{"id":"10.33","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 33","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः","topics":["महारास"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.33.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[331,338]},"verses":[{"id":"10.33.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/1/","page":331,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थं भगवतो गोप्यः श्रुत्वा वाचः सुपेशलाः।","जहुर्विरहजं तापं तदङ्गोपचिताशिषः॥ १"],"iast":["itthaṃ bhagavato gopyaḥ śrutvā vācaḥ supeśalāḥ|","jahurvirahajaṃ tāpaṃ tadaṅgopacitāśiṣaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! गोपियाँ भगवान्‌की इस प्रकार प्रेमभरी सुमधुर वाणी सुनकर जो कुछ विरहजन्य ताप शेष था, उससे भी मुक्त हो गयीं और सौन्दर्य-माधुर्यनिधि प्राणप्यारेके अंग-संगसे सफल-मनोरथ हो गयीं॥ १॥"},{"id":"10.33.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/2/","page":331,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रारभत गोविन्दो रासक्रीडामनुव्रतैः।","स्त्रीरत्‍नैरन्वितः प्रीतैरन्योन्याबद्धबाहुभिः॥ २"],"iast":["tatrārabhata govindo rāsakrīḍāmanuvrataiḥ|","strīratnairanvitaḥ prītairanyonyābaddhabāhubhiḥ|| 2"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेयसी और सेविका गोपियाँ एक-दूसरेकी बाँह-में-बाँह डाले खड़ी थीं। उन स्त्रीरत्‍नोंके साथ यमुनाजीके पुलिनपर भगवान्‌ने अपनी रसमयी रासक्रीड़ा प्रारम्भ की॥ २॥"},{"id":"10.33.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/3/","page":331,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः।","योगेश्‍वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः।","प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकटं स्त्रियः॥ ३"],"iast":["rāsotsavaḥ sampravṛtto gopīmaṇḍalamaṇḍitaḥ|","yogeśvareṇa kṛṣṇena tāsāṃ madhye dvayordvayoḥ|","praviṣṭena gṛhītānāṃ kaṇṭhe svanikaṭaṃ striyaḥ|| 3"],"meaning":"सम्पूर्ण योगोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियोंके बीचमें प्रकट हो गये और उनके गलेमें अपना हाथ डाल दिया। इस प्रकार एक गोपी और एक श्रीकृष्ण, यही क्रम था। सभी गोपियाँ ऐसा अनुभव करती थीं कि हमारे प्यारे तो हमारे ही पास हैं। इस प्रकार सहस्र-सहस्र गोपियोंसे शोभायमान भगवान् श्रीकृष्णका दिव्य रासोत्सव प्रारम्भ हुआ। उस समय आकाशमें शत-शत विमानोंकी भीड़ लग गयी। सभी देवता अपनी-अपनी पत्‍नियोंके साथ वहाँ आ पहुँचे। रासोत्सवके दर्शनकी लालसासे, उत्सुकतासे उनका मन उनके वशमें नहीं था॥ ३-४॥","meaning_covers":[3,4]},{"id":"10.33.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/4/","page":331,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यं मन्येरन् नभस्तावद् विमानशतसंकुलम।","दिवौकसां सदाराणामौत्सुक्यापहृतात्मनाम्॥ ४"],"iast":["yaṃ manyeran nabhastāvad vimānaśatasaṃkulama|","divaukasāṃ sadārāṇāmautsukyāpahṛtātmanām|| 4"],"meaning":"सम्पूर्ण योगोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियोंके बीचमें प्रकट हो गये और उनके गलेमें अपना हाथ डाल दिया। इस प्रकार एक गोपी और एक श्रीकृष्ण, यही क्रम था। सभी गोपियाँ ऐसा अनुभव करती थीं कि हमारे प्यारे तो हमारे ही पास हैं। इस प्रकार सहस्र-सहस्र गोपियोंसे शोभायमान भगवान् श्रीकृष्णका दिव्य रासोत्सव प्रारम्भ हुआ। उस समय आकाशमें शत-शत विमानोंकी भीड़ लग गयी। सभी देवता अपनी-अपनी पत्‍नियोंके साथ वहाँ आ पहुँचे। रासोत्सवके दर्शनकी लालसासे, उत्सुकतासे उनका मन उनके वशमें नहीं था॥ ३-४॥","meaning_covers":[3,4]},{"id":"10.33.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/5/","page":332,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो दुन्दुभयो नेदुर्निपेतुः पुष्पवृष्टयः।","जगुर्गन्धर्वपतयः सस्त्रीकास्तद्यशोऽमलम्॥ ५"],"iast":["tato dundubhayo nedurnipetuḥ puṣpavṛṣṭayaḥ|","jagurgandharvapatayaḥ sastrīkāstadyaśo'malam|| 5"],"meaning":"स्वर्गकी दिव्य दुन्दुभियाँ अपने-आप बज उठीं। स्वर्गीय पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। गन्धर्वगण अपनी-अपनी पत्‍नियोंके साथ भगवान्‌के निर्मल यशका गान करने लगे॥ ५॥"},{"id":"10.33.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/6/","page":332,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वलयानां नूपुराणां किंकिणीनां च योषिताम्।","सप्रियाणामभूच्छब्दस्तुमुलो रासमण्डले॥ ६"],"iast":["valayānāṃ nūpurāṇāṃ kiṃkiṇīnāṃ ca yoṣitām|","sapriyāṇāmabhūcchabdastumulo rāsamaṇḍale|| 6"],"meaning":"रासमण्डलमें सभी गोपियाँ अपने प्रियतम श्यामसुन्दरके साथ नृत्य करने लगीं। उनकी कलाइयोंके कंगन, पैरोंके पायजेब और करधनीके छोटे-छोटे घुँघरू एक साथ बज उठे। असंख्य गोपियाँ थीं, इसलिये यह मधुर ध्वनि भी बड़े ही जोरकी हो रही थी॥ ६॥"},{"id":"10.33.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/7/","page":332,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् देवकीसुतः।","मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा॥ ७"],"iast":["tatrātiśuśubhe tābhirbhagavān devakīsutaḥ|","madhye maṇīnāṃ haimānāṃ mahāmarakato yathā|| 7"],"meaning":"यमुनाजीकी रमणरेतीपर व्रजसुन्दरियोंके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णकी बड़ी अनोखी शोभा हुई। ऐसा जान पड़ता था, मानो अगणित पीली-पीली दमकती हुई सुवर्ण-मणियोंके बीचमें ज्योतिर्मयी नीलमणि चमक रही हो॥ ७॥"},{"id":"10.33.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/8/","page":332,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पादन्यासैर्भुजविधुतिभिः सस्मितैर्भ्रूविलासै-","र्भज्यन्मध्यैश्‍चलकुचपटैः कुण्डलैर्गण्डलोलैः।","स्विद्यन्मुख्यः कबररशनाग्रन्थयः कृष्णवध्वो","गायन्त्यस्तं तडित इव ता मेघचक्रे विरेजुः॥ ८"],"iast":["pādanyāsairbhujavidhutibhiḥ sasmitairbhrūvilāsai-","rbhajyanmadhyaiścalakucapaṭaiḥ kuṇḍalairgaṇḍalolaiḥ|","svidyanmukhyaḥ kabararaśanāgranthayaḥ kṛṣṇavadhvo","gāyantyastaṃ taḍita iva tā meghacakre virejuḥ|| 8"],"meaning":"नृत्यके समय गोपियाँ तरह-तरहसे ठुमुक-ठुमुककर अपने पाँव कभी आगे बढ़ातीं और कभी पीछे हटा लेतीं। कभी गतिके अनुसार धीरे-धीरे पाँव रखतीं, तो कभी बड़े वेगसे; कभी चाककी तरह घूम जातीं, कभी अपने हाथ उठा-उठाकर भाव बतातीं, तो कभी विभिन्‍न प्रकारसे उन्हें चमकातीं। कभी बड़े कलापूर्ण ढंगसे मुसकरातीं, तो कभी भौंहें मटकातीं। नाचते-नाचते उनकी पतली कमर ऐसी लचक जाती थी, मानो टूट गयी हो। झुकने, बैठने, उठने और चलनेकी फुर्तीसे उनके स्तन हिल रहे थे तथा वस्त्र उड़े जा रहे थे। कानोंके कुण्डल हिल-हिलकर कपोलोंपर आ जाते थे। नाचनेके परिश्रमसे उनके मुँहपर पसीनेकी बूँदें झलकने लगी थीं। केशोंकी चोटियाँ कुछ ढीली पड़ गयी थीं। नीवीकी गाँठें खुली जा रही थीं। इस प्रकार नटवर नन्दलालकी परम प्रेयसी गोपियाँ उनके साथ गा-गाकर नाच रही थीं। परीक्षित्! उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो बहुत-से श्रीकृष्ण तो साँवले-साँवले मेघ-मण्डल हैं और उनके बीच-बीचमें चमकती हुई गोरी गोपियाँ बिजली हैं। उनकी शोभा असीम थी॥ ८॥"},{"id":"10.33.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/9/","page":332,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उच्चैर्जगुर्नृत्यमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रियाः।","कृष्णाभिमर्शमुदिता यद्गीतेनेदमावृतम्॥ ९"],"iast":["uccairjagurnṛtyamānā raktakaṇṭhyo ratipriyāḥ|","kṛṣṇābhimarśamuditā yadgītenedamāvṛtam|| 9"],"meaning":"गोपियोंका जीवन भगवान्‌की रति है, प्रेम है। वे श्रीकृष्णसे सटकर नाचते-नाचते ऊँचे स्वरसे मधुर गान कर रही थीं। श्रीकृष्णका संस्पर्श पा-पाकर और भी आनन्दम‌ग्‍न हो रही थीं। उनके राग-रागिनियोंसे पूर्ण गानसे यह सारा जगत् अब भी गूँज रहा है॥ ९॥"},{"id":"10.33.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/10/","page":333,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["काचित् समं मुकुन्देन स्वरजातीरमिश्रिताः।","उन्‍निन्ये पूजिता तेन प्रीयता साधु साध्विति।","तदेव ध्रुवमुन्‍निन्ये तस्यै मानं च बह्वदात्॥ १०"],"iast":["kācit samaṃ mukundena svarajātīramiśritāḥ|","unninye pūjitā tena prīyatā sādhu sādhviti|","tadeva dhruvamunninye tasyai mānaṃ ca bahvadāt|| 10"],"meaning":"कोई गोपी भगवान्‌के साथ—उनके स्वरमें स्वर मिलाकर गा रही थी। वह श्रीकृष्णके स्वरकी अपेक्षा और भी ऊँचे स्वरसे राग अलापने लगी। उसके विलक्षण और उत्तम स्वरको सुनकर वे बहुत ही प्रसन्‍न हुए और वाह-वाह करके उसकी प्रशंसा करने लगे। उसी रागको एक दूसरी सखीने ध्रुपदमें गाया। उसका भी भगवान्‌ने बहुत सम्मान किया॥ १०॥"},{"id":"10.33.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/11/","page":333,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["काचिद् रासपरिश्रान्ता पार्श्‍वस्थस्य गदाभृतः।","जग्राह बाहुना स्कन्धं श्‍लथद्वलयमल्लिका॥ ११"],"iast":["kācid rāsapariśrāntā pārśvasthasya gadābhṛtaḥ|","jagrāha bāhunā skandhaṃ ślathadvalayamallikā|| 11"],"meaning":"एक गोपी नृत्य करते-करते थक गयी। उसकी कलाइयोंसे कंगन और चोटियोंसे बेलाके फूल खिसकने लगे। तब उसने अपने बगलमें ही खड़े मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके कंधेको अपनी बाँहसे कसकर पकड़ लिया॥ ११॥"},{"id":"10.33.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/12/","page":333,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पलसौरभम्।","चन्दनालिप्तमाघ्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह॥ १२"],"iast":["tatraikāṃsagataṃ bāhuṃ kṛṣṇasyotpalasaurabham|","candanāliptamāghrāya hṛṣṭaromā cucumba ha|| 12"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने अपना एक हाथ दूसरी गोपीके कंधेपर रख रखा था। वह स्वभावसे तो कमलके समान सुगन्धसे युक्त था ही, उसपर बड़ा सुगन्धित चन्दनका लेप भी था। उसकी सुगन्धसे वह गोपी पुलकित हो गयी, उसका रोम-रोम खिल उठा। उसने झटसे उसे चूम लिया॥ १२॥"},{"id":"10.33.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/13/","page":333,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कस्याश्‍चिन्‍नाट्यविक्षिप्तकुण्डलत्विषमण्डितम् ।","गण्डं गण्डे सन्दधत्या अदात्ताम्बूलचर्वितम्॥ १३"],"iast":["kasyāścinnāṭyavikṣiptakuṇḍalatviṣamaṇḍitam |","gaṇḍaṃ gaṇḍe sandadhatyā adāttāmbūlacarvitam|| 13"],"meaning":"एक गोपी नृत्य कर रही थी। नाचनेके कारण उसके कुण्डल हिल रहे थे, उनकी छटासे उसके कपोल और भी चमक रहे थे। उसने अपने कपोलोंको भगवान् श्रीकृष्णके कपोलसे सटा दिया और भगवान्‌ने उसके मुँहमें अपना चबाया हुआ पान दे दिया॥ १३॥"},{"id":"10.33.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/14/","page":333,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नृत्यन्ती गायती काचित् कूजन्‍नूपुरमेखला।","पार्श्‍वस्थाच्युतहस्ताब्जं श्रान्ताधात् स्तनयोः शिवम्॥ १४"],"iast":["nṛtyantī gāyatī kācit kūjannūpuramekhalā|","pārśvasthācyutahastābjaṃ śrāntādhāt stanayoḥ śivam|| 14"],"meaning":"कोई गोपी नूपुर और करधनीके घुँघरुओंको झनकारती हुई नाच और गा रही थी। वह जब बहुत थक गयी, तब उसने अपने बगलमें ही खड़े श्यामसुन्दरके शीतल करकमलको अपने दोनों स्तनोंपर रख लिया॥ १४॥"},{"id":"10.33.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/15/","page":333,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यो लब्ध्वाच्युतं कान्तं श्रिय एकान्तवल्लभम्।","गृहीतकण्ठ्यस्तद्दोर्भ्यां गायन्त्यस्तं विजह्रिरे॥ १५"],"iast":["gopyo labdhvācyutaṃ kāntaṃ śriya ekāntavallabham|","gṛhītakaṇṭhyastaddorbhyāṃ gāyantyastaṃ vijahrire|| 15"],"meaning":"परीक्षित्! गोपियोंका सौभाग्य लक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है। लक्ष्मीजीके परम प्रियतम एकान्तवल्लभ भगवान् श्रीकृष्णको अपने परम प्रियतमके रूपमें पाकर गोपियाँ गान करती हुई उनके साथ विहार करने लगीं। भगवान् श्रीकृष्णने उनके गलोंको अपने भुजपाशमें बाँध रखा था, उस समय गोपियोंकी बड़ी अपूर्व शोभा थी॥ १५॥"},{"id":"10.33.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/16/","page":333,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कर्णोत्पलालकविटंककपोलघर्म-","वक्त्रश्रियो वलयनूपुरघोषवाद्यैः।","गोप्यः समं भगवता ननृतुः स्वकेश-","स्रस्तस्रजो भ्रमरगायकरासगोष्ठ्याम्॥ १६"],"iast":["karṇotpalālakaviṭaṃkakapolagharma-","vaktraśriyo valayanūpuraghoṣavādyaiḥ|","gopyaḥ samaṃ bhagavatā nanṛtuḥ svakeśa-","srastasrajo bhramaragāyakarāsagoṣṭhyām|| 16"],"meaning":"उनके कानोंमें कमलके कुण्डल शोभायमान थे। घुँघराली अलकें कपोलोंपर लटक रही थीं। पसीनेकी बूँदें झलकनेसे उनके मुखकी छटा निराली ही हो गयी थी। वे रासमण्डलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ नृत्य कर रही थीं। उनके कंगन और पायजेबोंके बाजे बज रहे थे। भौंरे उनके ताल-सुरमें अपना सुर मिलाकर गा रहे थे। और उनके जूड़ों तथा चोटियोंमें गुँथे हुए फूल गिरते जा रहे थे॥ १६॥"},{"id":"10.33.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/17/","page":334,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं परिष्वङ्गकराभिमर्श-","स्निग्धेक्षणोद्दामविलासहासैः ।","रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभि-","र्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः॥ १७"],"iast":["evaṃ pariṣvaṅgakarābhimarśa-","snigdhekṣaṇoddāmavilāsahāsaiḥ |","reme rameśo vrajasundarībhi-","ryathārbhakaḥ svapratibimbavibhramaḥ|| 17"],"meaning":"परीक्षित्! जैसे नन्हा-सा शिशु निर्विकारभावसे अपनी परछाईंके साथ खेलता है, वैसे ही रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण कभी उन्हें अपने हृदयसे लगा लेते, कभी हाथसे उनका अंगस्पर्श करते, कभी प्रेमभरी तिरछी चितवनसे उनकी ओर देखते तो कभी लीलासे उन्मुक्त हँसी हँसने लगते। इस प्रकार उन्होंने व्रजसुन्दरियोंके साथ क्रीडा की, विहार किया॥ १७॥"},{"id":"10.33.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/18/","page":334,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदङ्गसङ्गप्रमुदाकुलेन्द्रियाः","केशान् दुकूलं कुचपट्टिकां वा।","नाञ्जः प्रतिव्योढुमलं व्रजस्त्रियो","विस्रस्तमालाभरणाः कुरूद्वह॥ १८"],"iast":["tadaṅgasaṅgapramudākulendriyāḥ","keśān dukūlaṃ kucapaṭṭikāṃ vā|","nāñjaḥ prativyoḍhumalaṃ vrajastriyo","visrastamālābharaṇāḥ kurūdvaha|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌के अंगोंका संस्पर्श प्राप्त करके गोपियोंकी इन्द्रियाँ प्रेम और आनन्दसे विह्वल हो गयीं। उनके केश बिखर गये। फूलोंके हार टूट गये और गहने अस्त-व्यस्त हो गये। वे अपने केश, वस्त्र और कंचुकीको भी पूर्णतया सँभालनेमें असमर्थ हो गयीं॥ १८॥"},{"id":"10.33.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/19/","page":334,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णविक्रीडितं वीक्ष्य मुमुहुः खेचरस्त्रियः।","कामार्दिताः शशांकश्‍च सगणो विस्मितोऽभवत्॥ १९"],"iast":["kṛṣṇavikrīḍitaṃ vīkṣya mumuhuḥ khecarastriyaḥ|","kāmārditāḥ śaśāṃkaśca sagaṇo vismito'bhavat|| 19"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णकी यह रासक्रीडा देखकर स्वर्गकी देवांगनाएँ भी मिलनकी कामनासे मोहित हो गयीं और समस्त तारों तथा ग्रहोंके साथ चन्द्रमा चकित, विस्मित हो गये॥ १९॥"},{"id":"10.33.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/20/","page":334,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः।","रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया॥ २०"],"iast":["kṛtvā tāvantamātmānaṃ yāvatīrgopayoṣitaḥ|","reme sa bhagavāṃstābhirātmārāmo'pi līlayā|| 20"],"meaning":"परीक्षित्! यद्यपि भगवान् आत्माराम हैं—उन्हें अपने अतिरिक्त और किसीकी भी आवश्यकता नहीं है—फिर भी उन्होंने जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण किये और खेल-खेलमें उनके साथ इस प्रकार विहार किया॥ २०॥"},{"id":"10.33.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/21/","page":334,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तासामतिविहारेण श्रान्तानां वदनानि सः।","प्रामृजत् करुणः प्रेम्णा शन्तमेनाङ्ग पाणिना॥ २१"],"iast":["tāsāmativihāreṇa śrāntānāṃ vadanāni saḥ|","prāmṛjat karuṇaḥ premṇā śantamenāṅga pāṇinā|| 21"],"meaning":"जब बहुत देरतक गान और नृत्य आदि विहार करनेके कारण गोपियाँ थक गयीं, तब करुणामय भगवान् श्रीकृष्णने बड़े प्रेमसे स्वयं अपने सुखद करकमलोंके द्वारा उनके मुँह पोंछे॥ २१॥"},{"id":"10.33.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/22/","page":334,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यः स्फुरत्पुरटकुण्डलकुन्तलत्विड्-","गण्डश्रिया सुधितहासनिरीक्षणेन।","मानं दधत्य ऋषभस्य जगुः कृतानि","पुण्यानि तत्कररुहस्पर्शप्रमोदाः॥ २२"],"iast":["gopyaḥ sphuratpuraṭakuṇḍalakuntalatviḍ-","gaṇḍaśriyā sudhitahāsanirīkṣaṇena|","mānaṃ dadhatya ṛṣabhasya jaguḥ kṛtāni","puṇyāni tatkararuhasparśapramodāḥ|| 22"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌के करकमल और नखस्पर्शसे गोपियोंको बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने अपने उन कपोलोंके सौन्दर्यसे, जिनपर सोनेके कुण्डल झिलमिला रहे थे और घुँघराली अलकें लटक रही थीं, तथा उस प्रेमभरी चितवनसे, जो सुधासे भी मीठी मुसकानसे उज्ज्वल हो रही थी, भगवान् श्रीकृष्णका सम्मान किया और प्रभुकी परम पवित्र लीलाओंका गान करने लगीं॥ २२॥"},{"id":"10.33.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/23/","page":335,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्गसङ्ग-","घृष्टस्रजः स कुचकुंकुमरंजितायाः।","गन्धर्वपालिभिरनुद्रुत आविशद् वाः","श्रान्तो गजीभिरिभराडिव भिन्‍नसेतुः॥ २३"],"iast":["tābhiryutaḥ śramamapohitumaṅgasaṅga-","ghṛṣṭasrajaḥ sa kucakuṃkumaraṃjitāyāḥ|","gandharvapālibhiranudruta āviśad vāḥ","śrānto gajībhiribharāḍiva bhinnasetuḥ|| 23"],"meaning":"इसके बाद जैसे थका हुआ गजराज किनारोंको तोड़ता हुआ हथिनियोंके साथ जलमें घुसकर क्रीडा करता है, वैसे ही लोक और वेदकी मर्यादाका अतिक्रमण करनेवाले भगवान्‌ने अपनी थकान दूर करनेके लिये गोपियोंके साथ जलक्रीडा करनेके उद्देश्यसे यमुनाके जलमें प्रवेश किया। उस समय भगवान्‌की वनमाला गोपियोंके अंगकी रगड़से कुछ कुचल-सी गयी थी और उनके वक्षःस्थलकी केसरसे वह रँग भी गयी थी। उसके चारों ओर गुनगुनाते हुए भौंरे उनके पीछे-पीछे इस प्रकार चल रहे थे, मानो गन्धर्वराज उनकी कीर्तिका गान करते हुए पीछे-पीछे चल रहे हों॥ २३॥"},{"id":"10.33.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/24/","page":335,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः","प्रेम्णेक्षितः प्रहसतीभिरितस्ततोऽङ्ग।","वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो","रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः॥ २४"],"iast":["so'mbhasyalaṃ yuvatibhiḥ pariṣicyamānaḥ","premṇekṣitaḥ prahasatībhiritastato'ṅga|","vaimānikaiḥ kusumavarṣibhirīḍyamāno","reme svayaṃ svaratiratra gajendralīlaḥ|| 24"],"meaning":"परीक्षित्! यमुनाजलमें गोपियोंने प्रेमभरी चितवनसे भगवान्‌की ओर देख-देखकर तथा हँस-हँसकर उनपर इधर-उधरसे जलकी खूब बौछारें डालीं। जल उलीच-उलीचकर उन्हें खूब नहलाया। विमानोंपर चढ़े हुए देवता पुष्पोंकी वर्षा करके उनकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार यमुनाजलमें स्वयं आत्माराम भगवान् श्रीकृष्णने गजराजके समान जलविहार किया॥ २४॥"},{"id":"10.33.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/25/","page":335,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततश्‍च कृष्णोपवने जलस्थल-","प्रसूनगन्धानिलजुष्टदिक्तटे ।","चचार भृङ्गप्रमदागणावृतो","यथा मदच्युद् द्विरदः करेणुभिः॥ २५"],"iast":["tataśca kṛṣṇopavane jalasthala-","prasūnagandhānilajuṣṭadiktaṭe |","cacāra bhṛṅgapramadāgaṇāvṛto","yathā madacyud dviradaḥ kareṇubhiḥ|| 25"],"meaning":"इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण व्रजयुवतियों और भौंरोंकी भीड़से घिरे हुए यमुनातटके उपवनमें गये। वह बड़ा ही रमणीय था। उसके चारों ओर जल और स्थलमें बड़ी सुन्दर सुगन्धवाले फूल खिले हुए थे। उनकी सुवास लेकर मन्द-मन्द वायु चल रही थी। उसमें भगवान् इस प्रकार विचरण करने लगे, जैसे मदमत्त गजराज हथिनियोंके झुंडके साथ घूम रहा हो॥ २५॥"},{"id":"10.33.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/26/","page":335,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं शशांकांशुविराजिता निशाः","स सत्यकामोऽनुरताबलागणः।","सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरतः","सर्वाः शरत्काव्यकथारसाश्रयाः॥ २६"],"iast":["evaṃ śaśāṃkāṃśuvirājitā niśāḥ","sa satyakāmo'nuratābalāgaṇaḥ|","siṣeva ātmanyavaruddhasaurataḥ","sarvāḥ śaratkāvyakathārasāśrayāḥ|| 26"],"meaning":"परीक्षित्! शरद्की वह रात्रि जिसके रूपमें अनेक रात्रियाँ पुंजीभूत हो गयी थीं, बहुत ही सुन्दर थी। चारों ओर चन्द्रमाकी बड़ी सुन्दर चाँदनी छिटक रही थी। काव्योंमें शरद् ऋतुकी जिन रस-सामग्रियोंका वर्णन मिलता है, उन सभीसे वह युक्त थी। उसमें भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्रेयसी गोपियोंके साथ यमुनाके पुलिन, यमुनाजी और उनके उपवनमें विहार किया। यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि भगवान् सत्यसंकल्प हैं। यह सब उनके चिन्मय संकल्पकी ही चिन्मयी लीला है। और उन्होंने इस लीलामें कामभावको, उसकी चेष्टाओंको तथा उसकी क्रियाको सर्वथा अपने अधीन कर रखा था, उन्हें अपने-आपमें कैद कर रखा था॥ २६॥"},{"id":"10.33.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/27/","page":336,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्य च।","अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्‍वरः॥ २७"],"iast":["saṃsthāpanāya dharmasya praśamāyetarasya ca|","avatīrṇo hi bhagavānaṃśena jagadīśvaraḥ|| 27"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! भगवान् श्रीकृष्ण सारे जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। उन्होंने अपने अंश श्रीबलरामजीके सहित पूर्णरूपमें अवतार ग्रहण किया था। उनके अवतारका उद्देश्य ही यह था कि धर्मकी स्थापना हो और अधर्मका नाश॥ २७॥"},{"id":"10.33.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/28/","page":336,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["स कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्ताभिरक्षिता।","प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम्॥ २८"],"iast":["sa kathaṃ dharmasetūnāṃ vaktā kartābhirakṣitā|","pratīpamācarad brahman paradārābhimarśanam|| 28"],"meaning":"ब्रह्मन्! वे धर्ममर्यादाके बनानेवाले, उपदेश करनेवाले और रक्षक थे। फिर उन्होंने स्वयं धर्मके विपरीत परस्त्रियोंका स्पर्श कैसे किया॥ २८॥"},{"id":"10.33.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/29/","page":336,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["आप्तकामो यदुपतिः कृतवान् वै जुगुप्सितम्।","किमभिप्राय एतं नः संशयं छिन्धि सुव्रत॥ २९"],"iast":["āptakāmo yadupatiḥ kṛtavān vai jugupsitam|","kimabhiprāya etaṃ naḥ saṃśayaṃ chindhi suvrata|| 29"],"meaning":"मैं मानता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम थे, उन्हें किसी भी वस्तुकी कामना नहीं थी, फिर भी उन्होंने किस अभिप्रायसे यह निन्दनीय कर्म किया? परम ब्रह्मचारी मुनीश्‍वर! आप कृपा करके मेरा यह सन्देह मिटाइये॥ २९॥"},{"id":"10.33.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/30/","page":336,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्‍वराणां च साहसम्।","तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा॥ ३०"],"iast":["dharmavyatikramo dṛṣṭa īśvarāṇāṃ ca sāhasam|","tejīyasāṃ na doṣāya vahneḥ sarvabhujo yathā|| 30"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—सूर्य, अग्‍नि आदि ईश्‍वर (समर्थ) कभी-कभी धर्मका उल्लंघन और साहसका काम करते देखे जाते हैं। परंतु उन कामोंसे उन तेजस्वी पुरुषोंको कोई दोष नहीं होता। देखो, अग्‍नि सब कुछ खा जाता है, परन्तु उन पदार्थोंके दोषसे लिप्त नहीं होता॥ ३०॥"},{"id":"10.33.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/31/","page":336,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्‍वरः।","विनश्यत्याचरन् मौढ्याद्यथारुद्रोऽब्धिजं विषम्॥ ३१"],"iast":["naitat samācarejjātu manasāpi hyanīśvaraḥ|","vinaśyatyācaran mauḍhyādyathārudro'bdhijaṃ viṣam|| 31"],"meaning":"जिन लोगोंमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है, उन्हें मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये, शरीरसे करना तो दूर रहा। यदि मूर्खतावश कोई ऐसा काम कर बैठे, तो उसका नाश हो जाता है। भगवान् शंकरने हलाहल विष पी लिया था, दूसरा कोई पिये तो वह जलकर भस्म हो जायगा॥ ३१॥"},{"id":"10.33.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/32/","page":336,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ईश्‍वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्‍वचित्।","तेषां यत् स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्॥ ३२"],"iast":["īśvarāṇāṃ vacaḥ satyaṃ tathaivācaritaṃ kvacit|","teṣāṃ yat svavacoyuktaṃ buddhimāṃstat samācaret|| 32"],"meaning":"इसलिये इस प्रकारके जो शंकर आदि ईश्‍वर हैं, अपने अधिकारके अनुसार उनके वचनको ही सत्य मानना और उसीके अनुसार आचरण करना चाहिये। उनके आचरणका अनुकरण तो कहीं-कहीं ही किया जाता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उनका जो आचरण उनके उपदेशके अनुकूल हो, उसीको जीवनमें उतारे॥ ३२॥"},{"id":"10.33.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/33/","page":337,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कुशलाचरितेनैषामिह स्वार्थो न विद्यते।","विपर्ययेण वानर्थो निरहंकारिणां प्रभो॥ ३३"],"iast":["kuśalācaritenaiṣāmiha svārtho na vidyate|","viparyayeṇa vānartho nirahaṃkāriṇāṃ prabho|| 33"],"meaning":"परीक्षित्! वे सामर्थ्यवान् पुरुष अहंकारहीन होते हैं, शुभकर्म करनेमें उनका कोई सांसारिक स्वार्थ नहीं होता और अशुभ कर्म करनेमें अनर्थ (नुकसान) नहीं होता। वे स्वार्थ और अनर्थसे ऊपर उठे होते हैं॥ ३३॥"},{"id":"10.33.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/34/","page":337,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किमुताखिलसत्त्वानां तिर्यङ्मर्त्यदिवौकसाम्।","ईशितुश्‍चेशितव्यानां कुशलाकुशलान्वयः॥ ३४"],"iast":["kimutākhilasattvānāṃ tiryaṅmartyadivaukasām|","īśituśceśitavyānāṃ kuśalākuśalānvayaḥ|| 34"],"meaning":"जब उन्हींके सम्बन्धमें ऐसी बात है तब जो पशु, पक्षी, मनुष्य, देवता आदि समस्त चराचर जीवोंके एकमात्र प्रभु सर्वेश्‍वर भगवान् हैं, उनके साथ मानवीय शुभ और अशुभका सम्बन्ध कैसे जोड़ा जा सकता है॥ ३४॥"},{"id":"10.33.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/35/","page":337,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत्पादपंकजपरागनिषेवतृप्ता","योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः ।","स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमाना-","स्तस्येच्छयाऽऽत्तवपुषः कुत एव बन्धः॥ ३५"],"iast":["yatpādapaṃkajaparāganiṣevatṛptā","yogaprabhāvavidhutākhilakarmabandhāḥ |","svairaṃ caranti munayo'pi na nahyamānā-","stasyecchayā''ttavapuṣaḥ kuta eva bandhaḥ|| 35"],"meaning":"जिनके चरणकमलोंके रजका सेवन करके भक्तजन तृप्त हो जाते हैं, जिनके साथ योग प्राप्त करके उसके प्रभावसे योगीजन अपने सारे कर्मबन्धन काट डालते हैं और विचारशील ज्ञानीजन जिनके तत्त्वका विचार करके तत्स्वरूप हो जाते हैं तथा समस्त कर्म-बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वच्छन्द विचरते हैं, वे ही भगवान् अपने भक्तोंकी इच्छासे अपना चिन्मय श्रीविग्रह प्रकट करते हैं; तब भला, उनमें कर्मबन्धनकी कल्पना ही कैसे हो सकती है॥ ३५॥"},{"id":"10.33.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/36/","page":337,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्।","योऽन्तश्‍चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक्॥ ३६"],"iast":["gopīnāṃ tatpatīnāṃ ca sarveṣāmeva dehinām|","yo'ntaścarati so'dhyakṣaḥ krīḍaneneha dehabhāk|| 36"],"meaning":"गोपियोंके, उनके पतियोंके और सम्पूर्ण शरीरधारियोंके अन्तःकरणोंमें जो आत्मारूपसे विराजमान हैं, जो सबके साक्षी और परमपति हैं, वही तो अपना दिव्य-चिन्मय श्रीविग्रह प्रकट करके यह लीला कर रहे हैं॥ ३६॥"},{"id":"10.33.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/37/","page":337,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अनुग्रहाय भूतानां मानुषं देहमास्थितः।","भजते तादृशीः क्रीडा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्॥ ३७"],"iast":["anugrahāya bhūtānāṃ mānuṣaṃ dehamāsthitaḥ|","bhajate tādṛśīḥ krīḍā yāḥ śrutvā tatparo bhavet|| 37"],"meaning":"भगवान् जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही अपनेको मनुष्यरूपमें प्रकट करते हैं और ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर जीव भगवत्परायण हो जायँ॥ ३७॥"},{"id":"10.33.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/38/","page":337,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया।","मन्यमानाः स्वपार्श्‍वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥ ३८"],"iast":["nāsūyan khalu kṛṣṇāya mohitāstasya māyayā|","manyamānāḥ svapārśvasthān svān svān dārān vrajaukasaḥ|| 38"],"meaning":"व्रजवासी गोपोंने भगवान् श्रीकृष्णमें तनिक भी दोषबुद्धि नहीं की। वे उनकी योगमायासे मोहित होकर ऐसा समझ रहे थे कि हमारी पत्‍नियाँ हमारे पास ही हैं॥ ३८॥"},{"id":"10.33.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/39/","page":337,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ब्रह्मरात्र उपावृत्ते वासुदेवानुमोदिताः।","अनिच्छन्त्यो ययुर्गोप्यः स्वगृहान् भगवत्प्रियाः॥ ३९"],"iast":["brahmarātra upāvṛtte vāsudevānumoditāḥ|","anicchantyo yayurgopyaḥ svagṛhān bhagavatpriyāḥ|| 39"],"meaning":"ब्रह्माकी रात्रिके बराबर वह रात्रि बीत गयी। ब्राह्ममुहूर्त आया। यद्यपि गोपियोंकी इच्छा अपने घर लौटनेकी नहीं थी, फिर भी भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे वे अपने-अपने घर चली गयीं। क्योंकि वे अपनी प्रत्येक चेष्टासे, प्रत्येक संकल्पसे केवल भगवान्‌को ही प्रसन्‍न करना चाहती थीं॥ ३९॥"},{"id":"10.33.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/40/","page":338,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णोः","श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः।","भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं","हृद्रोगमाश्‍वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ ४०"],"iast":["vikrīḍitaṃ vrajavadhūbhiridaṃ ca viṣṇoḥ","śraddhānvito'nuśṛṇuyādatha varṇayed yaḥ|","bhaktiṃ parāṃ bhagavati pratilabhya kāmaṃ","hṛdrogamāśvapahinotyacireṇa dhīraḥ|| 40"],"meaning":"परीक्षित्! जो धीर पुरुष व्रजयुवतियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके इस चिन्मय रास-विलासका श्रद्धाके साथ बार-बार श्रवण और वर्णन करता है, उसे भगवान्‌के चरणोंमें परा भक्तिकी प्राप्ति होती है और वह बहुत ही शीघ्र अपने हृदयके रोग—कामविकारसे छुटकारा पा जाता है। उसका कामभाव सर्वदाके लिये नष्ट हो जाता है॥ ४०॥"}],"text":[{"b":30819,"kind":"adhyaya_heading","page":331,"text":"अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः"},{"b":30820,"kind":"topic_heading","page":331,"text":"महारास"},{"b":30821,"kind":"topic_heading","page":331,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30822,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.1"],"text":"इत्थं भगवतो गोप्यः श्रुत्वा वाचः सुपेशलाः।"},{"b":30823,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.1"],"text":"जहुर्विरहजं तापं तदङ्गोपचिताशिषः॥ १"},{"b":30824,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.2"],"text":"तत्रारभत गोविन्दो रासक्रीडामनुव्रतैः।"},{"b":30825,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.2"],"text":"स्त्रीरत्‍नैरन्वितः प्रीतैरन्योन्याबद्धबाहुभिः॥ २"},{"b":30826,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.3"],"text":"रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः।"},{"b":30827,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.3"],"text":"योगेश्‍वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः।"},{"b":30828,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.3"],"text":"प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकटं स्त्रियः॥ ३"},{"b":30829,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.4"],"text":"यं मन्येरन् नभस्तावद् विमानशतसंकुलम।"},{"b":30830,"kind":"sanskrit_shloka","page":331,"verses":["10.33.4"],"text":"दिवौकसां सदाराणामौत्सुक्यापहृतात्मनाम्॥ ४"},{"b":30831,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.5"],"text":"ततो दुन्दुभयो नेदुर्निपेतुः पुष्पवृष्टयः।"},{"b":30832,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.5"],"text":"जगुर्गन्धर्वपतयः सस्त्रीकास्तद्यशोऽमलम्॥ ५"},{"b":30833,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.6"],"text":"वलयानां नूपुराणां किंकिणीनां च योषिताम्।"},{"b":30834,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.6"],"text":"सप्रियाणामभूच्छब्दस्तुमुलो रासमण्डले॥ ६"},{"b":30835,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.7"],"text":"तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् देवकीसुतः।"},{"b":30836,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.7"],"text":"मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा॥ ७"},{"b":30837,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.8"],"text":"पादन्यासैर्भुजविधुतिभिः सस्मितैर्भ्रूविलासै-"},{"b":30838,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.8"],"text":"र्भज्यन्मध्यैश्‍चलकुचपटैः कुण्डलैर्गण्डलोलैः।"},{"b":30839,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.8"],"text":"स्विद्यन्मुख्यः कबररशनाग्रन्थयः कृष्णवध्वो"},{"b":30840,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.8"],"text":"गायन्त्यस्तं तडित इव ता मेघचक्रे विरेजुः॥ ८"},{"b":30841,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.9"],"text":"उच्चैर्जगुर्नृत्यमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रियाः।"},{"b":30842,"kind":"sanskrit_shloka","page":332,"verses":["10.33.9"],"text":"कृष्णाभिमर्शमुदिता यद्गीतेनेदमावृतम्॥ ९"},{"b":30843,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.10"],"text":"काचित् समं मुकुन्देन स्वरजातीरमिश्रिताः।"},{"b":30844,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.10"],"text":"उन्‍निन्ये पूजिता तेन प्रीयता साधु साध्विति।"},{"b":30845,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.10"],"text":"तदेव ध्रुवमुन्‍निन्ये तस्यै मानं च बह्वदात्॥ १०"},{"b":30846,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.11"],"text":"काचिद् रासपरिश्रान्ता पार्श्‍वस्थस्य गदाभृतः।"},{"b":30847,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.11"],"text":"जग्राह बाहुना स्कन्धं श्‍लथद्वलयमल्लिका॥ ११"},{"b":30848,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.12"],"text":"तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पलसौरभम्।"},{"b":30849,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.12"],"text":"चन्दनालिप्तमाघ्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह॥ १२"},{"b":30850,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.13"],"text":"कस्याश्‍चिन्‍नाट्यविक्षिप्तकुण्डलत्विषमण्डितम् ।"},{"b":30851,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.13"],"text":"गण्डं गण्डे सन्दधत्या अदात्ताम्बूलचर्वितम्॥ १३"},{"b":30852,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.14"],"text":"नृत्यन्ती गायती काचित् कूजन्‍नूपुरमेखला।"},{"b":30853,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.14"],"text":"पार्श्‍वस्थाच्युतहस्ताब्जं श्रान्ताधात् स्तनयोः शिवम्॥ १४"},{"b":30854,"kind":"hindi_translation","page":331,"explains":["10.33.1","10.33.2","10.33.3","10.33.4","10.33.5","10.33.6","10.33.7","10.33.8","10.33.9","10.33.10","10.33.11","10.33.12","10.33.13","10.33.14"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! गोपियाँ भगवान्‌की इस प्रकार प्रेमभरी सुमधुर वाणी सुनकर जो कुछ विरहजन्य ताप शेष था, उससे भी मुक्त हो गयीं और सौन्दर्य-माधुर्यनिधि प्राणप्यारेके अंग-संगसे सफल-मनोरथ हो गयीं॥ १॥ भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेयसी और सेविका गोपियाँ एक-दूसरेकी बाँह-में-बाँह डाले खड़ी थीं। उन स्त्रीरत्‍नोंके साथ यमुनाजीके पुलिनपर भगवान्‌ने अपनी रसमयी रासक्रीड़ा प्रारम्भ की॥ २॥ सम्पूर्ण योगोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियोंके बीचमें प्रकट हो गये और उनके गलेमें अपना हाथ डाल दिया। इस प्रकार एक गोपी और एक श्रीकृष्ण, यही क्रम था। सभी गोपियाँ ऐसा अनुभव करती थीं कि हमारे प्यारे तो हमारे ही पास हैं। इस प्रकार सहस्र-सहस्र गोपियोंसे शोभायमान भगवान् श्रीकृष्णका दिव्य रासोत्सव प्रारम्भ हुआ। उस समय आकाशमें शत-शत विमानोंकी भीड़ लग गयी। सभी देवता अपनी-अपनी पत्‍नियोंके साथ वहाँ आ पहुँचे। रासोत्सवके दर्शनकी लालसासे, उत्सुकतासे उनका मन उनके वशमें नहीं था॥ ३-४॥ स्वर्गकी दिव्य दुन्दुभियाँ अपने-आप बज उठीं। स्वर्गीय पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। गन्धर्वगण अपनी-अपनी पत्‍नियोंके साथ भगवान्‌के निर्मल यशका गान करने लगे॥ ५॥ रासमण्डलमें सभी गोपियाँ अपने प्रियतम श्यामसुन्दरके साथ नृत्य करने लगीं। उनकी कलाइयोंके कंगन, पैरोंके पायजेब और करधनीके छोटे-छोटे घुँघरू एक साथ बज उठे। असंख्य गोपियाँ थीं, इसलिये यह मधुर ध्वनि भी बड़े ही जोरकी हो रही थी॥ ६॥ यमुनाजीकी रमणरेतीपर व्रजसुन्दरियोंके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णकी बड़ी अनोखी शोभा हुई। ऐसा जान पड़ता था, मानो अगणित पीली-पीली दमकती हुई सुवर्ण-मणियोंके बीचमें ज्योतिर्मयी नीलमणि चमक रही हो॥ ७॥ नृत्यके समय गोपियाँ तरह-तरहसे ठुमुक-ठुमुककर अपने पाँव कभी आगे बढ़ातीं और कभी पीछे हटा लेतीं। कभी गतिके अनुसार धीरे-धीरे पाँव रखतीं, तो कभी बड़े वेगसे; कभी चाककी तरह घूम जातीं, कभी अपने हाथ उठा-उठाकर भाव बतातीं, तो कभी विभिन्‍न प्रकारसे उन्हें चमकातीं। कभी बड़े कलापूर्ण ढंगसे मुसकरातीं, तो कभी भौंहें मटकातीं। नाचते-नाचते उनकी पतली कमर ऐसी लचक जाती थी, मानो टूट गयी हो। झुकने, बैठने, उठने और चलनेकी फुर्तीसे उनके स्तन हिल रहे थे तथा वस्त्र उड़े जा रहे थे। कानोंके कुण्डल हिल-हिलकर कपोलोंपर आ जाते थे। नाचनेके परिश्रमसे उनके मुँहपर पसीनेकी बूँदें झलकने लगी थीं। केशोंकी चोटियाँ कुछ ढीली पड़ गयी थीं। नीवीकी गाँठें खुली जा रही थीं। इस प्रकार नटवर नन्दलालकी परम प्रेयसी गोपियाँ उनके साथ गा-गाकर नाच रही थीं। परीक्षित्! उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो बहुत-से श्रीकृष्ण तो साँवले-साँवले मेघ-मण्डल हैं और उनके बीच-बीचमें चमकती हुई गोरी गोपियाँ बिजली हैं। उनकी शोभा असीम थी॥ ८॥ गोपियोंका जीवन भगवान्‌की रति है, प्रेम है। वे श्रीकृष्णसे सटकर नाचते-नाचते ऊँचे स्वरसे मधुर गान कर रही थीं। श्रीकृष्णका संस्पर्श पा-पाकर और भी आनन्दम‌ग्‍न हो रही थीं। उनके राग-रागिनियोंसे पूर्ण गानसे यह सारा जगत् अब भी गूँज रहा है॥ ९॥ कोई गोपी भगवान्‌के साथ—उनके स्वरमें स्वर मिलाकर गा रही थी। वह श्रीकृष्णके स्वरकी अपेक्षा और भी ऊँचे स्वरसे राग अलापने लगी। उसके विलक्षण और उत्तम स्वरको सुनकर वे बहुत ही प्रसन्‍न हुए और वाह-वाह करके उसकी प्रशंसा करने लगे। उसी रागको एक दूसरी सखीने ध्रुपदमें गाया। उसका भी भगवान्‌ने बहुत सम्मान किया॥ १०॥ एक गोपी नृत्य करते-करते थक गयी। उसकी कलाइयोंसे कंगन और चोटियोंसे बेलाके फूल खिसकने लगे। तब उसने अपने बगलमें ही खड़े मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके कंधेको अपनी बाँहसे कसकर पकड़ लिया॥ ११॥ भगवान् श्रीकृष्णने अपना एक हाथ दूसरी गोपीके कंधेपर रख रखा था। वह स्वभावसे तो कमलके समान सुगन्धसे युक्त था ही, उसपर बड़ा सुगन्धित चन्दनका लेप भी था। उसकी सुगन्धसे वह गोपी पुलकित हो गयी, उसका रोम-रोम खिल उठा। उसने झटसे उसे चूम लिया॥ १२॥ एक गोपी नृत्य कर रही थी। नाचनेके कारण उसके कुण्डल हिल रहे थे, उनकी छटासे उसके कपोल और भी चमक रहे थे। उसने अपने कपोलोंको भगवान् श्रीकृष्णके कपोलसे सटा दिया और भगवान्‌ने उसके मुँहमें अपना चबाया हुआ पान दे दिया॥ १३॥ कोई गोपी नूपुर और करधनीके घुँघरुओंको झनकारती हुई नाच और गा रही थी। वह जब बहुत थक गयी, तब उसने अपने बगलमें ही खड़े श्यामसुन्दरके शीतल करकमलको अपने दोनों स्तनोंपर रख लिया॥ १४॥"},{"b":30855,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.15"],"text":"गोप्यो लब्ध्वाच्युतं कान्तं श्रिय एकान्तवल्लभम्।"},{"b":30856,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.15"],"text":"गृहीतकण्ठ्यस्तद्दोर्भ्यां गायन्त्यस्तं विजह्रिरे॥ १५"},{"b":30857,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.16"],"text":"कर्णोत्पलालकविटंककपोलघर्म-"},{"b":30858,"kind":"sanskrit_shloka","page":333,"verses":["10.33.16"],"text":"वक्त्रश्रियो वलयनूपुरघोषवाद्यैः।"},{"b":30859,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.16"],"text":"गोप्यः समं भगवता ननृतुः स्वकेश-"},{"b":30860,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.16"],"text":"स्रस्तस्रजो भ्रमरगायकरासगोष्ठ्याम्॥ १६"},{"b":30861,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.17"],"text":"एवं परिष्वङ्गकराभिमर्श-"},{"b":30862,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.17"],"text":"स्निग्धेक्षणोद्दामविलासहासैः ।"},{"b":30863,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.17"],"text":"रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभि-"},{"b":30864,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.17"],"text":"र्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः॥ १७"},{"b":30865,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.18"],"text":"तदङ्गसङ्गप्रमुदाकुलेन्द्रियाः"},{"b":30866,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.18"],"text":"केशान् दुकूलं कुचपट्टिकां वा।"},{"b":30867,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.18"],"text":"नाञ्जः प्रतिव्योढुमलं व्रजस्त्रियो"},{"b":30868,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.18"],"text":"विस्रस्तमालाभरणाः कुरूद्वह॥ १८"},{"b":30869,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.19"],"text":"कृष्णविक्रीडितं वीक्ष्य मुमुहुः खेचरस्त्रियः।"},{"b":30870,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.19"],"text":"कामार्दिताः शशांकश्‍च सगणो विस्मितोऽभवत्॥ १९"},{"b":30871,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.20"],"text":"कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः।"},{"b":30872,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.20"],"text":"रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया॥ २०"},{"b":30873,"kind":"hindi_commentary","page":334,"verses":["10.33.21"],"text":"तासामतिविहारेण श्रान्तानां वदनानि सः।"},{"b":30874,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.21"],"text":"प्रामृजत् करुणः प्रेम्णा शन्तमेनाङ्ग पाणिना॥ २१"},{"b":30875,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.22"],"text":"गोप्यः स्फुरत्पुरटकुण्डलकुन्तलत्विड्-"},{"b":30876,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.22"],"text":"गण्डश्रिया सुधितहासनिरीक्षणेन।"},{"b":30877,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.22"],"text":"मानं दधत्य ऋषभस्य जगुः कृतानि"},{"b":30878,"kind":"sanskrit_shloka","page":334,"verses":["10.33.22"],"text":"पुण्यानि तत्कररुहस्पर्शप्रमोदाः॥ २२"},{"b":30879,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.23"],"text":"ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्गसङ्ग-"},{"b":30880,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.23"],"text":"घृष्टस्रजः स कुचकुंकुमरंजितायाः।"},{"b":30881,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.23"],"text":"गन्धर्वपालिभिरनुद्रुत आविशद् वाः"},{"b":30882,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.23"],"text":"श्रान्तो गजीभिरिभराडिव भिन्‍नसेतुः॥ २३"},{"b":30883,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.24"],"text":"सोऽम्भस्यलं युवतिभिः परिषिच्यमानः"},{"b":30884,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.24"],"text":"प्रेम्णेक्षितः प्रहसतीभिरितस्ततोऽङ्ग।"},{"b":30885,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.24"],"text":"वैमानिकैः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानो"},{"b":30886,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.24"],"text":"रेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलीलः॥ २४"},{"b":30887,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.25"],"text":"ततश्‍च कृष्णोपवने जलस्थल-"},{"b":30888,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.25"],"text":"प्रसूनगन्धानिलजुष्टदिक्तटे ।"},{"b":30889,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.25"],"text":"चचार भृङ्गप्रमदागणावृतो"},{"b":30890,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.25"],"text":"यथा मदच्युद् द्विरदः करेणुभिः॥ २५"},{"b":30891,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.26"],"text":"एवं शशांकांशुविराजिता निशाः"},{"b":30892,"kind":"sanskrit_shloka","page":335,"verses":["10.33.26"],"text":"स सत्यकामोऽनुरताबलागणः।"},{"b":30893,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.26"],"text":"सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरतः"},{"b":30894,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.26"],"text":"सर्वाः शरत्काव्यकथारसाश्रयाः॥ २६"},{"b":30895,"kind":"hindi_commentary","page":333,"explains":["10.33.15","10.33.16","10.33.17","10.33.18","10.33.19","10.33.20","10.33.21","10.33.22","10.33.23","10.33.24","10.33.25","10.33.26"],"text":"परीक्षित्! गोपियोंका सौभाग्य लक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है। लक्ष्मीजीके परम प्रियतम एकान्तवल्लभ भगवान् श्रीकृष्णको अपने परम प्रियतमके रूपमें पाकर गोपियाँ गान करती हुई उनके साथ विहार करने लगीं। भगवान् श्रीकृष्णने उनके गलोंको अपने भुजपाशमें बाँध रखा था, उस समय गोपियोंकी बड़ी अपूर्व शोभा थी॥ १५॥ उनके कानोंमें कमलके कुण्डल शोभायमान थे। घुँघराली अलकें कपोलोंपर लटक रही थीं। पसीनेकी बूँदें झलकनेसे उनके मुखकी छटा निराली ही हो गयी थी। वे रासमण्डलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ नृत्य कर रही थीं। उनके कंगन और पायजेबोंके बाजे बज रहे थे। भौंरे उनके ताल-सुरमें अपना सुर मिलाकर गा रहे थे। और उनके जूड़ों तथा चोटियोंमें गुँथे हुए फूल गिरते जा रहे थे॥ १६॥ परीक्षित्! जैसे नन्हा-सा शिशु निर्विकारभावसे अपनी परछाईंके साथ खेलता है, वैसे ही रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण कभी उन्हें अपने हृदयसे लगा लेते, कभी हाथसे उनका अंगस्पर्श करते, कभी प्रेमभरी तिरछी चितवनसे उनकी ओर देखते तो कभी लीलासे उन्मुक्त हँसी हँसने लगते। इस प्रकार उन्होंने व्रजसुन्दरियोंके साथ क्रीडा की, विहार किया॥ १७॥ परीक्षित्! भगवान्‌के अंगोंका संस्पर्श प्राप्त करके गोपियोंकी इन्द्रियाँ प्रेम और आनन्दसे विह्वल हो गयीं। उनके केश बिखर गये। फूलोंके हार टूट गये और गहने अस्त-व्यस्त हो गये। वे अपने केश, वस्त्र और कंचुकीको भी पूर्णतया सँभालनेमें असमर्थ हो गयीं॥ १८॥ भगवान् श्रीकृष्णकी यह रासक्रीडा देखकर स्वर्गकी देवांगनाएँ भी मिलनकी कामनासे मोहित हो गयीं और समस्त तारों तथा ग्रहोंके साथ चन्द्रमा चकित, विस्मित हो गये॥ १९॥ परीक्षित्! यद्यपि भगवान् आत्माराम हैं—उन्हें अपने अतिरिक्त और किसीकी भी आवश्यकता नहीं है—फिर भी उन्होंने जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण किये और खेल-खेलमें उनके साथ इस प्रकार विहार किया॥ २०॥ जब बहुत देरतक गान और नृत्य आदि विहार करनेके कारण गोपियाँ थक गयीं, तब करुणामय भगवान् श्रीकृष्णने बड़े प्रेमसे स्वयं अपने सुखद करकमलोंके द्वारा उनके मुँह पोंछे॥ २१॥ परीक्षित्! भगवान्‌के करकमल और नखस्पर्शसे गोपियोंको बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने अपने उन कपोलोंके सौन्दर्यसे, जिनपर सोनेके कुण्डल झिलमिला रहे थे और घुँघराली अलकें लटक रही थीं, तथा उस प्रेमभरी चितवनसे, जो सुधासे भी मीठी मुसकानसे उज्ज्वल हो रही थी, भगवान् श्रीकृष्णका सम्मान किया और प्रभुकी परम पवित्र लीलाओंका गान करने लगीं॥ २२॥ इसके बाद जैसे थका हुआ गजराज किनारोंको तोड़ता हुआ हथिनियोंके साथ जलमें घुसकर क्रीडा करता है, वैसे ही लोक और वेदकी मर्यादाका अतिक्रमण करनेवाले भगवान्‌ने अपनी थकान दूर करनेके लिये गोपियोंके साथ जलक्रीडा करनेके उद्देश्यसे यमुनाके जलमें प्रवेश किया। उस समय भगवान्‌की वनमाला गोपियोंके अंगकी रगड़से कुछ कुचल-सी गयी थी और उनके वक्षःस्थलकी केसरसे वह रँग भी गयी थी। उसके चारों ओर गुनगुनाते हुए भौंरे उनके पीछे-पीछे इस प्रकार चल रहे थे, मानो गन्धर्वराज उनकी कीर्तिका गान करते हुए पीछे-पीछे चल रहे हों॥ २३॥ परीक्षित्! यमुनाजलमें गोपियोंने प्रेमभरी चितवनसे भगवान्‌की ओर देख-देखकर तथा हँस-हँसकर उनपर इधर-उधरसे जलकी खूब बौछारें डालीं। जल उलीच-उलीचकर उन्हें खूब नहलाया। विमानोंपर चढ़े हुए देवता पुष्पोंकी वर्षा करके उनकी स्तुति करने लगे। इस प्रकार यमुनाजलमें स्वयं आत्माराम भगवान् श्रीकृष्णने गजराजके समान जलविहार किया॥ २४॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण व्रजयुवतियों और भौंरोंकी भीड़से घिरे हुए यमुनातटके उपवनमें गये। वह बड़ा ही रमणीय था। उसके चारों ओर जल और स्थलमें बड़ी सुन्दर सुगन्धवाले फूल खिले हुए थे। उनकी सुवास लेकर मन्द-मन्द वायु चल रही थी। उसमें भगवान् इस प्रकार विचरण करने लगे, जैसे मदमत्त गजराज हथिनियोंके झुंडके साथ घूम रहा हो॥ २५॥ परीक्षित्! शरद्की वह रात्रि जिसके रूपमें अनेक रात्रियाँ पुंजीभूत हो गयी थीं, बहुत ही सुन्दर थी। चारों ओर चन्द्रमाकी बड़ी सुन्दर चाँदनी छिटक रही थी। काव्योंमें शरद् ऋतुकी जिन रस-सामग्रियोंका वर्णन मिलता है, उन सभीसे वह युक्त थी। उसमें भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्रेयसी गोपियोंके साथ यमुनाके पुलिन, यमुनाजी और उनके उपवनमें विहार किया। यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि भगवान् सत्यसंकल्प हैं। यह सब उनके चिन्मय संकल्पकी ही चिन्मयी लीला है। और उन्होंने इस लीलामें कामभावको, उसकी चेष्टाओंको तथा उसकी क्रियाको सर्वथा अपने अधीन कर रखा था, उन्हें अपने-आपमें कैद कर रखा था॥ २६॥"},{"b":30896,"kind":"topic_heading","page":336,"text":"राजोवाच"},{"b":30897,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.27"],"text":"संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्य च।"},{"b":30898,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.27"],"text":"अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्‍वरः॥ २७"},{"b":30899,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.28"],"text":"स कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्ताभिरक्षिता।"},{"b":30900,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.28"],"text":"प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम्॥ २८"},{"b":30901,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.29"],"text":"आप्तकामो यदुपतिः कृतवान् वै जुगुप्सितम्।"},{"b":30902,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.29"],"text":"किमभिप्राय एतं नः संशयं छिन्धि सुव्रत॥ २९"},{"b":30903,"kind":"hindi_commentary","page":336,"explains":["10.33.27","10.33.28","10.33.29"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! भगवान् श्रीकृष्ण सारे जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। उन्होंने अपने अंश श्रीबलरामजीके सहित पूर्णरूपमें अवतार ग्रहण किया था। उनके अवतारका उद्देश्य ही यह था कि धर्मकी स्थापना हो और अधर्मका नाश॥ २७॥ ब्रह्मन्! वे धर्ममर्यादाके बनानेवाले, उपदेश करनेवाले और रक्षक थे। फिर उन्होंने स्वयं धर्मके विपरीत परस्त्रियोंका स्पर्श कैसे किया॥ २८॥ मैं मानता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम थे, उन्हें किसी भी वस्तुकी कामना नहीं थी, फिर भी उन्होंने किस अभिप्रायसे यह निन्दनीय कर्म किया? परम ब्रह्मचारी मुनीश्‍वर! आप कृपा करके मेरा यह सन्देह मिटाइये॥ २९॥"},{"b":30904,"kind":"topic_heading","page":336,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30905,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.30"],"text":"धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्‍वराणां च साहसम्।"},{"b":30906,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.30"],"text":"तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा॥ ३०"},{"b":30907,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.31"],"text":"नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्‍वरः।"},{"b":30908,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.31"],"text":"विनश्यत्याचरन् मौढ्याद्यथारुद्रोऽब्धिजं विषम्॥ ३१"},{"b":30909,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.32"],"text":"ईश्‍वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्‍वचित्।"},{"b":30910,"kind":"sanskrit_shloka","page":336,"verses":["10.33.32"],"text":"तेषां यत् स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्॥ ३२"},{"b":30911,"kind":"hindi_commentary","page":336,"explains":["10.33.30","10.33.31","10.33.32"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—सूर्य, अग्‍नि आदि ईश्‍वर (समर्थ) कभी-कभी धर्मका उल्लंघन और साहसका काम करते देखे जाते हैं। परंतु उन कामोंसे उन तेजस्वी पुरुषोंको कोई दोष नहीं होता। देखो, अग्‍नि सब कुछ खा जाता है, परन्तु उन पदार्थोंके दोषसे लिप्त नहीं होता॥ ३०॥ जिन लोगोंमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है, उन्हें मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये, शरीरसे करना तो दूर रहा। यदि मूर्खतावश कोई ऐसा काम कर बैठे, तो उसका नाश हो जाता है। भगवान् शंकरने हलाहल विष पी लिया था, दूसरा कोई पिये तो वह जलकर भस्म हो जायगा॥ ३१॥ इसलिये इस प्रकारके जो शंकर आदि ईश्‍वर हैं, अपने अधिकारके अनुसार उनके वचनको ही सत्य मानना और उसीके अनुसार आचरण करना चाहिये। उनके आचरणका अनुकरण तो कहीं-कहीं ही किया जाता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उनका जो आचरण उनके उपदेशके अनुकूल हो, उसीको जीवनमें उतारे॥ ३२॥"},{"b":30912,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.33"],"text":"कुशलाचरितेनैषामिह स्वार्थो न विद्यते।"},{"b":30913,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.33"],"text":"विपर्ययेण वानर्थो निरहंकारिणां प्रभो॥ ३३"},{"b":30914,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.34"],"text":"किमुताखिलसत्त्वानां तिर्यङ्मर्त्यदिवौकसाम्।"},{"b":30915,"kind":"topic_heading","page":337,"verses":["10.33.34"],"text":"ईशितुश्‍चेशितव्यानां कुशलाकुशलान्वयः॥ ३४"},{"b":30916,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.35"],"text":"यत्पादपंकजपरागनिषेवतृप्ता"},{"b":30917,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.35"],"text":"योगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धाः ।"},{"b":30918,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.35"],"text":"स्वैरं चरन्ति मुनयोऽपि न नह्यमाना-"},{"b":30919,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.35"],"text":"स्तस्येच्छयाऽऽत्तवपुषः कुत एव बन्धः॥ ३५"},{"b":30920,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.36"],"text":"गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्।"},{"b":30921,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.36"],"text":"योऽन्तश्‍चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक्॥ ३६"},{"b":30922,"kind":"hindi_translation","page":337,"explains":["10.33.33","10.33.34","10.33.35","10.33.36"],"text":"परीक्षित्! वे सामर्थ्यवान् पुरुष अहंकारहीन होते हैं, शुभकर्म करनेमें उनका कोई सांसारिक स्वार्थ नहीं होता और अशुभ कर्म करनेमें अनर्थ (नुकसान) नहीं होता। वे स्वार्थ और अनर्थसे ऊपर उठे होते हैं॥ ३३॥ जब उन्हींके सम्बन्धमें ऐसी बात है तब जो पशु, पक्षी, मनुष्य, देवता आदि समस्त चराचर जीवोंके एकमात्र प्रभु सर्वेश्‍वर भगवान् हैं, उनके साथ मानवीय शुभ और अशुभका सम्बन्ध कैसे जोड़ा जा सकता है॥ ३४॥ जिनके चरणकमलोंके रजका सेवन करके भक्तजन तृप्त हो जाते हैं, जिनके साथ योग प्राप्त करके उसके प्रभावसे योगीजन अपने सारे कर्मबन्धन काट डालते हैं और विचारशील ज्ञानीजन जिनके तत्त्वका विचार करके तत्स्वरूप हो जाते हैं तथा समस्त कर्म-बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वच्छन्द विचरते हैं, वे ही भगवान् अपने भक्तोंकी इच्छासे अपना चिन्मय श्रीविग्रह प्रकट करते हैं; तब भला, उनमें कर्मबन्धनकी कल्पना ही कैसे हो सकती है॥ ३५॥ गोपियोंके, उनके पतियोंके और सम्पूर्ण शरीरधारियोंके अन्तःकरणोंमें जो आत्मारूपसे विराजमान हैं, जो सबके साक्षी और परमपति हैं, वही तो अपना दिव्य-चिन्मय श्रीविग्रह प्रकट करके यह लीला कर रहे हैं॥ ३६॥"},{"b":30923,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.37"],"text":"अनुग्रहाय भूतानां मानुषं देहमास्थितः।"},{"b":30924,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.37"],"text":"भजते तादृशीः क्रीडा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्॥ ३७"},{"b":30925,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.38"],"text":"नासूयन् खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया।"},{"b":30926,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.38"],"text":"मन्यमानाः स्वपार्श्‍वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥ ३८"},{"b":30927,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.39"],"text":"ब्रह्मरात्र उपावृत्ते वासुदेवानुमोदिताः।"},{"b":30928,"kind":"sanskrit_shloka","page":337,"verses":["10.33.39"],"text":"अनिच्छन्त्यो ययुर्गोप्यः स्वगृहान् भगवत्प्रियाः॥ ३९"},{"b":30929,"kind":"sanskrit_shloka","page":338,"verses":["10.33.40"],"text":"विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णोः"},{"b":30930,"kind":"sanskrit_shloka","page":338,"verses":["10.33.40"],"text":"श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः।"},{"b":30931,"kind":"sanskrit_shloka","page":338,"verses":["10.33.40"],"text":"भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं"},{"b":30932,"kind":"sanskrit_shloka","page":338,"verses":["10.33.40"],"text":"हृद्रोगमाश्‍वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ ४०"},{"b":30933,"kind":"hindi_translation","page":337,"explains":["10.33.37","10.33.38","10.33.39"],"text":"भगवान् जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही अपनेको मनुष्यरूपमें प्रकट करते हैं और ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर जीव भगवत्परायण हो जायँ॥ ३७॥ व्रजवासी गोपोंने भगवान् श्रीकृष्णमें तनिक भी दोषबुद्धि नहीं की। वे उनकी योगमायासे मोहित होकर ऐसा समझ रहे थे कि हमारी पत्‍नियाँ हमारे पास ही हैं॥ ३८॥ ब्रह्माकी रात्रिके बराबर वह रात्रि बीत गयी। ब्राह्ममुहूर्त आया। यद्यपि गोपियोंकी इच्छा अपने घर लौटनेकी नहीं थी, फिर भी भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे वे अपने-अपने घर चली गयीं। क्योंकि वे अपनी प्रत्येक चेष्टासे, प्रत्येक संकल्पसे केवल भगवान्‌को ही प्रसन्‍न करना चाहती थीं॥ ३९॥"},{"b":30934,"kind":"hindi_translation","page":337,"explains":["10.33.40"],"text":"परीक्षित्! जो धीर पुरुष व्रजयुवतियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके इस चिन्मय रास-विलासका श्रद्धाके साथ बार-बार श्रवण और वर्णन करता है, उसे भगवान्‌के चरणोंमें परा भक्तिकी प्राप्ति होती है और वह बहुत ही शीघ्र अपने हृदयके रोग—कामविकारसे छुटकारा पा जाता है। उसका कामभाव सर्वदाके लिये नष्ट हो जाता है॥ ४०॥"},{"b":30935,"kind":"hindi_translation","page":338,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडावर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥"}],"notes":[{"id":"v2:281","mark":"*","page":338,"after_verse":"10.33.40","text":"श्रीमद्भागवतमें ये रासलीलाके पाँच अध्याय उसके पाँच प्राण माने जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्णकी परम अन्तरंगलीला, निजस्वरूपभूता गोपिकाओं और ह्लादिनी शक्ति श्रीराधाजीके साथ होनेवाली भगवान्‌की दिव्यातिदिव्य क्रीडा, इन अध्यायोंमें कही गयी है। ‘रास’ शब्दका मूल रस है और रस स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं—‘रसो वै सः’। जिस दिव्य क्रीडामें एक ही रस अनेक रसोंके रूपमें होकर अनन्त-अनन्त रसका समास्वादन करे; एक रस ही रस-समूहके रूपमें प्रकट होकर स्वयं ही आस्वाद्य-आस्वादक, लीला, धाम और विभिन्‍न आलम्बन एवं उद्दीपनके रूपमें क्रीडा करे—उसका नाम रास है। भगवान्‌की यह दिव्य लीला भगवान्‌के दिव्य धाममें दिव्य रूपसे निरन्तर हुआ करती है। यह भगवान्‌की विशेष कृपासे प्रेमी साधकोंके हितार्थ कभी-कभी अपने दिव्य धामके साथ ही भूमण्डलपर भी अवतीर्ण हुआ करती है, जिसको देख-सुन एवं गाकर तथा स्मरण-चिन्तन करके अधिकारी पुरुष रसस्वरूप भगवान्‌की इस परम रसमयी लीलाका आनन्द ले सकें और स्वयं भी भगवान्‌की लीलामें सम्मिलित होकर अपनेको कृतकृत्य कर सकें। इस पंचाध्यायीमें वंशीध्वनि, गोपियोंके अभिसार, श्रीकृष्णके साथ उनकी बातचीत, रमण, श्रीराधाजीके साथ अन्तर्धान, पुनः प्राकट्य, गोपियोंके द्वारा दिये हुए वसनासनपर विराजना, गोपियोंके कूट प्रश्‍नका उत्तर, रासनृत्य, क्रीडा, जलकेलि और वनविहारका वर्णन है—जो मानवी भाषामें होनेपर भी वस्तुतः परम दिव्य है। समयके साथ ही मानव-मस्तिष्क भी पलटता रहता है। कभी अन्तर्दृष्टिकी प्रधानता हो जाती है और कभी बहिर्दृष्टिकी। आजका युग ही ऐसा है, जिसमें भगवान्‌की दिव्य-लीलाओंकी तो बात ही क्या, स्वयं भगवान्‌के अस्तित्वपर ही अविश्‍वास प्रकट किया जा रहा है। ऐसी स्थितिमें इस दिव्य लीलाका रहस्य न समझकर लोग तरह-तरहकी आशंका प्रकट करें, इसमें आश्‍चर्यकी कोई बात नहीं है। यह लीला अन्तर्दृष्टिसे और मुख्यतः भगवत्कृपासे ही समझमें आती है। जिन भाग्यवान् और भगवत्कृपाप्राप्त महात्माओंने इसका अनुभव किया है, वे धन्य हैं और उनकी चरण-धूलिके प्रतापसे ही त्रिलोकी धन्य है। उन्हींकी उक्तियोंका आश्रय लेकर यहाँ रासलीलाके सम्बन्धमें यत्किंचित् लिखनेकी धृष्टता की जाती है। यह बात पहले ही समझ लेनी चाहिये कि भगवान्‌का शरीर जीव-शरीरकी भाँति जड नहीं होता। जडकी सत्ता केवल जीवकी दृष्टिमें होती है, भगवान्‌की दृष्टिमें नहीं। यह देह है और यह देही है, इस प्रकारका भेदभाव केवल प्रकृतिके राज्यमें होता है। अप्राकृत लोकमें—जहाँकी प्रकृति भी चिन्मय है—सब कुछ चिन्मय ही होता है; वहाँ अचित्की प्रतीति तो केवल चिद्विलास अथवा भगवान्‌की लीलाकी सिद्धिके लिये होती है। इसलिये स्थूलतामें—या यों कहिये कि जडराज्यमें रहनेवाला मस्तिष्क जब भगवान्‌की अप्राकृत लीलाओंके सम्बन्धमें विचार करने लगता है, तब वह अपनी पूर्व वासनाओंके अनुसार जडराज्यकी धारणाओं, कल्पनाओं और क्रियाओंका ही आरोप उस दिव्य राज्यके विषयमें भी करता है, इसलिये दिव्य-लीलाके रहस्यको समझनेमें असमर्थ हो जाता है। यह रास वस्तुतः परम उज्ज्वल रसका एक दिव्य प्रकाश है। जड जगत‍्की बात तो दूर रही, ज्ञानरूप या विज्ञानरूप जगत‍्में भी यह प्रकट नहीं होता। अधिक क्या, साक्षात् चिन्मय तत्त्वमें भी इस परम दिव्य उज्ज्वल रसका लेशाभास नहीं देखा जाता। इस परम रसकी स्फूर्ति तो परम भावमयी श्रीकृष्णप्रेमस्वरूपा गोपीजनोंके मधुर हृदयमें ही होती है। इस रासलीलाके यथार्थस्वरूप और परम माधुर्यका आस्वाद उन्हींको मिलता है, दूसरे लोग तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। भगवान्‌के समान ही गोपियाँ भी परमरसमयी और सच्चिदानन्दमयी ही हैं। साधनाकी दृष्टिसे भी उन्होंने न केवल जड शरीरका ही त्याग कर दिया है, बल्कि सूक्ष्म शरीरसे प्राप्त होनेवाले स्वर्ग, कैवल्यसे अनुभव होनेवाले मोक्ष—और तो क्या, जडताकी दृष्टिका ही त्याग कर दिया है। उनकी दृष्टिमें केवल चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण हैं, उनके हृदयमें श्रीकृष्णको तृप्त करनेवाला प्रेमामृत है। उनकी इस अलौकिक स्थितिमें स्थूलशरीर, उसकी स्मृति और उसके सम्बन्धसे होनेवाले अंग-संगकी कल्पना किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती। ऐसी कल्पना तो केवल देहात्मबुद्धिसे जकड़े हुए जीवोंकी ही होती है। जिन्होंने गोपियोंको पहचाना है, उन्होंने गोपियोंकी चरणधूलिका स्पर्श प्राप्त करके अपनी कृतकृत्यता चाही है। ब्रह्मा, शंकर, उद्धव और अर्जुनने गोपियोंकी उपासना करके भगवान्‌के चरणोंमें वैसे प्रेमका वरदान प्राप्त किया है या प्राप्त करनेकी अभिलाषा की है। उन गोपियोंके दिव्य भावको साधारण स्त्री-पुरुषके भाव-जैसा मानना गोपियोंके प्रति, भगवान्‌के प्रति और वास्तवमें सत्यके प्रति महान् अन्याय एवं अपराध है। इस अपराधसे बचनेके लिये भगवान्‌की दिव्य लीलाओंपर विचार करते समय उनकी अप्राकृत दिव्यताका स्मरण रखना परमावश्यक है। भगवान्‌का चिदानन्दघन शरीर दिव्य है। वह अजन्मा और अविनाशी है, हानोपादानरहित है। वह नित्य सनातन शुद्ध भगवत्स्वरूप ही है। इसी प्रकार गोपियाँ दिव्य जगत‍्की भगवान्‌की स्वरूपभूता अन्तरंगशक्तियाँ हैं। इन दोनोंका सम्बन्ध भी दिव्य ही है। यह उच्चतम भावराज्यकी लीला स्थूल शरीर और स्थूल मनसे परे है। आवरण-भंगके अनन्तर अर्थात् चीरहरण करके जब भगवान् स्वीकृति देते हैं, तब इसमें प्रवेश होता है। प्राकृत देहका निर्माण होता है स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन देहोंके संयोगसे। जबतक ‘कारण शरीर’ रहता है, तबतक इस प्राकृत देहसे जीवको छुटकारा नहीं मिलता। ‘कारण शरीर’ कहते हैं पूर्वकृत कर्मोंके उन संस्कारोंको, जो देह-निर्माणमें कारण होते हैं। इस ‘कारण शरीर’ के आधारपर जीवको बार-बार जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ना होता है और यह चक्र जीवकी मुक्ति न होनेतक अथवा ‘कारण’ का सर्वथा अभाव न होनेतक चलता ही रहता है। इसी कर्मबन्धनके कारण पांचभौतिक स्थूलशरीर मिलता है—जो रक्त, मांस, अस्थि आदिसे भरा और चमड़ेसे ढका होता है। प्रकृतिके राज्यमें जितने शरीर होते हैं, सभी वस्तुतः योनि और बिन्दुके संयोगसे ही बनते हैं; फिर चाहे कोई कामजनित निकृष्ट मैथुनसे उत्पन्‍न हो या ऊर्ध्वरेता महापुरुषके संकल्पसे, बिन्दुके अधोगामी होनेपर कर्तव्यरूप श्रेष्ठ मैथुनसे हो, अथवा बिना ही मैथुनके नाभि, हृदय, कण्ठ, कर्ण, नेत्र, सिर, मस्तक आदिके स्पर्शसे, बिना ही स्पर्शके केवल दृष्टिमात्रसे अथवा बिना देखे केवल संकल्पसे ही उत्पन्‍न हो। ये मैथुनी-अमैथुनी (अथवा कभी-कभी स्त्री या पुरुष-शरीरके बिना भी उत्पन्‍न होनेवाले) सभी शरीर हैं योनि और बिन्दुके संयोगजनित ही। ये सभी प्राकृत शरीर हैं। इसी प्रकार योगियोंके द्वारा निर्मित ‘निर्माणकाय’ यद्यपि अपेक्षाकृत शुद्ध हैं, परन्तु वे भी हैं प्राकृत ही। पितर या देवोंके दिव्य कहलानेवाले शरीर भी प्राकृत ही हैं। अप्राकृत शरीर इन सबसे विलक्षण हैं, जो महाप्रलयमें भी नष्ट नहीं होते। और भगवद्देह तो साक्षात् भगवत्स्वरूप ही है। देव-शरीर प्रायः रक्त-मांस-मेद-अस्थिवाले नहीं होते। अप्राकृत शरीर भी नहीं होते। फिर भगवान् श्रीकृष्णका भगवत्स्वरूप शरीर तो रक्त-मांस-अस्थिमय होता ही कैसे। वह तो सर्वथा चिदानन्दमय है। उसमें देह-देही, गुण-गुणी, रूप-रूपी, नाम-नामी और लीला तथा लीलापुरुषोत्तमका भेद नहीं है। श्रीकृष्णका एक-एक अंग पूर्ण श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्णका मुखमण्डल जैसे पूर्ण श्रीकृष्ण है, वैसे ही श्रीकृष्णका पदनख भी पूर्ण श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्णकी सभी इन्द्रियोंसे सभी काम हो सकते हैं। उनके कान देख सकते हैं, उनकी आँखें सुन सकती हैं, उनकी नाक स्पर्श कर सकती है, उनकी रसना सूँघ सकती है, उनकी त्वचा स्वाद ले सकती है। वे हाथोंसे देख सकते हैं, आँखोंसे चल सकते हैं। श्रीकृष्णका सब कुछ श्रीकृष्ण होनेके कारण वह सर्वथा पूर्णतम है। इसीसे उनकी रूपमाधुरी नित्यवर्द्धनशील, नित्य नवीन सौन्दर्यमयी है। उसमें ऐसा चमत्कार है कि वह स्वयं अपनेको ही आकर्षित कर लेती है। फिर उनके सौन्दर्य-माधुर्यसे गौ-हरिन और वृक्ष-बेल पुलकित हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। भगवान्‌के ऐसे स्वरूपभूत शरीरसे गंदा मैथुनकर्म सम्भव नहीं। मनुष्य जो कुछ खाता है, उससे क्रमशः रस, रक्त, मांस, मेद, मज्जा और अस्थि बनकर अन्तमें शुक्र बनता है; इसी शुक्रके आधारपर शरीर रहता है और मैथुनक्रियामें इसी शुक्रका क्षरण हुआ करता है। भगवान्‌का शरीर न तो कर्मजन्य है, न मैथुनी सृष्टिका है और न दैवी ही है। वह तो इन सबसे परे सर्वथा विशुद्ध भगवत्स्वरूप है। उसमें रक्त, मांस, अस्थि आदि नहीं हैं; अतएव उसमें शुक्र भी नहीं है। इसलिये उसमें प्राकृत पांचभौतिक शरीरोंवाले स्त्री-पुरुषोंके रमण या मैथुनकी कल्पना भी नहीं हो सकती। इसीलिये भगवान्‌को उपनिषद्में ‘अखण्ड ब्रह्मचारी’ बतलाया गया है और इसीसे भागवतमें उनके लिये ‘अवरुद्धसौरत’ आदि शब्द आये हैं। फिर कोई शंका करे कि उनके सोलह हजार एक सौ आठ रानियोंके इतने पुत्र कैसे हुए तो इसका सीधा उत्तर यही है कि यह सारी भागवती सृष्टि थी, भगवान्‌के संकल्पसे हुई थी। भगवान्‌के शरीरमें जो रक्त-मांस आदि दिखलायी पड़ते हैं, वह तो भगवान्‌की योगमायाका चमत्कार है। इस विवेचनसे भी यही सिद्ध होता है कि गोपियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णका जो रमण हुआ वह सर्वथा दिव्य भगवत्-राज्यकी लीला है, लौकिक काम-क्रीडा नहीं। × × × × इन गोपियोंकी साधना पूर्ण हो चुकी है। भगवान्‌ने अगली रात्रियोंमें उनके साथ विहार करनेका प्रेम-संकल्प कर लिया है। इसीके साथ उन गोपियोंको भी जो नित्यसिद्धा हैं, जो लोकदृष्टिमें विवाहिता भी हैं, इन्हीं रात्रियोंमें दिव्य-लीलामें सम्मिलित करना है। वे अगली रात्रियाँ कौन-सी हैं, यह बात भगवान्‌की दृष्टिके सामने है। उन्होंने शारदीय रात्रियोंको देखा। ‘भगवान्‌ने देखा’—इसका अर्थ सामान्य नहीं, विशेष है। जैसे सृष्टिके प्रारम्भमें ‘स ऐक्षत एकोऽहं बहु स्याम्।’