{"id":"10.77","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 77","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः","topics":["शाल्व-उद्धार"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[606,610]},"verses":[{"id":"10.77.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/1/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तूपस्पृश्य सलिलं दंशितो धृतकार्मुकः।","नय मां द्युमतः पार्श्‍वं वीरस्येत्याह सारथिम्॥ १"],"iast":["sa tūpaspṛśya salilaṃ daṃśito dhṛtakārmukaḥ|","naya māṃ dyumataḥ pārśvaṃ vīrasyetyāha sārathim|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब प्रद्युम्‍नजीने हाथ-मुँह धोकर, कवच पहन धनुष धारण किया और सारथीसे कहा कि ‘मुझे वीर द्युमान्‌के पास फिरसे ले चलो’॥ १॥"},{"id":"10.77.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/2/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विधमन्तं स्वसैन्यानि द्युमन्तं रुक्मिणीसुतः।","प्रतिहत्य प्रत्यविध्यन्‍नाराचैरष्टभिः स्मयन्॥ २"],"iast":["vidhamantaṃ svasainyāni dyumantaṃ rukmiṇīsutaḥ|","pratihatya pratyavidhyannārācairaṣṭabhiḥ smayan|| 2"],"meaning":"उस समय द्युमान् यादवसेनाको तहस-नहस कर रहा था। प्रद्युम्‍नजीने उसके पास पहुँचकर उसे ऐसा करनेसे रोक दिया और मुसकराकर आठ बाण मारे॥ २॥"},{"id":"10.77.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/3/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चतुर्भिश्‍चतुरो वाहान् सूतमेकेन चाहनत्।","द्वाभ्यां धनुश्‍च केतुं च शरेणान्येन वै शिरः॥ ३"],"iast":["caturbhiścaturo vāhān sūtamekena cāhanat|","dvābhyāṃ dhanuśca ketuṃ ca śareṇānyena vai śiraḥ|| 3"],"meaning":"चार बाणोंसे उसके चार घोड़े और एक-एक बाणसे सारथी, धनुष, ध्वजा और उसका सिर काट डाला॥ ३॥"},{"id":"10.77.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/4/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गदसात्यकिसाम्बाद्या जघ्नुः सौभपतेर्बलम्।","पेतुः समुद्रे सौभेयाः सर्वे संछिन्‍नकन्धराः॥ ४"],"iast":["gadasātyakisāmbādyā jaghnuḥ saubhapaterbalam|","petuḥ samudre saubheyāḥ sarve saṃchinnakandharāḥ|| 4"],"meaning":"इधर गद, सात्यकि, साम्ब आदि यदुवंशी वीर भी शाल्वकी सेनाका संहार करने लगे। सौभ विमानपर चढ़े हुए सैनिकोंकी गरदनें कट जातीं और वे समुद्रमें गिर पड़ते॥ ४॥"},{"id":"10.77.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/5/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं यदूनां शाल्वानां निघ्नतामितरेतरम्।","युद्धं त्रिणवरात्रं तदभूत्तुमुलमुल्बणम्॥ ५"],"iast":["evaṃ yadūnāṃ śālvānāṃ nighnatāmitaretaram|","yuddhaṃ triṇavarātraṃ tadabhūttumulamulbaṇam|| 5"],"meaning":"इस प्रकार यदुवंशी और शाल्वके सैनिक एक-दूसरेपर प्रहार करते रहे। बड़ा ही घमासान और भयंकर युद्ध हुआ और वह लगातार सत्ताईस दिनोंतक चलता रहा॥ ५॥"},{"id":"10.77.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/6/","page":606,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इन्द्रप्रस्थं गतः कृष्ण आहूतो धर्मसूनुना।","राजसूयेऽथ निर्वृत्ते शिशुपाले च संस्थिते॥ ६"],"iast":["indraprasthaṃ gataḥ kṛṣṇa āhūto dharmasūnunā|","rājasūye'tha nirvṛtte śiśupāle ca saṃsthite|| 6"],"meaning":"उन दिनों भगवान् श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिरके बुलानेसे इन्द्रप्रस्थ गये हुए थे। राजसूय यज्ञ हो चुका था और शिशुपालकी भी मृत्यु हो गयी थी॥ ६॥"},{"id":"10.77.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/7/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कुरुवृद्धाननुज्ञाप्य मुनींश्‍च ससुतां पृथाम्।","निमित्तान्यतिघोराणि पश्यन् द्वारवतीं ययौ॥ ७"],"iast":["kuruvṛddhānanujñāpya munīṃśca sasutāṃ pṛthām|","nimittānyatighorāṇi paśyan dvāravatīṃ yayau|| 7"],"meaning":"वहाँ भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि बड़े भयंकर अपशकुन हो रहे हैं। तब उन्होंने कुरुवंशके बड़े-बूढ़ों, ऋषि-मुनियों, कुन्ती और पाण्डवोंसे अनुमति लेकर द्वारकाके लिये प्रस्थान किया॥ ७॥"},{"id":"10.77.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/8/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आह चाहमिहायात आर्यमिश्राभिसंगतः।","राजन्याश्‍चैद्यपक्षीया नूनं हन्युः पुरीं मम॥ ८"],"iast":["āha cāhamihāyāta āryamiśrābhisaṃgataḥ|","rājanyāścaidyapakṣīyā nūnaṃ hanyuḥ purīṃ mama|| 8"],"meaning":"वे मन-ही-मन कहने लगे कि ‘मैं पूज्य भाई बलरामजीके साथ यहाँ चला आया। अब शिशुपालके पक्षपाती क्षत्रिय अवश्य ही द्वारकापर आक्रमण कर रहे होंगे’॥ ८॥"},{"id":"10.77.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/9/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वीक्ष्य तत् कदनं स्वानां निरूप्य पुररक्षणम्।","सौभं च शाल्वराजं च दारुकं प्राह केशवः॥ ९"],"iast":["vīkṣya tat kadanaṃ svānāṃ nirūpya purarakṣaṇam|","saubhaṃ ca śālvarājaṃ ca dārukaṃ prāha keśavaḥ|| 9"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकामें पहुँचकर देखा कि सचमुच यादवोंपर बड़ी विपत्ति आयी है। तब उन्होंने बलरामजीको नगरकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया और सौभपति शाल्वको देखकर अपने सारथि दारुकसे कहा—॥ ९॥"},{"id":"10.77.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/10/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रथं प्रापय मे सूत शाल्वस्यान्तिकमाशु वै।","सम्भ्रमस्ते न कर्तव्यो मायावी सौभराडयम्॥ १०"],"iast":["rathaṃ prāpaya me sūta śālvasyāntikamāśu vai|","sambhramaste na kartavyo māyāvī saubharāḍayam|| 10"],"meaning":"‘दारुक! तुम शीघ्र-से-शीघ्र मेरा रथ शाल्वके पास ले चलो। देखो, यह शाल्व बड़ा मायावी है, तो भी तुम तनिक भी भय न करना’॥ १०॥"},{"id":"10.77.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/11/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्तश्‍चोदयामास रथमास्थाय दारुकः।","विशन्तं ददृशुः सर्वे स्वे परे चारुणानुजम्॥ ११"],"iast":["ityuktaścodayāmāsa rathamāsthāya dārukaḥ|","viśantaṃ dadṛśuḥ sarve sve pare cāruṇānujam|| 11"],"meaning":"भगवान्‌की ऐसी आज्ञा पाकर दारुक रथपर चढ़ गया और उसे शाल्वकी ओर ले चला । भगवान्‌के रथकी ध्वजा गरुड़चिह्नसे चिह्नित थी। उसे देखकर यदुवंशियों तथा शाल्वकी सेनाके लोगोंने युद्धभूमिमें प्रवेश करते ही भगवान्‌को पहचान लिया॥ ११॥"},{"id":"10.77.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/12/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शाल्वश्‍च कृष्णमालोक्य हतप्रायबलेश्‍वरः।","प्राहरत् कृष्णसूताय शक्तिं भीमरवां मृधे॥ १२"],"iast":["śālvaśca kṛṣṇamālokya hataprāyabaleśvaraḥ|","prāharat kṛṣṇasūtāya śaktiṃ bhīmaravāṃ mṛdhe|| 12"],"meaning":"परीक्षित्! अबतक शाल्वकी सारी सेना प्रायः नष्ट हो चुकी थी। भगवान् श्रीकृष्णको देखते ही उसने उनके सारथीपर एक बहुत बड़ी शक्ति चलायी। वह शक्ति बड़ा भयंकर शब्द करती हुई आकाशमें बड़े वेगसे चल रही थी और बहुत बड़े लूकके समान जान पड़ती थी। उसके प्रकाशसे दिशाएँ चमक उठी थीं। उसे सारथीकी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्णने अपने बाणोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये॥१२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"10.77.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/13/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तामापतन्तीं नभसि महोल्कामिव रंहसा।","भासयन्तीं दिशः शौरिः सायकैः शतधाच्छिनत्॥ १३"],"iast":["tāmāpatantīṃ nabhasi maholkāmiva raṃhasā|","bhāsayantīṃ diśaḥ śauriḥ sāyakaiḥ śatadhācchinat|| 13"],"meaning":"परीक्षित्! अबतक शाल्वकी सारी सेना प्रायः नष्ट हो चुकी थी। भगवान् श्रीकृष्णको देखते ही उसने उनके सारथीपर एक बहुत बड़ी शक्ति चलायी। वह शक्ति बड़ा भयंकर शब्द करती हुई आकाशमें बड़े वेगसे चल रही थी और बहुत बड़े लूकके समान जान पड़ती थी। उसके प्रकाशसे दिशाएँ चमक उठी थीं। उसे सारथीकी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्णने अपने बाणोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये॥१२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"10.77.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/14/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं च षोडशभिर्विद‍्ध्वा बाणैः सौभं च खे भ्रमत्।","अविध्यच्छरसन्दोहैः खं सूर्य इव रश्मिभिः॥ १४"],"iast":["taṃ ca ṣoḍaśabhirviddhvā bāṇaiḥ saubhaṃ ca khe bhramat|","avidhyaccharasandohaiḥ khaṃ sūrya iva raśmibhiḥ|| 14"],"meaning":"इसके बाद उन्होंने शाल्वको सोलह बाण मारे और उसके विमानको भी, जो आकाशमें घूम रहा था, असंख्य बाणोंसे चलनी कर दिया—ठीक वैसे ही, जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे आकाशको भर देता है॥ १४॥"},{"id":"10.77.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/15/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शाल्वः शौरेस्तु दोः सव्यं सशार्ङ्गं शार्ङ्गधन्वनः।","बिभेद न्यपतद्धस्तात् शार्ङ्गमासीत्तदद्भुतम्॥ १५"],"iast":["śālvaḥ śaurestu doḥ savyaṃ saśārṅgaṃ śārṅgadhanvanaḥ|","bibheda nyapataddhastāt śārṅgamāsīttadadbhutam|| 15"],"meaning":"शाल्वने भगवान् श्रीकृष्णकी बायीं भुजामें, जिसमें शार्ङ्गधनुष शोभायमान था, बाण मारा, इससे शार्ङ्गधनुष भगवान्‌के हाथसे छूटकर गिर पड़ा। यह एक अद्भुत घटना घट गयी॥ १५॥"},{"id":"10.77.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/16/","page":607,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हाहाकारो महानासीद् भूतानां तत्र पश्यताम्।","विनद्य सौभराडुच्चैरिदमाह जनार्दनम्॥ १६"],"iast":["hāhākāro mahānāsīd bhūtānāṃ tatra paśyatām|","vinadya saubharāḍuccairidamāha janārdanam|| 16"],"meaning":"जो लोग आकाश या पृथ्वीसे यह युद्ध देख रहे थे, वे बड़े जोरसे ‘हाय-हाय’ पुकार उठे। तब शाल्वने गरजकर भगवान् श्रीकृष्णसे यों कहा—॥ १६॥"},{"id":"10.77.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/17/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत्त्वया मूढ नः सख्युर्भ्रातुर्भार्या हृतेक्षताम्।","प्रमत्तः स सभामध्ये त्वया व्यापादितः सखा॥ १७"],"iast":["yattvayā mūḍha naḥ sakhyurbhrāturbhāryā hṛtekṣatām|","pramattaḥ sa sabhāmadhye tvayā vyāpāditaḥ sakhā|| 17"],"meaning":"‘मूढ़! तूने हमलोगोंके देखते-देखते हमारे भाई और सखा शिशुपालकी पत्‍नीको हर लिया तथा भरी सभामें, जब कि हमारा मित्र शिशुपाल असावधान था, तूने उसे मार डाला॥ १७॥"},{"id":"10.77.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/18/","page":608,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं त्वाद्य निशितैर्बाणैरपराजितमानिनम्।","नयाम्यपुनरावृत्तिं यदि तिष्ठेर्ममाग्रतः॥ १८"],"iast":["taṃ tvādya niśitairbāṇairaparājitamāninam|","nayāmyapunarāvṛttiṃ yadi tiṣṭhermamāgrataḥ|| 18"],"meaning":"मैं जानता हूँ कि तू अपनेको अजेय मानता है। यदि मेरे सामने ठहर गया तो मैं आज तुझे अपने तीखे बाणोंसे वहाँ पहुँचा दूँगा, जहाँसे फिर कोई लौटकर नहीं आता’॥ १८॥"},{"id":"10.77.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/19/","page":608,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वृथा त्वं कत्थसे मन्द न पश्यस्यन्तिकेऽन्तकम्।","पौरुषं दर्शयन्ति स्म शूरा न बहुभाषिणः॥ १९"],"iast":["vṛthā tvaṃ katthase manda na paśyasyantike'ntakam|","pauruṣaṃ darśayanti sma śūrā na bahubhāṣiṇaḥ|| 19"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘रे मन्द! तू वृथा ही बहक रहा है। तुझे पता नहीं कि तेरे सिरपर मौत सवार है। शूरवीर व्यर्थकी बकवाद नहीं करते, वे अपनी वीरता ही दिखलाया करते हैं’॥ १९॥"},{"id":"10.77.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/20/","page":608,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्युक्त्वा भगवाञ्छाल्वं गदया भीमवेगया।","तताड जत्रौ संरब्धः स चकम्पे वमन्‍नसृक्॥ २०"],"iast":["ityuktvā bhagavāñchālvaṃ gadayā bhīmavegayā|","tatāḍa jatrau saṃrabdhaḥ sa cakampe vamannasṛk|| 20"],"meaning":"इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीकृष्णने क्रोधित हो अपनी अत्यन्त वेगवती और भयंकर गदासे शाल्वके जत्रुस्थान (हँसली) पर प्रहार किया। इससे वह खून उगलता हुआ काँपने लगा॥ २०॥"},{"id":"10.77.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/21/","page":608,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["गदायां सन्‍निवृत्तायां शाल्वस्त्वन्तरधीयत।","ततो मुहूर्त आगत्य पुरुषः शिरसाच्युतम्।","देवक्या प्रहितोऽस्मीति नत्वा प्राह वचो रुदन्॥ २१"],"iast":["gadāyāṃ sannivṛttāyāṃ śālvastvantaradhīyata|","tato muhūrta āgatya puruṣaḥ śirasācyutam|","devakyā prahito'smīti natvā prāha vaco rudan|| 21"],"meaning":"इधर जब गदा भगवान्‌के पास लौट आयी, तब शाल्व अन्तर्धान हो गया। इसके बाद दो घड़ी बीतते-बीतते एक मनुष्यने भगवान्‌के पास पहुँचकर उनको सिर झुकाकर प्रणाम किया और वह रोता हुआ बोला—‘मुझे आपकी माता देवकीजीने भेजा है॥ २१॥"},{"id":"10.77.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/22/","page":608,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कृष्ण कृष्ण महाबाहो पिता ते पितृवत्सल।","बद‍्ध्वापनीतः शाल्वेन सौनिकेन यथा पशुः॥ २२"],"iast":["kṛṣṇa kṛṣṇa mahābāho pitā te pitṛvatsala|","baddhvāpanītaḥ śālvena saunikena yathā paśuḥ|| 22"],"meaning":"उन्होंने कहा है कि अपने पिताके प्रति अत्यन्त प्रेम रखनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण! शाल्व तुम्हारे पिताको उसी प्रकार बाँधकर ले गया है, जैसे कोई कसाई पशुको बाँधकर ले जाय!’॥ २२॥"},{"id":"10.77.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/23/","page":608,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निशम्य विप्रियं कृष्णो मानुषीं प्रकृतिं गतः।","विमनस्को घृणी स्नेहाद् बभाषे प्राकृतो यथा॥ २३"],"iast":["niśamya vipriyaṃ kṛṣṇo mānuṣīṃ prakṛtiṃ gataḥ|","vimanasko ghṛṇī snehād babhāṣe prākṛto yathā|| 23"],"meaning":"यह अप्रिय समाचार सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्य-से बन गये। उनके मुँहपर कुछ उदासी छा गयी। वे साधारण पुरुषके समान अत्यन्त करुणा और स्नेहसे कहने लगे—॥ २३॥"},{"id":"10.77.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/24/","page":608,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कथं राममसम्भ्रान्तं जित्वाजेयं सुरासुरैः।","शाल्वेनाल्पीयसा नीतः पिता मे बलवान् विधिः॥ २४"],"iast":["kathaṃ rāmamasambhrāntaṃ jitvājeyaṃ surāsuraiḥ|","śālvenālpīyasā nītaḥ pitā me balavān vidhiḥ|| 24"],"meaning":"‘अहो! मेरे भाई बलरामजीको तो देवता अथवा असुर कोई नहीं जीत सकता। वे सदा-सर्वदा सावधान रहते हैं। शाल्वका बल-पौरुष तो अत्यन्त अल्प है। फिर भी इसने उन्हें कैसे जीत लिया और कैसे मेरे पिताजीको बाँधकर ले गया? सचमुच, प्रारब्ध बहुत बलवान् है’॥ २४॥"},{"id":"10.77.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/25/","page":608,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इति ब्रुवाणे गोविन्दे सौभराट् प्रत्युपस्थितः।","वसुदेवमिवानीय कृष्णं चेदमुवाच सः॥ २५"],"iast":["iti bruvāṇe govinde saubharāṭ pratyupasthitaḥ|","vasudevamivānīya kṛṣṇaṃ cedamuvāca saḥ|| 25"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार कह ही रहे थे कि शाल्व वसुदेवजीके समान एक मायारचित मनुष्य लेकर वहाँ आ पहुँचा और श्रीकृष्णसे कहने लगा—॥ २५॥"},{"id":"10.77.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/26/","page":609,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एष ते जनिता तातो यदर्थमिह जीवसि।","वधिष्ये वीक्षतस्तेऽमुमीशश्‍चेत् पाहि बालिश॥ २६"],"iast":["eṣa te janitā tāto yadarthamiha jīvasi|","vadhiṣye vīkṣataste'mumīśaścet pāhi bāliśa|| 26"],"meaning":"‘मूर्ख! देख, यही तुझे पैदा करनेवाला तेरा बाप है, जिसके लिये तू जी रहा है। तेरे देखते-देखते मैं इसका काम तमाम करता हूँ। कुछ बल-पौरुष हो, तो इसे बचा’॥ २६॥"},{"id":"10.77.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/27/","page":609,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं निर्भर्त्स्य मायावी खड्गेनानकदुन्दुभेः।","उत्कृत्य शिर आदाय खस्थं सौभं समाविशत्॥ २७"],"iast":["evaṃ nirbhartsya māyāvī khaḍgenānakadundubheḥ|","utkṛtya śira ādāya khasthaṃ saubhaṃ samāviśat|| 27"],"meaning":"मायावी शाल्वने इस प्रकार भगवान्‌को फटकार कर मायारचित वसुदेवका सिर तलवारसे काट लिया और उसे लेकर अपने आकाशस्थ विमानपर जा बैठा॥ २७॥"},{"id":"10.77.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/28/","page":609,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ततो मुहूर्तं प्रकृतावुपप्लुतः स्वबोध आस्ते स्वजनानुषंगतः।","महानुभावस्तदबुद्ध्यदासुरीं मायां स शाल्वप्रसृतां मयोदिताम्॥ २८"],"iast":["tato muhūrtaṃ prakṛtāvupaplutaḥ svabodha āste svajanānuṣaṃgataḥ|","mahānubhāvastadabuddhyadāsurīṃ māyāṃ sa śālvaprasṛtāṃ mayoditām|| 28"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंसिद्ध ज्ञानस्वरूप और महानुभाव हैं। वे यह घटना देखकर दो घड़ीके लिये अपने स्वजन वसुदेवजीके प्रति अत्यन्त प्रेम होनेके कारण साधारण पुरुषोंके समान शोकमें डूब गये। परन्तु फिर वे जान गये कि यह तो शाल्वकी फैलायी हुई आसुरी माया ही है, जो उसे मय दानवने बतलायी थी॥ २८॥"},{"id":"10.77.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/29/","page":609,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न तत्र दूतं न पितुः कलेवरं प्रबुद्ध आजौ समपश्यदच्युतः।","स्वाप्नं यथा चाम्बरचारिणं रिपुं सौभस्थमालोक्य निहन्तुमुद्यतः॥ २९"],"iast":["na tatra dūtaṃ na pituḥ kalevaraṃ prabuddha ājau samapaśyadacyutaḥ|","svāpnaṃ yathā cāmbaracāriṇaṃ ripuṃ saubhasthamālokya nihantumudyataḥ|| 29"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने युद्धभूमिमें सचेत होकर देखा—न वहाँ दूत है और न पिताका वह शरीर; जैसे स्वप्नमें एक दृश्य दीखकर लुप्त हो गया हो! उधर देखा तो शाल्व विमानपर चढ़कर आकाशमें विचर रहा है। तब वे उसका वध करनेके लिये उद्यत हो गये॥ २९॥"},{"id":"10.77.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/30/","page":609,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं वदन्ति राजर्षे ऋषयः केच नान्विताः।","यत् स्ववाचो विरुध्येत नूनं ते न स्मरन्त्युत॥ ३०"],"iast":["evaṃ vadanti rājarṣe ṛṣayaḥ keca nānvitāḥ|","yat svavāco virudhyeta nūnaṃ te na smarantyuta|| 30"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! इस प्रकारकी बात पूर्वापरका विचार न करनेवाले कोई-कोई ऋषि कहते हैं। अवश्य ही वे इस बातको भूल जाते हैं कि श्रीकृष्णके सम्बन्धमें ऐसा कहना उन्हींके वचनोंके विपरीत है॥ ३०॥"},{"id":"10.77.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/31/","page":609,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["क्व शोकमोहौ स्नेहो वा भयं वा येऽज्ञसम्भवाः।","क्व चाखण्डितविज्ञानज्ञानैश्‍वर्यस्त्वखण्डितः॥ ३१"],"iast":["kva śokamohau sneho vā bhayaṃ vā ye'jñasambhavāḥ|","kva cākhaṇḍitavijñānajñānaiśvaryastvakhaṇḍitaḥ|| 31"],"meaning":"कहाँ अज्ञानियोंमें रहनेवाले शोक, मोह, स्नेह और भय; तथा कहाँ वे परिपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण—जिनका ज्ञान, विज्ञान और ऐश्‍वर्य अखण्डित है, एकरस है (भला, उनमें वैसे भावोंकी सम्भावना ही कहाँ है?)॥ ३१॥"},{"id":"10.77.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/32/","page":609,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यत्पादसेवोर्जितयाऽऽत्मविद्यया","हिन्वन्त्यनाद्यात्मविपर्ययग्रहम् ।","लभन्त आत्मीयमनन्तमैश्‍वरं","कुतो नु मोहः परमस्य सद्गतेः॥ ३२"],"iast":["yatpādasevorjitayā''tmavidyayā","hinvantyanādyātmaviparyayagraham |","labhanta ātmīyamanantamaiśvaraṃ","kuto nu mohaḥ paramasya sadgateḥ|| 32"],"meaning":"बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा करके आत्मविद्याका भलीभाँति सम्पादन करते हैं और उसके द्वारा शरीर आदिमें आत्मबुद्धिरूप अनादि अज्ञानको मिटा डालते हैं तथा आत्मसम्बन्धी अनन्त ऐश्‍वर्य प्राप्त करते हैं। उन संतोंके परम गतिस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णमें भला, मोह कैसे हो सकता है?॥ ३२॥"},{"id":"10.77.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/33/","page":609,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तं शस्त्रपूगैः प्रहरन्तमोजसा","शाल्वं शरैः शौरिरमोघविक्रमः।","विद‍्ध्वाच्छिनद् वर्म धनुः शिरोमणिं","सौभं च शत्रोर्गदया रुरोज ह॥ ३३"],"iast":["taṃ śastrapūgaiḥ praharantamojasā","śālvaṃ śaraiḥ śauriramoghavikramaḥ|","viddhvācchinad varma dhanuḥ śiromaṇiṃ","saubhaṃ ca śatrorgadayā ruroja ha|| 33"],"meaning":"अब शाल्व भगवान् श्रीकृष्णपर बड़े उत्साह और वेगसे शस्त्रोंकी वर्षा करने लगा था। अमोघशक्ति भगवान् श्रीकृष्णने भी अपने बाणोंसे शाल्वको घायल कर दिया और उसके कवच, धनुष तथा सिरकी मणिको छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया। साथ ही गदाकी चोटसे उसके विमानको भी जर्जर कर दिया॥ ३३॥"},{"id":"10.77.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/34/","page":610,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तत् कृष्णहस्तेरितया विचूर्णितं","पपात तोये गदया सहस्रधा।","विसृज्य तद् भूतलमास्थितो गदा-","मुद्यम्य शाल्वोऽच्युतमभ्यगाद् द्रुतम्॥ ३४"],"iast":["tat kṛṣṇahasteritayā vicūrṇitaṃ","papāta toye gadayā sahasradhā|","visṛjya tad bhūtalamāsthito gadā-","mudyamya śālvo'cyutamabhyagād drutam|| 34"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे चलायी हुई गदासे वह विमान चूर-चूर होकर समुद्रमें गिर पड़ा। गिरनेके पहले ही शाल्व हाथमें गदा लेकर धरतीपर कूद पड़ा और सावधान होकर बड़े वेगसे भगवान् श्रीकृष्णकी ओर झपटा॥ ३४॥"},{"id":"10.77.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/35/","page":610,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आधावतः सगदं तस्य बाहुं","भल्लेन छित्त्वाथ रथांगमद्भुतम्।","वधाय शाल्वस्य लयार्कसन्‍निभं","बिभ्रद् बभौ सार्क इवोदयाचलः॥ ३५"],"iast":["ādhāvataḥ sagadaṃ tasya bāhuṃ","bhallena chittvātha rathāṃgamadbhutam|","vadhāya śālvasya layārkasannibhaṃ","bibhrad babhau sārka ivodayācalaḥ|| 35"],"meaning":"शाल्वको आक्रमण करते देख उन्होंने भालेसे गदाके साथ उसका हाथ काट गिराया। फिर उसे मार डालनेके लिये उन्होंने प्रलयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी और अत्यन्त अद्भुत सुदर्शन चक्र धारण कर लिया। उस समय उनकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो सूर्यके साथ उदयाचल शोभायमान हो॥ ३५॥"},{"id":"10.77.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/36/","page":610,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["जहार तेनैव शिरः सकुण्डलं","किरीटयुक्तं पुरुमायिनो हरिः।","वज्रेण वृत्रस्य यथा पुरन्दरो","बभूव हाहेति वचस्तदा नृणाम्॥ ३६"],"iast":["jahāra tenaiva śiraḥ sakuṇḍalaṃ","kirīṭayuktaṃ purumāyino hariḥ|","vajreṇa vṛtrasya yathā purandaro","babhūva hāheti vacastadā nṛṇām|| 36"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने उस चक्रसे परम मायावी शाल्वका कुण्डल-किरीटसहित सिर धड़से अलग कर दिया; ठीक वैसे ही, जैसे इन्द्रने वज्रसे वृत्रासुरका सिर काट डाला था। उस समय शाल्वके सैनिक अत्यन्त दुःखसे ‘हाय-हाय’ चिल्ला उठे॥ ३६॥"},{"id":"10.77.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/37/","page":610,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्मिन् निपतिते पापे सौभे च गदया हते।","नेदुर्दुन्दुभयो राजन् दिवि देवगणेरिताः।","सखीनामपचितिं कुर्वन् दन्तवक्त्रो रुषाभ्यगात्॥ ३७"],"iast":["tasmin nipatite pāpe saubhe ca gadayā hate|","nedurdundubhayo rājan divi devagaṇeritāḥ|","sakhīnāmapacitiṃ kurvan dantavaktro ruṣābhyagāt|| 37"],"meaning":"परीक्षित्! जब पापी शाल्व मर गया और उसका विमान भी गदाके प्रहारसे चूर-चूर हो गया, तब देवतालोग आकाशमें दुन्दुभियाँ बजाने लगे। ठीक इसी समय दन्तवक्त्र अपने मित्र शिशुपाल आदिका बदला लेनेके लिये अत्यन्त क्रोधित होकर आ पहुँचा॥ ३७॥"}],"text":[{"b":36304,"kind":"adhyaya_heading","page":606,"text":"अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः"},{"b":36305,"kind":"topic_heading","page":606,"text":"शाल्व-उद्धार"},{"b":36306,"kind":"hindi_commentary","page":606,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36307,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.1"],"text":"स तूपस्पृश्य सलिलं दंशितो धृतकार्मुकः।"},{"b":36308,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.1"],"text":"नय मां द्युमतः पार्श्‍वं वीरस्येत्याह सारथिम्॥ १"},{"b":36309,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.2"],"text":"विधमन्तं स्वसैन्यानि द्युमन्तं रुक्मिणीसुतः।"},{"b":36310,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.2"],"text":"प्रतिहत्य प्रत्यविध्यन्‍नाराचैरष्टभिः स्मयन्॥ २"},{"b":36311,"kind":"hindi_translation","page":606,"explains":["10.77.1","10.77.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब प्रद्युम्‍नजीने हाथ-मुँह धोकर, कवच पहन धनुष धारण किया और सारथीसे कहा कि ‘मुझे वीर द्युमान्‌के पास फिरसे ले चलो’॥ १॥ उस समय द्युमान् यादवसेनाको तहस-नहस कर रहा था। प्रद्युम्‍नजीने उसके पास पहुँचकर उसे ऐसा करनेसे रोक दिया और मुसकराकर आठ बाण मारे॥ २॥"},{"b":36312,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.3"],"text":"चतुर्भिश्‍चतुरो वाहान् सूतमेकेन चाहनत्।"},{"b":36313,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.3"],"text":"द्वाभ्यां धनुश्‍च केतुं च शरेणान्येन वै शिरः॥ ३"},{"b":36314,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.4"],"text":"गदसात्यकिसाम्बाद्या जघ्नुः सौभपतेर्बलम्।"},{"b":36315,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.4"],"text":"पेतुः समुद्रे सौभेयाः सर्वे संछिन्‍नकन्धराः॥ ४"},{"b":36316,"kind":"hindi_translation","page":606,"explains":["10.77.3","10.77.4"],"text":"चार बाणोंसे उसके चार घोड़े और एक-एक बाणसे सारथी, धनुष, ध्वजा और उसका सिर काट डाला॥ ३॥ इधर गद, सात्यकि, साम्ब आदि यदुवंशी वीर भी शाल्वकी सेनाका संहार करने लगे। सौभ विमानपर चढ़े हुए सैनिकोंकी गरदनें कट जातीं और वे समुद्रमें गिर पड़ते॥ ४॥"},{"b":36317,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.5"],"text":"एवं यदूनां शाल्वानां निघ्नतामितरेतरम्।"},{"b":36318,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.5"],"text":"युद्धं त्रिणवरात्रं तदभूत्तुमुलमुल्बणम्॥ ५"},{"b":36319,"kind":"hindi_translation","page":606,"explains":["10.77.5"],"text":"इस प्रकार यदुवंशी और शाल्वके सैनिक एक-दूसरेपर प्रहार करते रहे। बड़ा ही घमासान और भयंकर युद्ध हुआ और वह लगातार सत्ताईस दिनोंतक चलता रहा॥ ५॥"},{"b":36320,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.6"],"text":"इन्द्रप्रस्थं गतः कृष्ण आहूतो धर्मसूनुना।"},{"b":36321,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.77.6"],"text":"राजसूयेऽथ निर्वृत्ते शिशुपाले च संस्थिते॥ ६"},{"b":36322,"kind":"hindi_translation","page":606,"explains":["10.77.6"],"text":"उन दिनों भगवान् श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिरके बुलानेसे इन्द्रप्रस्थ गये हुए थे। राजसूय यज्ञ हो चुका था और शिशुपालकी भी मृत्यु हो गयी थी॥ ६॥"},{"b":36323,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.7"],"text":"कुरुवृद्धाननुज्ञाप्य मुनींश्‍च ससुतां पृथाम्।"},{"b":36324,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.7"],"text":"निमित्तान्यतिघोराणि पश्यन् द्वारवतीं ययौ॥ ७"},{"b":36325,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.8"],"text":"आह चाहमिहायात आर्यमिश्राभिसंगतः।"},{"b":36326,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.8"],"text":"राजन्याश्‍चैद्यपक्षीया नूनं हन्युः पुरीं मम॥ ८"},{"b":36327,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.9"],"text":"वीक्ष्य तत् कदनं स्वानां निरूप्य पुररक्षणम्।"},{"b":36328,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.9"],"text":"सौभं च शाल्वराजं च दारुकं प्राह केशवः॥ ९"},{"b":36329,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.10"],"text":"रथं प्रापय मे सूत शाल्वस्यान्तिकमाशु वै।"},{"b":36330,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.10"],"text":"सम्भ्रमस्ते न कर्तव्यो मायावी सौभराडयम्॥ १०"},{"b":36331,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.11"],"text":"इत्युक्तश्‍चोदयामास रथमास्थाय दारुकः।"