{"id":"10.76","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 76","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः","topics":["शाल्वके साथ यादवोंका युद्ध"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.76.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[602,606]},"verses":[{"id":"10.76.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/1/","page":602,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथान्यदपि कृष्णस्य शृणु कर्माद्भुतं नृप।","क्रीडानरशरीरस्य यथा सौभपतिर्हतः॥ १"],"iast":["athānyadapi kṛṣṇasya śṛṇu karmādbhutaṃ nṛpa|","krīḍānaraśarīrasya yathā saubhapatirhataḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब मनुष्यकी-सी लीला करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका एक और भी अद्भुत चरित्र सुनो। इसमें यह बताया जायगा कि सौभनामक विमानका अधिपति शाल्व किस प्रकार भगवान्‌के हाथसे मारा गया॥ १॥"},{"id":"10.76.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/2/","page":602,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिशुपालसखः शाल्वो रुक्मिण्युद्वाह आगतः।","यदुभिर्निर्जितः संख्ये जरासन्धादयस्तथा॥ २"],"iast":["śiśupālasakhaḥ śālvo rukmiṇyudvāha āgataḥ|","yadubhirnirjitaḥ saṃkhye jarāsandhādayastathā|| 2"],"meaning":"शाल्व शिशुपालका सखा था और रुक्मिणीके विवाहके अवसरपर बारातमें शिशुपालकी ओरसे आया हुआ था। उस समय यदुवंशियोंने युद्धमें जरासन्ध आदिके साथ-साथ शाल्वको भी जीत लिया था॥ २॥"},{"id":"10.76.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/3/","page":602,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शाल्वः प्रतिज्ञामकरोत् शृण्वतां सर्वभूभुजाम्।","अयादवीं क्ष्मां करिष्ये पौरुषं मम पश्यत॥ ३"],"iast":["śālvaḥ pratijñāmakarot śṛṇvatāṃ sarvabhūbhujām|","ayādavīṃ kṣmāṃ kariṣye pauruṣaṃ mama paśyata|| 3"],"meaning":"उस दिन सब राजाओंके सामने शाल्वने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं पृथ्वीसे यदुवंशियोंको मिटाकर छोड़ूँगा, सब लोग मेरा बल-पौरुष देखना’॥ ३॥"},{"id":"10.76.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/4/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति मूढः प्रतिज्ञाय देवं पशुपतिं प्रभुम्।","आराधयामास नृप पांसुमुष्टिं सकृद् ग्रसन्॥ ४"],"iast":["iti mūḍhaḥ pratijñāya devaṃ paśupatiṃ prabhum|","ārādhayāmāsa nṛpa pāṃsumuṣṭiṃ sakṛd grasan|| 4"],"meaning":"परीक्षित्! मूढ़ शाल्वने इस प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधिदेव भगवान् पशुपतिकी आराधना प्रारम्भ की। वह उन दिनों दिनमें केवल एक बार मुट्ठीभर राख फाँक लिया करता था॥ ४॥"},{"id":"10.76.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/5/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["संवत्सरान्ते भगवानाशुतोष उमापतिः।","वरेणच्छन्दयामास शाल्वं शरणमागतम्॥ ५"],"iast":["saṃvatsarānte bhagavānāśutoṣa umāpatiḥ|","vareṇacchandayāmāsa śālvaṃ śaraṇamāgatam|| 5"],"meaning":"यों तो पार्वतीपति भगवान् शंकर आशुतोष हैं, औढरदानी हैं, फिर भी वे शाल्वका घोर संकल्प जानकर एक वर्षके बाद प्रसन्‍न हुए। उन्होंने अपने शरणागत शाल्वसे वर माँगनेके लिये कहा॥ ५॥"},{"id":"10.76.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/6/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।","अभेद्यं कामगं वव्रे स यानं वृष्णिभीषणम्॥ ६"],"iast":["devāsuramanuṣyāṇāṃ gandharvoragarakṣasām|","abhedyaṃ kāmagaṃ vavre sa yānaṃ vṛṣṇibhīṣaṇam|| 6"],"meaning":"उस समय शाल्वने यह वर माँगा कि ‘मुझे आप एक ऐसा विमान दीजिये जो देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंसे तोड़ा न जा सके; जहाँ इच्छा हो, वहीं चला जाय और यदुवंशियोंके लिये अत्यन्त भयंकर हो’॥ ६॥"},{"id":"10.76.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/7/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथेति गिरिशादिष्टो मयः परपुरंजयः।","पुरं निर्माय शाल्वाय प्रादात्सौभमयस्मयम्॥ ७"],"iast":["tatheti giriśādiṣṭo mayaḥ parapuraṃjayaḥ|","puraṃ nirmāya śālvāya prādātsaubhamayasmayam|| 7"],"meaning":"भगवान् शंकरने कह दिया ‘तथास्तु!’ इसके बाद उनकी आज्ञासे विपक्षियोंके नगर जीतनेवाले मय दानवने लोहेका सौभनामक विमान बनाया और शाल्वको दे दिया॥ ७॥"},{"id":"10.76.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/8/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स लब्ध्वा कामगं यानं तमोधाम दुरासदम्।","ययौ द्वारवतीं शाल्वो वैरं वृष्णिकृतं स्मरन्॥ ८"],"iast":["sa labdhvā kāmagaṃ yānaṃ tamodhāma durāsadam|","yayau dvāravatīṃ śālvo vairaṃ vṛṣṇikṛtaṃ smaran|| 8"],"meaning":"वह विमान क्या था एक नगर ही था। वह इतना अन्धकारमय था कि उसे देखना या पकड़ना अत्यन्त कठिन था। चलानेवाला उसे जहाँ ले जाना चाहता, वहीं वह उसके इच्छा करते ही चला जाता था। शाल्वने वह विमान प्राप्त करके द्वारकापर चढ़ाई कर दी, क्योंकि वह वृष्णिवंशी यादवोंद्वारा किये हुए वैरको सदा स्मरण रखता था॥ ८॥"},{"id":"10.76.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/9/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निरुद्ध्य सेनया शाल्वो महत्या भरतर्षभ।","पुरीं बभंजोपवनान्युद्यानानि च सर्वशः॥ ९"],"iast":["niruddhya senayā śālvo mahatyā bharatarṣabha|","purīṃ babhaṃjopavanānyudyānāni ca sarvaśaḥ|| 9"],"meaning":"परीक्षित्! शाल्वने अपनी बहुत बड़ी सेनासे द्वारकाको चारों ओरसे घेर लिया और फिर उसके फल-फूलसे लदे हुए उपवन और उद्यानोंको उजाड़ने और नगरद्वारों, फाटकों, राजमहलों, अटारियों, दीवारों और नागरिकोंके मनोविनोदके स्थानोंको नष्ट-भ्रष्ट करने लगा। उस श्रेष्ठ विमानसे शस्त्रोंकी झड़ी लग गयी॥ ९-१०॥","meaning_covers":[9,10]},{"id":"10.76.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/10/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सगोपुराणि द्वाराणि प्रासादाट्टालतोलिकाः।","विहारान् स विमानाग्र्यान्‍निपेतुः शस्त्रवृष्टयः॥ १०"],"iast":["sagopurāṇi dvārāṇi prāsādāṭṭālatolikāḥ|","vihārān sa vimānāgryānnipetuḥ śastravṛṣṭayaḥ|| 10"],"meaning":"परीक्षित्! शाल्वने अपनी बहुत बड़ी सेनासे द्वारकाको चारों ओरसे घेर लिया और फिर उसके फल-फूलसे लदे हुए उपवन और उद्यानोंको उजाड़ने और नगरद्वारों, फाटकों, राजमहलों, अटारियों, दीवारों और नागरिकोंके मनोविनोदके स्थानोंको नष्ट-भ्रष्ट करने लगा। उस श्रेष्ठ विमानसे शस्त्रोंकी झड़ी लग गयी॥ ९-१०॥","meaning_covers":[9,10]},{"id":"10.76.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/11/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शिला द्रुमाश्‍चाशनयः सर्पा आसारशर्कराः।","प्रचण्डश्‍चक्रवातोऽभूद् रजसाऽऽच्छादिता दिशः॥ ११"],"iast":["śilā drumāścāśanayaḥ sarpā āsāraśarkarāḥ|","pracaṇḍaścakravāto'bhūd rajasā''cchāditā diśaḥ|| 11"],"meaning":"बड़ी-बड़ी चट्टानें, वृक्ष, वज्र, सर्प और ओले बरसने लगे। बड़े जोरका बवंडर उठ खड़ा हुआ। चारों ओर धूल-ही-धूल छा गयी॥ ११॥"},{"id":"10.76.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/12/","page":603,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्यर्द्यमाना सौभेन कृष्णस्य नगरी भृशम्।","नाभ्यपद्यत शं राजंस्त्रिपुरेण यथा मही॥ १२"],"iast":["ityardyamānā saubhena kṛṣṇasya nagarī bhṛśam|","nābhyapadyata śaṃ rājaṃstripureṇa yathā mahī|| 12"],"meaning":"परीक्षित्! प्राचीन कालमें जैसे त्रिपुरासुरने सारी पृथ्वीको पीड़ित कर रखा था, वैसे ही शाल्वके विमानने द्वारकापुरीको अत्यन्त पीड़ित कर दिया। वहाँके नर-नारियोंको कहीं एक क्षणके लिये भी शान्ति न मिलती थी॥ १२॥"},{"id":"10.76.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/13/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रद्युम्‍नो भगवान् वीक्ष्य बाध्यमाना निजाः प्रजाः।","मा भैष्टेत्यभ्यधाद् वीरो रथारूढो महायशाः॥ १३"],"iast":["pradyumno bhagavān vīkṣya bādhyamānā nijāḥ prajāḥ|","mā bhaiṣṭetyabhyadhād vīro rathārūḍho mahāyaśāḥ|| 13"],"meaning":"परमयशस्वी वीर भगवान् प्रद्युम्‍नने देखा—हमारी प्रजाको बड़ा कष्ट हो रहा है, तब उन्होंने रथपर सवार होकर सबको ढाढ़स बँधाया और कहा कि ‘डरो मत’॥ १३॥"},{"id":"10.76.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/14/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सात्यकिश्‍चारुदेष्णश्‍च साम्बोऽक्रूरः सहानुजः।","हार्दिक्यो भानुविन्दश्‍च गदश्‍च शुकसारणौ॥ १४"],"iast":["sātyakiścārudeṣṇaśca sāmbo'krūraḥ sahānujaḥ|","hārdikyo bhānuvindaśca gadaśca śukasāraṇau|| 14"],"meaning":"उनके पीछे-पीछे सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, भाइयोंके साथ अक्रूर, कृतवर्मा, भानुविन्द, गद, शुक, सारण आदि बहुत-से वीर बड़े-बड़े धनुष धारण करके निकले। ये सब-के-सब महारथी थे। सबने कवच पहन रखे थे और सबकी रक्षाके लिये बहुत-से रथ, हाथी, घोड़े तथा पैदल सेना साथ-साथ चल रही थी॥ १४-१५॥","meaning_covers":[14,15]},{"id":"10.76.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/15/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अपरे च महेष्वासा रथयूथपयूथपाः।","निर्ययुर्दंशिता गुप्ता रथेभाश्‍वपदातिभिः॥ १५"],"iast":["apare ca maheṣvāsā rathayūthapayūthapāḥ|","niryayurdaṃśitā guptā rathebhāśvapadātibhiḥ|| 15"],"meaning":"उनके पीछे-पीछे सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, भाइयोंके साथ अक्रूर, कृतवर्मा, भानुविन्द, गद, शुक, सारण आदि बहुत-से वीर बड़े-बड़े धनुष धारण करके निकले। ये सब-के-सब महारथी थे। सबने कवच पहन रखे थे और सबकी रक्षाके लिये बहुत-से रथ, हाथी, घोड़े तथा पैदल सेना साथ-साथ चल रही थी॥ १४-१५॥","meaning_covers":[14,15]},{"id":"10.76.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/16/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः प्रववृते युद्धं शाल्वानां यदुभिः सह।","यथासुराणां विबुधैस्तुमुलं लोमहर्षणम्॥ १६"],"iast":["tataḥ pravavṛte yuddhaṃ śālvānāṃ yadubhiḥ saha|","yathāsurāṇāṃ vibudhaistumulaṃ lomaharṣaṇam|| 16"],"meaning":"इसके बाद प्राचीन कालमें जैसे देवताओंके साथ असुरोंका घमासान युद्ध हुआ था वैसे ही शाल्वके सैनिकों और यदुवंशियोंका युद्ध होने लगा। उसे देखकर लोगोंके रोंगटे खड़े हो जाते थे॥ १६॥"},{"id":"10.76.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/17/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ताश्‍च सौभपतेर्माया दिव्यास्त्रै रुक्मिणीसुतः।","क्षणेन नाशयामास नैशं तम इवोष्णगुः॥ १७"],"iast":["tāśca saubhapatermāyā divyāstrai rukmiṇīsutaḥ|","kṣaṇena nāśayāmāsa naiśaṃ tama ivoṣṇaguḥ|| 17"],"meaning":"प्रद्युम्‍नजीने अपने दिव्य अस्त्रोंसे क्षणभरमें ही सौभपति शाल्वकी सारी माया काट डाली; ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अपनी प्रखर किरणोंसे रात्रिका अन्धकार मिटा देते हैं॥ १७॥"},{"id":"10.76.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/18/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विव्याध पंचविंशत्या स्वर्णपुंखैरयोमुखैः।","शाल्वस्य ध्वजिनीपालं शरैः सन्‍नतपर्वभिः॥ १८"],"iast":["vivyādha paṃcaviṃśatyā svarṇapuṃkhairayomukhaiḥ|","śālvasya dhvajinīpālaṃ śaraiḥ sannataparvabhiḥ|| 18"],"meaning":"प्रद्युम्‍नजीके बाणोंमें सोनेके पंख एवं लोहेके फल लगे हुए थे। उनकी गाँठें जान नहीं पड़ती थीं। उन्होंने ऐसे ही पचीस बाणोंसे शाल्वके सेनापतिको घायल कर दिया॥ १८॥"},{"id":"10.76.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/19/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शतेनाताडयच्छाल्वमेकैकेनास्य सैनिकान्।","दशभिर्दशभिर्नेतॄन् वाहनानि त्रिभिस्त्रिभिः॥ १९"],"iast":["śatenātāḍayacchālvamekaikenāsya sainikān|","daśabhirdaśabhirnetṝn vāhanāni tribhistribhiḥ|| 19"],"meaning":"परममनस्वी प्रद्युम्‍नजीने सेनापतिके साथ ही शाल्वको भी सौ बाण मारे, फिर प्रत्येक सैनिकको एक-एक और सारथियोंको दस-दस तथा वाहनोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल किया॥ १९॥"},{"id":"10.76.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/20/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदद्भुतं महत् कर्म प्रद्युम्‍नस्य महात्मनः।","दृष्ट्वा तं पूजयामासुः सर्वे स्वपरसैनिकाः॥ २०"],"iast":["tadadbhutaṃ mahat karma pradyumnasya mahātmanaḥ|","dṛṣṭvā taṃ pūjayāmāsuḥ sarve svaparasainikāḥ|| 20"],"meaning":"महामना प्रद्युम्‍नजीके इस अद्भुत और महान् कर्मको देखकर अपने एवं पराये—सभी सैनिक उनकी प्रशंसा करने लगे॥ २०॥"},{"id":"10.76.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/21/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बहुरूपैकरूपं तद् दृश्यते न च दृश्यते।","मायामयं मयकृतं दुर्विभाव्यं परैरभूत्॥ २१"],"iast":["bahurūpaikarūpaṃ tad dṛśyate na ca dṛśyate|","māyāmayaṃ mayakṛtaṃ durvibhāvyaṃ parairabhūt|| 21"],"meaning":"परीक्षित्! मय दानवका बनाया हुआ शाल्वका वह विमान अत्यन्त मायामय था। वह इतना विचित्र था कि कभी अनेक रूपोंमें दीखता तो कभी एक रूपमें, कभी दीखता तो कभी न भी दीखता। यदुवंशियोंको इस बातका पता ही न चलता कि वह इस समय कहाँ है॥ २१॥"},{"id":"10.76.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/22/","page":604,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्वचिद् भूमौ क्वचिद् व्योम्‍नि गिरिमूर्ध्नि जले क्‍वचित्।","अलातचक्रवद् भ्राम्यत् सौभं तद् दुरवस्थितम्॥ २२"],"iast":["kvacid bhūmau kvacid vyomni girimūrdhni jale kvacit|","alātacakravad bhrāmyat saubhaṃ tad duravasthitam|| 22"],"meaning":"वह कभी पृथ्वीपर आ जाता तो कभी आकाशमें उड़ने लगता। कभी पहाड़की चोटीपर चढ़ जाता तो कभी जलमें तैरने लगता। वह अलातचक्रके समान—मानो कोई दुमुँही लुकारियोंकी बनेठी भाँज रहा हो—घूमता रहता था, एक क्षणके लिये भी कहीं ठहरता न था॥ २२॥"},{"id":"10.76.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/23/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत्र यत्रोपलक्ष्येत ससौभः सहसैनिकः।","शाल्वस्ततस्ततोऽमुंचन् शरान् सात्वतयूथपाः॥ २३"],"iast":["yatra yatropalakṣyeta sasaubhaḥ sahasainikaḥ|","śālvastatastato'muṃcan śarān sātvatayūthapāḥ|| 23"],"meaning":"शाल्व अपने विमान और सैनिकोंके साथ जहाँ-जहाँ दिखायी पड़ता, वहीं-वहीं यदुवंशी सेनापति बाणोंकी झड़ी लगा देते थे॥ २३॥"},{"id":"10.76.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/24/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शरैर‌ग्‍न्यर्कसंस्पर्शैराशीविषदुरासदैः ।","पीड्यमानपुरानीकः शाल्वोऽमुह्यत् परेरितैः॥ २४"],"iast":["śarairagnyarkasaṃsparśairāśīviṣadurāsadaiḥ |","pīḍyamānapurānīkaḥ śālvo'muhyat pareritaiḥ|| 24"],"meaning":"उनके बाण सूर्य और अग्‍निके समान जलते हुए तथा विषैले साँपकी तरह असह्य होते थे। उनसे शाल्वका नगराकार विमान और सेना अत्यन्त पीड़ित हो गयी, यहाँतक कि यदुवंशियोंके बाणोंसे शाल्व स्वयं मूर्च्छित हो गया॥ २४॥"},{"id":"10.76.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/25/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शाल्वानीकपशस्त्रौघैर्वृष्णिवीरा भृशार्दिताः।","न तत्यजू रणं स्वं स्वं लोकद्वयजिगीषवः॥ २५"],"iast":["śālvānīkapaśastraughairvṛṣṇivīrā bhṛśārditāḥ|","na tatyajū raṇaṃ svaṃ svaṃ lokadvayajigīṣavaḥ|| 25"],"meaning":"परीक्षित्! शाल्वके सेनापतियोंने भी यदुवंशियोंपर खूब शस्त्रोंकी वर्षा कर रखी थी, इससे वे अत्यन्त पीड़ित थे; परन्तु उन्होंने अपना-अपना मोर्चा छोड़ा नहीं। वे सोचते थे कि मरेंगे तो परलोक बनेगा और जीतेंगे तो विजयकी प्राप्ति होगी॥ २५॥"},{"id":"10.76.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/26/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शाल्वामात्यो द्युमान् नाम प्रद्युम्‍नं प्राक्प्रपीडितः।","आसाद्य गदया मौर्व्या व्याहत्य व्यनदद् बली॥ २६"],"iast":["śālvāmātyo dyumān nāma pradyumnaṃ prākprapīḍitaḥ|","āsādya gadayā maurvyā vyāhatya vyanadad balī|| 26"],"meaning":"परीक्षित्! शाल्वके मन्त्रीका नाम था द्युमान्, जिसे पहले प्रद्युम्‍नजीने पचीस बाण मारे थे। वह बहुत बली था। उसने झपटकर प्रद्युम्‍नजीपर अपनी फौलादी गदासे बड़े जोरसे प्रहार किया और ‘मार लिया, मार लिया’ कहकर गरजने लगा॥ २६॥"},{"id":"10.76.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/27/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रद्युम्‍नं गदया शीर्णवक्षःस्थलमरिन्दमम्।","अपोवाह रणात् सूतो धर्मविद् दारुकात्मजः॥ २७"],"iast":["pradyumnaṃ gadayā śīrṇavakṣaḥsthalamarindamam|","apovāha raṇāt sūto dharmavid dārukātmajaḥ|| 27"],"meaning":"परीक्षित्! गदाकी चोटसे शत्रुदमन प्रद्युम्‍नजीका वक्षःस्थल फट-सा गया। दारुकका पुत्र उनका रथ हाँक रहा था। वह सारथिधर्मके अनुसार उन्हें रणभूमिसे हटा ले गया॥ २७॥"},{"id":"10.76.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/28/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन कार्ष्णिः सारथिमब्रवीत्।","अहो असाध्विदं सूत यद् रणान्मेऽपसर्पणम्॥ २८"],"iast":["labdhasaṃjño muhūrtena kārṣṇiḥ sārathimabravīt|","aho asādhvidaṃ sūta yad raṇānme'pasarpaṇam|| 28"],"meaning":"दो घड़ीमें प्रद्युम्‍नजीकी मूर्च्छा टूटी। तब उन्होंने सारथिसे कहा—‘सारथे! तूने यह बहुत बुरा किया। हाय, हाय! तू मुझे रणभूमिसे हटा लाया?॥ २८॥"},{"id":"10.76.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/29/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न यदूनां कुले जातः श्रूयते रणविच्युतः।","विना मत् क्लीबचित्तेन सूतेन प्राप्तकिल्बिषात्॥ २९"],"iast":["na yadūnāṃ kule jātaḥ śrūyate raṇavicyutaḥ|","vinā mat klībacittena sūtena prāptakilbiṣāt|| 29"],"meaning":"सूत! हमने ऐसा कभी नहीं सुना कि हमारे वंशका कोई भी वीर कभी रणभूमि छोड़कर अलग हट गया हो! यह कलंकका टीका तो केवल मेरे ही सिर लगा। सचमुच सूत! तू कायर है, नपुंसक है॥ २९॥"},{"id":"10.76.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/30/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं नु वक्ष्येऽभिसंगम्य पितरौ रामकेशवौ।","युद्धात् सम्यगपक्रान्तः पृष्टस्तत्रात्मनः क्षमम्॥ ३०"],"iast":["kiṃ nu vakṣye'bhisaṃgamya pitarau rāmakeśavau|","yuddhāt samyagapakrāntaḥ pṛṣṭastatrātmanaḥ kṣamam|| 30"],"meaning":"बतला तो सही, अब मैं अपने ताऊ बलरामजी और पिता श्रीकृष्णके सामने जाकर क्या कहूँगा? अब तो सब लोग यही कहेंगे न, कि मैं युद्धसे भग गया? उनके पूछनेपर मैं अपने अनुरूप क्या उत्तर दे सकूँगा’॥ ३०॥"},{"id":"10.76.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/31/","page":605,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["व्यक्तं मे कथयिष्यन्ति हसन्त्यो भ्रातृजामयः।","क्लैब्यं कथं कथं वीर तवान्यैः कथ्यतां मृधे॥ ३१"],"iast":["vyaktaṃ me kathayiṣyanti hasantyo bhrātṛjāmayaḥ|","klaibyaṃ kathaṃ kathaṃ vīra tavānyaiḥ kathyatāṃ mṛdhe|| 31"],"meaning":"मेरी भाभियाँ हँसती हुई मुझसे साफ-साफ पूछेंगी कि ‘कहो, वीर! तुम नपुंसक कैसे हो गये? दूसरोंने युद्धमें तुम्हें नीचा कैसे दिखा दिया?’ ‘सूत! अवश्य ही तुमने मुझे रणभूमिसे भगाकर अक्षम्य अपराध किया है!’॥ ३१॥"},{"id":"10.76.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/32/","page":606,"speaker":"सारथिरुवाच","sanskrit":["धर्मं विजानताऽऽयुष्मन् कृतमेतन्मया विभो।","सूतः कृच्छ्रगतं रक्षेद् रथिनं सारथिं रथी॥ ३२"],"iast":["dharmaṃ vijānatā''yuṣman kṛtametanmayā vibho|","sūtaḥ kṛcchragataṃ rakṣed rathinaṃ sārathiṃ rathī|| 32"],"meaning":"सारथीने कहा—आयुष्मन्! मैंने जो कुछ किया है, सारथीका धर्म समझकर ही किया है। मेरे समर्थ स्वामी! युद्धका ऐसा धर्म है कि संकट पड़नेपर सारथी रथीकी रक्षा कर ले और रथी सारथीकी॥ ३२॥"},{"id":"10.76.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/33/","page":606,"speaker":"सारथिरुवाच","sanskrit":["एतद् विदित्वा तु भवान् मयापोवाहितो रणात्।","उपसृष्टः परेणेति मूर्च्छितो गदया हतः॥ ३३"],"iast":["etad viditvā tu bhavān mayāpovāhito raṇāt|","upasṛṣṭaḥ pareṇeti mūrcchito gadayā hataḥ|| 33"],"meaning":"इस धर्मको समझते हुए ही मैंने आपको रणभूमिसे हटाया है। शत्रुने आपपर गदाका प्रहार किया था, जिससे आप मूर्च्छित हो गये थे, बड़े संकटमें थे; इसीसे मुझे ऐसा करना पड़ा॥ ३३॥"}],"text":[{"b":36225,"kind":"adhyaya_heading","page":602,"text":"अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः"},{"b":36226,"kind":"topic_heading","page":602,"text":"शाल्वके साथ यादवोंका युद्ध"},{"b":36227,"kind":"topic_heading","page":602,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":36228,"kind":"sanskrit_shloka","page":602,"verses":["10.76.1"],"text":"अथान्यदपि कृष्णस्य शृणु कर्माद्भुतं नृप।"},{"b":36229,"kind":"sanskrit_shloka","page":602,"verses":["10.76.1"],"text":"क्रीडानरशरीरस्य यथा सौभपतिर्हतः॥ १"},{"b":36230,"kind":"sanskrit_shloka","page":602,"verses":["10.76.2"],"text":"शिशुपालसखः शाल्वो रुक्मिण्युद्वाह आगतः।"},{"b":36231,"kind":"sanskrit_shloka","page":602,"verses":["10.76.2"],"text":"यदुभिर्निर्जितः संख्ये जरासन्धादयस्तथा॥ २"},{"b":36232,"kind":"sanskrit_shloka","page":602,"verses":["10.76.3"],"text":"शाल्वः प्रतिज्ञामकरोत् शृण्वतां सर्वभूभुजाम्।"},{"b":36233,"kind":"sanskrit_shloka","page":602,"verses":["10.76.3"],"text":"अयादवीं क्ष्मां करिष्ये पौरुषं मम पश्यत॥ ३"},{"b":36234,"kind":"hindi_translation","page":602,"explains":["10.76.1","10.76.2","10.76.3"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब मनुष्यकी-सी लीला करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका एक और भी अद्भुत चरित्र सुनो। इसमें यह बताया जायगा कि सौभनामक विमानका अधिपति शाल्व किस प्रकार भगवान्‌के हाथसे मारा गया॥ १॥ शाल्व शिशुपालका सखा था और रुक्मिणीके विवाहके अवसरपर बारातमें शिशुपालकी ओरसे आया हुआ था। उस समय यदुवंशियोंने युद्धमें जरासन्ध आदिके साथ-साथ शाल्वको भी जीत लिया था॥ २॥ उस दिन सब राजाओंके सामने शाल्वने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं पृथ्वीसे यदुवंशियोंको मिटाकर छोड़ूँगा, सब लोग मेरा बल-पौरुष देखना’॥ ३॥"},{"b":36235,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.4"],"text":"इति मूढः प्रतिज्ञाय देवं पशुपतिं प्रभुम्।"},{"b":36236,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.4"],"text":"आराधयामास नृप पांसुमुष्टिं सकृद् ग्रसन्॥ ४"},{"b":36237,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.5"],"text":"संवत्सरान्ते भगवानाशुतोष उमापतिः।"},{"b":36238,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.5"],"text":"वरेणच्छन्दयामास शाल्वं शरणमागतम्॥ ५"},{"b":36239,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.6"],"text":"देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।"},{"b":36240,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.6"],"text":"अभेद्यं कामगं वव्रे स यानं वृष्णिभीषणम्॥ ६"},{"b":36241,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.7"],"text":"तथेति गिरिशादिष्टो मयः परपुरंजयः।"},{"b":36242,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.7"],"text":"पुरं निर्माय शाल्वाय प्रादात्सौभमयस्मयम्॥ ७"},{"b":36243,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.8"],"text":"स लब्ध्वा कामगं यानं तमोधाम दुरासदम्।"},{"b":36244,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.8"],"text":"ययौ द्वारवतीं शाल्वो वैरं वृष्णिकृतं स्मरन्॥ ८"},{"b":36245,"kind":"hindi_commentary","page":603,"explains":["10.76.4","10.76.5","10.76.6","10.76.7","10.76.8"],"text":"परीक्षित्! मूढ़ शाल्वने इस प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधिदेव भगवान् पशुपतिकी आराधना प्रारम्भ की। वह उन दिनों दिनमें केवल एक बार मुट्ठीभर राख फाँक लिया करता था॥ ४॥ यों तो पार्वतीपति भगवान् शंकर आशुतोष हैं, औढरदानी हैं, फिर भी वे शाल्वका घोर संकल्प जानकर एक वर्षके बाद प्रसन्‍न हुए। उन्होंने अपने शरणागत शाल्वसे वर माँगनेके लिये कहा॥ ५॥ उस समय शाल्वने यह वर माँगा कि ‘मुझे आप एक ऐसा विमान दीजिये जो देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंसे तोड़ा न जा सके; जहाँ इच्छा हो, वहीं चला जाय और यदुवंशियोंके लिये अत्यन्त भयंकर हो’॥ ६॥ भगवान् शंकरने कह दिया ‘तथास्तु!’ इसके बाद उनकी आज्ञासे विपक्षियोंके नगर जीतनेवाले मय दानवने लोहेका सौभनामक विमान बनाया और शाल्वको दे दिया॥ ७॥ वह विमान क्या था एक नगर ही था। वह इतना अन्धकारमय था कि उसे देखना या पकड़ना अत्यन्त कठिन था। चलानेवाला उसे जहाँ ले जाना चाहता, वहीं वह उसके इच्छा करते ही चला जाता था। शाल्वने वह विमान प्राप्त करके द्वारकापर चढ़ाई कर दी, क्योंकि वह वृष्णिवंशी यादवोंद्वारा किये हुए वैरको सदा स्मरण रखता था॥ ८॥"},{"b":36246,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.9"],"text":"निरुद्ध्य सेनया शाल्वो महत्या भरतर्षभ।"},{"b":36247,"kind":"topic_heading","page":603,"verses":["10.76.9"],"text":"पुरीं बभंजोपवनान्युद्यानानि च सर्वशः॥ ९"},{"b":36248,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.10"],"text":"सगोपुराणि द्वाराणि प्रासादाट्टालतोलिकाः।"},{"b":36249,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.10"],"text":"विहारान् स विमानाग्र्यान्‍निपेतुः शस्त्रवृष्टयः॥ १०"},{"b":36250,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.11"],"text":"शिला द्रुमाश्‍चाशनयः सर्पा आसारशर्कराः।"},{"b":36251,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.11"],"text":"प्रचण्डश्‍चक्रवातोऽभूद् रजसाऽऽच्छादिता दिशः॥ ११"},{"b":36252,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.12"],"text":"इत्यर्द्यमाना सौभेन कृष्णस्य नगरी भृशम्।"},{"b":36253,"kind":"sanskrit_shloka","page":603,"verses":["10.76.12"],"text":"नाभ्यपद्यत शं राजंस्त्रिपुरेण यथा मही॥ १२"},{"b":36254,"kind":"hindi_commentary","page":603,"explains":["10.76.9","10.76.10","10.76.11","10.76.12"],"text":"परीक्षित्! शाल्वने अपनी बहुत बड़ी सेनासे द्वारकाको चारों ओरसे घेर लिया और फिर उसके फल-फूलसे लदे हुए उपवन और उद्यानोंको उजाड़ने और नगरद्वारों, फाटकों, राजमहलों, अटारियों, दीवारों और नागरिकोंके मनोविनोदके स्थानोंको नष्ट-भ्रष्ट करने लगा। उस श्रेष्ठ विमानसे शस्त्रोंकी झड़ी लग गयी॥ ९-१०॥ बड़ी-बड़ी चट्टानें, वृक्ष, वज्र, सर्प और ओले बरसने लगे। बड़े जोरका बवंडर उठ खड़ा हुआ। चारों ओर धूल-ही-धूल छा गयी॥ ११॥ परीक्षित्! प्राचीन कालमें जैसे त्रिपुरासुरने सारी पृथ्वीको पीड़ित कर रखा था, वैसे ही शाल्वके विमानने द्वारकापुरीको अत्यन्त पीड़ित कर दिया। वहाँके नर-नारियोंको कहीं एक क्षणके लिये भी शान्ति न मिलती थी॥ १२॥"},{"b":36255,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.13"],"text":"प्रद्युम्‍नो भगवान् वीक्ष्य बाध्यमाना निजाः प्रजाः।"},{"b":36256,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.13"],"text":"मा भैष्टेत्यभ्यधाद् वीरो रथारूढो महायशाः॥ १३"},{"b":36257,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.14"],"text":"सात्यकिश्‍चारुदेष्णश्‍च साम्बोऽक्रूरः सहानुजः।"},{"b":36258,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.14"],"text":"हार्दिक्यो भानुविन्दश्‍च गदश्‍च शुकसारणौ॥ १४"},{"b":36259,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.15"],"text":"अपरे च महेष्वासा रथयूथपयूथपाः।"},{"b":36260,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.15"],"text":"निर्ययुर्दंशिता गुप्ता रथेभाश्‍वपदातिभिः॥ १५"},{"b":36261,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.16"],"text":"ततः प्रववृते युद्धं शाल्वानां यदुभिः सह।"},{"b":36262,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.16"],"text":"यथासुराणां विबुधैस्तुमुलं लोमहर्षणम्॥ १६"},{"b":36263,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.17"],"text":"ताश्‍च सौभपतेर्माया दिव्यास्त्रै रुक्मिणीसुतः।"},{"b":36264,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.17"],"text":"क्षणेन नाशयामास नैशं तम इवोष्णगुः॥ १७"},{"b":36265,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.18"],"text":"विव्याध पंचविंशत्या स्वर्णपुंखैरयोमुखैः।"},{"b":36266,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.18"],"text":"शाल्वस्य ध्वजिनीपालं शरैः सन्‍नतपर्वभिः॥ १८"},{"b":36267,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.19"],"text":"शतेनाताडयच्छाल्वमेकैकेनास्य सैनिकान्।"