—भगवान्‌के इस ईक्षणसे जगत‍्की उत्पत्ति होती है, वैसे ही रासके प्रारम्भमें भगवान्‌के प्रेमवीक्षणसे शरत्कालकी दिव्य रात्रियोंकी सृष्टि होती है। मल्लिका-पुष्प, चन्द्रिका आदि समस्त उद्दीपनसामग्री भगवान्‌के द्वारा वीक्षित है अर्थात् लौकिक नहीं, अलौकिक—अप्राकृत है। गोपियोंने अपना मन श्रीकृष्णके मनमें मिला दिया था। उनके पास स्वयं मन न था। अब प्रेमदान करनेवाले श्रीकृष्णने विहारके लिये नवीन मनकी, दिव्य मनकी सृष्टि की। योगेश्‍वरेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णकी यही योगमाया है, जो रासलीलाके लिये दिव्य स्थल, दिव्य सामग्री एवं दिव्य मनका निर्माण किया करती है। इतना होनेपर भगवान्‌की बाँसुरी बजती है। भगवान्‌की बाँसुरी जडको चेतन, चेतनको जड, चलको अचल और अचलको चल, विक्षिप्तको समाधिस्थ और समाधिस्थको विक्षिप्त बनाती रहती है। भगवान्‌का प्रेमदान प्राप्त करके गोपियाँ निस्संकल्प, निश्‍चिन्त होकर घरके काममें लगी हुई थीं। कोई गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषा—धर्मके काममें लगी हुई थी, कोई गो-दोहन आदि अर्थके काममें लगी हुई थी, कोई साज-शृंगार आदि कामके साधनमें व्यस्त थी, कोई पूजा-पाठ आदि मोक्षसाधनमें लगी हुई थी। सब लगी हुई थीं अपने-अपने काममें, परन्तु वास्तवमें वे उनमेंसे एक भी पदार्थ चाहती न थीं। यही उनकी विशेषता थी और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि वंशीध्वनि सुनते ही कर्मकी पूर्णतापर उनका ध्यान नहीं गया; काम पूरा करके चलें, ऐसा उन्होंने नहीं सोचा। वे चल पड़ीं उस साधक संन्यासीके समान, जिसका हृदय वैराग्यकी प्रदीप्त ज्वालासे परिपूर्ण है। किसीने किसीसे पूछा नहीं, सलाह नहीं की; अस्त-व्यस्त गतिसे जो जैसे थी, वैसे ही श्रीकृष्णके पास पहुँच गयी। वैराग्यकी पूर्णता और प्रेमकी पूर्णता एक ही बात है, दो नहीं। गोपियाँ व्रज और श्रीकृष्णके बीचमें मूर्तिमान् वैराग्य हैं या मूर्तिमान् प्रेम, क्या इसका निर्णय कोई कर सकता है? साधनाके दो भेद हैं—१—मर्यादापूर्ण वैध साधना और २—मर्यादारहित अवैध प्रेमसाधना। दोनोंके ही अपने-अपने स्वतन्त्र नियम हैं। वैध साधनामें जैसे नियमोंके बन्धनका, सनातन पद्धतिका, कर्तव्योंका और विविध पालनीय कर्मोंका त्याग साधनासे भ्रष्ट करनेवाला और महान् हानिकर है, वैसे ही अवैध प्रेमसाधनामें इनका पालन कलंकरूप होता है। यह बात नहीं कि इन सब आत्मोन्‍नतिके साधनोंको वह अवैध प्रेमसाधनाका साधक जान-बूझकर छोड़ देता है। बात यह है कि वह स्तर ही ऐसा है, जहाँ इनकी आवश्यकता नहीं है। ये वहाँ अपने-आप वैसे ही छूट जाते हैं, जैसे नदीके पार पहुँच जानेपर स्वाभाविक ही नौकाकी सवारी छूट जाती है। जमीनपर न तो नौकापर बैठकर चलनेका प्रश्‍न उठता है और न ऐसा चाहने या करनेवाला बुद्धिमान् ही माना जाता है। ये सब साधन वहींतक रहते हैं, जहाँतक सारी वृत्तियाँ सहज स्वेच्छासे सदा-सर्वदा एकमात्र भगवान्‌की ओर दौड़ने नहीं लग जातीं। इसीलिये भगवान्‌ने गीतामें एक जगह तो अर्जुनसे कहा है— न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥ सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्‍चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ (३। २२—२५) ‘अर्जुन! यद्यपि तीनों लोकोंमें मुझे कुछ भी करना नहीं है और न मुझे किसी वस्तुको प्राप्त ही करना है, जो मुझे न प्राप्त हो; तो भी मैं कर्म करता ही हूँ। यदि मैं सावधान होकर कर्म न करूँ तो अर्जुन! मेरी देखा-देखी लोग कर्मोंको छोड़ बैठें और यों मेरे कर्म न करनेसे ये सारे लोक भ्रष्ट हो जायँ तथा मैं इन्हें वर्णसंकर बनानेवाला और सारी प्रजाका नाश करनेवाला बनूँ। इसलिये मेरे इस आदर्शके अनुसार अनासक्त ज्ञानी पुरुषको भी लोकसंग्रहके लिये वैसे ही कर्म करना चाहिये, जैसे कर्ममें आसक्त अज्ञानी लोग करते हैं।’ यहाँ भगवान् आदर्श लोकसंग्रही महापुरुषके रूपमें बोलते हैं, लोकनायक बनकर सर्वसाधारणको शिक्षा देते हैं। इसलिये स्वयं अपना उदाहरण देकर लोगोंको कर्ममें प्रवृत्त करना चाहते हैं। ये ही भगवान् उसी गीतामें जहाँ अन्तरंगताकी बात कहते हैं, वहाँ स्पष्ट कहते हैं— सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। (१८। ६६) ‘सारे धर्मोंका त्याग करके तू केवल एक मेरी शरणमें आ जा।’ यह बात सबके लिये नहीं है। इसीसे भगवान् १८। ६४ में इसे सबसे बढ़कर छिपी हुई गुप्त बात (सर्वगुह्यतम) कहकर इसके बादके ही श्‍लोकमें कहते हैं— इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ (१८। ६७) ‘भैया अर्जुन! इस सर्वगुह्यतम बातको जो इन्द्रिय-विजयी तपस्वी न हो, मेरा भक्त न हो, सुनना न चाहता हो और मुझमें दोष लगाता हो, उसे न कहना।’ श्रीगोपीजन साधनाके इसी उच्च स्तरमें परम आदर्श थीं। इसीसे उन्होंने देह-गेह, पति-पुत्र, लोक-परलोक, कर्तव्य-धर्म—सबको छोड़कर, सबका उल्लंघन कर, एकमात्र परमधर्मस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको ही पानेके लिये अभिसार किया था। उनका यह पति-पुत्रोंका त्याग, यह सर्वधर्मका त्याग ही उनके स्तरके अनुरूप स्वधर्म है। इस ‘सर्वधर्मत्याग’ रूप स्वधर्मका आचरण गोपियों-जैसे उच्च स्तरके साधकोंमें ही सम्भव है। क्योंकि सब धर्मोंका यह त्याग वही कर सकते हैं, जो इसका यथाविधि पूरा पालन कर चुकनेके बाद इसके परमफल अनन्य और अचिन्त्य देवदुर्लभ भगवत्प्रेमको प्राप्त कर चुकते हैं, वे भी जान-बूझकर त्याग नहीं करते। सूर्यका प्रखर प्रकाश हो जानेपर तैलदीपककी भाँति स्वतः ही ये धर्म उसे त्याग देते हैं। यह त्याग तिरस्कारमूलक नहीं, वरं तृप्तिमूलक है। भगवत्प्रेमकी ऊँची स्थितिका यही स्वरूप है। देवर्षि नारदजीका एक सूत्र है— ‘वेदानपि संन्यस्यति, केवलमविच्छिन्‍नानुरागं लभते।’ ‘जो वेदोंका (वेदमूलक समस्त धर्ममर्यादाओंका) भी भलीभाँति त्याग कर देता है, वह अखण्ड, असीम भगवत्प्रेमको प्राप्त करता है।’ जिसको भगवान् अपनी वंशीध्वनि सुनाकर—नाम ले-लेकर बुलायें, वह भला, किसी दूसरे धर्मकी ओर ताककर कब और कैसे रुक सकता है। रोकनेवालोंने रोका भी, परन्तु हिमालयसे निकलकर समुद्रमें गिरनेवाली ब्रह्मपुत्र नदीकी प्रखर धाराको क्या कोई रोक सकता है? वे न रुकीं, नहीं रोकी जा सकीं। जिनके चित्तमें कुछ प्राक्तन संस्कार अवशिष्ट थे, वे अपने अनधिकारके कारण सशरीर जानेमें समर्थ न हुईं। उनका शरीर घरमें पड़ा रह गया, भगवान्‌के वियोग-दुःखसे उनके सारे कलुष धुल गये, ध्यानमें प्राप्त भगवान्‌के प्रेमालिंगनसे उनके समस्त सौभाग्यका परमफल प्राप्त हो गया और वे भगवान्‌के पास सशरीर जानेवाली गोपियोंके पहुँचनेसे पहले ही भगवान्‌के पास पहुँच गयीं। भगवान्‌में मिल गयीं। यह शास्त्रका प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि पाप-पुण्यके कारण ही बन्धन होता है और शुभाशुभका भोग होता है। शुभाशुभ कर्मोंके भोगसे जब पाप-पुण्य दोनों नष्ट हो जाते हैं, तब जीवकी मुक्ति हो जाती है। यद्यपि गोपियाँ पाप-पुण्यसे रहित श्रीभगवान्‌की प्रेम-प्रतिमास्वरूपा थीं, तथापि लीलाके लिये यह दिखाया गया है कि अपने प्रियतम श्रीकृष्णके पास न जा सकनेसे, उनके विरहानलसे उनको इतना महान् सन्ताप हुआ कि उससे उनके सम्पूर्ण अशुभका भोग हो गया, उनके समस्त पाप नष्ट हो गये। और प्रियतम भगवान्‌के ध्यानसे उन्हें इतना आनन्द हुआ कि उससे उनके सारे पुण्योंका फल मिल गया। इस प्रकार पाप-पुण्योंका पूर्णरूपसे अभाव होनेसे उनकी मुक्ति हो गयी। चाहे किसी भी भावसे हो—कामसे, क्रोधसे, लोभसे—जो भगवान्‌के मंगलमय श्रीविग्रहका चिन्तन करता है, उसके भावकी अपेक्षा न करके वस्तुशक्तिसे ही उसका कल्याण हो जाता है। यह भगवान्‌के श्रीविग्रहकी विशेषता है। भावके द्वारा तो एक प्रस्तरमूर्ति भी परम कल्याणका दान कर सकती है, बिना भावके ही कल्याणदान भगवद्विग्रहका सहज दान है। भगवान् हैं बड़े लीलामय। जहाँ वे अखिल विश्‍वके विधाता ब्रह्मा-शिव आदिके भी वन्दनीय, निखिल जीवोंके प्रत्यगात्मा हैं, वहीं वे लीलानटवर गोपियोंके इशारेपर नाचनेवाले भी हैं। उन्हींकी इच्छासे, उन्हींके प्रेमाह्वानसे, उन्हींके वंशी-निमन्त्रणसे प्रेरित होकर गोपियाँ उनके पास आयीं; परंतु उन्होंने ऐसी भावभंगी प्रकट की, ऐसा स्वाँग बनाया, मानो उन्हें गोपियोंके आनेका कुछ पता ही न हो। शायद गोपियोंके मुँहसे वे उनके हृदयकी बात, प्रेमकी बात सुनना चाहते हों। सम्भव है, वे विप्रलम्भके द्वारा उनके मिलन-भावको परिपुष्ट करना चाहते हों। बहुत करके तो ऐसा मालूम होता है कि कहीं लोग इसे साधारण बात न समझ लें, इसलिये साधारण लोगोंके लिये उपदेश और गोपियोंका अधिकार भी उन्होंने सबके सामने रख दिया। उन्होंने बतलाया—‘गोपियो! व्रजमें कोई विपत्ति तो नहीं आयी, घोर रात्रिमें यहाँ आनेका कारण क्या है? घरवाले ढूँढ़ते होंगे, अब यहाँ ठहरना नहीं चाहिये। वनकी शोभा देख ली, अब बच्चों और बछड़ोंका भी ध्यान करो। धर्मके अनुकूल मोक्षके खुले हुए द्वार अपने सगे-सम्बन्धियोंकी सेवा छोड़कर वनमें दर-दर भटकना स्त्रियोंके लिये अनुचित है। स्त्रीको अपने पतिकी ही सेवा करनी चाहिये, वह कैसा भी क्यों न हो। यही सनातन धर्म है। इसीके अनुसार तुम्हें चलना चाहिये। मैं जानता हूँ कि तुम सब मुझसे प्रेम करती हो। परन्तु प्रेममें शारीरिक सन्‍निधि आवश्यक नहीं है। श्रवण, स्मरण, दर्शन और ध्यानसे सान्‍निध्यकी अपेक्षा अधिक प्रेम बढ़ता है। जाओ, तुम सनातन सदाचारका पालन करो। इधर-उधर मनको मत भटकने दो।’ श्रीकृष्णकी यह शिक्षा गोपियोंके लिये नहीं, सामान्य नारी-जातिके लिये है। गोपियोंका अधिकार विशेष था और उसको प्रकट करनेके लिये ही भगवान् श्रीकृष्णने ऐसे वचन कहे थे। इन्हें सुनकर गोपियोंकी क्या दशा हुई और इसके उत्तरमें उन्होंने श्रीकृष्णसे क्या प्रार्थना की; वे श्रीकृष्णको मनुष्य नहीं मानतीं, उनके पूर्णब्रह्म सनातन स्वरूपको भलीभाँति जानती हैं और यह जानकर ही उनसे प्रेम करती हैं—इस बातका कितना सुन्दर परिचय दिया; यह सब विषय मूलमें ही पाठ करनेयोग्य है। सचमुच जिनके हृदयमें भगवान्‌के परमतत्त्वका वैसा अनुपम ज्ञान और भगवान्‌के प्रति वैसा महान् अनन्य अनुराग है और सचाईके साथ जिनकी वाणीमें वैसे उद्गार हैं, वे ही विशेष अधिकारवान् हैं। गोपियोंकी प्रार्थनासे यह बात स्पष्ट है कि वे श्रीकृष्णको अन्तर्यामी, योगेश्‍वरेश्‍वर परमात्माके रूपमें पहचानती थीं और जैसे दूसरे लोग गुरु, सखा या माता-पिताके रूपमें श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं, वैसे ही वे पतिके रूपमें श्रीकृष्णसे प्रेम करती थीं, जो कि शास्त्रोंमें मधुर भावके—उज्ज्वल परम रसके नामसे कहा गया है। जब प्रेमके सभी भाव पूर्ण होते हैं और साधकोंको स्वामि-सखादिके रूपमें भगवान् मिलते हैं, तब गोपियोंने क्या अपराध किया था कि उनका यह उच्चतम भाव—जिसमें शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य सब-के-सब अन्तर्भूत हैं और जो सबसे उन्‍नत एवं सबका अन्तिम रूप है—न पूर्ण हो? भगवान्‌ने उनका भाव पूर्ण किया और अपनेको असंख्य रूपोंमें प्रकट करके गोपियोंके साथ क्रीडा की। उनकी क्रीडाका स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है—‘रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः।’ जैसे नन्हा-सा शिशु दर्पण अथवा जलमें पड़े हुए अपने प्रतिबिम्बके साथ खेलता है, वैसे ही रमेश भगवान् और व्रजसुन्दरियोंने रमण किया। अर्थात् सच्चिदानन्दघन सर्वान्तर्यामी प्रेमरस-स्वरूप, लीलारसमय परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने अपनी ह्लादिनी-शक्तिरूपा आनन्द-चिन्मयरस-प्रतिभाविता अपनी ही प्रतिमूर्तिसे उत्पन्‍न अपनी प्रतिबिम्ब-स्वरूपा गोपियोंसे आत्मक्रीडा की। पूर्णब्रह्म सनातन रसस्वरूप रसराज रसिक-शेखर रसपरब्रह्म अखिलरसामृतविग्रह भगवान् श्रीकृष्णकी इस चिदानन्द-रसमयी दिव्य क्रीडाका नाम ही रास है। इसमें न कोई जड शरीर था, न प्राकृत अंग-संग था और न इसके सम्बन्धकी प्राकृत और स्थूल कल्पनाएँ ही थीं। यह था चिदानन्दमय भगवान्‌का दिव्य विहार, जो दिव्य लीलाधाममें सर्वदा होते रहनेपर भी कभी-कभी प्रकट होता है। वियोग ही संयोगका पोषक है, मान और मद ही भगवान्‌की लीलामें बाधक हैं। भगवान्‌की दिव्य लीलामें मान और मद भी, जो कि दिव्य हैं, इसीलिये होते हैं कि उनसे लीलामें रसकी और भी पुष्टि हो। भगवान्‌की इच्छासे ही गोपियोंमें लीलानुरूप मान और मदका संचार हुआ और भगवान् अन्तर्धान हो गये। जिनके हृदयमें लेशमात्र भी मद अवशेष है, नाममात्र भी मानका संस्कार शेष है, वे भगवान्‌के सम्मुख रहनेके अधिकारी नहीं। अथवा वे भगवान्‌का, पास रहनेपर भी, दर्शन नहीं कर सकते। परन्तु गोपियाँ गोपियाँ थीं, उनसे जगत‍्के किसी प्राणीकी तिलमात्र भी तुलना नहीं है। भगवान्‌के वियोगमें गोपियोंकी क्या दशा हुई, इस बातको रासलीलाका प्रत्येक पाठक जानता है। गोपियोंके शरीर-मन-प्राण, वे जो कुछ थीं—सब श्रीकृष्णमें एकतान हो गये। उनके प्रेमोन्मादका वह गीत, जो उनके प्राणोंका प्रत्यक्ष प्रतीक है, आज भी भावुक भक्तोंको भावम‌ग्‍न करके भगवान्‌के लीलालोकमें पहुँचा देता है। एक बार सरस हृदयसे हृदयहीन होकर नहीं, पाठ करनेमात्रसे ही यह गोपियोंकी महत्ता सम्पूर्ण हृदयमें भर देता है। गोपियोंके उस ‘महाभाव’—उस ‘अलौकिक प्रेमोन्माद’को देखकर श्रीकृष्ण भी अन्तर्हित न रह सके, उनके सामने ‘साक्षान्मन्मथमन्मथः’ रूपसे प्रकट हुए और उन्होंने मुक्तकण्ठसे स्वीकार किया कि ‘गोपियो! मैं तुम्हारे प्रेमभावका चिर-ऋणी हूँ। यदि मैं अनन्तकालतक तुम्हारी सेवा करता रहूँ, तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता। मेरे अन्तर्धान होनेका प्रयोजन तुम्हारे चित्तको दुखाना नहीं था, बल्कि तुम्हारे प्रेमको और भी उज्ज्वल एवं समृद्ध करना था।’ इसके बाद रासक्रीडा प्रारम्भ हुई। जिन्होंने अध्यात्मशास्त्रका स्वाध्याय किया है, वे जानते हैं कि योगसिद्धिप्राप्त साधारण योगी भी कायव्यूहके द्वारा एक साथ अनेक शरीरोंका निर्माण कर सकते हैं और अनेक स्थानोंपर उपस्थित रहकर पृथक्-पृथक् कार्य कर सकते हैं। इन्द्रादि देवगण एक ही समय अनेक स्थानोंपर उपस्थित होकर अनेक यज्ञोंमें युगपत् आहुति स्वीकार कर सकते हैं। निखिल योगियों और योगेश्‍वरोंके ईश्‍वर सर्वसमर्थ भगवान् श्रीकृष्ण यदि एक ही साथ अनेक गोपियोंके साथ क्रीडा करें, तो इसमें आश्‍चर्यकी कौन-सी बात है? जो लोग भगवान्‌को भगवान् नहीं स्वीकार करते, वही अनेकों प्रकारकी शंका-कुशंकाएँ करते हैं। भगवान्‌की निज लीलामें इन तर्कोंका सर्वथा प्रवेश नहीं है। गोपियाँ श्रीकृष्णकी स्वकीया थीं या परकीया, यह प्रश्‍न भी श्रीकृष्णके स्वरूपको भुलाकर ही उठाया जाता है। श्रीकृष्ण जीव नहीं हैं कि जगत‍्की वस्तुओंमें उनका हिस्सेदार दूसरा भी जीव हो। जो कुछ भी था, है और आगे होगा—उसके एकमात्र पति श्रीकृष्ण ही हैं। अपनी प्रार्थनामें गोपियोंने और परीक्षित‍्के प्रश्‍नके उत्तरमें श्रीशुकदेवजीने यही बात कही है कि गोपी, गोपियोंके पति, उनके पुत्र, सगे-सम्बन्धी और जगत‍्के समस्त प्राणियोंके हृदयमें आत्मारूपसे, परमात्मारूपसे जो प्रभु स्थित हैं—वही श्रीकृष्ण हैं। कोई भ्रमसे, अज्ञानसे, भले ही श्रीकृष्णको पराया समझे; वे किसीके पराये नहीं हैं, सबके अपने हैं, सब उनके हैं। श्रीकृष्णकी दृष्टिसे, जो कि वास्तविक दृष्टि है, कोई परकीया है ही नहीं; सब स्वकीया हैं, सब केवल अपना ही लीलाविलास हैं, सभी स्वरूपभूता अन्तरंगा शक्ति हैं। गोपियाँ इस बातको जानती थीं और स्थान-स्थानपर उन्होंने ऐसा कहा है। ऐसी स्थितिमें ‘जारभाव’ और ‘औपपत्य’ का कोई लौकिक अर्थ नहीं रह जाता। जहाँ काम नहीं है, अंग-संग नहीं है, वहाँ ‘औपपत्य’ और ‘जारभाव’ की कल्पना ही कैसे हो सकती है? गोपियाँ परकीया नहीं थीं, स्वकीया थीं; परन्तु उनमें परकीयाभाव था। परकीया होनेमें और परकीयाभाव होनेमें आकाश-पातालका अन्तर है। परकीयाभावमें तीन बातें बड़े महत्त्वकी होती हैं—अपने प्रियतमका निरन्तर चिन्तन, मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा और दोषदृष्टिका सर्वथा अभाव। स्वकीयाभावमें निरन्तर एक साथ रहनेके कारण ये तीनों बातें गौण हो जाती हैं; परन्तु परकीयाभावमें ये तीनों भाव बने रहते हैं। कुछ गोपियाँ जारभावसे श्रीकृष्णको चाहती थीं, इसका इतना ही अर्थ है कि वे श्रीकृष्णका निरन्तर चिन्तन करती थीं, मिलनेके लिये उत्कण्ठित रहती थीं और श्रीकृष्णके प्रत्येक व्यवहारको प्रेमकी आँखोंसे ही देखती थीं। चौथा भाव विशेष महत्त्वका और है—वह यह कि स्वकीया अपने घरका, अपना और अपने पुत्र एवं कन्याओंका पालन-पोषण, रक्षणावेक्षण पतिसे चाहती है। वह समझती है कि इनकी देखरेख करना पतिका कर्तव्य है; क्योंकि ये सब उसीके आश्रित हैं, और वह पतिसे ऐसी आशा भी रखती है। कितनी ही पतिपरायणा क्यों न हो, स्वकीयामें यह सकामभाव छिपा रहता ही है। परन्तु परकीया अपने प्रियतमसे कुछ नहीं चाहती, कुछ भी आशा नहीं रखती; वह तो केवल अपनेको देकर ही उसे सुखी करना चाहती है। श्रीगोपियोंमें यह भाव भी भलीभाँति प्रस्फुटित था। इसी विशेषताके कारण संस्कृत-साहित्यके कई ग्रन्थोंमें निरन्तर चिन्तनके उदाहरणस्वरूप परकीयाभावका वर्णन आता है। गोपियोंके इस भावके एक नहीं, अनेक दृष्टान्त श्रीमद्भागवतमें मिलते हैं; इसलिये गोपियोंपर परकीयापनका आरोप उनके भावको न समझनेके कारण है। जिसके जीवनमें साधारण धर्मकी एक हलकी-सी प्रकाशरेखा आ जाती है, उसीका जीवन परम पवित्र और दूसरोंके लिये आदर्श-स्वरूप बन जाता है। फिर वे गोपियाँ, जिनका जीवन साधनाकी चरम सीमापर पहुँच चुका है, अथवा जो नित्यसिद्धा एवं भगवान्‌की स्वरूपभूता हैं, या जिन्होंने कल्पोंतक साधना करके श्रीकृष्णकी कृपासे उनका सेवाधिकार प्राप्त कर लिया है, सदाचारका उल्लंघन कैसे कर सकती हैं और समस्त धर्म-मर्यादाओंके संस्थापक श्रीकृष्णपर धर्मोल्लंघनका लाञ्छन कैसे लगाया जा सकता है? श्रीकृष्ण और गोपियोंके सम्बन्धमें इस प्रकारकी कुकल्पनाएँ उनके दिव्य स्वरूप और दिव्यलीलाके विषयमें अनभिज्ञता ही प्रकट करती हैं। श्रीमद्भागवतपर, दशम स्कन्धपर और रासपंचाध्यायीपर अबतक अनेकानेक भाष्य और टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं जिनके लेखकोंमें जगद्गुरु श्रीवल्लभाचार्य, श्रीश्रीधरस्वामी, श्रीजीवगोस्वामी आदि हैं। उन लोगोंने बड़े विस्तारसे रासलीलाकी महिमा समझायी है। किसीने इसे कामपर विजय बतलाया है, किसीने भगवान्‌का दिव्य विहार बतलाया है और किसीने इसका आध्यात्मिक अर्थ किया है। भगवान् श्रीकृष्ण आत्मा हैं, आत्माकार वृत्ति श्रीराधा हैं और शेष आत्माभिमुख वृत्तियाँ गोपियाँ हैं। उनका धाराप्रवाहरूपसे निरन्तर आत्मरमण ही रास है। किसी भी दृष्टिसे देखें, रासलीलाकी महिमा अधिकाधिक प्रकट होती है। परन्तु इससे ऐसा नहीं मानना चाहिये कि श्रीमद्भागवतमें वर्णित रास या रमण-प्रसंग केवल रूपक या कल्पनामात्र है। वह सर्वथा सत्य है और जैसा वर्णन है, वैसा ही मिलन-विलासादिरूप शृंगारका रसास्वादन भी हुआ था। भेद इतना ही है कि वह लौकिक स्त्री-पुरुषोंका मिलन न था। उनके नायक थे सच्चिदानन्दविग्रह, परात्परतत्त्व, पूर्णतम स्वाधीन और निरंकुश स्वेच्छाविहारी गोपीनाथ भगवान् नन्दनन्दन; और नायिका थीं स्वयं ह्लादिनीशक्ति श्रीराधाजी और उनकी कायव्यूहरूपा, उनकी घनीभूत मूर्तियाँ श्रीगोपीजन! अतएव इनकी यह लीला अप्राकृत थी। सर्वथा मीठी मिश्रीकी अत्यन्त कड़ुए इन्द्रायण (तूँबे)-जैसी कोई आकृति बना ली जाय, जो देखनेमें ठीक तूँबे-जैसी ही मालूम हो; परन्तु इससे असलमें क्या वह मिश्रीका तूँबा कड़ुआ थोड़े ही हो जाता है? क्या तूँबेके आकारकी होनेसे ही मिश्रीके स्वाभाविक गुण मधुरताका अभाव हो जाता है? नहीं-नहीं, वह किसी भी आकारमें हो—सर्वत्र, सर्वदा और सर्वथा केवल मिश्री-ही-मिश्री है बल्कि इसमें लीला-चमत्कारकी बात जरूर है। लोग समझते हैं कड़ुआ तूँबा, और होती है वह मधुर मिश्री। इसी प्रकार अखिलरसामृतसिन्धु सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी अन्तरंगा अभिन्‍नस्वरूपा गोपियोंकी लीला भी देखनेमें कैसी ही क्यों न हो, वस्तुतः वह सच्चिदानन्दमयी ही है। उसमें सांसारिक गंदे कामका कड़ुआ स्वाद है ही नहीं। हाँ, यह अवश्य है कि इस लीलाकी नकल किसीको नहीं करनी चाहिये, करना सम्भव भी नहीं है। मायिक पदार्थोंके द्वारा मायातीत भगवान्‌का अनुकरण कोई कैसे कर सकता है? कड़ुए तूँबेको चाहे जैसी सुन्दर मिठाईकी आकृति दे दी जाय, उसका कड़ुआपन कभी मिट नहीं सकता। इसीलिये जिन मोहग्रस्त मनुष्योंने श्रीकृष्णकी रास आदि अन्तरंगलीलाओंका अनुकरण करके नायक-नायिकाका रसास्वादन करना चाहा या चाहते हैं, उनका घोर पतन हुआ है और होगा। श्रीकृष्णकी इन लीलाओंका अनुकरण तो केवल श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं। इसीलिये शुकदेवजीने रासपंचाध्यायीके अन्तमें सबको सावधान करते हुए कह दिया है कि भगवान्‌के उपदेश तो सब मानने चाहिये, परन्तु उनके सभी आचरणोंका अनुकरण नहीं करना चाहिये। जो लोग भगवान् श्रीकृष्णको केवल मनुष्य मानते हैं और केवल मानवीय भाव एवं आदर्शकी कसौटीपर उनके चरित्रको कसना चाहते हैं, वे पहले ही शास्त्रसे विमुख हो जाते हैं, उनके चित्तमें धर्मकी कोई धारणा ही नहीं रहती और वे भगवान्‌को भी अपनी बुद्धिके पीछे चलाना चाहते हैं। इसलिये साधकोंके सामने उनकी युक्तियोंका कोई महत्त्व ही नहीं रहता। जो शास्त्रके ‘श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं’ इस वचनको नहीं मानता, वह उनकी लीलाओंको किस आधारपर सत्य मानकर उनकी आलोचना करता है—यह समझमें नहीं आता। जैसे मानवधर्म, देवधर्म और पशुधर्म पृथक्-पृथक् होते हैं, वैसे ही भगवद्धर्म भी पृथक् होता है और भगवान्‌के चरित्रका परीक्षण उसकी ही कसौटीपर होना चाहिये। भगवान्‌का एकमात्र धर्म है—प्रेमपरवशता, दयापरवशता और भक्तोंकी अभिलाषाकी पूर्ति। यशोदाके हाथोंसे ऊखलमें बँध जानेवाले श्रीकृष्ण अपने निजजन गोपियोंके प्रेमके कारण उनके साथ नाचें, यह उनका सहज धर्म है। यदि यह हठ ही हो कि श्रीकृष्णका चरित्र मानवीय धारणाओं और आदर्शोंके अनुकूल ही होना चाहिये, तो इसमें भी कोई आपत्तिकी बात नहीं है। श्रीकृष्णकी अवस्था उस समय दस वर्षके लगभग थी, जैसा कि भागवतमें स्पष्ट वर्णन मिलता है। गाँवोंमें रहनेवाले बहुत-से दस वर्षके बच्चे तो नंगे ही रहते हैं। उन्हें कामवृत्ति और स्त्री-पुरुष-सम्बन्धका कुछ ज्ञान ही नहीं रहता। लड़के-लड़की एक साथ खेलते हैं, नाचते हैं, गाते हैं, त्योहार मनाते हैं, गुड़ुई-गुड़ुएकी शादी करते हैं, बारात ले जाते हैं और आपसमें भोज-भात भी करते हैं। गाँवके बड़े-बूढ़े लोग बच्चोंका यह मनोरंजन देखकर प्रसन्‍न ही होते हैं, उनके मनमें किसी प्रकारका दुर्भाव नहीं आता। ऐसे बच्चोंको युवती स्त्रियाँ भी बड़े प्रेमसे देखती हैं, आदर करती हैं, नहलाती हैं, खिलाती हैं। यह तो साधारण बच्चोंकी बात है। श्रीकृष्ण-जैसे असाधारण धी-शक्तिसम्पन्‍न बालक जिनके अनेक सद्गुण बाल्यकालमें ही प्रकट हो चुके थे; जिनकी सम्मति, चातुर्य्य और शक्तिसे बड़ी-बड़ी विपत्तियोंसे व्रजवासियोंने त्राण पाया था; उनके प्रति वहाँकी स्त्रियों, बालिकाओं और बालकोंका कितना आदर रहा होगा—इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। उनके सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्‍वर्यसे आकृष्ट होकर गाँवकी बालक-बालिकाएँ उनके साथ ही रहती थीं और श्रीकृष्ण भी अपनी मौलिक प्रतिभासे राग, ताल आदि नये-नये ढंगसे उनका मनोरंजन करते थे और उन्हें शिक्षा देते थे। ऐसे ही मनोरंजनोंमेंसे रासलीला भी एक थी, ऐसा समझना चाहिये। जो श्रीकृष्णको केवल मनुष्य समझते हैं, उनकी दृष्टिमें भी यह दोषकी बात नहीं होनी चाहिये। वे उदारता और बुद्धिमानीके साथ भागवतमें आये हुए काम-रति आदि शब्दोंका ठीक वैसा ही अर्थ समझें, जैसा कि उपनिषद् और गीतामें इन शब्दोंका अर्थ होता है। वास्तवमें गोपियोंके निष्कपट प्रेमका ही नामान्तर काम है और भगवान् श्रीकृष्णका आत्मरमण अथवा उनकी दिव्य क्रीडा ही रति है। इसीलिये स्थान-स्थानपर उनके लिये विभु, परमेश्‍वर, लक्ष्मीपति, भगवान्, योगेश्‍वरेश्‍वर, आत्माराम, मन्मथमन्मथ आदि शब्द आये हैं—जिससे किसीको कोई भ्रम न हो जाय। जब गोपियाँ श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि सुनकर वनमें जाने लगी थीं, तब उनके सगे-सम्बन्धियोंने उन्हें जानेसे रोका था। रातमें अपनी बालिकाओंको भला, कौन बाहर जाने देता। फिर भी वे चली गयीं और इससे घरवालोंको किसी प्रकारकी अप्रसन्‍नता नहीं हुई। और न तो उन्होंने श्रीकृष्णपर या गोपियोंपर किसी प्रकारका लाञ्छन ही लगाया। उनका श्रीकृष्णपर, गोपियोंपर विश्‍वास था और वे उनके बचपन और खेलोंसे परिचित थे। उन्हें तो ऐसा मालूम हुआ मानो गोपियाँ हमारे पास ही हैं। इसको दो प्रकारसे समझ सकते हैं। एक तो यह कि श्रीकृष्णके प्रति उनका इतना विश्‍वास था कि श्रीकृष्णके पास गोपियोंका रहना भी अपने ही पास रहना है। यह तो मानवीय दृष्टि है। दूसरी दृष्टि यह है कि श्रीकृष्णकी योगमायाने ऐसी व्यवस्था कर रखी थी, गोपोंको वे घरमें ही दीखती थीं । किसी भी दृष्टिसे रासलीला दूषित प्रसंग नहीं है, बल्कि अधिकारी पुरुषोंके लिये तो यह सम्पूर्ण मनोमलको नष्ट करनेवाला है। रासलीलाके अन्तमें कहा गया है कि जो पुरुष श्रद्धा-भक्तिपूर्वक रासलीलाका श्रवण और वर्णन करता है, उसके हृदयका रोग-काम बहुत ही शीघ्र नष्ट हो जाता है और उसे भगवान्‌का प्रेम प्राप्त होता है। भागवतमें अनेक स्थानपर ऐसा वर्णन आता है कि जो भगवान्‌की मायाका वर्णन करता है, वह मायासे पार हो जाता है। जो भगवान्‌के कामजयका वर्णन करता है, वह कामपर विजय प्राप्त करता है। राजा परीक्षित‍्ने अपने प्रश्‍नोंमें जो शंकाएँ की हैं, उनका उत्तर प्रश्‍नोंके अनुरूप ही अध्याय २९ के श्‍लोक १३ से १६ तक और अध्याय ३३ के श्‍लोक ३० से ३७ तक श्रीशुकदेवजीने दिया है। उस उत्तरसे वे शंकाएँ तो हट गयी हैं, परन्तु भगवान्‌की दिव्यलीलाका रहस्य नहीं खुलने पाया; सम्भवतः उस रहस्यको गुप्त रखनेके लिये ही ३३वें अध्यायमें रासलीलाप्रसंग समाप्त कर दिया गया। वस्तुतः इस लीलाके गूढ़ रहस्यकी प्राकृत-जगत‍्में व्याख्या की भी नहीं जा सकती क्योंकि यह इस जगत‍्की क्रीडा ही नहीं है। यह तो उस दिव्य आनन्दमय रसमय राज्यकी चमत्कारमयी लीला है, जिसके श्रवण और दर्शनके लिये परमहंस मुनिगण भी सदा उत्कण्ठित रहते हैं। कुछ लोग इस लीलाप्रसंगको भागवतमें क्षेपक मानते हैं, वे वास्तवमें दुराग्रह करते हैं। क्योंकि प्राचीन-से-प्राचीन प्रतियोंमें भी यह प्रसंग मिलता है और जरा विचार करके देखनेसे यह सर्वथा सुसंगत और निर्दोष प्रतीत होता है। भगवान् श्रीकृष्ण कृपा करके ऐसी विमल बुद्धि दें, जिससे हमलोग इसका कुछ रहस्य समझनेमें समर्थ हों। भगवान्‌के इस दिव्य-लीलाके वर्णनका यही प्रयोजन है कि जीव गोपियोंके उस अहैतुक प्रेमका, जो कि श्रीकृष्णको ही सुख पहुँचानेके लिये था, स्मरण करे और उसके द्वारा भगवान्‌के रसमय दिव्यलीलालोकमें भगवान्‌के अनन्त प्रेमका अनुभव करे। हमें रासलीलाका अध्ययन करते समय किसी प्रकारकी भी शंका न करके इस भावको जगाये रखना चाहिये। —हनुमानप्रसाद पोद्दार"}],"corrections":{"count":2,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}