},{"b":36332,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.11"],"text":"विशन्तं ददृशुः सर्वे स्वे परे चारुणानुजम्॥ ११"},{"b":36333,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.12"],"text":"शाल्वश्‍च कृष्णमालोक्य हतप्रायबलेश्‍वरः।"},{"b":36334,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.12"],"text":"प्राहरत् कृष्णसूताय शक्तिं भीमरवां मृधे॥ १२"},{"b":36335,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.13"],"text":"तामापतन्तीं नभसि महोल्कामिव रंहसा।"},{"b":36336,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.13"],"text":"भासयन्तीं दिशः शौरिः सायकैः शतधाच्छिनत्॥ १३"},{"b":36337,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.14"],"text":"तं च षोडशभिर्विद‍्ध्वा बाणैः सौभं च खे भ्रमत्।"},{"b":36338,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.14"],"text":"अविध्यच्छरसन्दोहैः खं सूर्य इव रश्मिभिः॥ १४"},{"b":36339,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.15"],"text":"शाल्वः शौरेस्तु दोः सव्यं सशार्ङ्गं शार्ङ्गधन्वनः।"},{"b":36340,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.15"],"text":"बिभेद न्यपतद्धस्तात् शार्ङ्गमासीत्तदद्भुतम्॥ १५"},{"b":36341,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.16"],"text":"हाहाकारो महानासीद् भूतानां तत्र पश्यताम्।"},{"b":36342,"kind":"sanskrit_shloka","page":607,"verses":["10.77.16"],"text":"विनद्य सौभराडुच्चैरिदमाह जनार्दनम्॥ १६"},{"b":36343,"kind":"hindi_translation","page":607,"explains":["10.77.7","10.77.8","10.77.9","10.77.10","10.77.11","10.77.12","10.77.13","10.77.14","10.77.15","10.77.16"],"text":"वहाँ भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि बड़े भयंकर अपशकुन हो रहे हैं। तब उन्होंने कुरुवंशके बड़े-बूढ़ों, ऋषि-मुनियों, कुन्ती और पाण्डवोंसे अनुमति लेकर द्वारकाके लिये प्रस्थान किया॥ ७॥ वे मन-ही-मन कहने लगे कि ‘मैं पूज्य भाई बलरामजीके साथ यहाँ चला आया। अब शिशुपालके पक्षपाती क्षत्रिय अवश्य ही द्वारकापर आक्रमण कर रहे होंगे’॥ ८॥ भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकामें पहुँचकर देखा कि सचमुच यादवोंपर बड़ी विपत्ति आयी है। तब उन्होंने बलरामजीको नगरकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया और सौभपति शाल्वको देखकर अपने सारथि दारुकसे कहा—॥ ९॥ ‘दारुक! तुम शीघ्र-से-शीघ्र मेरा रथ शाल्वके पास ले चलो। देखो, यह शाल्व बड़ा मायावी है, तो भी तुम तनिक भी भय न करना’॥ १०॥ भगवान्‌की ऐसी आज्ञा पाकर दारुक रथपर चढ़ गया और उसे शाल्वकी ओर ले चला । भगवान्‌के रथकी ध्वजा गरुड़चिह्नसे चिह्नित थी। उसे देखकर यदुवंशियों तथा शाल्वकी सेनाके लोगोंने युद्धभूमिमें प्रवेश करते ही भगवान्‌को पहचान लिया॥ ११॥ परीक्षित्! अबतक शाल्वकी सारी सेना प्रायः नष्ट हो चुकी थी। भगवान् श्रीकृष्णको देखते ही उसने उनके सारथीपर एक बहुत बड़ी शक्ति चलायी। वह शक्ति बड़ा भयंकर शब्द करती हुई आकाशमें बड़े वेगसे चल रही थी और बहुत बड़े लूकके समान जान पड़ती थी। उसके प्रकाशसे दिशाएँ चमक उठी थीं। उसे सारथीकी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्णने अपने बाणोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये॥१२-१३॥ इसके बाद उन्होंने शाल्वको सोलह बाण मारे और उसके विमानको भी, जो आकाशमें घूम रहा था, असंख्य बाणोंसे चलनी कर दिया—ठीक वैसे ही, जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे आकाशको भर देता है॥ १४॥ शाल्वने भगवान् श्रीकृष्णकी बायीं भुजामें, जिसमें शार्ङ्गधनुष शोभायमान था, बाण मारा, इससे शार्ङ्गधनुष भगवान्‌के हाथसे छूटकर गिर पड़ा। यह एक अद्भुत घटना घट गयी॥ १५॥ जो लोग आकाश या पृथ्वीसे यह युद्ध देख रहे थे, वे बड़े जोरसे ‘हाय-हाय’ पुकार उठे। तब शाल्वने गरजकर भगवान् श्रीकृष्णसे यों कहा—॥ १६॥"},{"b":36344,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.17"],"text":"यत्त्वया मूढ नः सख्युर्भ्रातुर्भार्या हृतेक्षताम्।"},{"b":36345,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.17"],"text":"प्रमत्तः स सभामध्ये त्वया व्यापादितः सखा॥ १७"},{"b":36346,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.18"],"text":"तं त्वाद्य निशितैर्बाणैरपराजितमानिनम्।"},{"b":36347,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.18"],"text":"नयाम्यपुनरावृत्तिं यदि तिष्ठेर्ममाग्रतः॥ १८"},{"b":36348,"kind":"hindi_commentary","page":608,"explains":["10.77.17","10.77.18"],"text":"‘मूढ़! तूने हमलोगोंके देखते-देखते हमारे भाई और सखा शिशुपालकी पत्‍नीको हर लिया तथा भरी सभामें, जब कि हमारा मित्र शिशुपाल असावधान था, तूने उसे मार डाला॥ १७॥ मैं जानता हूँ कि तू अपनेको अजेय मानता है। यदि मेरे सामने ठहर गया तो मैं आज तुझे अपने तीखे बाणोंसे वहाँ पहुँचा दूँगा, जहाँसे फिर कोई लौटकर नहीं आता’॥ १८॥"},{"b":36349,"kind":"topic_heading","page":608,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":36350,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.19"],"text":"वृथा त्वं कत्थसे मन्द न पश्यस्यन्तिकेऽन्तकम्।"},{"b":36351,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.19"],"text":"पौरुषं दर्शयन्ति स्म शूरा न बहुभाषिणः॥ १९"},{"b":36352,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.20"],"text":"इत्युक्त्वा भगवाञ्छाल्वं गदया भीमवेगया।"},{"b":36353,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.20"],"text":"तताड जत्रौ संरब्धः स चकम्पे वमन्‍नसृक्॥ २०"},{"b":36354,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.21"],"text":"गदायां सन्‍निवृत्तायां शाल्वस्त्वन्तरधीयत।"},{"b":36355,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.21"],"text":"ततो मुहूर्त आगत्य पुरुषः शिरसाच्युतम्।"},{"b":36356,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.21"],"text":"देवक्या प्रहितोऽस्मीति नत्वा प्राह वचो रुदन्॥ २१"},{"b":36357,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.22"],"text":"कृष्ण कृष्ण महाबाहो पिता ते पितृवत्सल।"},{"b":36358,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.22"],"text":"बद‍्ध्वापनीतः शाल्वेन सौनिकेन यथा पशुः॥ २२"},{"b":36359,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.23"],"text":"निशम्य विप्रियं कृष्णो मानुषीं प्रकृतिं गतः।"},{"b":36360,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.23"],"text":"विमनस्को घृणी स्नेहाद् बभाषे प्राकृतो यथा॥ २३"},{"b":36361,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.24"],"text":"कथं राममसम्भ्रान्तं जित्वाजेयं सुरासुरैः।"},{"b":36362,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.24"],"text":"शाल्वेनाल्पीयसा नीतः पिता मे बलवान् विधिः॥ २४"},{"b":36363,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.25"],"text":"इति ब्रुवाणे गोविन्दे सौभराट् प्रत्युपस्थितः।"},{"b":36364,"kind":"sanskrit_shloka","page":608,"verses":["10.77.25"],"text":"वसुदेवमिवानीय कृष्णं चेदमुवाच सः॥ २५"},{"b":36365,"kind":"hindi_commentary","page":608,"explains":["10.77.19","10.77.20","10.77.21","10.77.22","10.77.23","10.77.24","10.77.25"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘रे मन्द! तू वृथा ही बहक रहा है। तुझे पता नहीं कि तेरे सिरपर मौत सवार है। शूरवीर व्यर्थकी बकवाद नहीं करते, वे अपनी वीरता ही दिखलाया करते हैं’॥ १९॥ इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीकृष्णने क्रोधित हो अपनी अत्यन्त वेगवती और भयंकर गदासे शाल्वके जत्रुस्थान (हँसली) पर प्रहार किया। इससे वह खून उगलता हुआ काँपने लगा॥ २०॥ इधर जब गदा भगवान्‌के पास लौट आयी, तब शाल्व अन्तर्धान हो गया। इसके बाद दो घड़ी बीतते-बीतते एक मनुष्यने भगवान्‌के पास पहुँचकर उनको सिर झुकाकर प्रणाम किया और वह रोता हुआ बोला—‘मुझे आपकी माता देवकीजीने भेजा है॥ २१॥ उन्होंने कहा है कि अपने पिताके प्रति अत्यन्त प्रेम रखनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण! शाल्व तुम्हारे पिताको उसी प्रकार बाँधकर ले गया है, जैसे कोई कसाई पशुको बाँधकर ले जाय!’॥ २२॥ यह अप्रिय समाचार सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्य-से बन गये। उनके मुँहपर कुछ उदासी छा गयी। वे साधारण पुरुषके समान अत्यन्त करुणा और स्नेहसे कहने लगे—॥ २३॥ ‘अहो! मेरे भाई बलरामजीको तो देवता अथवा असुर कोई नहीं जीत सकता। वे सदा-सर्वदा सावधान रहते हैं। शाल्वका बल-पौरुष तो अत्यन्त अल्प है। फिर भी इसने उन्हें कैसे जीत लिया और कैसे मेरे पिताजीको बाँधकर ले गया? सचमुच, प्रारब्ध बहुत बलवान् है’॥ २४॥ भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार कह ही रहे थे कि शाल्व वसुदेवजीके समान एक मायारचित मनुष्य लेकर वहाँ आ पहुँचा और श्रीकृष्णसे कहने लगा—॥ २५॥"},{"b":36366,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.26"],"text":"एष ते जनिता तातो यदर्थमिह जीवसि।"},{"b":36367,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.26"],"text":"वधिष्ये वीक्षतस्तेऽमुमीशश्‍चेत् पाहि बालिश॥ २६"},{"b":36368,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.27"],"text":"एवं निर्भर्त्स्य मायावी खड्गेनानकदुन्दुभेः।"},{"b":36369,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.27"],"text":"उत्कृत्य शिर आदाय खस्थं सौभं समाविशत्॥ २७"},{"b":36370,"kind":"hindi_commentary","page":609,"verses":["10.77.28"],"text":"ततो मुहूर्तं प्रकृतावुपप्लुतः स्वबोध आस्ते स्वजनानुषंगतः।"},{"b":36371,"kind":"hindi_translation","page":609,"verses":["10.77.28"],"text":"महानुभावस्तदबुद्ध्यदासुरीं मायां स शाल्वप्रसृतां मयोदिताम्॥ २८"},{"b":36372,"kind":"hindi_commentary","page":609,"verses":["10.77.29"],"text":"न तत्र दूतं न पितुः कलेवरं प्रबुद्ध आजौ समपश्यदच्युतः।"},{"b":36373,"kind":"hindi_translation","page":609,"verses":["10.77.29"],"text":"स्वाप्नं यथा चाम्बरचारिणं रिपुं सौभस्थमालोक्य निहन्तुमुद्यतः॥ २९"},{"b":36374,"kind":"hindi_translation","page":609,"explains":["10.77.26","10.77.27","10.77.28","10.77.29"],"text":"‘मूर्ख! देख, यही तुझे पैदा करनेवाला तेरा बाप है, जिसके लिये तू जी रहा है। तेरे देखते-देखते मैं इसका काम तमाम करता हूँ। कुछ बल-पौरुष हो, तो इसे बचा’॥ २६॥ मायावी शाल्वने इस प्रकार भगवान्‌को फटकार कर मायारचित वसुदेवका सिर तलवारसे काट लिया और उसे लेकर अपने आकाशस्थ विमानपर जा बैठा॥ २७॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंसिद्ध ज्ञानस्वरूप और महानुभाव हैं। वे यह घटना देखकर दो घड़ीके लिये अपने स्वजन वसुदेवजीके प्रति अत्यन्त प्रेम होनेके कारण साधारण पुरुषोंके समान शोकमें डूब गये। परन्तु फिर वे जान गये कि यह तो शाल्वकी फैलायी हुई आसुरी माया ही है, जो उसे मय दानवने बतलायी थी॥ २८॥ भगवान् श्रीकृष्णने युद्धभूमिमें सचेत होकर देखा—न वहाँ दूत है और न पिताका वह शरीर; जैसे स्वप्नमें एक दृश्य दीखकर लुप्त हो गया हो! उधर देखा तो शाल्व विमानपर चढ़कर आकाशमें विचर रहा है। तब वे उसका वध करनेके लिये उद्यत हो गये॥ २९॥"},{"b":36375,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.30"],"text":"एवं वदन्ति राजर्षे ऋषयः केच नान्विताः।"},{"b":36376,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.30"],"text":"यत् स्ववाचो विरुध्येत नूनं ते न स्मरन्त्युत॥ ३०"},{"b":36377,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.31"],"text":"क्व शोकमोहौ स्नेहो वा भयं वा येऽज्ञसम्भवाः।"},{"b":36378,"kind":"topic_heading","page":609,"verses":["10.77.31"],"text":"क्व चाखण्डितविज्ञानज्ञानैश्‍वर्यस्त्वखण्डितः॥ ३१"},{"b":36379,"kind":"hindi_commentary","page":609,"verses":["10.77.32"],"text":"यत्पादसेवोर्जितयाऽऽत्मविद्यया"},{"b":36380,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.32"],"text":"हिन्वन्त्यनाद्यात्मविपर्ययग्रहम् ।"},{"b":36381,"kind":"hindi_commentary","page":609,"verses":["10.77.32"],"text":"लभन्त आत्मीयमनन्तमैश्‍वरं"},{"b":36382,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.32"],"text":"कुतो नु मोहः परमस्य सद्गतेः॥ ३२"},{"b":36383,"kind":"hindi_translation","page":609,"explains":["10.77.30","10.77.31","10.77.32"],"text":"प्रिय परीक्षित्! इस प्रकारकी बात पूर्वापरका विचार न करनेवाले कोई-कोई ऋषि कहते हैं। अवश्य ही वे इस बातको भूल जाते हैं कि श्रीकृष्णके सम्बन्धमें ऐसा कहना उन्हींके वचनोंके विपरीत है॥ ३०॥ कहाँ अज्ञानियोंमें रहनेवाले शोक, मोह, स्नेह और भय; तथा कहाँ वे परिपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण—जिनका ज्ञान, विज्ञान और ऐश्‍वर्य अखण्डित है, एकरस है (भला, उनमें वैसे भावोंकी सम्भावना ही कहाँ है?)॥ ३१॥ बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवा करके आत्मविद्याका भलीभाँति सम्पादन करते हैं और उसके द्वारा शरीर आदिमें आत्मबुद्धिरूप अनादि अज्ञानको मिटा डालते हैं तथा आत्मसम्बन्धी अनन्त ऐश्‍वर्य प्राप्त करते हैं। उन संतोंके परम गतिस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णमें भला, मोह कैसे हो सकता है?॥ ३२॥"},{"b":36384,"kind":"hindi_commentary","page":609,"verses":["10.77.33"],"text":"तं शस्त्रपूगैः प्रहरन्तमोजसा"},{"b":36385,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.33"],"text":"शाल्वं शरैः शौरिरमोघविक्रमः।"},{"b":36386,"kind":"hindi_commentary","page":609,"verses":["10.77.33"],"text":"विद‍्ध्वाच्छिनद् वर्म धनुः शिरोमणिं"},{"b":36387,"kind":"sanskrit_shloka","page":609,"verses":["10.77.33"],"text":"सौभं च शत्रोर्गदया रुरोज ह॥ ३३"},{"b":36388,"kind":"hindi_commentary","page":610,"verses":["10.77.34"],"text":"तत् कृष्णहस्तेरितया विचूर्णितं"},{"b":36389,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.34"],"text":"पपात तोये गदया सहस्रधा।"},{"b":36390,"kind":"hindi_commentary","page":610,"verses":["10.77.34"],"text":"विसृज्य तद् भूतलमास्थितो गदा-"},{"b":36391,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.34"],"text":"मुद्यम्य शाल्वोऽच्युतमभ्यगाद् द्रुतम्॥ ३४"},{"b":36392,"kind":"hindi_commentary","page":610,"verses":["10.77.35"],"text":"आधावतः सगदं तस्य बाहुं"},{"b":36393,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.35"],"text":"भल्लेन छित्त्वाथ रथांगमद्भुतम्।"},{"b":36394,"kind":"hindi_commentary","page":610,"verses":["10.77.35"],"text":"वधाय शाल्वस्य लयार्कसन्‍निभं"},{"b":36395,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.35"],"text":"बिभ्रद् बभौ सार्क इवोदयाचलः॥ ३५"},{"b":36396,"kind":"hindi_commentary","page":610,"verses":["10.77.36"],"text":"जहार तेनैव शिरः सकुण्डलं"},{"b":36397,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.36"],"text":"किरीटयुक्तं पुरुमायिनो हरिः।"},{"b":36398,"kind":"hindi_commentary","page":610,"verses":["10.77.36"],"text":"वज्रेण वृत्रस्य यथा पुरन्दरो"},{"b":36399,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.36"],"text":"बभूव हाहेति वचस्तदा नृणाम्॥ ३६"},{"b":36400,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.37"],"text":"तस्मिन् निपतिते पापे सौभे च गदया हते।"},{"b":36401,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.37"],"text":"नेदुर्दुन्दुभयो राजन् दिवि देवगणेरिताः।"},{"b":36402,"kind":"sanskrit_shloka","page":610,"verses":["10.77.37"],"text":"सखीनामपचितिं कुर्वन् दन्तवक्त्रो रुषाभ्यगात्॥ ३७"},{"b":36403,"kind":"hindi_translation","page":609,"explains":["10.77.33","10.77.34","10.77.35","10.77.36","10.77.37"],"text":"अब शाल्व भगवान् श्रीकृष्णपर बड़े उत्साह और वेगसे शस्त्रोंकी वर्षा करने लगा था। अमोघशक्ति भगवान् श्रीकृष्णने भी अपने बाणोंसे शाल्वको घायल कर दिया और उसके कवच, धनुष तथा सिरकी मणिको छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया। साथ ही गदाकी चोटसे उसके विमानको भी जर्जर कर दिया॥ ३३॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंसे चलायी हुई गदासे वह विमान चूर-चूर होकर समुद्रमें गिर पड़ा। गिरनेके पहले ही शाल्व हाथमें गदा लेकर धरतीपर कूद पड़ा और सावधान होकर बड़े वेगसे भगवान् श्रीकृष्णकी ओर झपटा॥ ३४॥ शाल्वको आक्रमण करते देख उन्होंने भालेसे गदाके साथ उसका हाथ काट गिराया। फिर उसे मार डालनेके लिये उन्होंने प्रलयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी और अत्यन्त अद्भुत सुदर्शन चक्र धारण कर लिया। उस समय उनकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो सूर्यके साथ उदयाचल शोभायमान हो॥ ३५॥ भगवान् श्रीकृष्णने उस चक्रसे परम मायावी शाल्वका कुण्डल-किरीटसहित सिर धड़से अलग कर दिया; ठीक वैसे ही, जैसे इन्द्रने वज्रसे वृत्रासुरका सिर काट डाला था। उस समय शाल्वके सैनिक अत्यन्त दुःखसे ‘हाय-हाय’ चिल्ला उठे॥ ३६॥ परीक्षित्! जब पापी शाल्व मर गया और उसका विमान भी गदाके प्रहारसे चूर-चूर हो गया, तब देवतालोग आकाशमें दुन्दुभियाँ बजाने लगे। ठीक इसी समय दन्तवक्त्र अपने मित्र शिशुपाल आदिका बदला लेनेके लिये अत्यन्त क्रोधित होकर आ पहुँचा॥ ३७॥"},{"b":36404,"kind":"hindi_translation","page":610,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे सौभवधो नाम सप्तसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७७॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":0,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}