{"id":"10.80","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 80","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथाशीतितमोऽध्यायः","topics":["श्रीकृष्णके द्वारा सुदामाजीका स्वागत"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[619,624]},"verses":[{"id":"10.80.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/1/","page":619,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["भगवन् यानि चान्यानि मुकुन्दस्य महात्मनः।","वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य श्रोतुमिच्छामहे प्रभो॥ १"],"iast":["bhagavan yāni cānyāni mukundasya mahātmanaḥ|","vīryāṇyanantavīryasya śrotumicchāmahe prabho|| 1"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने कहा—भगवन्! प्रेम और मुक्तिके दाता परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी शक्ति अनन्त है। इसलिये उनकी माधुर्य और ऐश्‍वर्यसे भरी लीलाएँ भी अनन्त हैं। अब हम उनकी दूसरी लीलाएँ, जिनका वर्णन आपने अबतक नहीं किया है, सुनना चाहते हैं॥ १॥"},{"id":"10.80.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/2/","page":619,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["को नु श्रुत्वासकृद् ब्रह्मन्‍नुत्तमश्‍लोकसत्कथाः।","विरमेत विशेषज्ञो विषण्णः काममार्गणैः॥ २"],"iast":["ko nu śrutvāsakṛd brahmannuttamaślokasatkathāḥ|","virameta viśeṣajño viṣaṇṇaḥ kāmamārgaṇaiḥ|| 2"],"meaning":"ब्रह्मन्! यह जीव विषय-सुखको खोजते-खोजते अत्यन्त दुःखी हो गया है। वे बाणकी तरह इसके चित्तमें चुभते रहते हैं। ऐसी स्थितिमें ऐसा कौन-सा रसिक—रसका विशेषज्ञ पुरुष होगा, जो बार-बार पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णकी मंगलमयी लीलाओंका श्रवण करके भी उनसे विमुख होना चाहेगा॥ २॥"},{"id":"10.80.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/3/","page":619,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["सा वाग् यया तस्य गुणान् गृणीते","करौ च तत्कर्मकरौ मनश्‍च।","स्मरेद् वसन्तं स्थिरजंगमेषु","शृणोति तत्पुण्यकथाः स कर्णः॥ ३"],"iast":["sā vāg yayā tasya guṇān gṛṇīte","karau ca tatkarmakarau manaśca|","smared vasantaṃ sthirajaṃgameṣu","śṛṇoti tatpuṇyakathāḥ sa karṇaḥ|| 3"],"meaning":"जो वाणी भगवान्‌के गुणोंका गान करती है, वही सच्ची वाणी है। वे ही हाथ सच्चे हाथ हैं, जो भगवान्‌की सेवाके लिये काम करते हैं। वही मन सच्चा मन है, जो चराचर प्राणियोंमें निवास करनेवाले भगवान्‌का स्मरण करता है; और वे ही कान वास्तवमें कान कहनेयोग्य हैं, जो भगवान्‌की पुण्यमयी कथाओंका श्रवण करते हैं ॥ ३॥"},{"id":"10.80.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/4/","page":619,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["शिरस्तु तस्योभयलिंगमानमे-","त्तदेव यत् पश्यति तद्धि चक्षुः।","अंगानि विष्णोरथ तज्जनानां","पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम्॥ ४"],"iast":["śirastu tasyobhayaliṃgamāname-","ttadeva yat paśyati taddhi cakṣuḥ|","aṃgāni viṣṇoratha tajjanānāṃ","pādodakaṃ yāni bhajanti nityam|| 4"],"meaning":"वही सिर सिर है, जो चराचर जगत‍्को भगवान्‌की चल-अचल प्रतिमा समझकर नमस्कार करता है; और जो सर्वत्र भगवद्विग्रहका दर्शन करते हैं, वे ही नेत्र वास्तवमें नेत्र हैं। शरीरके जो अंग भगवान् और उनके भक्तोंके चरणोदकका सेवन करते हैं, वे ही अंग वास्तवमें अंग हैं; सच पूछिये तो उन्हींका होना सफल है॥ ४॥"},{"id":"10.80.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/5/","page":620,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["विष्णुरातेन सम्पृष्टो भगवान् बादरायणिः।","वासुदेवे भगवति निम‌ग्‍नहृदयोऽब्रवीत्॥ ५"],"iast":["viṣṇurātena sampṛṣṭo bhagavān bādarāyaṇiḥ|","vāsudeve bhagavati nimagnahṛdayo'bravīt|| 5"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षित‍्ने इस प्रकार प्रश्‍न किया, तब भगवान् श्रीशुकदेवजीका हृदय भगवान् श्रीकृष्णमें ही तल्लीन हो गया। उन्होंने परीक्षित‍्से इस प्रकार कहा॥ ५॥"},{"id":"10.80.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/6/","page":620,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णस्यासीत् सखा कश्‍चिद् ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः।","विरक्त इन्द्रियार्थेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः॥ ६"],"iast":["kṛṣṇasyāsīt sakhā kaścid brāhmaṇo brahmavittamaḥ|","virakta indriyārtheṣu praśāntātmā jitendriyaḥ|| 6"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परम मित्र थे। वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयोंसे विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे॥ ६॥"},{"id":"10.80.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/7/","page":620,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यदृच्छयोपपन्‍नेन वर्तमानो गृहाश्रमी।","तस्य भार्या कुचैलस्य क्षुत्क्षामा च तथाविधा॥ ७"],"iast":["yadṛcchayopapannena vartamāno gṛhāśramī|","tasya bhāryā kucailasya kṣutkṣāmā ca tathāvidhā|| 7"],"meaning":"वे गृहस्थ होनेपर भी किसी प्रकारका संग्रह-परिग्रह न रखकर प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसीमें सन्तुष्ट रहते थे। उनके वस्त्र तो फटे-पुराने थे ही, उनकी पत्‍नीके भी वैसे ही थे। वह भी अपने पतिके समान ही भूखसे दुबली हो रही थी॥ ७॥"},{"id":"10.80.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/8/","page":620,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पतिव्रता पतिं प्राह म्लायता वदनेन सा।","दरिद्रा सीदमाना सा वेपमानाभिगम्य च॥ ८"],"iast":["pativratā patiṃ prāha mlāyatā vadanena sā|","daridrā sīdamānā sā vepamānābhigamya ca|| 8"],"meaning":"एक दिन दरिद्रताकी प्रतिमूर्ति दुःखिनी पतिव्रता भूखके मारे काँपती हुई अपने पतिदेवके पास गयी और मुरझाये हुए मुँहसे बोली—॥ ८॥"},{"id":"10.80.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/9/","page":620,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ननु ब्रह्मन् भगवतः सखा साक्षाच्छ्रियः पतिः।","ब्रह्मण्यश्‍च शरण्यश्‍च भगवान् सात्वतर्षभः॥ ९"],"iast":["nanu brahman bhagavataḥ sakhā sākṣācchriyaḥ patiḥ|","brahmaṇyaśca śaraṇyaśca bhagavān sātvatarṣabhaḥ|| 9"],"meaning":"‘भगवन्! साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण आपके सखा हैं। वे भक्तवाञ्छाकल्पतरु, शरणागतवत्सल और ब्राह्मणोंके परम भक्त हैं॥ ९॥"},{"id":"10.80.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/10/","page":620,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमुपैहि महाभाग साधूनां च परायणम्।","दास्यति द्रविणं भूरि सीदते ते कुटुम्बिने॥ १०"],"iast":["tamupaihi mahābhāga sādhūnāṃ ca parāyaṇam|","dāsyati draviṇaṃ bhūri sīdate te kuṭumbine|| 10"],"meaning":"परम भाग्यवान् आर्यपुत्र! वे साधु-संतोंके, सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय हैं। आप उनके पास जाइये। जब वे जानेंगे कि आप कुटुम्बी हैं और अन्‍नके बिना दुःखी हो रहे हैं तो वे आपको बहुत-सा धन देंगे॥ १०॥"},{"id":"10.80.