{"id":"10.5","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 5","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ पञ्चमोऽध्यायः","topics":["गोकुलमें भगवान्‌का जन्ममहोत्सव"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.5.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[150,154]},"verses":[{"id":"10.5.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/1/","page":150,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दस्त्वात्मज उत्पन्‍ने जाताह्लादो महामनाः।","आहूय विप्रान् वेदज्ञान् स्नातः शुचिरलंकृतः॥ १"],"iast":["nandastvātmaja utpanne jātāhlādo mahāmanāḥ|","āhūya viprān vedajñān snātaḥ śuciralaṃkṛtaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे। पुत्रका जन्म होनेपर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्दसे भर गया। उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। फिर वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया। साथ ही देवता और पितरोंकी विधिपूर्वक पूजा भी करवायी॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"10.5.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/2/","page":151,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्मात्मजस्य वै।","कारयामास विधिवत् पितृदेवार्चनं तथा॥ २"],"iast":["vācayitvā svastyayanaṃ jātakarmātmajasya vai|","kārayāmāsa vidhivat pitṛdevārcanaṃ tathā|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे। पुत्रका जन्म होनेपर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्दसे भर गया। उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। फिर वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया। साथ ही देवता और पितरोंकी विधिपूर्वक पूजा भी करवायी॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"10.5.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/3/","page":151,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धेनूनां नियुते प्रादाद् विप्रेभ्यः समलंकृते।","तिलाद्रीन् सप्त रत्‍नौघशातकौम्भाम्बरावृतान्॥ ३"],"iast":["dhenūnāṃ niyute prādād viprebhyaḥ samalaṃkṛte|","tilādrīn sapta ratnaughaśātakaumbhāmbarāvṛtān|| 3"],"meaning":"उन्होंने ब्राह्मणोंको वस्त्र और आभूषणोंसे सुसज्जित दो लाख गौएँ दान कीं। रत्‍नों और सुनहले वस्त्रोंसे ढके हुए तिलके सात पहाड़ दान किये॥ ३॥"},{"id":"10.5.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/4/","page":151,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कालेन स्नानशौचाभ्यां संस्कारैस्तपसेज्यया।","शुध्यन्ति दानैः सन्तुष्ट्या द्रव्याण्यात्माऽऽत्मविद्यया॥ ४"],"iast":["kālena snānaśaucābhyāṃ saṃskāraistapasejyayā|","śudhyanti dānaiḥ santuṣṭyā dravyāṇyātmā''tmavidyayā|| 4"],"meaning":"(संस्कारोंसे ही गर्भशुद्धि होती है—यह प्रदर्शित करनेके लिये अनेक दृष्टान्तोंका उल्लेख करते हैं—) समयसे (नूतनजल, अशुद्ध भूमि आदि), स्नानसे (शरीर आदि), प्रक्षालनसे (वस्त्रादि), संस्कारोंसे (गर्भादि), तपस्यासे (इन्द्रियादि), यज्ञसे (ब्राह्मणादि), दानसे (धन-धान्यादि) और संतोषसे (मन आदि) द्रव्य शुद्ध होते हैं। परन्तु आत्माकी शुद्धि तो आत्मज्ञानसे ही होती है॥ ४॥"},{"id":"10.5.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/5/","page":151,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सौमंगल्यगिरो विप्राः सूतमागधवन्दिनः।","गायकाश्‍च जगुर्नेदुर्भेर्यो दुन्दुभयो मुहुः॥ ५"],"iast":["saumaṃgalyagiro viprāḥ sūtamāgadhavandinaḥ|","gāyakāśca jagurnedurbheryo dundubhayo muhuḥ|| 5"],"meaning":"उस समय ब्राह्मण, सूत, मागध और वंदीजन मंगलमय आशीर्वाद देने तथा स्तुति करने लगे। गायक गाने लगे। भेरी और दुन्दुभियाँ बार-बार बजने लगीं॥ ५॥"},{"id":"10.5.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/6/","page":151,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["व्रजः सम्मृष्टसंसिक्तद्वाराजिरगृहान्तरः।","चित्रध्वजपताकास्रक्चैलपल्लवतोरणैः॥ ६"],"iast":["vrajaḥ sammṛṣṭasaṃsiktadvārājiragṛhāntaraḥ|","citradhvajapatākāsrakcailapallavatoraṇaiḥ|| 6"],"meaning":"व्रजमण्डलके सभी घरोंके द्वार, आँगन और भीतरी भाग झाड़-बुहार दिये गये; उनमें सुगन्धित जलका छिड़काव किया गया; उन्हें चित्र-विचित्र, ध्वजा-पताका, पुष्पोंकी मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्र और पल्लवोंकी बन्दनवारोंसे सजाया गया॥ ६॥"},{"id":"10.5.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/7/","page":151,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गावो वृषा वत्सतरा हरिद्रातैलरूषिताः।","विचित्रधातुबर्हस्रग्वस्त्रकांचनमालिनः ॥ ७"],"iast":["gāvo vṛṣā vatsatarā haridrātailarūṣitāḥ|","vicitradhātubarhasragvastrakāṃcanamālinaḥ || 7"],"meaning":"गाय, बैल और बछड़ोंके अंगोंमें हल्दी-तेलका लेप कर दिया गया और उन्हें गेरू आदि रंगीन धातुएँ, मोरपंख, फूलोंके हार, तरह-तरहके सुन्दर वस्त्र और सोनेकी जंजीरोंसे सजा दिया गया॥ ७॥"},{"id":"10.5.