{"id":"10.44","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 44","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः","topics":["चाणूर, मुष्टिक आदि पहलवानोंका तथा कंसका उद्धार"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[401,408]},"verses":[{"id":"10.44.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/1/","page":401,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं चर्चितसंकल्पो भगवान् मधुसूदनः।","आससादाथ चाणूरं मुष्टिकं रोहिणीसुतः॥ १"],"iast":["evaṃ carcitasaṃkalpo bhagavān madhusūdanaḥ|","āsasādātha cāṇūraṃ muṣṭikaṃ rohiṇīsutaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने चाणूर आदिके वधका निश्‍चित संकल्प कर लिया। जोड़ बद दिये जानेपर श्रीकृष्ण चाणूरसे और बलरामजी मुष्टिकसे जा भिड़े॥ १॥"},{"id":"10.44.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/2/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हस्ताभ्यां हस्तयोर्बद‍्ध्वा पद‍्भ्यामेव च पादयोः।","विचकर्षतुरन्योन्यं प्रसह्य विजिगीषया॥ २"],"iast":["hastābhyāṃ hastayorbaddhvā padbhyāmeva ca pādayoḥ|","vicakarṣaturanyonyaṃ prasahya vijigīṣayā|| 2"],"meaning":"वे लोग एक-दूसरेको जीत लेनेकी इच्छासे हाथसे हाथ बाँधकर और पैरोंमें पैर अड़ाकर बलपूर्वक अपनी-अपनी ओर खींचने लगे॥ २॥"},{"id":"10.44.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/3/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अरत्‍नी द्वे अरत्‍निभ्यां जानुभ्यां चैव जानुनी।","शिरः शीर्ष्णोरसोरस्तावन्योन्यमभिजघ्नतुः॥ ३"],"iast":["aratnī dve aratnibhyāṃ jānubhyāṃ caiva jānunī|","śiraḥ śīrṣṇorasorastāvanyonyamabhijaghnatuḥ|| 3"],"meaning":"वे पंजोंसे पंजे, घुटनोंसे घुटने, माथेसे माथा और छातीसे छाती भिड़ाकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे॥ ३॥"},{"id":"10.44.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/4/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["परिभ्रामणविक्षेपपरिरम्भावपातनैः ।","उत्सर्पणापसर्पणैश्‍चान्योन्यं प्रत्यरुन्धताम्॥ ४"],"iast":["paribhrāmaṇavikṣepaparirambhāvapātanaiḥ |","utsarpaṇāpasarpaṇaiścānyonyaṃ pratyarundhatām|| 4"],"meaning":"इस प्रकार दाँव-पेंच करते-करते अपने-अपने जोड़ीदारको पकड़कर इधर-उधर घुमाते, दूर ढकेल देते, जोरसे जकड़ लेते, लिपट जाते, उठाकर पटक देते, छूटकर निकल भागते और कभी छोड़कर पीछे हट जाते थे। इस प्रकार एक-दूसरेको रोकते, प्रहार करते और अपने जोड़ीदारको पछाड़ देनेकी चेष्टा करते। कभी कोई नीचे गिर जाता, तो दूसरा उसे घुटनों और पैरोंमें दबाकर उठा लेता। हाथोंसे पकड़कर ऊपर ले जाता। गलेमें लिपट जानेपर ढकेल देता और आवश्यकता होनेपर हाथ-पाँव इकट्ठे करके गाँठ बाँध देता॥ ४-५॥","meaning_covers":[4,5]},{"id":"10.44.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/5/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उत्थापनैरुन्‍नयनैश्‍चालनैः स्थापनैरपि।","परस्परं जिगीषन्तावपचक्रतुरात्मनः॥ ५"],"iast":["utthāpanairunnayanaiścālanaiḥ sthāpanairapi|","parasparaṃ jigīṣantāvapacakraturātmanaḥ|| 5"],"meaning":"इस प्रकार दाँव-पेंच करते-करते अपने-अपने जोड़ीदारको पकड़कर इधर-उधर घुमाते, दूर ढकेल देते, जोरसे जकड़ लेते, लिपट जाते, उठाकर पटक देते, छूटकर निकल भागते और कभी छोड़कर पीछे हट जाते थे। इस प्रकार एक-दूसरेको रोकते, प्रहार करते और अपने जोड़ीदारको पछाड़ देनेकी चेष्टा करते। कभी कोई नीचे गिर जाता, तो दूसरा उसे घुटनों और पैरोंमें दबाकर उठा लेता। हाथोंसे पकड़कर ऊपर ले जाता। गलेमें लिपट जानेपर ढकेल देता और आवश्यकता होनेपर हाथ-पाँव इकट्ठे करके गाँठ बाँध देता॥ ४-५॥","meaning_covers":[4,5]},{"id":"10.44.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/6/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद् बलाबलवद्युद्धं समेताः सर्वयोषितः।","ऊचुः परस्परं राजन् सानुकम्पा वरूथशः॥ ६"],"iast":["tad balābalavadyuddhaṃ sametāḥ sarvayoṣitaḥ|","ūcuḥ parasparaṃ rājan sānukampā varūthaśaḥ|| 6"],"meaning":"परीक्षित्! इस दंगलको देखनेके लिये नगरकी बहुत-सी महिलाएँ भी आयी हुई थीं। उन्होंने जब देखा कि बड़े-बड़े पहलवानोंके साथ ये छोटे-छोटे बलहीन बालक लड़ाये जा रहे हैं, तब वे अलग-अलग टोलियाँ बनाकर करुणावश आपसमें बातचीत करने लगीं—॥ ६॥"},{"id":"10.44.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/7/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["महानयं बताधर्म एषां राजसभासदाम्।","ये बलाबलवद्युद्धं राज्ञोऽन्विच्छन्ति पश्यतः॥ ७"],"iast":["mahānayaṃ batādharma eṣāṃ rājasabhāsadām|","ye balābalavadyuddhaṃ rājño'nvicchanti paśyataḥ|| 7"],"meaning":"‘यहाँ राजा कंसके सभासद् बड़ा अन्याय और अधर्म कर रहे हैं। कितने खेदकी बात है कि राजाके सामने ही ये बली पहलवानों और निर्बल बालकोंके युद्धका अनुमोदन करते हैं॥ ७॥"},{"id":"10.44.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/8/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्व वज्रसारसर्वांगौ मल्लौ शैलेन्द्रसन्‍निभौ।","क्व चातिसुकुमारांगौ किशोरौ नाप्तयौवनौ॥ ८"],"iast":["kva vajrasārasarvāṃgau mallau śailendrasannibhau|","kva cātisukumārāṃgau kiśorau nāptayauvanau|| 8"],"meaning":"बहिन! देखो, इन पहलवानोंका एक-एक अंग वज्रके समान कठोर है। ये देखनेमें बड़े भारी पर्वत-से मालूम होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण और बलराम अभी जवान भी नहीं हुए हैं। इनकी किशोरावस्था है। इनका एक-एक अंग अत्यन्त सुकुमार है। कहाँ ये और कहाँ वे?॥ ८॥"},{"id":"10.44.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/9/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धर्मव्यतिक्रमो ह्यस्य समाजस्य ध्रुवं भवेत्।","यत्राधर्मः समुत्तिष्ठेन्‍न स्थेयं तत्र कर्हिचित्॥ ९"],"iast":["dharmavyatikramo hyasya samājasya dhruvaṃ bhavet|","yatrādharmaḥ samuttiṣṭhenna stheyaṃ tatra karhicit|| 9"],"meaning":"जितने लोग यहाँ इकट्ठे हुए हैं, देख रहे हैं, उन्हें अवश्य-अवश्य धर्मोल्लंघनका पाप लगेगा। सखी! अब हमें भी यहाँसे चल देना चाहिये। जहाँ अधर्मकी प्रधानता हो, वहाँ कभी न रहे; यही शास्त्रका नियम है॥ ९॥"},{"id":"10.44.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/10/","page":402,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न सभां प्रविशेत् प्राज्ञः सभ्यदोषाननुस्मरन्।","अब्रुवन् विब्रुवन्‍नज्ञो नरः किल्बिषमश्‍नुते॥ १०"],"iast":["na sabhāṃ praviśet prājñaḥ sabhyadoṣānanusmaran|","abruvan vibruvannajño naraḥ kilbiṣamaśnute|| 10"],"meaning":"देखो, शास्त्र कहता है कि बुद्धिमान् पुरुषको सभासदोंके दोषोंको जानते हुए सभामें जाना ठीक नहीं है। क्योंकि वहाँ जाकर उन अवगुणोंको कहना, चुप रह जाना अथवा मैं नहीं जानता ऐसा कह देना—ये तीनों ही बातें मनुष्यको दोषभागी बनाती हैं॥ १०॥"},{"id":"10.44.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/11/","page":403,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वल्गतः शत्रुमभितः कृष्णस्य वदनाम्बुजम्।","वीक्ष्यतां श्रमवार्युप्तं पद्मकोशमिवाम्बुभिः॥ ११"],"iast":["valgataḥ śatrumabhitaḥ kṛṣṇasya vadanāmbujam|","vīkṣyatāṃ śramavāryuptaṃ padmakośamivāmbubhiḥ|| 11"],"meaning":"देखो, देखो, श्रीकृष्ण शत्रुके चारों ओर पैंतरा बदल रहे हैं। उनके मुखपर पसीनेकी बूँदें ठीक वैसे ही शोभा दे रही हैं, जैसे कमलकोशपर जलकी बूँदें॥ ११॥"},{"id":"10.44.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/12/","page":403,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं न पश्यत रामस्य मुखमाताम्रलोचनम्।","मुष्टिकं प्रति सामर्षं हाससंरम्भशोभितम्॥ १२"],"iast":["kiṃ na paśyata rāmasya mukhamātāmralocanam|","muṣṭikaṃ prati sāmarṣaṃ hāsasaṃrambhaśobhitam|| 12"],"meaning":"सखियो! क्या तुम नहीं देख रही हो कि बलरामजीका मुख मुष्टिकके प्रति क्रोधके कारण कुछ-कुछ लाल लोचनोंसे युक्त हो रहा है! फिर भी हास्यका अनिरुद्ध आवेग कितना सुन्दर लग रहा है॥ १२॥"},{"id":"10.44.