{"id":"10.41","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 41","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः","topics":["श्रीकृष्णका मथुराजीमें प्रवेश"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[386,392]},"verses":[{"id":"10.41.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/1/","page":386,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्तुवतस्तस्य भगवान् दर्शयित्वा जले वपुः।","भूयः समाहरत् कृष्णो नटो नाट्यमिवात्मनः॥ १"],"iast":["stuvatastasya bhagavān darśayitvā jale vapuḥ|","bhūyaḥ samāharat kṛṣṇo naṭo nāṭyamivātmanaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अक्रूरजी इस प्रकार स्तुति कर रहे थे। उन्हें भगवान् श्रीकृष्णने जलमें अपने दिव्यरूपके दर्शन कराये और फिर उसे छिपा लिया, ठीक वैसे ही जैसे कोई नट अभिनयमें कोई रूप दिखाकर फिर उसे परदेकी ओटमें छिपा दे॥ १॥"},{"id":"10.41.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/2/","page":386,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽपि चान्तर्हितं वीक्ष्य जलादुन्मज्ज्य सत्वरः।","कृत्वा चावश्यकं सर्वं विस्मितो रथमागमत्॥ २"],"iast":["so'pi cāntarhitaṃ vīkṣya jalādunmajjya satvaraḥ|","kṛtvā cāvaśyakaṃ sarvaṃ vismito rathamāgamat|| 2"],"meaning":"जब अक्रूरजीने देखा कि भगवान्‌का वह दिव्यरूप अन्तर्धान हो गया, तब वे जलसे बाहर निकल आये और फिर जल्दी-जल्दी सारे आवश्यक कर्म समाप्त करके रथपर चले आये। उस समय वे बहुत ही विस्मित हो रहे थे॥ २॥"},{"id":"10.41.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/3/","page":386,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमपृच्छद‍्धृषीकेशः किं ते दृष्टमिवाद्भुतम्।","भूमौ वियति तोये वा तथा त्वां लक्षयामहे॥ ३"],"iast":["tamapṛcchaddhṛṣīkeśaḥ kiṃ te dṛṣṭamivādbhutam|","bhūmau viyati toye vā tathā tvāṃ lakṣayāmahe|| 3"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने उनसे पूछा—‘चाचाजी! आपने पृथ्वी, आकाश या जलमें कोई अद्भुत वस्तु देखी है क्या? क्योंकि आपकी आकृति देखनेसे ऐसा ही जान पड़ता है’॥ ३॥"},{"id":"10.41.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/4/","page":386,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["अद्भुतानीह यावन्ति भूमौ वियति वा जले।","त्वयि विश्‍वात्मके तानि किं मेऽदृष्टं विपश्यतः॥ ४"],"iast":["adbhutānīha yāvanti bhūmau viyati vā jale|","tvayi viśvātmake tāni kiṃ me'dṛṣṭaṃ vipaśyataḥ|| 4"],"meaning":"अक्रूरजीने कहा—‘प्रभो! पृथ्वी, आकाश या जलमें और सारे जगत‍्में जितने भी अद्भुत पदार्थ हैं, वे सब आपमें ही हैं। क्योंकि आप विश्‍वरूप हैं। जब मैं आपको ही देख रहा हूँ तब ऐसी कौन-सी अद्भुत वस्तु रह जाती है, जो मैंने न देखी हो॥ ४॥"},{"id":"10.41.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/5/","page":386,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["यत्राद्भुतानि सर्वाणि भूमौ वियति वा जले।","तं त्वानुपश्यतो ब्रह्मन् किं मे दृष्टमिहाद्भुतम्॥ ५"],"iast":["yatrādbhutāni sarvāṇi bhūmau viyati vā jale|","taṃ tvānupaśyato brahman kiṃ me dṛṣṭamihādbhutam|| 5"],"meaning":"भगवन्! जितनी भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, वे पृथ्वीमें हों या जल अथवा आकाशमें—सब-की-सब जिनमें हैं, उन्हीं आपको मैं देख रहा हूँ! फिर भला, मैंने यहाँ अद्भुत वस्तु कौन-सी देखी?॥ ५॥"},{"id":"10.41.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/6/","page":386,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["इत्युक्त्वा चोदयामास स्यन्दनं गान्दिनीसुतः।","मथुरामनयद् रामं कृष्णं चैव दिनात्यये॥ ६"],"iast":["ityuktvā codayāmāsa syandanaṃ gāndinīsutaḥ|","mathurāmanayad rāmaṃ kṛṣṇaṃ caiva dinātyaye|| 6"],"meaning":"गान्दिनीनन्दन अक्रूरजीने यह कहकर रथ हाँक दिया और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको लेकर दिन ढलते-ढलते वे मथुरापुरी जा पहुँचे॥ ६॥"},{"id":"10.41.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/7/","page":386,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["मार्गे ग्रामजना राजंस्तत्र तत्रोपसंगताः।","वसुदेवसुतौ वीक्ष्य प्रीता दृष्टिं न चाददुः॥ ७"],"iast":["mārge grāmajanā rājaṃstatra tatropasaṃgatāḥ|","vasudevasutau vīkṣya prītā dṛṣṭiṃ na cādaduḥ|| 7"],"meaning":"परीक्षित्! मार्गमें स्थान-स्थानपर गाँवोंके लोग मिलनेके लिये आते और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको देखकर आनन्द-म‌ग्‍न हो जाते। वे एकटक उनकी ओर देखने लगते, अपनी दृष्टि हटा न पाते॥ ७॥"},{"id":"10.41.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/8/","page":386,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["तावद् व्रजौकसस्तत्र नन्दगोपादयोऽग्रतः।","पुरोपवनमासाद्य प्रतीक्षन्तोऽवतस्थिरे॥ ८"],"iast":["tāvad vrajaukasastatra nandagopādayo'grataḥ|","puropavanamāsādya pratīkṣanto'vatasthire|| 8"],"meaning":"नन्दबाबा आदि व्रज-वासी तो पहलेसे ही वहाँ पहुँच गये थे, और मथुरापुरीके बाहरी उपवनमें रुककर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे॥ ८॥"},{"id":"10.41.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/9/","page":387,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["तान् समेत्याह भगवानक्रूरं जगदीश्‍वरः।","गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रश्रितं प्रहसन्‍निव॥ ९"],"iast":["tān sametyāha bhagavānakrūraṃ jagadīśvaraḥ|","gṛhītvā pāṇinā pāṇiṃ praśritaṃ prahasanniva|| 9"],"meaning":"उनके पास पहुँचकर जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने विनीतभावसे खड़े अक्रूरजीका हाथ अपने हाथमें लेकर मुसकराते हुए कहा—॥ ९॥"},{"id":"10.41.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/10/","page":387,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["भवान् प्रविशतामग्रे सहयानः पुरीं गृहम्।","वयं त्विहावमुच्याथ ततो द्रक्ष्यामहे पुरीम्॥ १०"],"iast":["bhavān praviśatāmagre sahayānaḥ purīṃ gṛham|","vayaṃ tvihāvamucyātha tato drakṣyāmahe purīm|| 10"],"meaning":"‘चाचाजी! आप रथ लेकर पहले मथुरापुरीमें प्रवेश कीजिये और अपने घर जाइये। हमलोग पहले यहाँ उतरकर फिर नगर देखनेके लिये आयेंगे’॥ १०॥"},{"id":"10.41.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/11/","page":387,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["नाहं भवद‍्भ्यां रहितः प्रवेक्ष्ये मथुरां प्रभो।","त्यक्तुं नार्हसि मां नाथ भक्तं ते भक्तवत्सल॥ ११"],"iast":["nāhaṃ bhavadbhyāṃ rahitaḥ pravekṣye mathurāṃ prabho|","tyaktuṃ nārhasi māṃ nātha bhaktaṃ te bhaktavatsala|| 11"],"meaning":"अक्रूरजीने कहा—प्रभो! आप दोनोंके बिना मैं मथुरामें नहीं जा सकता। स्वामी! मैं आपका भक्त हूँ! भक्तवत्सल प्रभो! आप मुझे मत छोड़िये॥ ११॥"},{"id":"10.41.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/12/","page":387,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["आगच्छ याम गेहान् नः सनाथान् कुर्वधोक्षज।","सहाग्रजः सगोपालैः सुहृद्भिश्‍च सुहृत्तम॥ १२"],"iast":["āgaccha yāma gehān naḥ sanāthān kurvadhokṣaja|","sahāgrajaḥ sagopālaiḥ suhṛdbhiśca suhṛttama|| 12"],"meaning":"भगवन्! आइये, चलें। मेरे परम हितैषी और सच्चे सुहृद् भगवन्! आप बलरामजी, ग्वालबालों तथा नन्दरायजी आदि आत्मीयोंके साथ चलकर हमारा घर सनाथ कीजिये॥ १२॥"},{"id":"10.41.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/13/","page":387,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["पुनीहि पादरजसा गृहान् नो गृहमेधिनाम्।","यच्छौचेनानुतृप्यन्ति पितरः सा‌ग्‍नयः सुराः॥ १३"],"iast":["punīhi pādarajasā gṛhān no gṛhamedhinām|","yacchaucenānutṛpyanti pitaraḥ sāgnayaḥ surāḥ|| 13"],"meaning":"हम गृहस्थ हैं। आप अपने चरणोंकी धूलिसे हमारा घर पवित्र कीजिये। आपके चरणोंकी धोवन (गंगाजल या चरणामृत) से अग्‍नि, देवता, पितर—सब-के-सब तृप्त हो जाते हैं॥ १३॥"},{"id":"10.41.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/14/","page":387,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["अवनिज्याङ्‌घ्रियुगलमासीच्छ्लोक्यो बलिर्महान्।","ऐश्‍वर्यमतुलं लेभे गतिं चैकान्तिनां तु या॥ १४"],"iast":["avanijyāṅghriyugalamāsīcchlokyo balirmahān|","aiśvaryamatulaṃ lebhe gatiṃ caikāntināṃ tu yā|| 14"],"meaning":"प्रभो! आपके युगल चरणोंको पखारकर महात्मा बलिने वह यश प्राप्त किया, जिसका गान सन्त पुरुष करते हैं। केवल यश ही नहीं—उन्हें अतुलनीय ऐश्‍वर्य तथा वह गति प्राप्त हुई, जो अनन्य प्रेमी भक्तोंको प्राप्त होती है॥ १४॥"},{"id":"10.41.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/15/","page":387,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["आपस्तेऽङ्‌घ्र्यवनेजन्यस्त्रीँल्लोकाञ्छुचयोऽपुनन्।","शिरसाधत्त याः शर्वः स्वर्याताः सगरात्मजाः॥ १५"],"iast":["āpaste'ṅghryavanejanyastrīm̐llokāñchucayo'punan|","śirasādhatta yāḥ śarvaḥ svaryātāḥ sagarātmajāḥ|| 15"],"meaning":"आपके चरणोदक—गंगाजीने तीनों लोक पवित्र कर दिये। सचमुच वे मूर्तिमान् पवित्रता हैं। उन्हींके स्पर्शसे सगरके पुत्रोंको सद्गति प्राप्त हुई और उसी जलको स्वयं भगवान् शंकरने अपने सिरपर धारण किया॥ १५॥"},{"id":"10.41.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/16/","page":387,"speaker":"अक्रूर उवाच","sanskrit":["देवदेव जगन्‍नाथ पुण्यश्रवणकीर्तन।","यदूत्तमोत्तमश्‍लोक नारायण नमोऽस्तु ते॥ १६"],"iast":["devadeva jagannātha puṇyaśravaṇakīrtana|","yadūttamottamaśloka nārāyaṇa namo'stu te|| 16"],"meaning":"यदुवंशशिरोमणे! आप देवताओंके भी आराध्यदेव हैं। जगत‍्के स्वामी हैं। आपके गुण और लीलाओंका श्रवण तथा कीर्तन बड़ा ही मंगलकारी है। उत्तम पुरुष आपके गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं। नारायण! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ १६॥"},{"id":"10.41.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/17/","page":387,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आयास्ये भवतो गेहमहमार्यसमन्वितः।","यदुचक्रद्रुहं हत्वा वितरिष्ये सुहृत्प्रियम्॥ १७"],"iast":["āyāsye bhavato gehamahamāryasamanvitaḥ|","yaducakradruhaṃ hatvā vitariṣye suhṛtpriyam|| 17"],"meaning":"श्रीभगवान्‌ने कहा—चाचाजी! मैं दाऊ भैयाके साथ आपके घर आऊँगा और पहले इस यदुवंशियोंके द्रोही कंसको मारकर तब अपने सभी सुहृद्-स्वजनोंका प्रिय करूँगा॥ १७॥"},{"id":"10.41.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/18/","page":387,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवमुक्तो भगवता सोऽक्रूरो विमना इव।","पुरीं प्रविष्टः कंसाय कर्मावेद्य गृहं ययौ॥ १८"],"iast":["evamukto bhagavatā so'krūro vimanā iva|","purīṃ praviṣṭaḥ kaṃsāya karmāvedya gṛhaṃ yayau|| 18"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर अक्रूरजी कुछ अनमने-से हो गये। उन्होंने पुरीमें प्रवेश करके कंससे श्रीकृष्ण और बलरामके ले आनेका समाचार निवेदन किया और फिर अपने घर गये॥ १८॥"},{"id":"10.41.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/19/","page":388,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथापराह्णे भगवान् कृष्णः संकर्षणान्वितः।","मथुरां प्राविशद् गोपैर्दिदृक्षुः परिवारितः॥ १९"],"iast":["athāparāhṇe bhagavān kṛṣṇaḥ saṃkarṣaṇānvitaḥ|","mathurāṃ prāviśad gopairdidṛkṣuḥ parivāritaḥ|| 19"],"meaning":"दूसरे दिन तीसरे पहर बलरामजी और ग्वालबालोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णने मथुरापुरीको देखनेके लिये नगरमें प्रवेश किया॥ १९॥"},{"id":"10.41.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/20/","page":388,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ददर्श तां स्फाटिकतुंगगोपुर-","द्वारां बृहद्धेमकपाटतोरणाम्।","ताम्रारकोष्ठां परिखादुरासदा-","मुद्यानरम्योपवनोपशोभिताम् ॥ २०"],"iast":["dadarśa tāṃ sphāṭikatuṃgagopura-","dvārāṃ bṛhaddhemakapāṭatoraṇām|","tāmrārakoṣṭhāṃ parikhādurāsadā-","mudyānaramyopavanopaśobhitām || 20"],"meaning":"भगवान्‌ने देखा कि नगरके परकोटेमें स्फटिकमणि (बिल्लौर) के बहुत ऊँचे-ऊँचे गोपुर (प्रधान दरवाजे) तथा घरोंमें भी बड़े-बड़े फाटक बने हुए हैं। उनमें सोनेके बड़े-बड़े किंवाड़ लगे हैं और सोनेके ही तोरण (बाहरी दरवाजे) बने हुए हैं। नगरके चारों ओर ताँबे और पीतलकी चहारदीवारी बनी हुई है। खाईंके कारण और कहींसे उस नगरमें प्रवेश करना बहुत कठिन है। स्थान-स्थानपर सुन्दर-सुन्दर उद्यान और रमणीय उपवन (केवल स्त्रियोंके उपयोगमें आनेवाले बगीचे) शोभायमान हैं॥ २०॥"},{"id":"10.41.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/21/","page":388,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सौवर्णशृंगाटकहर्म्यनिष्कुटैः","श्रेणीसभाभिर्भवनैरुपस्कृताम् ।","वैदूर्यवज्रामलनीलविद्रुमै-","र्मुक्ताहरिद्भिर्वलभीषु वेदिषु॥ २१"],"iast":["sauvarṇaśṛṃgāṭakaharmyaniṣkuṭaiḥ","śreṇīsabhābhirbhavanairupaskṛtām |","vaidūryavajrāmalanīlavidrumai-","rmuktāharidbhirvalabhīṣu vediṣu|| 21"],"meaning":"सुवर्णसे सजे हुए चौराहे, धनियोंके महल, उन्हींके साथके बगीचे, कारीगरोंके बैठनेके स्थान या प्रजावर्गके सभा-भवन (टाउनहाल) और साधारण लोगोंके निवासगृह नगरकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वैदूर्य, हीरे, स्फटिक (बिल्लौर), नीलम, मूँगे, मोती और पन्‍ने आदिसे जड़े हुए छज्जे, चबूतरे, झरोखे एवं फर्श आदि जगमगा रहे हैं। उनपर बैठे हुए कबूतर, मोर आदि पक्षी भाँति-भाँतिकी बोली बोल रहे हैं। सड़क, बाजार, गली एवं चौराहोंपर खूब छिड़काव किया गया है। स्थान-स्थानपर फूलोंके गजरे, जवारे (जौके अंकुर), खील और चावल बिखरे हुए हैं॥ २१-२२॥","meaning_covers":[21,22]},{"id":"10.41.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/22/","page":388,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जुष्टेषु जालामुखरन्ध्रकुट्टिमे-","ष्वाविष्टपारावतबर्हिनादिताम् ।","संसिक्तरथ्यापणमार्गचत्वरां","प्रकीर्णमाल्यांकुरलाजतण्डुलाम्॥ २२"],"iast":["juṣṭeṣu jālāmukharandhrakuṭṭime-","ṣvāviṣṭapārāvatabarhināditām |","saṃsiktarathyāpaṇamārgacatvarāṃ","prakīrṇamālyāṃkuralājataṇḍulām|| 22"],"meaning":"सुवर्णसे सजे हुए चौराहे, धनियोंके महल, उन्हींके साथके बगीचे, कारीगरोंके बैठनेके स्थान या प्रजावर्गके सभा-भवन (टाउनहाल) और साधारण लोगोंके निवासगृह नगरकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वैदूर्य, हीरे, स्फटिक (बिल्लौर), नीलम, मूँगे, मोती और पन्‍ने आदिसे जड़े हुए छज्जे, चबूतरे, झरोखे एवं फर्श आदि जगमगा रहे हैं। उनपर बैठे हुए कबूतर, मोर आदि पक्षी भाँति-भाँतिकी बोली बोल रहे हैं। सड़क, बाजार, गली एवं चौराहोंपर खूब छिड़काव किया गया है। स्थान-स्थानपर फूलोंके गजरे, जवारे (जौके अंकुर), खील और चावल बिखरे हुए हैं॥ २१-२२॥","meaning_covers":[21,22]},{"id":"10.41.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/23/","page":388,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आपूर्णकुम्भैर्दधिचन्दनोक्षितैः","प्रसूनदीपावलिभिः सपल्लवैः ।","सवृन्दरम्भाक्रमुकैः सकेतुभिः","स्वलंकृतद्वारगृहां सपट्टिकैः॥ २३"],"iast":["āpūrṇakumbhairdadhicandanokṣitaiḥ","prasūnadīpāvalibhiḥ sapallavaiḥ |","savṛndarambhākramukaiḥ saketubhiḥ","svalaṃkṛtadvāragṛhāṃ sapaṭṭikaiḥ|| 23"],"meaning":"घरोंके दरवाजोंपर दही और चन्दन आदिसे चर्चित जलसे भरे हुए कलश रखे हैं और वे फूल, दीपक, नयी-नयी कोंपलें फलसहित केले और सुपारीके वृक्ष, छोटी-छोटी झंडियों और रेशमी वस्त्रोंसे भलीभाँति सजाए हुए हैं॥ २३॥"},{"id":"10.41.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/24/","page":388,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तां सम्प्रविष्टौ वसुदेवनन्दनौ","वृतौ वयस्यैर्नरदेववर्त्मना।","द्रष्टुं समीयुस्त्वरिताः पुरस्त्रियो","हर्म्याणि चैवारुरुहुर्नृपोत्सुकाः॥ २४"],"iast":["tāṃ sampraviṣṭau vasudevanandanau","vṛtau vayasyairnaradevavartmanā|","draṣṭuṃ samīyustvaritāḥ purastriyo","harmyāṇi caivāruruhurnṛpotsukāḥ|| 24"],"meaning":"परीक्षित्! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने ग्वालबालोंके साथ राजपथसे मथुरा नगरीमें प्रवेश किया। उस समय नगरकी नारियाँ बड़ी उत्सुकतासे उन्हें देखनेके लिये झटपट अटारियोंपर चढ़ गयीं॥ २४॥"},{"id":"10.41.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/25/","page":389,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["काश्‍चिद् विपर्यग्धृतवस्त्रभूषणा","विस्मृत्य चैकं युगलेष्वथापराः।","कृतैकपत्रश्रवणैकनूपुरा","नाङ्‌क्त्वा द्वितीयं त्वपराश्‍च लोचनम्॥ २५"],"iast":["kāścid viparyagdhṛtavastrabhūṣaṇā","vismṛtya caikaṃ yugaleṣvathāparāḥ|","kṛtaikapatraśravaṇaikanūpurā","nāṅktvā dvitīyaṃ tvaparāśca locanam|| 25"],"meaning":"किसी-किसीने जल्दीके कारण अपने वस्त्र और गहने उलटे पहन लिये। किसीने भूलसे कुण्डल, कंगन आदि जोड़ेसे पहने जानेवाले आभूषणोंमेंसे एक ही पहना और चल पड़ी। कोई एक ही कानमें पत्र नामक आभूषण धारण कर पायी थी तो किसीने एक ही पाँवमें पायजेब पहन रखा था। कोई एक ही आँखमें अंजन आँज पायी थी और दूसरीमें बिना आँजे ही चल पड़ी॥ २५॥"},{"id":"10.41.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/26/","page":389,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अश्‍नन्त्य एकास्तदपास्य सोत्सवा","अभ्यज्यमाना अकृतोपमज्जनाः।","स्वपन्त्य उत्थाय निशम्य निःस्वनं","प्रपाययन्त्योऽर्भमपोह्य मातरः॥ २६"],"iast":["aśnantya ekāstadapāsya sotsavā","abhyajyamānā akṛtopamajjanāḥ|","svapantya utthāya niśamya niḥsvanaṃ","prapāyayantyo'rbhamapohya mātaraḥ|| 26"],"meaning":"कई रमणियाँ तो भोजन कर रही थीं, वे हाथका कौर फेंककर चल पड़ीं। सबका मन उत्साह और आनन्दसे भर रहा था। कोई-कोई उबटन लगवा रही थीं, वे बिना स्नान किये ही दौड़ पड़ीं। जो सो रही थीं, वे कोलाहल सुनकर उठ खड़ी हुईं और उसी अवस्थामें दौड़ चलीं। जो माताएँ बच्चोंको दूध पिला रही थीं, वे उन्हें गोदसे हटाकर भगवान् श्रीकृष्णको देखनेके लिये चल पड़ीं॥ २६॥"},{"id":"10.41.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/27/","page":389,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मनांसि तासामरविन्दलोचनः","प्रगल्भलीलाहसितावलोकनैः ।","जहार मत्तद्विरदेन्द्रविक्रमो","दृशां ददच्छ्रीरमणात्मनोत्सवम्॥ २७"],"iast":["manāṃsi tāsāmaravindalocanaḥ","pragalbhalīlāhasitāvalokanaiḥ |","jahāra mattadviradendravikramo","dṛśāṃ dadacchrīramaṇātmanotsavam|| 27"],"meaning":"कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण मतवाले गजराजके समान बड़ी मस्तीसे चल रहे थे। उन्होंने लक्ष्मीको भी आनन्दित करनेवाले अपने श्यामसुन्दर विग्रहसे नगरनारियोंके नेत्रोंको बड़ा आनन्द दिया और अपनी विलासपूर्ण प्रगल्भ हँसी तथा प्रेमभरी चितवनसे उनके मन चुरा लिये॥ २७॥"},{"id":"10.41.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/28/","page":389,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा मुहुःश्रुतमनुद्रुतचेतसस्तं","तत्प्रेक्षणोत्स्मितसुधोक्षणलब्धमानाः।","आनन्दमूर्तिमुपगुह्य दृशाऽऽत्मलब्धं","हृष्यत्त्वचो जहुरनन्तमरिन्दमाधिम्॥ २८"],"iast":["dṛṣṭvā muhuḥśrutamanudrutacetasastaṃ","tatprekṣaṇotsmitasudhokṣaṇalabdhamānāḥ|","ānandamūrtimupaguhya dṛśā''tmalabdhaṃ","hṛṣyattvaco jahuranantamarindamādhim|| 28"],"meaning":"मथुराकी स्त्रियाँ बहुत दिनोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी अद्भुत लीलाएँ सुनती आ रही थीं। उनके चित्त चिरकालसे श्रीकृष्णके लिये चंचल, व्याकुल हो रहे थे। आज उन्होंने उन्हें देखा। भगवान् श्रीकृष्णने भी अपनी प्रेमभरी चितवन और मन्द मुसकानकी सुधासे सींचकर उनका सम्मान किया। परीक्षित्! उन स्त्रियोंने नेत्रोंके द्वारा भगवान्‌को अपने हृदयमें ले जाकर उनके आनन्दमय स्वरूपका आलिंगन किया। उनका शरीर पुलकित हो गया और बहुत दिनोंकी विरह-व्याधि शान्त हो गयी॥ २८॥"},{"id":"10.41.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/29/","page":389,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रासादशिखरारूढाः प्रीत्युत्फुल्लमुखाम्बुजाः।","अभ्यवर्षन् सौमनस्यैः प्रमदा बलकेशवौ॥ २९"],"iast":["prāsādaśikharārūḍhāḥ prītyutphullamukhāmbujāḥ|","abhyavarṣan saumanasyaiḥ pramadā balakeśavau|| 29"],"meaning":"मथुराकी नारियाँ अपने-अपने महलोंकी अटारियोंपर चढ़कर बलराम और श्रीकृष्णपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं। उस समय उन स्त्रियोंके मुखकमल प्रेमके आवेगसे खिल रहे थे॥ २९॥"},{"id":"10.41.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/30/","page":389,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दध्यक्षतैः सोदपात्रैः स्रग्गन्धैरभ्युपायनैः।","तावानर्चुः प्रमुदितास्तत्र तत्र द्विजातयः॥ ३०"],"iast":["dadhyakṣataiḥ sodapātraiḥ sraggandhairabhyupāyanaiḥ|","tāvānarcuḥ pramuditāstatra tatra dvijātayaḥ|| 30"],"meaning":"ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंने स्थान-स्थानपर दही, अक्षत, जलसे भरे पात्र, फूलोंके हार, चन्दन और भेंटकी सामग्रियोंसे आनन्दम‌ग्‍न होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीकी पूजा की॥ ३०॥"},{"id":"10.41.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/31/","page":390,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ऊचुः पौरा अहो गोप्यस्तपः किमचरन् महत्।","या ह्येतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवौ॥ ३१"],"iast":["ūcuḥ paurā aho gopyastapaḥ kimacaran mahat|","yā hyetāvanupaśyanti naralokamahotsavau|| 31"],"meaning":"भगवान्‌को देखकर सभी पुरवासी आपसमें कहने लगे—‘धन्य है! धन्य है!’ गोपियोंने ऐसी कौन-सी महान् तपस्या की है, जिसके कारण वे मनुष्यमात्रको परमानन्द देनेवाले इन दोनों मनोहर किशोरोंको देखती रहती हैं॥ ३१॥"},{"id":"10.41.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/32/","page":390,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रजकं कंचिदायान्तं रंगकारं गदाग्रजः।","दृष्ट्वायाचत वासांसि धौतान्यत्युत्तमानि च॥ ३२"],"iast":["rajakaṃ kaṃcidāyāntaṃ raṃgakāraṃ gadāgrajaḥ|","dṛṣṭvāyācata vāsāṃsi dhautānyatyuttamāni ca|| 32"],"meaning":"इसी समय भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि एक धोबी, जो कपड़े रँगनेका भी काम करता था, उनकी ओर आ रहा है। भगवान् श्रीकृष्णने उससे धुले हुए उत्तम-उत्तम कपड़े माँगे॥ ३२॥"},{"id":"10.41.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/33/","page":390,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देह्यावयोः समुचितान्यंग वासांसि चार्हतोः।","भविष्यति परं श्रेयो दातुस्ते नात्र संशयः॥ ३३"],"iast":["dehyāvayoḥ samucitānyaṃga vāsāṃsi cārhatoḥ|","bhaviṣyati paraṃ śreyo dātuste nātra saṃśayaḥ|| 33"],"meaning":"भगवान्‌ने कहा—‘भाई! तुम हमें ऐसे वस्त्र दो, जो हमारे शरीरमें पूरे-पूरे आ जायँ। वास्तवमें हमलोग उन वस्त्रोंके अधिकारी हैं। इसमें सन्देह नहीं कि यदि तुम हमलोगोंको वस्त्र दोगे तो तुम्हारा परम कल्याण होगा’॥ ३३॥"},{"id":"10.41.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/34/","page":390,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स याचितो भगवता परिपूर्णेन सर्वतः।","साक्षेपं रुषितः प्राह भृत्यो राज्ञः सुदुर्मदः॥ ३४"],"iast":["sa yācito bhagavatā paripūrṇena sarvataḥ|","sākṣepaṃ ruṣitaḥ prāha bhṛtyo rājñaḥ sudurmadaḥ|| 34"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हींका है। फिर भी उन्होंने इस प्रकार माँगनेकी लीला की। परन्तु वह मूर्ख राजा कंसका सेवक होनेके कारण मतवाला हो रहा था। भगवान्‌की वस्तु भगवान्‌को देना तो दूर रहा, उसने क्रोधमें भरकर आक्षेप करते हुए कहा—॥ ३४॥"},{"id":"10.41.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/35/","page":390,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ईदृशान्येव वासांसि नित्यं गिरिवनेचराः।","परिधत्त किमुद‍्वृत्ता राजद्रव्याण्यभीप्सथ॥ ३५"],"iast":["īdṛśānyeva vāsāṃsi nityaṃ girivanecarāḥ|","paridhatta kimudvṛttā rājadravyāṇyabhīpsatha|| 35"],"meaning":"‘तुमलोग रहते हो सदा पहाड़ और जंगलोंमें। क्या वहाँ ऐसे ही वस्त्र पहनते हो? तुमलोग बहुत उद्दण्ड हो गये हो तभी तो ऐसी बढ़-बढ़कर बातें करते हो। अब तुम्हें राजाका धन लूटनेकी इच्छा हुई है॥ ३५॥"},{"id":"10.41.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/36/","page":390,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["याताशु बालिशा मैवं प्रार्थ्यं यदि जिजीविषा।","बध्नन्ति घ्नन्ति लुम्पन्ति दृप्तं राजकुलानि वै॥ ३६"],"iast":["yātāśu bāliśā maivaṃ prārthyaṃ yadi jijīviṣā|","badhnanti ghnanti lumpanti dṛptaṃ rājakulāni vai|| 36"],"meaning":"अरे, मूर्खो! जाओ, भाग जाओ! यदि कुछ दिन जीनेकी इच्छा हो तो फिर इस तरह मत माँगना। राजकर्मचारी तुम्हारे जैसे उच्छृंखलोंको कैद कर लेते हैं, मार डालते हैं और जो कुछ उनके पास होता है, छीन लेते हैं’॥ ३६॥"},{"id":"10.41.