{"id":"10.30","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 30","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ त्रिंशोऽध्यायः","topics":["श्रीकृष्णके विरहमें गोपियोंकी दशा"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[316,323]},"verses":[{"id":"10.30.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/1/","page":316,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः।","अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्॥ १"],"iast":["antarhite bhagavati sahasaiva vrajāṅganāḥ|","atapyaṃstamacakṣāṇāḥ kariṇya iva yūthapam|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् सहसा अन्तर्धान हो गये। उन्हें न देखकर व्रजयुवतियोंकी वैसी ही दशा हो गयी, जैसे यूथपति गजराजके बिना हथिनियोंकी होती है। उनका हृदय विरहकी ज्वालासे जलने लगा॥ १॥"},{"id":"10.30.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/2/","page":317,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै-","र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः ।","आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते-","स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः॥ २"],"iast":["gatyānurāgasmitavibhramekṣitai-","rmanoramālāpavihāravibhramaiḥ |","ākṣiptacittāḥ pramadā ramāpate-","stāstā viceṣṭā jagṛhustadātmikāḥ|| 2"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णकी मदोन्मत्त गजराजकी-सी चाल, प्रेमभरी मुसकान, विलासभरी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारकी लीलाओं तथा शृंगार-रसकी भाव-भंगियोंने उनके चित्तको चुरा लिया था। वे प्रेमकी मतवाली गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो गयीं और फिर श्रीकृष्णकी विभिन्‍न चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं॥ २॥"},{"id":"10.30.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/3/","page":317,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषु","प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।","असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका","न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः॥ ३"],"iast":["gatismitaprekṣaṇabhāṣaṇādiṣu","priyāḥ priyasya pratirūḍhamūrtayaḥ|","asāvahaṃ tvityabalāstadātmikā","nyavediṣuḥ kