{"id":"10.47","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 47","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः","topics":["उद्धव तथा गोपियोंकी बातचीत और भ्रमरगीत"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.47.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[421,434]},"verses":[{"id":"10.47.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/1/","page":421,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं वीक्ष्य कृष्णानुचरं व्रजस्त्रियः","प्रलम्बबाहुं नवकंजलोचनम्।","पीताम्बरं पुष्करमालिनं लस-","न्मुखारविन्दं मणिमृष्टकुण्डलम्॥ १"],"iast":["taṃ vīkṣya kṛṣṇānucaraṃ vrajastriyaḥ","pralambabāhuṃ navakaṃjalocanam|","pītāmbaraṃ puṣkaramālinaṃ lasa-","nmukhāravindaṃ maṇimṛṣṭakuṇḍalam|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गोपियोंने देखा कि श्रीकृष्णके सेवक उद्धवजीकी आकृति और वेषभूषा श्रीकृष्णसे मिलती-जुलती है। घुटनोंतक लंबी-लंबी भुजाएँ हैं, नूतन कमलदलके समान कोमल नेत्र हैं, शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, गलेमें कमल-पुष्पोंकी माला है, कानोंमें मणिजटित कुण्डल झलक रहे हैं और मुखारविन्द अत्यन्त प्रफुल्लित है॥ १॥"},{"id":"10.47.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/2/","page":421,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शुचिस्मिताः कोऽयमपीच्यदर्शनः","कुतश्‍च कस्याच्युतवेषभूषणः।","इति स्म सर्वाः परिवव्रुरुत्सुका-","स्तमुत्तमश्‍लोकपदाम्बुजाश्रयम् ॥ २"],"iast":["śucismitāḥ ko'yamapīcyadarśanaḥ","kutaśca kasyācyutaveṣabhūṣaṇaḥ|","iti sma sarvāḥ parivavrurutsukā-","stamuttamaślokapadāmbujāśrayam || 2"],"meaning":"पवित्र मुसकानवाली गोपियोंने आपसमें कहा—‘यह पुरुष देखनेमें तो बहुत सुन्दर है। परन्तु यह है कौन? कहाँसे आया है? किसका दूत है? इसने श्रीकृष्ण-जैसी वेषभूषा क्यों धारण कर रखी है?’ सब-की-सब गोपियाँ उनका परिचय प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त उत्सुक हो गयीं और उनमेंसे बहुत-सी पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके आश्रित तथा उनके सेवक-सखा उद्धवजीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं॥ २॥"},{"id":"10.47.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/3/","page":422,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं प्रश्रयेणावनताः सुसत्कृतं","सव्रीडहासेक्षणसूनृतादिभिः ।","रहस्यपृच्छन्‍नुपविष्टमासने","विज्ञाय सन्देशहरं रमापतेः॥ ३"],"iast":["taṃ praśrayeṇāvanatāḥ susatkṛtaṃ","savrīḍahāsekṣaṇasūnṛtādibhiḥ |","rahasyapṛcchannupaviṣṭamāsane","vijñāya sandeśaharaṃ ramāpateḥ|| 3"],"meaning":"जब उन्हें मालूम हुआ कि ये तो रमारमण भगवान् श्रीकृष्णका सन्देश लेकर आये हैं, तब उन्होंने विनयसे झुककर सलज्ज हास्य, चितवन और मधुर वाणी आदिसे उद्धवजीका अत्यन्त सत्कार किया तथा एकान्तमें आसनपर बैठाकर वे उनसे इस प्रकार कहने लगीं—॥ ३॥"},{"id":"10.47.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/4/","page":422,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जानीमस्त्वां यदुपतेः पार्षदं समुपागतम्।","भर्त्रेह प्रेषितः पित्रोर्भवान् प्रियचिकीर्षया॥ ४"],"iast":["jānīmastvāṃ yadupateḥ pārṣadaṃ samupāgatam|","bhartreha preṣitaḥ pitrorbhavān priyacikīrṣayā|| 4"],"meaning":"‘उद्धवजी! हम जानती हैं कि आप यदुनाथके पार्षद हैं। उन्हींका संदेश लेकर यहाँ पधारे हैं। आपके स्वामीने अपने माता-पिताको सुख देनेके लिये आपको यहाँ भेजा है॥ ४॥"},{"id":"10.47.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/5/","page":422,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्यथा गोव्रजे तस्य स्मरणीयं न चक्ष्महे।","स्नेहानुबन्धो बन्धूनां मुनेरपि सुदुस्त्यजः॥ ५"],"iast":["anyathā govraje tasya smaraṇīyaṃ na cakṣmahe|","snehānubandho bandhūnāṃ munerapi sudustyajaḥ|| 5"],"meaning":"अन्यथा हमें तो अब इस नन्दगाँवमें—गौओंके रहनेकी जगहमें उनके स्मरण करने योग्य कोई भी वस्तु दिखायी नहीं पड़ती; माता-पिता आदि सगे-सम्बन्धियोंका स्नेह-बन्धन तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी बड़ी कठिनाईसे छोड़ पाते हैं॥ ५॥"},{"id":"10.47.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/6/","page":422,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्येष्वर्थकृता मैत्री यावदर्थविडम्बनम्।","पुम्भिः स्त्रीषु कृता यद्वत् सुमनस्स्विव षट्पदैः॥ ६"],"iast":["anyeṣvarthakṛtā maitrī yāvadarthaviḍambanam|","pumbhiḥ strīṣu kṛtā yadvat sumanassviva ṣaṭpadaiḥ|| 6"],"meaning":"दूसरोंके साथ जो प्रेम-सम्बन्धका स्वाँग किया जाता है, वह तो किसी-न-किसी स्वार्थके लिये ही होता है। भौंरोंका पुष्पोंसे और पुरुषोंका स्त्रियोंसे ऐसा ही स्वार्थका प्रेम-सम्बन्ध होता है॥ ६॥"},{"id":"10.47.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/7/","page":422,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निस्स्वं त्यजन्ति गणिका अकल्पं नृपतिं प्रजाः।","अधीतविद्या आचार्यमृत्विजो दत्तदक्षिणम्॥ ७"],"iast":["nissvaṃ tyajanti gaṇikā akalpaṃ nṛpatiṃ prajāḥ|","adhītavidyā ācāryamṛtvijo dattadakṣiṇam|| 7"],"meaning":"जब वेश्या समझती है कि अब मेरे यहाँ आनेवालेके पास धन नहीं है, तब उसे वह धता बता देती है। जब प्रजा देखती है कि यह राजा हमारी रक्षा नहीं कर सकता, तब वह उसका साथ छोड़ देती है। अध्ययन समाप्त हो जानेपर कितने शिष्य अपने आचार्योंकी सेवा करते हैं? यज्ञकी दक्षिणा मिली कि ऋत्विजलोग चलते बने॥ ७॥"},{"id":"10.47.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/8/","page":422,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चातिथयो गृहम्।","दग्धं मृगास्तथारण्यं जारो भुक्त्वा रतां स्त्रियम्॥ ८"],"iast":["khagā vītaphalaṃ vṛkṣaṃ bhuktvā cātithayo gṛham|","dagdhaṃ mṛgāstathāraṇyaṃ jāro bhuktvā ratāṃ striyam|| 8"],"meaning":"जब वृक्षपर फल नहीं रहते, तब पक्षीगण वहाँसे बिना कुछ सोचे-विचारे उड़ जाते हैं। भोजन कर लेनेके बाद अतिथिलोग ही गृहस्थकी ओर कब देखते हैं? वनमें आग लगी कि पशु भाग खड़े हुए। चाहे स्त्रीके हृदयमें कितना भी अनुराग हो, जार पुरुष अपना काम बना लेनेके बाद उलटकर भी तो नहीं देखता’॥ ८॥"},{"id":"10.47.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/9/","page":422,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति गोप्यो हि गोविन्दे गतवाक्कायमानसाः।","कृष्णदूते व्रजं याते उद्धवे त्यक्तलौकिकाः॥ ९"],"iast":["iti gopyo hi govinde gatavākkāyamānasāḥ|","kṛṣṇadūte vrajaṃ yāte uddhave tyaktalaukikāḥ|| 9"],"meaning":"परीक्षित्! गोपियोंके मन, वाणी और शरीर श्रीकृष्णमें ही तल्लीन थे। जब भगवान् श्रीकृष्णके दूत बनकर उद्धवजी व्रजमें आये, तब वे उनसे इस प्रकार कहते-कहते यह भूल ही गयीं कि कौन-सी बात किस तरह किसके सामने कहनी चाहिये। भगवान् श्रीकृष्णने बचपनसे लेकर किशोर-अवस्थातक जितनी भी लीलाएँ की थीं, उन सबकी याद कर-करके गोपियाँ उनका गान करने लगीं। वे आत्मविस्मृत होकर स्त्री-सुलभ लज्जाको भी भूल गयीं और फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ९-१०॥","meaning_covers":[9,10]},{"id":"10.47.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/10/","page":423,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गायन्त्यः प्रियकर्माणि रुदत्यश्‍च गतह्रियः।","तस्य संस्मृत्य संस्मृत्य यानि कैशोरबाल्ययोः॥ १०"],"iast":["gāyantyaḥ priyakarmāṇi rudatyaśca gatahriyaḥ|","tasya saṃsmṛtya saṃsmṛtya yāni kaiśorabālyayoḥ|| 10"],"meaning":"परीक्षित्! गोपियोंके मन, वाणी और शरीर श्रीकृष्णमें ही तल्लीन थे। जब भगवान् श्रीकृष्णके दूत बनकर उद्धवजी व्रजमें आये, तब वे उनसे इस प्रकार कहते-कहते यह भूल ही गयीं कि कौन-सी बात किस तरह किसके सामने कहनी चाहिये। भगवान् श्रीकृष्णने बचपनसे लेकर किशोर-अवस्थातक जितनी भी लीलाएँ की थीं, उन सबकी याद कर-करके गोपियाँ उनका गान करने लगीं। वे आत्मविस्मृत होकर स्त्री-सुलभ लज्जाको भी भूल गयीं और फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ९-१०॥","meaning_covers":[9,10]},{"id":"10.47.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/11/","page":423,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["काचिन्मधुकरं दृष्ट्वा ध्यायन्ती कृष्णसंगमम्।","प्रियप्रस्थापितं दूतं कल्पयित्वेदमब्रवीत्॥ ११"],"iast":["kācinmadhukaraṃ dṛṣṭvā dhyāyantī kṛṣṇasaṃgamam|","priyaprasthāpitaṃ dūtaṃ kalpayitvedamabravīt|| 11"],"meaning":"एक गोपीको उस समय स्मरण हो रहा था भगवान् श्रीकृष्णके मिलनकी लीलाका। उसी समय उसने देखा कि पास ही एक भौंरा गुनगुना रहा है। उसने ऐसा समझा मानो मुझे रूठी हुई समझकर श्रीकृष्णने मनानेके लिये दूत भेजा हो। वह गोपी भौंरेसे इस प्रकार कहने लगी—॥ ११॥"},{"id":"10.47.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/12/","page":423,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["मधुप कितवबन्धो मा स्पृशाङ्‌घ्रिं सपत्‍न्याः","कुचविलुलितमालाकुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः ।","वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं","यदुसदसि विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक्॥ १२"],"iast":["madhupa kitavabandho mā spṛśāṅghriṃ sapatnyāḥ","kucavilulitamālākuṅkumaśmaśrubhirnaḥ |","vahatu madhupatistanmāninīnāṃ prasādaṃ","yadusadasi viḍambyaṃ yasya dūtastvamīdṛk|| 12"],"meaning":"गोपीने कहा—रे मधुप! तू कपटीका सखा है; इसलिये तू भी कपटी है। तू हमारे पैरोंको मत छू। झूठे प्रणाम करके हमसे अनुनय-विनय मत कर। हम देख रही हैं कि श्रीकृष्णकी जो वनमाला हमारी सौतोंके वक्षःस्थलके स्पर्शसे मसली हुई है, उसका पीला-पीला कुंकुम तेरी मूछोंपर भी लगा हुआ है। तू स्वयं भी तो किसी कुसुमसे प्रेम नहीं करता, यहाँ-से-वहाँ उड़ा करता है। जैसे तेरे स्वामी, वैसा ही तू! मधुपति श्रीकृष्ण मथुराकी मानिनी नायिकाओंको मनाया करें, उनका वह कुंकुमरूप कृपा-प्रसाद, जो युदवंशियोंकी सभामें उपहास करनेयोग्य है, अपने ही पास रखें। उसे तेरे द्वारा यहाँ भेजनेकी क्या आवश्यकता है?॥ १२॥"},{"id":"10.47.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/13/","page":423,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["सकृदधरसुधां स्वां मोहिनीं पाययित्वा","सुमनस इव सद्यस्तत्यजेऽस्मान् भवादृक्।","परिचरति कथं तत्पादपद्मं तु पद्मा","ह्यपि बत हृतचेता उत्तमश्‍लोकजल्पैः॥ १३"],"iast":["sakṛdadharasudhāṃ svāṃ mohinīṃ pāyayitvā","sumanasa iva sadyastatyaje'smān bhavādṛk|","paricarati kathaṃ tatpādapadmaṃ tu padmā","hyapi bata hṛtacetā uttamaślokajalpaiḥ|| 13"],"meaning":"जैसा तू काला है, वैसे ही वे भी हैं। तू भी पुष्पोंका रस लेकर उड़ जाता है, वैसे ही वे भी निकले। उन्होंने हमें केवल एक बार—हाँ, ऐसा ही लगता है—केवल एक बार अपनी तनिक-सी मोहिनी और परम मादक अधरसुधा पिलायी थी और फिर हम भोली-भाली गोपियोंको छोड़कर वे यहाँसे चले गये। पता नहीं; सुकुमारी लक्ष्मी उनके चरण-कमलोंकी सेवा कैसे करती रहती हैं! अवश्य ही वे छैल-छबीले श्रीकृष्णकी चिकनी-चुपड़ी बातोंमें आ गयी होंगी। चितचोरने उनका भी चित्त चुरा लिया होगा॥ १३॥"},{"id":"10.47.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/14/","page":424,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["किमिह बहु षडङ्‌घ्रे गायसि त्वं यदूना-","मधिपतिमगृहाणामग्रतो नः पुराणम्।","विजयसखसखीनां गीयतां तत्प्रसंगः","क्षपितकुचरुजस्ते कल्पयन्तीष्टमिष्टाः॥ १४"],"iast":["kimiha bahu ṣaḍaṅghre gāyasi tvaṃ yadūnā-","madhipatimagṛhāṇāmagrato naḥ purāṇam|","vijayasakhasakhīnāṃ gīyatāṃ tatprasaṃgaḥ","kṣapitakucarujaste kalpayantīṣṭamiṣṭāḥ|| 14"],"meaning":"अरे भ्रमर! हम वनवासिनी हैं । हमारे तो घर-द्वार भी नहीं है। तू हमलोगोंके सामने यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णका बहुत-सा गुणगान क्यों कर रहा है? यह सब भला हमलोगोंको मनानेके लिये ही तो? परन्तु नहीं-नहीं, वे हमारे लिये कोई नये नहीं हैं। हमारे लिये तो जाने-पहचाने, बिलकुल पुराने हैं। तेरी चापलूसी हमारे पास नहीं चलेगी। तू जा, यहाँसे चला जा और जिनके साथ सदा विजय रहती है, उन श्रीकृष्णकी मधुपुरवासिनी सखियोंके सामने जाकर उनका गुणगान कर। वे नयी हैं, उनकी लीलाएँ कम जानती हैं और इस समय वे उनकी प्यारी हैं; उनके हृदयकी पीड़ा उन्होंने मिटा दी है। वे तेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगी, तेरी चापलूसीसे प्रसन्‍न होकर तुझे मुँहमाँगी वस्तु देंगी॥ १४॥"},{"id":"10.47.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/15/","page":424,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["दिवि भुवि च रसायां काः स्त्रियस्तद्दुरापाः","कपटरुचिरहासभ्रूविजृम्भस्य याः स्युः।","चरणरज उपास्ते यस्य भूतिर्वयं का","अपि च कृपणपक्षे ह्युत्तमश्‍लोकशब्दः॥ १५"],"iast":["divi bhuvi ca rasāyāṃ kāḥ striyastaddurāpāḥ","kapaṭarucirahāsabhrūvijṛmbhasya yāḥ syuḥ|","caraṇaraja upāste yasya bhūtirvayaṃ kā","api ca kṛpaṇapakṣe hyuttamaślokaśabdaḥ|| 15"],"meaning":"भौंरे! वे हमारे लिये छटपटा रहे हैं, ऐसा तू क्यों कहता है? उनकी कपटभरी मनोहर मुसकान और भौंहोंके इशारेसे जो वशमें न हो जायँ, उनके पास दौड़ी न आवें—ऐसी कौन-सी स्त्रियाँ हैं? अरे अनजान! स्वर्गमें, पातालमें और पृथ्वीमें ऐसी एक भी स्त्री नहीं है। औरोंकी तो बात ही क्या, स्वयं लक्ष्मीजी भी उनके चरणरजकी सेवा किया करती हैं। फिर हम श्रीकृष्णके लिये किस गिनतीमें हैं? परन्तु तू उनके पास जाकर कहना कि ‘तुम्हारा नाम तो ‘उत्तमश्‍लोक’ है, अच्छे-अच्छे लोग तुम्हारी कीर्तिका गान करते हैं; परन्तु इसकी सार्थकता तो इसीमें है कि तुम दीनोंपर दया करो। नहीं तो श्रीकृष्ण! तुम्हारा ‘उत्तमश्‍लोक’ नाम झूठा पड़ जाता है॥ १५॥"},{"id":"10.47.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/16/","page":424,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["विसृज शिरसि पादं वेद‍्म्यहं चाटुकारै-","रनुनयविदुषस्तेऽभ्येत्य दौत्यैर्मुकुन्दात्।","स्वकृत इह विसृष्टापत्यपत्यन्यलोका","व्यसृजदकृतचेताः किं नु सन्धेयमस्मिन्॥ १६"],"iast":["visṛja śirasi pādaṃ vedmyahaṃ cāṭukārai-","ranunayaviduṣaste'bhyetya dautyairmukundāt|","svakṛta iha visṛṣṭāpatyapatyanyalokā","vyasṛjadakṛtacetāḥ kiṃ nu sandheyamasmin|| 16"],"meaning":"अरे मधुकर! देख, तू मेरे पैरपर सिर मत टेक। मैं जानती हूँ कि तू अनुनय-विनय करनेमें, क्षमा-याचना करनेमें बड़ा निपुण है। मालूम होता है तू श्रीकृष्णसे ही यही सीखकर आया है कि रूठे हुएको मनानेके लिये दूतको—सन्देश-वाहकको कितनी चाटुकारिता करनी चाहिये। परन्तु तू समझ ले कि यहाँ तेरी दाल नहीं गलनेकी। देख, हमने श्रीकृष्णके लिये ही अपने पति, पुत्र और दूसरे लोगोंको छोड़ दिया। परन्तु उनमें तनिक भी कृतज्ञता नहीं। वे ऐसे निर्मोही निकले कि हमें छोड़कर चलते बने! अब तू ही बता, ऐसे अकृतज्ञके साथ हम क्या सन्धि करें? क्या तू अब भी कहता है कि उनपर विश्‍वास करना चाहिये?॥ १६॥"},{"id":"10.47.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/17/","page":425,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा","स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्।","बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद् ध्वांक्षवद् य-","स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः ॥ १७"],"iast":["mṛgayuriva kapīndraṃ vivyadhe lubdhadharmā","striyamakṛta virūpāṃ strījitaḥ kāmayānām|","balimapi balimattvāveṣṭayad dhvāṃkṣavad ya-","stadalamasitasakhyairdustyajastatkathārthaḥ || 17"],"meaning":"ऐ रे मधुप! जब वे राम बने थे, तब उन्होंने कपिराज बालिको व्याधके समान छिपकर बड़ी निर्दयतासे मारा था। बेचारी शूर्पणखा कामवश उनके पास आयी थी, परन्तु उन्होंने अपनी स्त्रीके वश होकर उस बेचारीके नाक-कान काट लिये और इस प्रकार उसे कुरूप कर दिया। ब्राह्मणके घर वामनके रूपमें जन्म लेकर उन्होंने क्या किया? बलिने तो उनकी पूजा की, उनकी मुँहमाँगी वस्तु दी और उन्होंने उसकी पूजा ग्रहण करके भी उसे वरुणपाशसे बाँधकर पातालमें डाल दिया। ठीक वैसे ही, जैसे कौआ बलि खाकर भी बलि देनेवालेको अपने अन्य साथियोंके साथ मिलकर घेर लेता है और परेशान करता है। अच्छा, तो अब जाने दे; हमें श्रीकृष्णसे क्या, किसी भी काली वस्तुके साथ मित्रतासे कोई प्रयोजन नहीं है। परन्तु यदि तू यह कहे कि ‘जब ऐसा है तब तुमलोग उनकी चर्चा क्यों करती हो?’ तो भ्रमर! हम सच कहती हैं, एक बार जिसे उसका चसका लग जाता है, वह उसे छोड़ नहीं सकता। ऐसी दशामें हम चाहनेपर भी उनकी चर्चा छोड़ नहीं सकतीं॥ १७॥"},{"id":"10.47.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/18/","page":425,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["यदनुचरितलीलाकर्णपीयूषविप्रुट्-","सकृददनविधूतद्वन्द्वधर्मा विनष्टाः।","सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सृज्य दीना","बहव इह विहंगा भिक्षुचर्यां चरन्ति॥ १८"],"iast":["yadanucaritalīlākarṇapīyūṣavipruṭ-","sakṛdadanavidhūtadvandvadharmā vinaṣṭāḥ|","sapadi gṛhakuṭumbaṃ dīnamutsṛjya dīnā","bahava iha vihaṃgā bhikṣucaryāṃ caranti|| 18"],"meaning":"श्रीकृष्णकी लीलारूप कर्णामृतके एक कणका भी जो रसास्वादन कर लेता है, उसके राग-द्वेष, सुख-दुःख आदि सारे द्वन्द्व छूट जाते हैं। यहाँतक कि बहुत-से लोग तो अपनी दुःखमय—दुःखसे सनी हुई घर-गृहस्थी छोड़कर अकिंचन हो जाते हैं, अपने पास कुछ भी संग्रह-परिग्रह नहीं रखते और पक्षियोंकी तरह चुन-चुनकर—भीख माँगकर अपना पेट भरते हैं, दीन-दुनियासे जाते रहते हैं। फिर भी श्रीकृष्णकी लीलाकथा छोड़ नहीं पाते। वास्तवमें उसका रस, उसका चसका ऐसा ही है। यही दशा हमारी हो रही है॥ १८॥"},{"id":"10.47.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/19/","page":425,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["वयमृतमिव जिह्मव्याहृतं श्रद्दधानाः","कुलिकरुतमिवाज्ञाः कृष्णवध्वो हरिण्यः।","ददृशुरसकृदेतत्तन्‍नखस्पर्शतीव्र-","स्मररुज उपमन्त्रिन् भण्यतामन्यवार्ता॥ १९"],"iast":["vayamṛtamiva jihmavyāhṛtaṃ śraddadhānāḥ","kulikarutamivājñāḥ kṛṣṇavadhvo hariṇyaḥ|","dadṛśurasakṛdetattannakhasparśatīvra-","smararuja upamantrin bhaṇyatāmanyavārtā|| 19"],"meaning":"जैसे कृष्णसार मृगकी पत्‍नी भोली-भाली हरिनियाँ व्याधके सुमधुर गानका विश्‍वास कर लेती हैं और उसके जालमें फँसकर मारी जाती हैं, वैसे ही हम भोली-भाली गोपियाँ भी उस छलिया कृष्णकी कपटभरी मीठी-मीठी बातोंमें आकर उन्हें सत्यके समान मान बैठीं और उनके नखस्पर्शसे होनेवाली कामव्याधिका बार-बार अनुभव करती रहीं। इसलिये श्रीकृष्णके दूत भौंरे! अब इस विषयमें तू और कुछ मत कह। तुझे कहना ही हो तो कोई दूसरी बात कह॥ १९॥"},{"id":"10.47.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/20/","page":426,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["प्रियसख पुनरागाः प्रेयसा प्रेषितः किं","वरय किमनुरुन्धे माननीयोऽसि मेऽङ्ग।","नयसि कथमिहास्मान् दुस्त्यजद्वन्द्वपार्श्‍वं","सततमुरसि सौम्य श्रीर्वधूः साकमास्ते॥ २०"],"iast":["priyasakha punarāgāḥ preyasā preṣitaḥ kiṃ","varaya kimanurundhe mānanīyo'si me'ṅga|","nayasi kathamihāsmān dustyajadvandvapārśvaṃ","satatamurasi saumya śrīrvadhūḥ sākamāste|| 20"],"meaning":"हमारे प्रियतमके प्यारे सखा! जान पड़ता है तुम एक बार उधर जाकर फिर लौट आये हो। अवश्य ही हमारे प्रियतमने मनानेके लिये तुम्हें भेजा होगा। प्रिय भ्रमर! तुम सब प्रकारसे हमारे माननीय हो। कहो, तुम्हारी क्या इच्छा है? हमसे जो चाहो सो माँग लो। अच्छा, तुम सच बताओ, क्या हमें वहाँ ले चलना चाहते हो? अजी, उनके पास जाकर लौटना बड़ा कठिन है। हम तो उनके पास जा चुकी हैं। परन्तु तुम हमें वहाँ ले जाकर करोगे क्या? प्यारे भ्रमर! उनके साथ—उनके वक्षःस्थलपर तो उनकी प्यारी पत्‍नी लक्ष्मीजी सदा रहती हैं न? तब वहाँ हमारा निर्वाह कैसे होगा॥ २०॥"},{"id":"10.47.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/21/","page":426,"speaker":"गोप्युवाच","sanskrit":["अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनाऽऽस्ते","स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्‍च गोपान्।","क्वचिदपि स कथा नः किंकरीणां गृणीते","भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध्‍न्‍यधास्यत् कदा नु॥ २१"],"iast":["api bata madhupuryāmāryaputro'dhunā''ste","smarati sa pitṛgehān saumya bandhūṃśca gopān|","kvacidapi sa kathā naḥ kiṃkarīṇāṃ gṛṇīte","bhujamagurusugandhaṃ mūrdhnyadhāsyat kadā nu|| 21"],"meaning":"अच्छा, हमारे प्रियतमके प्यारे दूत मधुकर! हमें यह बतलाओ कि आर्यपुत्र भगवान् श्रीकृष्ण गुरुकुलसे लौटकर मधुपुरीमें अब सुखसे तो हैं न? क्या वे कभी नन्दबाबा, यशोदारानी, यहाँके घर, सगे-सम्बन्धी और ग्वालबालोंकी भी याद करते हैं? और क्या हम दासियोंकी भी कोई बात कभी चलाते हैं? प्यारे भ्रमर! हमें यह भी बतलाओ कि कभी वे अपनी अगरके समान दिव्य सुगन्धसे युक्त भुजा हमारे सिरोंपर रखेंगे? क्या हमारे जीवनमें कभी ऐसा शुभ अवसर भी आयेगा?॥ २१॥"},{"id":"10.47.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/22/","page":426,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथोद्धवो निशम्यैवं कृष्णदर्शनलालसाः।","सान्त्वयन् प्रियसन्देशैर्गोपीरिदमभाषत॥ २२"],"iast":["athoddhavo niśamyaivaṃ kṛṣṇadarśanalālasāḥ|","sāntvayan priyasandeśairgopīridamabhāṣata|| 22"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये अत्यन्त उत्सुक—लालायित हो रही थीं, उनके लिये तड़प रही थीं। उनकी बातें सुनकर उद्धवजीने उन्हें उनके प्रियतमका सन्देश सुनाकर सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा—॥ २२॥"},{"id":"10.47.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/23/","page":426,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["अहो यूयं स्म पूर्णार्था भवत्यो लोकपूजिताः।","वासुदेवे भगवति यासामित्यर्पितं मनः॥ २३"],"iast":["aho yūyaṃ sma pūrṇārthā bhavatyo lokapūjitāḥ|","vāsudeve bhagavati yāsāmityarpitaṃ manaḥ|| 23"],"meaning":"उद्धवजीने कहा—अहो गोपियो! तुम कृतकृत्य हो। तुम्हारा जीवन सफल है। देवियो! तुम सारे संसारके लिये पूजनीय हो; क्योंकि तुमलोगोंने इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णको अपना हृदय, अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया है॥ २३॥"},{"id":"10.47.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/24/","page":426,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["दानव्रततपोहोमजपस्वाध्यायसंयमैः ।","श्रेयोभिर्विविधैश्‍चान्यैः कृष्णे भक्तिर्हि साध्यते॥ २४"],"iast":["dānavratatapohomajapasvādhyāyasaṃyamaiḥ |","śreyobhirvividhaiścānyaiḥ kṛṣṇe bhaktirhi sādhyate|| 24"],"meaning":"दान, व्रत, तप, होम, जप, वेदाध्ययन, ध्यान, धारणा, समाधि और कल्याणके अन्य विविध साधनोंके द्वारा भगवान्‌की भक्ति प्राप्त हो, यही प्रयत्‍न किया जाता है॥ २४॥"},{"id":"10.47.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/25/","page":427,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["भगवत्युत्तमश्‍लोके भवतीभिरनुत्तमा।","भक्तिः प्रवर्तिता दिष्ट्या मुनीनामपि दुर्लभा॥ २५"],"iast":["bhagavatyuttamaśloke bhavatībhiranuttamā|","bhaktiḥ pravartitā diṣṭyā munīnāmapi durlabhā|| 25"],"meaning":"यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमलोगोंने पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके प्रति वही सर्वोत्तम प्रेमभक्ति प्राप्त की है और उसीका आदर्श स्थापित किया है, जो बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है॥ २५॥"},{"id":"10.47.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/26/","page":427,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["दिष्ट्या पुत्रान् पतीन् देहान् स्वजनान् भवनानि च।","हित्वावृणीत यूयं यत् कृष्णाख्यं पुरुषं परम्॥ २६"],"iast":["diṣṭyā putrān patīn dehān svajanān bhavanāni ca|","hitvāvṛṇīta yūyaṃ yat kṛṣṇākhyaṃ puruṣaṃ param|| 26"],"meaning":"सचमुच यह कितने सौभाग्यकी बात है कि तुमने अपने पुत्र, पति, देह, स्वजन और घरोंको छोड़कर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णको, जो सबके परम पति हैं, पतिके रूपमें वरण किया है॥ २६॥"},{"id":"10.47.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/27/","page":427,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["सर्वात्मभावोऽधिकृतो भवतीनामधोक्षजे।","विरहेण महाभागा महान् मेऽनुग्रहः कृतः॥ २७"],"iast":["sarvātmabhāvo'dhikṛto bhavatīnāmadhokṣaje|","viraheṇa mahābhāgā mahān me'nugrahaḥ kṛtaḥ|| 27"],"meaning":"महाभाग्यवती गोपियो! भगवान् श्रीकृष्णके वियोगसे तुमने उन इन्द्रियातीत परमात्माके प्रति वह भाव प्राप्त कर लिया है, जो सभी वस्तुओंके रूपमें उनका दर्शन कराता है। तुमलोगोंका वह भाव मेरे सामने भी प्रकट हुआ, यह मेरे ऊपर तुम देवियोंकी बड़ी ही दया है॥ २७॥"},{"id":"10.47.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/28/","page":427,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["श्रूयतां प्रियसन्देशो भवतीनां सुखावहः।","यमादायागतो भद्रा अहं भर्तू रहस्करः॥ २८"],"iast":["śrūyatāṃ priyasandeśo bhavatīnāṃ sukhāvahaḥ|","yamādāyāgato bhadrā ahaṃ bhartū rahaskaraḥ|| 28"],"meaning":"मैं अपने स्वामीका गुप्त काम करनेवाला दूत हूँ। तुम्हारे प्रियतम भगवान् श्रीकृष्णने तुमलोगोंको परम सुख देनेके लिये यह प्रिय सन्देश भेजा है। कल्याणियो! वही लेकर मैं तुमलोगोंके पास आया हूँ, अब उसे सुनो॥ २८॥"},{"id":"10.47.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/29/","page":427,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्‍वचित्।","यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वग्‍निर्जलं मही।","तथाहं च मनःप्राणभूतेन्द्रियगुणाश्रयः॥ २९"],"iast":["bhavatīnāṃ viyogo me na hi sarvātmanā kvacit|","yathā bhūtāni bhūteṣu khaṃ vāyvagnirjalaṃ mahī|","tathāhaṃ ca manaḥprāṇabhūtendriyaguṇāśrayaḥ|| 29"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा है—मैं सबका उपादान कारण होनेसे सबका आत्मा हूँ, सबमें अनुगत हूँ; इसलिये मुझसे कभी भी तुम्हारा वियोग नहीं हो सकता। जैसे संसारके सभी भौतिक पदार्थोंमें आकाश, वायु, अग्‍नि, जल और पृथ्वी—ये पाँचों भूत व्याप्त हैं, इन्हींसे सब वस्तुएँ बनी हैं, और यही उन वस्तुओंके रूपमें हैं। वैसे ही मैं मन, प्राण, पंचभूत, इन्द्रिय और उनके विषयोंका आश्रय हूँ। वे मुझमें हैं, मैं उनमें हूँ और सच पूछो तो मैं ही उनके रूपमें प्रकट हो रहा हूँ॥ २९॥"},{"id":"10.47.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/30/","page":427,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं सृजे हन्म्यनुपालये।","आत्ममायानुभावेन भूतेन्द्रियगुणात्मना॥ ३०"],"iast":["ātmanyevātmanā''tmānaṃ sṛje hanmyanupālaye|","ātmamāyānubhāvena bhūtendriyaguṇātmanā|| 30"],"meaning":"मैं ही अपनी मायाके द्वारा भूत, इन्द्रिय और उनके विषयोंके रूपमें होकर उनका आश्रय बन जाता हूँ तथा स्वयं निमित्त भी बनकर अपने-आपको ही रचता हूँ, पालता हूँ और समेट लेता हूँ॥ ३०॥"},{"id":"10.47.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/31/","page":427,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आत्मा ज्ञानमयः शुद्धो व्यतिरिक्तोऽगुणान्वयः।","सुषुप्तिस्वप्नजाग्रद्भिर्मायावृत्तिभिरीयते॥ ३१"],"iast":["ātmā jñānamayaḥ śuddho vyatirikto'guṇānvayaḥ|","suṣuptisvapnajāgradbhirmāyāvṛttibhirīyate|| 31"],"meaning":"आत्मा माया और मायाके कार्योंसे पृथक् है। वह विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, जड प्रकृति, अनेक जीव तथा अपने ही अवान्तर भेदोंसे रहित सर्वथा शुद्ध है। कोई भी गुण उसका स्पर्श नहीं कर पाते। मायाकी तीन वृत्तियाँ हैं—सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत्। इनके द्वारा वही अखण्ड, अनन्त बोधस्वरूप आत्मा कभी प्राज्ञ, तो कभी तैजस और कभी विश्‍वरूपसे प्रतीत होता है॥ ३१॥"},{"id":"10.47.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/32/","page":428,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["येनेन्द्रियार्थान् ध्यायेत मृषा स्वप्नवदुत्थितः।","तन्‍निरुन्ध्यादिन्द्रियाणि विनिद्रः प्रत्यपद्यत॥ ३२"],"iast":["yenendriyārthān dhyāyeta mṛṣā svapnavadutthitaḥ|","tannirundhyādindriyāṇi vinidraḥ pratyapadyata|| 32"],"meaning":"मनुष्यको चाहिये कि वह समझे कि स्वप्नमें दीखनेवाले पदार्थोंके समान ही जाग्रत्-अवस्थामें इन्द्रियोंके विषय भी प्रतीत हो रहे हैं, वे मिथ्या हैं। इसलिये उन विषयोंका चिन्तन करनेवाले मन और इन्द्रियोंको रोक ले और मानो सोकर उठा हो, इस प्रकार जगत‍्के स्वाप्निक विषयोंको त्यागकर मेरा साक्षात्कार करे॥ ३२॥"},{"id":"10.47.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/33/","page":428,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतदन्तः समाम्‍नायो योगः सांख्यं मनीषिणाम्।","त्यागस्तपो दमः सत्यं समुद्रान्ता इवापगाः॥ ३३"],"iast":["etadantaḥ samāmnāyo yogaḥ sāṃkhyaṃ manīṣiṇām|","tyāgastapo damaḥ satyaṃ samudrāntā ivāpagāḥ|| 33"],"meaning":"जिस प्रकार सभी नदियाँ घूम-फिरकर समुद्रमें ही पहुँचती हैं, उसी प्रकार मनस्वी पुरुषोंका वेदाभ्यास, योग-साधन, आत्मानात्मविवेक, त्याग, तपस्या, इन्द्रियसंयम और सत्य आदि समस्त धर्म, मेरी प्राप्तिमें ही समाप्त होते हैं। सबका सच्चा फल है मेरा साक्षात्कार; क्योंकि वे सब मनको निरुद्ध करके मेरे पास पहुँचाते हैं॥ ३३॥"},{"id":"10.47.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/34/","page":428,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यत्त्वहं भवतीनां वै दूरे वर्ते प्रियो दृशाम्।","मनसः सन्‍निकर्षार्थं मदनुध्यानकाम्यया॥ ३४"],"iast":["yattvahaṃ bhavatīnāṃ vai dūre varte priyo dṛśām|","manasaḥ sannikarṣārthaṃ madanudhyānakāmyayā|| 34"],"meaning":"गोपियो! इसमें सन्देह नहीं कि मैं तुम्हारे नयनोंका ध्रुवतारा हूँ। तुम्हारा जीवन-सर्वस्व हूँ। किन्तु मैं जो तुमसे इतना दूर रहता हूँ, उसका कारण है। वह यही कि तुम निरन्तर मेरा ध्यान कर सको, शरीरसे दूर रहनेपर भी मनसे तुम मेरी सन्‍निधिका अनुभव करो, अपना मन मेरे पास रखो॥ ३४॥"},{"id":"10.47.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/35/","page":428,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यथा दूरचरे प्रेष्ठे मन आविश्य वर्तते।","स्त्रीणां च न तथा चेतः सन्‍निकृष्टेऽक्षिगोचरे॥ ३५"],"iast":["yathā dūracare preṣṭhe mana āviśya vartate|","strīṇāṃ ca na tathā cetaḥ sannikṛṣṭe'kṣigocare|| 35"],"meaning":"क्योंकि स्त्रियों और अन्यान्य प्रेमियोंका चित्त अपने परदेशी प्रियतममें जितना निश्‍चल भावसे लगा रहता है, उतना आँखोंके सामने, पास रहनेवाले प्रियतममें नहीं लगता॥ ३५॥"},{"id":"10.47.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/36/","page":428,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मय्यावेश्य मनः कृत्स्नं विमुक्ताशेषवृत्ति यत्।","अनुस्मरन्त्यो मां नित्यमचिरान्मामुपैष्यथ॥ ३६"],"iast":["mayyāveśya manaḥ kṛtsnaṃ vimuktāśeṣavṛtti yat|","anusmarantyo māṃ nityamacirānmāmupaiṣyatha|| 36"],"meaning":"अशेष वृत्तियोंसे रहित सम्पूर्ण मन मुझमें लगाकर जब तुमलोग मेरा अनुस्मरण करोगी, तब शीघ्र ही सदाके लिये मुझे प्राप्त हो जाओगी॥ ३६॥"},{"id":"10.47.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/37/","page":428,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["या मया क्रीडता रात्र्यां वनेऽस्मिन् व्रज आस्थिताः।","अलब्धरासाः कल्याण्यो माऽऽपुर्मद्वीर्यचिन्तया॥ ३७"],"iast":["yā mayā krīḍatā rātryāṃ vane'smin vraja āsthitāḥ|","alabdharāsāḥ kalyāṇyo mā''purmadvīryacintayā|| 37"],"meaning":"कल्याणियो! जिस समय मैंने वृन्दावनमें शारदीय पूर्णिमाकी रात्रिमें रासक्रीडा की थी उस समय जो गोपियाँ स्वजनोंके रोक लेनेसे व्रजमें ही रह गयीं—मेरे साथ रास-विहारमें सम्मिलित न हो सकीं, वे मेरी लीलाओंका स्मरण करनेसे ही मुझे प्राप्त हो गयी थीं। (तुम्हें भी मैं मिलूँगा अवश्य, निराश होनेकी कोई बात नहीं है )॥ ३७॥"},{"id":"10.47.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/38/","page":428,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं प्रियतमादिष्टमाकर्ण्य व्रजयोषितः।","ता ऊचुरुद्धवं प्रीतास्तत्सन्देशागतस्मृतीः॥ ३८"],"iast":["evaṃ priyatamādiṣṭamākarṇya vrajayoṣitaḥ|","tā ūcuruddhavaṃ prītāstatsandeśāgatasmṛtīḥ|| 38"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपने प्रियतम श्रीकृष्णका यह सँदेशा सुनकर गोपियोंको बड़ा आनन्द हुआ उनके संदेशसे उन्हें श्रीकृष्णके स्वरूप और एक-एक लीलाकी याद आने लगी। प्रेमसे भरकर उन्होंने उद्धवजीसे कहा॥ ३८॥"},{"id":"10.47.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/39/","page":429,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["दिष्ट्याहितो हतः कंसो यदूनां सानुगोऽघकृत्।","दिष्ट्याऽऽप्तैर्लब्धसर्वार्थैः कुशल्यास्तेऽच्युतोऽधुना॥ ३९"],"iast":["diṣṭyāhito hataḥ kaṃso yadūnāṃ sānugo'ghakṛt|","diṣṭyā''ptairlabdhasarvārthaiḥ kuśalyāste'cyuto'dhunā|| 39"],"meaning":"गोपियोंने कहा—उद्धवजी! यह बड़े सौभाग्यकी और आनन्दकी बात है कि यदुवंशियोंको सतानेवाला पापी कंस अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। यह भी कम आनन्दकी बात नहीं है कि श्रीकृष्णके बन्धु-बान्धव और गुरुजनोंके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये तथा अब हमारे प्यारे श्यामसुन्दर उनके साथ सकुशल निवास कर रहे हैं॥ ३९॥"},{"id":"10.47.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/40/","page":429,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["कच्चिद् गदाग्रजः सौम्य करोति पुरयोषिताम्।","प्रीतिं नः स्निग्धसव्रीडहासोदारेक्षणार्चितः॥ ४०"],"iast":["kaccid gadāgrajaḥ saumya karoti purayoṣitām|","prītiṃ naḥ snigdhasavrīḍahāsodārekṣaṇārcitaḥ|| 40"],"meaning":"किन्तु उद्धवजी! एक बात आप हमें बतलाइये। ‘जिस प्रकार हम अपनी प्रेमभरी लजीली मुसकान और उन्मुक्त चितवनसे उनकी पूजा करती थीं और वे भी हमसे प्यार करते थे, उसी प्रकार मथुराकी स्त्रियोंसे भी वे प्रेम करते हैं या नहीं?’॥ ४०॥"},{"id":"10.47.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/41/","page":429,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["कथं रतिविशेषज्ञः प्रियश्‍च वरयोषिताम्।","नानुबध्येत तद्वाक्यैर्विभ्रमैश्‍चानुभाजितः॥ ४१"],"iast":["kathaṃ rativiśeṣajñaḥ priyaśca varayoṣitām|","nānubadhyeta tadvākyairvibhramaiścānubhājitaḥ|| 41"],"meaning":"तबतक दूसरी गोपी बोल उठी—‘अरी सखी! हमारे प्यारे श्यामसुन्दर तो प्रेमकी मोहिनी कलाके विशेषज्ञ हैं। सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ उनसे प्यार करती हैं, फिर भला जब नगरकी स्त्रियाँ उनसे मीठी-मीठी बातें करेंगी और हाव-भावसे उनकी ओर देखेंगी तब वे उनपर क्यों न रीझेंगे?’॥ ४१॥"},{"id":"10.47.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/42/","page":429,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["अपि स्मरति नः साधो गोविन्दः प्रस्तुते क्‍वचित्।","गोष्ठीमध्ये पुरस्त्रीणां ग्राम्याः स्वैरकथान्तरे॥ ४२"],"iast":["api smarati naḥ sādho govindaḥ prastute kvacit|","goṣṭhīmadhye purastrīṇāṃ grāmyāḥ svairakathāntare|| 42"],"meaning":"दूसरी गोपियाँ बोलीं—‘साधो! आप यह तो बतलाइये कि जब कभी नागरी नारियोंकी मण्डलीमें कोई बात चलती है और हमारे प्यारे स्वच्छन्दरूपसे, बिना किसी संकोचके जब प्रेमकी बातें करने लगते हैं, तब क्या कभी प्रसंगवश हम गँवार ग्वालिनों-की भी याद करते हैं?’॥ ४२॥"},{"id":"10.47.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/43/","page":429,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["ताः किं निशाः स्मरति यासु तदा प्रियाभि-","र्वृन्दावने कुमुदकुन्दशशांकरम्ये।","रेमे क्वणच्चरणनूपुररासगोष्ठ्या-","मस्माभिरीडितमनोज्ञकथः कदाचित्॥ ४३"],"iast":["tāḥ kiṃ niśāḥ smarati yāsu tadā priyābhi-","rvṛndāvane kumudakundaśaśāṃkaramye|","reme kvaṇaccaraṇanūpurarāsagoṣṭhyā-","masmābhirīḍitamanojñakathaḥ kadācit|| 43"],"meaning":"कुछ गोपियोंने कहा—‘उद्धवजी! क्या कभी श्रीकृष्ण उन रात्रियोंका स्मरण करते हैं, जब कुमुदिनी तथा कुन्दके पुष्प खिले हुए थे, चारों ओर चाँदनी छिटक रही थी और वृन्दावन अत्यन्त रमणीय हो रहा था! उन रात्रियोंमें ही उन्होंने रास-मण्डल बनाकर हमलोगोंके साथ नृत्य किया था। कितनी सुन्दर थी वह रासलीला! उस समय हमलोगोंके पैरोंके नूपुर रुनझुन-रुनझुन बज रहे थे। हम सब सखियाँ उन्हींकी सुन्दर-सुन्दर लीलाओंका गान कर रही थीं और वे हमारे साथ नाना प्रकारके विहार कर रहे थे’॥ ४३॥"},{"id":"10.47.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/44/","page":430,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["अप्येष्यतीह दाशार्हस्तप्ताः स्वकृतया शुचा।","संजीवयन् नु नो गात्रैर्यथेन्द्रो वनमम्बुदैः॥ ४४"],"iast":["apyeṣyatīha dāśārhastaptāḥ svakṛtayā śucā|","saṃjīvayan nu no gātrairyathendro vanamambudaiḥ|| 44"],"meaning":"कुछ दूसरी गोपियाँ बोल उठीं—‘उद्धवजी! हम सब तो उन्हींके विरहकी आगसे जल रही हैं। देवराज इन्द्र जैसे जल बरसाकर वनको हरा-भरा कर देते हैं, उसी प्रकार क्या कभी श्रीकृष्ण भी अपने कर-स्पर्श आदिसे हमें जीवनदान देनेके लिये यहाँ आवेंगे?’॥ ४४॥"},{"id":"10.47.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/45/","page":430,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["कस्मात् कृष्ण इहायाति प्राप्तराज्यो हताहितः।","नरेन्द्रकन्या उद्वाह्य प्रीतः सर्वसुहृद‍्वृतः॥ ४५"],"iast":["kasmāt kṛṣṇa ihāyāti prāptarājyo hatāhitaḥ|","narendrakanyā udvāhya prītaḥ sarvasuhṛdvṛtaḥ|| 45"],"meaning":"तबतक एक गोपीने कहा—‘अरी सखी! अब तो उन्होंने शत्रुओंको मारकर राज्य पा लिया है; जिसे देखो, वही उनका सुहृद् बना फिरता है। अब वे बड़े-बड़े नरपतियोंकी कुमारियोंसे विवाह करेंगे, उनके साथ आनन्दपूर्वक रहेंगे; यहाँ हम गँवारिनोंके पास क्यों आयेंगे?’॥ ४५॥"},{"id":"10.47.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/46/","page":430,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["किमस्माभिर्वनौकोभिरन्याभिर्वा महात्मनः।","श्रीपतेराप्तकामस्य क्रियेतार्थः कृतात्मनः॥ ४६"],"iast":["kimasmābhirvanaukobhiranyābhirvā mahātmanaḥ|","śrīpaterāptakāmasya kriyetārthaḥ kṛtātmanaḥ|| 46"],"meaning":"दूसरी गोपीने कहा—‘नहीं सखी! महात्मा श्रीकृष्ण तो स्वयं लक्ष्मीपति हैं। उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण ही हैं, वे कृतकृत्य हैं। हम वनवासिनी ग्वालिनों अथवा दूसरी राजकुमारियोंसे उनका कोई प्रयोजन नहीं है। हमलोगोंके बिना उनका कौन-सा काम अटक रहा है॥ ४६॥"},{"id":"10.47.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/47/","page":430,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["परं सौख्यं हि नैराश्यं स्वैरिण्यप्याह पिंगला।","तज्जानतीनां नः कृष्णे तथाप्याशा दुरत्यया॥ ४७"],"iast":["paraṃ saukhyaṃ hi nairāśyaṃ svairiṇyapyāha piṃgalā|","tajjānatīnāṃ naḥ kṛṣṇe tathāpyāśā duratyayā|| 47"],"meaning":"देखो वेश्या होनेपर भी पिंगलाने क्या ही ठीक कहा है—संसारमें किसीकी आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है।’ यह बात हम जानती हैं, फिर भी हम भगवान् श्रीकृष्णके लौटनेकी आशा छोड़नेमें असमर्थ हैं। उनके शुभागमनकी आशा ही तो हमारा जीवन है॥ ४७॥"},{"id":"10.47.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/48/","page":430,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["क उत्सहेत सन्त्यक्तुमुत्तमश्‍लोकसंविदम्।","अनिच्छतोऽपि यस्य श्रीरंगान्‍न च्यवते क्‍वचित्॥ ४८"],"iast":["ka utsaheta santyaktumuttamaślokasaṃvidam|","anicchato'pi yasya śrīraṃgānna cyavate kvacit|| 48"],"meaning":"हमारे प्यारे श्यामसुन्दरने, जिनकी कीर्तिका गान बड़े-बड़े महात्मा करते रहते हैं, हमसे एकान्तमें जो मीठी-मीठी प्रेमकी बातें की हैं उन्हें छोड़नेका, भुलानेका उत्साह भी हम कैसे कर सकती हैं? देखो तो, उनकी इच्छा न होनेपर भी स्वयं लक्ष्मीजी उनके चरणोंसे लिपटी रहती हैं, एक क्षणके लिये भी उनका अंग-संग छोड़कर कहीं नहीं जातीं॥ ४८॥"},{"id":"10.47.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/49/","page":431,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["सरिच्छैलवनोद्देशा गावो वेणुरवा इमे।","संकर्षणसहायेन कृष्णेनाचरिताः प्रभो॥ ४९"],"iast":["saricchailavanoddeśā gāvo veṇuravā ime|","saṃkarṣaṇasahāyena kṛṣṇenācaritāḥ prabho|| 49"],"meaning":"उद्धवजी! यह वही नदी है, जिसमें वे विहार करते थे। यह वही पर्वत है, जिसके शिखरपर चढ़कर वे बाँसुरी बजाते थे। ये वे ही वन हैं, जिनमें वे रात्रिके समय रासलीला करते थे, और ये वे ही गौएँ हैं, जिनको चरानेके लिये वे सुबह-शाम हमलोगोंको देखते हुए जाते-आते थे। और यह ठीक वैसी ही वंशीकी तान हमारे कानोंमें गूँजती रहती है, जैसी वे अपने अधरोंके संयोगसे छेड़ा करते थे। बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने इन सभीका सेवन किया है॥ ४९॥"},{"id":"10.47.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/50/","page":431,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["पुनः पुनः स्मारयन्ति नन्दगोपसुतं बत।","श्रीनिकेतैस्तत्पदकैर्विस्मर्तुं नैव शक्‍नुमः॥ ५०"],"iast":["punaḥ punaḥ smārayanti nandagopasutaṃ bata|","śrīniketaistatpadakairvismartuṃ naiva śaknumaḥ|| 50"],"meaning":"यहाँका एक-एक प्रदेश, एक-एक धूलिकण उनके परम सुन्दर चरणकमलोंसे चिह्नित है। इन्हें जब-जब हम देखती हैं, सुनती हैं—दिनभर यही तो करती रहती हैं—तब-तब वे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर नन्दनन्दनको हमारे नेत्रोंके सामने लाकर रख देते हैं। उद्धवजी! हम किसी भी प्रकार मरकर भी उन्हें भूल नहीं सकतीं॥ ५०॥"},{"id":"10.47.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/51/","page":431,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["गत्या ललितयोदारहासलीलावलोकनैः।","माध्व्या गिरा हृतधियः कथं तं विस्मरामहे॥ ५१"],"iast":["gatyā lalitayodārahāsalīlāvalokanaiḥ|","mādhvyā girā hṛtadhiyaḥ kathaṃ taṃ vismarāmahe|| 51"],"meaning":"उनकी वह हंसकी-सी सुन्दर चाल, उन्मुक्त हास्य, विलासपूर्ण चितवन और मधुमयी वाणी! आह! उन सबने हमारा चित्त चुरा लिया है, हमारा मन हमारे वशमें नहीं है; अब हम उन्हें भूलें तो किस तरह?॥ ५१॥"},{"id":"10.47.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/52/","page":431,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन।","म‌ग्‍नमुद्धर गोविन्द गोकुलं वृजिनार्णवात्॥ ५२"],"iast":["he nātha he ramānātha vrajanāthārtināśana|","magnamuddhara govinda gokulaṃ vṛjinārṇavāt|| 52"],"meaning":"हमारे प्यारे श्रीकृष्ण! तुम्हीं हमारे जीवनके स्वामी हो, सर्वस्व हो। प्यारे! तुम लक्ष्मीनाथ हो तो क्या हुआ? हमारे लिये तो व्रजनाथ ही हो। हम व्रजगोपियोंके एकमात्र तुम्हीं सच्चे स्वामी हो। श्यामसुन्दर! तुमने बार-बार हमारी व्यथा मिटायी है, हमारे संकट काटे हैं। गोविन्द! तुम गौओंसे बहुत प्रेम करते हो। क्या हम गौएँ नहीं हैं? तुम्हारा यह सारा गोकुल जिसमें ग्वालबाल, माता-पिता, गौएँ और हम गोपियाँ सब कोई हैं—दुःखके अपार सागरमें डूब रहा है। तुम इसे बचाओ, आओ, हमारी रक्षा करो॥ ५२॥"},{"id":"10.47.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/53/","page":431,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततस्ताः कृष्णसन्देशैर्व्यपेतविरहज्वराः।","उद्धवं पूजयांचक्रुर्ज्ञात्वाऽऽत्मानमधोक्षजम्॥ ५३"],"iast":["tatastāḥ kṛṣṇasandeśairvyapetavirahajvarāḥ|","uddhavaṃ pūjayāṃcakrurjñātvā''tmānamadhokṣajam|| 53"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका प्रिय सन्देश सुनकर गोपियोंके विरहकी व्यथा शान्त हो गयी थी। वे इन्द्रियातीत भगवान् श्रीकृष्णको अपने आत्माके रूपमें सर्वत्र स्थित समझ चुकी थीं। अब वे बड़े प्रेम और आदरसे उद्धवजीका सत्कार करने लगीं॥ ५३॥"},{"id":"10.47.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/54/","page":432,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उवास कतिचिन्मासान् गोपीनां विनुदञ्छुचः।","कृष्णलीलाकथां गायन् रमयामास गोकुलम्॥ ५४"],"iast":["uvāsa katicinmāsān gopīnāṃ vinudañchucaḥ|","kṛṣṇalīlākathāṃ gāyan ramayāmāsa gokulam|| 54"],"meaning":"उद्धवजी गोपियोंकी विरह-व्यथा मिटानेके लिये कई महीनोंतक वहीं रहे। वे भगवान् श्रीकृष्णकी अनेकों लीलाएँ और बातें सुना-सुनाकर व्रज-वासियोंको आनन्दित करते रहते॥ ५४॥"},{"id":"10.47.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/55/","page":432,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यावन्त्यहानि नन्दस्य व्रजेऽवात्सीत् स उद्धवः।","व्रजौकसां क्षणप्रायाण्यासन् कृष्णस्य वार्तया॥ ५५"],"iast":["yāvantyahāni nandasya vraje'vātsīt sa uddhavaḥ|","vrajaukasāṃ kṣaṇaprāyāṇyāsan kṛṣṇasya vārtayā|| 55"],"meaning":"नन्दबाबाके व्रजमें जितने दिनोंतक उद्धवजी रहे, उतने दिनोंतक भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकी चर्चा होते रहनेके कारण व्रजवासियोंको ऐसा जान पड़ा, मानो अभी एक ही क्षण हुआ हो॥ ५५॥"},{"id":"10.47.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/56/","page":432,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सरिद्वनगिरिद्रोणीर्वीक्षन् कुसुमितान् द्रुमान्।","कृष्णं संस्मारयन् रेमे हरिदासो व्रजौकसाम्॥ ५६"],"iast":["saridvanagiridroṇīrvīkṣan kusumitān drumān|","kṛṣṇaṃ saṃsmārayan reme haridāso vrajaukasām|| 56"],"meaning":"भगवान्‌के परमप्रेमी भक्त उद्धवजी कभी नदीतटपर जाते, कभी वनोंमें विहरते और कभी गिरिराजकी घाटियोंमें विचरते। कभी रंग-बिरंगे फूलोंसे लदे हुए वृक्षोंमें ही रम जाते और यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने कौन-सी लीला की है, यह पूछ-पूछकर व्रजवासियोंको भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी लीलाके स्मरणमें तन्मय कर देते॥ ५६॥"},{"id":"10.47.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/57/","page":432,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वैवमादि गोपीनां कृष्णावेशात्मविक्लवम्।","उद्धवः परमप्रीतस्ता नमस्यन्‍निदं जगौ॥ ५७"],"iast":["dṛṣṭvaivamādi gopīnāṃ kṛṣṇāveśātmaviklavam|","uddhavaḥ paramaprītastā namasyannidaṃ jagau|| 57"],"meaning":"उद्धवजीने व्रजमें रहकर गोपियोंकी इस प्रकारकी प्रेम-विकलता तथा और भी बहुत-सी प्रेम-चेष्टाएँ देखीं। उनकी इस प्रकार श्रीकृष्णमें तन्मयता देखकर वे प्रेम और आनन्दसे भर गये। अब वे गोपियोंको नमस्कार करते हुए इस प्रकार गान करने लगे—॥ ५७॥"},{"id":"10.47.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/58/","page":432,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो","गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावाः।","वाञ्छन्ति यद् भवभियो मुनयो वयं च","किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य॥ ५८"],"iast":["etāḥ paraṃ tanubhṛto bhuvi gopavadhvo","govinda eva nikhilātmani rūḍhabhāvāḥ|","vāñchanti yad bhavabhiyo munayo vayaṃ ca","kiṃ brahmajanmabhiranantakathārasasya|| 58"],"meaning":"‘इस पृथ्वीपर केवल इन गोपियोंका ही शरीर धारण करना श्रेष्ठ एवं सफल है; क्योंकि ये सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्णके परम प्रेममय दिव्य महाभावमें स्थित हो गयी हैं। प्रेमकी यह ऊँची-से-ऊँची स्थिति संसारके भयसे भीत मुमुक्षुजनोंके लिये ही नहीं, अपितु बड़े-बड़े मुनियों—मुक्त पुरुषों तथा हम भक्तजनोंके लिये भी अभी वाञ्छनीय ही है। हमें इसकी प्राप्ति नहीं हो सकी। सत्य है, जिन्हें भगवान् श्रीकृष्णकी लीला-कथाके रसका चसका लग गया है, उन्हें कुलीनताकी, द्विजातिसमुचित संस्कारकी और बड़े-बड़े यज्ञ-यागोंमें दीक्षित होनेकी क्या आवश्यकता है? अथवा यदि भगवान्‌की कथाका रस नहीं मिला, उसमें रुचि नहीं हुई, तो अनेक महाकल्पोंतक बार-बार ब्रह्मा होनेसे ही क्या लाभ?॥ ५८॥"},{"id":"10.47.59","number":59,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/59/","page":433,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्वेमाः स्त्रियो वनचरीर्व्यभिचारदुष्टाः","कृष्णे क्व चैष परमात्मनि रूढभावः।","नन्वीश्‍वरोऽनुभजतोऽविदुषोऽपि साक्षा-","च्छ्रेयस्तनोत्यगदराज इवोपयुक्तः॥ ५९"],"iast":["kvemāḥ striyo vanacarīrvyabhicāraduṣṭāḥ","kṛṣṇe kva caiṣa paramātmani rūḍhabhāvaḥ|","nanvīśvaro'nubhajato'viduṣo'pi sākṣā-","cchreyastanotyagadarāja ivopayuktaḥ|| 59"],"meaning":"कहाँ ये वनचरी आचार, ज्ञान और जातिसे हीन गाँवकी गँवार ग्वालिनें और कहाँ सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रीकृष्णमें यह अनन्य परम प्रेम! अहो, धन्य है! धन्य है! इससे सिद्ध होता है कि कोई भगवान्‌के स्वरूप और रहस्यको न जानकर भी उनसे प्रेम करे, उनका भजन करे, तो वे स्वयं अपनी शक्तिसे अपनी कृपासे उसका परम कल्याण कर देते हैं; ठीक वैसे ही, जैसे कोई अनजानमें भी अमृत पी ले तो वह अपनी वस्तु-शक्तिसे ही पीनेवालेको अमर बना देता है॥ ५९॥"},{"id":"10.47.60","number":60,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/60/","page":433,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः","स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।","रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-","लब्धाशिषां य उदगाद् व्रजबल्लवीनाम्॥ ६०"],"iast":["nāyaṃ śriyo'ṅga u nitāntarateḥ prasādaḥ","svaryoṣitāṃ nalinagandharucāṃ kuto'nyāḥ|","rāsotsave'sya bhujadaṇḍagṛhītakaṇṭha-","labdhāśiṣāṃ ya udagād vrajaballavīnām|| 60"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने रासोत्सवके समय इन व्रजांगनाओंके गलेमें बाँह डाल-डालकर इनके मनोरथ पूर्ण किये। इन्हें भगवान्‌ने जिस कृपा-प्रसादका वितरण किया, इन्हें जैसा प्रेमदान किया, वैसा भगवान्‌की परमप्रेमवती नित्यसंगिनी वक्षःस्थलपर विराजमान लक्ष्मीजीको भी नहीं प्राप्त हुआ। कमलकी-सी सुगन्ध और कान्तिसे युक्त देवांगनाओंको भी नहीं मिला। फिर दूसरी स्त्रियोंकी तो बात ही क्या करें?॥ ६०॥"},{"id":"10.47.61","number":61,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/61/","page":433,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां","वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।","या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा","भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥ ६१"],"iast":["āsāmaho caraṇareṇujuṣāmahaṃ syāṃ","vṛndāvane kimapi gulmalatauṣadhīnām|","yā dustyajaṃ svajanamāryapathaṃ ca hitvā","bhejurmukundapadavīṃ śrutibhirvimṛgyām|| 61"],"meaning":"मेरे लिये तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मैं इस वृन्दावनधाममें कोई झाड़ी, लता अथवा ओषधि—जड़ी-बूटी ही बन जाऊँ! अहा! यदि मैं ऐसा बन जाऊँगा, तो मुझे इन व्रजांगनाओंकी चरणधूलि निरन्तर सेवन करनेके लिये मिलती रहेगी। इनकी चरण-रजमें स्नान करके मैं धन्य हो जाऊँगा। धन्य हैं ये गोपियाँ। देखो तो सही, जिनको छोड़ना अत्यन्त कठिन है, उन स्वजन-सम्बन्धियों तथा लोक-वेदकी आर्य-मर्यादाका परित्याग करके इन्होंने भगवान्‌की पदवी, उनके साथ तन्मयता, उनका परम प्रेम प्राप्त कर लिया है—औरोंकी तो बात ही क्या—भगवद्वाणी, उनकी निःश्‍वासरूप समस्त श्रुतियाँ, उपनिषदें भी अबतक भगवान्‌के परम प्रेममय स्वरूपको ढूँढ़ती ही रहती हैं, प्राप्त नहीं कर पातीं॥ ६१॥"},{"id":"10.47.62","number":62,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/62/","page":433,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामै-","र्योगेश्‍वरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठ्याम्।","कृष्णस्य तद् भगवतश्‍चरणारविन्दं","न्यस्तं स्तनेषु विजहुः परिरभ्य तापम्॥ ६२"],"iast":["yā vai śriyārcitamajādibhirāptakāmai-","ryogeśvarairapi yadātmani rāsagoṣṭhyām|","kṛṣṇasya tad bhagavataścaraṇāravindaṃ","nyastaṃ staneṣu vijahuḥ parirabhya tāpam|| 62"],"meaning":"स्वयं भगवती लक्ष्मीजी जिनकी पूजा करती रहती हैं; ब्रह्मा, शंकर आदि परम समर्थ देवता, पूर्णकाम आत्माराम और बड़े-बड़े योगेश्‍वर अपने हृदयमें जिनका चिन्तन करते रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्णके उन्हीं चरणारविन्दोंको रास-लीलाके समय गोपियोंने अपने वक्षःस्थलपर रखा और उनका आलिंगन करके अपने हृदयकी जलन, विरह-व्यथा शान्त की॥ ६२॥"},{"id":"10.47.63","number":63,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/63/","page":434,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः।","यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम्॥ ६३"],"iast":["vande nandavrajastrīṇāṃ pādareṇumabhīkṣṇaśaḥ|","yāsāṃ harikathodgītaṃ punāti bhuvanatrayam|| 63"],"meaning":"नन्दबाबाके व्रजमें रहनेवाली गोपांगनाओंकी चरण-धूलिको मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ—उसे सिरपर चढ़ाता हूँ। अहा! इन गोपियोंने भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकथाके सम्बन्धमें जो कुछ गान किया है, वह तीनों लोकोंको पवित्र कर रहा है और सदा-सर्वदा पवित्र करता रहेगा’॥ ६३॥"},{"id":"10.47.64","number":64,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/64/","page":434,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ गोपीरनुज्ञाप्य यशोदां नन्दमेव च।","गोपानामन्त्र्य दाशार्हो यास्यन्‍नारुरुहे रथम्॥ ६४"],"iast":["atha gopīranujñāpya yaśodāṃ nandameva ca|","gopānāmantrya dāśārho yāsyannāruruhe ratham|| 64"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार कई महीनोंतक व्रजमें रहकर उद्धवजीने अब मथुरा जानेके लिये गोपियोंसे, नन्दबाबा और यशोदा मैयासे आज्ञा प्राप्त की। ग्वालबालोंसे विदा लेकर वहाँसे यात्रा करनेके लिये वे रथपर सवार हुए॥ ६४॥"},{"id":"10.47.65","number":65,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/65/","page":434,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं निर्गतं समासाद्य नानोपायनपाणयः।","नन्दादयोऽनुरागेण प्रावोचन्‍नश्रुलोचनाः॥ ६५"],"iast":["taṃ nirgataṃ samāsādya nānopāyanapāṇayaḥ|","nandādayo'nurāgeṇa prāvocannaśrulocanāḥ|| 65"],"meaning":"जब उनका रथ व्रजसे बाहर निकला, तब नन्दबाबा आदि गोपगण बहुत-सी भेंटकी सामग्री लेकर उनके पास आये और आँखोंमें आँसू भरकर उन्होंने बड़े प्रेमसे कहा—॥ ६५॥"},{"id":"10.47.66","number":66,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/66/","page":434,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः।","वाचोऽभिधायिनीर्नाम्‍नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु॥ ६६"],"iast":["manaso vṛttayo naḥ syuḥ kṛṣṇapādāmbujāśrayāḥ|","vāco'bhidhāyinīrnāmnāṃ kāyastatprahvaṇādiṣu|| 66"],"meaning":"‘उद्धवजी! अब हम यही चाहते हैं कि हमारे मनकी एक-एक वृत्ति, एक-एक संकल्प श्रीकृष्णके चरणकमलोंके ही आश्रित रहे। उन्हींकी सेवाके लिये उठे और उन्हींमें लगी भी रहे। हमारी वाणी नित्य-निरन्तर उन्हींके नामोंका उच्चारण करती रहे और शरीर उन्हींको प्रणाम करने, उन्हींके आज्ञापालन और सेवामें लगा रहे॥ ६६॥"},{"id":"10.47.67","number":67,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/67/","page":434,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र क्वापीश्‍वरेच्छया।","मंगलाचरितैर्दानै रतिर्नः कृष्ण ईश्‍वरे॥ ६७"],"iast":["karmabhirbhrāmyamāṇānāṃ yatra kvāpīśvarecchayā|","maṃgalācaritairdānai ratirnaḥ kṛṣṇa īśvare|| 67"],"meaning":"उद्धवजी! हम सच कहते हैं, हमें मोक्षकी इच्छा बिलकुल नहीं है। हम भगवान्‌की इच्छासे अपने कर्मोंके अनुसार चाहे जिस योनिमें जन्म लें—वहाँ शुभ आचरण करें, दान करें और उसका फल यही पावें कि हमारे अपने ईश्‍वर श्रीकृष्णमें हमारी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती रहे’॥ ६७॥"},{"id":"10.47.68","number":68,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/68/","page":434,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं सभाजितो गोपैः कृष्णभक्त्या नराधिप।","उद्धवः पुनरागच्छन्मथुरां कृष्णपालिताम्॥ ६८"],"iast":["evaṃ sabhājito gopaiḥ kṛṣṇabhaktyā narādhipa|","uddhavaḥ punarāgacchanmathurāṃ kṛṣṇapālitām|| 68"],"meaning":"प्रिय परीक्षित्! नन्दबाबा आदि गोपोंने इस प्रकार श्रीकृष्ण-भक्तिके द्वारा उद्धवजीका सम्मान किया। अब वे भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित मथुरापुरीमें लौट आये॥ ६८॥"},{"id":"10.47.69","number":69,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/69/","page":434,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णाय प्रणिपत्याह भक्त्युद्रेकं व्रजौकसाम्।","वसुदेवाय रामाय राज्ञे चोपायनान्यदात्॥ ६९"],"iast":["kṛṣṇāya praṇipatyāha bhaktyudrekaṃ vrajaukasām|","vasudevāya rāmāya rājñe copāyanānyadāt|| 69"],"meaning":"वहाँ पहुँचकर उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया और उन्हें व्रजवासियोंकी प्रेममयी भक्तिका उद्रेक, जैसा उन्होंने देखा था, कह सुनाया। इसके बाद नन्दबाबाने भेंटकी जो-जो सामग्री दी थी वह उनको, वसुदेवजी, बलरामजी और राजा उग्रसेनको दे दी॥ ६९॥"}],"text":[{"b":32509,"kind":"adhyaya_heading","page":421,"text":"अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः"},{"b":32510,"kind":"topic_heading","page":421,"text":"उद्धव तथा गोपियोंकी बातचीत और भ्रमरगीत"},{"b":32511,"kind":"topic_heading","page":421,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32512,"kind":"sanskrit_shloka","page":421,"verses":["10.47.1"],"text":"तं वीक्ष्य कृष्णानुचरं व्रजस्त्रियः"},{"b":32513,"kind":"sanskrit_shloka","page":421,"verses":["10.47.1"],"text":"प्रलम्बबाहुं नवकंजलोचनम्।"},{"b":32514,"kind":"sanskrit_shloka","page":421,"verses":["10.47.1"],"text":"पीताम्बरं पुष्करमालिनं लस-"},{"b":32515,"kind":"hindi_commentary","page":421,"verses":["10.47.1"],"text":"न्मुखारविन्दं मणिमृष्टकुण्डलम्॥ १"},{"b":32516,"kind":"sanskrit_shloka","page":421,"verses":["10.47.2"],"text":"शुचिस्मिताः कोऽयमपीच्यदर्शनः"},{"b":32517,"kind":"sanskrit_shloka","page":421,"verses":["10.47.2"],"text":"कुतश्‍च कस्याच्युतवेषभूषणः।"},{"b":32518,"kind":"sanskrit_shloka","page":421,"verses":["10.47.2"],"text":"इति स्म सर्वाः परिवव्रुरुत्सुका-"},{"b":32519,"kind":"hindi_commentary","page":421,"verses":["10.47.2"],"text":"स्तमुत्तमश्‍लोकपदाम्बुजाश्रयम् ॥ २"},{"b":32520,"kind":"hindi_commentary","page":421,"explains":["10.47.1","10.47.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गोपियोंने देखा कि श्रीकृष्णके सेवक उद्धवजीकी आकृति और वेषभूषा श्रीकृष्णसे मिलती-जुलती है। घुटनोंतक लंबी-लंबी भुजाएँ हैं, नूतन कमलदलके समान कोमल नेत्र हैं, शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, गलेमें कमल-पुष्पोंकी माला है, कानोंमें मणिजटित कुण्डल झलक रहे हैं और मुखारविन्द अत्यन्त प्रफुल्लित है॥ १॥ पवित्र मुसकानवाली गोपियोंने आपसमें कहा—‘यह पुरुष देखनेमें तो बहुत सुन्दर है। परन्तु यह है कौन? कहाँसे आया है? किसका दूत है? इसने श्रीकृष्ण-जैसी वेषभूषा क्यों धारण कर रखी है?’ सब-की-सब गोपियाँ उनका परिचय प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त उत्सुक हो गयीं और उनमेंसे बहुत-सी पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके आश्रित तथा उनके सेवक-सखा उद्धवजीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं॥ २॥"},{"b":32521,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.3"],"text":"तं प्रश्रयेणावनताः सुसत्कृतं"},{"b":32522,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.3"],"text":"सव्रीडहासेक्षणसूनृतादिभिः ।"},{"b":32523,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.3"],"text":"रहस्यपृच्छन्‍नुपविष्टमासने"},{"b":32524,"kind":"topic_heading","page":422,"verses":["10.47.3"],"text":"विज्ञाय सन्देशहरं रमापतेः॥ ३"},{"b":32525,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.4"],"text":"जानीमस्त्वां यदुपतेः पार्षदं समुपागतम्।"},{"b":32526,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.4"],"text":"भर्त्रेह प्रेषितः पित्रोर्भवान् प्रियचिकीर्षया॥ ४"},{"b":32527,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.5"],"text":"अन्यथा गोव्रजे तस्य स्मरणीयं न चक्ष्महे।"},{"b":32528,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.5"],"text":"स्नेहानुबन्धो बन्धूनां मुनेरपि सुदुस्त्यजः॥ ५"},{"b":32529,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.6"],"text":"अन्येष्वर्थकृता मैत्री यावदर्थविडम्बनम्।"},{"b":32530,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.6"],"text":"पुम्भिः स्त्रीषु कृता यद्वत् सुमनस्स्विव षट्पदैः॥ ६"},{"b":32531,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.7"],"text":"निस्स्वं त्यजन्ति गणिका अकल्पं नृपतिं प्रजाः।"},{"b":32532,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.7"],"text":"अधीतविद्या आचार्यमृत्विजो दत्तदक्षिणम्॥ ७"},{"b":32533,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.8"],"text":"खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चातिथयो गृहम्।"},{"b":32534,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.8"],"text":"दग्धं मृगास्तथारण्यं जारो भुक्त्वा रतां स्त्रियम्॥ ८"},{"b":32535,"kind":"hindi_commentary","page":422,"explains":["10.47.3","10.47.4","10.47.5","10.47.6","10.47.7","10.47.8"],"text":"जब उन्हें मालूम हुआ कि ये तो रमारमण भगवान् श्रीकृष्णका सन्देश लेकर आये हैं, तब उन्होंने विनयसे झुककर सलज्ज हास्य, चितवन और मधुर वाणी आदिसे उद्धवजीका अत्यन्त सत्कार किया तथा एकान्तमें आसनपर बैठाकर वे उनसे इस प्रकार कहने लगीं—॥ ३॥ ‘उद्धवजी! हम जानती हैं कि आप यदुनाथके पार्षद हैं। उन्हींका संदेश लेकर यहाँ पधारे हैं। आपके स्वामीने अपने माता-पिताको सुख देनेके लिये आपको यहाँ भेजा है॥ ४॥ अन्यथा हमें तो अब इस नन्दगाँवमें—गौओंके रहनेकी जगहमें उनके स्मरण करने योग्य कोई भी वस्तु दिखायी नहीं पड़ती; माता-पिता आदि सगे-सम्बन्धियोंका स्नेह-बन्धन तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी बड़ी कठिनाईसे छोड़ पाते हैं॥ ५॥ दूसरोंके साथ जो प्रेम-सम्बन्धका स्वाँग किया जाता है, वह तो किसी-न-किसी स्वार्थके लिये ही होता है। भौंरोंका पुष्पोंसे और पुरुषोंका स्त्रियोंसे ऐसा ही स्वार्थका प्रेम-सम्बन्ध होता है॥ ६॥ जब वेश्या समझती है कि अब मेरे यहाँ आनेवालेके पास धन नहीं है, तब उसे वह धता बता देती है। जब प्रजा देखती है कि यह राजा हमारी रक्षा नहीं कर सकता, तब वह उसका साथ छोड़ देती है। अध्ययन समाप्त हो जानेपर कितने शिष्य अपने आचार्योंकी सेवा करते हैं? यज्ञकी दक्षिणा मिली कि ऋत्विजलोग चलते बने॥ ७॥ जब वृक्षपर फल नहीं रहते, तब पक्षीगण वहाँसे बिना कुछ सोचे-विचारे उड़ जाते हैं। भोजन कर लेनेके बाद अतिथिलोग ही गृहस्थकी ओर कब देखते हैं? वनमें आग लगी कि पशु भाग खड़े हुए। चाहे स्त्रीके हृदयमें कितना भी अनुराग हो, जार पुरुष अपना काम बना लेनेके बाद उलटकर भी तो नहीं देखता’॥ ८॥"},{"b":32536,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.9"],"text":"इति गोप्यो हि गोविन्दे गतवाक्कायमानसाः।"},{"b":32537,"kind":"sanskrit_shloka","page":422,"verses":["10.47.9"],"text":"कृष्णदूते व्रजं याते उद्धवे त्यक्तलौकिकाः॥ ९"},{"b":32538,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.10"],"text":"गायन्त्यः प्रियकर्माणि रुदत्यश्‍च गतह्रियः।"},{"b":32539,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.10"],"text":"तस्य संस्मृत्य संस्मृत्य यानि कैशोरबाल्ययोः॥ १०"},{"b":32540,"kind":"hindi_commentary","page":422,"explains":["10.47.9","10.47.10"],"text":"परीक्षित्! गोपियोंके मन, वाणी और शरीर श्रीकृष्णमें ही तल्लीन थे। जब भगवान् श्रीकृष्णके दूत बनकर उद्धवजी व्रजमें आये, तब वे उनसे इस प्रकार कहते-कहते यह भूल ही गयीं कि कौन-सी बात किस तरह किसके सामने कहनी चाहिये। भगवान् श्रीकृष्णने बचपनसे लेकर किशोर-अवस्थातक जितनी भी लीलाएँ की थीं, उन सबकी याद कर-करके गोपियाँ उनका गान करने लगीं। वे आत्मविस्मृत होकर स्त्री-सुलभ लज्जाको भी भूल गयीं और फूट-फूटकर रोने लगीं॥ ९-१०॥"},{"b":32541,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.11"],"text":"काचिन्मधुकरं दृष्ट्वा ध्यायन्ती कृष्णसंगमम्।"},{"b":32542,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.11"],"text":"प्रियप्रस्थापितं दूतं कल्पयित्वेदमब्रवीत्॥ ११"},{"b":32543,"kind":"hindi_commentary","page":423,"explains":["10.47.11"],"text":"एक गोपीको उस समय स्मरण हो रहा था भगवान् श्रीकृष्णके मिलनकी लीलाका। उसी समय उसने देखा कि पास ही एक भौंरा गुनगुना रहा है। उसने ऐसा समझा मानो मुझे रूठी हुई समझकर श्रीकृष्णने मनानेके लिये दूत भेजा हो। वह गोपी भौंरेसे इस प्रकार कहने लगी—॥ ११॥"},{"b":32544,"kind":"topic_heading","page":423,"text":"गोप्युवाच"},{"b":32545,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.12"],"text":"मधुप कितवबन्धो मा स्पृशाङ्‌घ्रिं सपत्‍न्याः"},{"b":32546,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.12"],"text":"कुचविलुलितमालाकुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः ।"},{"b":32547,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.12"],"text":"वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं"},{"b":32548,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.12"],"text":"यदुसदसि विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक्॥ १२"},{"b":32549,"kind":"hindi_commentary","page":423,"explains":["10.47.12"],"text":"गोपीने कहा—रे मधुप! तू कपटीका सखा है; इसलिये तू भी कपटी है। तू हमारे पैरोंको मत छू। झूठे प्रणाम करके हमसे अनुनय-विनय मत कर। हम देख रही हैं कि श्रीकृष्णकी जो वनमाला हमारी सौतोंके वक्षःस्थलके स्पर्शसे मसली हुई है, उसका पीला-पीला कुंकुम तेरी मूछोंपर भी लगा हुआ है। तू स्वयं भी तो किसी कुसुमसे प्रेम नहीं करता, यहाँ-से-वहाँ उड़ा करता है। जैसे तेरे स्वामी, वैसा ही तू! मधुपति श्रीकृष्ण मथुराकी मानिनी नायिकाओंको मनाया करें, उनका वह कुंकुमरूप कृपा-प्रसाद, जो युदवंशियोंकी सभामें उपहास करनेयोग्य है, अपने ही पास रखें। उसे तेरे द्वारा यहाँ भेजनेकी क्या आवश्यकता है?॥ १२॥"},{"b":32550,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.13"],"text":"सकृदधरसुधां स्वां मोहिनीं पाययित्वा"},{"b":32551,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.13"],"text":"सुमनस इव सद्यस्तत्यजेऽस्मान् भवादृक्।"},{"b":32552,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.13"],"text":"परिचरति कथं तत्पादपद्मं तु पद्मा"},{"b":32553,"kind":"sanskrit_shloka","page":423,"verses":["10.47.13"],"text":"ह्यपि बत हृतचेता उत्तमश्‍लोकजल्पैः॥ १३"},{"b":32554,"kind":"hindi_commentary","page":423,"explains":["10.47.13"],"text":"जैसा तू काला है, वैसे ही वे भी हैं। तू भी पुष्पोंका रस लेकर उड़ जाता है, वैसे ही वे भी निकले। उन्होंने हमें केवल एक बार—हाँ, ऐसा ही लगता है—केवल एक बार अपनी तनिक-सी मोहिनी और परम मादक अधरसुधा पिलायी थी और फिर हम भोली-भाली गोपियोंको छोड़कर वे यहाँसे चले गये। पता नहीं; सुकुमारी लक्ष्मी उनके चरण-कमलोंकी सेवा कैसे करती रहती हैं! अवश्य ही वे छैल-छबीले श्रीकृष्णकी चिकनी-चुपड़ी बातोंमें आ गयी होंगी। चितचोरने उनका भी चित्त चुरा लिया होगा॥ १३॥"},{"b":32555,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.14"],"text":"किमिह बहु षडङ्‌घ्रे गायसि त्वं यदूना-"},{"b":32556,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.14"],"text":"मधिपतिमगृहाणामग्रतो नः पुराणम्।"},{"b":32557,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.14"],"text":"विजयसखसखीनां गीयतां तत्प्रसंगः"},{"b":32558,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.14"],"text":"क्षपितकुचरुजस्ते कल्पयन्तीष्टमिष्टाः॥ १४"},{"b":32559,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.15"],"text":"दिवि भुवि च रसायां काः स्त्रियस्तद्दुरापाः"},{"b":32560,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.15"],"text":"कपटरुचिरहासभ्रूविजृम्भस्य याः स्युः।"},{"b":32561,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.15"],"text":"चरणरज उपास्ते यस्य भूतिर्वयं का"},{"b":32562,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.15"],"text":"अपि च कृपणपक्षे ह्युत्तमश्‍लोकशब्दः॥ १५"},{"b":32563,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.16"],"text":"विसृज शिरसि पादं वेद‍्म्यहं चाटुकारै-"},{"b":32564,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.16"],"text":"रनुनयविदुषस्तेऽभ्येत्य दौत्यैर्मुकुन्दात्।"},{"b":32565,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.16"],"text":"स्वकृत इह विसृष्टापत्यपत्यन्यलोका"},{"b":32566,"kind":"sanskrit_shloka","page":424,"verses":["10.47.16"],"text":"व्यसृजदकृतचेताः किं नु सन्धेयमस्मिन्॥ १६"},{"b":32567,"kind":"hindi_commentary","page":424,"explains":["10.47.14","10.47.15","10.47.16"],"text":"अरे भ्रमर! हम वनवासिनी हैं । हमारे तो घर-द्वार भी नहीं है। तू हमलोगोंके सामने यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णका बहुत-सा गुणगान क्यों कर रहा है? यह सब भला हमलोगोंको मनानेके लिये ही तो? परन्तु नहीं-नहीं, वे हमारे लिये कोई नये नहीं हैं। हमारे लिये तो जाने-पहचाने, बिलकुल पुराने हैं। तेरी चापलूसी हमारे पास नहीं चलेगी। तू जा, यहाँसे चला जा और जिनके साथ सदा विजय रहती है, उन श्रीकृष्णकी मधुपुरवासिनी सखियोंके सामने जाकर उनका गुणगान कर। वे नयी हैं, उनकी लीलाएँ कम जानती हैं और इस समय वे उनकी प्यारी हैं; उनके हृदयकी पीड़ा उन्होंने मिटा दी है। वे तेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगी, तेरी चापलूसीसे प्रसन्‍न होकर तुझे मुँहमाँगी वस्तु देंगी॥ १४॥ भौंरे! वे हमारे लिये छटपटा रहे हैं, ऐसा तू क्यों कहता है? उनकी कपटभरी मनोहर मुसकान और भौंहोंके इशारेसे जो वशमें न हो जायँ, उनके पास दौड़ी न आवें—ऐसी कौन-सी स्त्रियाँ हैं? अरे अनजान! स्वर्गमें, पातालमें और पृथ्वीमें ऐसी एक भी स्त्री नहीं है। औरोंकी तो बात ही क्या, स्वयं लक्ष्मीजी भी उनके चरणरजकी सेवा किया करती हैं। फिर हम श्रीकृष्णके लिये किस गिनतीमें हैं? परन्तु तू उनके पास जाकर कहना कि ‘तुम्हारा नाम तो ‘उत्तमश्‍लोक’ है, अच्छे-अच्छे लोग तुम्हारी कीर्तिका गान करते हैं; परन्तु इसकी सार्थकता तो इसीमें है कि तुम दीनोंपर दया करो। नहीं तो श्रीकृष्ण! तुम्हारा ‘उत्तमश्‍लोक’ नाम झूठा पड़ जाता है॥ १५॥ अरे मधुकर! देख, तू मेरे पैरपर सिर मत टेक। मैं जानती हूँ कि तू अनुनय-विनय करनेमें, क्षमा-याचना करनेमें बड़ा निपुण है। मालूम होता है तू श्रीकृष्णसे ही यही सीखकर आया है कि रूठे हुएको मनानेके लिये दूतको—सन्देश-वाहकको कितनी चाटुकारिता करनी चाहिये। परन्तु तू समझ ले कि यहाँ तेरी दाल नहीं गलनेकी। देख, हमने श्रीकृष्णके लिये ही अपने पति, पुत्र और दूसरे लोगोंको छोड़ दिया। परन्तु उनमें तनिक भी कृतज्ञता नहीं। वे ऐसे निर्मोही निकले कि हमें छोड़कर चलते बने! अब तू ही बता, ऐसे अकृतज्ञके साथ हम क्या सन्धि करें? क्या तू अब भी कहता है कि उनपर विश्‍वास करना चाहिये?॥ १६॥"},{"b":32568,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.17"],"text":"मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा"},{"b":32569,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.17"],"text":"स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्।"},{"b":32570,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.17"],"text":"बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद् ध्वांक्षवद् य-"},{"b":32571,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.17"],"text":"स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः ॥ १७"},{"b":32572,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.18"],"text":"यदनुचरितलीलाकर्णपीयूषविप्रुट्-"},{"b":32573,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.18"],"text":"सकृददनविधूतद्वन्द्वधर्मा विनष्टाः।"},{"b":32574,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.18"],"text":"सपदि गृहकुटुम्बं दीनमुत्सृज्य दीना"},{"b":32575,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.18"],"text":"बहव इह विहंगा भिक्षुचर्यां चरन्ति॥ १८"},{"b":32576,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.19"],"text":"वयमृतमिव जिह्मव्याहृतं श्रद्दधानाः"},{"b":32577,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.19"],"text":"कुलिकरुतमिवाज्ञाः कृष्णवध्वो हरिण्यः।"},{"b":32578,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.19"],"text":"ददृशुरसकृदेतत्तन्‍नखस्पर्शतीव्र-"},{"b":32579,"kind":"sanskrit_shloka","page":425,"verses":["10.47.19"],"text":"स्मररुज उपमन्त्रिन् भण्यतामन्यवार्ता॥ १९"},{"b":32580,"kind":"hindi_translation","page":425,"explains":["10.47.17","10.47.18","10.47.19"],"text":"ऐ रे मधुप! जब वे राम बने थे, तब उन्होंने कपिराज बालिको व्याधके समान छिपकर बड़ी निर्दयतासे मारा था। बेचारी शूर्पणखा कामवश उनके पास आयी थी, परन्तु उन्होंने अपनी स्त्रीके वश होकर उस बेचारीके नाक-कान काट लिये और इस प्रकार उसे कुरूप कर दिया। ब्राह्मणके घर वामनके रूपमें जन्म लेकर उन्होंने क्या किया? बलिने तो उनकी पूजा की, उनकी मुँहमाँगी वस्तु दी और उन्होंने उसकी पूजा ग्रहण करके भी उसे वरुणपाशसे बाँधकर पातालमें डाल दिया। ठीक वैसे ही, जैसे कौआ बलि खाकर भी बलि देनेवालेको अपने अन्य साथियोंके साथ मिलकर घेर लेता है और परेशान करता है। अच्छा, तो अब जाने दे; हमें श्रीकृष्णसे क्या, किसी भी काली वस्तुके साथ मित्रतासे कोई प्रयोजन नहीं है। परन्तु यदि तू यह कहे कि ‘जब ऐसा है तब तुमलोग उनकी चर्चा क्यों करती हो?’ तो भ्रमर! हम सच कहती हैं, एक बार जिसे उसका चसका लग जाता है, वह उसे छोड़ नहीं सकता। ऐसी दशामें हम चाहनेपर भी उनकी चर्चा छोड़ नहीं सकतीं॥ १७॥ श्रीकृष्णकी लीलारूप कर्णामृतके एक कणका भी जो रसास्वादन कर लेता है, उसके राग-द्वेष, सुख-दुःख आदि सारे द्वन्द्व छूट जाते हैं। यहाँतक कि बहुत-से लोग तो अपनी दुःखमय—दुःखसे सनी हुई घर-गृहस्थी छोड़कर अकिंचन हो जाते हैं, अपने पास कुछ भी संग्रह-परिग्रह नहीं रखते और पक्षियोंकी तरह चुन-चुनकर—भीख माँगकर अपना पेट भरते हैं, दीन-दुनियासे जाते रहते हैं। फिर भी श्रीकृष्णकी लीलाकथा छोड़ नहीं पाते। वास्तवमें उसका रस, उसका चसका ऐसा ही है। यही दशा हमारी हो रही है॥ १८॥ जैसे कृष्णसार मृगकी पत्‍नी भोली-भाली हरिनियाँ व्याधके सुमधुर गानका विश्‍वास कर लेती हैं और उसके जालमें फँसकर मारी जाती हैं, वैसे ही हम भोली-भाली गोपियाँ भी उस छलिया कृष्णकी कपटभरी मीठी-मीठी बातोंमें आकर उन्हें सत्यके समान मान बैठीं और उनके नखस्पर्शसे होनेवाली कामव्याधिका बार-बार अनुभव करती रहीं। इसलिये श्रीकृष्णके दूत भौंरे! अब इस विषयमें तू और कुछ मत कह। तुझे कहना ही हो तो कोई दूसरी बात कह॥ १९॥"},{"b":32581,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.20"],"text":"प्रियसख पुनरागाः प्रेयसा प्रेषितः किं"},{"b":32582,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.20"],"text":"वरय किमनुरुन्धे माननीयोऽसि मेऽङ्ग।"},{"b":32583,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.20"],"text":"नयसि कथमिहास्मान् दुस्त्यजद्वन्द्वपार्श्‍वं"},{"b":32584,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.20"],"text":"सततमुरसि सौम्य श्रीर्वधूः साकमास्ते॥ २०"},{"b":32585,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.21"],"text":"अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनाऽऽस्ते"},{"b":32586,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.21"],"text":"स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्‍च गोपान्।"},{"b":32587,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.21"],"text":"क्वचिदपि स कथा नः किंकरीणां गृणीते"},{"b":32588,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.21"],"text":"भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध्‍न्‍यधास्यत् कदा नु॥ २१"},{"b":32589,"kind":"hindi_commentary","page":426,"explains":["10.47.20","10.47.21"],"text":"हमारे प्रियतमके प्यारे सखा! जान पड़ता है तुम एक बार उधर जाकर फिर लौट आये हो। अवश्य ही हमारे प्रियतमने मनानेके लिये तुम्हें भेजा होगा। प्रिय भ्रमर! तुम सब प्रकारसे हमारे माननीय हो। कहो, तुम्हारी क्या इच्छा है? हमसे जो चाहो सो माँग लो। अच्छा, तुम सच बताओ, क्या हमें वहाँ ले चलना चाहते हो? अजी, उनके पास जाकर लौटना बड़ा कठिन है। हम तो उनके पास जा चुकी हैं। परन्तु तुम हमें वहाँ ले जाकर करोगे क्या? प्यारे भ्रमर! उनके साथ—उनके वक्षःस्थलपर तो उनकी प्यारी पत्‍नी लक्ष्मीजी सदा रहती हैं न? तब वहाँ हमारा निर्वाह कैसे होगा॥ २०॥ अच्छा, हमारे प्रियतमके प्यारे दूत मधुकर! हमें यह बतलाओ कि आर्यपुत्र भगवान् श्रीकृष्ण गुरुकुलसे लौटकर मधुपुरीमें अब सुखसे तो हैं न? क्या वे कभी नन्दबाबा, यशोदारानी, यहाँके घर, सगे-सम्बन्धी और ग्वालबालोंकी भी याद करते हैं? और क्या हम दासियोंकी भी कोई बात कभी चलाते हैं? प्यारे भ्रमर! हमें यह भी बतलाओ कि कभी वे अपनी अगरके समान दिव्य सुगन्धसे युक्त भुजा हमारे सिरोंपर रखेंगे? क्या हमारे जीवनमें कभी ऐसा शुभ अवसर भी आयेगा?॥ २१॥"},{"b":32590,"kind":"topic_heading","page":426,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32591,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.22"],"text":"अथोद्धवो निशम्यैवं कृष्णदर्शनलालसाः।"},{"b":32592,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.22"],"text":"सान्त्वयन् प्रियसन्देशैर्गोपीरिदमभाषत॥ २२"},{"b":32593,"kind":"hindi_commentary","page":426,"explains":["10.47.22"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये अत्यन्त उत्सुक—लालायित हो रही थीं, उनके लिये तड़प रही थीं। उनकी बातें सुनकर उद्धवजीने उन्हें उनके प्रियतमका सन्देश सुनाकर सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा—॥ २२॥"},{"b":32594,"kind":"topic_heading","page":426,"text":"उद्धव उवाच"},{"b":32595,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.23"],"text":"अहो यूयं स्म पूर्णार्था भवत्यो लोकपूजिताः।"},{"b":32596,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.23"],"text":"वासुदेवे भगवति यासामित्यर्पितं मनः॥ २३"},{"b":32597,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.24"],"text":"दानव्रततपोहोमजपस्वाध्यायसंयमैः ।"},{"b":32598,"kind":"sanskrit_shloka","page":426,"verses":["10.47.24"],"text":"श्रेयोभिर्विविधैश्‍चान्यैः कृष्णे भक्तिर्हि साध्यते॥ २४"},{"b":32599,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.25"],"text":"भगवत्युत्तमश्‍लोके भवतीभिरनुत्तमा।"},{"b":32600,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.25"],"text":"भक्तिः प्रवर्तिता दिष्ट्या मुनीनामपि दुर्लभा॥ २५"},{"b":32601,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.26"],"text":"दिष्ट्या पुत्रान् पतीन् देहान् स्वजनान् भवनानि च।"},{"b":32602,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.26"],"text":"हित्वावृणीत यूयं यत् कृष्णाख्यं पुरुषं परम्॥ २६"},{"b":32603,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.27"],"text":"सर्वात्मभावोऽधिकृतो भवतीनामधोक्षजे।"},{"b":32604,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.27"],"text":"विरहेण महाभागा महान् मेऽनुग्रहः कृतः॥ २७"},{"b":32605,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.28"],"text":"श्रूयतां प्रियसन्देशो भवतीनां सुखावहः।"},{"b":32606,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.28"],"text":"यमादायागतो भद्रा अहं भर्तू रहस्करः॥ २८"},{"b":32607,"kind":"hindi_commentary","page":426,"explains":["10.47.23","10.47.24","10.47.25","10.47.26","10.47.27","10.47.28"],"text":"उद्धवजीने कहा—अहो गोपियो! तुम कृतकृत्य हो। तुम्हारा जीवन सफल है। देवियो! तुम सारे संसारके लिये पूजनीय हो; क्योंकि तुमलोगोंने इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णको अपना हृदय, अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया है॥ २३॥ दान, व्रत, तप, होम, जप, वेदाध्ययन, ध्यान, धारणा, समाधि और कल्याणके अन्य विविध साधनोंके द्वारा भगवान्‌की भक्ति प्राप्त हो, यही प्रयत्‍न किया जाता है॥ २४॥ यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमलोगोंने पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके प्रति वही सर्वोत्तम प्रेमभक्ति प्राप्त की है और उसीका आदर्श स्थापित किया है, जो बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है॥ २५॥ सचमुच यह कितने सौभाग्यकी बात है कि तुमने अपने पुत्र, पति, देह, स्वजन और घरोंको छोड़कर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णको, जो सबके परम पति हैं, पतिके रूपमें वरण किया है॥ २६॥ महाभाग्यवती गोपियो! भगवान् श्रीकृष्णके वियोगसे तुमने उन इन्द्रियातीत परमात्माके प्रति वह भाव प्राप्त कर लिया है, जो सभी वस्तुओंके रूपमें उनका दर्शन कराता है। तुमलोगोंका वह भाव मेरे सामने भी प्रकट हुआ, यह मेरे ऊपर तुम देवियोंकी बड़ी ही दया है॥ २७॥ मैं अपने स्वामीका गुप्त काम करनेवाला दूत हूँ। तुम्हारे प्रियतम भगवान् श्रीकृष्णने तुमलोगोंको परम सुख देनेके लिये यह प्रिय सन्देश भेजा है। कल्याणियो! वही लेकर मैं तुमलोगोंके पास आया हूँ, अब उसे सुनो॥ २८॥"},{"b":32608,"kind":"topic_heading","page":427,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":32609,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.29"],"text":"भवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्‍वचित्।"},{"b":32610,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.29"],"text":"यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वग्‍निर्जलं मही।"},{"b":32611,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.29"],"text":"तथाहं च मनःप्राणभूतेन्द्रियगुणाश्रयः॥ २९"},{"b":32612,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.30"],"text":"आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं सृजे हन्म्यनुपालये।"},{"b":32613,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.30"],"text":"आत्ममायानुभावेन भूतेन्द्रियगुणात्मना॥ ३०"},{"b":32614,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.31"],"text":"आत्मा ज्ञानमयः शुद्धो व्यतिरिक्तोऽगुणान्वयः।"},{"b":32615,"kind":"sanskrit_shloka","page":427,"verses":["10.47.31"],"text":"सुषुप्तिस्वप्नजाग्रद्भिर्मायावृत्तिभिरीयते॥ ३१"},{"b":32616,"kind":"hindi_commentary","page":427,"explains":["10.47.29","10.47.30","10.47.31"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा है—मैं सबका उपादान कारण होनेसे सबका आत्मा हूँ, सबमें अनुगत हूँ; इसलिये मुझसे कभी भी तुम्हारा वियोग नहीं हो सकता। जैसे संसारके सभी भौतिक पदार्थोंमें आकाश, वायु, अग्‍नि, जल और पृथ्वी—ये पाँचों भूत व्याप्त हैं, इन्हींसे सब वस्तुएँ बनी हैं, और यही उन वस्तुओंके रूपमें हैं। वैसे ही मैं मन, प्राण, पंचभूत, इन्द्रिय और उनके विषयोंका आश्रय हूँ। वे मुझमें हैं, मैं उनमें हूँ और सच पूछो तो मैं ही उनके रूपमें प्रकट हो रहा हूँ॥ २९॥ मैं ही अपनी मायाके द्वारा भूत, इन्द्रिय और उनके विषयोंके रूपमें होकर उनका आश्रय बन जाता हूँ तथा स्वयं निमित्त भी बनकर अपने-आपको ही रचता हूँ, पालता हूँ और समेट लेता हूँ॥ ३०॥ आत्मा माया और मायाके कार्योंसे पृथक् है। वह विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, जड प्रकृति, अनेक जीव तथा अपने ही अवान्तर भेदोंसे रहित सर्वथा शुद्ध है। कोई भी गुण उसका स्पर्श नहीं कर पाते। मायाकी तीन वृत्तियाँ हैं—सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत्। इनके द्वारा वही अखण्ड, अनन्त बोधस्वरूप आत्मा कभी प्राज्ञ, तो कभी तैजस और कभी विश्‍वरूपसे प्रतीत होता है॥ ३१॥"},{"b":32617,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.32"],"text":"येनेन्द्रियार्थान् ध्यायेत मृषा स्वप्नवदुत्थितः।"},{"b":32618,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.32"],"text":"तन्‍निरुन्ध्यादिन्द्रियाणि विनिद्रः प्रत्यपद्यत॥ ३२"},{"b":32619,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.33"],"text":"एतदन्तः समाम्‍नायो योगः सांख्यं मनीषिणाम्।"},{"b":32620,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.33"],"text":"त्यागस्तपो दमः सत्यं समुद्रान्ता इवापगाः॥ ३३"},{"b":32621,"kind":"hindi_commentary","page":427,"explains":["10.47.32","10.47.33"],"text":"मनुष्यको चाहिये कि वह समझे कि स्वप्नमें दीखनेवाले पदार्थोंके समान ही जाग्रत्-अवस्थामें इन्द्रियोंके विषय भी प्रतीत हो रहे हैं, वे मिथ्या हैं। इसलिये उन विषयोंका चिन्तन करनेवाले मन और इन्द्रियोंको रोक ले और मानो सोकर उठा हो, इस प्रकार जगत‍्के स्वाप्निक विषयोंको त्यागकर मेरा साक्षात्कार करे॥ ३२॥ जिस प्रकार सभी नदियाँ घूम-फिरकर समुद्रमें ही पहुँचती हैं, उसी प्रकार मनस्वी पुरुषोंका वेदाभ्यास, योग-साधन, आत्मानात्मविवेक, त्याग, तपस्या, इन्द्रियसंयम और सत्य आदि समस्त धर्म, मेरी प्राप्तिमें ही समाप्त होते हैं। सबका सच्चा फल है मेरा साक्षात्कार; क्योंकि वे सब मनको निरुद्ध करके मेरे पास पहुँचाते हैं॥ ३३॥"},{"b":32622,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.34"],"text":"यत्त्वहं भवतीनां वै दूरे वर्ते प्रियो दृशाम्।"},{"b":32623,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.34"],"text":"मनसः सन्‍निकर्षार्थं मदनुध्यानकाम्यया॥ ३४"},{"b":32624,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.35"],"text":"यथा दूरचरे प्रेष्ठे मन आविश्य वर्तते।"},{"b":32625,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.35"],"text":"स्त्रीणां च न तथा चेतः सन्‍निकृष्टेऽक्षिगोचरे॥ ३५"},{"b":32626,"kind":"hindi_commentary","page":428,"verses":["10.47.36"],"text":"मय्यावेश्य मनः कृत्स्नं विमुक्ताशेषवृत्ति यत्।"},{"b":32627,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.36"],"text":"अनुस्मरन्त्यो मां नित्यमचिरान्मामुपैष्यथ॥ ३६"},{"b":32628,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.37"],"text":"या मया क्रीडता रात्र्यां वनेऽस्मिन् व्रज आस्थिताः।"},{"b":32629,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.37"],"text":"अलब्धरासाः कल्याण्यो माऽऽपुर्मद्वीर्यचिन्तया॥ ३७"},{"b":32630,"kind":"hindi_translation","page":428,"explains":["10.47.34","10.47.35","10.47.36","10.47.37"],"text":"गोपियो! इसमें सन्देह नहीं कि मैं तुम्हारे नयनोंका ध्रुवतारा हूँ। तुम्हारा जीवन-सर्वस्व हूँ। किन्तु मैं जो तुमसे इतना दूर रहता हूँ, उसका कारण है। वह यही कि तुम निरन्तर मेरा ध्यान कर सको, शरीरसे दूर रहनेपर भी मनसे तुम मेरी सन्‍निधिका अनुभव करो, अपना मन मेरे पास रखो॥ ३४॥ क्योंकि स्त्रियों और अन्यान्य प्रेमियोंका चित्त अपने परदेशी प्रियतममें जितना निश्‍चल भावसे लगा रहता है, उतना आँखोंके सामने, पास रहनेवाले प्रियतममें नहीं लगता॥ ३५॥ अशेष वृत्तियोंसे रहित सम्पूर्ण मन मुझमें लगाकर जब तुमलोग मेरा अनुस्मरण करोगी, तब शीघ्र ही सदाके लिये मुझे प्राप्त हो जाओगी॥ ३६॥ कल्याणियो! जिस समय मैंने वृन्दावनमें शारदीय पूर्णिमाकी रात्रिमें रासक्रीडा की थी उस समय जो गोपियाँ स्वजनोंके रोक लेनेसे व्रजमें ही रह गयीं—मेरे साथ रास-विहारमें सम्मिलित न हो सकीं, वे मेरी लीलाओंका स्मरण करनेसे ही मुझे प्राप्त हो गयी थीं। (तुम्हें भी मैं मिलूँगा अवश्य, निराश होनेकी कोई बात नहीं है )॥ ३७॥"},{"b":32631,"kind":"topic_heading","page":428,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32632,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.38"],"text":"एवं प्रियतमादिष्टमाकर्ण्य व्रजयोषितः।"},{"b":32633,"kind":"sanskrit_shloka","page":428,"verses":["10.47.38"],"text":"ता ऊचुरुद्धवं प्रीतास्तत्सन्देशागतस्मृतीः॥ ३८"},{"b":32634,"kind":"hindi_commentary","page":428,"explains":["10.47.38"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपने प्रियतम श्रीकृष्णका यह सँदेशा सुनकर गोपियोंको बड़ा आनन्द हुआ उनके संदेशसे उन्हें श्रीकृष्णके स्वरूप और एक-एक लीलाकी याद आने लगी। प्रेमसे भरकर उन्होंने उद्धवजीसे कहा॥ ३८॥"},{"b":32635,"kind":"topic_heading","page":429,"text":"गोप्य ऊचुः"},{"b":32636,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.39"],"text":"दिष्ट्याहितो हतः कंसो यदूनां सानुगोऽघकृत्।"},{"b":32637,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.39"],"text":"दिष्ट्याऽऽप्तैर्लब्धसर्वार्थैः कुशल्यास्तेऽच्युतोऽधुना॥ ३९"},{"b":32638,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"explains":["10.47.39"],"text":"गोपियोंने कहा—उद्धवजी! यह बड़े सौभाग्यकी और आनन्दकी बात है कि यदुवंशियोंको सतानेवाला पापी कंस अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। यह भी कम आनन्दकी बात नहीं है कि श्रीकृष्णके बन्धु-बान्धव और गुरुजनोंके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये तथा अब हमारे प्यारे श्यामसुन्दर उनके साथ सकुशल निवास कर रहे हैं॥ ३९॥"},{"b":32639,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.40"],"text":"कच्चिद् गदाग्रजः सौम्य करोति पुरयोषिताम्।"},{"b":32640,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.40"],"text":"प्रीतिं नः स्निग्धसव्रीडहासोदारेक्षणार्चितः॥ ४०"},{"b":32641,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"explains":["10.47.40"],"text":"किन्तु उद्धवजी! एक बात आप हमें बतलाइये। ‘जिस प्रकार हम अपनी प्रेमभरी लजीली मुसकान और उन्मुक्त चितवनसे उनकी पूजा करती थीं और वे भी हमसे प्यार करते थे, उसी प्रकार मथुराकी स्त्रियोंसे भी वे प्रेम करते हैं या नहीं?’॥ ४०॥"},{"b":32642,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.41"],"text":"कथं रतिविशेषज्ञः प्रियश्‍च वरयोषिताम्।"},{"b":32643,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.41"],"text":"नानुबध्येत तद्वाक्यैर्विभ्रमैश्‍चानुभाजितः॥ ४१"},{"b":32644,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"explains":["10.47.41"],"text":"तबतक दूसरी गोपी बोल उठी—‘अरी सखी! हमारे प्यारे श्यामसुन्दर तो प्रेमकी मोहिनी कलाके विशेषज्ञ हैं। सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ उनसे प्यार करती हैं, फिर भला जब नगरकी स्त्रियाँ उनसे मीठी-मीठी बातें करेंगी और हाव-भावसे उनकी ओर देखेंगी तब वे उनपर क्यों न रीझेंगे?’॥ ४१॥"},{"b":32645,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.42"],"text":"अपि स्मरति नः साधो गोविन्दः प्रस्तुते क्‍वचित्।"},{"b":32646,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.42"],"text":"गोष्ठीमध्ये पुरस्त्रीणां ग्राम्याः स्वैरकथान्तरे॥ ४२"},{"b":32647,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"explains":["10.47.42"],"text":"दूसरी गोपियाँ बोलीं—‘साधो! आप यह तो बतलाइये कि जब कभी नागरी नारियोंकी मण्डलीमें कोई बात चलती है और हमारे प्यारे स्वच्छन्दरूपसे, बिना किसी संकोचके जब प्रेमकी बातें करने लगते हैं, तब क्या कभी प्रसंगवश हम गँवार ग्वालिनों-की भी याद करते हैं?’॥ ४२॥"},{"b":32648,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.43"],"text":"ताः किं निशाः स्मरति यासु तदा प्रियाभि-"},{"b":32649,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.43"],"text":"र्वृन्दावने कुमुदकुन्दशशांकरम्ये।"},{"b":32650,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.43"],"text":"रेमे क्वणच्चरणनूपुररासगोष्ठ्या-"},{"b":32651,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"verses":["10.47.43"],"text":"मस्माभिरीडितमनोज्ञकथः कदाचित्॥ ४३"},{"b":32652,"kind":"sanskrit_shloka","page":429,"explains":["10.47.43"],"text":"कुछ गोपियोंने कहा—‘उद्धवजी! क्या कभी श्रीकृष्ण उन रात्रियोंका स्मरण करते हैं, जब कुमुदिनी तथा कुन्दके पुष्प खिले हुए थे, चारों ओर चाँदनी छिटक रही थी और वृन्दावन अत्यन्त रमणीय हो रहा था! उन रात्रियोंमें ही उन्होंने रास-मण्डल बनाकर हमलोगोंके साथ नृत्य किया था। कितनी सुन्दर थी वह रासलीला! उस समय हमलोगोंके पैरोंके नूपुर रुनझुन-रुनझुन बज रहे थे। हम सब सखियाँ उन्हींकी सुन्दर-सुन्दर लीलाओंका गान कर रही थीं और वे हमारे साथ नाना प्रकारके विहार कर रहे थे’॥ ४३॥"},{"b":32653,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.44"],"text":"अप्येष्यतीह दाशार्हस्तप्ताः स्वकृतया शुचा।"},{"b":32654,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.44"],"text":"संजीवयन् नु नो गात्रैर्यथेन्द्रो वनमम्बुदैः॥ ४४"},{"b":32655,"kind":"hindi_commentary","page":430,"explains":["10.47.44"],"text":"कुछ दूसरी गोपियाँ बोल उठीं—‘उद्धवजी! हम सब तो उन्हींके विरहकी आगसे जल रही हैं। देवराज इन्द्र जैसे जल बरसाकर वनको हरा-भरा कर देते हैं, उसी प्रकार क्या कभी श्रीकृष्ण भी अपने कर-स्पर्श आदिसे हमें जीवनदान देनेके लिये यहाँ आवेंगे?’॥ ४४॥"},{"b":32656,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.45"],"text":"कस्मात् कृष्ण इहायाति प्राप्तराज्यो हताहितः।"},{"b":32657,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.45"],"text":"नरेन्द्रकन्या उद्वाह्य प्रीतः सर्वसुहृद‍्वृतः॥ ४५"},{"b":32658,"kind":"hindi_commentary","page":430,"explains":["10.47.45"],"text":"तबतक एक गोपीने कहा—‘अरी सखी! अब तो उन्होंने शत्रुओंको मारकर राज्य पा लिया है; जिसे देखो, वही उनका सुहृद् बना फिरता है। अब वे बड़े-बड़े नरपतियोंकी कुमारियोंसे विवाह करेंगे, उनके साथ आनन्दपूर्वक रहेंगे; यहाँ हम गँवारिनोंके पास क्यों आयेंगे?’॥ ४५॥"},{"b":32659,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.46"],"text":"किमस्माभिर्वनौकोभिरन्याभिर्वा महात्मनः।"},{"b":32660,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.46"],"text":"श्रीपतेराप्तकामस्य क्रियेतार्थः कृतात्मनः॥ ४६"},{"b":32661,"kind":"hindi_commentary","page":430,"explains":["10.47.46"],"text":"दूसरी गोपीने कहा—‘नहीं सखी! महात्मा श्रीकृष्ण तो स्वयं लक्ष्मीपति हैं। उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण ही हैं, वे कृतकृत्य हैं। हम वनवासिनी ग्वालिनों अथवा दूसरी राजकुमारियोंसे उनका कोई प्रयोजन नहीं है। हमलोगोंके बिना उनका कौन-सा काम अटक रहा है॥ ४६॥"},{"b":32662,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.47"],"text":"परं सौख्यं हि नैराश्यं स्वैरिण्यप्याह पिंगला।"},{"b":32663,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.47"],"text":"तज्जानतीनां नः कृष्णे तथाप्याशा दुरत्यया॥ ४७"},{"b":32664,"kind":"hindi_translation","page":430,"explains":["10.47.47"],"text":"देखो वेश्या होनेपर भी पिंगलाने क्या ही ठीक कहा है—संसारमें किसीकी आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है।’ यह बात हम जानती हैं, फिर भी हम भगवान् श्रीकृष्णके लौटनेकी आशा छोड़नेमें असमर्थ हैं। उनके शुभागमनकी आशा ही तो हमारा जीवन है॥ ४७॥"},{"b":32665,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.48"],"text":"क उत्सहेत सन्त्यक्तुमुत्तमश्‍लोकसंविदम्।"},{"b":32666,"kind":"sanskrit_shloka","page":430,"verses":["10.47.48"],"text":"अनिच्छतोऽपि यस्य श्रीरंगान्‍न च्यवते क्‍वचित्॥ ४८"},{"b":32667,"kind":"hindi_commentary","page":430,"explains":["10.47.48"],"text":"हमारे प्यारे श्यामसुन्दरने, जिनकी कीर्तिका गान बड़े-बड़े महात्मा करते रहते हैं, हमसे एकान्तमें जो मीठी-मीठी प्रेमकी बातें की हैं उन्हें छोड़नेका, भुलानेका उत्साह भी हम कैसे कर सकती हैं? देखो तो, उनकी इच्छा न होनेपर भी स्वयं लक्ष्मीजी उनके चरणोंसे लिपटी रहती हैं, एक क्षणके लिये भी उनका अंग-संग छोड़कर कहीं नहीं जातीं॥ ४८॥"},{"b":32668,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.49"],"text":"सरिच्छैलवनोद्देशा गावो वेणुरवा इमे।"},{"b":32669,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.49"],"text":"संकर्षणसहायेन कृष्णेनाचरिताः प्रभो॥ ४९"},{"b":32670,"kind":"hindi_commentary","page":431,"explains":["10.47.49"],"text":"उद्धवजी! यह वही नदी है, जिसमें वे विहार करते थे। यह वही पर्वत है, जिसके शिखरपर चढ़कर वे बाँसुरी बजाते थे। ये वे ही वन हैं, जिनमें वे रात्रिके समय रासलीला करते थे, और ये वे ही गौएँ हैं, जिनको चरानेके लिये वे सुबह-शाम हमलोगोंको देखते हुए जाते-आते थे। और यह ठीक वैसी ही वंशीकी तान हमारे कानोंमें गूँजती रहती है, जैसी वे अपने अधरोंके संयोगसे छेड़ा करते थे। बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने इन सभीका सेवन किया है॥ ४९॥"},{"b":32671,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.50"],"text":"पुनः पुनः स्मारयन्ति नन्दगोपसुतं बत।"},{"b":32672,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.50"],"text":"श्रीनिकेतैस्तत्पदकैर्विस्मर्तुं नैव शक्‍नुमः॥ ५०"},{"b":32673,"kind":"hindi_commentary","page":431,"explains":["10.47.50"],"text":"यहाँका एक-एक प्रदेश, एक-एक धूलिकण उनके परम सुन्दर चरणकमलोंसे चिह्नित है। इन्हें जब-जब हम देखती हैं, सुनती हैं—दिनभर यही तो करती रहती हैं—तब-तब वे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर नन्दनन्दनको हमारे नेत्रोंके सामने लाकर रख देते हैं। उद्धवजी! हम किसी भी प्रकार मरकर भी उन्हें भूल नहीं सकतीं॥ ५०॥"},{"b":32674,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.51"],"text":"गत्या ललितयोदारहासलीलावलोकनैः।"},{"b":32675,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.51"],"text":"माध्व्या गिरा हृतधियः कथं तं विस्मरामहे॥ ५१"},{"b":32676,"kind":"hindi_commentary","page":431,"explains":["10.47.51"],"text":"उनकी वह हंसकी-सी सुन्दर चाल, उन्मुक्त हास्य, विलासपूर्ण चितवन और मधुमयी वाणी! आह! उन सबने हमारा चित्त चुरा लिया है, हमारा मन हमारे वशमें नहीं है; अब हम उन्हें भूलें तो किस तरह?॥ ५१॥"},{"b":32677,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.52"],"text":"हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन।"},{"b":32678,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.52"],"text":"म‌ग्‍नमुद्धर गोविन्द गोकुलं वृजिनार्णवात्॥ ५२"},{"b":32679,"kind":"hindi_commentary","page":431,"explains":["10.47.52"],"text":"हमारे प्यारे श्रीकृष्ण! तुम्हीं हमारे जीवनके स्वामी हो, सर्वस्व हो। प्यारे! तुम लक्ष्मीनाथ हो तो क्या हुआ? हमारे लिये तो व्रजनाथ ही हो। हम व्रजगोपियोंके एकमात्र तुम्हीं सच्चे स्वामी हो। श्यामसुन्दर! तुमने बार-बार हमारी व्यथा मिटायी है, हमारे संकट काटे हैं। गोविन्द! तुम गौओंसे बहुत प्रेम करते हो। क्या हम गौएँ नहीं हैं? तुम्हारा यह सारा गोकुल जिसमें ग्वालबाल, माता-पिता, गौएँ और हम गोपियाँ सब कोई हैं—दुःखके अपार सागरमें डूब रहा है। तुम इसे बचाओ, आओ, हमारी रक्षा करो॥ ५२॥"},{"b":32680,"kind":"topic_heading","page":431,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32681,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.53"],"text":"ततस्ताः कृष्णसन्देशैर्व्यपेतविरहज्वराः।"},{"b":32682,"kind":"sanskrit_shloka","page":431,"verses":["10.47.53"],"text":"उद्धवं पूजयांचक्रुर्ज्ञात्वाऽऽत्मानमधोक्षजम्॥ ५३"},{"b":32683,"kind":"hindi_commentary","page":431,"explains":["10.47.53"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका प्रिय सन्देश सुनकर गोपियोंके विरहकी व्यथा शान्त हो गयी थी। वे इन्द्रियातीत भगवान् श्रीकृष्णको अपने आत्माके रूपमें सर्वत्र स्थित समझ चुकी थीं। अब वे बड़े प्रेम और आदरसे उद्धवजीका सत्कार करने लगीं॥ ५३॥"},{"b":32684,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.54"],"text":"उवास कतिचिन्मासान् गोपीनां विनुदञ्छुचः।"},{"b":32685,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.54"],"text":"कृष्णलीलाकथां गायन् रमयामास गोकुलम्॥ ५४"},{"b":32686,"kind":"hindi_commentary","page":432,"explains":["10.47.54"],"text":"उद्धवजी गोपियोंकी विरह-व्यथा मिटानेके लिये कई महीनोंतक वहीं रहे। वे भगवान् श्रीकृष्णकी अनेकों लीलाएँ और बातें सुना-सुनाकर व्रज-वासियोंको आनन्दित करते रहते॥ ५४॥"},{"b":32687,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.55"],"text":"यावन्त्यहानि नन्दस्य व्रजेऽवात्सीत् स उद्धवः।"},{"b":32688,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.55"],"text":"व्रजौकसां क्षणप्रायाण्यासन् कृष्णस्य वार्तया॥ ५५"},{"b":32689,"kind":"hindi_commentary","page":432,"explains":["10.47.55"],"text":"नन्दबाबाके व्रजमें जितने दिनोंतक उद्धवजी रहे, उतने दिनोंतक भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकी चर्चा होते रहनेके कारण व्रजवासियोंको ऐसा जान पड़ा, मानो अभी एक ही क्षण हुआ हो॥ ५५॥"},{"b":32690,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.56"],"text":"सरिद्वनगिरिद्रोणीर्वीक्षन् कुसुमितान् द्रुमान्।"},{"b":32691,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.56"],"text":"कृष्णं संस्मारयन् रेमे हरिदासो व्रजौकसाम्॥ ५६"},{"b":32692,"kind":"hindi_commentary","page":432,"explains":["10.47.56"],"text":"भगवान्‌के परमप्रेमी भक्त उद्धवजी कभी नदीतटपर जाते, कभी वनोंमें विहरते और कभी गिरिराजकी घाटियोंमें विचरते। कभी रंग-बिरंगे फूलोंसे लदे हुए वृक्षोंमें ही रम जाते और यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने कौन-सी लीला की है, यह पूछ-पूछकर व्रजवासियोंको भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी लीलाके स्मरणमें तन्मय कर देते॥ ५६॥"},{"b":32693,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.57"],"text":"दृष्ट्वैवमादि गोपीनां कृष्णावेशात्मविक्लवम्।"},{"b":32694,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.57"],"text":"उद्धवः परमप्रीतस्ता नमस्यन्‍निदं जगौ॥ ५७"},{"b":32695,"kind":"hindi_commentary","page":432,"explains":["10.47.57"],"text":"उद्धवजीने व्रजमें रहकर गोपियोंकी इस प्रकारकी प्रेम-विकलता तथा और भी बहुत-सी प्रेम-चेष्टाएँ देखीं। उनकी इस प्रकार श्रीकृष्णमें तन्मयता देखकर वे प्रेम और आनन्दसे भर गये। अब वे गोपियोंको नमस्कार करते हुए इस प्रकार गान करने लगे—॥ ५७॥"},{"b":32696,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.58"],"text":"एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो"},{"b":32697,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.58"],"text":"गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावाः।"},{"b":32698,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.58"],"text":"वाञ्छन्ति यद् भवभियो मुनयो वयं च"},{"b":32699,"kind":"sanskrit_shloka","page":432,"verses":["10.47.58"],"text":"किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य॥ ५८"},{"b":32700,"kind":"hindi_commentary","page":432,"explains":["10.47.58"],"text":"‘इस पृथ्वीपर केवल इन गोपियोंका ही शरीर धारण करना श्रेष्ठ एवं सफल है; क्योंकि ये सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्णके परम प्रेममय दिव्य महाभावमें स्थित हो गयी हैं। प्रेमकी यह ऊँची-से-ऊँची स्थिति संसारके भयसे भीत मुमुक्षुजनोंके लिये ही नहीं, अपितु बड़े-बड़े मुनियों—मुक्त पुरुषों तथा हम भक्तजनोंके लिये भी अभी वाञ्छनीय ही है। हमें इसकी प्राप्ति नहीं हो सकी। सत्य है, जिन्हें भगवान् श्रीकृष्णकी लीला-कथाके रसका चसका लग गया है, उन्हें कुलीनताकी, द्विजातिसमुचित संस्कारकी और बड़े-बड़े यज्ञ-यागोंमें दीक्षित होनेकी क्या आवश्यकता है? अथवा यदि भगवान्‌की कथाका रस नहीं मिला, उसमें रुचि नहीं हुई, तो अनेक महाकल्पोंतक बार-बार ब्रह्मा होनेसे ही क्या लाभ?॥ ५८॥"},{"b":32701,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.59"],"text":"क्वेमाः स्त्रियो वनचरीर्व्यभिचारदुष्टाः"},{"b":32702,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.59"],"text":"कृष्णे क्व चैष परमात्मनि रूढभावः।"},{"b":32703,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.59"],"text":"नन्वीश्‍वरोऽनुभजतोऽविदुषोऽपि साक्षा-"},{"b":32704,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.59"],"text":"च्छ्रेयस्तनोत्यगदराज इवोपयुक्तः॥ ५९"},{"b":32705,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.60"],"text":"नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः"},{"b":32706,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.60"],"text":"स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।"},{"b":32707,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.60"],"text":"रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-"},{"b":32708,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.60"],"text":"लब्धाशिषां य उदगाद् व्रजबल्लवीनाम्॥ ६०"},{"b":32709,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.61"],"text":"आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां"},{"b":32710,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.61"],"text":"वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।"},{"b":32711,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.61"],"text":"या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा"},{"b":32712,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.61"],"text":"भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥ ६१"},{"b":32713,"kind":"hindi_translation","page":433,"explains":["10.47.59","10.47.60","10.47.61"],"text":"कहाँ ये वनचरी आचार, ज्ञान और जातिसे हीन गाँवकी गँवार ग्वालिनें और कहाँ सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रीकृष्णमें यह अनन्य परम प्रेम! अहो, धन्य है! धन्य है! इससे सिद्ध होता है कि कोई भगवान्‌के स्वरूप और रहस्यको न जानकर भी उनसे प्रेम करे, उनका भजन करे, तो वे स्वयं अपनी शक्तिसे अपनी कृपासे उसका परम कल्याण कर देते हैं; ठीक वैसे ही, जैसे कोई अनजानमें भी अमृत पी ले तो वह अपनी वस्तु-शक्तिसे ही पीनेवालेको अमर बना देता है॥ ५९॥ भगवान् श्रीकृष्णने रासोत्सवके समय इन व्रजांगनाओंके गलेमें बाँह डाल-डालकर इनके मनोरथ पूर्ण किये। इन्हें भगवान्‌ने जिस कृपा-प्रसादका वितरण किया, इन्हें जैसा प्रेमदान किया, वैसा भगवान्‌की परमप्रेमवती नित्यसंगिनी वक्षःस्थलपर विराजमान लक्ष्मीजीको भी नहीं प्राप्त हुआ। कमलकी-सी सुगन्ध और कान्तिसे युक्त देवांगनाओंको भी नहीं मिला। फिर दूसरी स्त्रियोंकी तो बात ही क्या करें?॥ ६०॥ मेरे लिये तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मैं इस वृन्दावनधाममें कोई झाड़ी, लता अथवा ओषधि—जड़ी-बूटी ही बन जाऊँ! अहा! यदि मैं ऐसा बन जाऊँगा, तो मुझे इन व्रजांगनाओंकी चरणधूलि निरन्तर सेवन करनेके लिये मिलती रहेगी। इनकी चरण-रजमें स्नान करके मैं धन्य हो जाऊँगा। धन्य हैं ये गोपियाँ। देखो तो सही, जिनको छोड़ना अत्यन्त कठिन है, उन स्वजन-सम्बन्धियों तथा लोक-वेदकी आर्य-मर्यादाका परित्याग करके इन्होंने भगवान्‌की पदवी, उनके साथ तन्मयता, उनका परम प्रेम प्राप्त कर लिया है—औरोंकी तो बात ही क्या—भगवद्वाणी, उनकी निःश्‍वासरूप समस्त श्रुतियाँ, उपनिषदें भी अबतक भगवान्‌के परम प्रेममय स्वरूपको ढूँढ़ती ही रहती हैं, प्राप्त नहीं कर पातीं॥ ६१॥"},{"b":32714,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.62"],"text":"या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामै-"},{"b":32715,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.62"],"text":"र्योगेश्‍वरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठ्याम्।"},{"b":32716,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.62"],"text":"कृष्णस्य तद् भगवतश्‍चरणारविन्दं"},{"b":32717,"kind":"sanskrit_shloka","page":433,"verses":["10.47.62"],"text":"न्यस्तं स्तनेषु विजहुः परिरभ्य तापम्॥ ६२"},{"b":32718,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.63"],"text":"वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः।"},{"b":32719,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.63"],"text":"यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम्॥ ६३"},{"b":32720,"kind":"hindi_translation","page":433,"explains":["10.47.62","10.47.63"],"text":"स्वयं भगवती लक्ष्मीजी जिनकी पूजा करती रहती हैं; ब्रह्मा, शंकर आदि परम समर्थ देवता, पूर्णकाम आत्माराम और बड़े-बड़े योगेश्‍वर अपने हृदयमें जिनका चिन्तन करते रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्णके उन्हीं चरणारविन्दोंको रास-लीलाके समय गोपियोंने अपने वक्षःस्थलपर रखा और उनका आलिंगन करके अपने हृदयकी जलन, विरह-व्यथा शान्त की॥ ६२॥ नन्दबाबाके व्रजमें रहनेवाली गोपांगनाओंकी चरण-धूलिको मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ—उसे सिरपर चढ़ाता हूँ। अहा! इन गोपियोंने भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकथाके सम्बन्धमें जो कुछ गान किया है, वह तीनों लोकोंको पवित्र कर रहा है और सदा-सर्वदा पवित्र करता रहेगा’॥ ६३॥"},{"b":32721,"kind":"topic_heading","page":434,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32722,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.64"],"text":"अथ गोपीरनुज्ञाप्य यशोदां नन्दमेव च।"},{"b":32723,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.64"],"text":"गोपानामन्त्र्य दाशार्हो यास्यन्‍नारुरुहे रथम्॥ ६४"},{"b":32724,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.65"],"text":"तं निर्गतं समासाद्य नानोपायनपाणयः।"},{"b":32725,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.65"],"text":"नन्दादयोऽनुरागेण प्रावोचन्‍नश्रुलोचनाः॥ ६५"},{"b":32726,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.66"],"text":"मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः।"},{"b":32727,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.66"],"text":"वाचोऽभिधायिनीर्नाम्‍नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु॥ ६६"},{"b":32728,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.67"],"text":"कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र क्वापीश्‍वरेच्छया।"},{"b":32729,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.67"],"text":"मंगलाचरितैर्दानै रतिर्नः कृष्ण ईश्‍वरे॥ ६७"},{"b":32730,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.68"],"text":"एवं सभाजितो गोपैः कृष्णभक्त्या नराधिप।"},{"b":32731,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.68"],"text":"उद्धवः पुनरागच्छन्मथुरां कृष्णपालिताम्॥ ६८"},{"b":32732,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.69"],"text":"कृष्णाय प्रणिपत्याह भक्त्युद्रेकं व्रजौकसाम्।"},{"b":32733,"kind":"sanskrit_shloka","page":434,"verses":["10.47.69"],"text":"वसुदेवाय रामाय राज्ञे चोपायनान्यदात्॥ ६९"},{"b":32734,"kind":"hindi_commentary","page":434,"explains":["10.47.64","10.47.65","10.47.66","10.47.67","10.47.68","10.47.69"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार कई महीनोंतक व्रजमें रहकर उद्धवजीने अब मथुरा जानेके लिये गोपियोंसे, नन्दबाबा और यशोदा मैयासे आज्ञा प्राप्त की। ग्वालबालोंसे विदा लेकर वहाँसे यात्रा करनेके लिये वे रथपर सवार हुए॥ ६४॥ जब उनका रथ व्रजसे बाहर निकला, तब नन्दबाबा आदि गोपगण बहुत-सी भेंटकी सामग्री लेकर उनके पास आये और आँखोंमें आँसू भरकर उन्होंने बड़े प्रेमसे कहा—॥ ६५॥ ‘उद्धवजी! अब हम यही चाहते हैं कि हमारे मनकी एक-एक वृत्ति, एक-एक संकल्प श्रीकृष्णके चरणकमलोंके ही आश्रित रहे। उन्हींकी सेवाके लिये उठे और उन्हींमें लगी भी रहे। हमारी वाणी नित्य-निरन्तर उन्हींके नामोंका उच्चारण करती रहे और शरीर उन्हींको प्रणाम करने, उन्हींके आज्ञापालन और सेवामें लगा रहे॥ ६६॥ उद्धवजी! हम सच कहते हैं, हमें मोक्षकी इच्छा बिलकुल नहीं है। हम भगवान्‌की इच्छासे अपने कर्मोंके अनुसार चाहे जिस योनिमें जन्म लें—वहाँ शुभ आचरण करें, दान करें और उसका फल यही पावें कि हमारे अपने ईश्‍वर श्रीकृष्णमें हमारी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती रहे’॥ ६७॥ प्रिय परीक्षित्! नन्दबाबा आदि गोपोंने इस प्रकार श्रीकृष्ण-भक्तिके द्वारा उद्धवजीका सम्मान किया। अब वे भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित मथुरापुरीमें लौट आये॥ ६८॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया और उन्हें व्रजवासियोंकी प्रेममयी भक्तिका उद्रेक, जैसा उन्होंने देखा था, कह सुनाया। इसके बाद नन्दबाबाने भेंटकी जो-जो सामग्री दी थी वह उनको, वसुदेवजी, बलरामजी और राजा उग्रसेनको दे दी॥ ६९॥"},{"b":32735,"kind":"hindi_translation","page":434,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे उद्धवप्रतियाने सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७॥"}],"notes":[{"id":"v2:296","mark":"१","page":428,"after_verse":"10.47.36","text":"कृष्णे।"}],"corrections":{"count":8,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}