{"id":"10.4","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 4","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ चतुर्थोऽध्यायः","topics":["कंसके हाथसे छूटकर योगमायाका आकाशमें जाकर भविष्यवाणी करना"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[145,150]},"verses":[{"id":"10.4.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/1/","page":145,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बहिरन्तःपुरद्वारः सर्वाः पूर्ववदावृताः।","ततो बालध्वनिं श्रुत्वा गृहपालाः समुत्थिताः॥ १"],"iast":["bahirantaḥpuradvāraḥ sarvāḥ pūrvavadāvṛtāḥ|","tato bāladhvaniṃ śrutvā gṛhapālāḥ samutthitāḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेवजी लौट आये, तब नगरके बाहरी और भीतरी सब दरवाजे अपने-आप ही पहलेकी तरह बंद हो गये। इसके बाद नवजात शिशुके रोनेकी ध्वनि सुनकर द्वारपालोंकी नींद टूटी॥ १॥"},{"id":"10.4.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/2/","page":145,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ते तु तूर्णमुपव्रज्य देवक्या गर्भजन्म तत्।","आचख्युर्भोजराजाय यदुद्वि‌ग्‍नः प्रतीक्षते॥ २"],"iast":["te tu tūrṇamupavrajya devakyā garbhajanma tat|","ācakhyurbhojarājāya yadudvignaḥ pratīkṣate|| 2"],"meaning":"वे तुरन्त भोजराज कंसके पास गये और देवकीको सन्तान होनेकी बात कही। कंस तो बड़ी आकुलता और घबराहटके साथ इसी बातकी प्रतीक्षा कर रहा था॥ २॥"},{"id":"10.4.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/3/","page":145,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तल्पात् तूर्णमुत्थाय कालोऽयमिति विह्वलः।","सूतीगृहमगात् तूर्णं प्रस्खलन् मुक्तमूर्धजः॥ ३"],"iast":["sa talpāt tūrṇamutthāya kālo'yamiti vihvalaḥ|","sūtīgṛhamagāt tūrṇaṃ praskhalan muktamūrdhajaḥ|| 3"],"meaning":"द्वारपालोंकी बात सुनते ही वह झटपट पलँगसे उठ खड़ा हुआ और बड़ी शीघ्रतासे सूतिकागृहकी ओर झपटा। इस बार तो मेरे कालका ही जन्म हुआ है, यह सोचकर वह विह्वल हो रहा था और यही कारण है कि उसे इस बातका भी ध्यान न रहा कि उसके बाल बिखरे हुए हैं। रास्तेमें कई जगह वह लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बचा॥ ३॥"},{"id":"10.4.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/4/","page":145,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमाह भ्रातरं देवी कृपणा करुणं सती।","स्नुषेयं तव कल्याण स्त्रियं मा हन्तुमर्हसि॥ ४"],"iast":["tamāha bhrātaraṃ devī kṛpaṇā karuṇaṃ satī|","snuṣeyaṃ tava kalyāṇa striyaṃ mā hantumarhasi|| 4"],"meaning":"बंदीगृहमें पहुँचनेपर सती देवकीने बड़े दुःख और करुणाके साथ अपने भाई कंससे कहा—‘मेरे हितैषी भाई! यह कन्या तो तुम्हारी पुत्रवधूके समान है। स्त्रीजातिकी है; तुम्हें स्त्रीकी हत्या कदापि नहीं करनी चाहिये॥ ४॥"},{"id":"10.4.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/5/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बहवो हिंसिता भ्रातः शिशवः पावकोपमाः।","त्वया दैवनिसृष्टेन पुत्रिकैका प्रदीयताम्॥ ५"],"iast":["bahavo hiṃsitā bhrātaḥ śiśavaḥ pāvakopamāḥ|","tvayā daivanisṛṣṭena putrikaikā pradīyatām|| 5"],"meaning":"भैया! तुमने दैववश मेरे बहुत-से अग्‍निके समान तेजस्वी बालक मार डाले। अब केवल यही एक कन्या बची है, इसे तो मुझे दे दो॥ ५॥"},{"id":"10.4.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/6/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्वहं ते ह्यवरजा दीना हतसुता प्रभो।","दातुमर्हसि मन्दाया अंगेमां चरमां प्रजाम्॥ ६"],"iast":["nanvahaṃ te hyavarajā dīnā hatasutā prabho|","dātumarhasi mandāyā aṃgemāṃ caramāṃ prajām|| 6"],"meaning":"अवश्य ही मैं तुम्हारी छोटी बहिन हूँ। मेरे बहुत-से बच्चे मर गये हैं, इसलिये मैं अत्यन्त दीन हूँ। मेरे प्यारे और समर्थ भाई! तुम मुझ मन्दभागिनीको यह अन्तिम सन्तान अवश्य दे दो’॥ ६॥"},{"id":"10.4.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/7/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उपगुह्यात्मजामेवं रुदत्या दीनदीनवत्।","याचितस्तां विनिर्भर्त्स्य हस्तादाचिच्छिदे खलः॥ ७"],"iast":["upaguhyātmajāmevaṃ rudatyā dīnadīnavat|","yācitastāṃ vinirbhartsya hastādācicchide khalaḥ|| 7"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कन्याको अपनी गोदमें छिपाकर देवकीजीने अत्यन्त दीनताके साथ रोते-रोते याचना की। परन्तु कंस बड़ा दुष्ट था। उसने देवकीजीको झिड़ककर उनके हाथसे वह कन्या छीन ली॥ ७॥"},{"id":"10.4.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/8/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसुः सुताम्।","अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृदः॥ ८"],"iast":["tāṃ gṛhītvā caraṇayorjātamātrāṃ svasuḥ sutām|","apothayacchilāpṛṣṭhe svārthonmūlitasauhṛdaḥ|| 8"],"meaning":"अपनी उस नन्हीं-सी नवजात भानजीके पैर पकड़कर कंसने उसे बड़े जोरसे एक चट्टानपर दे मारा। स्वार्थने उसके हृदयसे सौहार्दको समूल उखाड़ फेंका था॥ ८॥"},{"id":"10.4.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/9/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सा तद्धस्तात् समुत्पत्य सद्यो देव्यम्बरं गता।","अदृश्यतानुजा विष्णोः सायुधाष्टमहाभुजा॥ ९"],"iast":["sā taddhastāt samutpatya sadyo devyambaraṃ gatā|","adṛśyatānujā viṣṇoḥ sāyudhāṣṭamahābhujā|| 9"],"meaning":"परन्तु श्रीकृष्णकी वह छोटी बहिन साधारण कन्या तो थी नहीं, देवी थी; उसके हाथसे छूटकर तुरन्त आकाशमें चली गयी और अपने बड़े-बड़े आठ हाथोंमें आयुध लिये हुए दीख पड़ी॥ ९॥"},{"id":"10.4.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/10/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिव्यस्रगम्बरालेपरत्‍नाभरणभूषिता ।","धनुःशूलेषुचर्मासिशंखचक्रगदाधरा ॥ १०"],"iast":["divyasragambarāleparatnābharaṇabhūṣitā |","dhanuḥśūleṣucarmāsiśaṃkhacakragadādharā || 10"],"meaning":"वह दिव्य माला, वस्त्र, चन्दन और मणिमय आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके हाथोंमें धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा—ये आठ आयुध थे॥ १०॥"},{"id":"10.4.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/11/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सिद्धचारणगन्धर्वैरप्सरःकिन्‍नरोरगैः ।","उपाहृतोरुबलिभिः स्तूयमानेदमब्रवीत्॥ ११"],"iast":["siddhacāraṇagandharvairapsaraḥkinnaroragaiḥ |","upāhṛtorubalibhiḥ stūyamānedamabravīt|| 11"],"meaning":"सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, किन्‍नर और नागगण बहुत-सी भेंटकी सामग्री समर्पित करके उसकी स्तुति कर रहे थे । उस समय देवीने कंससे यह कहा—॥ ११॥"},{"id":"10.4.