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/11/","page":620,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आस्तेऽधुना द्वारवत्यां भोजवृष्ण्यन्धकेश्‍वरः।","स्मरतः पादकमलमात्मानमपि यच्छति।","किं न्वर्थकामान् भजतो नात्यभीष्टांजगद्गुरुः॥ ११"],"iast":["āste'dhunā dvāravatyāṃ bhojavṛṣṇyandhakeśvaraḥ|","smarataḥ pādakamalamātmānamapi yacchati|","kiṃ nvarthakāmān bhajato nātyabhīṣṭāṃjagadguruḥ|| 11"],"meaning":"आजकल वे भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके स्वामीके रूपमें द्वारकामें ही निवास कर रहे हैं और इतने उदार हैं कि जो उनके चरणकमलोंका स्मरण करते हैं, उन प्रेमी भक्तोंको वे अपने-आपतकका दान कर डालते हैं। ऐसी स्थितिमें जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तोंको यदि धन और विषय-सुख, जो अत्यन्त वाञ्छनीय नहीं है, दे दें तो इसमें आश्‍चर्यकी कौन-सी बात है?’॥ ११॥"},{"id":"10.80.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/12/","page":620,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स एवं भार्यया विप्रो बहुशः प्रार्थितो मृदु।","अयं हि परमो लाभ उत्तमश्‍लोकदर्शनम्॥ १२"],"iast":["sa evaṃ bhāryayā vipro bahuśaḥ prārthito mṛdu|","ayaṃ hi paramo lābha uttamaślokadarśanam|| 12"],"meaning":"इस प्रकार जब उन ब्राह्मणदेवताकी पत्‍नीने अपने पतिदेवसे कई बार बड़ी नम्रतासे प्रार्थना की, तब उन्होंने सोचा कि ‘धनकी तो कोई बात नहीं है; परन्तु भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन हो जायगा, यह तो जीवनका बहुत बड़ा लाभ है’॥ १२॥"},{"id":"10.80.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/13/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति संचिन्त्य मनसा गमनाय मतिं दधे।","अप्यस्त्युपायनं किंचिद् गृहे कल्याणि दीयताम्॥ १३"],"iast":["iti saṃcintya manasā gamanāya matiṃ dadhe|","apyastyupāyanaṃ kiṃcid gṛhe kalyāṇi dīyatām|| 13"],"meaning":"यही विचार करके उन्होंने जानेका निश्‍चय किया और अपनी पत्‍नीसे बोले—‘कल्याणी! घरमें कुछ भेंट देनेयोग्य वस्तु भी है क्या? यदि हो तो दे दो’॥ १३॥"},{"id":"10.80.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/14/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["याचित्वा चतुरो मुष्टीन् विप्रान् पृथुकतण्डुलान्।","चैलखण्डेन तान् बद‍्ध्वा भर्त्रे प्रादादुपायनम्॥ १४"],"iast":["yācitvā caturo muṣṭīn viprān pṛthukataṇḍulān|","cailakhaṇḍena tān baddhvā bhartre prādādupāyanam|| 14"],"meaning":"तब उस ब्राह्मणीने पास-पड़ोसके ब्राह्मणोंके घरसे चार मुट्ठी चिउड़े माँगकर एक कपड़ेमें बाँध दिये और भगवान्‌को भेंट देनेके लिये अपने पतिदेवको दे दिये॥ १४॥"},{"id":"10.80.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/15/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तानादाय विप्राग्र्यः प्रययौ द्वारकां किल।","कृष्णसन्दर्शनं मह्यं कथं स्यादिति चिन्तयन्॥ १५"],"iast":["sa tānādāya viprāgryaḥ prayayau dvārakāṃ kila|","kṛṣṇasandarśanaṃ mahyaṃ kathaṃ syāditi cintayan|| 15"],"meaning":"इसके बाद वे ब्राह्मणदेवता उन चिउड़ोंको लेकर द्वारकाके लिये चल पड़े। वे मार्गमें यह सोचते जाते थे कि ‘मुझे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?’॥ १५॥"},{"id":"10.80.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/16/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्रीणि गुल्मान्यतीयाय तिस्रः कक्षाश्‍च स द्विजः।","विप्रोऽगम्यान्धकवृष्णीनां गृहेष्वच्युतधर्मिणाम्॥ १६"],"iast":["trīṇi gulmānyatīyāya tisraḥ kakṣāśca sa dvijaḥ|","vipro'gamyāndhakavṛṣṇīnāṃ gṛheṣvacyutadharmiṇām|| 16"],"meaning":"परीक्षित्! द्वारकामें पहुँचनेपर वे ब्राह्मणदेवता दूसरे ब्राह्मणोंके साथ सैनिकोंकी तीन छावनियाँ और तीन ड्योढ़ियाँ पार करके भगवद्धर्मका पालन करनेवाले अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंके महलोंमें, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है, जा पहुँचे॥ १६॥"},{"id":"10.80.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/17/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गृहं द‍्व्यष्टसहस्राणां महिषीणां हरेर्द्विजः।","विवेशैकतमं श्रीमद् ब्रह्मानन्दं गतो यथा॥ १७"],"iast":["gṛhaṃ dvyaṣṭasahasrāṇāṃ mahiṣīṇāṃ harerdvijaḥ|","viveśaikatamaṃ śrīmad brahmānandaṃ gato yathā|| 17"],"meaning":"उनके बीच भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार रानियोंके महल थे। उनमेंसे एकमें उन ब्राह्मणदेवताने प्रवेश किया। वह महल खूब सजा-सजाया—अत्यन्त शोभा-युक्त था। उसमें प्रवेश करते समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो वे ब्रह्मानन्दके समुद्रमें डूब-उतरा रहे हों!॥ १७॥"},{"id":"10.80.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/18/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं विलोक्याच्युतो दूरात् प्रियापर्यंकमास्थितः।","सहसोत्थाय चाभ्येत्य दोर्भ्यां पर्यग्रहीन्मुदा॥ १८"],"iast":["taṃ vilokyācyuto dūrāt priyāparyaṃkamāsthitaḥ|","sahasotthāya cābhyetya dorbhyāṃ paryagrahīnmudā|| 18"],"meaning":"उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया रुक्मिणीजीके पलंगपर विराजे हुए थे। ब्राह्मणदेवताको दूरसे ही देखकर वे सहसा उठ खड़े हुए और उनके पास आकर बड़े आनन्दसे उन्हें अपने भुजपाशमें बाँध लिया॥ १८॥"},{"id":"10.80.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/19/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सख्युः प्रियस्य विप्रर्षेरंगसंगातिनिर्वृतः।","प्रीतो व्यमुंचदब्बिन्दून् नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः॥ १९"],"iast":["sakhyuḥ priyasya viprarṣeraṃgasaṃgātinirvṛtaḥ|","prīto vyamuṃcadabbindūn netrābhyāṃ puṣkarekṣaṇaḥ|| 19"],"meaning":"परीक्षित्! परमानन्दस्वरूप भगवान् अपने प्यारे सखा ब्राह्मणदेवताके अंग-स्पर्शसे अत्यन्त आनन्दित हुए। उनके कमलके समान कोमल नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बरसने लगे॥ १९॥"},{"id":"10.80.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/20/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथोपवेश्य पर्यंके स्वयं सख्युः समर्हणम्।","उपहृत्यावनिज्यास्य पादौ पादावनेजनीः॥ २०"],"iast":["athopaveśya paryaṃke svayaṃ sakhyuḥ samarhaṇam|","upahṛtyāvanijyāsya pādau pādāvanejanīḥ|| 20"],"meaning":"परीक्षित्! कुछ समयके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें ले जाकर अपने पलंगपर बैठा दिया और स्वयं पूजनकी सामग्री लाकर उनकी पूजा की। प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सभीको पवित्र करनेवाले हैं; फिर भी उन्होंने अपने हाथों ब्राह्मणदेवताके पाँव पखारकर उनका चरणोदक अपने सिरपर धारण किया और उनके शरीरमें चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धोंका लेपन किया॥ २०-२१॥","meaning_covers":[20,21]},{"id":"10.80.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/21/","page":621,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अग्रहीच्छिरसा राजन् भगवाँल्लोकपावनः।","व्यलिम्पद् दिव्यगन्धेन चन्दनागुरुकुंकुमैः॥ २१"],"iast":["agrahīcchirasā rājan bhagavām̐llokapāvanaḥ|","vyalimpad divyagandhena candanāgurukuṃkumaiḥ|| 21"],"meaning":"परीक्षित्! कुछ समयके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें ले जाकर अपने पलंगपर बैठा दिया और स्वयं पूजनकी सामग्री लाकर उनकी पूजा की। प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सभीको पवित्र करनेवाले हैं; फिर भी उन्होंने अपने हाथों ब्राह्मणदेवताके पाँव पखारकर उनका चरणोदक अपने सिरपर धारण किया और उनके शरीरमें चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धोंका लेपन किया॥ २०-२१॥","meaning_covers":[20,21]},{"id":"10.80.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/22/","page":622,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धूपैः सुरभिभिर्मित्रं प्रदीपावलिभिर्मुदा।","अर्चित्वाऽऽवेद्य ताम्बूलं गां च स्वागतमब्रवीत्॥ २२"],"iast":["dhūpaiḥ surabhibhirmitraṃ pradīpāvalibhirmudā|","arcitvā''vedya tāmbūlaṃ gāṃ ca svāgatamabravīt|| 22"],"meaning":"फिर उन्होंने बड़े आनन्दसे सुगन्धित धूप और दीपावलीसे अपने मित्रकी आरती उतारी। इस प्रकार पूजा करके पान एवं गाय देकर मधुर वचनोंसे ‘भले पधारे’ ऐसा कहकर उनका स्वागत किया॥ २२॥"},{"id":"10.80.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/23/","page":622,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कुचैलं मलिनं क्षामं द्विजं धमनिसंततम्।","देवी पर्यचरत् साक्षाच्चामरव्यजनेन वै॥ २३"],"iast":["kucailaṃ malinaṃ kṣāmaṃ dvijaṃ dhamanisaṃtatam|","devī paryacarat sākṣāccāmaravyajanena vai|| 23"],"meaning":"ब्राह्मणदेवता फटे-पुराने वस्त्र पहने हुए थे। शरीर अत्यन्त मलिन और दुर्बल था। देहकी सारी नसें दिखायी पड़ती थीं। स्वयं भगवती रुक्मिणीजी चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं॥ २३॥"},{"id":"10.80.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/24/","page":622,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्तःपुरजनो दृष्ट्वा कृष्णेनामलकीर्तिना।","विस्मितोऽभूदतिप्रीत्या अवधूतं सभाजितम्॥ २४"],"iast":["antaḥpurajano dṛṣṭvā kṛṣṇenāmalakīrtinā|","vismito'bhūdatiprītyā avadhūtaṃ sabhājitam|| 24"],"meaning":"अन्तःपुरकी स्त्रियाँ यह देखकर अत्यन्त विस्मित हो गयीं कि पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण अतिशय प्रेमसे इस मैले-कुचैले अवधूत ब्राह्मणकी पूजा कर रहे हैं॥ २४॥"},{"id":"10.80.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/25/","page":622,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किमनेन कृतं पुण्यमवधूतेन भिक्षुणा।","श्रिया हीनेन लोकेऽस्मिन् गर्हितेनाधमेन च॥ २५"],"iast":["kimanena kṛtaṃ puṇyamavadhūtena bhikṣuṇā|","śriyā hīnena loke'smin garhitenādhamena ca|| 25"],"meaning":"वे आपसमें कहने लगीं—‘इस नंग-धड़ंग, निर्धन, निन्दनीय और निकृष्ट भिखमंगेने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है, जिससे त्रिलोकी-गुरु श्रीनिवास श्रीकृष्ण स्वयं इसका आदर-सत्कार कर रहे हैं। देखो तो सही, इन्होंने अपने पलंगपर सेवा करती हुई स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीको छोड़कर इस ब्राह्मणको अपने बड़े भाई बलरामजीके समान हृदयसे लगाया है’॥ २५-२६॥","meaning_covers":[25,26]},{"id":"10.80.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/26/","page":622,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["योऽसौ त्रिलोकगुरुणा श्रीनिवासेन सम्भृतः।","पर्यंकस्थां श्रियं हित्वा परिष्वक्तोऽग्रजो यथा॥ २६"],"iast":["yo'sau trilokaguruṇā śrīnivāsena sambhṛtaḥ|","paryaṃkasthāṃ śriyaṃ hitvā pariṣvakto'grajo yathā|| 26"],"meaning":"वे आपसमें कहने लगीं—‘इस नंग-धड़ंग, निर्धन, निन्दनीय और निकृष्ट भिखमंगेने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है, जिससे त्रिलोकी-गुरु श्रीनिवास श्रीकृष्ण स्वयं इसका आदर-सत्कार कर रहे हैं। देखो तो सही, इन्होंने अपने पलंगपर सेवा करती हुई स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीको छोड़कर इस ब्राह्मणको अपने बड़े भाई बलरामजीके समान हृदयसे लगाया है’॥ २५-२६॥","meaning_covers":[25,26]},{"id":"10.80.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/27/","page":622,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कथयांचक्रतुर्गाथाः पूर्वा गुरुकुले सतोः।","आत्मनो ललिता राजन् करौ गृह्य परस्परम्॥ २७"],"iast":["kathayāṃcakraturgāthāḥ pūrvā gurukule satoḥ|","ātmano lalitā rājan karau gṛhya parasparam|| 27"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और वे ब्राह्मण दोनों एक-दूसरेका हाथ पकड़कर अपने पूर्वजीवनकी उन आनन्ददायक घटनाओंका स्मरण और वर्णन करने लगे जो गुरुकुलमें रहते समय घटित हुई थीं॥ २७॥"},{"id":"10.80.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/28/","page":622,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अपि ब्रह्मन् गुरुकुलाद् भवता लब्धदक्षिणात्।","समावृत्तेन धर्मज्ञ भार्योढा सदृशी न वा॥ २८"],"iast":["api brahman gurukulād bhavatā labdhadakṣiṇāt|","samāvṛttena dharmajña bhāryoḍhā sadṛśī na vā|| 28"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—धर्मके मर्मज्ञ ब्राह्मणदेव! गुरुदक्षिणा देकर जब आप गुरुकुलसे लौट आये, तब आपने अपने अनुरूप स्त्रीसे विवाह किया या नहीं?॥ २८॥"},{"id":"10.80.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/29/","page":622,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रायो गृहेषु ते चित्तमकामविहतं तथा।","नैवातिप्रीयसे विद्वन् धनेषु विदितं हि मे॥ २९"],"iast":["prāyo gṛheṣu te cittamakāmavihataṃ tathā|","naivātiprīyase vidvan dhaneṣu viditaṃ hi me|| 29"],"meaning":"मैं जानता हूँ कि आपका चित्त गृहस्थीमें रहनेपर भी प्रायः विषय-भोगोंमें आसक्त नहीं है। विद्वन्! यह भी मुझे मालूम है कि धन आदिमें भी आपकी कोई प्रीति नहीं है॥ २९॥"},{"id":"10.80.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/30/","page":622,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["केचित् कुर्वन्ति कर्माणि कामैरहतचेतसः।","त्यजन्तः प्रकृतीर्दैवीर्यथाहं लोकसङ्ग्रहम्॥ ३०"],"iast":["kecit kurvanti karmāṇi kāmairahatacetasaḥ|","tyajantaḥ prakṛtīrdaivīryathāhaṃ lokasaṅgraham|| 30"],"meaning":"जगत‍्में विरले ही लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान्‌की मायासे निर्मित विषयसम्बन्धी वासनाओंका त्याग कर देते हैं और चित्तमें विषयोंकी तनिक भी वासना न रहनेपर भी मेरे समान केवल लोकशिक्षाके लिये कर्म करते रहते हैं॥ ३०॥"},{"id":"10.80.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/31/","page":622,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कच्चिद् गुरुकुले वासं ब्रह्मन् स्मरसि नौ यतः।","द्विजो विज्ञाय विज्ञेयं तमसः पारमश्‍नुते॥ ३१"],"iast":["kaccid gurukule vāsaṃ brahman smarasi nau yataḥ|","dvijo vijñāya vijñeyaṃ tamasaḥ pāramaśnute|| 31"],"meaning":"ब्राह्मणशिरोमणे! क्या आपको उस समयकी बात याद है, जब हम दोनों एक साथ गुरुकुलमें निवास करते थे। सचमुच गुरुकुलमें ही द्विजातियोंको अपने ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान होता है, जिसके द्वारा वे अज्ञानान्धकारसे पार हो जाते हैं॥ ३१॥"},{"id":"10.80.