{"id":"10.50","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 50","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः","topics":["जरासन्धसे युद्ध और द्वारकापुरीका निर्माण"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.50.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[444,452]},"verses":[{"id":"10.50.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/1/","page":445,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अस्तिः प्राप्तिश्‍च कंसस्य महिष्यौ भरतर्षभ।","मृते भर्तरि दुःखार्ते ईयतुः स्म पितुर्गृहान्॥ १"],"iast":["astiḥ prāptiśca kaṃsasya mahiṣyau bharatarṣabha|","mṛte bhartari duḥkhārte īyatuḥ sma piturgṛhān|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भरतवंशशिरोमणि परीक्षित्! कंसकी दो रानियाँ थीं—अस्ति और प्राप्ति। पतिकी मृत्युसे उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे अपने पिताकी राजधानीमें चली गयीं॥ १॥"},{"id":"10.50.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/2/","page":445,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पित्रे मगधराजाय जरासन्धाय दुःखिते।","वेदयांचक्रतुः सर्वमात्मवैधव्यकारणम्॥ २"],"iast":["pitre magadharājāya jarāsandhāya duḥkhite|","vedayāṃcakratuḥ sarvamātmavaidhavyakāraṇam|| 2"],"meaning":"उन दोनोंका पिता था मगधराज जरासन्ध। उससे उन्होंने बड़े दुःखके साथ अपने विधवा होनेके कारणोंका वर्णन किया॥ २॥"},{"id":"10.50.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/3/","page":445,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तदप्रियमाकर्ण्य शोकामर्षयुतो नृप।","अयादवीं महीं कर्तुं चक्रे परममुद्यमम्॥ ३"],"iast":["sa tadapriyamākarṇya śokāmarṣayuto nṛpa|","ayādavīṃ mahīṃ kartuṃ cakre paramamudyamam|| 3"],"meaning":"परीक्षित्! यह अप्रिय समाचार सुनकर पहले तो जरासन्धको बड़ा शोक हुआ, परन्तु पीछे वह क्रोधसे तिलमिला उठा। उसने यह निश्‍चय करके कि मैं पृथ्वीपर एक भी यदुवंशी नहीं रहने दूँगा, युद्धकी बहुत बड़ी तैयारी की॥ ३॥"},{"id":"10.50.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/4/","page":445,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अक्षौहिणीभिर्विंशत्या तिसृभिश्‍चापि संवृतः।","यदुराजधानीं मथुरां न्यरुणत् सर्वतोदिशम्॥ ४"],"iast":["akṣauhiṇībhirviṃśatyā tisṛbhiścāpi saṃvṛtaḥ|","yadurājadhānīṃ mathurāṃ nyaruṇat sarvatodiśam|| 4"],"meaning":"और तेईस अक्षौहिणी सेनाके साथ यदुवंशियोंकी राजधानी मथुराको चारों ओरसे घेर लिया॥ ४॥"},{"id":"10.50.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/5/","page":445,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निरीक्ष्य तद्बलं कृष्ण उद्वेलमिव सागरम्।","स्वपुरं तेन संरुद्धं स्वजनं च भयाकुलम्॥ ५"],"iast":["nirīkṣya tadbalaṃ kṛṣṇa udvelamiva sāgaram|","svapuraṃ tena saṃruddhaṃ svajanaṃ ca bhayākulam|| 5"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने देखा—जरासन्धकी सेना क्या है, उमड़ता हुआ समुद्र है। उन्होंने यह भी देखा कि उसने चारों ओरसे हमारी राजधानी घेर ली है और हमारे स्वजन तथा पुरवासी भयभीत हो रहे हैं॥ ५॥"},{"id":"10.50.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/6/","page":445,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चिन्तयामास भगवान् हरिः कारणमानुषः।","तद्देशकालानुगुणं स्वावतारप्रयोजनम्॥ ६"],"iast":["cintayāmāsa bhagavān hariḥ kāraṇamānuṣaḥ|","taddeśakālānuguṇaṃ svāvatāraprayojanam|| 6"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही मनुष्यका-सा वेष धारण किये हुए हैं। अब उन्होंने विचार किया कि मेरे अवतारका क्या प्रयोजन है और इस समय इस स्थानपर मुझे क्या करना चाहिये॥ ६॥"},{"id":"10.50.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/7/","page":445,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हनिष्यामि बलं ह्येतद् भुवि भारं समाहितम्।","मागधेन समानीतं वश्यानां सर्वभूभुजाम्॥ ७"],"iast":["haniṣyāmi balaṃ hyetad bhuvi bhāraṃ samāhitam|","māgadhena samānītaṃ vaśyānāṃ sarvabhūbhujām|| 7"],"meaning":"उन्होंने सोचा यह बड़ा अच्छा हुआ कि मगधराज जरासन्धने अपने अधीनस्थ नरपतियोंकी पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियोंसे युक्त कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी कर ली है। यह सब तो पृथ्वीका भार ही जुटकर मेरे पास आ पहुँचा है। मैं इसका नाश करूँगा। परन्तु अभी मगधराज जरासन्धको नहीं मारना चाहिये। क्योंकि वह जीवित रहेगा तो फिरसे असुरोंकी बहुत-सी सेना इकट्ठी कर लायेगा॥ ७-८॥","meaning_covers":[7,8]},{"id":"10.50.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/8/","page":445,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अक्षौहिणीभिः संख्यातं भटाश्‍वरथकुंजरैः।","मागधस्तु न हन्तव्यो भूयः कर्ता बलोद्यमम्॥ ८"],"iast":["akṣauhiṇībhiḥ saṃkhyātaṃ bhaṭāśvarathakuṃjaraiḥ|","māgadhastu na hantavyo bhūyaḥ kartā balodyamam|| 8"],"meaning":"उन्होंने सोचा यह बड़ा अच्छा हुआ कि मगधराज जरासन्धने अपने अधीनस्थ नरपतियोंकी पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियोंसे युक्त कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी कर ली है। यह सब तो पृथ्वीका भार ही जुटकर मेरे पास आ पहुँचा है। मैं इसका नाश करूँगा। परन्तु अभी मगधराज जरासन्धको नहीं मारना चाहिये। क्योंकि वह जीवित रहेगा तो फिरसे असुरोंकी बहुत-सी सेना इकट्ठी कर लायेगा॥ ७-८॥","meaning_covers":[7,8]},{"id":"10.50.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/9/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतदर्थोऽवतारोऽयं भूभारहरणाय मे।","संरक्षणाय साधूनां कृतोऽन्येषां वधाय च॥ ९"],"iast":["etadartho'vatāro'yaṃ bhūbhāraharaṇāya me|","saṃrakṣaṇāya sādhūnāṃ kṛto'nyeṣāṃ vadhāya ca|| 9"],"meaning":"मेरे अवतारका यही प्रयोजन है कि मैं पृथ्वीका बोझ हलका कर दूँ, साधु-सज्जनोंकी रक्षा करूँ और दुष्ट-दुर्जनोंका संहार॥ ९॥"},{"id":"10.50.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/10/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्योऽपि धर्मरक्षायै देहः संभ्रियते मया।","विरामायाप्यधर्मस्य काले प्रभवतः क्‍वचित्॥ १०"],"iast":["anyo'pi dharmarakṣāyai dehaḥ saṃbhriyate mayā|","virāmāyāpyadharmasya kāle prabhavataḥ kvacit|| 10"],"meaning":"समय-समयपर धर्म-रक्षाके लिये और बढ़ते हुए अधर्मको रोकनेके लिये मैं और भी अनेकों शरीर ग्रहण करता हूँ॥ १०॥"},{"id":"10.50.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/11/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं ध्यायति गोविन्द आकाशात् सूर्यवर्चसौ।","रथावुपस्थितौ सद्यः ससूतौ सपरिच्छदौ॥ ११"],"iast":["evaṃ dhyāyati govinda ākāśāt sūryavarcasau|","rathāvupasthitau sadyaḥ sasūtau saparicchadau|| 11"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि आकाशसे सूर्यके समान चमकते हुए दो रथ आ पहुँचे। उनमें युद्धकी सारी सामग्रियाँ सुसज्जित थीं और दो सारथि उन्हें हाँक रहे थे॥ ११॥"},{"id":"10.50.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/12/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आयुधानि च दिव्यानि पुराणानि यदृच्छया।","दृष्ट्वा तानि हृषीकेशः संकर्षणमथाब्रवीत्॥ १२"],"iast":["āyudhāni ca divyāni purāṇāni yadṛcchayā|","dṛṣṭvā tāni hṛṣīkeśaḥ saṃkarṣaṇamathābravīt|| 12"],"meaning":"इसी समय भगवान्‌के दिव्य और सनातन आयुध भी अपने-आप वहाँ आकर उपस्थित हो गये। उन्हें देखकर भगवान् श्रीकृष्णने अपने बड़े भाई बलरामजीसे कहा—॥ १२॥"},{"id":"10.50.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/13/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पश्यार्य व्यसनं प्राप्तं यदूनां त्वावतां प्रभो।","एष ते रथ आयातो दयितान्यायुधानि च॥ १३"],"iast":["paśyārya vyasanaṃ prāptaṃ yadūnāṃ tvāvatāṃ prabho|","eṣa te ratha āyāto dayitānyāyudhāni ca|| 13"],"meaning":"‘भाईजी! आप बड़े शक्तिशाली हैं। इस समय जो यदुवंशी आपको ही अपना स्वामी और रक्षक मानते हैं, जो आपसे ही सनाथ हैं, उनपर बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़ी है। देखिये, यह आपका रथ है और आपके प्यारे आयुध हल-मूसल भी आ पहुँचे हैं॥ १३॥"},{"id":"10.50.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/14/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यानमास्थाय जह्येतद् व्यसनात् स्वान् समुद्धर।","एतदर्थं हि नौ जन्म साधूनामीश शर्मकृत्॥ १४"],"iast":["yānamāsthāya jahyetad vyasanāt svān samuddhara|","etadarthaṃ hi nau janma sādhūnāmīśa śarmakṛt|| 14"],"meaning":"अब आप इस रथपर सवार होकर शत्रु-सेनाका संहार कीजिये और अपने स्वजनोंको इस विपत्तिसे बचाइये। भगवन्! साधुओंका कल्याण करनेके लिये ही हम दोनोंने अवतार ग्रहण किया है॥ १४॥"},{"id":"10.50.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/15/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्रयोविंशत्यनीकाख्यं भूमेर्भारमपाकुरु।","एवं सम्मन्त्र्य दाशार्हौ दंशितौ रथिनौ पुरात्॥ १५"],"iast":["trayoviṃśatyanīkākhyaṃ bhūmerbhāramapākuru|","evaṃ sammantrya dāśārhau daṃśitau rathinau purāt|| 15"],"meaning":"अतः अब आप यह तेईस अक्षौहिणी सेना, पृथ्वीका यह विपुल भार नष्ट कीजिये।’ भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने यह सलाह करके कवच धारण किये और रथपर सवार होकर वे मथुरासे निकले। उस समय दोनों भाई अपने-अपने आयुध लिये हुए थे और छोटी-सी सेना उनके साथ-साथ चल रही थी। श्रीकृष्णका रथ हाँक रहा था दारुक। पुरीसे बाहर निकलकर उन्होंने अपना पांचजन्य शंख बजाया॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"10.50.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/16/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निर्जग्मतुः स्वायुधाढ्यौ बलेनाल्पीयसाऽऽवृतौ।","शंखं दध्मौ विनिर्गत्य हरिर्दारुकसारथिः॥ १६"],"iast":["nirjagmatuḥ svāyudhāḍhyau balenālpīyasā''vṛtau|","śaṃkhaṃ dadhmau vinirgatya harirdārukasārathiḥ|| 16"],"meaning":"अतः अब आप यह तेईस अक्षौहिणी सेना, पृथ्वीका यह विपुल भार नष्ट कीजिये।’ भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने यह सलाह करके कवच धारण किये और रथपर सवार होकर वे मथुरासे निकले। उस समय दोनों भाई अपने-अपने आयुध लिये हुए थे और छोटी-सी सेना उनके साथ-साथ चल रही थी। श्रीकृष्णका रथ हाँक रहा था दारुक। पुरीसे बाहर निकलकर उन्होंने अपना पांचजन्य शंख बजाया॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"10.50.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/17/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽभूत् परसैन्यानां हृदि वित्रासवेपथुः।","तावाह मागधो वीक्ष्य हे कृष्ण पुरुषाधम॥ १७"],"iast":["tato'bhūt parasainyānāṃ hṛdi vitrāsavepathuḥ|","tāvāha māgadho vīkṣya he kṛṣṇa puruṣādhama|| 17"],"meaning":"उनके शंखकी भयंकर ध्वनि सुनकर शत्रुपक्षकी सेनाके वीरोंका हृदय डरके मारे थर्रा उठा। उन्हें देखकर मगधराज जरासन्धने कहा—‘पुरुषाधम कृष्ण! तू तो अभी निरा बच्चा है। अकेले तेरे साथ लड़नेमें मुझे लाज लग रही है। इतने दिनोंतक तू न जाने कहाँ-कहाँ छिपा फिरता था। मन्द! तू तो अपने मामाका हत्यारा है। इसलिये मैं तेरे साथ नहीं लड़ सकता। जा, मेरे सामनेसे भाग जा॥ १७-१८॥","meaning_covers":[17,18]},{"id":"10.50.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/18/","page":446,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न त्वया योद्धुमिच्छामि बालेनैकेन लज्जया।","गुप्तेन हि त्वया मन्द न योत्स्ये याहि बन्धुहन्॥ १८"],"iast":["na tvayā yoddhumicchāmi bālenaikena lajjayā|","guptena hi tvayā manda na yotsye yāhi bandhuhan|| 18"],"meaning":"उनके शंखकी भयंकर ध्वनि सुनकर शत्रुपक्षकी सेनाके वीरोंका हृदय डरके मारे थर्रा उठा। उन्हें देखकर मगधराज जरासन्धने कहा—‘पुरुषाधम कृष्ण! तू तो अभी निरा बच्चा है। अकेले तेरे साथ लड़नेमें मुझे लाज लग रही है। इतने दिनोंतक तू न जाने कहाँ-कहाँ छिपा फिरता था। मन्द! तू तो अपने मामाका हत्यारा है। इसलिये मैं तेरे साथ नहीं लड़ सकता। जा, मेरे सामनेसे भाग जा॥ १७-१८॥","meaning_covers":[17,18]},{"id":"10.50.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/19/","page":447,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तव राम यदि श्रद्धा युध्यस्व धैर्यमुद्वह।","हित्वा वा मच्छरैश्छिन्‍नं देहं स्वर्याहि मां जहि॥ १९"],"iast":["tava rāma yadi śraddhā yudhyasva dhairyamudvaha|","hitvā vā maccharaiśchinnaṃ dehaṃ svaryāhi māṃ jahi|| 19"],"meaning":"बलराम! यदि तेरे चित्तमें यह श्रद्धा हो कि युद्धमें मरनेपर स्वर्ग मिलता है तो तू आ, हिम्मत बाँधकर मुझसे लड़। मेरे बाणोंसे छिन्‍न-भिन्‍न हुए शरीरको यहाँ छोड़कर स्वर्गमें जा अथवा यदि तुझमें शक्ति हो तो मुझे ही मार डाल’॥ १९॥"},{"id":"10.50.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/20/","page":447,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न वै शूरा विकत्थन्ते दर्शयन्त्येव पौरुषम्।","न गृह्णीमो वचो राजन्‍नातुरस्य मुमूर्षतः॥ २०"],"iast":["na vai śūrā vikatthante darśayantyeva pauruṣam|","na gṛhṇīmo vaco rājannāturasya mumūrṣataḥ|| 20"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—मगधराज! जो शूरवीर होते हैं, वे तुम्हारी तरह डींग नहीं हाँकते, वे तो अपना बल-पौरुष ही दिखलाते हैं। देखो, अब तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे सिरपर नाच रही है। तुम वैसे ही अकबक कर रहे हो, जैसे मरनेके समय कोई सन्‍निपातका रोगी करे। बक लो, मैं तुम्हारी बातपर ध्यान नहीं देता॥ २०॥"},{"id":"10.50.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/21/","page":447,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जरासुतस्तावभिसृत्य माधवौ","महाबलौघेन बलीयसाऽऽवृणोत्।","ससैन्ययानध्वजवाजिसारथी","सूर्यानलौ वायुरिवाभ्ररेणुभिः॥ २१"],"iast":["jarāsutastāvabhisṛtya mādhavau","mahābalaughena balīyasā''vṛṇot|","sasainyayānadhvajavājisārathī","sūryānalau vāyurivābhrareṇubhiḥ|| 21"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जैसे वायु बादलोंसे सूर्यको और धूएँसे आगको ढक लेती है, किन्तु वास्तवमें वे ढकते नहीं, उनका प्रकाश फिर फैलता ही है; वैसे ही मगधराज जरासन्धने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामके सामने आकर अपनी बहुत बड़ी बलवान् और अपार सेनाके द्वारा उन्हें चारों ओरसे घेर लिया—यहाँतक कि उनकी सेना, रथ, ध्वजा, घोड़ों और सारथियोंका दीखना भी बंद हो गया॥ २१॥"},{"id":"10.50.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/22/","page":447,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुपर्णतालध्वजचिह्नितौ रथा-","वलक्षयन्त्यो हरिरामयोर्मृधे।","स्त्रियः पुराट्टालकहर्म्यगोपुरं","समाश्रिताः संमुमुहुः शुचार्दिताः॥ २२"],"iast":["suparṇatāladhvajacihnitau rathā-","valakṣayantyo harirāmayormṛdhe|","striyaḥ purāṭṭālakaharmyagopuraṃ","samāśritāḥ saṃmumuhuḥ śucārditāḥ|| 22"],"meaning":"मथुरापुरीकी स्त्रियाँ अपने महलोंकी अटारियों, छज्जों और फाटकोंपर चढ़कर युद्धका कौतुक देख रही थीं। जब उन्होंने देखा कि युद्धभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णकी गरुड़चिह्नसे चिह्नित और बलरामजीकी तालचिह्नसे चिह्नित ध्वजावाले रथ नहीं दीख रहे हैं, तब वे शोकके आवेगसे मूर्च्छित हो गयीं॥ २२॥"},{"id":"10.50.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/23/","page":447,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हरिः परानीकपयोमुचां मुहुः","शिलीमुखात्युल्बणवर्षपीडितम् ।","स्वसैन्यमालोक्य सुरासुरार्चितं","व्यस्फूर्जयच्छार्ङ्गशरासनोत्तमम् ॥ २३"],"iast":["hariḥ parānīkapayomucāṃ muhuḥ","śilīmukhātyulbaṇavarṣapīḍitam |","svasainyamālokya surāsurārcitaṃ","vyasphūrjayacchārṅgaśarāsanottamam || 23"],"meaning":"जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि शत्रु-सेनाके वीर हमारी सेनापर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा कर रहे हैं, मानो बादल पानीकी अनगिनत बूँदें बरसा रहे हों और हमारी सेना उससे अत्यन्त पीड़ित, व्यथित हो रही है; तब उन्होंने अपने देवता और असुर—दोनोंसे सम्मानित शार्ङ्गधनुषका टंकार किया॥ २३॥"},{"id":"10.50.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/24/","page":447,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गृह्णन् निषंगादथ सन्दधच्छरान्","विकृष्य मुञ्चञ्छितबाणपूगान्।","निघ्नन् रथान् कुंजरवाजिपत्तीन्","निरन्तरं यद्वदलातचक्रम्॥ २४"],"iast":["gṛhṇan niṣaṃgādatha sandadhaccharān","vikṛṣya muñcañchitabāṇapūgān|","nighnan rathān kuṃjaravājipattīn","nirantaraṃ yadvadalātacakram|| 24"],"meaning":"इसके बाद वे तरकसमेंसे बाण निकालने, उन्हें धनुषपर चढ़ाने और धनुषकी डोरी खींचकर झुंड-के-झुंड बाण छोड़ने लगे। उस समय उनका वह धनुष इतनी फुर्तीसे घूम रहा था, मानो कोई बड़े वेगसे अलातचक्र (लुकारी) घुमा रहा हो। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण जरासन्धकी चतुरंगिणी—हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेनाका संहार करने लगे॥ २४॥"},{"id":"10.50.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/25/","page":448,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निर्भिन्‍नकुम्भाः करिणो निपेतु-","रनेकशोऽश्‍वा शरवृक्णकन्धराः।","रथा हताश्‍वध्वजसूतनायकाः","पदातयश्छिन्‍नभुजोरुकन्धराः ॥ २५"],"iast":["nirbhinnakumbhāḥ kariṇo nipetu-","ranekaśo'śvā śaravṛkṇakandharāḥ|","rathā hatāśvadhvajasūtanāyakāḥ","padātayaśchinnabhujorukandharāḥ || 25"],"meaning":"इससे बहुत-से हाथियोंके सिर फट गये और वे मर-मरकर गिरने लगे। बाणोंकी बौछारसे अनेकों घोड़ोंके सिर धड़से अलग हो गये। घोड़े, ध्वजा, सारथि और रथियोंके नष्ट हो जानेसे बहुत-से रथ बेकाम हो गये। पैदल सेनाकी बाँहें, जाँघ और सिर आदि अंग-प्रत्यंग कट-कटकर गिर पड़े॥ २५॥"},{"id":"10.50.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/26/","page":448,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["संछिद्यमानद्विपदेभवाजिना-","मंगप्रसूताः शतशोऽसृगापगाः।","भुजाहयः पूरुषशीर्षकच्छपा","हतद्विपद्वीपहयग्रहाकुलाः ॥ २६"],"iast":["saṃchidyamānadvipadebhavājinā-","maṃgaprasūtāḥ śataśo'sṛgāpagāḥ|","bhujāhayaḥ pūruṣaśīrṣakacchapā","hatadvipadvīpahayagrahākulāḥ || 26"],"meaning":"उस युद्धमें अपार तेजस्वी भगवान् बलरामजीने अपने मूसलकी चोटसे बहुत-से मतवाले शत्रुओंको मार-मारकर उनके अंग-प्रत्यंगसे निकले हुए खूनकी सैकड़ों नदियाँ बहा दीं। कहीं मनुष्य कट रहे हैं तो कहीं हाथी और घोड़े छटपटा रहे हैं। उन नदियोंमें मनुष्योंकी भुजाएँ साँपके समान जान पड़तीं और सिर इस प्रकार मालूम पड़ते, मानो कछुओंकी भीड़ लग गयी हो। मरे हुए हाथी द्वीप-जैसे और घोड़े ग्राहोंके समान जान पड़ते। हाथ और जाँघें मछलियोंकी तरह, मनुष्योंके केश सेवारके समान, धनुष तरंगोंकी भाँति और अस्त्र-शस्त्र लता एवं तिनकोंके समान जान पड़ते। ढालें ऐसी मालूम पड़तीं, मानो भयानक भँवर हों। बहुमूल्य मणियाँ और आभूषण पत्थरके रोड़ों तथा कंकड़ोंके समान बहे जा रहे थे। उन नदियोंको देखकर कायर पुरुष डर रहे थे और वीरोंका आपसमें खूब उत्साह बढ़ रहा था॥ २६—२८॥","meaning_covers":[26,28]},{"id":"10.50.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/27/","page":448,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["करोरुमीना नरकेशशैवला","धनुस्तरंगायुधगुल्मसंकुलाः ।","अच्छूरिकावर्तभयानका महा-","मणिप्रवेकाभरणाश्मशर्कराः ॥ २७"],"iast":["karorumīnā narakeśaśaivalā","dhanustaraṃgāyudhagulmasaṃkulāḥ |","acchūrikāvartabhayānakā mahā-","maṇipravekābharaṇāśmaśarkarāḥ || 27"],"meaning":"उस युद्धमें अपार तेजस्वी भगवान् बलरामजीने अपने मूसलकी चोटसे बहुत-से मतवाले शत्रुओंको मार-मारकर उनके अंग-प्रत्यंगसे निकले हुए खूनकी सैकड़ों नदियाँ बहा दीं। कहीं मनुष्य कट रहे हैं तो कहीं हाथी और घोड़े छटपटा रहे हैं। उन नदियोंमें मनुष्योंकी भुजाएँ साँपके समान जान पड़तीं और सिर इस प्रकार मालूम पड़ते, मानो कछुओंकी भीड़ लग गयी हो। मरे हुए हाथी द्वीप-जैसे और घोड़े ग्राहोंके समान जान पड़ते। हाथ और जाँघें मछलियोंकी तरह, मनुष्योंके केश सेवारके समान, धनुष तरंगोंकी भाँति और अस्त्र-शस्त्र लता एवं तिनकोंके समान जान पड़ते। ढालें ऐसी मालूम पड़तीं, मानो भयानक भँवर हों। बहुमूल्य मणियाँ और आभूषण पत्थरके रोड़ों तथा कंकड़ोंके समान बहे जा रहे थे। उन नदियोंको देखकर कायर पुरुष डर रहे थे और वीरोंका आपसमें खूब उत्साह बढ़ रहा था॥ २६—२८॥","meaning_covers":[26,28]},{"id":"10.50.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/28/","page":448,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रवर्तिता भीरुभयावहा मृधे","मनस्विनां हर्षकरीः परस्परम्।","विनिघ्नतारीन् मुसलेन दुर्मदान्","संकर्षणेनापरिमेयतेजसा ॥ २८"],"iast":["pravartitā bhīrubhayāvahā mṛdhe","manasvināṃ harṣakarīḥ parasparam|","vinighnatārīn musalena durmadān","saṃkarṣaṇenāparimeyatejasā || 28"],"meaning":"उस युद्धमें अपार तेजस्वी भगवान् बलरामजीने अपने मूसलकी चोटसे बहुत-से मतवाले शत्रुओंको मार-मारकर उनके अंग-प्रत्यंगसे निकले हुए खूनकी सैकड़ों नदियाँ बहा दीं। कहीं मनुष्य कट रहे हैं तो कहीं हाथी और घोड़े छटपटा रहे हैं। उन नदियोंमें मनुष्योंकी भुजाएँ साँपके समान जान पड़तीं और सिर इस प्रकार मालूम पड़ते, मानो कछुओंकी भीड़ लग गयी हो। मरे हुए हाथी द्वीप-जैसे और घोड़े ग्राहोंके समान जान पड़ते। हाथ और जाँघें मछलियोंकी तरह, मनुष्योंके केश सेवारके समान, धनुष तरंगोंकी भाँति और अस्त्र-शस्त्र लता एवं तिनकोंके समान जान पड़ते। ढालें ऐसी मालूम पड़तीं, मानो भयानक भँवर हों। बहुमूल्य मणियाँ और आभूषण पत्थरके रोड़ों तथा कंकड़ोंके समान बहे जा रहे थे। उन नदियोंको देखकर कायर पुरुष डर रहे थे और वीरोंका आपसमें खूब उत्साह बढ़ रहा था॥ २६—२८॥","meaning_covers":[26,28]},{"id":"10.50.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/29/","page":448,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बलं तदंगार्णवदुर्गभैरवं","दुरन्तपारं मगधेन्द्रपालितम्।","क्षयं प्रणीतं वसुदेवपुत्रयो-","र्विक्रीडितं तज्जगदीशयोः परम्॥ २९"],"iast":["balaṃ tadaṃgārṇavadurgabhairavaṃ","durantapāraṃ magadhendrapālitam|","kṣayaṃ praṇītaṃ vasudevaputrayo-","rvikrīḍitaṃ tajjagadīśayoḥ param|| 29"],"meaning":"परीक्षित्! जरासन्धकी वह सेना समुद्रके समान दुर्गम, भयावह और बड़ी कठिनाईसे जीतनेयोग्य थी। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने थोड़े ही समयमें उसे नष्ट कर डाला। वे सारे जगत‍्के स्वामी हैं। उनके लिये एक सेनाका नाश कर देना केवल खिलवाड़ ही तो है॥ २९॥"},{"id":"10.50.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/30/","page":448,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्थित्युद्भवान्तं भुवनत्रयस्य यः","समीहतेऽनन्तगुणः स्वलीलया।","न तस्य चित्रं परपक्षनिग्रह-","स्तथापि मर्त्यानुविधस्य वर्ण्यते॥ ३०"],"iast":["sthityudbhavāntaṃ bhuvanatrayasya yaḥ","samīhate'nantaguṇaḥ svalīlayā|","na tasya citraṃ parapakṣanigraha-","stathāpi martyānuvidhasya varṇyate|| 30"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌के गुण अनन्त हैं। वे खेल-खेलमें ही तीनों लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है कि वे शत्रुओंकी सेनाका इस प्रकार बात-की-बातमें सत्यानाश कर दें। तथापि जब वे मनुष्यका-सा वेष धारण करके मनुष्यकी-सी लीला करते हैं, तब उसका भी वर्णन किया ही जाता है॥ ३०॥"},{"id":"10.50.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/31/","page":449,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जग्राह विरथं रामो जरासन्धं महाबलम्।","हतानीकावशिष्टासुं सिंहः सिंहमिवौजसा॥ ३१"],"iast":["jagrāha virathaṃ rāmo jarāsandhaṃ mahābalam|","hatānīkāvaśiṣṭāsuṃ siṃhaḥ siṃhamivaujasā|| 31"],"meaning":"इस प्रकार जरासन्धकी सारी सेना मारी गयी। रथ भी टूट गया। शरीरमें केवल प्राण बाकी रहे। तब भगवान् श्रीबलरामजीने जैसे एक सिंह दूसरे सिंहको पकड़ लेता है, वैसे ही बलपूर्वक महाबली जरासन्धको पकड़ लिया॥ ३१॥"},{"id":"10.50.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/32/","page":449,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बध्यमानं हतारातिं पाशैर्वारुणमानुषैः।","वारयामास गोविन्दस्तेन कार्यचिकीर्षया॥ ३२"],"iast":["badhyamānaṃ hatārātiṃ pāśairvāruṇamānuṣaiḥ|","vārayāmāsa govindastena kāryacikīrṣayā|| 32"],"meaning":"जरासन्धने पहले बहुत-से विपक्षी नरपतियोंका वध किया था, परन्तु आज उसे बलरामजी वरुणकी फाँसी और मनुष्योंके फंदेसे बाँध रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने यह सोचकर कि यह छोड़ दिया जायगा तो और भी सेना इकट्ठी करके लायेगा तथा हम सहज ही पृथ्वीका भार उतार सकेंगे, बलरामजीको रोक दिया॥ ३२॥"},{"id":"10.50.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/33/","page":449,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स मुक्तो लोकनाथाभ्यां व्रीडितो वीरसंमतः।","तपसे कृतसंकल्पो वारितः पथि राजभिः॥ ३३"],"iast":["sa mukto lokanāthābhyāṃ vrīḍito vīrasaṃmataḥ|","tapase kṛtasaṃkalpo vāritaḥ pathi rājabhiḥ|| 33"],"meaning":"बड़े-बड़े शूरवीर जरासन्धका सम्मान करते थे। इसलिये उसे इस बातपर बड़ी लज्जा मालूम हुई कि मुझे श्रीकृष्ण और बलरामने दया करके दीनकी भाँति छोड़ दिया है। अब उसने तपस्या करनेका निश्‍चय किया। परन्तु रास्तेमें उसके साथी नरपतियोंने बहुत समझाया कि ‘राजन्! यदुवंशियोंमें क्या रखा है? वे आपको बिलकुल ही पराजित नहीं कर सकते थे। आपको प्रारब्धवश ही नीचा देखना पड़ा है।’ उन लोगोंने भगवान्‌की इच्छा, फिर विजय प्राप्त करनेकी आशा आदि बतलाकर तथा लौकिक दृष्टान्त एवं युक्तियाँ दे-देकर यह बात समझा दी कि आपको तपस्या नहीं करनी चाहिये॥ ३३-३४॥","meaning_covers":[33,34]},{"id":"10.50.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/34/","page":449,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वाक्यैः पवित्रार्थपदैर्नयनैः प्राकृतैरपि।","स्वकर्मबन्धप्राप्तोऽयं यदुभिस्ते पराभवः॥ ३४"],"iast":["vākyaiḥ pavitrārthapadairnayanaiḥ prākṛtairapi|","svakarmabandhaprāpto'yaṃ yadubhiste parābhavaḥ|| 34"],"meaning":"बड़े-बड़े शूरवीर जरासन्धका सम्मान करते थे। इसलिये उसे इस बातपर बड़ी लज्जा मालूम हुई कि मुझे श्रीकृष्ण और बलरामने दया करके दीनकी भाँति छोड़ दिया है। अब उसने तपस्या करनेका निश्‍चय किया। परन्तु रास्तेमें उसके साथी नरपतियोंने बहुत समझाया कि ‘राजन्! यदुवंशियोंमें क्या रखा है? वे आपको बिलकुल ही पराजित नहीं कर सकते थे। आपको प्रारब्धवश ही नीचा देखना पड़ा है।’ उन लोगोंने भगवान्‌की इच्छा, फिर विजय प्राप्त करनेकी आशा आदि बतलाकर तथा लौकिक दृष्टान्त एवं युक्तियाँ दे-देकर यह बात समझा दी कि आपको तपस्या नहीं करनी चाहिये॥ ३३-३४॥","meaning_covers":[33,34]},{"id":"10.50.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/35/","page":449,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हतेषु सर्वानीकेषु नृपो बार्हद्रथस्तदा।","उपेक्षितो भगवता मगधान् दुर्मना ययौ॥ ३५"],"iast":["hateṣu sarvānīkeṣu nṛpo bārhadrathastadā|","upekṣito bhagavatā magadhān durmanā yayau|| 35"],"meaning":"परीक्षित्! उस समय मगधराज जरासन्धकी सारी सेना मर चुकी थी। भगवान् बलरामजीने उपेक्षापूर्वक उसे छोड़ दिया था, इससे वह बहुत उदास होकर अपने देश मगधको चला गया॥ ३५॥"},{"id":"10.50.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/36/","page":449,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मुकुन्दोऽप्यक्षतबलो निस्तीर्णारिबलार्णवः।","विकीर्यमाणः कुसुमैस्त्रिदशैरनुमोदितः॥ ३६"],"iast":["mukundo'pyakṣatabalo nistīrṇāribalārṇavaḥ|","vikīryamāṇaḥ kusumaistridaśairanumoditaḥ|| 36"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णकी सेनामें किसीका बाल भी बाँका न हुआ और उन्होंने जरासन्धकी तेईस अक्षौहिणी सेनापर, जो समुद्रके समान थी, सहज ही विजय प्राप्त कर ली। उस समय बड़े-बड़े देवता उनपर नन्दनवनके पुष्पोंकी वर्षा और उनके इस महान् कार्यका अनुमोदन—प्रशंसा कर रहे थे॥ ३६॥"},{"id":"10.50.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/37/","page":449,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["माथुरैरुपसंगम्य विज्वरैर्मुदितात्मभिः।","उपगीयमानविजयः सूतमागधवन्दिभिः॥ ३७"],"iast":["māthurairupasaṃgamya vijvarairmuditātmabhiḥ|","upagīyamānavijayaḥ sūtamāgadhavandibhiḥ|| 37"],"meaning":"जरासन्धकी सेनाके पराजयसे मथुरावासी भयरहित हो गये थे और भगवान् श्रीकृष्णकी विजयसे उनका हृदय आनन्दसे भर रहा था। भगवान् श्रीकृष्ण आकर उनमें मिल गये। सूत, मागध और वन्दीजन उनकी विजयके गीत गा रहे थे॥ ३७॥"},{"id":"10.50.