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/12/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं मया हतया मन्द जातः खलु तवान्तकृत्।","यत्र क्व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसीः कृपणान् वृथा॥ १२"],"iast":["kiṃ mayā hatayā manda jātaḥ khalu tavāntakṛt|","yatra kva vā pūrvaśatrurmā hiṃsīḥ kṛpaṇān vṛthā|| 12"],"meaning":"‘रे मूर्ख! मुझे मारनेसे तुझे क्या मिलेगा? तेरे पूर्वजन्मका शत्रु तुझे मारनेके लिये किसी स्थानपर पैदा हो चुका है। अब तू व्यर्थ निर्दोष बालकोंकी हत्या न किया कर’॥ १२॥"},{"id":"10.4.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/13/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति प्रभाष्य तं देवी माया भगवती भुवि।","बहुनामनिकेतेषु बहुनामा बभूव ह॥ १३"],"iast":["iti prabhāṣya taṃ devī māyā bhagavatī bhuvi|","bahunāmaniketeṣu bahunāmā babhūva ha|| 13"],"meaning":"कंससे इस प्रकार कहकर भगवती योगमाया वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं और पृथ्वीके अनेक स्थानोंमें विभिन्‍न नामोंसे प्रसिद्ध हुईं॥ १३॥"},{"id":"10.4.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/14/","page":146,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तयाभिहितमाकर्ण्य कंसः परमविस्मितः।","देवकीं वसुदेवं च विमुच्य प्रश्रितोऽब्रवीत्॥ १४"],"iast":["tayābhihitamākarṇya kaṃsaḥ paramavismitaḥ|","devakīṃ vasudevaṃ ca vimucya praśrito'bravīt|| 14"],"meaning":"देवीकी यह बात सुनकर कंसको असीम आश्‍चर्य हुआ। उसने उसी समय देवकी और वसुदेवको कैदसे छोड़ दिया और बड़ी नम्रतासे उनसे कहा—॥ १४॥"},{"id":"10.4.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/15/","page":147,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो भगिन्यहो भाम मया वां बत पाप्मना।","पुरुषाद इवापत्यं बहवो हिंसिताः सुताः॥ १५"],"iast":["aho bhaginyaho bhāma mayā vāṃ bata pāpmanā|","puruṣāda ivāpatyaṃ bahavo hiṃsitāḥ sutāḥ|| 15"],"meaning":"‘मेरी प्यारी बहिन और बहनोईजी! हाय-हाय, मैं बड़ा पापी हूँ । राक्षस जैसे अपने ही बच्चोंको मार डालता है, वैसे ही मैंने तुम्हारे बहुत-से लड़के मार डाले। इस बातका मुझे बड़ा खेद है॥ १५॥"},{"id":"10.4.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/16/","page":147,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स त्वहं त्यक्तकारुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहृत् खलः।","काँल्लोकान् वै गमिष्यामि ब्रह्महेव मृतः श्‍वसन्॥ १६"],"iast":["sa tvahaṃ tyaktakāruṇyastyaktajñātisuhṛt khalaḥ|","kām̐llokān vai gamiṣyāmi brahmaheva mṛtaḥ śvasan|| 16"],"meaning":"मैं इतना दुष्ट हूँ कि करुणाका तो मुझमें लेश भी नहीं है । मैंने अपने भाई-बन्धु और हितैषियोंतकका त्याग कर दिया। पता नहीं, अब मुझे किस नरकमें जाना पड़ेगा। वास्तवमें तो मैं ब्रह्मघातीके समान जीवित होनेपर भी मुर्दा ही हूँ॥ १६॥"},{"id":"10.4.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/17/","page":147,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दैवमप्यनृतं वक्ति न मर्त्या एव केवलम्।","यद्विश्रम्भादहं पापः स्वसुर्निहतवाञ्छिशून्॥ १७"],"iast":["daivamapyanṛtaṃ vakti na martyā eva kevalam|","yadviśrambhādahaṃ pāpaḥ svasurnihatavāñchiśūn|| 17"],"meaning":"केवल मनुष्य ही झूठ नहीं बोलते, विधाता भी झूठ बोलते हैं । उसीपर विश्‍वास करके मैंने अपनी बहिनके बच्चे मार डाले। ओह! मैं कितना पापी हूँ॥ १७॥"},{"id":"10.4.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/18/","page":147,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मा शोचतं महाभागावात्मजान् स्वकृतम्भुजः।","जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनास्तदासते॥ १८"],"iast":["mā śocataṃ mahābhāgāvātmajān svakṛtambhujaḥ|","jantavo na sadaikatra daivādhīnāstadāsate|| 18"],"meaning":"तुम दोनों महात्मा हो। अपने पुत्रोंके लिये शोक मत करो। उन्हें तो अपने कर्मका ही फल मिला है। सभी प्राणी प्रारब्धके अधीन हैं। इसीसे वे सदा-सर्वदा एक साथ नहीं रह सकते॥ १८॥"},{"id":"10.4.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/19/","page":147,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भुवि भौमानि भूतानि यथा यान्त्यपयान्ति च।","नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः॥ १९"],"iast":["bhuvi bhaumāni bhūtāni yathā yāntyapayānti ca|","nāyamātmā tathaiteṣu viparyeti yathaiva bhūḥ|| 19"],"meaning":"जैसे मिट्टीके बने हुए पदार्थ बनते और बिगड़ते रहते हैं, परन्तु मिट्टीमें कोई अदल-बदल नहीं होती—वैसे ही शरीरका तो बनना-बिगड़ना होता ही रहता है; परन्तु आत्मापर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता॥ १९॥"},{"id":"10.4.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/20/","page":147,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथानेवंविदो भेदो यत आत्मविपर्ययः।","देहयोगवियोगौ च संसृतिर्न निवर्तते॥ २०"],"iast":["yathānevaṃvido bhedo yata ātmaviparyayaḥ|","dehayogaviyogau ca saṃsṛtirna nivartate|| 20"],"meaning":"जो लोग इस तत्त्वको नहीं जानते, वे इस अनात्मा शरीरको ही आत्मा मान बैठते हैं। यही उलटी बुद्धि अथवा अज्ञान है। इसीके कारण जन्म और मृत्यु होते हैं। और जबतक यह अज्ञान नहीं मिटता, तबतक सुख-दुःखरूप संसारसे छुटकारा नहीं मिलता॥ २०॥"},{"id":"10.4.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/21/","page":147,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि।","मानुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः॥ २१"],"iast":["tasmād bhadre svatanayān mayā vyāpāditānapi|","mānuśoca yataḥ sarvaḥ svakṛtaṃ vindate'vaśaḥ|| 21"],"meaning":"मेरी प्यारी बहिन! यद्यपि मैंने तुम्हारे पुत्रोंको मार डाला है, फिर भी तुम उनके लिये शोक न करो। क्योंकि सभी प्राणियोंको विवश होकर अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है॥ २१॥"},{"id":"10.4.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/22/","page":147,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यावद्धतोऽस्मि हन्तास्मीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वदृक् ।","तावत्तदभिमान्यज्ञो बाध्यबाधकतामियात्॥ २२"],"iast":["yāvaddhato'smi hantāsmītyātmānaṃ manyate'svadṛk |","tāvattadabhimānyajño bādhyabādhakatāmiyāt|| 22"],"meaning":"अपने स्वरूपको न जाननेके कारण जीव जबतक यह मानता रहता है कि ‘मैं मारनेवाला हूँ या मारा जाता हूँ’, तबतक शरीरके जन्म और मृत्युका अभिमान करनेवाला वह अज्ञानी बाध्य और बाधक-भावको प्राप्त होता है। अर्थात् वह दूसरोंको दुःख देता है और स्वयं दुःख भोगता है॥ २२॥"},{"id":"10.4.