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/13/","page":403,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुण्या बत व्रजभुवो यदयं नृलिंग-","गूढः पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्यः।","गाः पालयन् सहबलः क्वणयंश्‍च वेणुं","विक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्‌घ्रिः॥ १३"],"iast":["puṇyā bata vrajabhuvo yadayaṃ nṛliṃga-","gūḍhaḥ purāṇapuruṣo vanacitramālyaḥ|","gāḥ pālayan sahabalaḥ kvaṇayaṃśca veṇuṃ","vikrīḍayāñcati giritraramārcitāṅghriḥ|| 13"],"meaning":"सखी! सच पूछो तो व्रजभूमि ही परम पवित्र और धन्य है। क्योंकि वहाँ ये पुरुषोत्तम मनुष्यके वेषमें छिपकर रहते हैं। स्वयं भगवान् शंकर और लक्ष्मीजी जिनके चरणोंकी पूजा करती हैं, वे ही प्रभु वहाँ रंग-बिरंगे जंगली पुष्पोंकी माला धारण कर लेते हैं तथा बलरामजीके साथ बाँसुरी बजाते, गौएँ चराते और तरह-तरहके खेल खेलते हुए आनन्दसे विचरते हैं॥ १३॥"},{"id":"10.44.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/14/","page":403,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं","लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्।","दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप-","मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्‍वरस्य॥ १४"],"iast":["gopyastapaḥ kimacaran yadamuṣya rūpaṃ","lāvaṇyasāramasamordhvamananyasiddham|","dṛgbhiḥ pibantyanusavābhinavaṃ durāpa-","mekāntadhāma yaśasaḥ śriya aiśvarasya|| 14"],"meaning":"सखी! पता नहीं, गोपियोंने कौन-सी तपस्या की थी, जो नेत्रोंके दोनोंसे नित्य-निरन्तर इनकी रूप-माधुरीका पान करती रहती हैं। इनका रूप क्या है, लावण्यका सार! संसारमें या उससे परे किसीका भी रूप इनके रूपके समान नहीं है, फिर बढ़कर होनेकी तो बात ही क्या है! सो भी किसीके सँवारने-सजानेसे नहीं, गहने-कपड़ेसे भी नहीं, बल्कि स्वयंसिद्ध है। इस रूपको देखते-देखते तृप्ति भी नहीं होती। क्योंकि यह प्रतिक्षण नया होता जाता है, नित्य नूतन है। समग्र यश, सौन्दर्य और ऐश्‍वर्य इसीके आश्रित हैं। सखियो! परन्तु इसका दर्शन तो औरोंके लिये बड़ा ही दुर्लभ है। वह तो गोपियोंके ही भाग्यमें बदा है॥ १४॥"},{"id":"10.44.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/15/","page":403,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-","प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ ।","गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो","धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः॥ १५"],"iast":["yā dohane'vahanane mathanopalepa-","preṅkheṅkhanārbharuditokṣaṇamārjanādau |","gāyanti cainamanuraktadhiyo'śrukaṇṭhyo","dhanyā vrajastriya urukramacittayānāḥ|| 15"],"meaning":"सखी! व्रजकी गोपियाँ धन्य हैं। निरन्तर श्रीकृष्णमें ही चित्त लगा रहनेके कारण प्रेमभरे हृदयसे, आँसुओंके कारण गद्गद कण्ठसे वे इन्हींकी लीलाओंका गान करती रहती हैं। वे दूध दुहते, दही मथते, धान कूटते, घर लीपते, बालकोंको झूला झुलाते, रोते हुए बालकोंको चुप कराते, उन्हें नहलाते-धुलाते, घरोंको झाड़ते-बुहारते—कहाँतक कहें, सारे काम-काज करते समय श्रीकृष्णके गुणोंके गानमें ही मस्त रहती हैं॥ १५॥"},{"id":"10.44.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/16/","page":404,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रातर्व्रजाद् व्रजत आविशतश्‍च सायं","गोभिः समं क्वणयतोऽस्य निशम्य वेणुम्।","निर्गम्य तूर्णमबलाः पथि भूरिपुण्याः","पश्यन्ति सस्मितमुखं सदयावलोकम्॥ १६"],"iast":["prātarvrajād vrajata āviśataśca sāyaṃ","gobhiḥ samaṃ kvaṇayato'sya niśamya veṇum|","nirgamya tūrṇamabalāḥ pathi bhūripuṇyāḥ","paśyanti sasmitamukhaṃ sadayāvalokam|| 16"],"meaning":"ये श्रीकृष्ण जब प्रातःकाल गौओंको चरानेके लिये व्रजसे वनमें जाते हैं और सायंकाल उन्हें लेकर व्रजमें लौटते हैं, तब बड़े मधुर स्वरसे बाँसुरी बजाते हैं। उसकी टेर सुनकर गोपियाँ घरका सारा कामकाज छोड़कर झटपट रास्तेमें दौड़ आती हैं और श्रीकृष्णका मन्द-मन्द मुसकान एवं दयाभरी चितवनसे युक्त मुखकमल निहार-निहारकर निहाल होती हैं। सचमुच गोपियाँ ही परम पुण्यवती हैं’॥ १६॥"},{"id":"10.44.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/17/","page":404,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं प्रभाषमाणासु स्त्रीषु योगेश्‍वरो हरिः।","शत्रुं हन्तुं मनश्‍चक्रे भगवान् भरतर्षभ॥ १७"],"iast":["evaṃ prabhāṣamāṇāsu strīṣu yogeśvaro hariḥ|","śatruṃ hantuṃ manaścakre bhagavān bharatarṣabha|| 17"],"meaning":"भरतवंशशिरोमणे! जिस समय पुरवासिनी स्त्रियाँ इस प्रकार बातें कर रही थीं, उसी समय योगेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन शत्रुको मार डालनेका निश्‍चय किया॥ १७॥"},{"id":"10.44.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/18/","page":404,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सभयाः स्त्रीगिरः श्रुत्वा पुत्रस्नेहशुचाऽऽतुरौ।","पितरावन्वतप्येतां पुत्रयोरबुधौ बलम्॥ १८"],"iast":["sabhayāḥ strīgiraḥ śrutvā putrasnehaśucā''turau|","pitarāvanvatapyetāṃ putrayorabudhau balam|| 18"],"meaning":"स्त्रियोंकी ये भयपूर्ण बातें माता-पिता देवकी-वसुदेव भी सुन रहे थे। वे पुत्रस्नेहवश शोकसे विह्वल हो गये। उनके हृदयमें बड़ी जलन, बड़ी पीड़ा होने लगी। क्योंकि वे अपने पुत्रोंके बल-वीर्यको नहीं जानते थे॥ १८॥"},{"id":"10.44.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/19/","page":404,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तैस्तैर्नियुद्धविधिभिर्विविधैरच्युतेतरौ ।","युयुधाते यथान्योन्यं तथैव बलमुष्टिकौ॥ १९"],"iast":["taistairniyuddhavidhibhirvividhairacyutetarau |","yuyudhāte yathānyonyaṃ tathaiva balamuṣṭikau|| 19"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण और उनसे भिड़नेवाला चाणूर दोनों ही भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारके दाँव-पेंचका प्रयोग करते हुए परस्पर जिस प्रकार लड़ रहे थे, वैसे ही बलरामजी और मुष्टिक भी भिड़े हुए थे॥ १९॥"},{"id":"10.44.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/20/","page":404,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवद्गात्रनिष्पातैर्वज्रनिष्पेषनिष्ठुरैः ।","चाणूरो भज्यमानांगो मुहुर्ग्लानिमवाप ह॥ २०"],"iast":["bhagavadgātraniṣpātairvajraniṣpeṣaniṣṭhuraiḥ |","cāṇūro bhajyamānāṃgo muhurglānimavāpa ha|| 20"],"meaning":"भगवान्‌के अंग-प्रत्यंग वज्रसे भी कठोर हो रहे थे। उनकी रगड़से चाणूरकी रग-रग ढीली पड़ गयी। बार-बार उसे ऐसा मालूम हो रहा था मानो उसके शरीरके सारे बन्धन टूट रहे हैं। उसे बड़ी ग्लानि, बड़ी व्यथा हुई॥ २०॥"},{"id":"10.44.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/21/","page":404,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स श्येनवेग उत्पत्य मुष्टीकृत्य करावुभौ।","भगवन्तं वासुदेवं क्रुद्धो वक्षस्यबाधत॥ २१"],"iast":["sa śyenavega utpatya muṣṭīkṛtya karāvubhau|","bhagavantaṃ vāsudevaṃ kruddho vakṣasyabādhata|| 21"],"meaning":"अब वह अत्यन्त क्रोधित होकर बाजकी तरह झपटा और दोनों हाथोंके घूँसे बाँधकर उसने भगवान् श्रीकृष्णकी छातीपर प्रहार किया॥ २१॥"},{"id":"10.44.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/22/","page":404,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नाचलत्तत्प्रहारेण मालाहत इव द्विपः।","बाह्वोर्निगृह्य चाणूरं बहुशो भ्रामयन् हरिः॥ २२"],"iast":["nācalattatprahāreṇa mālāhata iva dvipaḥ|","bāhvornigṛhya cāṇūraṃ bahuśo bhrāmayan hariḥ|| 22"],"meaning":"परन्तु उसके प्रहारसे भगवान् तनिक भी विचलित न हुए, जैसे फूलोंके गजरेकी मारसे गजराज। उन्होंने चाणूरकी दोनों भुजाएँ पकड़ लीं और उसे अन्तरिक्षमें बड़े वेगसे कई बार घुमाकर धरतीपर दे मारा। परीक्षित्! चाणूरके प्राण तो घुमानेके समय ही निकल गये थे। उसकी वेष-भूषा अस्त-व्यस्त हो गयी, केश और मालाएँ बिखर गयीं, वह इन्द्रध्वज (इन्द्रकी पूजाके लिये खड़े किये गये बड़े झंडे) के समान गिर पड़ा॥ २२-२३॥","meaning_covers":[22,23]},{"id":"10.44.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/23/","page":404,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भूपृष्ठे पोथयामास तरसा क्षीणजीवितम्।","विस्रस्ताकल्पकेशस्रगिन्द्रध्वज इवापतत्॥ २३"],"iast":["bhūpṛṣṭhe pothayāmāsa tarasā kṣīṇajīvitam|","visrastākalpakeśasragindradhvaja ivāpatat|| 23"],"meaning":"परन्तु उसके प्रहारसे भगवान् तनिक भी विचलित न हुए, जैसे फूलोंके गजरेकी मारसे गजराज। उन्होंने चाणूरकी दोनों भुजाएँ पकड़ लीं और उसे अन्तरिक्षमें बड़े वेगसे कई बार घुमाकर धरतीपर दे मारा। परीक्षित्! चाणूरके प्राण तो घुमानेके समय ही निकल गये थे। उसकी वेष-भूषा अस्त-व्यस्त हो गयी, केश और मालाएँ बिखर गयीं, वह इन्द्रध्वज (इन्द्रकी पूजाके लिये खड़े किये गये बड़े झंडे) के समान गिर पड़ा॥ २२-२३॥","meaning_covers":[22,23]},{"id":"10.44.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/24/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथैव मुष्टिकः पूर्वं स्वमुष्ट्याभिहतेन वै।","बलभद्रेण बलिना तलेनाभिहतो भृशम्॥ २४"],"iast":["tathaiva muṣṭikaḥ pūrvaṃ svamuṣṭyābhihatena vai|","balabhadreṇa balinā talenābhihato bhṛśam|| 24"],"meaning":"इसी प्रकार मुष्टिकने भी पहले बलरामजीको एक घूँसा मारा। इसपर बली बलरामजीने उसे बड़े जोरसे एक तमाचा जड़ दिया॥ २४॥"},{"id":"10.44.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/25/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रवेपितः स रुधिरमुद्वमन् मुखतोऽर्दितः।","व्यसुः पपातोर्व्युपस्थे वाताहत इवाङ्‌घ्रिपः॥ २५"],"iast":["pravepitaḥ sa rudhiramudvaman mukhato'rditaḥ|","vyasuḥ papātorvyupasthe vātāhata ivāṅghripaḥ|| 25"],"meaning":"तमाचा लगनेसे वह काँप उठा और आँधीसे उखड़े हुए वृक्षके समान अत्यन्त व्यथित और अन्तमें प्राणहीन होकर खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २५॥"},{"id":"10.44.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/26/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः कूटमनुप्राप्तं रामः प्रहरतां वरः।","अवधील्लीलया राजन् सावज्ञं वाममुष्टिना॥ २६"],"iast":["tataḥ kūṭamanuprāptaṃ rāmaḥ praharatāṃ varaḥ|","avadhīllīlayā rājan sāvajñaṃ vāmamuṣṭinā|| 26"],"meaning":"हे राजन्! इसके बाद योद्धाओंमें श्रेष्ठ भगवान् बलरामजीने अपने सामने आते ही कूट नामक पहलवानको खेल-खेलमें ही बायें हाथके घूँसेसे उपेक्षापूर्वक मार डाला॥ २६॥"},{"id":"10.44.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/27/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तर्ह्येव हि शलः कृष्णपदापहतशीर्षकः।","द्विधा विदीर्णस्तोशलक उभावपि निपेततुः॥ २७"],"iast":["tarhyeva hi śalaḥ kṛṣṇapadāpahataśīrṣakaḥ|","dvidhā vidīrṇastośalaka ubhāvapi nipetatuḥ|| 27"],"meaning":"उसी समय भगवान् श्रीकृष्णने पैरकी ठोकरसे शलका सिर धड़से अलग कर दिया और तोशलको तिनकेकी तरह चीरकर दो टुकड़े कर दिया। इस प्रकार दोनों धराशायी हो गये॥ २७॥"},{"id":"10.44.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/28/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चाणूरे मुष्टिके कूटे शले तोशलके हते।","शेषाः प्रदुद्रुवुर्मल्लाः सर्वे प्राणपरीप्सवः॥ २८"],"iast":["cāṇūre muṣṭike kūṭe śale tośalake hate|","śeṣāḥ pradudruvurmallāḥ sarve prāṇaparīpsavaḥ|| 28"],"meaning":"जब चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल—ये पाँचों पहलवान मर चुके, तब जो बच रहे थे, वे अपने प्राण बचानेके लिये स्वयं वहाँसे भाग खड़े हुए॥ २८॥"},{"id":"10.44.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/29/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोपान् वयस्यानाकृष्य तैः संसृज्य विजह्रतुः।","वाद्यमानेषु तूर्येषु वल्गन्तौ रुतनूपुरौ॥ २९"],"iast":["gopān vayasyānākṛṣya taiḥ saṃsṛjya vijahratuḥ|","vādyamāneṣu tūryeṣu valgantau rutanūpurau|| 29"],"meaning":"उनके भाग जानेपर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी अपने समवयस्क ग्वाल-बालोंको खींच-खींचकर उनके साथ भिड़ने और नाच-नाचकर भेरीध्वनिके साथ अपने नूपुरोंकी झनकारको मिलाकर मल्लक्रीडा—कुश्तीके खेल करने लगे॥ २९॥"},{"id":"10.44.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/30/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जनाः प्रजहृषुः सर्वे कर्मणा रामकृष्णयोः।","ऋते कंसं विप्रमुख्याः साधवः साधु साध्विति॥ ३०"],"iast":["janāḥ prajahṛṣuḥ sarve karmaṇā rāmakṛṣṇayoḥ|","ṛte kaṃsaṃ vipramukhyāḥ sādhavaḥ sādhu sādhviti|| 30"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी इस अद्भुत लीलाको देखकर सभी दर्शकोंको बड़ा आनन्द हुआ। श्रेष्ठ ब्राह्मण और साधु पुरुष ‘धन्य है, धन्य है’—इस प्रकार कहकर प्रशंसा करने लगे। परन्तु कंसको इससे बड़ा दुःख हुआ। वह और भी चिढ़ गया॥ ३०॥"},{"id":"10.44.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/31/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हतेषु मल्लवर्येषु विद्रुतेषु च भोजराट्।","न्यवारयत् स्वतूर्याणि वाक्यं चेदमुवाच ह॥ ३१"],"iast":["hateṣu mallavaryeṣu vidruteṣu ca bhojarāṭ|","nyavārayat svatūryāṇi vākyaṃ cedamuvāca ha|| 31"],"meaning":"जब उसके प्रधान पहलवान मार डाले गये और बचे हुए सब-के-सब भाग गये, तब भोजराज कंसने अपने बाजे-गाजे बंद करा दिये और अपने सेवकोंको यह आज्ञा दी—॥ ३१॥"},{"id":"10.44.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/32/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निःसारयत दुर्वृत्तौ वसुदेवात्मजौ पुरात्।","धनं हरत गोपानां नन्दं बध्नीत दुर्मतिम्॥ ३२"],"iast":["niḥsārayata durvṛttau vasudevātmajau purāt|","dhanaṃ harata gopānāṃ nandaṃ badhnīta durmatim|| 32"],"meaning":"‘अरे, वसुदेवके इन दुश्‍चरित्र लड़कोंको नगरसे बाहर निकाल दो। गोपोंका सारा धन छीन लो और दुर्बुद्धि नन्दको कैद कर लो॥ ३२॥"},{"id":"10.44.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/33/","page":405,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसुदेवस्तु दुर्मेधा हन्यतामाश्‍वसत्तमः।","उग्रसेनः पिता चापि सानुगः परपक्षगः॥ ३३"],"iast":["vasudevastu durmedhā hanyatāmāśvasattamaḥ|","ugrasenaḥ pitā cāpi sānugaḥ parapakṣagaḥ|| 33"],"meaning":"वसुदेव भी बड़ा कुबुद्धि और दुष्ट है। उसे शीघ्र मार डालो और उग्रसेन मेरा पिता होनेपर भी अपने अनुयायियोंके साथ शत्रुओंसे मिला हुआ है। इसलिये उसे भी जीता मत छोड़ो’॥ ३३॥"},{"id":"10.44.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/34/","page":406,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं विकत्थमाने वै कंसे प्रकुपितोऽव्ययः।","लघिम्‍नोत्पत्य तरसा मंचमुत्तुंगमारुहत्॥ ३४"],"iast":["evaṃ vikatthamāne vai kaṃse prakupito'vyayaḥ|","laghimnotpatya tarasā maṃcamuttuṃgamāruhat|| 34"],"meaning":"कंस इस प्रकार बढ़-बढ़कर बकवाद कर रहा था कि अविनाशी श्रीकृष्ण कुपित होकर फुर्तीसे वेगपूर्वक उछलकर लीलासे ही उसके ऊँचे मंचपर जा चढ़े॥ ३४॥"},{"id":"10.44.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/35/","page":406,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमाविशन्तमालोक्य मृत्युमात्मन आसनात्।","मनस्वी सहसोत्थाय जगृहे सोऽसिचर्मणी॥ ३५"],"iast":["tamāviśantamālokya mṛtyumātmana āsanāt|","manasvī sahasotthāya jagṛhe so'sicarmaṇī|| 35"],"meaning":"जब मनस्वी कंसने देखा कि मेरे मृत्युरूप भगवान् श्रीकृष्ण सामने आ गये, तब वह सहसा अपने सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ और हाथमें ढाल तथा तलवार उठा ली॥ ३५॥"},{"id":"10.44.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/36/","page":406,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं खड्गपाणिं विचरन्तमाशु","श्येनं यथा दक्षिणसव्यमम्बरे।","समग्रहीद् दुर्विषहोग्रतेजा","यथोरगं तार्क्ष्यसुतः प्रसह्य॥ ३६"],"iast":["taṃ khaḍgapāṇiṃ vicarantamāśu","śyenaṃ yathā dakṣiṇasavyamambare|","samagrahīd durviṣahogratejā","yathoragaṃ tārkṣyasutaḥ prasahya|| 36"],"meaning":"हाथमें तलवार लेकर वह चोट करनेका अवसर ढूँढ़ता हुआ पैंतरा बदलने लगा। आकाशमें उड़ते हुए बाजके समान वह कभी दायीं ओर जाता तो कभी बायीं ओर। परन्तु भगवान्‌का प्रचण्ड तेज अत्यन्त दुस्सह है। जैसे गरुड़ साँपको पकड़ लेते हैं, वैसे ही भगवान्‌ने बलपूर्वक उसे पकड़ लिया॥ ३६॥"},{"id":"10.44.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/37/","page":406,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रगृह्य केशेषु चलत्किरीटं","निपात्य रङ्गोपरि तुङ्गमञ्चात्।","तस्योपरिष्टात् स्वयमब्जनाभः","पपात विश्‍वाश्रय आत्मतन्त्रः॥ ३७"],"iast":["pragṛhya keśeṣu calatkirīṭaṃ","nipātya raṅgopari tuṅgamañcāt|","tasyopariṣṭāt svayamabjanābhaḥ","papāta viśvāśraya ātmatantraḥ|| 37"],"meaning":"इसी समय कंसका मुकुट गिर गया और भगवान्‌ने उसके केश पकड़कर उसे भी उस ऊँचे मंचसे रंगभूमिमें गिरा दिया। फिर परम स्वतन्त्र और सारे विश्‍वके आश्रय भगवान् श्रीकृष्ण उसके ऊपर स्वयं कूद पड़े॥ ३७॥"},{"id":"10.44.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/38/","page":406,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं सम्परेतं विचकर्ष भूमौ","हरिर्यथेभं जगतो विपश्यतः।","हाहेति शब्दः सुमहांस्तदाभू-","दुदीरितः सर्वजनैर्नरेन्द्र॥ ३८"],"iast":["taṃ samparetaṃ vicakarṣa bhūmau","hariryathebhaṃ jagato vipaśyataḥ|","hāheti śabdaḥ sumahāṃstadābhū-","dudīritaḥ sarvajanairnarendra|| 38"],"meaning":"उनके कूदते ही कंसकी मृत्यु हो गयी। सबके देखते-देखते भगवान् श्रीकृष्ण कंसकी लाशको धरतीपर उसी प्रकार घसीटने लगे, जैसे सिंह हाथीको घसीटे। नरेन्द्र! उस समय सबके मुँहसे ‘हाय! हाय!’ की बड़ी ऊँची आवाज सुनायी पड़ी॥ ३८॥"},{"id":"10.44.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/39/","page":406,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स नित्यदोद्वि‌ग्‍नधिया तमीश्‍वरं","पिबन् वदन् वा विचरन् स्वपन् श्‍वसन्।","ददर्श चक्रायुधमग्रतो य-","स्तदेव रूपं दुरवापमाप॥ ३९"],"iast":["sa nityadodvignadhiyā tamīśvaraṃ","piban vadan vā vicaran svapan śvasan|","dadarśa cakrāyudhamagrato ya-","stadeva rūpaṃ duravāpamāpa|| 39"],"meaning":"कंस नित्य-निरन्तर बड़ी घबड़ाहटके साथ श्रीकृष्णका ही चिन्तन करता रहता था। वह खाते-पीते, सोते-चलते, बोलते और साँस लेते—सब समय अपने सामने चक्र हाथमें लिये भगवान् श्रीकृष्णको ही देखता रहता था। इस नित्य चिन्तनके फलस्वरूप—वह चाहे द्वेषभावसे ही क्यों न किया गया हो—उसे भगवान्‌के उसी रूपकी प्राप्ति हुई, सारूप्य मुक्ति हुई, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े तपस्वी योगियोंके लिये भी कठिन है॥ ३९॥"},{"id":"10.44.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/40/","page":406,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यानुजा भ्रातरोऽष्टौ कंकन्यग्रोधकादयः।","अभ्यधावन्‍नभिक्रुद्धा भ्रातुर्निर्वेशकारिणः॥ ४०"],"iast":["tasyānujā bhrātaro'ṣṭau kaṃkanyagrodhakādayaḥ|","abhyadhāvannabhikruddhā bhrāturnirveśakāriṇaḥ|| 40"],"meaning":"कंसके कंक और न्यग्रोध आदि आठ छोटे भाई थे। वे अपने बड़े भाईका बदला लेनेके लिये क्रोधसे आगबबूले होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी ओर दौड़े॥ ४०॥"},{"id":"10.44.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/41/","page":406,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथातिरभसांस्तांस्तु संयत्तान् रोहिणीसुतः।","अहन् परिघमुद्यम्य पशूनिव मृगाधिपः॥ ४१"],"iast":["tathātirabhasāṃstāṃstu saṃyattān rohiṇīsutaḥ|","ahan parighamudyamya paśūniva mṛgādhipaḥ|| 41"],"meaning":"जब भगवान् बलरामजीने देखा कि वे बड़े वेगसे युद्धके लिये तैयार होकर दौड़े आ रहे हैं, तब उन्होंने परिघ उठाकर उन्हें वैसे ही मार डाला, जैसे सिंह पशुओंको मार डालता है॥ ४१॥"},{"id":"10.44.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/42/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नेदुर्दुन्दुभयो व्योम्‍नि ब्रह्मेशाद्या विभूतयः।","पुष्पैः किरन्तस्तं प्रीताः शशंसुर्ननृतुः स्त्रियः॥ ४२"],"iast":["nedurdundubhayo vyomni brahmeśādyā vibhūtayaḥ|","puṣpaiḥ kirantastaṃ prītāḥ śaśaṃsurnanṛtuḥ striyaḥ|| 42"],"meaning":"उस समय आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। भगवान्‌के विभूतिस्वरूप ब्रह्मा, शंकर आदि देवता बड़े आनन्दसे पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे। अप्सराएँ नाचने लगीं॥ ४२॥"},{"id":"10.44.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/43/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेषां स्त्रियो महाराज सुहृन्मरणदुःखिताः।","तत्राभीयुर्विनिघ्नन्त्यः शीर्षाण्यश्रुविलोचनाः॥ ४३"],"iast":["teṣāṃ striyo mahārāja suhṛnmaraṇaduḥkhitāḥ|","tatrābhīyurvinighnantyaḥ śīrṣāṇyaśruvilocanāḥ|| 43"],"meaning":"महाराज! कंस और उसके भाइयोंकी स्त्रियाँ अपने आत्मीय स्वजनोंकी मृत्युसे अत्यन्त दुःखित हुईं। वे अपने सिर पीटती हुई आँखोंमें आँसू भरे वहाँ आयीं॥ ४३॥"},{"id":"10.44.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/44/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शयानान् वीरशय्यायां पतीनालिङ्‌ग्‍य शोचतीः।","विलेपुः सुस्वरं नार्यो विसृजन्त्यो मुहुः शुचः॥ ४४"],"iast":["śayānān vīraśayyāyāṃ patīnāliṅgya śocatīḥ|","vilepuḥ susvaraṃ nāryo visṛjantyo muhuḥ śucaḥ|| 44"],"meaning":"वीरशय्यापर सोये हुए अपने पतियोंसे लिपटकर वे शोकग्रस्त हो गयीं और बार-बार आँसू बहाती हुई ऊँचे स्वरसे विलाप करने लगीं॥ ४४॥"},{"id":"10.44.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/45/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ करुणानाथवत्सल।","त्वया हतेन निहता वयं ते सगृहप्रजाः॥ ४५"],"iast":["hā nātha priya dharmajña karuṇānāthavatsala|","tvayā hatena nihatā vayaṃ te sagṛhaprajāḥ|| 45"],"meaning":"‘हा नाथ! हे प्यारे! हे धर्मज्ञ! हे करुणामय! हे अनाथवत्सल! आपकी मृत्युसे हम सबकी मृत्यु हो गयी। आज हमारे घर उजड़ गये। हमारी सन्तान अनाथ हो गयी॥ ४५॥"},{"id":"10.44.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/46/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्वया विरहिता पत्या पुरीयं पुरुषर्षभ।","न शोभते वयमिव निवृत्तोत्सवमंगला॥ ४६"],"iast":["tvayā virahitā patyā purīyaṃ puruṣarṣabha|","na śobhate vayamiva nivṛttotsavamaṃgalā|| 46"],"meaning":"पुरुषश्रेष्ठ! इस पुरीके आप ही स्वामी थे। आपके विरहसे इसके उत्सव समाप्त हो गये और मंगलचिह्न उतर गये। यह हमारी ही भाँति विधवा होकर शोभाहीन हो गयी॥ ४६॥"},{"id":"10.44.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/47/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अनागसां त्वं भूतानां कृतवान् द्रोहमुल्बणम्।","तेनेमां भो दशां नीतो भूतध्रुक् को लभेत शम्॥ ४७"],"iast":["anāgasāṃ tvaṃ bhūtānāṃ kṛtavān drohamulbaṇam|","tenemāṃ bho daśāṃ nīto bhūtadhruk ko labheta śam|| 47"],"meaning":"स्वामी! आपने निरपराध प्राणियोंके साथ घोर द्रोह किया था, अन्याय किया था; इसीसे आपकी यह गति हुई। सच है, जो जगत‍्के जीवोंसे द्रोह करता है, उनका अहित करता है, ऐसा कौन पुरुष शान्ति पा सकता है?॥ ४७॥"},{"id":"10.44.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/48/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्वेषामिह भूतानामेष हि प्रभवाप्ययः।","गोप्ता च तदवध्यायी न क्‍वचित् सुखमेधते॥ ४८"],"iast":["sarveṣāmiha bhūtānāmeṣa hi prabhavāpyayaḥ|","goptā ca tadavadhyāyī na kvacit sukhamedhate|| 48"],"meaning":"ये भगवान् श्रीकृष्ण जगत‍्के समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके आधार हैं। यही रक्षक भी हैं। जो इनका बुरा चाहता है, इनका तिरस्कार करता है; वह कभी सुखी नहीं हो सकता॥ ४८॥"},{"id":"10.44.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/49/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजयोषित आश्‍वास्य भगवाँल्लोकभावनः।","यामाहुर्लौकिकीं संस्थां हतानां समकारयत्॥ ४९"],"iast":["rājayoṣita āśvāsya bhagavām̐llokabhāvanaḥ|","yāmāhurlaukikīṃ saṃsthāṃ hatānāṃ samakārayat|| 49"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे संसारके जीवनदाता हैं। उन्होंने रानियोंको ढाढ़स बँधाया, सान्त्वना दी; फिर लोकरीतिके अनुसार मरनेवालोंका जैसा क्रिया-कर्म होता है, वह सब कराया॥ ४९॥"},{"id":"10.44.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/50/","page":407,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मातरं पितरं चैव मोचयित्वाथ बन्धनात्।","कृष्णरामौ ववन्दाते शिरसाऽऽस्पृश्य पादयोः॥ ५०"],"iast":["mātaraṃ pitaraṃ caiva mocayitvātha bandhanāt|","kṛṣṇarāmau vavandāte śirasā''spṛśya pādayoḥ|| 50"],"meaning":"तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने जेलमें जाकर अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाया और सिरसे स्पर्श करके उनके चरणोंकी वन्दना की॥ ५०॥"},{"id":"10.44.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/51/","page":408,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवकी वसुदेवश्‍च विज्ञाय जगदीश्‍वरौ।","कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शङ्कितौ॥ ५१"],"iast":["devakī vasudevaśca vijñāya jagadīśvarau|","kṛtasaṃvandanau putrau sasvajāte na śaṅkitau|| 51"],"meaning":"किंतु अपने पुत्रोंके प्रणाम करनेपर भी देवकी और वसुदेवने उन्हें जगदीश्‍वर समझकर अपने हृदयसे नहीं लगाया। उन्हें शंका हो गयी कि हम जगदीश्‍वरको पुत्र कैसे समझें॥ ५१॥"}],"text":[{"b":32093,"kind":"adhyaya_heading","page":401,"text":"अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः"},{"b":32094,"kind":"topic_heading","page":401,"text":"चाणूर, मुष्टिक आदि पहलवानोंका तथा कंसका उद्धार"},{"b":32095,"kind":"topic_heading","page":401,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32096,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.44.1"],"text":"एवं चर्चितसंकल्पो भगवान् मधुसूदनः।"},{"b":32097,"kind":"sanskrit_shloka","page":401,"verses":["10.44.1"],"text":"आससादाथ चाणूरं मुष्टिकं रोहिणीसुतः॥ १"},{"b":32098,"kind":"hindi_commentary","page":401,"explains":["10.44.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने चाणूर आदिके वधका निश्‍चित संकल्प कर लिया। जोड़ बद दिये जानेपर श्रीकृष्ण चाणूरसे और बलरामजी मुष्टिकसे जा भिड़े॥ १॥"},{"b":32099,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.2"],"text":"हस्ताभ्यां हस्तयोर्बद‍्ध्वा पद‍्भ्यामेव च पादयोः।"},{"b":32100,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.2"],"text":"विचकर्षतुरन्योन्यं प्रसह्य विजिगीषया॥ २"},{"b":32101,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.3"],"text":"अरत्‍नी द्वे अरत्‍निभ्यां जानुभ्यां चैव जानुनी।"},{"b":32102,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.3"],"text":"शिरः शीर्ष्णोरसोरस्तावन्योन्यमभिजघ्नतुः॥ ३"},{"b":32103,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.4"],"text":"परिभ्रामणविक्षेपपरिरम्भावपातनैः ।"},{"b":32104,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.4"],"text":"उत्सर्पणापसर्पणैश्‍चान्योन्यं प्रत्यरुन्धताम्॥ ४"},{"b":32105,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.5"],"text":"उत्थापनैरुन्‍नयनैश्‍चालनैः स्थापनैरपि।"},{"b":32106,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.5"],"text":"परस्परं जिगीषन्तावपचक्रतुरात्मनः॥ ५"},{"b":32107,"kind":"hindi_translation","page":402,"explains":["10.44.2","10.44.3","10.44.4","10.44.5"],"text":"वे लोग एक-दूसरेको जीत लेनेकी इच्छासे हाथसे हाथ बाँधकर और पैरोंमें पैर अड़ाकर बलपूर्वक अपनी-अपनी ओर खींचने लगे॥ २॥ वे पंजोंसे पंजे, घुटनोंसे घुटने, माथेसे माथा और छातीसे छाती भिड़ाकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे॥ ३॥ इस प्रकार दाँव-पेंच करते-करते अपने-अपने जोड़ीदारको पकड़कर इधर-उधर घुमाते, दूर ढकेल देते, जोरसे जकड़ लेते, लिपट जाते, उठाकर पटक देते, छूटकर निकल भागते और कभी छोड़कर पीछे हट जाते थे। इस प्रकार एक-दूसरेको रोकते, प्रहार करते और अपने जोड़ीदारको पछाड़ देनेकी चेष्टा करते। कभी कोई नीचे गिर जाता, तो दूसरा उसे घुटनों और पैरोंमें दबाकर उठा लेता। हाथोंसे पकड़कर ऊपर ले जाता। गलेमें लिपट जानेपर ढकेल देता और आवश्यकता होनेपर हाथ-पाँव इकट्ठे करके गाँठ बाँध देता॥ ४-५॥"},{"b":32108,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.6"],"text":"तद् बलाबलवद्युद्धं समेताः सर्वयोषितः।"},{"b":32109,"kind":"hindi_commentary","page":402,"verses":["10.44.6"],"text":"ऊचुः परस्परं राजन् सानुकम्पा वरूथशः॥ ६"},{"b":32110,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.7"],"text":"महानयं बताधर्म एषां राजसभासदाम्।"},{"b":32111,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.7"],"text":"ये बलाबलवद्युद्धं राज्ञोऽन्विच्छन्ति पश्यतः॥ ७"},{"b":32112,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.8"],"text":"क्व वज्रसारसर्वांगौ मल्लौ शैलेन्द्रसन्‍निभौ।"},{"b":32113,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.8"],"text":"क्व चातिसुकुमारांगौ किशोरौ नाप्तयौवनौ॥ ८"},{"b":32114,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.9"],"text":"धर्मव्यतिक्रमो ह्यस्य समाजस्य ध्रुवं भवेत्।"},{"b":32115,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.9"],"text":"यत्राधर्मः समुत्तिष्ठेन्‍न स्थेयं तत्र कर्हिचित्॥ ९"},{"b":32116,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.10"],"text":"न सभां प्रविशेत् प्राज्ञः सभ्यदोषाननुस्मरन्।"},{"b":32117,"kind":"sanskrit_shloka","page":402,"verses":["10.44.10"],"text":"अब्रुवन् विब्रुवन्‍नज्ञो नरः किल्बिषमश्‍नुते॥ १०"},{"b":32118,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.11"],"text":"वल्गतः शत्रुमभितः कृष्णस्य वदनाम्बुजम्।"},{"b":32119,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.11"],"text":"वीक्ष्यतां श्रमवार्युप्तं पद्मकोशमिवाम्बुभिः॥ ११"},{"b":32120,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.12"],"text":"किं न पश्यत रामस्य मुखमाताम्रलोचनम्।"},{"b":32121,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.12"],"text":"मुष्टिकं प्रति सामर्षं हाससंरम्भशोभितम्॥ १२"},{"b":32122,"kind":"hindi_translation","page":402,"explains":["10.44.6","10.44.7","10.44.8","10.44.9","10.44.10","10.44.11","10.44.12"],"text":"परीक्षित्! इस दंगलको देखनेके लिये नगरकी बहुत-सी महिलाएँ भी आयी हुई थीं। उन्होंने जब देखा कि बड़े-बड़े पहलवानोंके साथ ये छोटे-छोटे बलहीन बालक लड़ाये जा रहे हैं, तब वे अलग-अलग टोलियाँ बनाकर करुणावश आपसमें बातचीत करने लगीं—॥ ६॥ ‘यहाँ राजा कंसके सभासद् बड़ा अन्याय और अधर्म कर रहे हैं। कितने खेदकी बात है कि राजाके सामने ही ये बली पहलवानों और निर्बल बालकोंके युद्धका अनुमोदन करते हैं॥ ७॥ बहिन! देखो, इन पहलवानोंका एक-एक अंग वज्रके समान कठोर है। ये देखनेमें बड़े भारी पर्वत-से मालूम होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण और बलराम अभी जवान भी नहीं हुए हैं। इनकी किशोरावस्था है। इनका एक-एक अंग अत्यन्त सुकुमार है। कहाँ ये और कहाँ वे?॥ ८॥ जितने लोग यहाँ इकट्ठे हुए हैं, देख रहे हैं, उन्हें अवश्य-अवश्य धर्मोल्लंघनका पाप लगेगा। सखी! अब हमें भी यहाँसे चल देना चाहिये। जहाँ अधर्मकी प्रधानता हो, वहाँ कभी न रहे; यही शास्त्रका नियम है॥ ९॥ देखो, शास्त्र कहता है कि बुद्धिमान् पुरुषको सभासदोंके दोषोंको जानते हुए सभामें जाना ठीक नहीं है। क्योंकि वहाँ जाकर उन अवगुणोंको कहना, चुप रह जाना अथवा मैं नहीं जानता ऐसा कह देना—ये तीनों ही बातें मनुष्यको दोषभागी बनाती हैं॥ १०॥ देखो, देखो, श्रीकृष्ण शत्रुके चारों ओर पैंतरा बदल रहे हैं। उनके मुखपर पसीनेकी बूँदें ठीक वैसे ही शोभा दे रही हैं, जैसे कमलकोशपर जलकी बूँदें॥ ११॥ सखियो! क्या तुम नहीं देख रही हो कि बलरामजीका मुख मुष्टिकके प्रति क्रोधके कारण कुछ-कुछ लाल लोचनोंसे युक्त हो रहा है! फिर भी हास्यका अनिरुद्ध आवेग कितना सुन्दर लग रहा है॥ १२॥"