛṣṇarāmau pariṣvajya pitarāvabhivādya ca|","na kiṃcanocatuḥ premṇā sāśrukaṇṭhau kurūdvaha|| 35"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने माता यशोदा और पिता नन्दजीके हृदयसे लगकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। परीक्षित्! उस समय प्रेमके उद्रेकसे दोनों भाइयोंका गला रुँध गया, वे कुछ भी बोल न सके॥ ३५॥"},{"id":"10.82.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/36/","page":634,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तावात्मासनमारोप्य बाहुभ्यां परिरभ्य च।","यशोदा च महाभागा सुतौ विजहतुः शुचः॥ ३६"],"iast":["tāvātmāsanamāropya bāhubhyāṃ parirabhya ca|","yaśodā ca mahābhāgā sutau vijahatuḥ śucaḥ|| 36"],"meaning":"महाभाग्यवती यशोदाजी और नन्दबाबाने दोनों पुत्रोंको अपनी गोदमें बैठा लिया और भुजाओंसे उनका गाढ़ आलिंगन किया। उनके हृदयमें चिरकालतक न मिलनेका जो दुःख था, वह सब मिट गया॥ ३६॥"},{"id":"10.82.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/37/","page":634,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रोहिणी देवकी चाथ परिष्वज्य व्रजेश्‍वरीम्।","स्मरन्त्यौ तत्कृतां मैत्रीं बाष्पकण्ठ्यौ समूचतुः॥ ३७"],"iast":["rohiṇī devakī cātha pariṣvajya vrajeśvarīm|","smarantyau tatkṛtāṃ maitrīṃ bāṣpakaṇṭhyau samūcatuḥ|| 37"],"meaning":"रोहिणी और देवकीजीने व्रजेश्‍वरी यशोदाको अपनी अँकवारमें भर लिया। यशोदाजीने उन लोगोंके साथ मित्रताका जो व्यवहार किया था, उसका स्मरण करके दोनोंका गला भर आया। वे यशोदाजीसे कहने लगीं—॥ ३७॥"},{"id":"10.82.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/38/","page":634,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["का विस्मरेत वां मैत्रीमनिवृत्तां व्रजेश्‍वरि।","अवाप्याप्यैन्द्रमैश्‍वर्यं यस्या नेह प्रतिक्रिया॥ ३८"],"iast":["kā vismareta vāṃ maitrīmanivṛttāṃ vrajeśvari|","avāpyāpyaindramaiśvaryaṃ yasyā neha pratikriyā|| 38"],"meaning":"‘यशोदारानी! आपने और व्रजेश्‍वर नन्दजीने हमलोगोंके साथ जो मित्रताका व्यवहार किया है, वह कभी मिटनेवाला नहीं है, उसका बदला इन्द्रका ऐश्‍वर्य पाकर भी हम किसी प्रकार नहीं चुका सकतीं। नन्दरानीजी! भला ऐसा कौन कृतघ्न है, जो आपके उस उपकारको भूल सके?॥ ३८॥"},{"id":"10.82.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/39/","page":634,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतावदृष्टपितरौ युवयोः स्म पित्रोः","सम्प्रीणनाभ्युदयपोषणपालनानि ।","प्राप्योषतुर्भवति पक्ष्म ह यद्वदक्ष्णो-","र्न्यस्तावकुत्र च भयौ न सतां परः स्वः॥ ३९"],"iast":["etāvadṛṣṭapitarau yuvayoḥ sma pitroḥ","samprīṇanābhyudayapoṣaṇapālanāni |","prāpyoṣaturbhavati pakṣma ha yadvadakṣṇo-","rnyastāvakutra ca bhayau na satāṃ paraḥ svaḥ|| 39"],"meaning":"देवि! जिस समय बलराम और श्रीकृष्णने अपने मा-बापको देखातक न था और इनके पिताने धरोहरके रूपमें इन्हें आप दोनोंके पास रख छोड़ा था, उस समय आपने इन दोनोंकी इस प्रकार रक्षा की, जैसे पलकें पुतलियोंकी रक्षा करती हैं। तथा आपलोगोंने ही इन्हें खिलाया-पिलाया, दुलार किया और रिझाया; इनके मंगलके लिये अनेकों प्रकारके उत्सव मनाये। सच पूछिये, तो इनके मा-बाप आप ही लोग हैं। आपलोगोंकी देख-रेखमें इन्हें किसीकी आँचतक न लगी, ये सर्वथा निर्भय रहे, ऐसा करना आपलोगोंके अनुरूप ही था। क्योंकि सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें अपने-परायेका भेद-भाव नहीं रहता। नन्दरानीजी! सचमुच आपलोग परम संत हैं॥ ३९॥"},{"id":"10.82.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/40/","page":635,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यश्‍च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टं","यत्प्रेक्षणे दृशिषु पक्ष्मकृतं शपन्ति।","दृग्भिर्हृदीकृतमलं परिरभ्य सर्वा-","स्तद्भावमापुरपि नित्ययुजां दुरापम्॥ ४०"],"iast":["gopyaśca kṛṣṇamupalabhya cirādabhīṣṭaṃ","yatprekṣaṇe dṛśiṣu pakṣmakṛtaṃ śapanti|","dṛgbhirhṛdīkṛtamalaṃ parirabhya sarvā-","stadbhāvamāpurapi nityayujāṃ durāpam|| 40"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मैं कह चुका हूँ कि गोपियोंके परम प्रियतम, जीवनसर्वस्व श्रीकृष्ण ही थे। जब उनके दर्शनके समय नेत्रोंकी पलकें गिर पड़तीं, तब वे पलकोंको बनानेवालेको ही कोसने लगतीं। उन्हीं प्रेमकी मूर्ति गोपियोंको आज बहुत दिनोंके बाद भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन हुआ। उनके मनमें इसके लिये कितनी लालसा थी, इसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता। उन्होंने नेत्रोंके रास्ते अपने प्रियतम श्रीकृष्णको हृदयमें ले जाकर गाढ़ आलिंगन किया और मन-ही-मन आलिंगन करते-करते तन्मय हो गयीं। परीक्षित्! कहाँतक कहूँ, वे उस भावको प्राप्त हो गयीं, जो नित्य-निरन्तर अभ्यास करनेवाले योगियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है॥ ४०॥"},{"id":"10.82.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/41/","page":635,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवांस्तास्तथाभूता विविक्त उपसंगतः।","आश्‍लिष्यानामयं पृष्ट्वा प्रहसन्‍निदमब्रवीत्॥ ४१"],"iast":["bhagavāṃstāstathābhūtā vivikta upasaṃgataḥ|","āśliṣyānāmayaṃ pṛṣṭvā prahasannidamabravīt|| 41"],"meaning":"जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि गोपियाँ मुझसे तादात्म्यको प्राप्त—एक हो रही हैं, तब वे एकान्तमें उनके पास गये, उनको हृदयसे लगाया, कुशल-मंगल पूछा और हँसते हुए यों बोले—॥ ४१॥"},{"id":"10.82.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/42/","page":635,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपि स्मरथ नः सख्यः स्वानामर्थचिकीर्षया।","गतांश्‍चिरायिताञ्छत्रुपक्षक्षपणचेतसः ॥ ४२"],"iast":["api smaratha naḥ sakhyaḥ svānāmarthacikīrṣayā|","gatāṃścirāyitāñchatrupakṣakṣapaṇacetasaḥ || 42"],"meaning":"‘सखियो! हमलोग अपने स्वजन-सम्बन्धियोंका काम करनेके लिये व्रजसे बाहर चले आये और इस प्रकार तुम्हारी-जैसी प्रेयसियोंको छोड़कर हम शत्रुओंका विनाश करनेमें उलझ गये। बहुत दिन बीत गये, क्या कभी तुमलोग हमारा स्मरण भी करती हो?॥ ४२॥"},{"id":"10.82.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/43/","page":635,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अप्यवध्यायथास्मान् स्विदकृतज्ञाविशंकया।","नूनं भूतानि भगवान् युनक्ति वियुनक्ति च॥ ४३"],"iast":["apyavadhyāyathāsmān svidakṛtajñāviśaṃkayā|","nūnaṃ bhūtāni bhagavān yunakti viyunakti ca|| 43"],"meaning":"मेरी प्यारी गोपियो! कहीं तुमलोगोंके मनमें यह आशंका तो नहीं हो गयी है कि मैं अकृतज्ञ हूँ और ऐसा समझकर तुमलोग हमसे बुरा तो नहीं मानने लगी हो? निस्सन्देह भगवान् ही प्राणियोंके संयोग और वियोगके कारण हैं॥ ४३॥"},{"id":"10.82.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/44/","page":635,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वायुर्यथा घनानीकं तृणं तूलं रजांसि च।","संयोज्याक्षिपते भूयस्तथा भूतानि भूतकृत्॥ ४४"],"iast":["vāyuryathā ghanānīkaṃ tṛṇaṃ tūlaṃ rajāṃsi ca|","saṃyojyākṣipate bhūyastathā bhūtāni bhūtakṛt|| 44"],"meaning":"जैसे वायु बादलों, तिनकों, रूई और धूलके कणोंको एक-दूसरेसे मिला देती है और फिर स्वच्छन्दरूपसे उन्हें अलग-अलग कर देती है, वैसे ही समस्त पदार्थोंके निर्माता भगवान् भी सबका संयोग-वियोग अपनी इच्छानुसार करते रहते हैं॥ ४४॥"},{"id":"10.82.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/45/","page":635,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते।","दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः॥ ४५"],"iast":["mayi bhaktirhi bhūtānāmamṛtatvāya kalpate|","diṣṭyā yadāsīnmatsneho bhavatīnāṃ madāpanaḥ|| 45"],"meaning":"सखियो! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सब लोगोंको मेरा वह प्रेम प्राप्त हो चुका है, जो मेरी ही प्राप्ति करानेवाला है। क्योंकि मेरे प्रति की हुई प्रेम-भक्ति प्राणियोंको अमृतत्व (परमानन्द-धाम) प्रदान करनेमें समर्थ है॥ ४५॥"},{"id":"10.82.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/46/","page":636,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहं हि सर्वभूतानामादिरन्तोऽन्तरं बहिः।","भौतिकानां यथा खं वार्भूर्वायुर्ज्योतिरंगनाः॥ ४६"],"iast":["ahaṃ hi sarvabhūtānāmādiranto'ntaraṃ bahiḥ|","bhautikānāṃ yathā khaṃ vārbhūrvāyurjyotiraṃganāḥ|| 46"],"meaning":"प्यारी गोपियो! जैसे घट, पट आदि जितने भी भौतिक पदार्थ हैं, उनके आदि, अन्त और मध्यमें, बाहर और भीतर, उनके मूल कारण पृथ्वी, जल, वायु, अग्‍नि तथा आकाश ही ओतप्रोत हो रहे हैं, वैसे ही जितने भी पदार्थ हैं, उनके पहले, पीछे, बीचमें, बाहर और भीतर केवल मैं-ही-मैं हूँ॥ ४६॥"},{"id":"10.82.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/47/","page":636,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं ह्येतानि भूतानि भूतेष्वात्माऽऽत्मना ततः।","उभयं मय्यथ परे पश्यताभातमक्षरे॥ ४७"],"iast":["evaṃ hyetāni bhūtāni bhūteṣvātmā''tmanā tataḥ|","ubhayaṃ mayyatha pare paśyatābhātamakṣare|| 47"],"meaning":"इसी प्रकार सभी प्राणियोंके शरीरमें यही पाँचों भूत कारणरूपसे स्थित हैं और आत्मा भोक्ताके रूपसे अथवा जीवके रूपसे स्थित है। परन्तु मैं इन दोनोंसे परे अविनाशी सत्य हूँ। ये दोनों मेरे ही अंदर प्रतीत हो रहे हैं, तुमलोग ऐसा अनुभव करो॥ ४७॥"},{"id":"10.82.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/48/","page":636,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अध्यात्मशिक्षया गोप्य एवं कृष्णेन शिक्षिताः।","तदनुस्मरणध्वस्तजीवकोशास्तमध्यगन् ॥ ४८"],"iast":["adhyātmaśikṣayā gopya evaṃ kṛṣṇena śikṣitāḥ|","tadanusmaraṇadhvastajīvakośāstamadhyagan || 48"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार गोपियोंको अध्यात्मज्ञानकी शिक्षासे शिक्षित किया। उसी उपदेशके बार-बार स्मरणसे गोपियोंका जीवकोश—लिंगशरीर नष्ट हो गया और वे भगवान्‌से एक हो गयीं, भगवान्‌को ही सदा-सर्वदाके लिये प्राप्त हो गयीं॥ ४८॥"},{"id":"10.82.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/49/","page":636,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आहुश्‍च ते नलिननाभ पदारविन्दं","योगेश्‍वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः।","संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं","गेहञ्जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः॥ ४९"],"iast":["āhuśca te nalinanābha padāravindaṃ","yogeśvarairhṛdi vicintyamagādhabodhaiḥ|","saṃsārakūpapatitottaraṇāvalambaṃ","gehañjuṣāmapi manasyudiyāt sadā naḥ|| 49"],"meaning":"उन्होंने कहा—‘हे कमलनाभ! अगाधबोध-सम्पन्‍न बड़े-बड़े योगेश्‍वर अपने हृदयकमलमें आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं। जो लोग संसारके कूएँमें गिरे हुए हैं, उन्हें उससे निकलनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र अवलम्बन हैं। प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपका वह चरणकमल, घर-गृहस्थके काम करते रहनेपर भी सदा-सर्वदा हमारे हृदयमें विराजमान रहे, हम एक क्षणके लिये भी उसे न भूलें॥ ४९॥"}],"text":[{"b":36807,"kind":"adhyaya_heading","page":629,"text":"अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः"},{"b":36808,"kind":"topic_heading","page":629,"text":"भगवान् श्रीकृष्ण-बलरामसे गोप-गोपियोंकी भेंट"},{"b":36809,"kind":"hindi_commentary","page":629,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36810,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.82.1"],"text":"अथैकदा द्वारवत्यां वसतो रामकृष्णयोः।"},{"b":36811,"kind":"sanskrit_shloka","page":629,"verses":["10.82.1"],"text":"सूर्योपरागः सुमहानासीत् कल्पक्षये यथा॥ १"},{"b":36812,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.2"],"text":"तं ज्ञात्वा मनुजा राजन् पुरस्तादेव सर्वतः।"},{"b":36813,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.2"],"text":"समन्तपंचकं क्षेत्रं ययुः श्रेयोविधित्सया॥ २"},{"b":36814,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.3"],"text":"निःक्षत्रियां महीं कुर्वन् रामः शस्त्रभृतां वरः।"},{"b":36815,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.3"],"text":"नृपाणां रुधिरौघेण यत्र चक्रे महाह्रदान्॥ ३"},{"b":36816,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.4"],"text":"ईजे च भगवान् रामो यत्रास्पृष्टोऽपि कर्मणा।"},{"b":36817,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.4"],"text":"लोकस्य ग्राहयन्‍नीशो यथान्योऽघापनुत्तये॥ ४"},{"b":36818,"kind":"hindi_commentary","page":629,"explains":["10.82.1","10.82.2","10.82.3","10.82.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी द्वारकामें निवास कर रहे थे। एक बार सर्वग्रास सूर्यग्रहण लगा, जैसा कि प्रलयके समय लगा करता है॥ १॥ परीक्षित्! मनुष्योंको ज्योतिषियोंके द्वारा उस ग्रहणका पता पहलेसे ही चल गया था, इसलिये सब लोग अपने-अपने कल्याणके उद्देश्यसे पुण्य आदि उपार्जन करनेके लिये समन्तपंचक-तीर्थ कुरुक्षेत्रमें आये॥ २॥ समन्तपंचक क्षेत्र वह है, जहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने सारी पृथ्वीको क्षत्रियहीन करके राजाओंकी रुधिरधारासे पाँच बड़े-बड़े कुण्ड बना दिये थे॥ ३॥ जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने पापकी निवृत्तिके लिये प्रायश्‍चित्त करता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् परशुरामने अपने साथ कर्मका कुछ सम्बन्ध न होनेपर भी लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये वहींपर यज्ञ किया था॥ ४॥"},{"b":36819,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.5"],"text":"महत्यां तीर्थयात्रायां तत्रागन् भारतीः प्रजाः।"},{"b":36820,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.5"],"text":"वृष्णयश्‍च तथाक्रूरवसुदेवाहुकादयः॥ ५"},{"b":36821,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.6"],"text":"ययुर्भारत तत् क्षेत्रं स्वमघं क्षपयिष्णवः।"},{"b":36822,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.6"],"text":"गदप्रद्युम्‍नसाम्बाद्याः सुचन्द्रशुकसारणैः॥ ६"},{"b":36823,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.7"],"text":"आस्तेऽनिरुद्धो रक्षायां कृतवर्मा च यूथपः।"},{"b":36824,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.7"],"text":"ते रथैर्देवधिष्ण्याभैर्हयैश्‍च तरलप्लवैः॥ ७"},{"b":36825,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.8"],"text":"गजैर्नदद्भिरभ्राभैर्नृभिर्विद्याधरद्युभिः ।"},{"b":36826,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.8"],"text":"व्यरोचन्त महातेजाः पथि कांचनमालिनः॥ ८"},{"b":36827,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.9"],"text":"दिव्यस्रग्वस्त्रसन्‍नाहाः कलत्रैः खेचरा इव।"},{"b":36828,"kind":"sanskrit_shloka","page":630,"verses":["10.82.9"],"text":"तत्र स्नात्वा महाभागा उपोष्य सुसमाहिताः॥ ९"},{"b":36829,"kind":"hindi_translation","page":630,"explains":["10.82.5","10.82.6","10.82.7","10.82.8","10.82.9"],"text":"परीक्षित्! इस महान् तीर्थयात्राके अवसरपर भारतवर्षके सभी प्रान्तोंकी जनता कुरुक्षेत्र आयी थी। उनमें अक्रूर, वसुदेव, उग्रसेन आदि बड़े-बूढ़े तथा गद, प्रद्युम्‍न, साम्ब आदि अन्य यदुवंशी भी अपने-अपने पापोंका नाश करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये थे। प्रद्युम्‍ननन्दन अनिरुद्ध और यदुवंशी सेनापति कृतवर्मा—ये दोनों सुचन्द्र, शुक, सारण आदिके साथ नगरकी रक्षाके लिये द्वारकामें रह गये थे। यदुवंशी एक तो स्वभावसे ही परम तेजस्वी थे; दूसरे गलेमें सोनेकी माला, दिव्य पुष्पोंके हार, बहुमूल्य वस्त्र और कवचोंसे सुसज्जित होनेके कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे तीर्थयात्राके पथमें देवताओंके विमानके समान रथों, समुद्रकी तरंगके समान चलनेवाले घोड़ों, बादलोंके समान विशालकाय एवं गर्जना करते हुए हाथियों तथा विद्याधरोंके समान मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकियोंपर अपनी पत्‍नियोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, मानो स्वर्गके देवता ही यात्रा कर रहे हों। महाभाग्यवान् यदुवंशियोंने कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर एकाग्रचित्तसे संयमपूर्वक स्नान किया और ग्रहणके उपलक्ष्यमें निश्‍चित कालतक उपवास किया॥ ५—९॥"},{"b":36830,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.10"],"text":"ब्राह्मणेभ्यो ददुर्धेनूर्वासःस्रग्रुक्ममालिनीः।"},{"b":36831,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.10"],"text":"रामह्रदेषु विधिवत् पुनराप्लुत्य वृष्णयः॥ १०"},{"b":36832,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.11"],"text":"ददुः स्वन्‍नं द्विजाग्र्येभ्यः कृष्णे नो भक्तिरस्त्विति।"},{"b":36833,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.11"],"text":"स्वयं च तदनुज्ञाता वृष्णयः कृष्णदेवताः॥ ११"},{"b":36834,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.12"],"text":"भुक्त्वोपविविशुः कामं स्निग्धच्छायाङ्‌घ्रिपाङ्‌घ्रिषु।"},{"b":36835,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.12"],"text":"तत्रागतांस्ते ददृशुः सुहृत्सम्बन्धिनो नृपान्॥ १२"},{"b":36836,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.13"],"text":"मत्स्योशीनरकौसल्यविदर्भकुरुसृंजयान् ।"},{"b":36837,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.13"],"text":"काम्बोजकैकयान् मद्रान् कुन्तीनानर्तकेरलान्॥ १३"},{"b":36838,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.14"],"text":"अन्यांश्‍चैवात्मपक्षीयान् परांश्‍च शतशो नृप।"},{"b":36839,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.14"],"text":"नन्दादीन् सुहृदो गोपान् गोपीश्‍चोत्कण्ठिताश्‍चिरम्॥ १४"},{"b":36840,"kind":"hindi_commentary","page":631,"verses":["10.82.15"],"text":"अन्योन्यसन्दर्शनहर्षरंहसा प्रोत्फुल्लहृद्वक्त्रसरोरुहश्रियः ।"},{"b":36841,"kind":"hindi_translation","page":631,"verses":["10.82.15"],"text":"आश्‍लिष्य गाढं नयनैः स्रवज्जला हृष्यत्त्वचो रुद्धगिरो ययुर्मुदम्॥ १५"},{"b":36842,"kind":"hindi_commentary","page":631,"explains":["10.82.10","10.82.11","10.82.12","10.82.13","10.82.14","10.82.15"],"text":"उन्होंने ब्राह्मणोंको गोदान किया। ऐसी गौओंका दान किया जिन्हें वस्त्रोंकी सुन्दर-सुन्दर झूलें, पुष्पमालाएँ एवं सोनेकी जंजीरें पहना दी गयी थीं। इसके बाद ग्रहणका मोक्ष हो जानेपर परशुरामजीके बनाये हुए कुण्डोंमें यदुवंशियोंने विधिपूर्वक स्नान किया और सत्पात्र ब्राह्मणोंको सुन्दर-सुन्दर पकवानोंका भोजन कराया। उन्होंने अपने मनमें यह संकल्प किया था कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें हमारी प्रेमभक्ति बनी रहे। भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना आदर्श और इष्टदेव माननेवाले यदुवंशियोंने ब्राह्मणोंसे अनुमति लेकर तब स्वयं भोजन किया और फिर घनी एवं ठंडी छायावाले वृक्षोंके नीचे अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार डेरा डालकर ठहर गये। परीक्षित्! विश्राम कर लेनेके बाद यदुवंशियोंने अपने सुहृद् और सम्बन्धी राजाओंसे मिलना-भेंटना शुरू किया॥ १०—१२॥ वहाँ मत्स्य, उशीनर, कोसल, विदर्भ, कुरु, सृंजय, काम्बोज, कैकय, मद्र, कुन्ति, आनर्त, केरल एवं दूसरे अनेकों देशोंके—अपने पक्षके तथा शत्रुपक्षके—सैकड़ों नरपति आये हुए थे। परीक्षित्! इनके अतिरिक्त यदुवंशियोंके परम हितैषी बन्धु नन्द आदि गोप तथा भगवान्‌के दर्शनके लिये चिरकालसे उत्कण्ठित गोपियाँ भी वहाँ आयी हुई थीं। यादवोंने इन सबको देखा॥ १३-१४॥ परीक्षित्! एक-दूसरेके दर्शन, मिलन और वार्तालापसे सभीको बड़ा आनन्द हुआ। सभीके हृदय-कमल एवं मुख-कमल खिल उठे। सब एक-दूसरेको भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगाते, उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी झड़ी लग जाती, रोम-रोम खिल उठता, प्रेमके आवेगसे बोली बंद हो जाती और सब-के-सब आनन्द-समुद्रमें डूबने-उतराने लगते॥ १५॥"},{"b":36843,"kind":"hindi_commentary","page":631,"verses":["10.82.16"],"text":"स्त्रियश्‍च संवीक्ष्य मिथोऽतिसौहृद-"},{"b":36844,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.16"],"text":"स्मितामलापांगदृशोऽभिरेभिरे ।"},{"b":36845,"kind":"hindi_commentary","page":631,"verses":["10.82.16"],"text":"स्तनैः स्तनान् कुंकुमपंकरूषितान्"},{"b":36846,"kind":"sanskrit_shloka","page":631,"verses":["10.82.16"],"text":"निहत्य दोर्भिः प्रणयाश्रुलोचनाः॥ १६"},{"b":36847,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.17"],"text":"ततोऽभिवाद्य ते वृद्धान् यविष्ठैरभिवादिताः।"},{"b":36848,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.17"],"text":"स्वागतं कुशलं पृष्ट्वा चक्रुः कृष्णकथा मिथः॥ १७"},{"b":36849,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.18"],"text":"पृथा भ्रातॄन् स्वसॄर्वीक्ष्य तत्पुत्रान् पितरावपि।"},{"b":36850,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.18"],"text":"भ्रातृपत्‍नीर्मुकुन्दं च जहौ संकथया शुचः॥ १८"},{"b":36851,"kind":"hindi_translation","page":631,"explains":["10.82.16","10.82.17","10.82.18"],"text":"पुरुषोंकी भाँति स्त्रियाँ भी एक-दूसरेको देखकर प्रेम और आनन्दसे भर गयीं। वे अत्यन्त सौहार्द, मन्द-मन्द मुसकान, परम पवित्र तिरछी चितवनसे देख-देखकर परस्पर भेंट-अँकवार भरने लगीं। वे अपनी भुजाओंमें भरकर केसर लगे हुए वक्षःस्थलोंको दूसरी स्त्रियोंके वक्षःस्थलोंसे दबातीं और अत्यन्त आनन्दका अनुभव करतीं। उस समय उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू छलकने लगते॥ १६॥ अवस्था आदिमें छोटोंने बड़े-बूढ़ोंको प्रणाम किया और उन्होंने अपनेसे छोटोंका प्रणाम स्वीकार किया। वे एक-दूसरेका स्वागत करके तथा कुशल-मंगल आदि पूछकर फिर श्रीकृष्णकी मधुर लीलाएँ आपसमें कहने-सुनने लगे॥ १७॥ परीक्षित्! कुन्ती वसुदेव आदि अपने भाइयों, बहिनों, उनके पुत्रों, माता-पिता, भाभियों और भगवान् श्रीकृष्णको देखकर तथा उनसे बातचीत करके अपना सारा दुःख भूल गयीं॥ १८॥"},{"b":36852,"kind":"topic_heading","page":632,"text":"कुन्त्युवाच"},{"b":36853,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.19"],"text":"आर्य भ्रातरहं मन्ये आत्मानमकृताशिषम्।"},{"b":36854,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.19"],"text":"यद् वा आपत्सु मद्वार्तां नानुस्मरथ सत्तमाः॥ १९"},{"b":36855,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.20"],"text":"सुहृदो ज्ञातयः पुत्रा भ्रातरः पितरावपि।"},{"b":36856,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.20"],"text":"नानुस्मरन्ति स्वजनं यस्य दैवमदक्षिणम्॥ २०"},{"b":36857,"kind":"hindi_commentary","page":632,"explains":["10.82.19","10.82.20"],"text":"कुन्तीने वसुदेवजीसे कहा—भैया! मैं सचमुच बड़ी अभागिन हूँ। मेरी एक भी साध पूरी न हुई। आप-जैसे साधु-स्वभाव सज्जन भाई आपत्तिके समय मेरी सुधि भी न लें, इससे बढ़कर दुःखकी बात क्या होगी?॥ १९॥ भैया! विधाता जिसके बाँयें हो जाता है उसे स्वजन-सम्बन्धी, पुत्र और माता-पिता भी भूल जाते हैं। इसमें आपलोगोंका कोई दोष नहीं॥ २०॥"},{"b":36858,"kind":"topic_heading","page":632,"text":"वसुदेव उवाच"},{"b":36859,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.21"],"text":"अम्ब मास्मानसूयेथा दैवक्रीडनकान् नरान्।"},{"b":36860,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.21"],"text":"ईशस्य हि वशे लोकः कुरुते कार्यतेऽथवा॥ २१"},{"b":36861,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.22"],"text":"कंसप्रतापिताः सर्वे वयं याता दिशं दिशम्।"},{"b":36862,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.22"],"text":"एतर्ह्येव पुनः स्थानं दैवेनासादिताः स्वसः॥ २२"},{"b":36863,"kind":"hindi_commentary","page":632,"explains":["10.82.21","10.82.22"],"text":"वसुदेवजीने कहा—बहिन! उलाहना मत दो। हमसे बिलग न मानो। सभी मनुष्य दैवके खिलौने हैं। यह सम्पूर्ण लोक ईश्‍वरके वशमें रहकर कर्म करता है और उसका फल भोगता है॥ २१॥ बहिन! कंससे सताये जाकर हमलोग इधर-उधर अनेक दिशाओंमें भगे हुए थे। अभी कुछ ही दिन हुए, ईश्‍वरकृपासे हम सब पुनः अपना स्थान प्राप्त कर सके हैं॥ २२॥"},{"b":36864,"kind":"topic_heading","page":632,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36865,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.23"],"text":"वसुदेवोग्रसेनाद्यैर्यदुभिस्तेऽर्चिता नृपाः।"},{"b":36866,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.23"],"text":"आसन्‍नच्युतसन्दर्शपरमानन्दनिर्वृताः ॥ २३"},{"b":36867,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.24"],"text":"भीष्मो द्रोणोऽम्बिकापुत्रो गान्धारी ससुता तथा।"},{"b":36868,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.24"],"text":"सदाराः पाण्डवाः कुन्ती सृंजयो विदुरः कृपः॥ २४"},{"b":36869,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.25"],"text":"कुन्तिभोजो विराटश्‍च भीष्मको न‌ग्‍नजिन्महान्।"},{"b":36870,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.25"],"text":"पुरुजिद् द्रुपदः शल्यो धृष्टकेतुः सकाशिराट्॥ २५"},{"b":36871,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.26"],"text":"दमघोषो विशालाक्षो मैथिलो मद्रकेकयौ।"},{"b":36872,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.26"],"text":"युधामन्युः सुशर्मा च ससुता बाह्लिकादयः॥ २६"},{"b":36873,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.27"],"text":"राजानो ये च राजेन्द्र युधिष्ठिरमनुव्रताः।"},{"b":36874,"kind":"sanskrit_shloka","page":632,"verses":["10.82.27"],"text":"श्रीनिकेतं वपुः शौरेः सस्त्रीकं वीक्ष्य विस्मिताः॥ २७"},{"b":36875,"kind":"hindi_commentary","page":632,"explains":["10.82.23","10.82.24","10.82.25","10.82.26","10.82.27"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वहाँ जितने भी नरपति आये थे—वसुदेव, उग्रसेन आदि यदुवंशियोंने उनका खूब सम्मान-सत्कार किया। वे सब भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर परमानन्द और शान्तिका अनुभव करने लगे॥ २३॥ परीक्षित्! भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधनादि पुत्रोंके साथ गान्धारी, पत्‍नियोंके सहित युधिष्ठिर आदि पाण्डव, कुन्ती, सृंजय, विदुर, कृपाचार्य, कुन्तिभोज, विराट, भीष्मक, महाराज न‌ग्‍नजित्, पुरुजित्, द्रुपद, शल्य, धृष्टकेतु, काशीनरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिलानरेश, मद्रनरेश, केकयनरेश, युधामन्यु, सुशर्मा, अपने पुत्रोंके साथ बाह्लीक और दूसरे भी युधिष्ठिरके अनुयायी नृपति भगवान् श्रीकृष्णका परम सुन्दर श्रीनिकेतन विग्रह और उनकी रानियोंको देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये॥ २४—२७॥"},{"b":36876,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.28"],"text":"अथ ते रामकृष्णाभ्यां सम्यक् प्राप्तसमर्हणाः।"