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/23/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्षमध्वं मम दौरात्म्यं साधवो दीनवत्सलाः।","इत्युक्त्वाश्रुमुखः पादौ श्यालः स्वस्रोरथाग्रहीत्॥ २३"],"iast":["kṣamadhvaṃ mama daurātmyaṃ sādhavo dīnavatsalāḥ|","ityuktvāśrumukhaḥ pādau śyālaḥ svasrorathāgrahīt|| 23"],"meaning":"मेरी यह दुष्टता तुम दोनों क्षमा करो; क्योंकि तुम बड़े ही साधुस्वभाव और दीनोंके रक्षक हो।’ ऐसा कहकर कंसने अपनी बहिन देवकी और वसुदेवजीके चरण पकड़ लिये। उसकी आँखोंसे आँसू बह-बहकर मुँहतक आ रहे थे॥ २३॥"},{"id":"10.4.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/24/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मोचयामास निगडाद् विश्रब्धः कन्यकागिरा।","देवकीं वसुदेवं च दर्शयन्‍नात्मसौहृदम्॥ २४"],"iast":["mocayāmāsa nigaḍād viśrabdhaḥ kanyakāgirā|","devakīṃ vasudevaṃ ca darśayannātmasauhṛdam|| 24"],"meaning":"इसके बाद उसने योगमायाके वचनोंपर विश्‍वास करके देवकी और वसुदेवको कैदसे छोड़ दिया और वह तरह-तरहसे उनके प्रति अपना प्रेम प्रकट करने लगा॥ २४॥"},{"id":"10.4.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/25/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भ्रातुः समनुतप्तस्य क्षान्त्वा रोषं च देवकी।","व्यसृजद् वसुदेवश्‍च प्रहस्य तमुवाच ह॥ २५"],"iast":["bhrātuḥ samanutaptasya kṣāntvā roṣaṃ ca devakī|","vyasṛjad vasudevaśca prahasya tamuvāca ha|| 25"],"meaning":"जब देवकीजीने देखा कि भाई कंसको पश्‍चात्ताप हो रहा है, तब उन्होंने उसे क्षमा कर दिया। वे उसके पहले अपराधोंको भूल गयीं और वसुदेवजीने हँसकर कंससे कहा—॥ २५॥"},{"id":"10.4.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/26/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवमेतन्महाभाग यथा वदसि देहिनाम्।","अज्ञानप्रभवाहंधीः स्वपरेति भिदा यतः॥ २६"],"iast":["evametanmahābhāga yathā vadasi dehinām|","ajñānaprabhavāhaṃdhīḥ svapareti bhidā yataḥ|| 26"],"meaning":"‘मनस्वी कंस! आप जो कहते हैं, वह ठीक वैसा ही है। जीव अज्ञानके कारण ही शरीर आदिको ‘मैं’ मान बैठते हैं। इसीसे अपने परायेका भेद हो जाता है॥ २६॥"},{"id":"10.4.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/27/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः ।","मिथो घ्नन्तं न पश्यन्ति भावैर्भावं पृथग्दृशः॥ २७"],"iast":["śokaharṣabhayadveṣalobhamohamadānvitāḥ |","mitho ghnantaṃ na paśyanti bhāvairbhāvaṃ pṛthagdṛśaḥ|| 27"],"meaning":"और यह भेददृष्टि हो जानेपर तो वे शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह और मदसे अन्धे हो जाते हैं। फिर तो उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि सबके प्रेरक भगवान् ही एक भावसे दूसरे भावका, एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नाश करा रहे हैं’॥ २७॥"},{"id":"10.4.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/28/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कंस एवं प्रसन्‍नाभ्यां विशुद्धं प्रतिभाषितः।","देवकीवसुदेवाभ्यामनुज्ञातोऽविशद् गृहम्॥ २८"],"iast":["kaṃsa evaṃ prasannābhyāṃ viśuddhaṃ pratibhāṣitaḥ|","devakīvasudevābhyāmanujñāto'viśad gṛham|| 28"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेव और देवकीने इस प्रकार प्रसन्‍न होकर निष्कपटभावसे कंसके साथ बातचीत की, तब उनसे अनुमति लेकर वह अपने महलमें चला गया॥ २८॥"},{"id":"10.4.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/29/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां कंस आहूय मन्त्रिणः।","तेभ्य आचष्ट तत् सर्वं यदुक्तं योगनिद्रया॥ २९"],"iast":["tasyāṃ rātryāṃ vyatītāyāṃ kaṃsa āhūya mantriṇaḥ|","tebhya ācaṣṭa tat sarvaṃ yaduktaṃ yoganidrayā|| 29"],"meaning":"वह रात्रि बीत जानेपर कंसने अपने मन्त्रियोंको बुलाया और योगमायाने जो कुछ कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया॥ २९॥"},{"id":"10.4.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/30/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आकर्ण्य भर्तुर्गदितं तमूचुर्देवशत्रवः।","देवान् प्रति कृतामर्षा दैतेया नातिकोविदाः॥ ३०"],"iast":["ākarṇya bharturgaditaṃ tamūcurdevaśatravaḥ|","devān prati kṛtāmarṣā daiteyā nātikovidāḥ|| 30"],"meaning":"कंसके मन्त्री पूर्णतया नीतिनिपुण नहीं थे। दैत्य होनेके कारण स्वभावसे ही वे देवताओंके प्रति शत्रुताका भाव रखते थे। अपने स्वामी कंसकी बात सुनकर वे देवताओंपर और भी चिढ़ गये और कंससे कहने लगे—॥ ३०॥"},{"id":"10.4.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/31/","page":148,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं चेत्तर्हि भोजेन्द्र पुरग्रामव्रजादिषु।","अनिर्दशान् निर्दशांश्‍च हनिष्यामोऽद्य वै शिशून्॥ ३१"],"iast":["evaṃ cettarhi bhojendra puragrāmavrajādiṣu|","anirdaśān nirdaśāṃśca haniṣyāmo'dya vai śiśūn|| 31"],"meaning":"‘भोजराज! यदि ऐसी बात है तो हम आज ही बड़े-बड़े नगरोंमें, छोटे-छोटे गाँवोंमें, अहीरोंकी बस्तियोंमें और दूसरे स्थानोंमें जितने बच्चे हुए हैं, वे चाहे दस दिनसे अधिकके हों या कमके, सबको आज ही मार डालेंगे॥ ३१॥"},{"id":"10.4.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/32/","page":149,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किमुद्यमैः करिष्यन्ति देवाः समरभीरवः।","नित्यमुद्वि‌ग्‍नमनसो ज्याघोषैर्धनुषस्तव॥ ३२"],"iast":["kimudyamaiḥ kariṣyanti devāḥ samarabhīravaḥ|","nityamudvignamanaso jyāghoṣairdhanuṣastava|| 32"],"meaning":"समरभीरु देवगण युद्धोद्योग करके ही क्या करेंगे? वे तो आपके धनुषकी टंकार सुनकर ही सदा-सर्वदा घबराये रहते हैं॥ ३२॥"},{"id":"10.4.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/33/","page":149,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अस्यतस्ते शरव्रातैर्हन्यमानाः समन्ततः।","जिजीविषव उत्सृज्य पलायनपरा ययुः॥ ३३"],"iast":["asyataste śaravrātairhanyamānāḥ samantataḥ|","jijīviṣava utsṛjya palāyanaparā yayuḥ|| 33"],"meaning":"जिस समय युद्धभूमिमें आप चोट-पर-चोट करने लगते हैं, बाण-वर्षासे घायल होकर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये समरांगण छोड़कर देवतालोग पलायन-परायण होकर इधर-उधर भाग जाते हैं॥ ३३॥"},{"id":"10.4.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/34/","page":149,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["केचित् प्रांजलयो दीना न्यस्तशस्त्रा दिवौकसः।","मुक्तकच्छशिखाः केचिद् भीताः स्म इति वादिनः॥ ३४"],"iast":["kecit prāṃjalayo dīnā nyastaśastrā divaukasaḥ|","muktakacchaśikhāḥ kecid bhītāḥ sma iti vādinaḥ|| 34"],"meaning":"कुछ देवता तो अपने अस्त्र-शस्त्र जमीनपर डाल देते हैं और हाथ जोड़कर आपके सामने अपनी दीनता प्रकट करने लगते हैं। कोई-कोई अपनी चोटीके बाल तथा कच्छ खोलकर आपकी शरणमें आकर कहते हैं कि—‘हम भयभीत हैं, हमारी रक्षा कीजिये’॥ ३४॥"},{"id":"10.4.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/35/","page":149,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न त्वं विस्मृतशस्त्रास्त्रान् विरथान् भयसंवृतान्।","हंस्यन्यासक्तविमुखान् भ‌ग्‍नचापानयुध्यतः॥ ३५"],"iast":["na tvaṃ vismṛtaśastrāstrān virathān bhayasaṃvṛtān|","haṃsyanyāsaktavimukhān bhagnacāpānayudhyataḥ|| 35"],"meaning":"आप उन शत्रुओंको नहीं मारते जो अस्त्र-शस्त्र भूल गये हों, जिनका रथ टूट गया हो, जो डर गये हों, जो लोग युद्ध छोड़कर अन्यमनस्क हो गये हों, जिनका धनुष टूट गया हो या जिन्होंने युद्धसे अपना मुख मोड़ लिया हो—उन्हें भी आप नहीं मारते॥ ३५॥"},{"id":"10.4.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/36/","page":149,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं क्षेमशूरैर्विबुधैरसंयुगविकत्थनैः।","रहोजुषा किं हरिणा शम्भुना वा वनौकसा।","किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण ब्रह्मणा वा तपस्यता॥ ३६"],"iast":["kiṃ kṣemaśūrairvibudhairasaṃyugavikatthanaiḥ|","rahojuṣā kiṃ hariṇā śambhunā vā vanaukasā|","kimindreṇālpavīryeṇa brahmaṇā vā tapasyatā|| 36"],"meaning":"देवता तो बस वहीं वीर बनते हैं, जहाँ कोई लड़ाई-झगड़ा न हो। रणभूमिके बाहर वे बड़ी-बड़ी डींग हाँकते हैं। उनसे तथा एकान्तवासी विष्णु, वनवासी शंकर, अल्पवीर्य इन्द्र और तपस्वी ब्रह्मासे भी हमें क्या भय हो सकता है॥ ३६॥"},{"id":"10.4.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/37/","page":149,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथापि देवाः सापत्‍न्यान्‍नोपेक्ष्या इति मन्महे।","ततस्तन्मूलखनने नियुङ्क्ष्वास्माननुव्रतान्॥ ३७"],"iast":["tathāpi devāḥ sāpatnyānnopekṣyā iti manmahe|","tatastanmūlakhanane niyuṅkṣvāsmānanuvratān|| 37"],"meaning":"फिर भी देवताओंकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये—ऐसी हमारी राय है। क्योंकि हैं तो वे शत्रु ही। इसलिये उनकी जड़ उखाड़ फेंकनेके लिये आप हम-जैसे विश्‍वासपात्र सेवकोंको नियुक्त कर दीजिये॥ ३७॥"},{"id":"10.4.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/38/","page":149,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथाऽऽमयोऽङ्गे समुपेक्षितो नृभि-","र्न शक्यते रूढपदश्‍चिकित्सितुम्।","यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा","रिपुर्महान् बद्धबलो न चाल्यते॥ ३८"],"iast":["yathā''mayo'ṅge samupekṣito nṛbhi-","rna śakyate rūḍhapadaścikitsitum|","yathendriyagrāma upekṣitastathā","ripurmahān baddhabalo na cālyate|| 38"],"meaning":"जब मनुष्यके शरीरमें रोग हो जाता है और उसकी चिकित्सा नहीं की जाती—उपेक्षा कर दी जाती है, तब रोग अपनी जड़ जमा लेता है और फिर वह असाध्य हो जाता है। अथवा जैसे इन्द्रियोंकी उपेक्षा कर देनेपर उनका दमन असम्भव हो जाता है, वैसे ही यदि पहले शत्रुकी उपेक्षा कर दी जाय और वह अपना पाँव जमा ले, तो फिर उसको हराना कठिन हो जाता है॥ ३८॥"},{"id":"10.4.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/39/","page":149,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मूलं हि विष्णुर्देवानां यत्र धर्मः सनातनः।","तस्य च ब्रह्म गोविप्रास्तपो यज्ञाः सदक्षिणाः॥ ३९"],"iast":["mūlaṃ hi viṣṇurdevānāṃ yatra dharmaḥ sanātanaḥ|","tasya ca brahma goviprāstapo yajñāḥ sadakṣiṇāḥ|| 39"],"meaning":"देवताओंकी जड़ है विष्णु और वह वहाँ रहता है, जहाँ सनातनधर्म है। सनातनधर्मकी जड़ हैं—वेद, गौ, ब्राह्मण, तपस्या और वे यज्ञ, जिनमें दक्षिणा दी जाती है॥ ३९॥"},{"id":"10.4.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/40/","page":150,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मात् सर्वात्मना राजन् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः।","तपस्विनो यज्ञशीलान् गाश्‍च हन्मो हविर्दुघाः॥ ४०"],"iast":["tasmāt sarvātmanā rājan brāhmaṇān brahmavādinaḥ|","tapasvino yajñaśīlān gāśca hanmo havirdughāḥ|| 40"],"meaning":"इसलिये भोजराज! हमलोग वेदवादी ब्राह्मण, तपस्वी, याज्ञिक और यज्ञके लिये घी आदि हविष्य पदार्थ देनेवाली गायोंका पूर्णरूपसे नाश कर डालेंगे॥ ४०॥"},{"id":"10.4.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/41/","page":150,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विप्रा गावश्‍च वेदाश्‍च तपः सत्यं दमः शमः।","श्रद्धा दया तितिक्षा च क्रतवश्‍च हरेस्तनूः॥ ४१"],"iast":["viprā gāvaśca vedāśca tapaḥ satyaṃ damaḥ śamaḥ|","śraddhā dayā titikṣā ca kratavaśca harestanūḥ|| 41"],"meaning":"ब्राह्मण, गौ, वेद, तपस्या, सत्य, इन्द्रियदमन, मनोनिग्रह, श्रद्धा, दया, तितिक्षा और यज्ञ विष्णुके शरीर हैं॥ ४१॥"},{"id":"10.4.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/42/","page":150,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स हि सर्वसुराध्यक्षो ह्यसुरद्विड् गुहाशयः।","तन्मूला देवताः सर्वाः सेश्‍वराः सचतुर्मुखाः।","अयं वै तद्वधोपायो यदृषीणां विहिंसनम्॥ ४२"],"iast":["sa hi sarvasurādhyakṣo hyasuradviḍ guhāśayaḥ|","tanmūlā devatāḥ sarvāḥ seśvarāḥ sacaturmukhāḥ|","ayaṃ vai tadvadhopāyo yadṛṣīṇāṃ vihiṃsanam|| 42"],"meaning":"वह विष्णु ही सारे देवताओंका स्वामी तथा असुरोंका प्रधान द्वेषी है। परन्तु वह किसी गुफामें छिपा रहता है। महादेव, ब्रह्मा और सारे देवताओंकी जड़ वही है। उसको मार डालनेका उपाय यह है कि ऋषियोंको मार डाला जाय’॥ ४२॥"},{"id":"10.4.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/43/","page":150,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं दुर्मन्त्रिभिः कंसः सह सम्मन्त्र्य दुर्मतिः।","ब्रह्महिंसां हितं मेने कालपाशावृतोऽसुरः॥ ४३"],"iast":["evaṃ durmantribhiḥ kaṃsaḥ saha sammantrya durmatiḥ|","brahmahiṃsāṃ hitaṃ mene kālapāśāvṛto'suraḥ|| 43"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक तो कंसकी बुद्धि स्वयं ही बिगड़ी हुई थी; फिर उसे मन्त्री ऐसे मिले थे, जो उससे भी बढ़कर दुष्ट थे। इस प्रकार उनसे सलाह करके कालके फंदेमें फँसे हुए असुर कंसने यही ठीक समझा कि ब्राह्मणोंको ही मार डाला जाय॥ ४३॥"},{"id":"10.4.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/44/","page":150,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सन्दिश्य साधुलोकस्य कदने कदनप्रियान्।","कामरूपधरान् दिक्षु दानवान् गृहमाविशत्॥ ४४"],"iast":["sandiśya sādhulokasya kadane kadanapriyān|","kāmarūpadharān dikṣu dānavān gṛhamāviśat|| 44"],"meaning":"उसने हिंसाप्रेमी राक्षसोंको संतपुरुषोंकी हिंसा करनेका आदेश दे दिया। वे इच्छानुसार रूप धारण कर सकते थे। जब वे इधर-उधर चले गये, तब कंसने अपने महलमें प्रवेश किया॥ ४४॥"},{"id":"10.4.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/45/","page":150,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ते वै रजःप्रकृतयस्तमसा मूढचेतसः।","सतां विद्वेषमाचेरुरारादागतमृत्यवः॥ ४५"],"iast":["te vai rajaḥprakṛtayastamasā mūḍhacetasaḥ|","satāṃ vidveṣamācerurārādāgatamṛtyavaḥ|| 45"],"meaning":"उन असुरोंकी प्रकृति थी रजोगुणी। तमोगुणके कारण उनका चित्त उचित और अनुचितके विवेकसे रहित हो गया था। उनके सिरपर मौत नाच रही थी। यही कारण है कि उन्होंने सन्तोंसे द्वेष किया॥ ४५॥"},{"id":"10.4.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/46/","page":150,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च।","हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः॥ ४६"],"iast":["āyuḥ śriyaṃ yaśo dharmaṃ lokānāśiṣa eva ca|","hanti śreyāṃsi sarvāṇi puṃso mahadatikramaḥ|| 46"],"meaning":"परीक्षित्! जो लोग महान् सन्त पुरुषोंका अनादर करते हैं, उनका वह कुकर्म उनकी आयु, लक्ष्मी, कीर्ति, धर्म, लोक-परलोक, विषय-भोग और सब-के-सब कल्याणके साधनोंको नष्ट कर देता है॥ ४६॥"}],"text":[{"b":27479,"kind":"adhyaya_heading","page":145,"text":"अथ चतुर्थोऽध्यायः"},{"b":27480,"kind":"topic_heading","page":145,"text":"कंसके हाथसे छूटकर योगमायाका आकाशमें जाकर भविष्यवाणी करना"},{"b":27481,"kind":"topic_heading","page":145,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27482,"kind":"sanskrit_shloka","page":145,"verses":["10.4.1"],"text":"बहिरन्तःपुरद्वारः सर्वाः पूर्ववदावृताः।"},{"b":27483,"kind":"sanskrit_shloka","page":145,"verses":["10.4.1"],"text":"ततो बालध्वनिं श्रुत्वा गृहपालाः समुत्थिताः॥ १"},{"b":27484,"kind":"sanskrit_shloka","page":145,"verses":["10.4.2"],"text":"ते तु तूर्णमुपव्रज्य देवक्या गर्भजन्म तत्।"},{"b":27485,"kind":"sanskrit_shloka","page":145,"verses":["10.4.2"],"text":"आचख्युर्भोजराजाय यदुद्वि‌ग्‍नः प्रतीक्षते॥ २"},{"b":27486,"kind":"sanskrit_shloka","page":145,"verses":["10.4.3"],"text":"स तल्पात् तूर्णमुत्थाय कालोऽयमिति विह्वलः।"},{"b":27487,"kind":"sanskrit_shloka","page":145,"verses":["10.4.3"],"text":"सूतीगृहमगात् तूर्णं प्रस्खलन् मुक्तमूर्धजः॥ ३"},{"b":27488,"kind":"sanskrit_shloka","page":145,"verses":["10.4.4"],"text":"तमाह भ्रातरं देवी कृपणा करुणं सती।"},{"b":27489,"kind":"sanskrit_shloka","page":145,"verses":["10.4.4"],"text":"स्नुषेयं तव कल्याण स्त्रियं मा हन्तुमर्हसि॥ ४"},{"b":27490,"kind":"hindi_commentary","page":145,"explains":["10.4.1","10.4.2","10.4.3","10.4.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेवजी लौट आये, तब नगरके बाहरी और भीतरी सब दरवाजे अपने-आप ही पहलेकी तरह बंद हो गये। इसके बाद नवजात शिशुके रोनेकी ध्वनि सुनकर द्वारपालोंकी नींद टूटी॥ १॥ वे तुरन्त भोजराज कंसके पास गये और देवकीको सन्तान होनेकी बात कही। कंस तो बड़ी आकुलता और घबराहटके साथ इसी बातकी प्रतीक्षा कर रहा था॥ २॥ द्वारपालोंकी बात सुनते ही वह झटपट पलँगसे उठ खड़ा हुआ और बड़ी शीघ्रतासे सूतिकागृहकी ओर झपटा। इस बार तो मेरे कालका ही जन्म हुआ है, यह सोचकर वह विह्वल हो रहा था और यही कारण है कि उसे इस बातका भी ध्यान न रहा कि उसके बाल बिखरे हुए हैं। रास्तेमें कई जगह वह लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बचा॥ ३॥ बंदीगृहमें पहुँचनेपर सती देवकीने बड़े दुःख और करुणाके साथ अपने भाई कंससे कहा—‘मेरे हितैषी भाई! यह कन्या तो तुम्हारी पुत्रवधूके समान है। स्त्रीजातिकी है; तुम्हें स्त्रीकी हत्या कदापि नहीं करनी चाहिये॥ ४॥"},{"b":27491,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.5"],"text":"बहवो हिंसिता भ्रातः शिशवः पावकोपमाः।"},{"b":27492,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.5"],"text":"त्वया दैवनिसृष्टेन पुत्रिकैका प्रदीयताम्॥ ५"},{"b":27493,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.6"],"text":"नन्वहं ते ह्यवरजा दीना हतसुता प्रभो।"},{"b":27494,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.6"],"text":"दातुमर्हसि मन्दाया अंगेमां चरमां प्रजाम्॥ ६"},{"b":27495,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"explains":["10.4.5","10.4.6"],"text":"भैया! तुमने दैववश मेरे बहुत-से अग्‍निके समान तेजस्वी बालक मार डाले। अब केवल यही एक कन्या बची है, इसे तो मुझे दे दो॥ ५॥ अवश्य ही मैं तुम्हारी छोटी बहिन हूँ। मेरे बहुत-से बच्चे मर गये हैं, इसलिये मैं अत्यन्त दीन हूँ। मेरे प्यारे और समर्थ भाई! तुम मुझ मन्दभागिनीको यह अन्तिम सन्तान अवश्य दे दो’॥ ६॥"},{"b":27496,"kind":"topic_heading","page":145,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27497,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.7"],"text":"उपगुह्यात्मजामेवं रुदत्या दीनदीनवत्।"},{"b":27498,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.7"],"text":"याचितस्तां विनिर्भर्त्स्य हस्तादाचिच्छिदे खलः॥ ७"},{"b":27499,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.8"],"text":"तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसुः सुताम्।"},{"b":27500,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.8"],"text":"अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृदः॥ ८"},{"b":27501,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.9"],"text":"सा तद्धस्तात् समुत्पत्य सद्यो देव्यम्बरं गता।"},{"b":27502,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.9"],"text":"अदृश्यतानुजा विष्णोः सायुधाष्टमहाभुजा॥ ९"},{"b":27503,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.10"],"text":"दिव्यस्रगम्बरालेपरत्‍नाभरणभूषिता ।"},{"b":27504,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.10"],"text":"धनुःशूलेषुचर्मासिशंखचक्रगदाधरा ॥ १०"},{"b":27505,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.11"],"text":"सिद्धचारणगन्धर्वैरप्सरःकिन्‍नरोरगैः ।"},{"b":27506,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.11"],"text":"उपाहृतोरुबलिभिः स्तूयमानेदमब्रवीत्॥ ११"},{"b":27507,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.12"],"text":"किं मया हतया मन्द जातः खलु तवान्तकृत्।"},{"b":27508,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.12"],"text":"यत्र क्व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसीः कृपणान् वृथा॥ १२"},{"b":27509,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.13"],"text":"इति प्रभाष्य तं देवी माया भगवती भुवि।"