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/32/","page":623,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स वै सत्कर्मणां साक्षाद् द्विजातेरिह सम्भवः।","आद्योऽङ्ग यत्राश्रमिणां यथाहं ज्ञानदो गुरुः॥ ३२"],"iast":["sa vai satkarmaṇāṃ sākṣād dvijāteriha sambhavaḥ|","ādyo'ṅga yatrāśramiṇāṃ yathāhaṃ jñānado guruḥ|| 32"],"meaning":"मित्र! इस संसारमें शरीरका कारण—जन्मदाता पिता प्रथम गुरु है। इसके बाद उपनयन-संस्कार करके सत्कर्मोंकी शिक्षा देनेवाला दूसरा गुरु है। वह मेरे ही समान पूज्य है। तदनन्तर ज्ञानोपदेश करके परमात्माको प्राप्त करानेवाला गुरु तो मेरा स्वरूप ही है। वर्णाश्रमियोंके ये तीन गुरु होते हैं॥ ३२॥"},{"id":"10.80.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/33/","page":623,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नन्वर्थकोविदा ब्रह्मन् वर्णाश्रमवतामिह।","ये मया गुरुणा वाचा तरन्त्यंजो भवार्णवम्॥ ३३"],"iast":["nanvarthakovidā brahman varṇāśramavatāmiha|","ye mayā guruṇā vācā tarantyaṃjo bhavārṇavam|| 33"],"meaning":"मेरे प्यारे मित्र! गुरुके स्वरूपमें स्वयं मैं हूँ। इस जगत‍्में वर्णाश्रमियोंमें जो लोग अपने गुरुदेवके उपदेशानुसार अनायास ही भवसागर पार कर लेते हैं, वे अपने स्वार्थ और परमार्थके सच्चे जानकार हैं॥ ३३॥"},{"id":"10.80.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/34/","page":623,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा।","तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा॥ ३४"],"iast":["nāhamijyāprajātibhyāṃ tapasopaśamena vā|","tuṣyeyaṃ sarvabhūtātmā guruśuśrūṣayā yathā|| 34"],"meaning":"प्रिय मित्र! मैं सबका आत्मा हूँ, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान हूँ। मैं गृहस्थके धर्म पंचमहायज्ञ आदिसे, ब्रह्मचारीके धर्म उपनयन-वेदाध्ययन आदिसे, वानप्रस्थीके धर्म तपस्यासे और सब ओरसे उपरत हो जाना—इस संन्यासीके धर्मसे भी उतना सन्तुष्ट नहीं होता, जितना गुरुदेवकी सेवा-शुश्रूषासे सन्तुष्ट होता हूँ॥ ३४॥"},{"id":"10.80.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/35/","page":623,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अपि नः स्मर्यते ब्रह्मन् वृत्तं निवसतां गुरौ।","गुरुदारैश्‍चोदितानामिन्धनानयने क्‍वचित्॥ ३५"],"iast":["api naḥ smaryate brahman vṛttaṃ nivasatāṃ gurau|","gurudāraiścoditānāmindhanānayane kvacit|| 35"],"meaning":"ब्रह्मन्! जिस समय हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे; उस समयकी वह बात आपको याद है क्या, जब हम दोनोंको एक दिन हमारी गुरुपत्‍नीने ईंधन लानेके लिये जंगलमें भेजा था॥ ३५॥"},{"id":"10.80.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/36/","page":623,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रविष्टानां महारण्यमपर्तौ सुमहद् द्विज।","वातवर्षमभूत्तीव्रं निष्ठुराः स्तनयित्‍नवः॥ ३६"],"iast":["praviṣṭānāṃ mahāraṇyamapartau sumahad dvija|","vātavarṣamabhūttīvraṃ niṣṭhurāḥ stanayitnavaḥ|| 36"],"meaning":"उस समय हमलोग एक घोर जंगलमें गये हुए थे और बिना ऋतुके ही बड़ा भयंकर आँधी-पानी आ गया था। आकाशमें बिजली कड़कने लगी थी॥ ३६॥"},{"id":"10.80.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/37/","page":623,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सूर्यश्‍चास्तं गतस्तावत् तमसा चावृता दिशः।","निम्‍नं कूलं जलमयं न प्राज्ञायत किंचन॥ ३७"],"iast":["sūryaścāstaṃ gatastāvat tamasā cāvṛtā diśaḥ|","nimnaṃ kūlaṃ jalamayaṃ na prājñāyata kiṃcana|| 37"],"meaning":"तबतक सूर्यास्त हो गया; चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा फैल गया। धरतीपर इस प्रकार पानी-ही-पानी हो गया कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ किनारा, इसका पता ही न चलता था॥ ३७॥"},{"id":"10.80.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/38/","page":623,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वयं भृशं तत्र महानिलाम्बुभिर्निहन्यमाना मुहुरम्बुसम्प्लवे।","दिशोऽविदन्तोऽथ परस्परं वने गृहीतहस्ताः परिबभ्रिमातुराः॥ ३८"],"iast":["vayaṃ bhṛśaṃ tatra mahānilāmbubhirnihanyamānā muhurambusamplave|","diśo'vidanto'tha parasparaṃ vane gṛhītahastāḥ paribabhrimāturāḥ|| 38"],"meaning":"वह वर्षा क्या थी, एक छोटा-मोटा प्रलय ही था। आँधीके झटकों और वर्षाकी बौछारोंसे हमलोगोंको बड़ी पीड़ा हुई, दिशाका ज्ञान न रहा। हमलोग अत्यन्त आतुर हो गये और एक-दूसरेका हाथ पकड़कर जंगलमें इधर-उधर भटकते रहे॥ ३८॥"},{"id":"10.80.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/39/","page":623,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतद् विदित्वा उदिते रवौ सान्दीपनिर्गुरुः।","अन्वेषमाणो नः शिष्यानाचार्योऽपश्यदातुरान्॥ ३९"],"iast":["etad viditvā udite ravau sāndīpanirguruḥ|","anveṣamāṇo naḥ śiṣyānācāryo'paśyadāturān|| 39"],"meaning":"जब हमारे गुरुदेव सान्दीपनि मुनिको इस बातका पता चला, तब वे सूर्योदय होनेपर अपने शिष्य हमलोगोंको ढूँढ़ते हुए जंगलमें पहुँचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यन्त आतुर हो रहे हैं॥ ३९॥"},{"id":"10.80.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/40/","page":624,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहो हे पुत्रका यूयमस्मदर्थेऽतिदुःखिताः।","आत्मा वै प्राणिनां प्रेष्ठस्तमनादृत्य मत्पराः॥ ४०"],"iast":["aho he putrakā yūyamasmadarthe'tiduḥkhitāḥ|","ātmā vai prāṇināṃ preṣṭhastamanādṛtya matparāḥ|| 40"],"meaning":"वे कहने लगे—‘आश्‍चर्य है, आश्‍चर्य है! पुत्रो! तुमलोगोंने हमारे लिये अत्यन्त कष्ट उठाया। सभी प्राणियोंको अपना शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है; परन्तु तुम दोनों उसकी भी परवा न करके हमारी सेवामें ही संल‌ग्‍न रहे॥ ४०॥"},{"id":"10.80.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/41/","page":624,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतदेव हि सच्छिष्यैः कर्तव्यं गुरुनिष्कृतम्।","यद् वै विशुद्धभावेन सर्वार्थात्मार्पणं गुरौ॥ ४१"],"iast":["etadeva hi sacchiṣyaiḥ kartavyaṃ guruniṣkṛtam|","yad vai viśuddhabhāvena sarvārthātmārpaṇaṃ gurau|| 41"],"meaning":"गुरुके ऋणसे मुक्त होनेके लिये सत्-शिष्योंका इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भावसे अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेवकी सेवामें समर्पित कर दें॥ ४१॥"},{"id":"10.80.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/42/","page":624,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तुष्टोऽहं भो द्विजश्रेष्ठाः सत्याः सन्तु मनोरथाः।","छन्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च॥ ४२"],"iast":["tuṣṭo'haṃ bho dvijaśreṣṭhāḥ satyāḥ santu manorathāḥ|","chandāṃsyayātayāmāni bhavantviha paratra ca|| 42"],"meaning":"द्विज-शिरोमणियो! मैं तुमलोगोंसे अत्यन्त प्रसन्‍न हूँ। तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हों और तुमलोगोंने हमसे जो वेदाध्ययन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कण्ठस्थ रहे तथा इस लोक एवं परलोकमें कहीं भी निष्फल न हो’॥ ४२॥"},{"id":"10.80.