},{"b":36268,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.19"],"text":"दशभिर्दशभिर्नेतॄन् वाहनानि त्रिभिस्त्रिभिः॥ १९"},{"b":36269,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.20"],"text":"तदद्भुतं महत् कर्म प्रद्युम्‍नस्य महात्मनः।"},{"b":36270,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.20"],"text":"दृष्ट्वा तं पूजयामासुः सर्वे स्वपरसैनिकाः॥ २०"},{"b":36271,"kind":"hindi_translation","page":604,"explains":["10.76.13","10.76.14","10.76.15","10.76.16","10.76.17","10.76.18","10.76.19","10.76.20"],"text":"परमयशस्वी वीर भगवान् प्रद्युम्‍नने देखा—हमारी प्रजाको बड़ा कष्ट हो रहा है, तब उन्होंने रथपर सवार होकर सबको ढाढ़स बँधाया और कहा कि ‘डरो मत’॥ १३॥ उनके पीछे-पीछे सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, भाइयोंके साथ अक्रूर, कृतवर्मा, भानुविन्द, गद, शुक, सारण आदि बहुत-से वीर बड़े-बड़े धनुष धारण करके निकले। ये सब-के-सब महारथी थे। सबने कवच पहन रखे थे और सबकी रक्षाके लिये बहुत-से रथ, हाथी, घोड़े तथा पैदल सेना साथ-साथ चल रही थी॥ १४-१५॥ इसके बाद प्राचीन कालमें जैसे देवताओंके साथ असुरोंका घमासान युद्ध हुआ था वैसे ही शाल्वके सैनिकों और यदुवंशियोंका युद्ध होने लगा। उसे देखकर लोगोंके रोंगटे खड़े हो जाते थे॥ १६॥ प्रद्युम्‍नजीने अपने दिव्य अस्त्रोंसे क्षणभरमें ही सौभपति शाल्वकी सारी माया काट डाली; ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अपनी प्रखर किरणोंसे रात्रिका अन्धकार मिटा देते हैं॥ १७॥ प्रद्युम्‍नजीके बाणोंमें सोनेके पंख एवं लोहेके फल लगे हुए थे। उनकी गाँठें जान नहीं पड़ती थीं। उन्होंने ऐसे ही पचीस बाणोंसे शाल्वके सेनापतिको घायल कर दिया॥ १८॥ परममनस्वी प्रद्युम्‍नजीने सेनापतिके साथ ही शाल्वको भी सौ बाण मारे, फिर प्रत्येक सैनिकको एक-एक और सारथियोंको दस-दस तथा वाहनोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल किया॥ १९॥ महामना प्रद्युम्‍नजीके इस अद्भुत और महान् कर्मको देखकर अपने एवं पराये—सभी सैनिक उनकी प्रशंसा करने लगे॥ २०॥"},{"b":36272,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.21"],"text":"बहुरूपैकरूपं तद् दृश्यते न च दृश्यते।"},{"b":36273,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.21"],"text":"मायामयं मयकृतं दुर्विभाव्यं परैरभूत्॥ २१"},{"b":36274,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.22"],"text":"क्वचिद् भूमौ क्वचिद् व्योम्‍नि गिरिमूर्ध्नि जले क्‍वचित्।"},{"b":36275,"kind":"sanskrit_shloka","page":604,"verses":["10.76.22"],"text":"अलातचक्रवद् भ्राम्यत् सौभं तद् दुरवस्थितम्॥ २२"},{"b":36276,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.23"],"text":"यत्र यत्रोपलक्ष्येत ससौभः सहसैनिकः।"},{"b":36277,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.23"],"text":"शाल्वस्ततस्ततोऽमुंचन् शरान् सात्वतयूथपाः॥ २३"},{"b":36278,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.24"],"text":"शरैर‌ग्‍न्यर्कसंस्पर्शैराशीविषदुरासदैः ।"},{"b":36279,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.24"],"text":"पीड्यमानपुरानीकः शाल्वोऽमुह्यत् परेरितैः॥ २४"},{"b":36280,"kind":"hindi_translation","page":604,"explains":["10.76.21","10.76.22","10.76.23","10.76.24"],"text":"परीक्षित्! मय दानवका बनाया हुआ शाल्वका वह विमान अत्यन्त मायामय था। वह इतना विचित्र था कि कभी अनेक रूपोंमें दीखता तो कभी एक रूपमें, कभी दीखता तो कभी न भी दीखता। यदुवंशियोंको इस बातका पता ही न चलता कि वह इस समय कहाँ है॥ २१॥ वह कभी पृथ्वीपर आ जाता तो कभी आकाशमें उड़ने लगता। कभी पहाड़की चोटीपर चढ़ जाता तो कभी जलमें तैरने लगता। वह अलातचक्रके समान—मानो कोई दुमुँही लुकारियोंकी बनेठी भाँज रहा हो—घूमता रहता था, एक क्षणके लिये भी कहीं ठहरता न था॥ २२॥ शाल्व अपने विमान और सैनिकोंके साथ जहाँ-जहाँ दिखायी पड़ता, वहीं-वहीं यदुवंशी सेनापति बाणोंकी झड़ी लगा देते थे॥ २३॥ उनके बाण सूर्य और अग्‍निके समान जलते हुए तथा विषैले साँपकी तरह असह्य होते थे। उनसे शाल्वका नगराकार विमान और सेना अत्यन्त पीड़ित हो गयी, यहाँतक कि यदुवंशियोंके बाणोंसे शाल्व स्वयं मूर्च्छित हो गया॥ २४॥"},{"b":36281,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.25"],"text":"शाल्वानीकपशस्त्रौघैर्वृष्णिवीरा भृशार्दिताः।"},{"b":36282,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.25"],"text":"न तत्यजू रणं स्वं स्वं लोकद्वयजिगीषवः॥ २५"},{"b":36283,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.26"],"text":"शाल्वामात्यो द्युमान् नाम प्रद्युम्‍नं प्राक्प्रपीडितः।"},{"b":36284,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.26"],"text":"आसाद्य गदया मौर्व्या व्याहत्य व्यनदद् बली॥ २६"},{"b":36285,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.27"],"text":"प्रद्युम्‍नं गदया शीर्णवक्षःस्थलमरिन्दमम्।"},{"b":36286,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.27"],"text":"अपोवाह रणात् सूतो धर्मविद् दारुकात्मजः॥ २७"},{"b":36287,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.28"],"text":"लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन कार्ष्णिः सारथिमब्रवीत्।"},{"b":36288,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.28"],"text":"अहो असाध्विदं सूत यद् रणान्मेऽपसर्पणम्॥ २८"},{"b":36289,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.29"],"text":"न यदूनां कुले जातः श्रूयते रणविच्युतः।"},{"b":36290,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.29"],"text":"विना मत् क्लीबचित्तेन सूतेन प्राप्तकिल्बिषात्॥ २९"},{"b":36291,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.30"],"text":"किं नु वक्ष्येऽभिसंगम्य पितरौ रामकेशवौ।"},{"b":36292,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.30"],"text":"युद्धात् सम्यगपक्रान्तः पृष्टस्तत्रात्मनः क्षमम्॥ ३०"},{"b":36293,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.31"],"text":"व्यक्तं मे कथयिष्यन्ति हसन्त्यो भ्रातृजामयः।"},{"b":36294,"kind":"sanskrit_shloka","page":605,"verses":["10.76.31"],"text":"क्लैब्यं कथं कथं वीर तवान्यैः कथ्यतां मृधे॥ ३१"},{"b":36295,"kind":"hindi_translation","page":605,"explains":["10.76.25","10.76.26","10.76.27","10.76.28","10.76.29","10.76.30","10.76.31"],"text":"परीक्षित्! शाल्वके सेनापतियोंने भी यदुवंशियोंपर खूब शस्त्रोंकी वर्षा कर रखी थी, इससे वे अत्यन्त पीड़ित थे; परन्तु उन्होंने अपना-अपना मोर्चा छोड़ा नहीं। वे सोचते थे कि मरेंगे तो परलोक बनेगा और जीतेंगे तो विजयकी प्राप्ति होगी॥ २५॥ परीक्षित्! शाल्वके मन्त्रीका नाम था द्युमान्, जिसे पहले प्रद्युम्‍नजीने पचीस बाण मारे थे। वह बहुत बली था। उसने झपटकर प्रद्युम्‍नजीपर अपनी फौलादी गदासे बड़े जोरसे प्रहार किया और ‘मार लिया, मार लिया’ कहकर गरजने लगा॥ २६॥ परीक्षित्! गदाकी चोटसे शत्रुदमन प्रद्युम्‍नजीका वक्षःस्थल फट-सा गया। दारुकका पुत्र उनका रथ हाँक रहा था। वह सारथिधर्मके अनुसार उन्हें रणभूमिसे हटा ले गया॥ २७॥ दो घड़ीमें प्रद्युम्‍नजीकी मूर्च्छा टूटी। तब उन्होंने सारथिसे कहा—‘सारथे! तूने यह बहुत बुरा किया। हाय, हाय! तू मुझे रणभूमिसे हटा लाया?॥ २८॥ सूत! हमने ऐसा कभी नहीं सुना कि हमारे वंशका कोई भी वीर कभी रणभूमि छोड़कर अलग हट गया हो! यह कलंकका टीका तो केवल मेरे ही सिर लगा। सचमुच सूत! तू कायर है, नपुंसक है॥ २९॥ बतला तो सही, अब मैं अपने ताऊ बलरामजी और पिता श्रीकृष्णके सामने जाकर क्या कहूँगा? अब तो सब लोग यही कहेंगे न, कि मैं युद्धसे भग गया? उनके पूछनेपर मैं अपने अनुरूप क्या उत्तर दे सकूँगा’॥ ३०॥ मेरी भाभियाँ हँसती हुई मुझसे साफ-साफ पूछेंगी कि ‘कहो, वीर! तुम नपुंसक कैसे हो गये? दूसरोंने युद्धमें तुम्हें नीचा कैसे दिखा दिया?’ ‘सूत! अवश्य ही तुमने मुझे रणभूमिसे भगाकर अक्षम्य अपराध किया है!’॥ ३१॥"},{"b":36296,"kind":"topic_heading","page":606,"text":"सारथिरुवाच"},{"b":36297,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.76.32"],"text":"धर्मं विजानताऽऽयुष्मन् कृतमेतन्मया विभो।"},{"b":36298,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.76.32"],"text":"सूतः कृच्छ्रगतं रक्षेद् रथिनं सारथिं रथी॥ ३२"},{"b":36299,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.76.33"],"text":"एतद् विदित्वा तु भवान् मयापोवाहितो रणात्।"},{"b":36300,"kind":"sanskrit_shloka","page":606,"verses":["10.76.33"],"text":"उपसृष्टः परेणेति मूर्च्छितो गदया हतः॥ ३३"},{"b":36301,"kind":"hindi_commentary","page":606,"explains":["10.76.32","10.76.33"],"text":"सारथीने कहा—आयुष्मन्! मैंने जो कुछ किया है, सारथीका धर्म समझकर ही किया है। मेरे समर्थ स्वामी! युद्धका ऐसा धर्म है कि संकट पड़नेपर सारथी रथीकी रक्षा कर ले और रथी सारथीकी॥ ३२॥ इस धर्मको समझते हुए ही मैंने आपको रणभूमिसे हटाया है। शत्रुने आपपर गदाका प्रहार किया था, जिससे आप मूर्च्छित हो गये थे, बड़े संकटमें थे; इसीसे मुझे ऐसा करना पड़ा॥ ३३॥"},{"b":36302,"kind":"hindi_translation","page":606,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे शाल्वयुद्धे षट्सप्ततितमोऽध्यायः॥ ७६॥"}],"notes":[{"id":"v2:323","mark":"१","page":605,"after_verse":"10.76.25","text":"त्रय०।"},{"id":"v2:324","mark":"२","page":605,"after_verse":"10.76.26","text":"गुर्व्या।"},{"id":"v2:325","mark":"३","page":605,"after_verse":"10.76.29","text":"प्तकल्मषात्।"}],"corrections":{"count":1,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}