},{"b":27510,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.13"],"text":"बहुनामनिकेतेषु बहुनामा बभूव ह॥ १३"},{"b":27511,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"explains":["10.4.7","10.4.8","10.4.9","10.4.10","10.4.11","10.4.12","10.4.13"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कन्याको अपनी गोदमें छिपाकर देवकीजीने अत्यन्त दीनताके साथ रोते-रोते याचना की। परन्तु कंस बड़ा दुष्ट था। उसने देवकीजीको झिड़ककर उनके हाथसे वह कन्या छीन ली॥ ७॥ अपनी उस नन्हीं-सी नवजात भानजीके पैर पकड़कर कंसने उसे बड़े जोरसे एक चट्टानपर दे मारा। स्वार्थने उसके हृदयसे सौहार्दको समूल उखाड़ फेंका था॥ ८॥ परन्तु श्रीकृष्णकी वह छोटी बहिन साधारण कन्या तो थी नहीं, देवी थी; उसके हाथसे छूटकर तुरन्त आकाशमें चली गयी और अपने बड़े-बड़े आठ हाथोंमें आयुध लिये हुए दीख पड़ी॥ ९॥ वह दिव्य माला, वस्त्र, चन्दन और मणिमय आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके हाथोंमें धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा—ये आठ आयुध थे॥ १०॥ सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, किन्‍नर और नागगण बहुत-सी भेंटकी सामग्री समर्पित करके उसकी स्तुति कर रहे थे । उस समय देवीने कंससे यह कहा—॥ ११॥ ‘रे मूर्ख! मुझे मारनेसे तुझे क्या मिलेगा? तेरे पूर्वजन्मका शत्रु तुझे मारनेके लिये किसी स्थानपर पैदा हो चुका है। अब तू व्यर्थ निर्दोष बालकोंकी हत्या न किया कर’॥ १२॥ कंससे इस प्रकार कहकर भगवती योगमाया वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं और पृथ्वीके अनेक स्थानोंमें विभिन्‍न नामोंसे प्रसिद्ध हुईं॥ १३॥"},{"b":27512,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.14"],"text":"तयाभिहितमाकर्ण्य कंसः परमविस्मितः।"},{"b":27513,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"verses":["10.4.14"],"text":"देवकीं वसुदेवं च विमुच्य प्रश्रितोऽब्रवीत्॥ १४"},{"b":27514,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.15"],"text":"अहो भगिन्यहो भाम मया वां बत पाप्मना।"},{"b":27515,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.15"],"text":"पुरुषाद इवापत्यं बहवो हिंसिताः सुताः॥ १५"},{"b":27516,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.16"],"text":"स त्वहं त्यक्तकारुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहृत् खलः।"},{"b":27517,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.16"],"text":"काँल्लोकान् वै गमिष्यामि ब्रह्महेव मृतः श्‍वसन्॥ १६"},{"b":27518,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.17"],"text":"दैवमप्यनृतं वक्ति न मर्त्या एव केवलम्।"},{"b":27519,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.17"],"text":"यद्विश्रम्भादहं पापः स्वसुर्निहतवाञ्छिशून्॥ १७"},{"b":27520,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.18"],"text":"मा शोचतं महाभागावात्मजान् स्वकृतम्भुजः।"},{"b":27521,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.18"],"text":"जन्तवो न सदैकत्र दैवाधीनास्तदासते॥ १८"},{"b":27522,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.19"],"text":"भुवि भौमानि भूतानि यथा यान्त्यपयान्ति च।"},{"b":27523,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.19"],"text":"नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भूः॥ १९"},{"b":27524,"kind":"sanskrit_shloka","page":146,"explains":["10.4.14","10.4.15","10.4.16","10.4.17","10.4.18","10.4.19"],"text":"देवीकी यह बात सुनकर कंसको असीम आश्‍चर्य हुआ। उसने उसी समय देवकी और वसुदेवको कैदसे छोड़ दिया और बड़ी नम्रतासे उनसे कहा—॥ १४॥ ‘मेरी प्यारी बहिन और बहनोईजी! हाय-हाय, मैं बड़ा पापी हूँ । राक्षस जैसे अपने ही बच्चोंको मार डालता है, वैसे ही मैंने तुम्हारे बहुत-से लड़के मार डाले। इस बातका मुझे बड़ा खेद है॥ १५॥ मैं इतना दुष्ट हूँ कि करुणाका तो मुझमें लेश भी नहीं है । मैंने अपने भाई-बन्धु और हितैषियोंतकका त्याग कर दिया। पता नहीं, अब मुझे किस नरकमें जाना पड़ेगा। वास्तवमें तो मैं ब्रह्मघातीके समान जीवित होनेपर भी मुर्दा ही हूँ॥ १६॥ केवल मनुष्य ही झूठ नहीं बोलते, विधाता भी झूठ बोलते हैं । उसीपर विश्‍वास करके मैंने अपनी बहिनके बच्चे मार डाले। ओह! मैं कितना पापी हूँ॥ १७॥ तुम दोनों महात्मा हो। अपने पुत्रोंके लिये शोक मत करो। उन्हें तो अपने कर्मका ही फल मिला है। सभी प्राणी प्रारब्धके अधीन हैं। इसीसे वे सदा-सर्वदा एक साथ नहीं रह सकते॥ १८॥ जैसे मिट्टीके बने हुए पदार्थ बनते और बिगड़ते रहते हैं, परन्तु मिट्टीमें कोई अदल-बदल नहीं होती—वैसे ही शरीरका तो बनना-बिगड़ना होता ही रहता है; परन्तु आत्मापर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता॥ १९॥"},{"b":27525,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.20"],"text":"यथानेवंविदो भेदो यत आत्मविपर्ययः।"},{"b":27526,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.20"],"text":"देहयोगवियोगौ च संसृतिर्न निवर्तते॥ २०"},{"b":27527,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.21"],"text":"तस्माद् भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि।"},{"b":27528,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.21"],"text":"मानुशोच यतः सर्वः स्वकृतं विन्दतेऽवशः॥ २१"},{"b":27529,"kind":"hindi_commentary","page":147,"verses":["10.4.22"],"text":"यावद्धतोऽस्मि हन्तास्मीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वदृक् ।"},{"b":27530,"kind":"sanskrit_shloka","page":147,"verses":["10.4.22"],"text":"तावत्तदभिमान्यज्ञो बाध्यबाधकतामियात्॥ २२"},{"b":27531,"kind":"hindi_commentary","page":148,"verses":["10.4.23"],"text":"क्षमध्वं मम दौरात्म्यं साधवो दीनवत्सलाः।"},{"b":27532,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.23"],"text":"इत्युक्त्वाश्रुमुखः पादौ श्यालः स्वस्रोरथाग्रहीत्॥ २३"},{"b":27533,"kind":"hindi_commentary","page":148,"verses":["10.4.24"],"text":"मोचयामास निगडाद् विश्रब्धः कन्यकागिरा।"},{"b":27534,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.24"],"text":"देवकीं वसुदेवं च दर्शयन्‍नात्मसौहृदम्॥ २४"},{"b":27535,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.25"],"text":"भ्रातुः समनुतप्तस्य क्षान्त्वा रोषं च देवकी।"},{"b":27536,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.25"],"text":"व्यसृजद् वसुदेवश्‍च प्रहस्य तमुवाच ह॥ २५"},{"b":27537,"kind":"hindi_commentary","page":148,"verses":["10.4.26"],"text":"एवमेतन्महाभाग यथा वदसि देहिनाम्।"},{"b":27538,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.26"],"text":"अज्ञानप्रभवाहंधीः स्वपरेति भिदा यतः॥ २६"},{"b":27539,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.27"],"text":"शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विताः ।"},{"b":27540,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.27"],"text":"मिथो घ्नन्तं न पश्यन्ति भावैर्भावं पृथग्दृशः॥ २७"},{"b":27541,"kind":"hindi_translation","page":147,"explains":["10.4.20","10.4.21","10.4.22","10.4.23","10.4.24","10.4.25","10.4.26","10.4.27"],"text":"जो लोग इस तत्त्वको नहीं जानते, वे इस अनात्मा शरीरको ही आत्मा मान बैठते हैं। यही उलटी बुद्धि अथवा अज्ञान है। इसीके कारण जन्म और मृत्यु होते हैं। और जबतक यह अज्ञान नहीं मिटता, तबतक सुख-दुःखरूप संसारसे छुटकारा नहीं मिलता॥ २०॥ मेरी प्यारी बहिन! यद्यपि मैंने तुम्हारे पुत्रोंको मार डाला है, फिर भी तुम उनके लिये शोक न करो। क्योंकि सभी प्राणियोंको विवश होकर अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है॥ २१॥ अपने स्वरूपको न जाननेके कारण जीव जबतक यह मानता रहता है कि ‘मैं मारनेवाला हूँ या मारा जाता हूँ’, तबतक शरीरके जन्म और मृत्युका अभिमान करनेवाला वह अज्ञानी बाध्य और बाधक-भावको प्राप्त होता है। अर्थात् वह दूसरोंको दुःख देता है और स्वयं दुःख भोगता है॥ २२॥ मेरी यह दुष्टता तुम दोनों क्षमा करो; क्योंकि तुम बड़े ही साधुस्वभाव और दीनोंके रक्षक हो।’ ऐसा कहकर कंसने अपनी बहिन देवकी और वसुदेवजीके चरण पकड़ लिये। उसकी आँखोंसे आँसू बह-बहकर मुँहतक आ रहे थे॥ २३॥ इसके बाद उसने योगमायाके वचनोंपर विश्‍वास करके देवकी और वसुदेवको कैदसे छोड़ दिया और वह तरह-तरहसे उनके प्रति अपना प्रेम प्रकट करने लगा॥ २४॥ जब देवकीजीने देखा कि भाई कंसको पश्‍चात्ताप हो रहा है, तब उन्होंने उसे क्षमा कर दिया। वे उसके पहले अपराधोंको भूल गयीं और वसुदेवजीने हँसकर कंससे कहा—॥ २५॥ ‘मनस्वी कंस! आप जो कहते हैं, वह ठीक वैसा ही है। जीव अज्ञानके कारण ही शरीर आदिको ‘मैं’ मान बैठते हैं। इसीसे अपने परायेका भेद हो जाता है॥ २६॥ और यह भेददृष्टि हो जानेपर तो वे शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह और मदसे अन्धे हो जाते हैं। फिर तो उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि सबके प्रेरक भगवान् ही एक भावसे दूसरे भावका, एक वस्तुसे दूसरी वस्तुका नाश करा रहे हैं’॥ २७॥"},{"b":27542,"kind":"topic_heading","page":148,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27543,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.28"],"text":"कंस एवं प्रसन्‍नाभ्यां विशुद्धं प्रतिभाषितः।"},{"b":27544,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.28"],"text":"देवकीवसुदेवाभ्यामनुज्ञातोऽविशद् गृहम्॥ २८"},{"b":27545,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.29"],"text":"तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां कंस आहूय मन्त्रिणः।"},{"b":27546,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.29"],"text":"तेभ्य आचष्ट तत् सर्वं यदुक्तं योगनिद्रया॥ २९"},{"b":27547,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.30"],"text":"आकर्ण्य भर्तुर्गदितं तमूचुर्देवशत्रवः।"},{"b":27548,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.30"],"text":"देवान् प्रति कृतामर्षा दैतेया नातिकोविदाः॥ ३०"},{"b":27549,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.31"],"text":"एवं चेत्तर्हि भोजेन्द्र पुरग्रामव्रजादिषु।"},{"b":27550,"kind":"sanskrit_shloka","page":148,"verses":["10.4.31"],"text":"अनिर्दशान् निर्दशांश्‍च हनिष्यामोऽद्य वै शिशून्॥ ३१"},{"b":27551,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.32"],"text":"किमुद्यमैः करिष्यन्ति देवाः समरभीरवः।"},{"b":27552,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.32"],"text":"नित्यमुद्वि‌ग्‍नमनसो ज्याघोषैर्धनुषस्तव॥ ३२"},{"b":27553,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.33"],"text":"अस्यतस्ते शरव्रातैर्हन्यमानाः समन्ततः।"},{"b":27554,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.33"],"text":"जिजीविषव उत्सृज्य पलायनपरा ययुः॥ ३३"},{"b":27555,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.34"],"text":"केचित् प्रांजलयो दीना न्यस्तशस्त्रा दिवौकसः।"},{"b":27556,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.34"],"text":"मुक्तकच्छशिखाः केचिद् भीताः स्म इति वादिनः॥ ३४"},{"b":27557,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.35"],"text":"न त्वं विस्मृतशस्त्रास्त्रान् विरथान् भयसंवृतान्।"},{"b":27558,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.35"],"text":"हंस्यन्यासक्तविमुखान् भ‌ग्‍नचापानयुध्यतः॥ ३५"},{"b":27559,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.36"],"text":"किं क्षेमशूरैर्विबुधैरसंयुगविकत्थनैः।"},{"b":27560,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.36"],"text":"रहोजुषा किं हरिणा शम्भुना वा वनौकसा।"},{"b":27561,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.36"],"text":"किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण ब्रह्मणा वा तपस्यता॥ ३६"},{"b":27562,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.37"],"text":"तथापि देवाः सापत्‍न्यान्‍नोपेक्ष्या इति मन्महे।"},{"b":27563,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.37"],"text":"ततस्तन्मूलखनने नियुङ्क्ष्वास्माननुव्रतान्॥ ३७"},{"b":27564,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.38"],"text":"यथाऽऽमयोऽङ्गे समुपेक्षितो नृभि-"},{"b":27565,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.38"],"text":"र्न शक्यते रूढपदश्‍चिकित्सितुम्।"},{"b":27566,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.38"],"text":"यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा"},{"b":27567,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.38"],"text":"रिपुर्महान् बद्धबलो न चाल्यते॥ ३८"},{"b":27568,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.39"],"text":"मूलं हि विष्णुर्देवानां यत्र धर्मः सनातनः।"},{"b":27569,"kind":"sanskrit_shloka","page":149,"verses":["10.4.39"],"text":"तस्य च ब्रह्म गोविप्रास्तपो यज्ञाः सदक्षिणाः॥ ३९"},{"b":27570,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.40"],"text":"तस्मात् सर्वात्मना राजन् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः।"},{"b":27571,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.40"],"text":"तपस्विनो यज्ञशीलान् गाश्‍च हन्मो हविर्दुघाः॥ ४०"},{"b":27572,"kind":"hindi_commentary","page":150,"verses":["10.4.41"],"text":"विप्रा गावश्‍च वेदाश्‍च तपः सत्यं दमः शमः।"},{"b":27573,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.41"],"text":"श्रद्धा दया तितिक्षा च क्रतवश्‍च हरेस्तनूः॥ ४१"},{"b":27574,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.42"],"text":"स हि सर्वसुराध्यक्षो ह्यसुरद्विड् गुहाशयः।"},{"b":27575,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.42"],"text":"तन्मूला देवताः सर्वाः सेश्‍वराः सचतुर्मुखाः।"},{"b":27576,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.42"],"text":"अयं वै तद्वधोपायो यदृषीणां विहिंसनम्॥ ४२"},{"b":27577,"kind":"hindi_commentary","page":148,"explains":["10.4.28","10.4.29","10.4.30","10.4.31","10.4.32","10.4.33","10.4.34","10.4.35","10.4.36","10.4.37","10.4.38","10.4.39","10.4.40","10.4.41","10.4.42"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब वसुदेव और देवकीने इस प्रकार प्रसन्‍न होकर निष्कपटभावसे कंसके साथ बातचीत की, तब उनसे अनुमति लेकर वह अपने महलमें चला गया॥ २८॥ वह रात्रि बीत जानेपर कंसने अपने मन्त्रियोंको बुलाया और योगमायाने जो कुछ कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया॥ २९॥ कंसके मन्त्री पूर्णतया नीतिनिपुण नहीं थे। दैत्य होनेके कारण स्वभावसे ही वे देवताओंके प्रति शत्रुताका भाव रखते थे। अपने स्वामी कंसकी बात सुनकर वे देवताओंपर और भी चिढ़ गये और कंससे कहने लगे—॥ ३०॥ ‘भोजराज! यदि ऐसी बात है तो हम आज ही बड़े-बड़े नगरोंमें, छोटे-छोटे गाँवोंमें, अहीरोंकी बस्तियोंमें और दूसरे स्थानोंमें जितने बच्चे हुए हैं, वे चाहे दस दिनसे अधिकके हों या कमके, सबको आज ही मार डालेंगे॥ ३१॥ समरभीरु देवगण युद्धोद्योग करके ही क्या करेंगे? वे तो आपके धनुषकी टंकार सुनकर ही सदा-सर्वदा घबराये रहते हैं॥ ३२॥ जिस समय युद्धभूमिमें आप चोट-पर-चोट करने लगते हैं, बाण-वर्षासे घायल होकर अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये समरांगण छोड़कर देवतालोग पलायन-परायण होकर इधर-उधर भाग जाते हैं॥ ३३॥ कुछ देवता तो अपने अस्त्र-शस्त्र जमीनपर डाल देते हैं और हाथ जोड़कर आपके सामने अपनी दीनता प्रकट करने लगते हैं। कोई-कोई अपनी चोटीके बाल तथा कच्छ खोलकर आपकी शरणमें आकर कहते हैं कि—‘हम भयभीत हैं, हमारी रक्षा कीजिये’॥ ३४॥ आप उन शत्रुओंको नहीं मारते जो अस्त्र-शस्त्र भूल गये हों, जिनका रथ टूट गया हो, जो डर गये हों, जो लोग युद्ध छोड़कर अन्यमनस्क हो गये हों, जिनका धनुष टूट गया हो या जिन्होंने युद्धसे अपना मुख मोड़ लिया हो—उन्हें भी आप नहीं मारते॥ ३५॥ देवता तो बस वहीं वीर बनते हैं, जहाँ कोई लड़ाई-झगड़ा न हो। रणभूमिके बाहर वे बड़ी-बड़ी डींग हाँकते हैं। उनसे तथा एकान्तवासी विष्णु, वनवासी शंकर, अल्पवीर्य इन्द्र और तपस्वी ब्रह्मासे भी हमें क्या भय हो सकता है॥ ३६॥ फिर भी देवताओंकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये—ऐसी हमारी राय है। क्योंकि हैं तो वे शत्रु ही। इसलिये उनकी जड़ उखाड़ फेंकनेके लिये आप हम-जैसे विश्‍वासपात्र सेवकोंको नियुक्त कर दीजिये॥ ३७॥ जब मनुष्यके शरीरमें रोग हो जाता है और उसकी चिकित्सा नहीं की जाती—उपेक्षा कर दी जाती है, तब रोग अपनी जड़ जमा लेता है और फिर वह असाध्य हो जाता है। अथवा जैसे इन्द्रियोंकी उपेक्षा कर देनेपर उनका दमन असम्भव हो जाता है, वैसे ही यदि पहले शत्रुकी उपेक्षा कर दी जाय और वह अपना पाँव जमा ले, तो फिर उसको हराना कठिन हो जाता है॥ ३८॥ देवताओंकी जड़ है विष्णु और वह वहाँ रहता है, जहाँ सनातनधर्म है। सनातनधर्मकी जड़ हैं—वेद, गौ, ब्राह्मण, तपस्या और वे यज्ञ, जिनमें दक्षिणा दी जाती है॥ ३९॥ इसलिये भोजराज! हमलोग वेदवादी ब्राह्मण, तपस्वी, याज्ञिक और यज्ञके लिये घी आदि हविष्य पदार्थ देनेवाली गायोंका पूर्णरूपसे नाश कर डालेंगे॥ ४०॥ ब्राह्मण, गौ, वेद, तपस्या, सत्य, इन्द्रियदमन, मनोनिग्रह, श्रद्धा, दया, तितिक्षा और यज्ञ विष्णुके शरीर हैं॥ ४१॥ वह विष्णु ही सारे देवताओंका स्वामी तथा असुरोंका प्रधान द्वेषी है। परन्तु वह किसी गुफामें छिपा रहता है। महादेव, ब्रह्मा और सारे देवताओंकी जड़ वही है। उसको मार डालनेका उपाय यह है कि ऋषियोंको मार डाला जाय’॥ ४२॥"},{"b":27578,"kind":"topic_heading","page":148,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27579,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.43"],"text":"एवं दुर्मन्त्रिभिः कंसः सह सम्मन्त्र्य दुर्मतिः।"},{"b":27580,"kind":"hindi_commentary","page":150,"verses":["10.4.43"],"text":"ब्रह्महिंसां हितं मेने कालपाशावृतोऽसुरः॥ ४३"},{"b":27581,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.44"],"text":"सन्दिश्य साधुलोकस्य कदने कदनप्रियान्।"},{"b":27582,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.44"],"text":"कामरूपधरान् दिक्षु दानवान् गृहमाविशत्॥ ४४"},{"b":27583,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.45"],"text":"ते वै रजःप्रकृतयस्तमसा मूढचेतसः।"},{"b":27584,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.45"],"text":"सतां विद्वेषमाचेरुरारादागतमृत्यवः॥ ४५"},{"b":27585,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.46"],"text":"आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च।"},{"b":27586,"kind":"sanskrit_shloka","page":150,"verses":["10.4.46"],"text":"हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः॥ ४६"},{"b":27587,"kind":"hindi_commentary","page":150,"explains":["10.4.43","10.4.44","10.4.45","10.4.46"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक तो कंसकी बुद्धि स्वयं ही बिगड़ी हुई थी; फिर उसे मन्त्री ऐसे मिले थे, जो उससे भी बढ़कर दुष्ट थे। इस प्रकार उनसे सलाह करके कालके फंदेमें फँसे हुए असुर कंसने यही ठीक समझा कि ब्राह्मणोंको ही मार डाला जाय॥ ४३॥ उसने हिंसाप्रेमी राक्षसोंको संतपुरुषोंकी हिंसा करनेका आदेश दे दिया। वे इच्छानुसार रूप धारण कर सकते थे। जब वे इधर-उधर चले गये, तब कंसने अपने महलमें प्रवेश किया॥ ४४॥ उन असुरोंकी प्रकृति थी रजोगुणी। तमोगुणके कारण उनका चित्त उचित और अनुचितके विवेकसे रहित हो गया था। उनके सिरपर मौत नाच रही थी। यही कारण है कि उन्होंने सन्तोंसे द्वेष किया॥ ४५॥ परीक्षित्! जो लोग महान् सन्त पुरुषोंका अनादर करते हैं, उनका वह कुकर्म उनकी आयु, लक्ष्मी, कीर्ति, धर्म, लोक-परलोक, विषय-भोग और सब-के-सब कल्याणके साधनोंको नष्ट कर देता है॥ ४६॥"},{"b":27588,"kind":"hindi_translation","page":150,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥"}],"notes":[{"id":"v2:182","mark":"*","page":147,"after_verse":"10.4.19","text":"जिनके गर्भमें भगवान्‌ने निवास किया, जिन्हें भगवान्‌के दर्शन हुए, उन देवकी-वसुदेवके दर्शनका ही यह फल है कि कंसके हृदयमें विनय, विचार, उदारता आदि सद्गुणोंका उदय हो गया। परन्तु जबतक वह उनके सामने रहा तभीतक ये सद्गुण रहे। दुष्ट मन्त्रियोंके बीचमें जाते ही वह फिर ज्यों-का-त्यों हो 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