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/43/","page":624,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्थंविधान्यनेकानि वसतां गुरुवेश्मसु।","गुरोरनुग्रहेणैव पुमान् पूर्णः प्रशान्तये॥ ४३"],"iast":["itthaṃvidhānyanekāni vasatāṃ guruveśmasu|","guroranugraheṇaiva pumān pūrṇaḥ praśāntaye|| 43"],"meaning":"प्रिय मित्र! जिस समय हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे, हमारे जीवनमें ऐसी-ऐसी अनेकों घटनाएँ घटित हुई थीं। इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेवकी कृपासे ही मनुष्य शान्तिका अधिकारी होता और पूर्णताको प्राप्त करता है॥ ४३॥"},{"id":"10.80.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/44/","page":624,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["किमस्माभिरनिर्वृत्तं देवदेव जगद्गुरो।","भवता सत्यकामेन येषां वासो गुरावभूत्॥ ४४"],"iast":["kimasmābhiranirvṛttaṃ devadeva jagadguro|","bhavatā satyakāmena yeṣāṃ vāso gurāvabhūt|| 44"],"meaning":"ब्राह्मणदेवताने कहा—देवताओंके आराध्यदेव जगद्गुरु श्रीकृष्ण! भला, अब हमें क्या करना बाकी है? क्योंकि आपके साथ, जो सत्यसंकल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुलमें रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था॥ ४४॥"},{"id":"10.80.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/45/","page":624,"speaker":"ब्राह्मण उवाच","sanskrit":["यस्यच्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो।","श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोऽत्यन्तविडम्बनम्॥ ४५"],"iast":["yasyacchandomayaṃ brahma deha āvapanaṃ vibho|","śreyasāṃ tasya guruṣu vāso'tyantaviḍambanam|| 45"],"meaning":"प्रभो! छन्दोमय वेद, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चतुर्विध पुरुषार्थके मूल स्रोत हैं; और वे हैं आपके शरीर। वही आप वेदाध्ययनके लिये गुरुकुलमें निवास करें, यह मनुष्य-लीलाका अभिनय नहीं तो और क्या है?॥ ४५॥"}],"text":[{"b":36593,"kind":"adhyaya_heading","page":619,"text":"अथाशीतितमोऽध्यायः"},{"b":36594,"kind":"topic_heading","page":619,"text":"श्रीकृष्णके द्वारा सुदामाजीका स्वागत"},{"b":36595,"kind":"topic_heading","page":619,"text":"राजोवाच"},{"b":36596,"kind":"sanskrit_shloka","page":619,"verses":["10.80.1"],"text":"भगवन् यानि चान्यानि मुकुन्दस्य महात्मनः।"},{"b":36597,"kind":"sanskrit_shloka","page":619,"verses":["10.80.1"],"text":"वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य श्रोतुमिच्छामहे प्रभो॥ १"},{"b":36598,"kind":"sanskrit_shloka","page":619,"verses":["10.80.2"],"text":"को नु श्रुत्वासकृद् ब्रह्मन्‍नुत्तमश्‍लोकसत्कथाः।"},{"b":36599,"kind":"sanskrit_shloka","page":619,"verses":["10.80.2"],"text":"विरमेत विशेषज्ञो विषण्णः काममार्गणैः॥ २"},{"b":36600,"kind":"hindi_commentary","page":619,"verses":["10.80.3"],"text":"सा वाग् यया तस्य गुणान् गृणीते"},{"b":36601,"kind":"sanskrit_shloka","page":619,"verses":["10.80.3"],"text":"करौ च तत्कर्मकरौ मनश्‍च।"},{"b":36602,"kind":"hindi_commentary","page":619,"verses":["10.80.3"],"text":"स्मरेद् वसन्तं स्थिरजंगमेषु"},{"b":36603,"kind":"sanskrit_shloka","page":619,"verses":["10.80.3"],"text":"शृणोति तत्पुण्यकथाः स कर्णः॥ ३"},{"b":36604,"kind":"hindi_commentary","page":619,"verses":["10.80.4"],"text":"शिरस्तु तस्योभयलिंगमानमे-"},{"b":36605,"kind":"sanskrit_shloka","page":619,"verses":["10.80.4"],"text":"त्तदेव यत् पश्यति तद्धि चक्षुः।"},{"b":36606,"kind":"hindi_commentary","page":619,"verses":["10.80.4"],"text":"अंगानि विष्णोरथ तज्जनानां"},{"b":36607,"kind":"sanskrit_shloka","page":619,"verses":["10.80.4"],"text":"पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम्॥ ४"},{"b":36608,"kind":"hindi_commentary","page":619,"explains":["10.80.1","10.80.2","10.80.3","10.80.4"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने कहा—भगवन्! प्रेम और मुक्तिके दाता परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी शक्ति अनन्त है। इसलिये उनकी माधुर्य और ऐश्‍वर्यसे भरी लीलाएँ भी अनन्त हैं। अब हम उनकी दूसरी लीलाएँ, जिनका वर्णन आपने अबतक नहीं किया है, सुनना चाहते हैं॥ १॥ ब्रह्मन्! यह जीव विषय-सुखको खोजते-खोजते अत्यन्त दुःखी हो गया है। वे बाणकी तरह इसके चित्तमें चुभते रहते हैं। ऐसी स्थितिमें ऐसा कौन-सा रसिक—रसका विशेषज्ञ पुरुष होगा, जो बार-बार पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णकी मंगलमयी लीलाओंका श्रवण करके भी उनसे विमुख होना चाहेगा॥ २॥ जो वाणी भगवान्‌के गुणोंका गान करती है, वही सच्ची वाणी है। वे ही हाथ सच्चे हाथ हैं, जो भगवान्‌की सेवाके लिये काम करते हैं। वही मन सच्चा मन है, जो चराचर प्राणियोंमें निवास करनेवाले भगवान्‌का स्मरण करता है; और वे ही कान वास्तवमें कान कहनेयोग्य हैं, जो भगवान्‌की पुण्यमयी कथाओंका श्रवण करते हैं ॥ ३॥ वही सिर सिर है, जो चराचर जगत‍्को भगवान्‌की चल-अचल प्रतिमा समझकर नमस्कार करता है; और जो सर्वत्र भगवद्विग्रहका दर्शन करते हैं, वे ही नेत्र वास्तवमें नेत्र हैं। शरीरके जो अंग भगवान् और उनके भक्तोंके चरणोदकका सेवन करते हैं, वे ही अंग वास्तवमें अंग हैं; सच पूछिये तो उन्हींका होना सफल है॥ ४॥"},{"b":36609,"kind":"topic_heading","page":620,"text":"सूत उवाच"},{"b":36610,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.5"],"text":"विष्णुरातेन सम्पृष्टो भगवान् बादरायणिः।"},{"b":36611,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.5"],"text":"वासुदेवे भगवति निम‌ग्‍नहृदयोऽब्रवीत्॥ ५"},{"b":36612,"kind":"hindi_translation","page":620,"explains":["10.80.5"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षित‍्ने इस प्रकार प्रश्‍न किया, तब भगवान् श्रीशुकदेवजीका हृदय भगवान् श्रीकृष्णमें ही तल्लीन हो गया। उन्होंने परीक्षित‍्से इस प्रकार कहा॥ ५॥"},{"b":36613,"kind":"topic_heading","page":620,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36614,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.6"],"text":"कृष्णस्यासीत् सखा कश्‍चिद् ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः।"},{"b":36615,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.6"],"text":"विरक्त इन्द्रियार्थेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः॥ ६"},{"b":36616,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.7"],"text":"यदृच्छयोपपन्‍नेन वर्तमानो गृहाश्रमी।"},{"b":36617,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.7"],"text":"तस्य भार्या कुचैलस्य क्षुत्क्षामा च तथाविधा॥ ७"},{"b":36618,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.8"],"text":"पतिव्रता पतिं प्राह म्लायता वदनेन सा।"},{"b":36619,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.8"],"text":"दरिद्रा सीदमाना सा वेपमानाभिगम्य च॥ ८"},{"b":36620,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.9"],"text":"ननु ब्रह्मन् भगवतः सखा साक्षाच्छ्रियः पतिः।"},{"b":36621,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.9"],"text":"ब्रह्मण्यश्‍च शरण्यश्‍च भगवान् सात्वतर्षभः॥ ९"},{"b":36622,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.10"],"text":"तमुपैहि महाभाग साधूनां च परायणम्।"},{"b":36623,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.10"],"text":"दास्यति द्रविणं भूरि सीदते ते कुटुम्बिने॥ १०"},{"b":36624,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.11"],"text":"आस्तेऽधुना द्वारवत्यां भोजवृष्ण्यन्धकेश्‍वरः।"},{"b":36625,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.11"],"text":"स्मरतः पादकमलमात्मानमपि यच्छति।"},{"b":36626,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.11"],"text":"किं न्वर्थकामान् भजतो नात्यभीष्टांजगद्गुरुः॥ ११"},{"b":36627,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.12"],"text":"स एवं भार्यया विप्रो बहुशः प्रार्थितो मृदु।"},{"b":36628,"kind":"sanskrit_shloka","page":620,"verses":["10.80.12"],"text":"अयं हि परमो लाभ उत्तमश्‍लोकदर्शनम्॥ १२"},{"b":36629,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.13"],"text":"इति संचिन्त्य मनसा गमनाय मतिं दधे।"},{"b":36630,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.13"],"text":"अप्यस्त्युपायनं किंचिद् गृहे कल्याणि दीयताम्॥ १३"},{"b":36631,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.14"],"text":"याचित्वा चतुरो मुष्टीन् विप्रान् पृथुकतण्डुलान्।"},{"b":36632,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.14"],"text":"चैलखण्डेन तान् बद‍्ध्वा भर्त्रे प्रादादुपायनम्॥ १४"},{"b":36633,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.15"],"text":"स तानादाय विप्राग्र्यः प्रययौ द्वारकां किल।"},{"b":36634,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.15"],"text":"कृष्णसन्दर्शनं मह्यं कथं स्यादिति चिन्तयन्॥ १५"},{"b":36635,"kind":"hindi_commentary","page":620,"explains":["10.80.6","10.80.7","10.80.8","10.80.9","10.80.10","10.80.11","10.80.12","10.80.13","10.80.14","10.80.15"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परम मित्र थे। वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयोंसे विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे॥ ६॥ वे गृहस्थ होनेपर भी किसी प्रकारका संग्रह-परिग्रह न रखकर प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसीमें सन्तुष्ट रहते थे। उनके वस्त्र तो फटे-पुराने थे ही, उनकी पत्‍नीके भी वैसे ही थे। वह भी अपने पतिके समान ही भूखसे दुबली हो रही थी॥ ७॥ एक दिन दरिद्रताकी प्रतिमूर्ति दुःखिनी पतिव्रता भूखके मारे काँपती हुई अपने पतिदेवके पास गयी और मुरझाये हुए मुँहसे बोली—॥ ८॥ ‘भगवन्! साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण आपके सखा हैं। वे भक्तवाञ्छाकल्पतरु, शरणागतवत्सल और ब्राह्मणोंके परम भक्त हैं॥ ९॥ परम भाग्यवान् आर्यपुत्र! वे साधु-संतोंके, सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय हैं। आप उनके पास जाइये। जब वे जानेंगे कि आप कुटुम्बी हैं और अन्‍नके बिना दुःखी हो रहे हैं तो वे आपको बहुत-सा धन देंगे॥ १०॥ आजकल वे भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके स्वामीके रूपमें द्वारकामें ही निवास कर रहे हैं और इतने उदार हैं कि जो उनके चरणकमलोंका स्मरण करते हैं, उन प्रेमी भक्तोंको वे अपने-आपतकका दान कर डालते हैं। ऐसी स्थितिमें जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तोंको यदि धन और विषय-सुख, जो अत्यन्त वाञ्छनीय नहीं है, दे दें तो इसमें आश्‍चर्यकी कौन-सी बात है?’॥ ११॥ इस प्रकार जब उन ब्राह्मणदेवताकी पत्‍नीने अपने पतिदेवसे कई बार बड़ी नम्रतासे प्रार्थना की, तब उन्होंने सोचा कि ‘धनकी तो कोई बात नहीं है; परन्तु भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन हो जायगा, यह तो जीवनका बहुत बड़ा लाभ है’॥ १२॥ यही विचार करके उन्होंने जानेका निश्‍चय किया और अपनी पत्‍नीसे बोले—‘कल्याणी! घरमें कुछ भेंट देनेयोग्य वस्तु भी है क्या? यदि हो तो दे दो’॥ १३॥ तब उस ब्राह्मणीने पास-पड़ोसके ब्राह्मणोंके घरसे चार मुट्ठी चिउड़े माँगकर एक कपड़ेमें बाँध दिये और भगवान्‌को भेंट देनेके लिये अपने पतिदेवको दे दिये॥ १४॥ इसके बाद वे ब्राह्मणदेवता उन चिउड़ोंको लेकर द्वारकाके लिये चल पड़े। वे मार्गमें यह सोचते जाते थे कि ‘मुझे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?’॥ १५॥"},{"b":36636,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.16"],"text":"त्रीणि गुल्मान्यतीयाय तिस्रः कक्षाश्‍च स द्विजः।"},{"b":36637,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.16"],"text":"विप्रोऽगम्यान्धकवृष्णीनां गृहेष्वच्युतधर्मिणाम्॥ १६"},{"b":36638,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.17"],"text":"गृहं द‍्व्यष्टसहस्राणां महिषीणां हरेर्द्विजः।"},{"b":36639,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.17"],"text":"विवेशैकतमं श्रीमद् ब्रह्मानन्दं गतो यथा॥ १७"},{"b":36640,"kind":"hindi_commentary","page":621,"explains":["10.80.16","10.80.17"],"text":"परीक्षित्! द्वारकामें पहुँचनेपर वे ब्राह्मणदेवता दूसरे ब्राह्मणोंके साथ सैनिकोंकी तीन छावनियाँ और तीन ड्योढ़ियाँ पार करके भगवद्धर्मका पालन करनेवाले अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंके महलोंमें, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है, जा पहुँचे॥ १६॥ उनके बीच भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार रानियोंके महल थे। उनमेंसे एकमें उन ब्राह्मणदेवताने प्रवेश किया। वह महल खूब सजा-सजाया—अत्यन्त शोभा-युक्त था। उसमें प्रवेश करते समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो वे ब्रह्मानन्दके समुद्रमें डूब-उतरा रहे हों!॥ १७॥"},{"b":36641,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.18"],"text":"तं विलोक्याच्युतो दूरात् प्रियापर्यंकमास्थितः।"},{"b":36642,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.18"],"text":"सहसोत्थाय चाभ्येत्य दोर्भ्यां पर्यग्रहीन्मुदा॥ १८"},{"b":36643,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.19"],"text":"सख्युः प्रियस्य विप्रर्षेरंगसंगातिनिर्वृतः।"},{"b":36644,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.19"],"text":"प्रीतो व्यमुंचदब्बिन्दून् नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः॥ १९"},{"b":36645,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.20"],"text":"अथोपवेश्य पर्यंके स्वयं सख्युः समर्हणम्।"},{"b":36646,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.20"],"text":"उपहृत्यावनिज्यास्य पादौ पादावनेजनीः॥ २०"},{"b":36647,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.21"],"text":"अग्रहीच्छिरसा राजन् भगवाँल्लोकपावनः।"},{"b":36648,"kind":"sanskrit_shloka","page":621,"verses":["10.80.21"],"text":"व्यलिम्पद् दिव्यगन्धेन चन्दनागुरुकुंकुमैः॥ २१"},{"b":36649,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.22"],"text":"धूपैः सुरभिभिर्मित्रं प्रदीपावलिभिर्मुदा।"},{"b":36650,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.22"],"text":"अर्चित्वाऽऽवेद्य ताम्बूलं गां च स्वागतमब्रवीत्॥ २२"},{"b":36651,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.23"],"text":"कुचैलं मलिनं क्षामं द्विजं धमनिसंततम्।"