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/38/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शंखदुन्दुभयो नेदुर्भेरीतूर्याण्यनेकशः।","वीणावेणुमृदंगानि पुरं प्रविशति प्रभौ॥ ३८"],"iast":["śaṃkhadundubhayo nedurbherītūryāṇyanekaśaḥ|","vīṇāveṇumṛdaṃgāni puraṃ praviśati prabhau|| 38"],"meaning":"जिस समय भगवान् श्रीकृष्णने नगरमें प्रवेश किया, उस समय वहाँ शंख, नगारे, भेरी, तुरही, वीणा, बाँसुरी और मृदंग आदि बाजे बजने लगे थे॥ ३८॥"},{"id":"10.50.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/39/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सिक्तमार्गां हृष्टजनां पताकाभिरलंकृताम्।","निर्घुष्टां ब्रह्मघोषेण कौतुकाबद्धतोरणाम्॥ ३९"],"iast":["siktamārgāṃ hṛṣṭajanāṃ patākābhiralaṃkṛtām|","nirghuṣṭāṃ brahmaghoṣeṇa kautukābaddhatoraṇām|| 39"],"meaning":"मथुराकी एक-एक सड़क और गलीमें छिड़काव कर दिया गया था। चारों ओर हँसते-खेलते नागरिकोंकी चहल-पहल थी। सारा नगर छोटी-छोटी झंडियों और बड़ी-बड़ी विजय-पताकाओंसे सजा दिया गया था। ब्राह्मणोंकी वेदध्वनि गूँज रही थी और सब ओर आनन्दोत्सवके सूचक बंदनवार बाँध दिये गये थे॥ ३९॥"},{"id":"10.50.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/40/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निचीयमानो नारीभिर्माल्यदध्यक्षतांकुरैः।","निरीक्ष्यमाणः सस्नेहं प्रीत्युत्कलितलोचनैः॥ ४०"],"iast":["nicīyamāno nārībhirmālyadadhyakṣatāṃkuraiḥ|","nirīkṣyamāṇaḥ sasnehaṃ prītyutkalitalocanaiḥ|| 40"],"meaning":"जिस समय श्रीकृष्ण नगरमें प्रवेश कर रहे थे, उस समय नगरकी नारियाँ प्रेम और उत्कण्ठासे भरे हुए नेत्रोंसे उन्हें स्नेहपूर्वक निहार रही थीं और फूलोंके हार, दही, अक्षत और जौ आदिके अंकुरोंकी उनके ऊपर वर्षा कर रही थीं॥ ४०॥"},{"id":"10.50.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/41/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आयोधनगतं वित्तमनन्तं वीरभूषणम्।","यदुराजाय तत् सर्वमाहृतं प्रादिशत्प्रभुः॥ ४१"],"iast":["āyodhanagataṃ vittamanantaṃ vīrabhūṣaṇam|","yadurājāya tat sarvamāhṛtaṃ prādiśatprabhuḥ|| 41"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण रणभूमिसे अपार धन और वीरोंके आभूषण ले आये थे। वह सब उन्होंने यदुवंशियोंके राजा उग्रसेनके पास भेज दिया॥ ४१॥"},{"id":"10.50.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/42/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं सप्तदशकृत्वस्तावत्यक्षौहिणीबलः।","युयुधे मागधो राजा यदुभिः कृष्णपालितैः॥ ४२"],"iast":["evaṃ saptadaśakṛtvastāvatyakṣauhiṇībalaḥ|","yuyudhe māgadho rājā yadubhiḥ kṛṣṇapālitaiḥ|| 42"],"meaning":"परीक्षित्! इस प्रकार सत्रह बार तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके मगधराज जरासन्धने भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित यदुवंशियोंसे युद्ध किया॥ ४२॥"},{"id":"10.50.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/43/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अक्षिण्वंस्तद्बलं सर्वं वृष्णयः कृष्णतेजसा।","हतेषु स्वेष्वनीकेषु त्यक्तोऽयादरिभिर्नृपः॥ ४३"],"iast":["akṣiṇvaṃstadbalaṃ sarvaṃ vṛṣṇayaḥ kṛṣṇatejasā|","hateṣu sveṣvanīkeṣu tyakto'yādaribhirnṛpaḥ|| 43"],"meaning":"किन्तु यादवोंने भगवान् श्रीकृष्णकी शक्तिसे हर बार उसकी सारी सेना नष्ट कर दी। जब सारी सेना नष्ट हो जाती, तब यदुवंशियोंके उपेक्षापूर्वक छोड़ देनेपर जरासन्ध अपनी राजधानीमें लौट जाता॥ ४३॥"},{"id":"10.50.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/44/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अष्टादशमसंग्रामे आगामिनि तदन्तरा।","नारदप्रेषितो वीरो यवनः प्रत्यदृश्यत॥ ४४"],"iast":["aṣṭādaśamasaṃgrāme āgāmini tadantarā|","nāradapreṣito vīro yavanaḥ pratyadṛśyata|| 44"],"meaning":"जिस समय अठारहवाँ संग्राम छिड़नेहीवाला था, उसी समय नारदजीका भेजा हुआ वीर कालयवन दिखायी पड़ा॥ ४४॥"},{"id":"10.50.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/45/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रुरोध मथुरामेत्य तिसृभिर्म्लेच्छकोटिभिः।","नृलोके चाप्रतिद्वन्द्वो वृष्णीञ्छ्रुत्वाऽऽत्मसम्मितान्॥ ४५"],"iast":["rurodha mathurāmetya tisṛbhirmlecchakoṭibhiḥ|","nṛloke cāpratidvandvo vṛṣṇīñchrutvā''tmasammitān|| 45"],"meaning":"युद्धमें कालयवनके सामने खड़ा होनेवाला वीर संसारमें दूसरा कोई न था। उसने जब यह सुना कि यदुवंशी हमारे ही-जैसे बलवान् हैं और हमारा सामना कर सकते हैं, तब तीन करोड़ म्लेच्छोंकी सेना लेकर उसने मथुराको घेर लिया॥ ४५॥"},{"id":"10.50.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/46/","page":450,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं दृष्ट्वाचिन्तयत् कृष्णः संकर्षणसहायवान्।","अहो यदूनां वृजिनं प्राप्तं ह्युभयतो महत्॥ ४६"],"iast":["taṃ dṛṣṭvācintayat kṛṣṇaḥ saṃkarṣaṇasahāyavān|","aho yadūnāṃ vṛjinaṃ prāptaṃ hyubhayato mahat|| 46"],"meaning":"कालयवनकी यह असमय चढ़ाई देखकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ मिलकर विचार किया— ‘अहो! इस समय तो यदुवंशियोंपर जरासन्ध और कालयवन—ये दो-दो विपत्तियाँ एक साथ ही मँडरा रही हैं॥ ४६॥"},{"id":"10.50.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/47/","page":451,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यवनोऽयं निरुन्धेऽस्मानद्य तावन्महाबलः।","मागधोऽप्यद्य वा श्‍वो वा परश्‍वो वाऽऽगमिष्यति॥ ४७"],"iast":["yavano'yaṃ nirundhe'smānadya tāvanmahābalaḥ|","māgadho'pyadya vā śvo vā paraśvo vā''gamiṣyati|| 47"],"meaning":"आज इस परम बलशाली यवनने हमें आकर घेर लिया है और जरासन्ध भी आज, कल या परसोंमें आ ही जायेगा॥ ४७॥"},{"id":"10.50.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/48/","page":451,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आवयोर्युध्यतोरस्य यद्यागन्ता जरासुतः।","बन्धून् वधिष्यत्यथवा नेष्यते स्वपुरं बली॥ ४८"],"iast":["āvayoryudhyatorasya yadyāgantā jarāsutaḥ|","bandhūn vadhiṣyatyathavā neṣyate svapuraṃ balī|| 48"],"meaning":"यदि हम दोनों भाई इसके साथ लड़नेमें लग गये और उसी समय जरासन्ध भी आ पहुँचा, तो वह हमारे बन्धुओंको मार डालेगा या तो कैद करके अपने नगरमें ले जायगा; क्योंकि वह बहुत बलवान् है॥ ४८॥"},{"id":"10.50.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/49/","page":451,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मादद्य विधास्यामो दुर्गं द्विपददुर्गमम्।","तत्र ज्ञातीन् समाधाय यवनं घातयामहे॥ ४९"],"iast":["tasmādadya vidhāsyāmo durgaṃ dvipadadurgamam|","tatra jñātīn samādhāya yavanaṃ ghātayāmahe|| 49"],"meaning":"इसलिये आज हमलोग एक ऐसा दुर्ग—ऐसा किला बनायेंगे, जिसमें किसी भी मनुष्यका प्रवेश करना अत्यन्त कठिन होगा। अपने स्वजन-सम्बन्धियोंको उसी किलेमें पहुँचाकर फिर इस यवनका वध करायेंगे’॥ ४९॥"},{"id":"10.50.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/50/","page":451,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति सम्मन्त्र्य भगवान् दुर्गं द्वादशयोजनम्।","अन्तःसमुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत्॥ ५०"],"iast":["iti sammantrya bhagavān durgaṃ dvādaśayojanam|","antaḥsamudre nagaraṃ kṛtsnādbhutamacīkarat|| 50"],"meaning":"बलरामजीसे इस प्रकार सलाह करके भगवान् श्रीकृष्णने समुद्रके भीतर एक ऐसा दुर्गम नगर बनवाया, जिसमें सभी वस्तुएँ अद्भुत थीं और उस नगरकी लम्बाई-चौड़ाई अड़तालीस कोसकी थी॥ ५०॥"},{"id":"10.50.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/51/","page":451,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृश्यते यत्र हि त्वाष्ट्रं विज्ञानं शिल्पनैपुणम्।","रथ्याचत्वरवीथीभिर्यथावास्तु विनिर्मितम्॥ ५१"],"iast":["dṛśyate yatra hi tvāṣṭraṃ vijñānaṃ śilpanaipuṇam|","rathyācatvaravīthībhiryathāvāstu vinirmitam|| 51"],"meaning":"उस नगरकी एक-एक वस्तुमें विश्‍वकर्माका विज्ञान (वास्तु-विज्ञान) और शिल्पकलाकी निपुणता प्रकट होती थी। उसमें वास्तुशास्त्रके अनुसार बड़ी-बड़ी सड़कों, चौराहों और गलियोंका यथास्थान ठीक-ठीक विभाजन किया गया था॥ ५१॥"},{"id":"10.50.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/52/","page":451,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुरद्रुमलतोद्यानविचित्रोपवनान्वितम् ।","हेमशृङ्गैर्दिविस्पृग्भिः स्फाटिकाट्टालगोपुरैः॥ ५२"],"iast":["suradrumalatodyānavicitropavanānvitam |","hemaśṛṅgairdivispṛgbhiḥ sphāṭikāṭṭālagopuraiḥ|| 52"],"meaning":"वह नगर ऐसे सुन्दर-सुन्दर उद्यानों और विचित्र-विचित्र उपवनोंसे युक्त था, जिनमें देवताओंके वृक्ष और लताएँ लहलहाती रहती थीं। सोनेके इतने ऊँचे-ऊँचे शिखर थे, जो आकाशसे बातें करते थे। स्फटिकमणिकी अटारियाँ और ऊँचे-ऊँचे दरवाजे बड़े ही सुन्दर लगते थे॥ ५२॥"},{"id":"10.50.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/53/","page":451,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजतारकुटैः कोष्ठैर्हेमकुम्भैरलंकृतैः।","रत्‍नकूटैर्गृहैर्हैमैर्महामरकतस्थलैः ॥ ५३"],"iast":["rājatārakuṭaiḥ koṣṭhairhemakumbhairalaṃkṛtaiḥ|","ratnakūṭairgṛhairhaimairmahāmarakatasthalaiḥ || 53"],"meaning":"अन्‍न रखनेके लिये चाँदी और पीतलके बहुत-से कोठे बने हुए थे। वहाँके महल सोनेके बने हुए थे और उनपर कामदार सोनेके कलश सजे हुए थे। उनके शिखर रत्‍नोंके थे तथा गच पन्‍नेकी बनी हुई बहुत भली मालूम होती थी॥ ५३॥"},{"id":"10.50.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/54/","page":451,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वास्तोष्पतीनां च गृहैर्वलभीभिश्‍च निर्मितम्।","चातुर्वर्ण्यजनाकीर्णं यदुदेवगृहोल्लसत्॥ ५४"],"iast":["vāstoṣpatīnāṃ ca gṛhairvalabhībhiśca nirmitam|","cāturvarṇyajanākīrṇaṃ yadudevagṛhollasat|| 54"],"meaning":"इसके अतिरिक्त उस नगरमें वास्तुदेवताके मन्दिर और छज्जे भी बहुत सुन्दर-सुन्दर बने हुए थे। उसमें चारों वर्णके लोग निवास करते थे। और सबके बीचमें यदुवंशियोंके प्रधान उग्रसेनजी, वसुदेवजी, बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्णके महल जगमगा रहे थे॥ ५४॥"},{"id":"10.50.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/55/","page":452,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुधर्मां पारिजातं च महेन्द्रः प्राहिणोद्धरेः।","यत्र चावस्थितो मर्त्यो मर्त्यधर्मैर्न युज्यते॥ ५५"],"iast":["sudharmāṃ pārijātaṃ ca mahendraḥ prāhiṇoddhareḥ|","yatra cāvasthito martyo martyadharmairna yujyate|| 55"],"meaning":"परीक्षित्! उस समय देवराज इन्द्रने भगवान् श्रीकृष्णके लिये पारिजातवृक्ष और सुधर्मा-सभाको भेज दिया। वह सभा ऐसी दिव्य थी कि उसमें बैठे हुए मनुष्यको भूख-प्यास आदि मर्त्यलोकके धर्म नहीं छू पाते थे॥ ५५॥"},{"id":"10.50.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/56/","page":452,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्यामैककर्णान् वरुणो हयाञ्छुक्लान् मनोजवान्।","अष्टौ निधिपतिः कोशान् लोकपालो निजोदयान्॥ ५६"],"iast":["śyāmaikakarṇān varuṇo hayāñchuklān manojavān|","aṣṭau nidhipatiḥ kośān lokapālo nijodayān|| 56"],"meaning":"वरुणजीने ऐसे बहुत-से श्‍वेत घोड़े भेज दिये, जिनका एक-एक कान श्यामवर्णका था और जिनकी चाल मनके समान तेज थी। धनपति कुबेरजीने अपनी आठों निधियाँ भेज दीं और दूसरे लोकपालोंने भी अपनी-अपनी विभूतियाँ भगवान्‌के पास भेज दीं॥ ५६॥"},{"id":"10.50.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/57/","page":452,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यद् यद् भगवता दत्तमाधिपत्यं स्वसिद्धये।","सर्वं प्रत्यर्पयामासुर्हरौ भूमिगते नृप॥ ५७"],"iast":["yad yad bhagavatā dattamādhipatyaṃ svasiddhaye|","sarvaṃ pratyarpayāmāsurharau bhūmigate nṛpa|| 57"],"meaning":"परीक्षित्! सभी लोकपालोंको भगवान् श्रीकृष्णने ही उनके अधिकारके निर्वाहके लिये शक्तियाँ और सिद्धियाँ दी हैं। जब भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर लीला करने लगे, तब सभी सिद्धियाँ उन्होंने भगवान्‌के चरणोंमें समर्पित कर दीं॥ ५७॥"},{"id":"10.50.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/58/","page":452,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र योगप्रभावेण नीत्वा सर्वजनं हरिः।","प्रजापालेन रामेण कृष्णः समनुमन्त्रितः।","निर्जगाम पुरद्वारात् पद्ममाली निरायुधः॥ ५८"],"iast":["tatra yogaprabhāveṇa nītvā sarvajanaṃ hariḥ|","prajāpālena rāmeṇa kṛṣṇaḥ samanumantritaḥ|","nirjagāma puradvārāt padmamālī nirāyudhaḥ|| 58"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने अपने समस्त स्वजन-सम्बन्धियोंको अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाके द्वारा द्वारकामें पहुँचा दिया। शेष प्रजाकी रक्षाके लिये बलरामजीको मथुरापुरीमें रख दिया और उनसे सलाह लेकर गलेमें कमलोंकी माला पहने, बिना कोई अस्त्र-शस्त्र लिये स्वयं नगरके बड़े दरवाजेसे बाहर निकल आये॥ ५८॥"}],"text":[{"b":32951,"kind":"adhyaya_heading","page":445,"text":"अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः"},{"b":32952,"kind":"topic_heading","page":445,"text":"जरासन्धसे युद्ध और द्वारकापुरीका निर्माण"},{"b":32953,"kind":"topic_heading","page":444,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32954,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.1"],"text":"अस्तिः प्राप्तिश्‍च कंसस्य महिष्यौ भरतर्षभ।"},{"b":32955,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.1"],"text":"मृते भर्तरि दुःखार्ते ईयतुः स्म पितुर्गृहान्॥ १"},{"b":32956,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.2"],"text":"पित्रे मगधराजाय जरासन्धाय दुःखिते।"},{"b":32957,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.2"],"text":"वेदयांचक्रतुः सर्वमात्मवैधव्यकारणम्॥ २"},{"b":32958,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.3"],"text":"स तदप्रियमाकर्ण्य शोकामर्षयुतो नृप।"},{"b":32959,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.3"],"text":"अयादवीं महीं कर्तुं चक्रे परममुद्यमम्॥ ३"},{"b":32960,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.4"],"text":"अक्षौहिणीभिर्विंशत्या तिसृभिश्‍चापि संवृतः।"},{"b":32961,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.4"],"text":"यदुराजधानीं मथुरां न्यरुणत् सर्वतोदिशम्॥ ४"},{"b":32962,"kind":"hindi_commentary","page":445,"explains":["10.50.1","10.50.2","10.50.3","10.50.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भरतवंशशिरोमणि परीक्षित्! कंसकी दो रानियाँ थीं—अस्ति और प्राप्ति। पतिकी मृत्युसे उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे अपने पिताकी राजधानीमें चली गयीं॥ १॥ उन दोनोंका पिता था मगधराज जरासन्ध। उससे उन्होंने बड़े दुःखके साथ अपने विधवा होनेके कारणोंका वर्णन किया॥ २॥ परीक्षित्! यह अप्रिय समाचार सुनकर पहले तो जरासन्धको बड़ा शोक हुआ, परन्तु पीछे वह क्रोधसे तिलमिला उठा। उसने यह निश्‍चय करके कि मैं पृथ्वीपर एक भी यदुवंशी नहीं रहने दूँगा, युद्धकी बहुत बड़ी तैयारी की॥ ३॥ और तेईस अक्षौहिणी सेनाके साथ यदुवंशियोंकी राजधानी मथुराको चारों ओरसे घेर लिया॥ ४॥"},{"b":32963,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.5"],"text":"निरीक्ष्य तद्बलं कृष्ण उद्वेलमिव सागरम्।"},{"b":32964,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.5"],"text":"स्वपुरं तेन संरुद्धं स्वजनं च भयाकुलम्॥ ५"},{"b":32965,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.6"],"text":"चिन्तयामास भगवान् हरिः कारणमानुषः।"},{"b":32966,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.6"],"text":"तद्देशकालानुगुणं स्वावतारप्रयोजनम्॥ ६"},{"b":32967,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.7"],"text":"हनिष्यामि बलं ह्येतद् भुवि भारं समाहितम्।"},{"b":32968,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.7"],"text":"मागधेन समानीतं वश्यानां सर्वभूभुजाम्॥ ७"},{"b":32969,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.8"],"text":"अक्षौहिणीभिः संख्यातं भटाश्‍वरथकुंजरैः।"},{"b":32970,"kind":"sanskrit_shloka","page":445,"verses":["10.50.8"],"text":"मागधस्तु न हन्तव्यो भूयः कर्ता बलोद्यमम्॥ ८"},{"b":32971,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.9"],"text":"एतदर्थोऽवतारोऽयं भूभारहरणाय मे।"},{"b":32972,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.9"],"text":"संरक्षणाय साधूनां कृतोऽन्येषां वधाय च॥ ९"},{"b":32973,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.10"],"text":"अन्योऽपि धर्मरक्षायै देहः संभ्रियते मया।"},{"b":32974,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.10"],"text":"विरामायाप्यधर्मस्य काले प्रभवतः क्‍वचित्॥ १०"},{"b":32975,"kind":"hindi_translation","page":445,"explains":["10.50.5","10.50.6","10.50.7","10.50.8","10.50.9","10.50.10"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने देखा—जरासन्धकी सेना क्या है, उमड़ता हुआ समुद्र है। उन्होंने यह भी देखा कि उसने चारों ओरसे हमारी राजधानी घेर ली है और हमारे स्वजन तथा पुरवासी भयभीत हो रहे हैं॥ ५॥ भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही मनुष्यका-सा वेष धारण किये हुए हैं। अब उन्होंने विचार किया कि मेरे अवतारका क्या प्रयोजन है और इस समय इस स्थानपर मुझे क्या करना चाहिये॥ ६॥ उन्होंने सोचा यह बड़ा अच्छा हुआ कि मगधराज जरासन्धने अपने अधीनस्थ नरपतियोंकी पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियोंसे युक्त कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी कर ली है। यह सब तो पृथ्वीका भार ही जुटकर मेरे पास आ पहुँचा है। मैं इसका नाश करूँगा। परन्तु अभी मगधराज जरासन्धको नहीं मारना चाहिये। क्योंकि वह जीवित रहेगा तो फिरसे असुरोंकी बहुत-सी सेना इकट्ठी कर लायेगा॥ ७-८॥ मेरे अवतारका यही प्रयोजन है कि मैं पृथ्वीका बोझ हलका कर दूँ, साधु-सज्जनोंकी रक्षा करूँ और दुष्ट-दुर्जनोंका संहार॥ ९॥ समय-समयपर धर्म-रक्षाके लिये और बढ़ते हुए अधर्मको रोकनेके लिये मैं और भी अनेकों शरीर ग्रहण करता हूँ॥ १०॥"},{"b":32976,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.11"],"text":"एवं ध्यायति गोविन्द आकाशात् सूर्यवर्चसौ।"},{"b":32977,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.11"],"text":"रथावुपस्थितौ सद्यः ससूतौ सपरिच्छदौ॥ ११"},{"b":32978,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.12"],"text":"आयुधानि च दिव्यानि पुराणानि यदृच्छया।"},{"b":32979,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.12"],"text":"दृष्ट्वा तानि हृषीकेशः संकर्षणमथाब्रवीत्॥ १२"},{"b":32980,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.13"],"text":"पश्यार्य व्यसनं प्राप्तं यदूनां त्वावतां प्रभो।"},{"b":32981,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.13"],"text":"एष ते रथ आयातो दयितान्यायुधानि च॥ १३"},{"b":32982,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.14"],"text":"यानमास्थाय जह्येतद् व्यसनात् स्वान् समुद्धर।"},{"b":32983,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.14"],"text":"एतदर्थं हि नौ जन्म साधूनामीश शर्मकृत्॥ १४"},{"b":32984,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.15"],"text":"त्रयोविंशत्यनीकाख्यं भूमेर्भारमपाकुरु।"},{"b":32985,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.15"],"text":"एवं सम्मन्त्र्य दाशार्हौ दंशितौ रथिनौ पुरात्॥ १५"},{"b":32986,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.16"],"text":"निर्जग्मतुः स्वायुधाढ्यौ बलेनाल्पीयसाऽऽवृतौ।"},{"b":32987,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.16"],"text":"शंखं दध्मौ विनिर्गत्य हरिर्दारुकसारथिः॥ १६"},{"b":32988,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.17"],"text":"ततोऽभूत् परसैन्यानां हृदि वित्रासवेपथुः।"},{"b":32989,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.17"],"text":"तावाह मागधो वीक्ष्य हे कृष्ण पुरुषाधम॥ १७"},{"b":32990,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.18"],"text":"न त्वया योद्धुमिच्छामि बालेनैकेन लज्जया।"},{"b":32991,"kind":"sanskrit_shloka","page":446,"verses":["10.50.18"],"text":"गुप्तेन हि त्वया मन्द न योत्स्ये याहि बन्धुहन्॥ १८"},{"b":32992,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.19"],"text":"तव राम यदि श्रद्धा युध्यस्व धैर्यमुद्वह।"},{"b":32993,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.19"],"text":"हित्वा वा मच्छरैश्छिन्‍नं देहं स्वर्याहि मां जहि॥ १९"},{"b":32994,"kind":"hindi_translation","page":446,"explains":["10.50.11","10.50.12","10.50.13","10.50.14","10.50.15","10.50.16","10.50.17","10.50.18","10.50.19"],"text":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि आकाशसे सूर्यके समान चमकते हुए दो रथ आ पहुँचे। उनमें युद्धकी सारी सामग्रियाँ सुसज्जित थीं और दो सारथि उन्हें हाँक रहे थे॥ ११॥ इसी समय भगवान्‌के दिव्य और सनातन आयुध भी अपने-आप वहाँ आकर उपस्थित हो गये। उन्हें देखकर भगवान् श्रीकृष्णने अपने बड़े भाई बलरामजीसे कहा—॥ १२॥ ‘भाईजी! आप बड़े शक्तिशाली हैं। इस समय जो यदुवंशी आपको ही अपना स्वामी और रक्षक मानते हैं, जो आपसे ही सनाथ हैं, उनपर बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़ी है। देखिये, यह आपका रथ है और आपके प्यारे आयुध हल-मूसल भी आ पहुँचे हैं॥ १३॥ अब आप इस रथपर सवार होकर शत्रु-सेनाका संहार कीजिये और अपने स्वजनोंको इस विपत्तिसे बचाइये। भगवन्! साधुओंका कल्याण करनेके लिये ही हम दोनोंने अवतार ग्रहण किया है॥ १४॥ अतः अब आप यह तेईस अक्षौहिणी सेना, पृथ्वीका यह विपुल भार नष्ट कीजिये।’ भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने यह सलाह करके कवच धारण किये और रथपर सवार होकर वे मथुरासे निकले। उस समय दोनों भाई अपने-अपने आयुध लिये हुए थे और छोटी-सी सेना उनके साथ-साथ चल रही थी। श्रीकृष्णका रथ हाँक रहा था दारुक। पुरीसे बाहर निकलकर उन्होंने अपना पांचजन्य शंख बजाया॥ १५-१६॥ उनके शंखकी भयंकर ध्वनि सुनकर शत्रुपक्षकी सेनाके वीरोंका हृदय डरके मारे थर्रा उठा। उन्हें देखकर मगधराज जरासन्धने कहा—‘पुरुषाधम कृष्ण! तू तो अभी निरा बच्चा है। अकेले तेरे साथ लड़नेमें मुझे लाज लग रही है। इतने दिनोंतक तू न जाने कहाँ-कहाँ छिपा फिरता था। मन्द! तू तो अपने मामाका हत्यारा है। इसलिये मैं तेरे साथ नहीं लड़ सकता। जा, मेरे सामनेसे भाग जा॥ १७-१८॥ बलराम! यदि तेरे चित्तमें यह श्रद्धा हो कि युद्धमें मरनेपर स्वर्ग मिलता है तो तू आ, हिम्मत बाँधकर मुझसे लड़। मेरे बाणोंसे छिन्‍न-भिन्‍न हुए शरीरको यहाँ छोड़कर स्वर्गमें जा अथवा यदि तुझमें शक्ति हो तो मुझे ही मार डाल’॥ १९॥"},{"b":32995,"kind":"topic_heading","page":447,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":32996,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.20"],"text":"न वै शूरा विकत्थन्ते दर्शयन्त्येव पौरुषम्।"},{"b":32997,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.20"],"text":"न गृह्णीमो वचो राजन्‍नातुरस्य मुमूर्षतः॥ २०"},{"b":32998,"kind":"hindi_commentary","page":447,"explains":["10.50.20"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—मगधराज! जो शूरवीर होते हैं, वे तुम्हारी तरह डींग नहीं हाँकते, वे तो अपना बल-पौरुष ही दिखलाते हैं। देखो, अब तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे सिरपर नाच रही है। तुम वैसे ही अकबक कर रहे हो, जैसे मरनेके समय कोई सन्‍निपातका रोगी करे। बक लो, मैं तुम्हारी बातपर ध्यान नहीं देता॥ २०॥"},{"b":32999,"kind":"topic_heading","page":447,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":33000,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.21"],"text":"जरासुतस्तावभिसृत्य माधवौ"},{"b":33001,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.21"],"text":"महाबलौघेन बलीयसाऽऽवृणोत्।"},{"b":33002,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.21"],"text":"ससैन्ययानध्वजवाजिसारथी"},{"b":33003,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.21"],"text":"सूर्यानलौ वायुरिवाभ्ररेणुभिः॥ २१"},{"b":33004,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.22"],"text":"सुपर्णतालध्वजचिह्नितौ रथा-"},{"b":33005,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.22"],"text":"वलक्षयन्त्यो हरिरामयोर्मृधे।"},{"b":33006,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.22"],"text":"स्त्रियः पुराट्टालकहर्म्यगोपुरं"},{"b":33007,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.22"],"text":"समाश्रिताः संमुमुहुः शुचार्दिताः॥ २२"},{"b":33008,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.23"],"text":"हरिः परानीकपयोमुचां मुहुः"},{"b":33009,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.23"],"text":"शिलीमुखात्युल्बणवर्षपीडितम् ।"},{"b":33010,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.23"],"text":"स्वसैन्यमालोक्य सुरासुरार्चितं"},{"b":33011,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.23"],"text":"व्यस्फूर्जयच्छार्ङ्गशरासनोत्तमम् ॥ २३"},{"b":33012,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.24"],"text":"गृह्णन् निषंगादथ सन्दधच्छरान्"},{"b":33013,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.24"],"text":"विकृष्य मुञ्चञ्छितबाणपूगान्।"},{"b":33014,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.24"],"text":"निघ्नन् रथान् कुंजरवाजिपत्तीन्"},{"b":33015,"kind":"sanskrit_shloka","page":447,"verses":["10.50.24"],"text":"निरन्तरं यद्वदलातचक्रम्॥ २४"},{"b":33016,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.25"],"text":"निर्भिन्‍नकुम्भाः करिणो निपेतु-"},{"b":33017,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.25"],"text":"रनेकशोऽश्‍वा शरवृक्णकन्धराः।"},{"b":33018,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.25"],"text":"रथा हताश्‍वध्वजसूतनायकाः"},{"b":33019,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.25"],"text":"पदातयश्छिन्‍नभुजोरुकन्धराः ॥ २५"},{"b":33020,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.26"],"text":"संछिद्यमानद्विपदेभवाजिना-"},{"b":33021,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.26"],"text":"मंगप्रसूताः शतशोऽसृगापगाः।"},{"b":33022,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.26"],"text":"भुजाहयः पूरुषशीर्षकच्छपा"},{"b":33023,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.26"],"text":"हतद्विपद्वीपहयग्रहाकुलाः ॥ २६"},{"b":33024,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.27"],"text":"करोरुमीना नरकेशशैवला"},{"b":33025,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.27"],"text":"धनुस्तरंगायुधगुल्मसंकुलाः ।"},{"b":33026,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.27"],"text":"अच्छूरिकावर्तभयानका महा-"},{"b":33027,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.27"],"text":"मणिप्रवेकाभरणाश्मशर्कराः ॥ २७"},{"b":33028,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.28"],"text":"प्रवर्तिता भीरुभयावहा मृधे"},{"b":33029,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.28"],"text":"मनस्विनां हर्षकरीः परस्परम्।"},{"b":33030,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.28"],"text":"विनिघ्नतारीन् मुसलेन दुर्मदान्"},{"b":33031,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.28"],"text":"संकर्षणेनापरिमेयतेजसा ॥ २८"},{"b":33032,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.29"],"text":"बलं तदंगार्णवदुर्गभैरवं"},{"b":33033,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.29"],"text":"दुरन्तपारं मगधेन्द्रपालितम्।"},{"b":33034,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.29"],"text":"क्षयं प्रणीतं वसुदेवपुत्रयो-"},{"b":33035,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.29"],"text":"र्विक्रीडितं तज्जगदीशयोः परम्॥ २९"},{"b":33036,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.30"],"text":"स्थित्युद्भवान्तं भुवनत्रयस्य यः"},{"b":33037,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.30"],"text":"समीहतेऽनन्तगुणः स्वलीलया।"},{"b":33038,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.30"],"text":"न तस्य चित्रं परपक्षनिग्रह-"},{"b":33039,"kind":"sanskrit_shloka","page":448,"verses":["10.50.30"],"text":"स्तथापि मर्त्यानुविधस्य वर्ण्यते॥ ३०"},{"b":33040,"kind":"hindi_commentary","page":447,"explains":["10.50.21","10.50.22","10.50.23","10.50.24","10.50.25","10.50.26","10.50.27","10.50.28","10.50.29","10.50.30"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जैसे वायु बादलोंसे सूर्यको और धूएँसे आगको ढक लेती है, किन्तु वास्तवमें वे ढकते नहीं, उनका प्रकाश फिर फैलता ही है; वैसे ही मगधराज जरासन्धने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामके सामने आकर अपनी बहुत बड़ी बलवान् और अपार सेनाके द्वारा उन्हें चारों ओरसे घेर लिया—यहाँतक कि उनकी सेना, रथ, ध्वजा, घोड़ों और सारथियोंका दीखना भी बंद हो गया॥ २१॥ मथुरापुरीकी स्त्रियाँ अपने महलोंकी अटारियों, छज्जों और फाटकोंपर चढ़कर युद्धका कौतुक देख रही थीं। जब उन्होंने देखा कि युद्धभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णकी गरुड़चिह्नसे चिह्नित और बलरामजीकी तालचिह्नसे चिह्नित ध्वजावाले रथ नहीं दीख रहे हैं, तब वे शोकके आवेगसे मूर्च्छित हो गयीं॥ २२॥ जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि शत्रु-सेनाके वीर हमारी सेनापर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा कर रहे हैं, मानो बादल पानीकी अनगिनत बूँदें बरसा रहे हों और हमारी सेना उससे अत्यन्त पीड़ित, व्यथित हो रही है; तब उन्होंने अपने देवता और असुर—दोनोंसे सम्मानित शार्ङ्गधनुषका टंकार किया॥ २३॥ इसके बाद वे तरकसमेंसे बाण निकालने, उन्हें धनुषपर चढ़ाने और धनुषकी डोरी खींचकर झुंड-के-झुंड बाण छोड़ने लगे। उस समय उनका वह धनुष इतनी फुर्तीसे घूम रहा था, मानो कोई बड़े वेगसे अलातचक्र (लुकारी) घुमा रहा हो। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण जरासन्धकी चतुरंगिणी—हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेनाका संहार करने लगे॥ २४॥ इससे बहुत-से हाथियोंके सिर फट गये और वे मर-मरकर गिरने लगे। बाणोंकी बौछारसे अनेकों घोड़ोंके सिर धड़से अलग हो गये। घोड़े, ध्वजा, सारथि और रथियोंके नष्ट हो जानेसे बहुत-से रथ बेकाम हो गये। पैदल सेनाकी बाँहें, जाँघ और सिर आदि अंग-प्रत्यंग कट-कटकर गिर पड़े॥ २५॥ उस युद्धमें अपार तेजस्वी भगवान् बलरामजीने अपने मूसलकी चोटसे बहुत-से मतवाले शत्रुओंको मार-मारकर उनके अंग-प्रत्यंगसे निकले हुए खूनकी सैकड़ों नदियाँ बहा दीं। कहीं मनुष्य कट रहे हैं तो कहीं हाथी और घोड़े छटपटा रहे हैं। उन नदियोंमें मनुष्योंकी भुजाएँ साँपके समान जान पड़तीं और सिर इस प्रकार मालूम पड़ते, मानो कछुओंकी भीड़ लग गयी हो। मरे हुए हाथी द्वीप-जैसे और घोड़े ग्राहोंके समान जान पड़ते। हाथ और जाँघें मछलियोंकी तरह, मनुष्योंके केश सेवारके समान, धनुष तरंगोंकी भाँति और अस्त्र-शस्त्र लता एवं तिनकोंके समान जान पड़ते। ढालें ऐसी मालूम पड़तीं, मानो भयानक भँवर हों। बहुमूल्य मणियाँ और आभूषण पत्थरके रोड़ों तथा कंकड़ोंके समान बहे जा रहे थे। उन नदियोंको देखकर कायर पुरुष डर रहे थे और वीरोंका आपसमें खूब उत्साह बढ़ रहा था॥ २६—२८॥ परीक्षित्! जरासन्धकी वह सेना समुद्रके समान दुर्गम, भयावह और बड़ी कठिनाईसे जीतनेयोग्य थी। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने थोड़े ही समयमें उसे नष्ट कर डाला। वे सारे जगत‍्के स्वामी हैं। उनके लिये एक सेनाका नाश कर देना केवल खिलवाड़ ही तो है॥ २९॥ परीक्षित्! भगवान्‌के गुण अनन्त हैं। वे खेल-खेलमें ही तीनों लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है कि वे शत्रुओंकी सेनाका इस प्रकार बात-की-बातमें सत्यानाश कर दें। तथापि जब वे मनुष्यका-सा वेष धारण करके मनुष्यकी-सी लीला करते हैं, तब उसका भी वर्णन किया ही जाता है॥ ३०॥"},{"b":33041,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.31"],"text":"जग्राह विरथं रामो जरासन्धं महाबलम्।"},{"b":33042,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.31"],"text":"हतानीकावशिष्टासुं सिंहः सिंहमिवौजसा॥ ३१"},{"b":33043,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.32"],"text":"बध्यमानं हतारातिं पाशैर्वारुणमानुषैः।"},{"b":33044,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.32"],"text":"वारयामास गोविन्दस्तेन कार्यचिकीर्षया॥ ३२"},{"b":33045,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.33"],"text":"स मुक्तो लोकनाथाभ्यां व्रीडितो वीरसंमतः।"},{"b":33046,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.33"],"text":"तपसे कृतसंकल्पो वारितः पथि राजभिः॥ ३३"},{"b":33047,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.34"],"text":"वाक्यैः पवित्रार्थपदैर्नयनैः प्राकृतैरपि।"},{"b":33048,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.34"],"text":"स्वकर्मबन्धप्राप्तोऽयं यदुभिस्ते पराभवः॥ ३४"},{"b":33049,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.35"],"text":"हतेषु सर्वानीकेषु नृपो बार्हद्रथस्तदा।"},{"b":33050,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.35"],"text":"उपेक्षितो भगवता मगधान् दुर्मना ययौ॥ ३५"},{"b":33051,"kind":"hindi_commentary","page":449,"explains":["10.50.31","10.50.32","10.50.33","10.50.34","10.50.35"],"text":"इस प्रकार जरासन्धकी सारी सेना मारी गयी। रथ भी टूट गया। शरीरमें केवल प्राण बाकी रहे। तब भगवान् श्रीबलरामजीने जैसे एक सिंह दूसरे सिंहको पकड़ लेता है, वैसे ही बलपूर्वक महाबली जरासन्धको पकड़ लिया॥ ३१॥ जरासन्धने पहले बहुत-से विपक्षी नरपतियोंका वध किया था, परन्तु आज उसे बलरामजी वरुणकी फाँसी और मनुष्योंके फंदेसे बाँध रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने यह सोचकर कि यह छोड़ दिया जायगा तो और भी सेना इकट्ठी करके लायेगा तथा हम सहज ही पृथ्वीका भार उतार सकेंगे, बलरामजीको रोक दिया॥ ३२॥ बड़े-बड़े शूरवीर जरासन्धका सम्मान करते थे। इसलिये उसे इस बातपर बड़ी लज्जा मालूम हुई कि मुझे श्रीकृष्ण और बलरामने दया करके दीनकी भाँति छोड़ दिया है। अब उसने तपस्या करनेका निश्‍चय किया। परन्तु रास्तेमें उसके साथी नरपतियोंने बहुत समझाया कि ‘राजन्! यदुवंशियोंमें क्या रखा है? वे आपको बिलकुल ही पराजित नहीं कर सकते थे। आपको प्रारब्धवश ही नीचा देखना पड़ा है।’ उन लोगोंने भगवान्‌की इच्छा, फिर विजय प्राप्त करनेकी आशा आदि बतलाकर तथा लौकिक दृष्टान्त एवं युक्तियाँ दे-देकर यह बात समझा दी कि आपको तपस्या नहीं करनी चाहिये॥ ३३-३४॥ परीक्षित्! उस समय मगधराज जरासन्धकी सारी सेना मर चुकी थी। भगवान् बलरामजीने उपेक्षापूर्वक उसे छोड़ दिया था, इससे वह बहुत उदास होकर अपने देश मगधको चला गया॥ ३५॥"},{"b":33052,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.36"],"text":"मुकुन्दोऽप्यक्षतबलो निस्तीर्णारिबलार्णवः।"},{"b":33053,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.36"],"text":"विकीर्यमाणः कुसुमैस्त्रिदशैरनुमोदितः॥ ३६"},{"b":33054,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.37"],"text":"माथुरैरुपसंगम्य विज्वरैर्मुदितात्मभिः।"},{"b":33055,"kind":"sanskrit_shloka","page":449,"verses":["10.50.37"],"text":"उपगीयमानविजयः सूतमागधवन्दिभिः॥ ३७"},{"b":33056,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.38"],"text":"शंखदुन्दुभयो नेदुर्भेरीतूर्याण्यनेकशः।"},{"b":33057,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.38"],"text":"वीणावेणुमृदंगानि पुरं प्रविशति प्रभौ॥ ३८"},{"b":33058,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.39"],"text":"सिक्तमार्गां हृष्टजनां पताकाभिरलंकृताम्।"},{"b":33059,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.39"],"text":"निर्घुष्टां ब्रह्मघोषेण कौतुकाबद्धतोरणाम्॥ ३९"},{"b":33060,"kind":"hindi_commentary","page":450,"verses":["10.50.40"],"text":"निचीयमानो नारीभिर्माल्यदध्यक्षतांकुरैः।"},{"b":33061,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.40"],"text":"निरीक्ष्यमाणः सस्नेहं प्रीत्युत्कलितलोचनैः॥ ४०"},{"b":33062,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.41"],"text":"आयोधनगतं वित्तमनन्तं वीरभूषणम्।"},{"b":33063,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.41"],"text":"यदुराजाय तत् सर्वमाहृतं प्रादिशत्प्रभुः॥ ४१"},{"b":33064,"kind":"hindi_commentary","page":449,"explains":["10.50.36","10.50.37","10.50.38","10.50.39","10.50.40","10.50.41"],"text":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णकी सेनामें किसीका बाल भी बाँका न हुआ और उन्होंने जरासन्धकी तेईस अक्षौहिणी सेनापर, जो समुद्रके समान थी, सहज ही विजय प्राप्त कर ली। उस समय बड़े-बड़े देवता उनपर नन्दनवनके पुष्पोंकी वर्षा और उनके इस महान् कार्यका अनुमोदन—प्रशंसा कर रहे थे॥ ३६॥ जरासन्धकी सेनाके पराजयसे मथुरावासी भयरहित हो गये थे और भगवान् श्रीकृष्णकी विजयसे उनका हृदय आनन्दसे भर रहा था। भगवान् श्रीकृष्ण आकर उनमें मिल गये। सूत, मागध और वन्दीजन उनकी विजयके गीत गा रहे थे॥ ३७॥ जिस समय भगवान् श्रीकृष्णने नगरमें प्रवेश किया, उस समय वहाँ शंख, नगारे, भेरी, तुरही, वीणा, बाँसुरी और मृदंग आदि बाजे बजने लगे थे॥ ३८॥ मथुराकी एक-एक सड़क और गलीमें छिड़काव कर दिया गया था। चारों ओर हँसते-खेलते नागरिकोंकी चहल-पहल थी। सारा नगर छोटी-छोटी झंडियों और बड़ी-बड़ी विजय-पताकाओंसे सजा दिया गया था। ब्राह्मणोंकी वेदध्वनि गूँज रही थी और सब ओर आनन्दोत्सवके सूचक बंदनवार बाँध दिये गये थे॥ ३९॥ जिस समय श्रीकृष्ण नगरमें प्रवेश कर रहे थे, उस समय नगरकी नारियाँ प्रेम और उत्कण्ठासे भरे हुए नेत्रोंसे उन्हें स्नेहपूर्वक निहार रही थीं और फूलोंके हार, दही, अक्षत और जौ आदिके अंकुरोंकी उनके ऊपर वर्षा कर रही थीं॥ ४०॥ भगवान् श्रीकृष्ण रणभूमिसे अपार धन और वीरोंके आभूषण ले आये थे। वह सब उन्होंने यदुवंशियोंके राजा उग्रसेनके पास भेज दिया॥ ४१॥"},{"b":33065,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.42"],"text":"एवं सप्तदशकृत्वस्तावत्यक्षौहिणीबलः।"},{"b":33066,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.42"],"text":"युयुधे मागधो राजा यदुभिः कृष्णपालितैः॥ ४२"},{"b":33067,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.43"],"text":"अक्षिण्वंस्तद्बलं सर्वं वृष्णयः कृष्णतेजसा।"},{"b":33068,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.43"],"text":"हतेषु स्वेष्वनीकेषु त्यक्तोऽयादरिभिर्नृपः॥ ४३"},{"b":33069,"kind":"hindi_translation","page":450,"explains":["10.50.42","10.50.43"],"text":"परीक्षित्! इस प्रकार सत्रह बार तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके मगधराज जरासन्धने भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित यदुवंशियोंसे युद्ध किया॥ ४२॥ किन्तु यादवोंने भगवान् श्रीकृष्णकी शक्तिसे हर बार उसकी सारी सेना नष्ट कर दी। जब सारी सेना नष्ट हो जाती, तब यदुवंशियोंके उपेक्षापूर्वक छोड़ देनेपर जरासन्ध अपनी राजधानीमें लौट जाता॥ ४३॥"},{"b":33070,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.44"],"text":"अष्टादशमसंग्रामे आगामिनि तदन्तरा।"},{"b":33071,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.44"],"text":"नारदप्रेषितो वीरो यवनः प्रत्यदृश्यत॥ ४४"},{"b":33072,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.45"],"text":"रुरोध मथुरामेत्य तिसृभिर्म्लेच्छकोटिभिः।"},{"b":33073,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.45"],"text":"नृलोके चाप्रतिद्वन्द्वो वृष्णीञ्छ्रुत्वाऽऽत्मसम्मितान्॥ ४५"},{"b":33074,"kind":"hindi_translation","page":450,"explains":["10.50.44","10.50.45"],"text":"जिस समय अठारहवाँ संग्राम छिड़नेहीवाला था, उसी समय नारदजीका भेजा हुआ वीर कालयवन दिखायी पड़ा॥ ४४॥ युद्धमें कालयवनके सामने खड़ा होनेवाला वीर संसारमें दूसरा कोई न था। उसने जब यह सुना कि यदुवंशी हमारे ही-जैसे बलवान् हैं और हमारा सामना कर सकते हैं, तब तीन करोड़ म्लेच्छोंकी सेना लेकर उसने मथुराको घेर लिया॥ ४५॥"},{"b":33075,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.46"],"text":"तं दृष्ट्वाचिन्तयत् कृष्णः संकर्षणसहायवान्।"},{"b":33076,"kind":"sanskrit_shloka","page":450,"verses":["10.50.46"],"text":"अहो यदूनां वृजिनं प्राप्तं ह्युभयतो महत्॥ ४६"},{"b":33077,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.47"],"text":"यवनोऽयं निरुन्धेऽस्मानद्य तावन्महाबलः।"},{"b":33078,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.47"],"text":"मागधोऽप्यद्य वा श्‍वो वा परश्‍वो वाऽऽगमिष्यति॥ ४७"},{"b":33079,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.48"],"text":"आवयोर्युध्यतोरस्य यद्यागन्ता जरासुतः।"},{"b":33080,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.48"],"text":"बन्धून् वधिष्यत्यथवा नेष्यते स्वपुरं बली॥ ४८"},{"b":33081,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.49"],"text":"तस्मादद्य विधास्यामो दुर्गं द्विपददुर्गमम्।"},{"b":33082,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.49"],"text":"तत्र ज्ञातीन् समाधाय यवनं घातयामहे॥ ४९"},{"b":33083,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.50"],"text":"इति सम्मन्त्र्य भगवान् दुर्गं द्वादशयोजनम्।"},{"b":33084,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.50"],"text":"अन्तःसमुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत्॥ ५०"},{"b":33085,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.51"],"text":"दृश्यते यत्र हि त्वाष्ट्रं विज्ञानं शिल्पनैपुणम्।"},{"b":33086,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.51"],"text":"रथ्याचत्वरवीथीभिर्यथावास्तु विनिर्मितम्॥ ५१"},{"b":33087,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.52"],"text":"सुरद्रुमलतोद्यानविचित्रोपवनान्वितम् ।"},{"b":33088,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.52"],"text":"हेमशृङ्गैर्दिविस्पृग्भिः स्फाटिकाट्टालगोपुरैः॥ ५२"},{"b":33089,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.53"],"text":"राजतारकुटैः कोष्ठैर्हेमकुम्भैरलंकृतैः।"},{"b":33090,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.53"],"text":"रत्‍नकूटैर्गृहैर्हैमैर्महामरकतस्थलैः ॥ ५३"},{"b":33091,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.54"],"text":"वास्तोष्पतीनां च गृहैर्वलभीभिश्‍च निर्मितम्।"},{"b":33092,"kind":"sanskrit_shloka","page":451,"verses":["10.50.54"],"text":"चातुर्वर्ण्यजनाकीर्णं यदुदेवगृहोल्लसत्॥ ५४"},{"b":33093,"kind":"hindi_translation","page":450,"explains":["10.50.46","10.50.47","10.50.48","10.50.49","10.50.50","10.50.51","10.50.52","10.50.53","10.50.54"],"text":"कालयवनकी यह असमय चढ़ाई देखकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ मिलकर विचार किया— ‘अहो! इस समय तो यदुवंशियोंपर जरासन्ध और कालयवन—ये दो-दो विपत्तियाँ एक साथ ही मँडरा रही हैं॥ ४६॥ आज इस परम बलशाली यवनने हमें आकर घेर लिया है और जरासन्ध भी आज, कल या परसोंमें आ ही जायेगा॥ ४७॥ यदि हम दोनों भाई इसके साथ लड़नेमें लग गये और उसी समय जरासन्ध भी आ पहुँचा, तो वह हमारे बन्धुओंको मार डालेगा या तो कैद करके अपने नगरमें ले जायगा; क्योंकि वह बहुत बलवान् है॥ ४८॥ इसलिये आज हमलोग एक ऐसा दुर्ग—ऐसा किला बनायेंगे, जिसमें किसी भी मनुष्यका प्रवेश करना अत्यन्त कठिन होगा। अपने स्वजन-सम्बन्धियोंको उसी किलेमें पहुँचाकर फिर इस यवनका वध करायेंगे’॥ ४९॥ बलरामजीसे इस प्रकार सलाह करके भगवान् श्रीकृष्णने समुद्रके भीतर एक ऐसा दुर्गम नगर बनवाया, जिसमें सभी वस्तुएँ अद्भुत थीं और उस नगरकी लम्बाई-चौड़ाई अड़तालीस कोसकी थी॥ ५०॥ उस नगरकी एक-एक वस्तुमें विश्‍वकर्माका विज्ञान (वास्तु-विज्ञान) और शिल्पकलाकी निपुणता प्रकट होती थी। उसमें वास्तुशास्त्रके अनुसार बड़ी-बड़ी सड़कों, चौराहों और गलियोंका यथास्थान ठीक-ठीक विभाजन किया गया था॥ ५१॥ वह नगर ऐसे सुन्दर-सुन्दर उद्यानों और विचित्र-विचित्र उपवनोंसे युक्त था, जिनमें देवताओंके वृक्ष और लताएँ लहलहाती रहती थीं। सोनेके इतने ऊँचे-ऊँचे शिखर थे, जो आकाशसे बातें करते थे। स्फटिकमणिकी अटारियाँ और ऊँचे-ऊँचे दरवाजे बड़े ही सुन्दर लगते थे॥ ५२॥ अन्‍न रखनेके लिये चाँदी और पीतलके बहुत-से कोठे बने हुए थे। वहाँके महल सोनेके बने हुए थे और उनपर कामदार सोनेके कलश सजे हुए थे। उनके शिखर रत्‍नोंके थे तथा गच पन्‍नेकी बनी हुई बहुत भली मालूम होती थी॥ ५३॥ इसके अतिरिक्त उस नगरमें वास्तुदेवताके मन्दिर और छज्जे भी बहुत सुन्दर-सुन्दर बने हुए थे। उसमें चारों वर्णके लोग निवास करते थे। और सबके बीचमें यदुवंशियोंके प्रधान उग्रसेनजी, वसुदेवजी, बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्णके महल जगमगा रहे थे॥ ५४॥"},{"b":33094,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.55"],"text":"सुधर्मां पारिजातं च महेन्द्रः प्राहिणोद्धरेः।"},{"b":33095,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.55"],"text":"यत्र चावस्थितो मर्त्यो मर्त्यधर्मैर्न युज्यते॥ ५५"},{"b":33096,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.56"],"text":"श्यामैककर्णान् वरुणो हयाञ्छुक्लान् मनोजवान्।"},{"b":33097,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.56"],"text":"अष्टौ निधिपतिः कोशान् लोकपालो निजोदयान्॥ ५६"},{"b":33098,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.57"],"text":"यद् यद् भगवता दत्तमाधिपत्यं स्वसिद्धये।"},{"b":33099,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.57"],"text":"सर्वं प्रत्यर्पयामासुर्हरौ भूमिगते नृप॥ ५७"},{"b":33100,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.58"],"text":"तत्र योगप्रभावेण नीत्वा सर्वजनं हरिः।"},{"b":33101,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.58"],"text":"प्रजापालेन रामेण कृष्णः समनुमन्त्रितः।"},{"b":33102,"kind":"sanskrit_shloka","page":452,"verses":["10.50.58"],"text":"निर्जगाम पुरद्वारात् पद्ममाली निरायुधः॥ ५८"},{"b":33103,"kind":"hindi_translation","page":452,"explains":["10.50.55","10.50.56","10.50.57","10.50.58"],"text":"परीक्षित्! उस समय देवराज इन्द्रने भगवान् श्रीकृष्णके लिये पारिजातवृक्ष और सुधर्मा-सभाको भेज दिया। वह सभा ऐसी दिव्य थी कि उसमें बैठे हुए मनुष्यको भूख-प्यास आदि मर्त्यलोकके धर्म नहीं छू पाते थे॥ ५५॥ वरुणजीने ऐसे बहुत-से श्‍वेत घोड़े भेज दिये, जिनका एक-एक कान श्यामवर्णका था और जिनकी चाल मनके समान तेज थी। धनपति कुबेरजीने अपनी आठों निधियाँ भेज दीं और दूसरे लोकपालोंने भी अपनी-अपनी विभूतियाँ भगवान्‌के पास भेज दीं॥ ५६॥ परीक्षित्! सभी लोकपालोंको भगवान् श्रीकृष्णने ही उनके अधिकारके निर्वाहके लिये शक्तियाँ और सिद्धियाँ दी हैं। जब भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर लीला करने लगे, तब सभी सिद्धियाँ उन्होंने भगवान्‌के चरणोंमें समर्पित कर दीं॥ ५७॥ भगवान् श्रीकृष्णने अपने समस्त स्वजन-सम्बन्धियोंको अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाके द्वारा द्वारकामें पहुँचा दिया। शेष प्रजाकी रक्षाके लिये बलरामजीको मथुरापुरीमें रख दिया और उनसे सलाह लेकर गलेमें कमलोंकी माला पहने, बिना कोई अस्त्र-शस्त्र लिये स्वयं नगरके बड़े दरवाजेसे बाहर निकल आये॥ ५८॥"},{"b":33104,"kind":"hindi_translation","page":452,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे दुर्गनिवेशनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५०॥"}],"notes":[{"id":"v2:298","mark":"१","page":450,"after_verse":"10.50.40","text":"विकीर्यमाणो।"},{"id":"v2:299","mark":"२","page":450,"after_verse":"10.50.42","text":"णीर्नृपः।"}],"corrections":{"count":6,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}