},{"b":32123,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.13"],"text":"पुण्या बत व्रजभुवो यदयं नृलिंग-"},{"b":32124,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.13"],"text":"गूढः पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्यः।"},{"b":32125,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.13"],"text":"गाः पालयन् सहबलः क्वणयंश्‍च वेणुं"},{"b":32126,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.13"],"text":"विक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्‌घ्रिः॥ १३"},{"b":32127,"kind":"hindi_commentary","page":403,"explains":["10.44.13"],"text":"सखी! सच पूछो तो व्रजभूमि ही परम पवित्र और धन्य है। क्योंकि वहाँ ये पुरुषोत्तम मनुष्यके वेषमें छिपकर रहते हैं। स्वयं भगवान् शंकर और लक्ष्मीजी जिनके चरणोंकी पूजा करती हैं, वे ही प्रभु वहाँ रंग-बिरंगे जंगली पुष्पोंकी माला धारण कर लेते हैं तथा बलरामजीके साथ बाँसुरी बजाते, गौएँ चराते और तरह-तरहके खेल खेलते हुए आनन्दसे विचरते हैं॥ १३॥"},{"b":32128,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.14"],"text":"गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं"},{"b":32129,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.14"],"text":"लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्।"},{"b":32130,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.14"],"text":"दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप-"},{"b":32131,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.14"],"text":"मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्‍वरस्य॥ १४"},{"b":32132,"kind":"hindi_commentary","page":403,"explains":["10.44.14"],"text":"सखी! पता नहीं, गोपियोंने कौन-सी तपस्या की थी, जो नेत्रोंके दोनोंसे नित्य-निरन्तर इनकी रूप-माधुरीका पान करती रहती हैं। इनका रूप क्या है, लावण्यका सार! संसारमें या उससे परे किसीका भी रूप इनके रूपके समान नहीं है, फिर बढ़कर होनेकी तो बात ही क्या है! सो भी किसीके सँवारने-सजानेसे नहीं, गहने-कपड़ेसे भी नहीं, बल्कि स्वयंसिद्ध है। इस रूपको देखते-देखते तृप्ति भी नहीं होती। क्योंकि यह प्रतिक्षण नया होता जाता है, नित्य नूतन है। समग्र यश, सौन्दर्य और ऐश्‍वर्य इसीके आश्रित हैं। सखियो! परन्तु इसका दर्शन तो औरोंके लिये बड़ा ही दुर्लभ है। वह तो गोपियोंके ही भाग्यमें बदा है॥ १४॥"},{"b":32133,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.15"],"text":"या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-"},{"b":32134,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.15"],"text":"प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ ।"},{"b":32135,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.15"],"text":"गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो"},{"b":32136,"kind":"sanskrit_shloka","page":403,"verses":["10.44.15"],"text":"धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः॥ १५"},{"b":32137,"kind":"hindi_commentary","page":403,"explains":["10.44.15"],"text":"सखी! व्रजकी गोपियाँ धन्य हैं। निरन्तर श्रीकृष्णमें ही चित्त लगा रहनेके कारण प्रेमभरे हृदयसे, आँसुओंके कारण गद्गद कण्ठसे वे इन्हींकी लीलाओंका गान करती रहती हैं। वे दूध दुहते, दही मथते, धान कूटते, घर लीपते, बालकोंको झूला झुलाते, रोते हुए बालकोंको चुप कराते, उन्हें नहलाते-धुलाते, घरोंको झाड़ते-बुहारते—कहाँतक कहें, सारे काम-काज करते समय श्रीकृष्णके गुणोंके गानमें ही मस्त रहती हैं॥ १५॥"},{"b":32138,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.16"],"text":"प्रातर्व्रजाद् व्रजत आविशतश्‍च सायं"},{"b":32139,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.16"],"text":"गोभिः समं क्वणयतोऽस्य निशम्य वेणुम्।"},{"b":32140,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.16"],"text":"निर्गम्य तूर्णमबलाः पथि भूरिपुण्याः"},{"b":32141,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.16"],"text":"पश्यन्ति सस्मितमुखं सदयावलोकम्॥ १६"},{"b":32142,"kind":"hindi_translation","page":404,"explains":["10.44.16"],"text":"ये श्रीकृष्ण जब प्रातःकाल गौओंको चरानेके लिये व्रजसे वनमें जाते हैं और सायंकाल उन्हें लेकर व्रजमें लौटते हैं, तब बड़े मधुर स्वरसे बाँसुरी बजाते हैं। उसकी टेर सुनकर गोपियाँ घरका सारा कामकाज छोड़कर झटपट रास्तेमें दौड़ आती हैं और श्रीकृष्णका मन्द-मन्द मुसकान एवं दयाभरी चितवनसे युक्त मुखकमल निहार-निहारकर निहाल होती हैं। सचमुच गोपियाँ ही परम पुण्यवती हैं’॥ १६॥"},{"b":32143,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.17"],"text":"एवं प्रभाषमाणासु स्त्रीषु योगेश्‍वरो हरिः।"},{"b":32144,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.17"],"text":"शत्रुं हन्तुं मनश्‍चक्रे भगवान् भरतर्षभ॥ १७"},{"b":32145,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.18"],"text":"सभयाः स्त्रीगिरः श्रुत्वा पुत्रस्नेहशुचाऽऽतुरौ।"},{"b":32146,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.18"],"text":"पितरावन्वतप्येतां पुत्रयोरबुधौ बलम्॥ १८"},{"b":32147,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.19"],"text":"तैस्तैर्नियुद्धविधिभिर्विविधैरच्युतेतरौ ।"},{"b":32148,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.19"],"text":"युयुधाते यथान्योन्यं तथैव बलमुष्टिकौ॥ १९"},{"b":32149,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.20"],"text":"भगवद्गात्रनिष्पातैर्वज्रनिष्पेषनिष्ठुरैः ।"},{"b":32150,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.20"],"text":"चाणूरो भज्यमानांगो मुहुर्ग्लानिमवाप ह॥ २०"},{"b":32151,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.21"],"text":"स श्येनवेग उत्पत्य मुष्टीकृत्य करावुभौ।"},{"b":32152,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.21"],"text":"भगवन्तं वासुदेवं क्रुद्धो वक्षस्यबाधत॥ २१"},{"b":32153,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.22"],"text":"नाचलत्तत्प्रहारेण मालाहत इव द्विपः।"},{"b":32154,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.22"],"text":"बाह्वोर्निगृह्य चाणूरं बहुशो भ्रामयन् हरिः॥ २२"},{"b":32155,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.23"],"text":"भूपृष्ठे पोथयामास तरसा क्षीणजीवितम्।"},{"b":32156,"kind":"sanskrit_shloka","page":404,"verses":["10.44.23"],"text":"विस्रस्ताकल्पकेशस्रगिन्द्रध्वज इवापतत्॥ २३"},{"b":32157,"kind":"hindi_translation","page":404,"explains":["10.44.17","10.44.18","10.44.19","10.44.20","10.44.21","10.44.22","10.44.23"],"text":"भरतवंशशिरोमणे! जिस समय पुरवासिनी स्त्रियाँ इस प्रकार बातें कर रही थीं, उसी समय योगेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन शत्रुको मार डालनेका निश्‍चय किया॥ १७॥ स्त्रियोंकी ये भयपूर्ण बातें माता-पिता देवकी-वसुदेव भी सुन रहे थे। वे पुत्रस्नेहवश शोकसे विह्वल हो गये। उनके हृदयमें बड़ी जलन, बड़ी पीड़ा होने लगी। क्योंकि वे अपने पुत्रोंके बल-वीर्यको नहीं जानते थे॥ १८॥ भगवान् श्रीकृष्ण और उनसे भिड़नेवाला चाणूर दोनों ही भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारके दाँव-पेंचका प्रयोग करते हुए परस्पर जिस प्रकार लड़ रहे थे, वैसे ही बलरामजी और मुष्टिक भी भिड़े हुए थे॥ १९॥ भगवान्‌के अंग-प्रत्यंग वज्रसे भी कठोर हो रहे थे। उनकी रगड़से चाणूरकी रग-रग ढीली पड़ गयी। बार-बार उसे ऐसा मालूम हो रहा था मानो उसके शरीरके सारे बन्धन टूट रहे हैं। उसे बड़ी ग्लानि, बड़ी व्यथा हुई॥ २०॥ अब वह अत्यन्त क्रोधित होकर बाजकी तरह झपटा और दोनों हाथोंके घूँसे बाँधकर उसने भगवान् श्रीकृष्णकी छातीपर प्रहार किया॥ २१॥ परन्तु उसके प्रहारसे भगवान् तनिक भी विचलित न हुए, जैसे फूलोंके गजरेकी मारसे गजराज। उन्होंने चाणूरकी दोनों भुजाएँ पकड़ लीं और उसे अन्तरिक्षमें बड़े वेगसे कई बार घुमाकर धरतीपर दे मारा। परीक्षित्! चाणूरके प्राण तो घुमानेके समय ही निकल गये थे। उसकी वेष-भूषा अस्त-व्यस्त हो गयी, केश और मालाएँ बिखर गयीं, वह इन्द्रध्वज (इन्द्रकी पूजाके लिये खड़े किये गये बड़े झंडे) के समान गिर पड़ा॥ २२-२३॥"},{"b":32158,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.24"],"text":"तथैव मुष्टिकः पूर्वं स्वमुष्ट्याभिहतेन वै।"},{"b":32159,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.24"],"text":"बलभद्रेण बलिना तलेनाभिहतो भृशम्॥ २४"},{"b":32160,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.25"],"text":"प्रवेपितः स रुधिरमुद्वमन् मुखतोऽर्दितः।"},{"b":32161,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.25"],"text":"व्यसुः पपातोर्व्युपस्थे वाताहत इवाङ्‌घ्रिपः॥ २५"},{"b":32162,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.26"],"text":"ततः कूटमनुप्राप्तं रामः प्रहरतां वरः।"},{"b":32163,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.26"],"text":"अवधील्लीलया राजन् सावज्ञं वाममुष्टिना॥ २६"},{"b":32164,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.27"],"text":"तर्ह्येव हि शलः कृष्णपदापहतशीर्षकः।"},{"b":32165,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.27"],"text":"द्विधा विदीर्णस्तोशलक उभावपि निपेततुः॥ २७"},{"b":32166,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.28"],"text":"चाणूरे मुष्टिके कूटे शले तोशलके हते।"},{"b":32167,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.28"],"text":"शेषाः प्रदुद्रुवुर्मल्लाः सर्वे प्राणपरीप्सवः॥ २८"},{"b":32168,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.29"],"text":"गोपान् वयस्यानाकृष्य तैः संसृज्य विजह्रतुः।"},{"b":32169,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.29"],"text":"वाद्यमानेषु तूर्येषु वल्गन्तौ रुतनूपुरौ॥ २९"},{"b":32170,"kind":"hindi_commentary","page":405,"explains":["10.44.24","10.44.25","10.44.26","10.44.27","10.44.28","10.44.29"],"text":"इसी प्रकार मुष्टिकने भी पहले बलरामजीको एक घूँसा मारा। इसपर बली बलरामजीने उसे बड़े जोरसे एक तमाचा जड़ दिया॥ २४॥ तमाचा लगनेसे वह काँप उठा और आँधीसे उखड़े हुए वृक्षके समान अत्यन्त व्यथित और अन्तमें प्राणहीन होकर खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २५॥ हे राजन्! इसके बाद योद्धाओंमें श्रेष्ठ भगवान् बलरामजीने अपने सामने आते ही कूट नामक पहलवानको खेल-खेलमें ही बायें हाथके घूँसेसे उपेक्षापूर्वक मार डाला॥ २६॥ उसी समय भगवान् श्रीकृष्णने पैरकी ठोकरसे शलका सिर धड़से अलग कर दिया और तोशलको तिनकेकी तरह चीरकर दो टुकड़े कर दिया। इस प्रकार दोनों धराशायी हो गये॥ २७॥ जब चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल—ये पाँचों पहलवान मर चुके, तब जो बच रहे थे, वे अपने प्राण बचानेके लिये स्वयं वहाँसे भाग खड़े हुए॥ २८॥ उनके भाग जानेपर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी अपने समवयस्क ग्वाल-बालोंको खींच-खींचकर उनके साथ भिड़ने और नाच-नाचकर भेरीध्वनिके साथ अपने नूपुरोंकी झनकारको मिलाकर मल्लक्रीडा—कुश्तीके खेल करने लगे॥ २९॥"},{"b":32171,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.30"],"text":"जनाः प्रजहृषुः सर्वे कर्मणा रामकृष्णयोः।"},{"b":32172,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.30"],"text":"ऋते कंसं विप्रमुख्याः साधवः साधु साध्विति॥ ३०"},{"b":32173,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.31"],"text":"हतेषु मल्लवर्येषु विद्रुतेषु च भोजराट्।"},{"b":32174,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.31"],"text":"न्यवारयत् स्वतूर्याणि वाक्यं चेदमुवाच ह॥ ३१"},{"b":32175,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.32"],"text":"निःसारयत दुर्वृत्तौ वसुदेवात्मजौ पुरात्।"},{"b":32176,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.32"],"text":"धनं हरत गोपानां नन्दं बध्नीत दुर्मतिम्॥ ३२"},{"b":32177,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.33"],"text":"वसुदेवस्तु दुर्मेधा हन्यतामाश्‍वसत्तमः।"},{"b":32178,"kind":"sanskrit_shloka","page":405,"verses":["10.44.33"],"text":"उग्रसेनः पिता चापि सानुगः परपक्षगः॥ ३३"},{"b":32179,"kind":"hindi_commentary","page":405,"explains":["10.44.30","10.44.31","10.44.32","10.44.33"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी इस अद्भुत लीलाको देखकर सभी दर्शकोंको बड़ा आनन्द हुआ। श्रेष्ठ ब्राह्मण और साधु पुरुष ‘धन्य है, धन्य है’—इस प्रकार कहकर प्रशंसा करने लगे। परन्तु कंसको इससे बड़ा दुःख हुआ। वह और भी चिढ़ गया॥ ३०॥ जब उसके प्रधान पहलवान मार डाले गये और बचे हुए सब-के-सब भाग गये, तब भोजराज कंसने अपने बाजे-गाजे बंद करा दिये और अपने सेवकोंको यह आज्ञा दी—॥ ३१॥ ‘अरे, वसुदेवके इन दुश्‍चरित्र लड़कोंको नगरसे बाहर निकाल दो। गोपोंका सारा धन छीन लो और दुर्बुद्धि नन्दको कैद कर लो॥ ३२॥ वसुदेव भी बड़ा कुबुद्धि और दुष्ट है। उसे शीघ्र मार डालो और उग्रसेन मेरा पिता होनेपर भी अपने अनुयायियोंके साथ शत्रुओंसे मिला हुआ है। इसलिये उसे भी जीता मत छोड़ो’॥ ३३॥"},{"b":32180,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.34"],"text":"एवं विकत्थमाने वै कंसे प्रकुपितोऽव्ययः।"},{"b":32181,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.34"],"text":"लघिम्‍नोत्पत्य तरसा मंचमुत्तुंगमारुहत्॥ ३४"},{"b":32182,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.35"],"text":"तमाविशन्तमालोक्य मृत्युमात्मन आसनात्।"},{"b":32183,"kind":"topic_heading","page":406,"verses":["10.44.35"],"text":"मनस्वी सहसोत्थाय जगृहे सोऽसिचर्मणी॥ ३५"},{"b":32184,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.36"],"text":"तं खड्गपाणिं विचरन्तमाशु"},{"b":32185,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.36"],"text":"श्येनं यथा दक्षिणसव्यमम्बरे।"},{"b":32186,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.36"],"text":"समग्रहीद् दुर्विषहोग्रतेजा"},{"b":32187,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.36"],"text":"यथोरगं तार्क्ष्यसुतः प्रसह्य॥ ३६"},{"b":32188,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.37"],"text":"प्रगृह्य केशेषु चलत्किरीटं"},{"b":32189,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.37"],"text":"निपात्य रङ्गोपरि तुङ्गमञ्चात्।"},{"b":32190,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.37"],"text":"तस्योपरिष्टात् स्वयमब्जनाभः"},{"b":32191,"kind":"topic_heading","page":406,"verses":["10.44.37"],"text":"पपात विश्‍वाश्रय आत्मतन्त्रः॥ ३७"},{"b":32192,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.38"],"text":"तं सम्परेतं विचकर्ष भूमौ"},{"b":32193,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.38"],"text":"हरिर्यथेभं जगतो विपश्यतः।"},{"b":32194,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.38"],"text":"हाहेति शब्दः सुमहांस्तदाभू-"},{"b":32195,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.38"],"text":"दुदीरितः सर्वजनैर्नरेन्द्र॥ ३८"},{"b":32196,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.39"],"text":"स नित्यदोद्वि‌ग्‍नधिया तमीश्‍वरं"},{"b":32197,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.39"],"text":"पिबन् वदन् वा विचरन् स्वपन् श्‍वसन्।"},{"b":32198,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.39"],"text":"ददर्श चक्रायुधमग्रतो य-"},{"b":32199,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.39"],"text":"स्तदेव रूपं दुरवापमाप॥ ३९"},{"b":32200,"kind":"hindi_commentary","page":406,"explains":["10.44.34","10.44.35","10.44.36","10.44.37","10.44.38","10.44.39"],"text":"कंस इस प्रकार बढ़-बढ़कर बकवाद कर रहा था कि अविनाशी श्रीकृष्ण कुपित होकर फुर्तीसे वेगपूर्वक उछलकर लीलासे ही उसके ऊँचे मंचपर जा चढ़े॥ ३४॥ जब मनस्वी कंसने देखा कि मेरे मृत्युरूप भगवान् श्रीकृष्ण सामने आ गये, तब वह सहसा अपने सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ और हाथमें ढाल तथा तलवार उठा ली॥ ३५॥ हाथमें तलवार लेकर वह चोट करनेका अवसर ढूँढ़ता हुआ पैंतरा बदलने लगा। आकाशमें उड़ते हुए बाजके समान वह कभी दायीं ओर जाता तो कभी बायीं ओर। परन्तु भगवान्‌का प्रचण्ड तेज अत्यन्त दुस्सह है। जैसे गरुड़ साँपको पकड़ लेते हैं, वैसे ही भगवान्‌ने बलपूर्वक उसे पकड़ लिया॥ ३६॥ इसी समय कंसका मुकुट गिर गया और भगवान्‌ने उसके केश पकड़कर उसे भी उस ऊँचे मंचसे रंगभूमिमें गिरा दिया। फिर परम स्वतन्त्र और सारे विश्‍वके आश्रय भगवान् श्रीकृष्ण उसके ऊपर स्वयं कूद पड़े॥ ३७॥ उनके कूदते ही कंसकी मृत्यु हो गयी। सबके देखते-देखते भगवान् श्रीकृष्ण कंसकी लाशको धरतीपर उसी प्रकार घसीटने लगे, जैसे सिंह हाथीको घसीटे। नरेन्द्र! उस समय सबके मुँहसे ‘हाय! हाय!’ की बड़ी ऊँची आवाज सुनायी पड़ी॥ ३८॥ कंस नित्य-निरन्तर बड़ी घबड़ाहटके साथ श्रीकृष्णका ही चिन्तन करता रहता था। वह खाते-पीते, सोते-चलते, बोलते और साँस लेते—सब समय अपने सामने चक्र हाथमें लिये भगवान् श्रीकृष्णको ही देखता रहता था। इस नित्य चिन्तनके फलस्वरूप—वह चाहे द्वेषभावसे ही क्यों न किया गया हो—उसे भगवान्‌के उसी रूपकी प्राप्ति हुई, सारूप्य मुक्ति हुई, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े तपस्वी योगियोंके लिये भी कठिन है॥ ३९॥"},{"b":32201,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.40"],"text":"तस्यानुजा भ्रातरोऽष्टौ कंकन्यग्रोधकादयः।"},{"b":32202,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.40"],"text":"अभ्यधावन्‍नभिक्रुद्धा भ्रातुर्निर्वेशकारिणः॥ ४०"},{"b":32203,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.41"],"text":"तथातिरभसांस्तांस्तु संयत्तान् रोहिणीसुतः।"},{"b":32204,"kind":"sanskrit_shloka","page":406,"verses":["10.44.41"],"text":"अहन् परिघमुद्यम्य पशूनिव मृगाधिपः॥ ४१"},{"b":32205,"kind":"hindi_commentary","page":406,"explains":["10.44.40","10.44.41"],"text":"कंसके कंक और न्यग्रोध आदि आठ छोटे भाई थे। वे अपने बड़े भाईका बदला लेनेके लिये क्रोधसे आगबबूले होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी ओर दौड़े॥ ४०॥ जब भगवान् बलरामजीने देखा कि वे बड़े वेगसे युद्धके लिये तैयार होकर दौड़े आ रहे हैं, तब उन्होंने परिघ उठाकर उन्हें वैसे ही मार डाला, जैसे सिंह पशुओंको मार डालता है॥ ४१॥"},{"b":32206,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.42"],"text":"नेदुर्दुन्दुभयो व्योम्‍नि ब्रह्मेशाद्या विभूतयः।"},{"b":32207,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.42"],"text":"पुष्पैः किरन्तस्तं प्रीताः शशंसुर्ननृतुः स्त्रियः॥ ४२"},{"b":32208,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.43"],"text":"तेषां स्त्रियो महाराज सुहृन्मरणदुःखिताः।"},{"b":32209,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.43"],"text":"तत्राभीयुर्विनिघ्नन्त्यः शीर्षाण्यश्रुविलोचनाः॥ ४३"},{"b":32210,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.44"],"text":"शयानान् वीरशय्यायां पतीनालिङ्‌ग्‍य शोचतीः।"},{"b":32211,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.44"],"text":"विलेपुः सुस्वरं नार्यो विसृजन्त्यो मुहुः शुचः॥ ४४"},{"b":32212,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.45"],"text":"हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ करुणानाथवत्सल।"},{"b":32213,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.45"],"text":"त्वया हतेन निहता वयं ते सगृहप्रजाः॥ ४५"},{"b":32214,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.46"],"text":"त्वया विरहिता पत्या पुरीयं पुरुषर्षभ।"},{"b":32215,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.46"],"text":"न शोभते वयमिव निवृत्तोत्सवमंगला॥ ४६"},{"b":32216,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.47"],"text":"अनागसां त्वं भूतानां कृतवान् द्रोहमुल्बणम्।"},{"b":32217,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.47"],"text":"तेनेमां भो दशां नीतो भूतध्रुक् को लभेत शम्॥ ४७"},{"b":32218,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.48"],"text":"सर्वेषामिह भूतानामेष हि प्रभवाप्ययः।"},{"b":32219,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.48"],"text":"गोप्ता च तदवध्यायी न क्‍वचित् सुखमेधते॥ ४८"},{"b":32220,"kind":"hindi_translation","page":407,"explains":["10.44.42","10.44.43","10.44.44","10.44.45","10.44.46","10.44.47","10.44.48"],"text":"उस समय आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। भगवान्‌के विभूतिस्वरूप ब्रह्मा, शंकर आदि देवता बड़े आनन्दसे पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी स्तुति करने लगे। अप्सराएँ नाचने लगीं॥ ४२॥ महाराज! कंस और उसके भाइयोंकी स्त्रियाँ अपने आत्मीय स्वजनोंकी मृत्युसे अत्यन्त दुःखित हुईं। वे अपने सिर पीटती हुई आँखोंमें आँसू भरे वहाँ आयीं॥ ४३॥ वीरशय्यापर सोये हुए अपने पतियोंसे लिपटकर वे शोकग्रस्त हो गयीं और बार-बार आँसू बहाती हुई ऊँचे स्वरसे विलाप करने लगीं॥ ४४॥ ‘हा नाथ! हे प्यारे! हे धर्मज्ञ! हे करुणामय! हे अनाथवत्सल! आपकी मृत्युसे हम सबकी मृत्यु हो गयी। आज हमारे घर उजड़ गये। हमारी सन्तान अनाथ हो गयी॥ ४५॥ पुरुषश्रेष्ठ! इस पुरीके आप ही स्वामी थे। आपके विरहसे इसके उत्सव समाप्त हो गये और मंगलचिह्न उतर गये। यह हमारी ही भाँति विधवा होकर शोभाहीन हो गयी॥ ४६॥ स्वामी! आपने निरपराध प्राणियोंके साथ घोर द्रोह किया था, अन्याय किया था; इसीसे आपकी यह गति हुई। सच है, जो जगत‍्के जीवोंसे द्रोह करता है, उनका अहित करता है, ऐसा कौन पुरुष शान्ति पा सकता है?॥ ४७॥ ये भगवान् श्रीकृष्ण जगत‍्के समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके आधार हैं। यही रक्षक भी हैं। जो इनका बुरा चाहता है, इनका तिरस्कार करता है; वह कभी सुखी नहीं हो सकता॥ ४८॥"},{"b":32221,"kind":"topic_heading","page":407,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32222,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.49"],"text":"राजयोषित आश्‍वास्य भगवाँल्लोकभावनः।"},{"b":32223,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.49"],"text":"यामाहुर्लौकिकीं संस्थां हतानां समकारयत्॥ ४९"},{"b":32224,"kind":"hindi_commentary","page":407,"explains":["10.44.49"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ही सारे संसारके जीवनदाता हैं। उन्होंने रानियोंको ढाढ़स बँधाया, सान्त्वना दी; फिर लोकरीतिके अनुसार मरनेवालोंका जैसा क्रिया-कर्म होता है, वह सब कराया॥ ४९॥"},{"b":32225,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.50"],"text":"मातरं पितरं चैव मोचयित्वाथ बन्धनात्।"},{"b":32226,"kind":"sanskrit_shloka","page":407,"verses":["10.44.50"],"text":"कृष्णरामौ ववन्दाते शिरसाऽऽस्पृश्य पादयोः॥ ५०"},{"b":32227,"kind":"hindi_commentary","page":407,"explains":["10.44.50"],"text":"तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने जेलमें जाकर अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाया और सिरसे स्पर्श करके उनके चरणोंकी वन्दना की॥ ५०॥"},{"b":32228,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.44.51"],"text":"देवकी वसुदेवश्‍च विज्ञाय जगदीश्‍वरौ।"},{"b":32229,"kind":"sanskrit_shloka","page":408,"verses":["10.44.51"],"text":"कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शङ्कितौ॥ ५१"},{"b":32230,"kind":"hindi_translation","page":408,"explains":["10.44.51"],"text":"किंतु अपने पुत्रोंके प्रणाम करनेपर भी देवकी और वसुदेवने उन्हें जगदीश्‍वर समझकर अपने हृदयसे नहीं लगाया। उन्हें शंका हो गयी कि हम जगदीश्‍वरको पुत्र कैसे समझें॥ ५१॥"},{"b":32231,"kind":"hindi_translation","page":408,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे कंसवधो नाम चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥"}],"notes":[{"id":"v2:294","mark":"*","page":404,"after_verse":"10.44.23","text":"स्त्रियाँ जहाँ बातें कर रही थीं, वहाँसे निकट ही वसुदेव-देवकी कैद थे, अतः वे उनकी बातें सुन सके।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}