},{"b":36652,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.23"],"text":"देवी पर्यचरत् साक्षाच्चामरव्यजनेन वै॥ २३"},{"b":36653,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.24"],"text":"अन्तःपुरजनो दृष्ट्वा कृष्णेनामलकीर्तिना।"},{"b":36654,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.24"],"text":"विस्मितोऽभूदतिप्रीत्या अवधूतं सभाजितम्॥ २४"},{"b":36655,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.25"],"text":"किमनेन कृतं पुण्यमवधूतेन भिक्षुणा।"},{"b":36656,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.25"],"text":"श्रिया हीनेन लोकेऽस्मिन् गर्हितेनाधमेन च॥ २५"},{"b":36657,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.26"],"text":"योऽसौ त्रिलोकगुरुणा श्रीनिवासेन सम्भृतः।"},{"b":36658,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.26"],"text":"पर्यंकस्थां श्रियं हित्वा परिष्वक्तोऽग्रजो यथा॥ २६"},{"b":36659,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.27"],"text":"कथयांचक्रतुर्गाथाः पूर्वा गुरुकुले सतोः।"},{"b":36660,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.27"],"text":"आत्मनो ललिता राजन् करौ गृह्य परस्परम्॥ २७"},{"b":36661,"kind":"hindi_commentary","page":621,"explains":["10.80.18","10.80.19","10.80.20","10.80.21","10.80.22","10.80.23","10.80.24","10.80.25","10.80.26","10.80.27"],"text":"उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया रुक्मिणीजीके पलंगपर विराजे हुए थे। ब्राह्मणदेवताको दूरसे ही देखकर वे सहसा उठ खड़े हुए और उनके पास आकर बड़े आनन्दसे उन्हें अपने भुजपाशमें बाँध लिया॥ १८॥ परीक्षित्! परमानन्दस्वरूप भगवान् अपने प्यारे सखा ब्राह्मणदेवताके अंग-स्पर्शसे अत्यन्त आनन्दित हुए। उनके कमलके समान कोमल नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बरसने लगे॥ १९॥ परीक्षित्! कुछ समयके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें ले जाकर अपने पलंगपर बैठा दिया और स्वयं पूजनकी सामग्री लाकर उनकी पूजा की। प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सभीको पवित्र करनेवाले हैं; फिर भी उन्होंने अपने हाथों ब्राह्मणदेवताके पाँव पखारकर उनका चरणोदक अपने सिरपर धारण किया और उनके शरीरमें चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धोंका लेपन किया॥ २०-२१॥ फिर उन्होंने बड़े आनन्दसे सुगन्धित धूप और दीपावलीसे अपने मित्रकी आरती उतारी। इस प्रकार पूजा करके पान एवं गाय देकर मधुर वचनोंसे ‘भले पधारे’ ऐसा कहकर उनका स्वागत किया॥ २२॥ ब्राह्मणदेवता फटे-पुराने वस्त्र पहने हुए थे। शरीर अत्यन्त मलिन और दुर्बल था। देहकी सारी नसें दिखायी पड़ती थीं। स्वयं भगवती रुक्मिणीजी चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं॥ २३॥ अन्तःपुरकी स्त्रियाँ यह देखकर अत्यन्त विस्मित हो गयीं कि पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण अतिशय प्रेमसे इस मैले-कुचैले अवधूत ब्राह्मणकी पूजा कर रहे हैं॥ २४॥ वे आपसमें कहने लगीं—‘इस नंग-धड़ंग, निर्धन, निन्दनीय और निकृष्ट भिखमंगेने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है, जिससे त्रिलोकी-गुरु श्रीनिवास श्रीकृष्ण स्वयं इसका आदर-सत्कार कर रहे हैं। देखो तो सही, इन्होंने अपने पलंगपर सेवा करती हुई स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजीको छोड़कर इस ब्राह्मणको अपने बड़े भाई बलरामजीके समान हृदयसे लगाया है’॥ २५-२६॥ प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और वे ब्राह्मण दोनों एक-दूसरेका हाथ पकड़कर अपने पूर्वजीवनकी उन आनन्ददायक घटनाओंका स्मरण और वर्णन करने लगे जो गुरुकुलमें रहते समय घटित हुई थीं॥ २७॥"},{"b":36662,"kind":"topic_heading","page":622,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":36663,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.28"],"text":"अपि ब्रह्मन् गुरुकुलाद् भवता लब्धदक्षिणात्।"},{"b":36664,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.28"],"text":"समावृत्तेन धर्मज्ञ भार्योढा सदृशी न वा॥ २८"},{"b":36665,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.29"],"text":"प्रायो गृहेषु ते चित्तमकामविहतं तथा।"},{"b":36666,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.29"],"text":"नैवातिप्रीयसे विद्वन् धनेषु विदितं हि मे॥ २९"},{"b":36667,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.30"],"text":"केचित् कुर्वन्ति कर्माणि कामैरहतचेतसः।"},{"b":36668,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.30"],"text":"त्यजन्तः प्रकृतीर्दैवीर्यथाहं लोकसङ्ग्रहम्॥ ३०"},{"b":36669,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.31"],"text":"कच्चिद् गुरुकुले वासं ब्रह्मन् स्मरसि नौ यतः।"},{"b":36670,"kind":"sanskrit_shloka","page":622,"verses":["10.80.31"],"text":"द्विजो विज्ञाय विज्ञेयं तमसः पारमश्‍नुते॥ ३१"},{"b":36671,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.32"],"text":"स वै सत्कर्मणां साक्षाद् द्विजातेरिह सम्भवः।"},{"b":36672,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.32"],"text":"आद्योऽङ्ग यत्राश्रमिणां यथाहं ज्ञानदो गुरुः॥ ३२"},{"b":36673,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.33"],"text":"नन्वर्थकोविदा ब्रह्मन् वर्णाश्रमवतामिह।"},{"b":36674,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.33"],"text":"ये मया गुरुणा वाचा तरन्त्यंजो भवार्णवम्॥ ३३"},{"b":36675,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.34"],"text":"नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा।"},{"b":36676,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.34"],"text":"तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा॥ ३४"},{"b":36677,"kind":"hindi_commentary","page":622,"explains":["10.80.28","10.80.29","10.80.30","10.80.31","10.80.32","10.80.33","10.80.34"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—धर्मके मर्मज्ञ ब्राह्मणदेव! गुरुदक्षिणा देकर जब आप गुरुकुलसे लौट आये, तब आपने अपने अनुरूप स्त्रीसे विवाह किया या नहीं?॥ २८॥ मैं जानता हूँ कि आपका चित्त गृहस्थीमें रहनेपर भी प्रायः विषय-भोगोंमें आसक्त नहीं है। विद्वन्! यह भी मुझे मालूम है कि धन आदिमें भी आपकी कोई प्रीति नहीं है॥ २९॥ जगत‍्में विरले ही लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान्‌की मायासे निर्मित विषयसम्बन्धी वासनाओंका त्याग कर देते हैं और चित्तमें विषयोंकी तनिक भी वासना न रहनेपर भी मेरे समान केवल लोकशिक्षाके लिये कर्म करते रहते हैं॥ ३०॥ ब्राह्मणशिरोमणे! क्या आपको उस समयकी बात याद है, जब हम दोनों एक साथ गुरुकुलमें निवास करते थे। सचमुच गुरुकुलमें ही द्विजातियोंको अपने ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान होता है, जिसके द्वारा वे अज्ञानान्धकारसे पार हो जाते हैं॥ ३१॥ मित्र! इस संसारमें शरीरका कारण—जन्मदाता पिता प्रथम गुरु है। इसके बाद उपनयन-संस्कार करके सत्कर्मोंकी शिक्षा देनेवाला दूसरा गुरु है। वह मेरे ही समान पूज्य है। तदनन्तर ज्ञानोपदेश करके परमात्माको प्राप्त करानेवाला गुरु तो मेरा स्वरूप ही है। वर्णाश्रमियोंके ये तीन गुरु होते हैं॥ ३२॥ मेरे प्यारे मित्र! गुरुके स्वरूपमें स्वयं मैं हूँ। इस जगत‍्में वर्णाश्रमियोंमें जो लोग अपने गुरुदेवके उपदेशानुसार अनायास ही भवसागर पार कर लेते हैं, वे अपने स्वार्थ और परमार्थके सच्चे जानकार हैं॥ ३३॥ प्रिय मित्र! मैं सबका आत्मा हूँ, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान हूँ। मैं गृहस्थके धर्म पंचमहायज्ञ आदिसे, ब्रह्मचारीके धर्म उपनयन-वेदाध्ययन आदिसे, वानप्रस्थीके धर्म तपस्यासे और सब ओरसे उपरत हो जाना—इस संन्यासीके धर्मसे भी उतना सन्तुष्ट नहीं होता, जितना गुरुदेवकी सेवा-शुश्रूषासे सन्तुष्ट होता हूँ॥ ३४॥"},{"b":36678,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.35"],"text":"अपि नः स्मर्यते ब्रह्मन् वृत्तं निवसतां गुरौ।"},{"b":36679,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.35"],"text":"गुरुदारैश्‍चोदितानामिन्धनानयने क्‍वचित्॥ ३५"},{"b":36680,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.36"],"text":"प्रविष्टानां महारण्यमपर्तौ सुमहद् द्विज।"},{"b":36681,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.36"],"text":"वातवर्षमभूत्तीव्रं निष्ठुराः स्तनयित्‍नवः॥ ३६"},{"b":36682,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.37"],"text":"सूर्यश्‍चास्तं गतस्तावत् तमसा चावृता दिशः।"},{"b":36683,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.37"],"text":"निम्‍नं कूलं जलमयं न प्राज्ञायत किंचन॥ ३७"},{"b":36684,"kind":"hindi_commentary","page":623,"explains":["10.80.35","10.80.36","10.80.37"],"text":"ब्रह्मन्! जिस समय हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे; उस समयकी वह बात आपको याद है क्या, जब हम दोनोंको एक दिन हमारी गुरुपत्‍नीने ईंधन लानेके लिये जंगलमें भेजा था॥ ३५॥ उस समय हमलोग एक घोर जंगलमें गये हुए थे और बिना ऋतुके ही बड़ा भयंकर आँधी-पानी आ गया था। आकाशमें बिजली कड़कने लगी थी॥ ३६॥ तबतक सूर्यास्त हो गया; चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा फैल गया। धरतीपर इस प्रकार पानी-ही-पानी हो गया कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ किनारा, इसका पता ही न चलता था॥ ३७॥"},{"b":36685,"kind":"hindi_commentary","page":623,"verses":["10.80.38"],"text":"वयं भृशं तत्र महानिलाम्बुभिर्निहन्यमाना मुहुरम्बुसम्प्लवे।"},{"b":36686,"kind":"hindi_translation","page":623,"verses":["10.80.38"],"text":"दिशोऽविदन्तोऽथ परस्परं वने गृहीतहस्ताः परिबभ्रिमातुराः॥ ३८"},{"b":36687,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.39"],"text":"एतद् विदित्वा उदिते रवौ सान्दीपनिर्गुरुः।"},{"b":36688,"kind":"sanskrit_shloka","page":623,"verses":["10.80.39"],"text":"अन्वेषमाणो नः शिष्यानाचार्योऽपश्यदातुरान्॥ ३९"},{"b":36689,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.40"],"text":"अहो हे पुत्रका यूयमस्मदर्थेऽतिदुःखिताः।"},{"b":36690,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.40"],"text":"आत्मा वै प्राणिनां प्रेष्ठस्तमनादृत्य मत्पराः॥ ४०"},{"b":36691,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.41"],"text":"एतदेव हि सच्छिष्यैः कर्तव्यं गुरुनिष्कृतम्।"},{"b":36692,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.41"],"text":"यद् वै विशुद्धभावेन सर्वार्थात्मार्पणं गुरौ॥ ४१"},{"b":36693,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.42"],"text":"तुष्टोऽहं भो द्विजश्रेष्ठाः सत्याः सन्तु मनोरथाः।"},{"b":36694,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.42"],"text":"छन्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च॥ ४२"},{"b":36695,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.43"],"text":"इत्थंविधान्यनेकानि वसतां गुरुवेश्मसु।"},{"b":36696,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.43"],"text":"गुरोरनुग्रहेणैव पुमान् पूर्णः प्रशान्तये॥ ४३"},{"b":36697,"kind":"hindi_translation","page":623,"explains":["10.80.38","10.80.39","10.80.40","10.80.41","10.80.42","10.80.43"],"text":"वह वर्षा क्या थी, एक छोटा-मोटा प्रलय ही था। आँधीके झटकों और वर्षाकी बौछारोंसे हमलोगोंको बड़ी पीड़ा हुई, दिशाका ज्ञान न रहा। हमलोग अत्यन्त आतुर हो गये और एक-दूसरेका हाथ पकड़कर जंगलमें इधर-उधर भटकते रहे॥ ३८॥ जब हमारे गुरुदेव सान्दीपनि मुनिको इस बातका पता चला, तब वे सूर्योदय होनेपर अपने शिष्य हमलोगोंको ढूँढ़ते हुए जंगलमें पहुँचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यन्त आतुर हो रहे हैं॥ ३९॥ वे कहने लगे—‘आश्‍चर्य है, आश्‍चर्य है! पुत्रो! तुमलोगोंने हमारे लिये अत्यन्त कष्ट उठाया। सभी प्राणियोंको अपना शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है; परन्तु तुम दोनों उसकी भी परवा न करके हमारी सेवामें ही संल‌ग्‍न रहे॥ ४०॥ गुरुके ऋणसे मुक्त होनेके लिये सत्-शिष्योंका इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भावसे अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेवकी सेवामें समर्पित कर दें॥ ४१॥ द्विज-शिरोमणियो! मैं तुमलोगोंसे अत्यन्त प्रसन्‍न हूँ। तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हों और तुमलोगोंने हमसे जो वेदाध्ययन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कण्ठस्थ रहे तथा इस लोक एवं परलोकमें कहीं भी निष्फल न हो’॥ ४२॥ प्रिय मित्र! जिस समय हमलोग गुरुकुलमें निवास कर रहे थे, हमारे जीवनमें ऐसी-ऐसी अनेकों घटनाएँ घटित हुई थीं। इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेवकी कृपासे ही मनुष्य शान्तिका अधिकारी होता और पूर्णताको प्राप्त करता है॥ ४३॥"},{"b":36698,"kind":"topic_heading","page":624,"text":"ब्राह्मण उवाच"},{"b":36699,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.44"],"text":"किमस्माभिरनिर्वृत्तं देवदेव जगद्गुरो।"},{"b":36700,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.44"],"text":"भवता सत्यकामेन येषां वासो गुरावभूत्॥ ४४"},{"b":36701,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.45"],"text":"यस्यच्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो।"},{"b":36702,"kind":"sanskrit_shloka","page":624,"verses":["10.80.45"],"text":"श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोऽत्यन्तविडम्बनम्॥ ४५"},{"b":36703,"kind":"hindi_commentary","page":624,"explains":["10.80.44","10.80.45"],"text":"ब्राह्मणदेवताने कहा—देवताओंके आराध्यदेव जगद्गुरु श्रीकृष्ण! भला, अब हमें क्या करना बाकी है? क्योंकि आपके साथ, जो सत्यसंकल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुलमें रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था॥ ४४॥ प्रभो! छन्दोमय वेद, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चतुर्विध पुरुषार्थके मूल स्रोत हैं; और वे हैं आपके शरीर। वही आप वेदाध्ययनके लिये गुरुकुलमें निवास करें, यह मनुष्य-लीलाका अभिनय नहीं तो और क्या है?॥ ४५॥"},{"b":36704,"kind":"hindi_translation","page":624,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे श्रीदामचरितेऽशीतितमोऽध्यायः॥ ८०॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":2,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}