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/37/","page":390,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं विकत्थमानस्य कुपितो देवकीसुतः।","रजकस्य कराग्रेण शिरः कायादपातयत्॥ ३७"],"iast":["evaṃ vikatthamānasya kupito devakīsutaḥ|","rajakasya karāgreṇa śiraḥ kāyādapātayat|| 37"],"meaning":"जब वह धोबी इस प्रकार बहुत कुछ बहक-बहककर बातें करने लगा, तब भगवान् श्रीकृष्णने तनिक कुपित होकर उसे एक तमाचा जमाया और उसका सिर धड़ामसे धड़से नीचे जा गिरा॥ ३७॥"},{"id":"10.41.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/38/","page":390,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यानुजीविनः सर्वे वासः कोशान् विसृज्य वै।","दुद्रुवुः सर्वतो मार्गं वासांसि जगृहेऽच्युतः॥ ३८"],"iast":["tasyānujīvinaḥ sarve vāsaḥ kośān visṛjya vai|","dudruvuḥ sarvato mārgaṃ vāsāṃsi jagṛhe'cyutaḥ|| 38"],"meaning":"यह देखकर उस धोबीके अधीन काम करनेवाले सब-के-सब कपड़ोंके गट्ठर वहीं छोड़कर इधर-उधर भाग गये। भगवान्‌ने उन वस्त्रोंको ले लिया॥ ३८॥"},{"id":"10.41.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/39/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसित्वाऽऽत्मप्रिये वस्त्रे कृष्णः संकर्षणस्तथा।","शेषाण्यादत्त गोपेभ्यो विसृज्य भुवि कानिचित्॥ ३९"],"iast":["vasitvā''tmapriye vastre kṛṣṇaḥ saṃkarṣaṇastathā|","śeṣāṇyādatta gopebhyo visṛjya bhuvi kānicit|| 39"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने मनमाने वस्त्र पहन लिये तथा बचे हुए वस्त्रोंमेंसे बहुत-से अपने साथी ग्वाल-बालोंको भी दिये। बहुत-से कपड़े तो वहीं जमीनपर ही छोड़कर चल दिये॥ ३९॥"},{"id":"10.41.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/40/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततस्तु वायकः प्रीतस्तयोर्वेषमकल्पयत्।","विचित्रवर्णैश्‍चैलेयैराकल्पैरनुरूपतः ॥ ४०"],"iast":["tatastu vāyakaḥ prītastayorveṣamakalpayat|","vicitravarṇaiścaileyairākalpairanurūpataḥ || 40"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम जब कुछ आगे बढ़े, तब उन्हें एक दर्जी मिला। भगवान्‌का अनुपम सौन्दर्य देखकर उसे बड़ी प्रसन्‍नता हुई। उसने उन रंग-बिरंगे सुन्दर वस्त्रोंको उनके शरीरपर ऐसे ढंगसे सजा दिया कि वे सब ठीक-ठीक फब गये॥ ४०॥"},{"id":"10.41.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/41/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नानालक्षणवेषाभ्यां कृष्णरामौ विरेजतुः।","स्वलंकृतौ बालगजौ पर्वणीव सितेतरौ॥ ४१"],"iast":["nānālakṣaṇaveṣābhyāṃ kṛṣṇarāmau virejatuḥ|","svalaṃkṛtau bālagajau parvaṇīva sitetarau|| 41"],"meaning":"अनेक प्रकारके वस्त्रोंसे विभूषित होकर दोनों भाई और भी अधिक शोभायमान हुए ऐसे जान पड़ते, मानो उत्सवके समय श्‍वेत और श्याम गजशावक भलीभाँति सजा दिये गये हों॥ ४१॥"},{"id":"10.41.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/42/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य प्रसन्‍नो भगवान् प्रादात् सारूप्यमात्मनः।","श्रियं च परमां लोके बलैश्‍वर्यस्मृतीन्द्रियम्॥ ४२"],"iast":["tasya prasanno bhagavān prādāt sārūpyamātmanaḥ|","śriyaṃ ca paramāṃ loke balaiśvaryasmṛtīndriyam|| 42"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण उस दर्जीपर बहुत प्रसन्‍न हुए। उन्होंने उसे इस लोकमें भरपूर धन-सम्पत्ति, बल-ऐश्‍वर्य, अपनी स्मृति और दूरतक देखने-सुनने आदिकी इन्द्रियसम्बन्धी शक्तियाँ दीं और मृत्युके बादके लिये अपना सारूप्य मोक्ष भी दे दिया॥ ४२॥"},{"id":"10.41.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/43/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः सुदाम्‍नो भवनं मालाकारस्य जग्मतुः।","तौ दृष्ट्वा स समुत्थाय ननाम शिरसा भुवि॥ ४३"],"iast":["tataḥ sudāmno bhavanaṃ mālākārasya jagmatuḥ|","tau dṛṣṭvā sa samutthāya nanāma śirasā bhuvi|| 43"],"meaning":"इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण सुदामा मालीके घर गये। दोनों भाइयोंको देखते ही सुदामा उठ खड़ा हुआ और पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया॥ ४३॥"},{"id":"10.41.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/44/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तयोरासनमानीय पाद्यं चार्घ्यार्हणादिभिः।","पूजां सानुगयोश्‍चक्रे स्रक्ताम्बूलानुलेपनैः॥ ४४"],"iast":["tayorāsanamānīya pādyaṃ cārghyārhaṇādibhiḥ|","pūjāṃ sānugayoścakre sraktāmbūlānulepanaiḥ|| 44"],"meaning":"फिर उनको आसनपर बैठाकर उनके पाँव पखारे, हाथ धुलाये और तदनन्तर ग्वालबालोंके सहित सबकी फूलोंके हार, पान, चन्दन आदि सामग्रियोंसे विधिपूर्वक पूजा की॥ ४४॥"},{"id":"10.41.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/45/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्राह नः सार्थकं जन्म पावितं च कुलं प्रभो।","पितृदेवर्षयो मह्यं तुष्टा ह्यागमनेन वाम्॥ ४५"],"iast":["prāha naḥ sārthakaṃ janma pāvitaṃ ca kulaṃ prabho|","pitṛdevarṣayo mahyaṃ tuṣṭā hyāgamanena vām|| 45"],"meaning":"इसके पश्‍चात् उसने प्रार्थना की—‘प्रभो! आप दोनोंके शुभागमनसे हमारा जन्म सफल हो गया। हमारा कुल पवित्र हो गया। आज हम पितर, ऋषि और देवताओंके ऋणसे मुक्त हो गये। वे हमपर परम सन्तुष्ट हैं॥ ४५॥"},{"id":"10.41.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/46/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भवन्तौ किल विश्‍वस्य जगतः कारणं परम्।","अवतीर्णाविहांशेन क्षेमाय च भवाय च॥ ४६"],"iast":["bhavantau kila viśvasya jagataḥ kāraṇaṃ param|","avatīrṇāvihāṃśena kṣemāya ca bhavāya ca|| 46"],"meaning":"आप दोनों सम्पूर्ण जगत‍्के परम कारण हैं। आप संसारके अभ्युदय-उन्‍नति और निःश्रेयस—मोक्षके लिये ही इस पृथ्वीपर अपने ज्ञान, बल आदि अंशोंके साथ अवतीर्ण हुए हैं॥ ४६॥"},{"id":"10.41.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/47/","page":391,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न हि वां विषमा दृष्टिः सुहृदोर्जगदात्मनोः।","समयोः सर्वभूतेषु भजन्तं भजतोरपि॥ ४७"],"iast":["na hi vāṃ viṣamā dṛṣṭiḥ suhṛdorjagadātmanoḥ|","samayoḥ sarvabhūteṣu bhajantaṃ bhajatorapi|| 47"],"meaning":"यद्यपि आप प्रेम करनेवालोंसे ही प्रेम करते हैं, भजन करनेवालोंको ही भजते हैं—फिर भी आपकी दृष्टिमें विषमता नहीं है। क्योंकि आप सारे जगत‍्के परम सुहृद् और आत्मा हैं। आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंमें समरूपसे स्थित हैं॥ ४७॥"},{"id":"10.41.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/48/","page":392,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तावाज्ञापयतं भृत्यं किमहं करवाणि वाम्।","पुंसोऽत्यनुग्रहो ह्येष भवद्भिर्यन्‍नियुज्यते॥ ४८"],"iast":["tāvājñāpayataṃ bhṛtyaṃ kimahaṃ karavāṇi vām|","puṃso'tyanugraho hyeṣa bhavadbhiryanniyujyate|| 48"],"meaning":"मैं आपका दास हूँ। आप दोनों मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ। भगवन्! जीवपर आपका यह बहुत बड़ा अनुग्रह है, पूर्ण कृपाप्रसाद है कि आप उसे आज्ञा देकर किसी कार्यमें नियुक्त करते हैं॥ ४८॥"},{"id":"10.41.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/49/","page":392,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्यभिप्रेत्य राजेन्द्र सुदामा प्रीतमानसः।","शस्तैः सुगन्धैः कुसुमैर्माला विरचिता ददौ॥ ४९"],"iast":["ityabhipretya rājendra sudāmā prītamānasaḥ|","śastaiḥ sugandhaiḥ kusumairmālā viracitā dadau|| 49"],"meaning":"राजेन्द्र! सुदामा मालीने इस प्रकार प्रार्थना करनेके बाद भगवान्‌का अभिप्राय जानकर बड़े प्रेम और आनन्दसे भरकर अत्यन्त सुन्दर-सुन्दर तथा सुगन्धित पुष्पोंसे गुँथे हुए हार उन्हें पहनाये॥ ४९॥"},{"id":"10.41.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/50/","page":392,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ताभिः स्वलंकृतौ प्रीतौ कृष्णरामौ सहानुगौ।","प्रणताय प्रपन्‍नाय ददतुर्वरदौ वरान्॥ ५०"],"iast":["tābhiḥ svalaṃkṛtau prītau kṛṣṇarāmau sahānugau|","praṇatāya prapannāya dadaturvaradau varān|| 50"],"meaning":"जब ग्वालबाल और बलरामजीके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उन सुन्दर-सुन्दर मालाओंसे अलंकृत हो चुके, तब उन वरदायक प्रभुने प्रसन्‍न होकर विनीत और शरणागत सुदामाको श्रेष्ठ वर दिये॥ ५०॥"},{"id":"10.41.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/51/","page":392,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽपि वव्रेऽचलां भक्तिं तस्मिन्‍नेवाखिलात्मनि।","तद्भक्तेषु च सौहार्दं भूतेषु च दयां पराम्॥ ५१"],"iast":["so'pi vavre'calāṃ bhaktiṃ tasminnevākhilātmani|","tadbhakteṣu ca sauhārdaṃ bhūteṣu ca dayāṃ parām|| 51"],"meaning":"सुदामा मालीने उनसे यही वर माँगा कि ‘प्रभो! आप ही समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं। सर्वस्वरूप आपके चरणोंमें मेरी अविचल भक्ति हो। आपके भक्तोंसे मेरा सौहार्द, मैत्रीका सम्बन्ध हो और समस्त प्राणियोंके प्रति अहैतुक दयाका भाव बना रहे’॥ ५१॥"},{"id":"10.41.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/52/","page":392,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति तस्मै वरं दत्त्वा श्रियं चान्वयवर्धिनीम्।","बलमायुर्यशः कान्तिं निर्जगाम सहाग्रजः॥ ५२"],"iast":["iti tasmai varaṃ dattvā śriyaṃ cānvayavardhinīm|","balamāyuryaśaḥ kāntiṃ nirjagāma sahāgrajaḥ|| 52"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने सुदामाको उसके माँगे हुए वर तो दिये ही—ऐसी लक्ष्मी भी दी जो वंशपरम्पराके साथ-साथ बढ़ती जाय; और साथ ही बल, आयु, कीर्ति तथा कान्तिका भी वरदान दिया। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ वहाँसे बिदा हुए॥ ५२॥"}],"text":[{"b":31750,"kind":"adhyaya_heading","page":386,"text":"अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः"},{"b":31751,"kind":"topic_heading","page":386,"text":"श्रीकृष्णका मथुराजीमें प्रवेश"},{"b":31752,"kind":"topic_heading","page":386,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":31753,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.1"],"text":"स्तुवतस्तस्य भगवान् दर्शयित्वा जले वपुः।"},{"b":31754,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.1"],"text":"भूयः समाहरत् कृष्णो नटो नाट्यमिवात्मनः॥ १"},{"b":31755,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.2"],"text":"सोऽपि चान्तर्हितं वीक्ष्य जलादुन्मज्ज्य सत्वरः।"},{"b":31756,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.2"],"text":"कृत्वा चावश्यकं सर्वं विस्मितो रथमागमत्॥ २"},{"b":31757,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.3"],"text":"तमपृच्छद‍्धृषीकेशः किं ते दृष्टमिवाद्भुतम्।"},{"b":31758,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.3"],"text":"भूमौ वियति तोये वा तथा त्वां लक्षयामहे॥ ३"},{"b":31759,"kind":"hindi_commentary","page":386,"explains":["10.41.1","10.41.2","10.41.3"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अक्रूरजी इस प्रकार स्तुति कर रहे थे। उन्हें भगवान् श्रीकृष्णने जलमें अपने दिव्यरूपके दर्शन कराये और फिर उसे छिपा लिया, ठीक वैसे ही जैसे कोई नट अभिनयमें कोई रूप दिखाकर फिर उसे परदेकी ओटमें छिपा दे॥ १॥ जब अक्रूरजीने देखा कि भगवान्‌का वह दिव्यरूप अन्तर्धान हो गया, तब वे जलसे बाहर निकल आये और फिर जल्दी-जल्दी सारे आवश्यक कर्म समाप्त करके रथपर चले आये। उस समय वे बहुत ही विस्मित हो रहे थे॥ २॥ भगवान् श्रीकृष्णने उनसे पूछा—‘चाचाजी! आपने पृथ्वी, आकाश या जलमें कोई अद्भुत वस्तु देखी है क्या? क्योंकि आपकी आकृति देखनेसे ऐसा ही जान पड़ता है’॥ ३॥"},{"b":31760,"kind":"topic_heading","page":386,"text":"अक्रूर उवाच"},{"b":31761,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.4"],"text":"अद्भुतानीह यावन्ति भूमौ वियति वा जले।"},{"b":31762,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.4"],"text":"त्वयि विश्‍वात्मके तानि किं मेऽदृष्टं विपश्यतः॥ ४"},{"b":31763,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.5"],"text":"यत्राद्भुतानि सर्वाणि भूमौ वियति वा जले।"},{"b":31764,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.5"],"text":"तं त्वानुपश्यतो ब्रह्मन् किं मे दृष्टमिहाद्भुतम्॥ ५"},{"b":31765,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.6"],"text":"इत्युक्त्वा चोदयामास स्यन्दनं गान्दिनीसुतः।"},{"b":31766,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.6"],"text":"मथुरामनयद् रामं कृष्णं चैव दिनात्यये॥ ६"},{"b":31767,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.7"],"text":"मार्गे ग्रामजना राजंस्तत्र तत्रोपसंगताः।"},{"b":31768,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.7"],"text":"वसुदेवसुतौ वीक्ष्य प्रीता दृष्टिं न चाददुः॥ ७"},{"b":31769,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.8"],"text":"तावद् व्रजौकसस्तत्र नन्दगोपादयोऽग्रतः।"},{"b":31770,"kind":"sanskrit_shloka","page":386,"verses":["10.41.8"],"text":"पुरोपवनमासाद्य प्रतीक्षन्तोऽवतस्थिरे॥ ८"},{"b":31771,"kind":"hindi_commentary","page":386,"explains":["10.41.4","10.41.5","10.41.6","10.41.7","10.41.8"],"text":"अक्रूरजीने कहा—‘प्रभो! पृथ्वी, आकाश या जलमें और सारे जगत‍्में जितने भी अद्भुत पदार्थ हैं, वे सब आपमें ही हैं। क्योंकि आप विश्‍वरूप हैं। जब मैं आपको ही देख रहा हूँ तब ऐसी कौन-सी अद्भुत वस्तु रह जाती है, जो मैंने न देखी हो॥ ४॥ भगवन्! जितनी भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, वे पृथ्वीमें हों या जल अथवा आकाशमें—सब-की-सब जिनमें हैं, उन्हीं आपको मैं देख रहा हूँ! फिर भला, मैंने यहाँ अद्भुत वस्तु कौन-सी देखी?॥ ५॥ गान्दिनीनन्दन अक्रूरजीने यह कहकर रथ हाँक दिया और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको लेकर दिन ढलते-ढलते वे मथुरापुरी जा पहुँचे॥ ६॥ परीक्षित्! मार्गमें स्थान-स्थानपर गाँवोंके लोग मिलनेके लिये आते और भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीको देखकर आनन्द-म‌ग्‍न हो जाते। वे एकटक उनकी ओर देखने लगते, अपनी दृष्टि हटा न पाते॥ ७॥ नन्दबाबा आदि व्रज-वासी तो पहलेसे ही वहाँ पहुँच गये थे, और मथुरापुरीके बाहरी उपवनमें रुककर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे॥ ८॥"},{"b":31772,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.9"],"text":"तान् समेत्याह भगवानक्रूरं जगदीश्‍वरः।"},{"b":31773,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.9"],"text":"गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रश्रितं प्रहसन्‍निव॥ ९"},{"b":31774,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.10"],"text":"भवान् प्रविशतामग्रे सहयानः पुरीं गृहम्।"},{"b":31775,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.10"],"text":"वयं त्विहावमुच्याथ ततो द्रक्ष्यामहे पुरीम्॥ १०"},{"b":31776,"kind":"hindi_commentary","page":387,"explains":["10.41.9","10.41.10"],"text":"उनके पास पहुँचकर जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने विनीतभावसे खड़े अक्रूरजीका हाथ अपने हाथमें लेकर मुसकराते हुए कहा—॥ ९॥ ‘चाचाजी! आप रथ लेकर पहले मथुरापुरीमें प्रवेश कीजिये और अपने घर जाइये। हमलोग पहले यहाँ उतरकर फिर नगर देखनेके लिये आयेंगे’॥ १०॥"},{"b":31777,"kind":"topic_heading","page":386,"text":"अक्रूर उवाच"},{"b":31778,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.11"],"text":"नाहं भवद‍्भ्यां रहितः प्रवेक्ष्ये मथुरां प्रभो।"},{"b":31779,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.11"],"text":"त्यक्तुं नार्हसि मां नाथ भक्तं ते भक्तवत्सल॥ ११"},{"b":31780,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.12"],"text":"आगच्छ याम गेहान् नः सनाथान् कुर्वधोक्षज।"},{"b":31781,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.12"],"text":"सहाग्रजः सगोपालैः सुहृद्भिश्‍च सुहृत्तम॥ १२"},{"b":31782,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.13"],"text":"पुनीहि पादरजसा गृहान् नो गृहमेधिनाम्।"},{"b":31783,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.13"],"text":"यच्छौचेनानुतृप्यन्ति पितरः सा‌ग्‍नयः सुराः॥ १३"},{"b":31784,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.14"],"text":"अवनिज्याङ्‌घ्रियुगलमासीच्छ्लोक्यो बलिर्महान्।"},{"b":31785,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.14"],"text":"ऐश्‍वर्यमतुलं लेभे गतिं चैकान्तिनां तु या॥ १४"},{"b":31786,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.15"],"text":"आपस्तेऽङ्‌घ्र्यवनेजन्यस्त्रीँल्लोकाञ्छुचयोऽपुनन्।"