},{"b":36877,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.28"],"text":"प्रशशंसुर्मुदा युक्ता वृष्णीन् कृष्णपरिग्रहान्॥ २८"},{"b":36878,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.29"],"text":"अहो भोजपते यूयं जन्मभाजो नृणामिह।"},{"b":36879,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.29"],"text":"यत् पश्यथासकृत् कृष्णं दुर्दर्शमपि योगिनाम्॥ २९"},{"b":36880,"kind":"hindi_commentary","page":633,"verses":["10.82.30"],"text":"यद्विश्रुतिः श्रुतिनुतेदमलं पुनाति"},{"b":36881,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.30"],"text":"पादावनेजनपयश्‍च वचश्‍च शास्त्रम्।"},{"b":36882,"kind":"hindi_commentary","page":633,"verses":["10.82.30"],"text":"भूः कालभर्जितभगापि यदङ्‌घ्रिपद्म-"},{"b":36883,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.30"],"text":"स्पर्शोत्थशक्तिरभिवर्षति नोऽखिलार्थान्॥ ३०"},{"b":36884,"kind":"hindi_commentary","page":633,"verses":["10.82.31"],"text":"तद्दर्शनस्पर्शनानुपथप्रजल्प-"},{"b":36885,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.31"],"text":"शय्यासनाशनसयौनसपिण्डबन्धः।"},{"b":36886,"kind":"hindi_commentary","page":633,"verses":["10.82.31"],"text":"येषां गृहे निरयवर्त्मनि वर्ततां वः"},{"b":36887,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.31"],"text":"स्वर्गापवर्गविरमः स्वयमास विष्णुः॥ ३१"},{"b":36888,"kind":"hindi_translation","page":633,"explains":["10.82.28","10.82.29","10.82.30","10.82.31"],"text":"अब वे बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्णसे भलीभाँति सम्मान प्राप्त करके बड़े आनन्दसे श्रीकृष्णके स्वजनों—यदुवंशियोंकी प्रशंसा करने लगे॥ २८॥ उन लोगोंने मुख्यतया उग्रसेनजीको सम्बोधित कर कहा—‘भोजराज उग्रसेनजी! सच पूछिये तो इस जगत‍्के मनुष्योंमें आपलोगोंका जीवन ही सफल है, धन्य है! धन्य है! क्योंकि जिन श्रीकृष्णका दर्शन बड़े-बड़े योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, उन्हींको आपलोग नित्य-निरन्तर देखते रहते हैं॥ २९॥ वेदोंने बड़े आदरके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी कीर्तिका गान किया है। उनके चरणधोवनका जल गंगाजल, उनकी वाणी—शास्त्र और उनकी कीर्ति इस जगत‍्को अत्यन्त पवित्र कर रही है। अभी हमलोगोंके जीवनकी ही बात है, समयके फेरसे पृथ्वीका सारा सौभाग्य नष्ट हो चुका था; परन्तु उनके चरणकमलोंके स्पर्शसे पृथ्वीमें फिर समस्त शक्तियोंका संचार हो गया और अब वह फिर हमारी समस्त अभिलाषाओं—मनोरथोंको पूर्ण करने लगी॥ ३०॥ उग्रसेनजी! आपलोगोंका श्रीकृष्णके साथ वैवाहिक एवं गोत्रसम्बन्ध है। यही नहीं, आप हर समय उनका दर्शन और स्पर्श प्राप्त करते रहते हैं। उनके साथ चलते हैं, बोलते हैं, सोते हैं, बैठते हैं और खाते-पीते हैं। यों तो आपलोग गृहस्थीकी झंझटोंमें फँसे रहते हैं—जो नरकका मार्ग है, परन्तु आपलोगोंके घर वे सर्वव्यापक विष्णु भगवान् मूर्तिमान् रूपसे निवास करते हैं, जिनके दर्शनमात्रसे स्वर्ग और मोक्षतककी अभिलाषा मिट जाती है’॥ ३१॥"},{"b":36889,"kind":"topic_heading","page":632,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36890,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.32"],"text":"नन्दस्तत्र यदून् प्राप्तान् ज्ञात्वा कृष्णपुरोगमान्।"},{"b":36891,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.32"],"text":"तत्रागमद् वृतो गोपैरनःस्थार्थैर्दिदृक्षया॥ ३२"},{"b":36892,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.33"],"text":"तं दृष्ट्वा वृष्णयो हृष्टास्तन्वः प्राणमिवोत्थिताः।"},{"b":36893,"kind":"sanskrit_shloka","page":633,"verses":["10.82.33"],"text":"परिषस्वजिरे गाढं चिरदर्शनकातराः॥ ३३"},{"b":36894,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.34"],"text":"वसुदेवः परिष्वज्य सम्प्रीतः प्रेमविह्वलः।"},{"b":36895,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.34"],"text":"स्मरन् कंसकृतान् क्लेशान् पुत्रन्यासं च गोकुले॥ ३४"},{"b":36896,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.35"],"text":"कृष्णरामौ परिष्वज्य पितरावभिवाद्य च।"},{"b":36897,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.35"],"text":"न किंचनोचतुः प्रेम्णा साश्रुकण्ठौ कुरूद्वह॥ ३५"},{"b":36898,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.36"],"text":"तावात्मासनमारोप्य बाहुभ्यां परिरभ्य च।"},{"b":36899,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.36"],"text":"यशोदा च महाभागा सुतौ विजहतुः शुचः॥ ३६"},{"b":36900,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.37"],"text":"रोहिणी देवकी चाथ परिष्वज्य व्रजेश्‍वरीम्।"},{"b":36901,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.37"],"text":"स्मरन्त्यौ तत्कृतां मैत्रीं बाष्पकण्ठ्यौ समूचतुः॥ ३७"},{"b":36902,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.38"],"text":"का विस्मरेत वां मैत्रीमनिवृत्तां व्रजेश्‍वरि।"},{"b":36903,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.38"],"text":"अवाप्याप्यैन्द्रमैश्‍वर्यं यस्या नेह प्रतिक्रिया॥ ३८"},{"b":36904,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.39"],"text":"एतावदृष्टपितरौ युवयोः स्म पित्रोः"},{"b":36905,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.39"],"text":"सम्प्रीणनाभ्युदयपोषणपालनानि ।"