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/8/","page":151,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["महार्हवस्त्राभरणकंचुकोष्णीषभूषिताः ।","गोपाः समाययू राजन् नानोपायनपाणयः॥ ८"],"iast":["mahārhavastrābharaṇakaṃcukoṣṇīṣabhūṣitāḥ |","gopāḥ samāyayū rājan nānopāyanapāṇayaḥ|| 8"],"meaning":"परीक्षित्! सभी ग्वाल बहुमूल्य वस्त्र, गहने, अँगरखे और पगड़ियोंसे सुसज्जित होकर और अपने हाथोंमें भेंटकी बहुत-सी सामग्रियाँ ले-लेकर नन्दबाबाके घर आये॥ ८॥"},{"id":"10.5.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/9/","page":151,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यश्‍चाकर्ण्य मुदिता यशोदायाः सुतोद्भवम्।","आत्मानं भूषयांचक्रुर्वस्त्राकल्पांजनादिभिः॥ ९"],"iast":["gopyaścākarṇya muditā yaśodāyāḥ sutodbhavam|","ātmānaṃ bhūṣayāṃcakrurvastrākalpāṃjanādibhiḥ|| 9"],"meaning":"यशोदाजीके पुत्र हुआ है, यह सुनकर गोपियोंको भी बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने सुन्दर-सुन्दर वस्त्र, आभूषण और अंजन आदिसे अपना शृंगार किया॥ ९॥"},{"id":"10.5.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/10/","page":152,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नवकुंकुमकिंजल्कमुखपंकजभूतयः ।","बलिभिस्त्वरितं जग्मुः पृथुश्रोण्यश्‍चलत्कुचाः॥ १०"],"iast":["navakuṃkumakiṃjalkamukhapaṃkajabhūtayaḥ |","balibhistvaritaṃ jagmuḥ pṛthuśroṇyaścalatkucāḥ|| 10"],"meaning":"गोपियोंके मुखकमल बड़े ही सुन्दर जान पड़ते थे। उनपर लगी हुई कुंकुम ऐसी लगती मानो कमलकी केशर हो। उनके नितम्ब बड़े-बड़े थे। वे भेंटकी सामग्री ले-लेकर जल्दी-जल्दी यशोदाजीके पास चलीं। उस समय उनके पयोधर हिल रहे थे॥ १०॥"},{"id":"10.5.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/11/","page":152,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यः सुमृष्टमणिकुण्डलनिष्ककण्ठ्य-","श्‍चित्राम्बराः पथि शिखाच्युतमाल्यवर्षाः।","नन्दालयं सवलया व्रजतीर्विरेजु-","र्व्यालोलकुण्डलपयोधरहारशोभाः॥ ११"],"iast":["gopyaḥ sumṛṣṭamaṇikuṇḍalaniṣkakaṇṭhya-","ścitrāmbarāḥ pathi śikhācyutamālyavarṣāḥ|","nandālayaṃ savalayā vrajatīrvireju-","rvyālolakuṇḍalapayodharahāraśobhāḥ|| 11"],"meaning":"गोपियोंके कानोंमें चमकती हुई मणियोंके कुण्डल झिलमिला रहे थे। गलेमें सोनेके हार (हैकल या हुमेल) जगमगा रहे थे। वे बड़े सुन्दर-सुन्दर रंग-बिरंगे वस्त्र पहने हुए थीं। मार्गमें उनकी चोटियोंमें गुँथे हुए फूल बरसते जा रहे थे। हाथोंमें जड़ाऊ कंगन अलग ही चमक रहे थे। उनके कानोंके कुण्डल, पयोधर और हार हिलते जाते थे। इस प्रकार नन्दबाबाके घर जाते समय उनकी शोभा बड़ी अनूठी जान पड़ती थी॥ ११॥"},{"id":"10.5.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/12/","page":152,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ता आशिषः प्रयुंजानाश्‍चिरं पाहीति बालके।","हरिद्राचूर्णतैलाद्भिः सिंचन्त्योऽजनमुज्जगुः॥ १२"],"iast":["tā āśiṣaḥ prayuṃjānāściraṃ pāhīti bālake|","haridrācūrṇatailādbhiḥ siṃcantyo'janamujjaguḥ|| 12"],"meaning":"नन्दबाबाके घर जाकर वे नवजात शिशुको आशीर्वाद देतीं ‘यह चिरजीवी हो, भगवन्! इसकी रक्षा करो।’ और लोगोंपर हल्दी-तेलसे मिला हुआ पानी छिड़क देतीं तथा ऊँचे स्वरसे मंगलगान करती थीं॥ १२॥"},{"id":"10.5.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/13/","page":152,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अवाद्यन्त विचित्राणि वादित्राणि महोत्सवे।","कृष्णे विश्‍वेश्‍वरेऽनन्ते नन्दस्य व्रजमागते॥ १३"],"iast":["avādyanta vicitrāṇi vāditrāṇi mahotsave|","kṛṣṇe viśveśvare'nante nandasya vrajamāgate|| 13"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण समस्त जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। उनके ऐश्‍वर्य, माधुर्य, वात्सल्य—सभी अनन्त हैं। वे जब नन्दबाबाके व्रजमें प्रकट हुए, उस समय उनके जन्मका महान् उत्सव मनाया गया। उसमें बड़े-बड़े विचित्र और मंगलमय बाजे बजाये जाने लगे॥ १३॥"},{"id":"10.5.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/14/","page":152,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोपाः परस्परं हृष्टा दधिक्षीरघृताम्बुभिः।","आसिञ्चन्तो विलिम्पन्तो नवनीतैश्‍च चिक्षिपुः॥ १४"],"iast":["gopāḥ parasparaṃ hṛṣṭā dadhikṣīraghṛtāmbubhiḥ|","āsiñcanto vilimpanto navanītaiśca cikṣipuḥ|| 14"],"meaning":"आनन्दसे मतवाले होकर गोपगण एक-दूसरेपर दही, दूध, घी और पानी उड़ेलने लगे। एक-दूसरेके मुँहपर मक्खन मलने लगे और मक्खन फेंक-फेंककर आनन्दोत्सव मनाने लगे॥ १४॥"},{"id":"10.5.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/15/","page":152,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दो महामनास्तेभ्यो वासोऽलंकारगोधनम्।","सूतमागधवन्दिभ्यो येऽन्ये विद्योपजीविनः॥ १५"],"iast":["nando mahāmanāstebhyo vāso'laṃkāragodhanam|","sūtamāgadhavandibhyo ye'nye vidyopajīvinaḥ|| 15"],"meaning":"नन्दबाबा स्वभावसे ही परम उदार और मनस्वी थे। उन्होंने गोपोंको बहुत-से वस्त्र, आभूषण और गौएँ दीं। सूत-मागध-वंदीजनों, नृत्य, वाद्य आदि विद्याओंसे अपना जीवन-निर्वाह करनेवालों तथा दूसरे गुणीजनोंको भी नन्दबाबाने प्रसन्‍नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ देकर उनका यथोचित सत्कार किया। यह सब करनेमें उनका उद्देश्य यही था कि इन कर्मोंसे भगवान् विष्णु प्रसन्‍न हों और मेरे इस नवजात शिशुका मंगल हो॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"10.5.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/16/","page":152,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तैस्तैः कामैरदीनात्मा यथोचितमपूजयत्।","विष्णोराराधनार्थाय स्वपुत्रस्योदयाय च॥ १६"],"iast":["taistaiḥ kāmairadīnātmā yathocitamapūjayat|","viṣṇorārādhanārthāya svaputrasyodayāya ca|| 16"],"meaning":"नन्दबाबा स्वभावसे ही परम उदार और मनस्वी थे। उन्होंने गोपोंको बहुत-से वस्त्र, आभूषण और गौएँ दीं। सूत-मागध-वंदीजनों, नृत्य, वाद्य आदि विद्याओंसे अपना जीवन-निर्वाह करनेवालों तथा दूसरे गुणीजनोंको भी नन्दबाबाने प्रसन्‍नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ देकर उनका यथोचित सत्कार किया। यह सब करनेमें उनका उद्देश्य यही था कि इन कर्मोंसे भगवान् विष्णु प्रसन्‍न हों और मेरे इस नवजात शिशुका मंगल हो॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"10.5.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/17/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रोहिणी च महाभागा नन्दगोपाभिनन्दिता।","व्यचरद् दिव्यवासःस्रक्कण्ठाभरणभूषिता॥ १७"],"iast":["rohiṇī ca mahābhāgā nandagopābhinanditā|","vyacarad divyavāsaḥsrakkaṇṭhābharaṇabhūṣitā|| 17"],"meaning":"नन्दबाबाके अभिनन्दन करनेपर परम सौभाग्यवती रोहिणीजी दिव्य वस्त्र, माला और गलेके भाँति-भाँतिके गहनोंसे सुसज्जित होकर गृहस्वामिनीकी भाँति आने-जानेवाली स्त्रियोंका सत्कार करती हुई विचर रही थीं॥ १७॥"},{"id":"10.5.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/18/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत आरभ्य नन्दस्य व्रजः सर्वसमृद्धिमान्।","हरेर्निवासात्मगुणै रमाक्रीडमभून्‍नृप॥ १८"],"iast":["tata ārabhya nandasya vrajaḥ sarvasamṛddhimān|","harernivāsātmaguṇai ramākrīḍamabhūnnṛpa|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! उसी दिनसे नन्दबाबाके व्रजमें सब प्रकारकी ऋद्धि-सिद्धियाँ अठखेलियाँ करने लगीं और भगवान् श्रीकृष्णके निवास तथा अपने स्वाभाविक गुणोंके कारण वह लक्ष्मीजीका क्रीडास्थल बन गया॥ १८॥"},{"id":"10.5.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/19/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोपान् गोकुलरक्षायां निरूप्य मथुरां गतः।","नन्दः कंसस्य वार्षिक्यं करं दातुं कुरूद्वह॥ १९"],"iast":["gopān gokularakṣāyāṃ nirūpya mathurāṃ gataḥ|","nandaḥ kaṃsasya vārṣikyaṃ karaṃ dātuṃ kurūdvaha|| 19"],"meaning":"परीक्षित्! कुछ दिनोंके बाद नन्दबाबाने गोकुलकी रक्षाका भार तो दूसरे गोपोंको सौंप दिया और वे स्वयं कंसका वार्षिक कर चुकानेके लिये मथुरा चले गये॥ १९॥"},{"id":"10.5.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/20/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसुदेव उपश्रुत्य भ्रातरं नन्दमागतम्।","ज्ञात्वा दत्तकरं राज्ञे ययौ तदवमोचनम्॥ २०"],"iast":["vasudeva upaśrutya bhrātaraṃ nandamāgatam|","jñātvā dattakaraṃ rājñe yayau tadavamocanam|| 20"],"meaning":"जब वसुदेवजीको यह मालूम हुआ कि हमारे भाई नन्दजी मथुरामें आये हैं और राजा कंसको उसका कर भी दे चुके हैं, तब वे जहाँ नन्दबाबा ठहरे हुए थे, वहाँ गये॥ २०॥"},{"id":"10.5.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/21/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय देहः प्राणमिवागतम्।","प्रीतः प्रियतमं दोर्भ्यां सस्वजे प्रेमविह्वलः॥ २१"],"iast":["taṃ dṛṣṭvā sahasotthāya dehaḥ prāṇamivāgatam|","prītaḥ priyatamaṃ dorbhyāṃ sasvaje premavihvalaḥ|| 21"],"meaning":"वसुदेवजीको देखते ही नन्दजी सहसा उठकर खड़े हो गये मानो मृतक शरीरमें प्राण आ गया हो। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपने प्रियतम वसुदेवजीको दोनों हाथोंसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया। नन्दबाबा उस समय प्रेमसे विह्वल हो रहे थे॥ २१॥"},{"id":"10.5.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/22/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पूजितः सुखमासीनः पृष्ट्वानामयमादृतः।","प्रसक्तधीः स्वात्मजयोरिदमाह विशाम्पते॥ २२"],"iast":["pūjitaḥ sukhamāsīnaḥ pṛṣṭvānāmayamādṛtaḥ|","prasaktadhīḥ svātmajayoridamāha viśāmpate|| 22"],"meaning":"परीक्षित्! नन्दबाबाने वसुदेवजीका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। वे आदरपूर्वक आरामसे बैठ गये। उस समय उनका चित्त अपने पुत्रोंमें लग रहा था। वे नन्दबाबासे कुशलमंगल पूछकर कहने लगे॥ २२॥"},{"id":"10.5.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/23/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिष्ट्या भ्रातः प्रवयस इदानीमप्रजस्य ते।","प्रजाशाया निवृत्तस्य प्रजा यत् समपद्यत॥ २३"],"iast":["diṣṭyā bhrātaḥ pravayasa idānīmaprajasya te|","prajāśāyā nivṛttasya prajā yat samapadyata|| 23"],"meaning":"[वसुदेवजीने कहा—] ‘भाई! तुम्हारी अवस्था ढल चली थी और अबतक तुम्हें कोई सन्तान नहीं हुई थी। यहाँतक कि अब तुम्हें सन्तानकी कोई आशा भी न थी। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि अब तुम्हें सन्तान प्राप्त हो गयी॥ २३॥"},{"id":"10.5.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/24/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिष्ट्या संसारचक्रेऽस्मिन् वर्तमानः पुनर्भवः।","उपलब्धो भवानद्य दुर्लभं प्रियदर्शनम्॥ २४"],"iast":["diṣṭyā saṃsāracakre'smin vartamānaḥ punarbhavaḥ|","upalabdho bhavānadya durlabhaṃ priyadarśanam|| 24"],"meaning":"यह भी बड़े आनन्दका विषय है कि आज हमलोगोंका मिलना हो गया। अपने प्रेमियोंका मिलना भी बड़ा दुर्लभ है। इस संसारका चक्र ही ऐसा है। इसे तो एक प्रकारका पुनर्जन्म ही समझना चाहिये॥ २४॥"},{"id":"10.5.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/25/","page":153,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नैकत्र प्रियसंवासः सुहृदां चित्रकर्मणाम्।","ओघेन व्यूह्यमानानां प्लवानां स्रोतसो यथा॥ २५"],"iast":["naikatra priyasaṃvāsaḥ suhṛdāṃ citrakarmaṇām|","oghena vyūhyamānānāṃ plavānāṃ srotaso yathā|| 25"],"meaning":"जैसे नदीके प्रबल प्रवाहमें बहते हुए बेड़े और तिनके सदा एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही सगे-सम्बन्धी और प्रेमियोंका भी एक स्थानपर रहना सम्भव नहीं है—यद्यपि वह सबको प्रिय लगता है। क्योंकि सबके प्रारब्धकर्म अलग-अलग होते हैं॥ २५॥"},{"id":"10.5.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/26/","page":154,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कच्चित् पशव्यं निरुजं भूर्यम्बुतृणवीरुधम्।","बृहद्वनं तदधुना यत्रास्से त्वं सुहृद‍्वृतः॥ २६"],"iast":["kaccit paśavyaṃ nirujaṃ bhūryambutṛṇavīrudham|","bṛhadvanaṃ tadadhunā yatrāsse tvaṃ suhṛdvṛtaḥ|| 26"],"meaning":"आजकल तुम जिस महावनमें अपने भाई-बन्धु और स्वजनोंके साथ रहते हो, उसमें जल, घास और लता-पत्रादि तो भरे-पूरे हैं न? वह वन पशुओंके लिये अनुकूल और सब प्रकारके रोगोंसे तो बचा है?॥ २६॥"},{"id":"10.5.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/27/","page":154,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भ्रातर्मम सुतः कच्चिन्मात्रा सह भवद्व्रजे।","तातं भवन्तं मन्वानो भवद‍्भ्यामुपलालितः॥ २७"],"iast":["bhrātarmama sutaḥ kaccinmātrā saha bhavadvraje|","tātaṃ bhavantaṃ manvāno bhavadbhyāmupalālitaḥ|| 27"],"meaning":"भाई! मेरा लड़का अपनी मा (रोहिणी) के साथ तुम्हारे व्रजमें रहता है। उसका लालन-पालन तुम और यशोदा करते हो, इसलिये वह तो तुम्हींको अपने पिता-माता मानता होगा। वह अच्छी तरह है न?॥ २७॥"},{"id":"10.5.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/28/","page":154,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुंसस्त्रिवर्गो विहितः सुहृदो ह्यनुभावितः।","न तेषु क्लिश्यमानेषु त्रिवर्गोऽर्थाय कल्पते॥ २८"],"iast":["puṃsastrivargo vihitaḥ suhṛdo hyanubhāvitaḥ|","na teṣu kliśyamāneṣu trivargo'rthāya kalpate|| 28"],"meaning":"मनुष्यके लिये वे ही धर्म, अर्थ और काम शास्त्रविहित हैं, जिनसे उसके स्वजनोंको सुख मिले। जिनसे केवल अपनेको ही सुख मिलता है; किन्तु अपने स्वजनोंको दुःख मिलता है, वे धर्म, अर्थ और काम हितकारी नहीं हैं’॥ २८॥"},{"id":"10.5.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/29/","page":154,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["अहो ते देवकीपुत्राः कंसेन बहवो हताः।","एकावशिष्टावरजा कन्या सापि दिवं गता॥ २९"],"iast":["aho te devakīputrāḥ kaṃsena bahavo hatāḥ|","ekāvaśiṣṭāvarajā kanyā sāpi divaṃ gatā|| 29"],"meaning":"नन्दबाबाने कहा—भाई वसुदेव! कंसने देवकीके गर्भसे उत्पन्‍न तुम्हारे कई पुत्र मार डाले। अन्तमें एक सबसे छोटी कन्या बच रही थी, वह भी स्वर्ग सिधार गयी॥ २९॥"},{"id":"10.5.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/30/","page":154,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["नूनं ह्यदृष्टनिष्ठोऽयमदृष्टपरमो जनः।","अदृष्टमात्मनस्तत्त्वं यो वेद न स मुह्यति॥ ३०"],"iast":["nūnaṃ hyadṛṣṭaniṣṭho'yamadṛṣṭaparamo janaḥ|","adṛṣṭamātmanastattvaṃ yo veda na sa muhyati|| 30"],"meaning":"इसमें सन्देह नहीं कि प्राणियोंका सुख-दुःख भाग्यपर ही अवलम्बित है। भाग्य ही प्राणीका एकमात्र आश्रय है। जो जान लेता है कि जीवनके सुख-दुःखका कारण भाग्य ही है, वह उनके प्राप्त होनेपर मोहित नहीं होता॥ ३०॥"},{"id":"10.5.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/31/","page":154,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["करो वै वार्षिको दत्तो राज्ञे दृष्टा वयं च वः।","नेह स्थेयं बहुतिथं सन्त्युत्पाताश्‍च गोकुले॥ ३१"],"iast":["karo vai vārṣiko datto rājñe dṛṣṭā vayaṃ ca vaḥ|","neha stheyaṃ bahutithaṃ santyutpātāśca gokule|| 31"],"meaning":"वसुदेवजीने कहा—भाई! तुमने राजा कंसको उसका सालाना कर चुका दिया। हम दोनों मिल भी चुके। अब तुम्हें यहाँ अधिक दिन नहीं ठहरना चाहिये; क्योंकि आजकल गोकुलमें बड़े-बड़े उत्पात हो रहे हैं॥ ३१॥"},{"id":"10.5.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/32/","page":154,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति नन्दादयो गोपाः प्रोक्तास्ते शौरिणा ययुः।","अनोभिरनडुद्युक्तैस्तमनुज्ञाप्य गोकुलम्॥ ३२"],"iast":["iti nandādayo gopāḥ proktāste śauriṇā yayuḥ|","anobhiranaḍudyuktaistamanujñāpya gokulam|| 32"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेवजीने इस प्रकार कहा, तब नन्द आदि गोपोंने उनसे अनुमति ले, बैलोंसे जुते हुए छकड़ोंपर सवार होकर गोकुलकी यात्रा की॥ ३२॥"}],"text":[{"b":27590,"kind":"adhyaya_heading","page":150,"text":"अथ पञ्चमोऽध्यायः"},{"b":27591,"kind":"topic_heading","page":150,"text":"गोकुलमें भगवान्‌का जन्ममहोत्सव"},{"b":27592,"kind":"topic_heading","page":150,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27593,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.5.1"],"text":"नन्दस्त्वात्मज उत्पन्‍ने जाताह्लादो महामनाः।"},{"b":27594,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.5.1"],"text":"आहूय विप्रान् वेदज्ञान् स्नातः शुचिरलंकृतः॥ १"},{"b":27595,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.2"],"text":"वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्मात्मजस्य वै।"},{"b":27596,"kind":"hindi_commentary","page":151,"verses":["10.5.2"],"text":"कारयामास विधिवत् पितृदेवार्चनं तथा॥ २"},{"b":27597,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.3"],"text":"धेनूनां नियुते प्रादाद् विप्रेभ्यः समलंकृते।"},{"b":27598,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.3"],"text":"तिलाद्रीन् सप्त रत्‍नौघशातकौम्भाम्बरावृतान्॥ ३"},{"b":27599,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.4"],"text":"कालेन स्नानशौचाभ्यां संस्कारैस्तपसेज्यया।"},{"b":27600,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.4"],"text":"शुध्यन्ति दानैः सन्तुष्ट्या द्रव्याण्यात्माऽऽत्मविद्यया॥ ४"},{"b":27601,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.5"],"text":"सौमंगल्यगिरो विप्राः सूतमागधवन्दिनः।"},{"b":27602,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.5"],"text":"गायकाश्‍च जगुर्नेदुर्भेर्यो दुन्दुभयो मुहुः॥ ५"},{"b":27603,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.6"],"text":"व्रजः सम्मृष्टसंसिक्तद्वाराजिरगृहान्तरः।"},{"b":27604,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.6"],"text":"चित्रध्वजपताकास्रक्चैलपल्लवतोरणैः॥ ६"},{"b":27605,"kind":"hindi_commentary","page":151,"verses":["10.5.7"],"text":"गावो वृषा वत्सतरा हरिद्रातैलरूषिताः।"},{"b":27606,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.7"],"text":"विचित्रधातुबर्हस्रग्वस्त्रकांचनमालिनः ॥ ७"},{"b":27607,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.8"],"text":"महार्हवस्त्राभरणकंचुकोष्णीषभूषिताः ।"},{"b":27608,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.8"],"text":"गोपाः समाययू राजन् नानोपायनपाणयः॥ ८"},{"b":27609,"kind":"hindi_commentary","page":150,"explains":["10.5.1","10.5.2","10.5.3","10.5.4","10.5.5","10.5.6","10.5.7","10.5.8"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे। पुत्रका जन्म होनेपर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्दसे भर गया। उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। फिर वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया। साथ ही देवता और पितरोंकी विधिपूर्वक पूजा भी करवायी॥ १-२॥ उन्होंने ब्राह्मणोंको वस्त्र और आभूषणोंसे सुसज्जित दो लाख गौएँ दान कीं। रत्‍नों और सुनहले वस्त्रोंसे ढके हुए तिलके सात पहाड़ दान किये॥ ३॥ (संस्कारोंसे ही गर्भशुद्धि होती है—यह प्रदर्शित करनेके लिये अनेक दृष्टान्तोंका उल्लेख करते हैं—) समयसे (नूतनजल, अशुद्ध भूमि आदि), स्नानसे (शरीर आदि), प्रक्षालनसे (वस्त्रादि), संस्कारोंसे (गर्भादि), तपस्यासे (इन्द्रियादि), यज्ञसे (ब्राह्मणादि), दानसे (धन-धान्यादि) और संतोषसे (मन आदि) द्रव्य शुद्ध होते हैं। परन्तु आत्माकी शुद्धि तो आत्मज्ञानसे ही होती है॥ ४॥ उस समय ब्राह्मण, सूत, मागध और वंदीजन मंगलमय आशीर्वाद देने तथा स्तुति करने लगे। गायक गाने लगे। भेरी और दुन्दुभियाँ बार-बार बजने लगीं॥ ५॥ व्रजमण्डलके सभी घरोंके द्वार, आँगन और भीतरी भाग झाड़-बुहार दिये गये; उनमें सुगन्धित जलका छिड़काव किया गया; उन्हें चित्र-विचित्र, ध्वजा-पताका, पुष्पोंकी मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्र और पल्लवोंकी बन्दनवारोंसे सजाया गया॥ ६॥ गाय, बैल और बछड़ोंके अंगोंमें हल्दी-तेलका लेप कर दिया गया और उन्हें गेरू आदि रंगीन धातुएँ, मोरपंख, फूलोंके हार, तरह-तरहके सुन्दर वस्त्र और सोनेकी जंजीरोंसे सजा दिया गया॥ ७॥ परीक्षित्! सभी ग्वाल बहुमूल्य वस्त्र, गहने, अँगरखे और पगड़ियोंसे सुसज्जित होकर और अपने हाथोंमें भेंटकी बहुत-सी सामग्रियाँ ले-लेकर नन्दबाबाके घर आये॥ ८॥"},{"b":27610,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.9"],"text":"गोप्यश्‍चाकर्ण्य मुदिता यशोदायाः सुतोद्भवम्।"},{"b":27611,"kind":"sanskrit_shloka","page":151,"verses":["10.5.9"],"text":"आत्मानं भूषयांचक्रुर्वस्त्राकल्पांजनादिभिः॥ ९"},{"b":27612,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.10"],"text":"नवकुंकुमकिंजल्कमुखपंकजभूतयः ।"},{"b":27613,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.10"],"text":"बलिभिस्त्वरितं जग्मुः पृथुश्रोण्यश्‍चलत्कुचाः॥ १०"},{"b":27614,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.11"],"text":"गोप्यः सुमृष्टमणिकुण्डलनिष्ककण्ठ्य-"},{"b":27615,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.11"],"text":"श्‍चित्राम्बराः पथि शिखाच्युतमाल्यवर्षाः।"},{"b":27616,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.11"],"text":"नन्दालयं सवलया व्रजतीर्विरेजु-"},{"b":27617,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.11"],"text":"र्व्यालोलकुण्डलपयोधरहारशोभाः॥ ११"},{"b":27618,"kind":"hindi_commentary","page":152,"verses":["10.5.12"],"text":"ता आशिषः प्रयुंजानाश्‍चिरं पाहीति बालके।"},{"b":27619,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.12"],"text":"हरिद्राचूर्णतैलाद्भिः सिंचन्त्योऽजनमुज्जगुः॥ १२"},{"b":27620,"kind":"hindi_translation","page":151,"explains":["10.5.9","10.5.10","10.5.11","10.5.12"],"text":"यशोदाजीके पुत्र हुआ है, यह सुनकर गोपियोंको भी बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने सुन्दर-सुन्दर वस्त्र, आभूषण और अंजन आदिसे अपना शृंगार किया॥ ९॥ गोपियोंके मुखकमल बड़े ही सुन्दर जान पड़ते थे। उनपर लगी हुई कुंकुम ऐसी लगती मानो कमलकी केशर हो। उनके नितम्ब बड़े-बड़े थे। वे भेंटकी सामग्री ले-लेकर जल्दी-जल्दी यशोदाजीके पास चलीं। उस समय उनके पयोधर हिल रहे थे॥ १०॥ गोपियोंके कानोंमें चमकती हुई मणियोंके कुण्डल झिलमिला रहे थे। गलेमें सोनेके हार (हैकल या हुमेल) जगमगा रहे थे। वे बड़े सुन्दर-सुन्दर रंग-बिरंगे वस्त्र पहने हुए थीं। मार्गमें उनकी चोटियोंमें गुँथे हुए फूल बरसते जा रहे थे। हाथोंमें जड़ाऊ कंगन अलग ही चमक रहे थे। उनके कानोंके कुण्डल, पयोधर और हार हिलते जाते थे। इस प्रकार नन्दबाबाके घर जाते समय उनकी शोभा बड़ी अनूठी जान पड़ती थी॥ ११॥ नन्दबाबाके घर जाकर वे नवजात शिशुको आशीर्वाद देतीं ‘यह चिरजीवी हो, भगवन्! इसकी रक्षा करो।’ और लोगोंपर हल्दी-तेलसे मिला हुआ पानी छिड़क देतीं तथा ऊँचे स्वरसे मंगलगान करती थीं॥ १२॥"},{"b":27621,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.13"],"text":"अवाद्यन्त विचित्राणि वादित्राणि महोत्सवे।"},{"b":27622,"kind":"hindi_commentary","page":152,"verses":["10.5.13"],"text":"कृष्णे विश्‍वेश्‍वरेऽनन्ते नन्दस्य व्रजमागते॥ १३"},{"b":27623,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.14"],"text":"गोपाः परस्परं हृष्टा दधिक्षीरघृताम्बुभिः।"},{"b":27624,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.14"],"text":"आसिञ्चन्तो विलिम्पन्तो नवनीतैश्‍च चिक्षिपुः॥ १४"},{"b":27625,"kind":"hindi_commentary","page":152,"verses":["10.5.15"],"text":"नन्दो महामनास्तेभ्यो वासोऽलंकारगोधनम्।"},{"b":27626,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.15"],"text":"सूतमागधवन्दिभ्यो येऽन्ये विद्योपजीविनः॥ १५"},{"b":27627,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.16"],"text":"तैस्तैः कामैरदीनात्मा यथोचितमपूजयत्।"},{"b":27628,"kind":"sanskrit_shloka","page":152,"verses":["10.5.16"],"text":"विष्णोराराधनार्थाय स्वपुत्रस्योदयाय च॥ १६"},{"b":27629,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.17"],"text":"रोहिणी च महाभागा नन्दगोपाभिनन्दिता।"},{"b":27630,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.17"],"text":"व्यचरद् दिव्यवासःस्रक्कण्ठाभरणभूषिता॥ १७"},{"b":27631,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.18"],"text":"तत आरभ्य नन्दस्य व्रजः सर्वसमृद्धिमान्।"},{"b":27632,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.18"],"text":"हरेर्निवासात्मगुणै रमाक्रीडमभून्‍नृप॥ १८"},{"b":27633,"kind":"hindi_translation","page":152,"explains":["10.5.13","10.5.14","10.5.15","10.5.16","10.5.17","10.5.18"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण समस्त जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। उनके ऐश्‍वर्य, माधुर्य, वात्सल्य—सभी अनन्त हैं। वे जब नन्दबाबाके व्रजमें प्रकट हुए, उस समय उनके जन्मका महान् उत्सव मनाया गया। उसमें बड़े-बड़े विचित्र और मंगलमय बाजे बजाये जाने लगे॥ १३॥ आनन्दसे मतवाले होकर गोपगण एक-दूसरेपर दही, दूध, घी और पानी उड़ेलने लगे। एक-दूसरेके मुँहपर मक्खन मलने लगे और मक्खन फेंक-फेंककर आनन्दोत्सव मनाने लगे॥ १४॥ नन्दबाबा स्वभावसे ही परम उदार और मनस्वी थे। उन्होंने गोपोंको बहुत-से वस्त्र, आभूषण और गौएँ दीं। सूत-मागध-वंदीजनों, नृत्य, वाद्य आदि विद्याओंसे अपना जीवन-निर्वाह करनेवालों तथा दूसरे गुणीजनोंको भी नन्दबाबाने प्रसन्‍नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ देकर उनका यथोचित सत्कार किया। यह सब करनेमें उनका उद्देश्य यही था कि इन कर्मोंसे भगवान् विष्णु प्रसन्‍न हों और मेरे इस नवजात शिशुका मंगल हो॥ १५-१६॥ नन्दबाबाके अभिनन्दन करनेपर परम सौभाग्यवती रोहिणीजी दिव्य वस्त्र, माला और गलेके भाँति-भाँतिके गहनोंसे सुसज्जित होकर गृहस्वामिनीकी भाँति आने-जानेवाली स्त्रियोंका सत्कार करती हुई विचर रही थीं॥ १७॥ परीक्षित्! उसी दिनसे नन्दबाबाके व्रजमें सब प्रकारकी ऋद्धि-सिद्धियाँ अठखेलियाँ करने लगीं और भगवान् श्रीकृष्णके निवास तथा अपने स्वाभाविक गुणोंके कारण वह लक्ष्मीजीका क्रीडास्थल बन गया॥ १८॥"},{"b":27634,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.19"],"text":"गोपान् गोकुलरक्षायां निरूप्य मथुरां गतः।"},{"b":27635,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.19"],"text":"नन्दः कंसस्य वार्षिक्यं करं दातुं कुरूद्वह॥ १९"},{"b":27636,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.20"],"text":"वसुदेव उपश्रुत्य भ्रातरं नन्दमागतम्।"},{"b":27637,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.20"],"text":"ज्ञात्वा दत्तकरं राज्ञे ययौ तदवमोचनम्॥ २०"},{"b":27638,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.21"],"text":"तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय देहः प्राणमिवागतम्।"},{"b":27639,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.21"],"text":"प्रीतः प्रियतमं दोर्भ्यां सस्वजे प्रेमविह्वलः॥ २१"},{"b":27640,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.22"],"text":"पूजितः सुखमासीनः पृष्ट्वानामयमादृतः।"},{"b":27641,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.22"],"text":"प्रसक्तधीः स्वात्मजयोरिदमाह विशाम्पते॥ २२"},{"b":27642,"kind":"hindi_translation","page":153,"explains":["10.5.19","10.5.20","10.5.21","10.5.22"],"text":"परीक्षित्! कुछ दिनोंके बाद नन्दबाबाने गोकुलकी रक्षाका भार तो दूसरे गोपोंको सौंप दिया और वे स्वयं कंसका वार्षिक कर चुकानेके लिये मथुरा चले गये॥ १९॥ जब वसुदेवजीको यह मालूम हुआ कि हमारे भाई नन्दजी मथुरामें आये हैं और राजा कंसको उसका कर भी दे चुके हैं, तब वे जहाँ नन्दबाबा ठहरे हुए थे, वहाँ गये॥ २०॥ वसुदेवजीको देखते ही नन्दजी सहसा उठकर खड़े हो गये मानो मृतक शरीरमें प्राण आ गया हो। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपने प्रियतम वसुदेवजीको दोनों हाथोंसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया। नन्दबाबा उस समय प्रेमसे विह्वल हो रहे थे॥ २१॥ परीक्षित्! नन्दबाबाने वसुदेवजीका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। वे आदरपूर्वक आरामसे बैठ गये। उस समय उनका चित्त अपने पुत्रोंमें लग रहा था। वे नन्दबाबासे कुशलमंगल पूछकर कहने लगे॥ २२॥"},{"b":27643,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.23"],"text":"दिष्ट्या भ्रातः प्रवयस इदानीमप्रजस्य ते।"},{"b":27644,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.23"],"text":"प्रजाशाया निवृत्तस्य प्रजा यत् समपद्यत॥ २३"},{"b":27645,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.24"],"text":"दिष्ट्या संसारचक्रेऽस्मिन् वर्तमानः पुनर्भवः।"},{"b":27646,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.24"],"text":"उपलब्धो भवानद्य दुर्लभं प्रियदर्शनम्॥ २४"},{"b":27647,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.25"],"text":"नैकत्र प्रियसंवासः सुहृदां चित्रकर्मणाम्।"},{"b":27648,"kind":"sanskrit_shloka","page":153,"verses":["10.5.25"],"text":"ओघेन व्यूह्यमानानां प्लवानां स्रोतसो यथा॥ २५"},{"b":27649,"kind":"hindi_commentary","page":153,"explains":["10.5.23","10.5.24","10.5.25"],"text":"[वसुदेवजीने कहा—] ‘भाई! तुम्हारी अवस्था ढल चली थी और अबतक तुम्हें कोई सन्तान नहीं हुई थी। यहाँतक कि अब तुम्हें सन्तानकी कोई आशा भी न थी। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि अब तुम्हें सन्तान प्राप्त हो गयी॥ २३॥ यह भी बड़े आनन्दका विषय है कि आज हमलोगोंका मिलना हो गया। अपने प्रेमियोंका मिलना भी बड़ा दुर्लभ है। इस संसारका चक्र ही ऐसा है। इसे तो एक प्रकारका पुनर्जन्म ही समझना चाहिये॥ २४॥ जैसे नदीके प्रबल प्रवाहमें बहते हुए बेड़े और तिनके सदा एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही सगे-सम्बन्धी और प्रेमियोंका भी एक स्थानपर रहना सम्भव नहीं है—यद्यपि वह सबको प्रिय लगता है। क्योंकि सबके प्रारब्धकर्म अलग-अलग होते हैं॥ २५॥"},{"b":27650,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.26"],"text":"कच्चित् पशव्यं निरुजं भूर्यम्बुतृणवीरुधम्।"},{"b":27651,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.26"],"text":"बृहद्वनं तदधुना यत्रास्से त्वं सुहृद‍्वृतः॥ २६"},{"b":27652,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.27"],"text":"भ्रातर्मम सुतः कच्चिन्मात्रा सह भवद्व्रजे।"