},{"b":31787,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.15"],"text":"शिरसाधत्त याः शर्वः स्वर्याताः सगरात्मजाः॥ १५"},{"b":31788,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.16"],"text":"देवदेव जगन्‍नाथ पुण्यश्रवणकीर्तन।"},{"b":31789,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.16"],"text":"यदूत्तमोत्तमश्‍लोक नारायण नमोऽस्तु ते॥ १६"},{"b":31790,"kind":"hindi_commentary","page":387,"explains":["10.41.11","10.41.12","10.41.13","10.41.14","10.41.15","10.41.16"],"text":"अक्रूरजीने कहा—प्रभो! आप दोनोंके बिना मैं मथुरामें नहीं जा सकता। स्वामी! मैं आपका भक्त हूँ! भक्तवत्सल प्रभो! आप मुझे मत छोड़िये॥ ११॥ भगवन्! आइये, चलें। मेरे परम हितैषी और सच्चे सुहृद् भगवन्! आप बलरामजी, ग्वालबालों तथा नन्दरायजी आदि आत्मीयोंके साथ चलकर हमारा घर सनाथ कीजिये॥ १२॥ हम गृहस्थ हैं। आप अपने चरणोंकी धूलिसे हमारा घर पवित्र कीजिये। आपके चरणोंकी धोवन (गंगाजल या चरणामृत) से अग्‍नि, देवता, पितर—सब-के-सब तृप्त हो जाते हैं॥ १३॥ प्रभो! आपके युगल चरणोंको पखारकर महात्मा बलिने वह यश प्राप्त किया, जिसका गान सन्त पुरुष करते हैं। केवल यश ही नहीं—उन्हें अतुलनीय ऐश्‍वर्य तथा वह गति प्राप्त हुई, जो अनन्य प्रेमी भक्तोंको प्राप्त होती है॥ १४॥ आपके चरणोदक—गंगाजीने तीनों लोक पवित्र कर दिये। सचमुच वे मूर्तिमान् पवित्रता हैं। उन्हींके स्पर्शसे सगरके पुत्रोंको सद्गति प्राप्त हुई और उसी जलको स्वयं भगवान् शंकरने अपने सिरपर धारण किया॥ १५॥ यदुवंशशिरोमणे! आप देवताओंके भी आराध्यदेव हैं। जगत‍्के स्वामी हैं। आपके गुण और लीलाओंका श्रवण तथा कीर्तन बड़ा ही मंगलकारी है। उत्तम पुरुष आपके गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं। नारायण! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ १६॥"},{"b":31791,"kind":"topic_heading","page":387,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":31792,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.17"],"text":"आयास्ये भवतो गेहमहमार्यसमन्वितः।"},{"b":31793,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.17"],"text":"यदुचक्रद्रुहं हत्वा वितरिष्ये सुहृत्प्रियम्॥ १७"},{"b":31794,"kind":"hindi_commentary","page":387,"explains":["10.41.17"],"text":"श्रीभगवान्‌ने कहा—चाचाजी! मैं दाऊ भैयाके साथ आपके घर आऊँगा और पहले इस यदुवंशियोंके द्रोही कंसको मारकर तब अपने सभी सुहृद्-स्वजनोंका प्रिय करूँगा॥ १७॥"},{"b":31795,"kind":"topic_heading","page":387,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":31796,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.18"],"text":"एवमुक्तो भगवता सोऽक्रूरो विमना इव।"},{"b":31797,"kind":"sanskrit_shloka","page":387,"verses":["10.41.18"],"text":"पुरीं प्रविष्टः कंसाय कर्मावेद्य गृहं ययौ॥ १८"},{"b":31798,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.19"],"text":"अथापराह्णे भगवान् कृष्णः संकर्षणान्वितः।"},{"b":31799,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.19"],"text":"मथुरां प्राविशद् गोपैर्दिदृक्षुः परिवारितः॥ १९"},{"b":31800,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.20"],"text":"ददर्श तां स्फाटिकतुंगगोपुर-"},{"b":31801,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.20"],"text":"द्वारां बृहद्धेमकपाटतोरणाम्।"},{"b":31802,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.20"],"text":"ताम्रारकोष्ठां परिखादुरासदा-"},{"b":31803,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.20"],"text":"मुद्यानरम्योपवनोपशोभिताम् ॥ २०"},{"b":31804,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.21"],"text":"सौवर्णशृंगाटकहर्म्यनिष्कुटैः"},{"b":31805,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.21"],"text":"श्रेणीसभाभिर्भवनैरुपस्कृताम् ।"},{"b":31806,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.21"],"text":"वैदूर्यवज्रामलनीलविद्रुमै-"},{"b":31807,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.21"],"text":"र्मुक्ताहरिद्भिर्वलभीषु वेदिषु॥ २१"},{"b":31808,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.22"],"text":"जुष्टेषु जालामुखरन्ध्रकुट्टिमे-"},{"b":31809,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.22"],"text":"ष्वाविष्टपारावतबर्हिनादिताम् ।"},{"b":31810,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.22"],"text":"संसिक्तरथ्यापणमार्गचत्वरां"},{"b":31811,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.22"],"text":"प्रकीर्णमाल्यांकुरलाजतण्डुलाम्॥ २२"},{"b":31812,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.23"],"text":"आपूर्णकुम्भैर्दधिचन्दनोक्षितैः"},{"b":31813,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.23"],"text":"प्रसूनदीपावलिभिः सपल्लवैः ।"},{"b":31814,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.23"],"text":"सवृन्दरम्भाक्रमुकैः सकेतुभिः"},{"b":31815,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.23"],"text":"स्वलंकृतद्वारगृहां सपट्टिकैः॥ २३"},{"b":31816,"kind":"hindi_commentary","page":387,"explains":["10.41.18","10.41.19","10.41.20","10.41.21","10.41.22","10.41.23"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर अक्रूरजी कुछ अनमने-से हो गये। उन्होंने पुरीमें प्रवेश करके कंससे श्रीकृष्ण और बलरामके ले आनेका समाचार निवेदन किया और फिर अपने घर गये॥ १८॥ दूसरे दिन तीसरे पहर बलरामजी और ग्वालबालोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णने मथुरापुरीको देखनेके लिये नगरमें प्रवेश किया॥ १९॥ भगवान्‌ने देखा कि नगरके परकोटेमें स्फटिकमणि (बिल्लौर) के बहुत ऊँचे-ऊँचे गोपुर (प्रधान दरवाजे) तथा घरोंमें भी बड़े-बड़े फाटक बने हुए हैं। उनमें सोनेके बड़े-बड़े किंवाड़ लगे हैं और सोनेके ही तोरण (बाहरी दरवाजे) बने हुए हैं। नगरके चारों ओर ताँबे और पीतलकी चहारदीवारी बनी हुई है। खाईंके कारण और कहींसे उस नगरमें प्रवेश करना बहुत कठिन है। स्थान-स्थानपर सुन्दर-सुन्दर उद्यान और रमणीय उपवन (केवल स्त्रियोंके उपयोगमें आनेवाले बगीचे) शोभायमान हैं॥ २०॥ सुवर्णसे सजे हुए चौराहे, धनियोंके महल, उन्हींके साथके बगीचे, कारीगरोंके बैठनेके स्थान या प्रजावर्गके सभा-भवन (टाउनहाल) और साधारण लोगोंके निवासगृह नगरकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वैदूर्य, हीरे, स्फटिक (बिल्लौर), नीलम, मूँगे, मोती और पन्‍ने आदिसे जड़े हुए छज्जे, चबूतरे, झरोखे एवं फर्श आदि जगमगा रहे हैं। उनपर बैठे हुए कबूतर, मोर आदि पक्षी भाँति-भाँतिकी बोली बोल रहे हैं। सड़क, बाजार, गली एवं चौराहोंपर खूब छिड़काव किया गया है। स्थान-स्थानपर फूलोंके गजरे, जवारे (जौके अंकुर), खील और चावल बिखरे हुए हैं॥ २१-२२॥ घरोंके दरवाजोंपर दही और चन्दन आदिसे चर्चित जलसे भरे हुए कलश रखे हैं और वे फूल, दीपक, नयी-नयी कोंपलें फलसहित केले और सुपारीके वृक्ष, छोटी-छोटी झंडियों और रेशमी वस्त्रोंसे भलीभाँति सजाए हुए हैं॥ २३॥"},{"b":31817,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.24"],"text":"तां सम्प्रविष्टौ वसुदेवनन्दनौ"},{"b":31818,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.24"],"text":"वृतौ वयस्यैर्नरदेववर्त्मना।"},{"b":31819,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.24"],"text":"द्रष्टुं समीयुस्त्वरिताः पुरस्त्रियो"},{"b":31820,"kind":"sanskrit_shloka","page":388,"verses":["10.41.24"],"text":"हर्म्याणि चैवारुरुहुर्नृपोत्सुकाः॥ २४"},{"b":31821,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.25"],"text":"काश्‍चिद् विपर्यग्धृतवस्त्रभूषणा"},{"b":31822,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.25"],"text":"विस्मृत्य चैकं युगलेष्वथापराः।"},{"b":31823,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.25"],"text":"कृतैकपत्रश्रवणैकनूपुरा"},{"b":31824,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.25"],"text":"नाङ्‌क्त्वा द्वितीयं त्वपराश्‍च लोचनम्॥ २५"},{"b":31825,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.26"],"text":"अश्‍नन्त्य एकास्तदपास्य सोत्सवा"},{"b":31826,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.26"],"text":"अभ्यज्यमाना अकृतोपमज्जनाः।"