},{"b":36906,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.39"],"text":"प्राप्योषतुर्भवति पक्ष्म ह यद्वदक्ष्णो-"},{"b":36907,"kind":"sanskrit_shloka","page":634,"verses":["10.82.39"],"text":"र्न्यस्तावकुत्र च भयौ न सतां परः स्वः॥ ३९"},{"b":36908,"kind":"hindi_commentary","page":633,"explains":["10.82.32","10.82.33","10.82.34","10.82.35","10.82.36","10.82.37","10.82.38","10.82.39"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब नन्दबाबाको यह बात मालूम हुई कि श्रीकृष्ण आदि यदुवंशी कुरुक्षेत्रमें आये हुए हैं, तब वे गोपोंके साथ अपनी सारी सामग्री गाड़ियोंपर लादकर अपने प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण-बलराम आदिको देखनेके लिये वहाँ आये॥ ३२॥ नन्द आदि गोपोंको देखकर सब-के-सब यदुवंशी आनन्दसे भर गये। वे इस प्रकार उठ खड़े हुए, मानो मृत शरीरमें प्राणोंका संचार हो गया हो। वे लोग एक-दूसरेसे मिलनेके लिये बहुत दिनोंसे आतुर हो रहे थे। इसलिये एक-दूसरेको बहुत देरतक अत्यन्त गाढ़भावसे आलिंगन करते रहे॥ ३३॥ वसुदेवजीने अत्यन्त प्रेम और आनन्दसे विह्वल होकर नन्दजीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें एक-एक करके सारी बातें याद हो आयीं—कंस किस प्रकार उन्हें सताता था और किस प्रकार उन्होंने अपने पुत्रको गोकुलमें ले जाकर नन्दजीके घर रख दिया था॥ ३४॥ भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने माता यशोदा और पिता नन्दजीके हृदयसे लगकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। परीक्षित्! उस समय प्रेमके उद्रेकसे दोनों भाइयोंका गला रुँध गया, वे कुछ भी बोल न सके॥ ३५॥ महाभाग्यवती यशोदाजी और नन्दबाबाने दोनों पुत्रोंको अपनी गोदमें बैठा लिया और भुजाओंसे उनका गाढ़ आलिंगन किया। उनके हृदयमें चिरकालतक न मिलनेका जो दुःख था, वह सब मिट गया॥ ३६॥ रोहिणी और देवकीजीने व्रजेश्‍वरी यशोदाको अपनी अँकवारमें भर लिया। यशोदाजीने उन लोगोंके साथ मित्रताका जो व्यवहार किया था, उसका स्मरण करके दोनोंका गला भर आया। वे यशोदाजीसे कहने लगीं—॥ ३७॥ ‘यशोदारानी! आपने और व्रजेश्‍वर नन्दजीने हमलोगोंके साथ जो मित्रताका व्यवहार किया है, वह कभी मिटनेवाला नहीं है, उसका बदला इन्द्रका ऐश्‍वर्य पाकर भी हम किसी प्रकार नहीं चुका सकतीं। नन्दरानीजी! भला ऐसा कौन कृतघ्न है, जो आपके उस उपकारको भूल सके?॥ ३८॥ देवि! जिस समय बलराम और श्रीकृष्णने अपने मा-बापको देखातक न था और इनके पिताने धरोहरके रूपमें इन्हें आप दोनोंके पास रख छोड़ा था, उस समय आपने इन दोनोंकी इस प्रकार रक्षा की, जैसे पलकें पुतलियोंकी रक्षा करती हैं। तथा आपलोगोंने ही इन्हें खिलाया-पिलाया, दुलार किया और रिझाया; इनके मंगलके लिये अनेकों प्रकारके उत्सव मनाये। सच पूछिये, तो इनके मा-बाप आप ही लोग हैं। आपलोगोंकी देख-रेखमें इन्हें किसीकी आँचतक न लगी, ये सर्वथा निर्भय रहे, ऐसा करना आपलोगोंके अनुरूप ही था। क्योंकि सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें अपने-परायेका भेद-भाव नहीं रहता। नन्दरानीजी! सचमुच आपलोग परम संत हैं॥ ३९॥"},{"b":36909,"kind":"topic_heading","page":633,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36910,"kind":"hindi_commentary","page":635,"verses":["10.82.40"],"text":"गोप्यश्‍च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टं"},{"b":36911,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.40"],"text":"यत्प्रेक्षणे दृशिषु पक्ष्मकृतं शपन्ति।"},{"b":36912,"kind":"hindi_commentary","page":635,"verses":["10.82.40"],"text":"दृग्भिर्हृदीकृतमलं परिरभ्य सर्वा-"},{"b":36913,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.40"],"text":"स्तद्भावमापुरपि नित्ययुजां दुरापम्॥ ४०"},{"b":36914,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.41"],"text":"भगवांस्तास्तथाभूता विविक्त उपसंगतः।"},{"b":36915,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.41"],"text":"आश्‍लिष्यानामयं पृष्ट्वा प्रहसन्‍निदमब्रवीत्॥ ४१"},{"b":36916,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.42"],"text":"अपि स्मरथ नः सख्यः स्वानामर्थचिकीर्षया।"},{"b":36917,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.42"],"text":"गतांश्‍चिरायिताञ्छत्रुपक्षक्षपणचेतसः ॥ ४२"},{"b":36918,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.43"],"text":"अप्यवध्यायथास्मान् स्विदकृतज्ञाविशंकया।"},{"b":36919,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.43"],"text":"नूनं भूतानि भगवान् युनक्ति वियुनक्ति च॥ ४३"},{"b":36920,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.44"],"text":"वायुर्यथा घनानीकं तृणं तूलं रजांसि च।"},{"b":36921,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.44"],"text":"संयोज्याक्षिपते भूयस्तथा भूतानि भूतकृत्॥ ४४"},{"b":36922,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.45"],"text":"मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते।"},{"b":36923,"kind":"sanskrit_shloka","page":635,"verses":["10.82.45"],"text":"दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः॥ ४५"},{"b":36924,"kind":"sanskrit_shloka","page":636,"verses":["10.82.46"],"text":"अहं हि सर्वभूतानामादिरन्तोऽन्तरं बहिः।"},{"b":36925,"kind":"sanskrit_shloka","page":636,"verses":["10.82.46"],"text":"भौतिकानां यथा खं वार्भूर्वायुर्ज्योतिरंगनाः॥ ४६"},{"b":36926,"kind":"sanskrit_shloka","page":636,"verses":["10.82.47"],"text":"एवं ह्येतानि भूतानि भूतेष्वात्माऽऽत्मना ततः।"