},{"b":27653,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.27"],"text":"तातं भवन्तं मन्वानो भवद‍्भ्यामुपलालितः॥ २७"},{"b":27654,"kind":"hindi_translation","page":154,"explains":["10.5.26","10.5.27"],"text":"आजकल तुम जिस महावनमें अपने भाई-बन्धु और स्वजनोंके साथ रहते हो, उसमें जल, घास और लता-पत्रादि तो भरे-पूरे हैं न? वह वन पशुओंके लिये अनुकूल और सब प्रकारके रोगोंसे तो बचा है?॥ २६॥ भाई! मेरा लड़का अपनी मा (रोहिणी) के साथ तुम्हारे व्रजमें रहता है। उसका लालन-पालन तुम और यशोदा करते हो, इसलिये वह तो तुम्हींको अपने पिता-माता मानता होगा। वह अच्छी तरह है न?॥ २७॥"},{"b":27655,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.28"],"text":"पुंसस्त्रिवर्गो विहितः सुहृदो ह्यनुभावितः।"},{"b":27656,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.28"],"text":"न तेषु क्लिश्यमानेषु त्रिवर्गोऽर्थाय कल्पते॥ २८"},{"b":27657,"kind":"hindi_translation","page":154,"explains":["10.5.28"],"text":"मनुष्यके लिये वे ही धर्म, अर्थ और काम शास्त्रविहित हैं, जिनसे उसके स्वजनोंको सुख मिले। जिनसे केवल अपनेको ही सुख मिलता है; किन्तु अपने स्वजनोंको दुःख मिलता है, वे धर्म, अर्थ और काम हितकारी नहीं हैं’॥ २८॥"},{"b":27658,"kind":"topic_heading","page":154,"text":"नन्द उवाच"},{"b":27659,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.29"],"text":"अहो ते देवकीपुत्राः कंसेन बहवो हताः।"},{"b":27660,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.29"],"text":"एकावशिष्टावरजा कन्या सापि दिवं गता॥ २९"},{"b":27661,"kind":"hindi_commentary","page":154,"explains":["10.5.29"],"text":"नन्दबाबाने कहा—भाई वसुदेव! कंसने देवकीके गर्भसे उत्पन्‍न तुम्हारे कई पुत्र मार डाले। अन्तमें एक सबसे छोटी कन्या बच रही थी, वह भी स्वर्ग सिधार गयी॥ २९॥"},{"b":27662,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.30"],"text":"नूनं ह्यदृष्टनिष्ठोऽयमदृष्टपरमो जनः।"},{"b":27663,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.30"],"text":"अदृष्टमात्मनस्तत्त्वं यो वेद न स मुह्यति॥ ३०"},{"b":27664,"kind":"hindi_translation","page":154,"explains":["10.5.30"],"text":"इसमें सन्देह नहीं कि प्राणियोंका सुख-दुःख भाग्यपर ही अवलम्बित है। भाग्य ही प्राणीका एकमात्र आश्रय है। जो जान लेता है कि जीवनके सुख-दुःखका कारण भाग्य ही है, वह उनके प्राप्त होनेपर मोहित नहीं होता॥ ३०॥"},{"b":27665,"kind":"topic_heading","page":154,"text":"वसुदेव उवाच"},{"b":27666,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.31"],"text":"करो वै वार्षिको दत्तो राज्ञे दृष्टा वयं च वः।"},{"b":27667,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.31"],"text":"नेह स्थेयं बहुतिथं सन्त्युत्पाताश्‍च गोकुले॥ ३१"},{"b":27668,"kind":"topic_heading","page":154,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27669,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.32"],"text":"इति नन्दादयो गोपाः प्रोक्तास्ते शौरिणा ययुः।"},{"b":27670,"kind":"sanskrit_shloka","page":154,"verses":["10.5.32"],"text":"अनोभिरनडुद्युक्तैस्तमनुज्ञाप्य गोकुलम्॥ ३२"},{"b":27671,"kind":"hindi_commentary","page":154,"explains":["10.5.31"],"text":"वसुदेवजीने कहा—भाई! तुमने राजा कंसको उसका सालाना कर चुका दिया। हम दोनों मिल भी चुके। अब तुम्हें यहाँ अधिक दिन नहीं ठहरना चाहिये; क्योंकि आजकल गोकुलमें बड़े-बड़े उत्पात हो रहे हैं॥ ३१॥"},{"b":27672,"kind":"hindi_commentary","page":154,"explains":["10.5.32"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेवजीने इस प्रकार कहा, तब नन्द आदि गोपोंने उनसे अनुमति ले, बैलोंसे जुते हुए छकड़ोंपर सवार होकर गोकुलकी यात्रा की॥ ३२॥"},{"b":27673,"kind":"hindi_translation","page":154,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे नन्दवसुदेवसंगमो नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥"}],"notes":[{"id":"v2:189","mark":"१","page":151,"after_verse":"10.5.2","text":"धिना पितृ०।"},{"id":"v2:190","mark":"२","page":151,"after_verse":"10.5.7","text":"षाः सवत्साश्‍च हरि०।"},{"id":"v2:191","mark":"*","page":151,"after_verse":"10.5.8","text":"पौराणिक।"},{"id":"v2:192","mark":"†","page":151,"after_verse":"10.5.8","text":"वंशका वर्णन करनेवाले।"},{"id":"v2:193","mark":"‡","page":151,"after_verse":"10.5.8","text":"समयानुसार उक्तियोंसे स्तुति करनेवाले भाट। जैसा कि कहा है— ‘सूताः पौराणिकाः प्रोक्ता मागधा वंशशंसकाः । वन्दिनस्त्वमलप्रज्ञाः प्रस्तावसदृशोक्तयः॥’"},{"id":"v2:194","mark":"१","page":152,"after_verse":"10.5.12","text":"जीवेति।"},{"id":"v2:195","mark":"२","page":152,"after_verse":"10.5.13","text":"नन्दव्रजमुपेयुषि।"},{"id":"v2:196","mark":"३","page":152,"after_verse":"10.5.15","text":"धनैः।"}],"corrections":{"count":6,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}