},{"b":31827,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.26"],"text":"स्वपन्त्य उत्थाय निशम्य निःस्वनं"},{"b":31828,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.26"],"text":"प्रपाययन्त्योऽर्भमपोह्य मातरः॥ २६"},{"b":31829,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.27"],"text":"मनांसि तासामरविन्दलोचनः"},{"b":31830,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.27"],"text":"प्रगल्भलीलाहसितावलोकनैः ।"},{"b":31831,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.27"],"text":"जहार मत्तद्विरदेन्द्रविक्रमो"},{"b":31832,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.27"],"text":"दृशां ददच्छ्रीरमणात्मनोत्सवम्॥ २७"},{"b":31833,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.28"],"text":"दृष्ट्वा मुहुःश्रुतमनुद्रुतचेतसस्तं"},{"b":31834,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.28"],"text":"तत्प्रेक्षणोत्स्मितसुधोक्षणलब्धमानाः।"},{"b":31835,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.28"],"text":"आनन्दमूर्तिमुपगुह्य दृशाऽऽत्मलब्धं"},{"b":31836,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.28"],"text":"हृष्यत्त्वचो जहुरनन्तमरिन्दमाधिम्॥ २८"},{"b":31837,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.29"],"text":"प्रासादशिखरारूढाः प्रीत्युत्फुल्लमुखाम्बुजाः।"},{"b":31838,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.29"],"text":"अभ्यवर्षन् सौमनस्यैः प्रमदा बलकेशवौ॥ २९"},{"b":31839,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.30"],"text":"दध्यक्षतैः सोदपात्रैः स्रग्गन्धैरभ्युपायनैः।"},{"b":31840,"kind":"sanskrit_shloka","page":389,"verses":["10.41.30"],"text":"तावानर्चुः प्रमुदितास्तत्र तत्र द्विजातयः॥ ३०"},{"b":31841,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.31"],"text":"ऊचुः पौरा अहो गोप्यस्तपः किमचरन् महत्।"},{"b":31842,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.31"],"text":"या ह्येतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवौ॥ ३१"},{"b":31843,"kind":"hindi_translation","page":388,"explains":["10.41.24","10.41.25","10.41.26","10.41.27","10.41.28","10.41.29","10.41.30","10.41.31"],"text":"परीक्षित्! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने ग्वालबालोंके साथ राजपथसे मथुरा नगरीमें प्रवेश किया। उस समय नगरकी नारियाँ बड़ी उत्सुकतासे उन्हें देखनेके लिये झटपट अटारियोंपर चढ़ गयीं॥ २४॥ किसी-किसीने जल्दीके कारण अपने वस्त्र और गहने उलटे पहन लिये। किसीने भूलसे कुण्डल, कंगन आदि जोड़ेसे पहने जानेवाले आभूषणोंमेंसे एक ही पहना और चल पड़ी। कोई एक ही कानमें पत्र नामक आभूषण धारण कर पायी थी तो किसीने एक ही पाँवमें पायजेब पहन रखा था। कोई एक ही आँखमें अंजन आँज पायी थी और दूसरीमें बिना आँजे ही चल पड़ी॥ २५॥ कई रमणियाँ तो भोजन कर रही थीं, वे हाथका कौर फेंककर चल पड़ीं। सबका मन उत्साह और आनन्दसे भर रहा था। कोई-कोई उबटन लगवा रही थीं, वे बिना स्नान किये ही दौड़ पड़ीं। जो सो रही थीं, वे कोलाहल सुनकर उठ खड़ी हुईं और उसी अवस्थामें दौड़ चलीं। जो माताएँ बच्चोंको दूध पिला रही थीं, वे उन्हें गोदसे हटाकर भगवान् श्रीकृष्णको देखनेके लिये चल पड़ीं॥ २६॥ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण मतवाले गजराजके समान बड़ी मस्तीसे चल रहे थे। उन्होंने लक्ष्मीको भी आनन्दित करनेवाले अपने श्यामसुन्दर विग्रहसे नगरनारियोंके नेत्रोंको बड़ा आनन्द दिया और अपनी विलासपूर्ण प्रगल्भ हँसी तथा प्रेमभरी चितवनसे उनके मन चुरा लिये॥ २७॥ मथुराकी स्त्रियाँ बहुत दिनोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी अद्भुत लीलाएँ सुनती आ रही थीं। उनके चित्त चिरकालसे श्रीकृष्णके लिये चंचल, व्याकुल हो रहे थे। आज उन्होंने उन्हें देखा। भगवान् श्रीकृष्णने भी अपनी प्रेमभरी चितवन और मन्द मुसकानकी सुधासे सींचकर उनका सम्मान किया। परीक्षित्! उन स्त्रियोंने नेत्रोंके द्वारा भगवान्‌को अपने हृदयमें ले जाकर उनके आनन्दमय स्वरूपका आलिंगन किया। उनका शरीर पुलकित हो गया और बहुत दिनोंकी विरह-व्याधि शान्त हो गयी॥ २८॥ मथुराकी नारियाँ अपने-अपने महलोंकी अटारियोंपर चढ़कर बलराम और श्रीकृष्णपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं। उस समय उन स्त्रियोंके मुखकमल प्रेमके आवेगसे खिल रहे थे॥ २९॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंने स्थान-स्थानपर दही, अक्षत, जलसे भरे पात्र, फूलोंके हार, चन्दन और भेंटकी सामग्रियोंसे आनन्दम‌ग्‍न होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीकी पूजा की॥ ३०॥ भगवान्‌को देखकर सभी पुरवासी आपसमें कहने लगे—‘धन्य है! धन्य है!’ गोपियोंने ऐसी कौन-सी महान् तपस्या की है, जिसके कारण वे मनुष्यमात्रको परमानन्द देनेवाले इन दोनों मनोहर किशोरोंको देखती रहती हैं॥ ३१॥"},{"b":31844,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.32"],"text":"रजकं कंचिदायान्तं रंगकारं गदाग्रजः।"},{"b":31845,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.32"],"text":"दृष्ट्वायाचत वासांसि धौतान्यत्युत्तमानि च॥ ३२"},{"b":31846,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.33"],"text":"देह्यावयोः समुचितान्यंग वासांसि चार्हतोः।"},{"b":31847,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.33"],"text":"भविष्यति परं श्रेयो दातुस्ते नात्र संशयः॥ ३३"},{"b":31848,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.34"],"text":"स याचितो भगवता परिपूर्णेन सर्वतः।"},{"b":31849,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.34"],"text":"साक्षेपं रुषितः प्राह भृत्यो राज्ञः सुदुर्मदः॥ ३४"},{"b":31850,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.35"],"text":"ईदृशान्येव वासांसि नित्यं गिरिवनेचराः।"},{"b":31851,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.35"],"text":"परिधत्त किमुद‍्वृत्ता राजद्रव्याण्यभीप्सथ॥ ३५"},{"b":31852,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.36"],"text":"याताशु बालिशा मैवं प्रार्थ्यं यदि जिजीविषा।"},{"b":31853,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.36"],"text":"बध्नन्ति घ्नन्ति लुम्पन्ति दृप्तं राजकुलानि वै॥ ३६"},{"b":31854,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.37"],"text":"एवं विकत्थमानस्य कुपितो देवकीसुतः।"},{"b":31855,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.37"],"text":"रजकस्य कराग्रेण शिरः कायादपातयत्॥ ३७"},{"b":31856,"kind":"hindi_commentary","page":390,"verses":["10.41.38"],"text":"तस्यानुजीविनः सर्वे वासः कोशान् विसृज्य वै।"},{"b":31857,"kind":"sanskrit_shloka","page":390,"verses":["10.41.38"],"text":"दुद्रुवुः सर्वतो मार्गं वासांसि जगृहेऽच्युतः॥ ३८"},{"b":31858,"kind":"hindi_translation","page":390,"explains":["10.41.32","10.41.33","10.41.34","10.41.35","10.41.36","10.41.37","10.41.38"],"text":"इसी समय भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि एक धोबी, जो कपड़े रँगनेका भी काम करता था, उनकी ओर आ रहा है। भगवान् श्रीकृष्णने उससे धुले हुए उत्तम-उत्तम कपड़े माँगे॥ ३२॥ भगवान्‌ने कहा—‘भाई! तुम हमें ऐसे वस्त्र दो, जो हमारे शरीरमें पूरे-पूरे आ जायँ। वास्तवमें हमलोग उन वस्त्रोंके अधिकारी हैं। इसमें सन्देह नहीं कि यदि तुम हमलोगोंको वस्त्र दोगे तो तुम्हारा परम कल्याण होगा’॥ ३३॥ परीक्षित्! भगवान् सर्वत्र परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हींका है। फिर भी उन्होंने इस प्रकार माँगनेकी लीला की। परन्तु वह मूर्ख राजा कंसका सेवक होनेके कारण मतवाला हो रहा था। भगवान्‌की वस्तु भगवान्‌को देना तो दूर रहा, उसने क्रोधमें भरकर आक्षेप करते हुए कहा—॥ ३४॥ ‘तुमलोग रहते हो सदा पहाड़ और जंगलोंमें। क्या वहाँ ऐसे ही वस्त्र पहनते हो? तुमलोग बहुत उद्दण्ड हो गये हो तभी तो ऐसी बढ़-बढ़कर बातें करते हो। अब तुम्हें राजाका धन लूटनेकी इच्छा हुई है॥ ३५॥ अरे, मूर्खो! जाओ, भाग जाओ! यदि कुछ दिन जीनेकी इच्छा हो तो फिर इस तरह मत माँगना। राजकर्मचारी तुम्हारे जैसे उच्छृंखलोंको कैद कर लेते हैं, मार डालते हैं और जो कुछ उनके पास होता है, छीन लेते हैं’॥ ३६॥ जब वह धोबी इस प्रकार बहुत कुछ बहक-बहककर बातें करने लगा, तब भगवान् श्रीकृष्णने तनिक कुपित होकर उसे एक तमाचा जमाया और उसका सिर धड़ामसे धड़से नीचे जा गिरा॥ ३७॥ यह देखकर उस धोबीके अधीन काम करनेवाले सब-के-सब कपड़ोंके गट्ठर वहीं छोड़कर इधर-उधर भाग गये। भगवान्‌ने उन वस्त्रोंको ले लिया॥ ३८॥"},{"b":31859,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.39"],"text":"वसित्वाऽऽत्मप्रिये वस्त्रे कृष्णः संकर्षणस्तथा।"},{"b":31860,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.39"],"text":"शेषाण्यादत्त गोपेभ्यो विसृज्य भुवि कानिचित्॥ ३९"},{"b":31861,"kind":"hindi_translation","page":391,"explains":["10.41.39"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने मनमाने वस्त्र पहन लिये तथा बचे हुए वस्त्रोंमेंसे बहुत-से अपने साथी ग्वाल-बालोंको भी दिये। बहुत-से कपड़े तो वहीं जमीनपर ही छोड़कर चल दिये॥ ३९॥"},{"b":31862,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.40"],"text":"ततस्तु वायकः प्रीतस्तयोर्वेषमकल्पयत्।"},{"b":31863,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.40"],"text":"विचित्रवर्णैश्‍चैलेयैराकल्पैरनुरूपतः ॥ ४०"},{"b":31864,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.41"],"text":"नानालक्षणवेषाभ्यां कृष्णरामौ विरेजतुः।"},{"b":31865,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.41"],"text":"स्वलंकृतौ बालगजौ पर्वणीव सितेतरौ॥ ४१"},{"b":31866,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.42"],"text":"तस्य प्रसन्‍नो भगवान् प्रादात् सारूप्यमात्मनः।"},{"b":31867,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.42"],"text":"श्रियं च परमां लोके बलैश्‍वर्यस्मृतीन्द्रियम्॥ ४२"},{"b":31868,"kind":"hindi_translation","page":391,"explains":["10.41.40","10.41.41","10.41.42"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम जब कुछ आगे बढ़े, तब उन्हें एक दर्जी मिला। भगवान्‌का अनुपम सौन्दर्य देखकर उसे बड़ी प्रसन्‍नता हुई। उसने उन रंग-बिरंगे सुन्दर वस्त्रोंको उनके शरीरपर ऐसे ढंगसे सजा दिया कि वे सब ठीक-ठीक फब गये॥ ४०॥ अनेक प्रकारके वस्त्रोंसे विभूषित होकर दोनों भाई और भी अधिक शोभायमान हुए ऐसे जान पड़ते, मानो उत्सवके समय श्‍वेत और श्याम गजशावक भलीभाँति सजा दिये गये हों॥ ४१॥ भगवान् श्रीकृष्ण उस दर्जीपर बहुत प्रसन्‍न हुए। उन्होंने उसे इस लोकमें भरपूर धन-सम्पत्ति, बल-ऐश्‍वर्य, अपनी स्मृति और दूरतक देखने-सुनने आदिकी इन्द्रियसम्बन्धी शक्तियाँ दीं और मृत्युके बादके लिये अपना सारूप्य मोक्ष भी दे दिया॥ ४२॥"},{"b":31869,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.43"],"text":"ततः सुदाम्‍नो भवनं मालाकारस्य जग्मतुः।"},{"b":31870,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.43"],"text":"तौ दृष्ट्वा स समुत्थाय ननाम शिरसा भुवि॥ ४३"},{"b":31871,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.44"],"text":"तयोरासनमानीय पाद्यं चार्घ्यार्हणादिभिः।"},{"b":31872,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.44"],"text":"पूजां सानुगयोश्‍चक्रे स्रक्ताम्बूलानुलेपनैः॥ ४४"},{"b":31873,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.45"],"text":"प्राह नः सार्थकं जन्म पावितं च कुलं प्रभो।"},{"b":31874,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.45"],"text":"पितृदेवर्षयो मह्यं तुष्टा ह्यागमनेन वाम्॥ ४५"},{"b":31875,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.46"],"text":"भवन्तौ किल विश्‍वस्य जगतः कारणं परम्।"},{"b":31876,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.46"],"text":"अवतीर्णाविहांशेन क्षेमाय च भवाय च॥ ४६"},{"b":31877,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.47"],"text":"न हि वां विषमा दृष्टिः सुहृदोर्जगदात्मनोः।"},{"b":31878,"kind":"sanskrit_shloka","page":391,"verses":["10.41.47"],"text":"समयोः सर्वभूतेषु भजन्तं भजतोरपि॥ ४७"},{"b":31879,"kind":"hindi_translation","page":391,"explains":["10.41.43","10.41.44","10.41.45","10.41.46","10.41.47"],"text":"इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण सुदामा मालीके घर गये। दोनों भाइयोंको देखते ही सुदामा उठ खड़ा हुआ और पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया॥ ४३॥ फिर उनको आसनपर बैठाकर उनके पाँव पखारे, हाथ धुलाये और तदनन्तर ग्वालबालोंके सहित सबकी फूलोंके हार, पान, चन्दन आदि सामग्रियोंसे विधिपूर्वक पूजा की॥ ४४॥ इसके पश्‍चात् उसने प्रार्थना की—‘प्रभो! आप दोनोंके शुभागमनसे हमारा जन्म सफल हो गया। हमारा कुल पवित्र हो गया। आज हम पितर, ऋषि और देवताओंके ऋणसे मुक्त हो गये। वे हमपर परम सन्तुष्ट हैं॥ ४५॥ आप दोनों सम्पूर्ण जगत‍्के परम कारण हैं। आप संसारके अभ्युदय-उन्‍नति और निःश्रेयस—मोक्षके लिये ही इस पृथ्वीपर अपने ज्ञान, बल आदि अंशोंके साथ अवतीर्ण हुए हैं॥ ४६॥ यद्यपि आप प्रेम करनेवालोंसे ही प्रेम करते हैं, भजन करनेवालोंको ही भजते हैं—फिर भी आपकी दृष्टिमें विषमता नहीं है। क्योंकि आप सारे जगत‍्के परम सुहृद् और आत्मा हैं। आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंमें समरूपसे स्थित हैं॥ ४७॥"},{"b":31880,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.48"],"text":"तावाज्ञापयतं भृत्यं किमहं करवाणि वाम्।"},{"b":31881,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.48"],"text":"पुंसोऽत्यनुग्रहो ह्येष भवद्भिर्यन्‍नियुज्यते॥ ४८"},{"b":31882,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.49"],"text":"इत्यभिप्रेत्य राजेन्द्र सुदामा प्रीतमानसः।"},{"b":31883,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.49"],"text":"शस्तैः सुगन्धैः कुसुमैर्माला विरचिता ददौ॥ ४९"},{"b":31884,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.50"],"text":"ताभिः स्वलंकृतौ प्रीतौ कृष्णरामौ सहानुगौ।"},{"b":31885,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.50"],"text":"प्रणताय प्रपन्‍नाय ददतुर्वरदौ वरान्॥ ५०"},{"b":31886,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.51"],"text":"सोऽपि वव्रेऽचलां भक्तिं तस्मिन्‍नेवाखिलात्मनि।"},{"b":31887,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.51"],"text":"तद्भक्तेषु च सौहार्दं भूतेषु च दयां पराम्॥ ५१"},{"b":31888,"kind":"hindi_translation","page":392,"explains":["10.41.48","10.41.49","10.41.50","10.41.51"],"text":"मैं आपका दास हूँ। आप दोनों मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ। भगवन्! जीवपर आपका यह बहुत बड़ा अनुग्रह है, पूर्ण कृपाप्रसाद है कि आप उसे आज्ञा देकर किसी कार्यमें नियुक्त करते हैं॥ ४८॥ राजेन्द्र! सुदामा मालीने इस प्रकार प्रार्थना करनेके बाद भगवान्‌का अभिप्राय जानकर बड़े प्रेम और आनन्दसे भरकर अत्यन्त सुन्दर-सुन्दर तथा सुगन्धित पुष्पोंसे गुँथे हुए हार उन्हें पहनाये॥ ४९॥ जब ग्वालबाल और बलरामजीके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उन सुन्दर-सुन्दर मालाओंसे अलंकृत हो चुके, तब उन वरदायक प्रभुने प्रसन्‍न होकर विनीत और शरणागत सुदामाको श्रेष्ठ वर दिये॥ ५०॥ सुदामा मालीने उनसे यही वर माँगा कि ‘प्रभो! आप ही समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं। सर्वस्वरूप आपके चरणोंमें मेरी अविचल भक्ति हो। आपके भक्तोंसे मेरा सौहार्द, मैत्रीका सम्बन्ध हो और समस्त प्राणियोंके प्रति अहैतुक दयाका भाव बना रहे’॥ ५१॥"},{"b":31889,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.52"],"text":"इति तस्मै वरं दत्त्वा श्रियं चान्वयवर्धिनीम्।"},{"b":31890,"kind":"sanskrit_shloka","page":392,"verses":["10.41.52"],"text":"बलमायुर्यशः कान्तिं निर्जगाम सहाग्रजः॥ ५२"},{"b":31891,"kind":"hindi_translation","page":392,"explains":["10.41.52"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने सुदामाको उसके माँगे हुए वर तो दिये ही—ऐसी लक्ष्मी भी दी जो वंशपरम्पराके साथ-साथ बढ़ती जाय; और साथ ही बल, आयु, कीर्ति तथा कान्तिका भी वरदान दिया। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ वहाँसे बिदा हुए॥ ५२॥"},{"b":31892,"kind":"hindi_translation","page":392,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे पुरप्रवेशो नाम एकचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४१॥"}],"notes":[{"id":"v2:293","mark":"१","page":390,"after_verse":"10.41.38","text":"बाह्यघोषैर्वितत्रसुः।"}],"corrections":{"count":5,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}