},{"b":36927,"kind":"sanskrit_shloka","page":636,"verses":["10.82.47"],"text":"उभयं मय्यथ परे पश्यताभातमक्षरे॥ ४७"},{"b":36928,"kind":"hindi_commentary","page":634,"explains":["10.82.40","10.82.41","10.82.42","10.82.43","10.82.44","10.82.45","10.82.46","10.82.47"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मैं कह चुका हूँ कि गोपियोंके परम प्रियतम, जीवनसर्वस्व श्रीकृष्ण ही थे। जब उनके दर्शनके समय नेत्रोंकी पलकें गिर पड़तीं, तब वे पलकोंको बनानेवालेको ही कोसने लगतीं। उन्हीं प्रेमकी मूर्ति गोपियोंको आज बहुत दिनोंके बाद भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन हुआ। उनके मनमें इसके लिये कितनी लालसा थी, इसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता। उन्होंने नेत्रोंके रास्ते अपने प्रियतम श्रीकृष्णको हृदयमें ले जाकर गाढ़ आलिंगन किया और मन-ही-मन आलिंगन करते-करते तन्मय हो गयीं। परीक्षित्! कहाँतक कहूँ, वे उस भावको प्राप्त हो गयीं, जो नित्य-निरन्तर अभ्यास करनेवाले योगियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है॥ ४०॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि गोपियाँ मुझसे तादात्म्यको प्राप्त—एक हो रही हैं, तब वे एकान्तमें उनके पास गये, उनको हृदयसे लगाया, कुशल-मंगल पूछा और हँसते हुए यों बोले—॥ ४१॥ ‘सखियो! हमलोग अपने स्वजन-सम्बन्धियोंका काम करनेके लिये व्रजसे बाहर चले आये और इस प्रकार तुम्हारी-जैसी प्रेयसियोंको छोड़कर हम शत्रुओंका विनाश करनेमें उलझ गये। बहुत दिन बीत गये, क्या कभी तुमलोग हमारा स्मरण भी करती हो?॥ ४२॥ मेरी प्यारी गोपियो! कहीं तुमलोगोंके मनमें यह आशंका तो नहीं हो गयी है कि मैं अकृतज्ञ हूँ और ऐसा समझकर तुमलोग हमसे बुरा तो नहीं मानने लगी हो? निस्सन्देह भगवान् ही प्राणियोंके संयोग और वियोगके कारण हैं॥ ४३॥ जैसे वायु बादलों, तिनकों, रूई और धूलके कणोंको एक-दूसरेसे मिला देती है और फिर स्वच्छन्दरूपसे उन्हें अलग-अलग कर देती है, वैसे ही समस्त पदार्थोंके निर्माता भगवान् भी सबका संयोग-वियोग अपनी इच्छानुसार करते रहते हैं॥ ४४॥ सखियो! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सब लोगोंको मेरा वह प्रेम प्राप्त हो चुका है, जो मेरी ही प्राप्ति करानेवाला है। क्योंकि मेरे प्रति की हुई प्रेम-भक्ति प्राणियोंको अमृतत्व (परमानन्द-धाम) प्रदान करनेमें समर्थ है॥ ४५॥ प्यारी गोपियो! जैसे घट, पट आदि जितने भी भौतिक पदार्थ हैं, उनके आदि, अन्त और मध्यमें, बाहर और भीतर, उनके मूल कारण पृथ्वी, जल, वायु, अग्‍नि तथा आकाश ही ओतप्रोत हो रहे हैं, वैसे ही जितने भी पदार्थ हैं, उनके पहले, पीछे, बीचमें, बाहर और भीतर केवल मैं-ही-मैं हूँ॥ ४६॥ इसी प्रकार सभी प्राणियोंके शरीरमें यही पाँचों भूत कारणरूपसे स्थित हैं और आत्मा भोक्ताके रूपसे अथवा जीवके रूपसे स्थित है। परन्तु मैं इन दोनोंसे परे अविनाशी सत्य हूँ। ये दोनों मेरे ही अंदर प्रतीत हो रहे हैं, तुमलोग ऐसा अनुभव करो॥ ४७॥"},{"b":36929,"kind":"hindi_commentary","page":635,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36930,"kind":"sanskrit_shloka","page":636,"verses":["10.82.48"],"text":"अध्यात्मशिक्षया गोप्य एवं कृष्णेन शिक्षिताः।"},{"b":36931,"kind":"sanskrit_shloka","page":636,"verses":["10.82.48"],"text":"तदनुस्मरणध्वस्तजीवकोशास्तमध्यगन् ॥ ४८"},{"b":36932,"kind":"hindi_commentary","page":636,"explains":["10.82.48"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार गोपियोंको अध्यात्मज्ञानकी शिक्षासे शिक्षित किया। उसी उपदेशके बार-बार स्मरणसे गोपियोंका जीवकोश—लिंगशरीर नष्ट हो गया और वे भगवान्‌से एक हो गयीं, भगवान्‌को ही सदा-सर्वदाके लिये प्राप्त हो गयीं॥ ४८॥"},{"b":36933,"kind":"hindi_commentary","page":636,"verses":["10.82.49"],"text":"आहुश्‍च ते नलिननाभ पदारविन्दं"},{"b":36934,"kind":"sanskrit_shloka","page":636,"verses":["10.82.49"],"text":"योगेश्‍वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः।"},{"b":36935,"kind":"hindi_commentary","page":636,"verses":["10.82.49"],"text":"संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं"},{"b":36936,"kind":"sanskrit_shloka","page":636,"verses":["10.82.49"],"text":"गेहञ्जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः॥ ४९"},{"b":36937,"kind":"hindi_translation","page":636,"explains":["10.82.49"],"text":"उन्होंने कहा—‘हे कमलनाभ! अगाधबोध-सम्पन्‍न बड़े-बड़े योगेश्‍वर अपने हृदयकमलमें आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं। जो लोग संसारके कूएँमें गिरे हुए हैं, उन्हें उससे निकलनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र अवलम्बन हैं। प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपका वह चरणकमल, घर-गृहस्थके काम करते रहनेपर भी सदा-सर्वदा हमारे हृदयमें विराजमान रहे, हम एक क्षणके लिये भी उसे न भूलें॥ ४९॥"},{"b":36938,"kind":"hindi_translation","page":636,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे वृष्णिगोपसंगमो नाम द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८२॥"}],"notes":[{"id":"v2:327","mark":"१","page":632,"after_verse":"10.82.25","text":"शैव्यो धृष्टकेतुश्‍च काशि०।"},{"id":"v2:328","mark":"२","page":632,"after_verse":"10.82.26","text":"यदुश्‍चावन्तिकादयः।"}],"corrections":{"count":4,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}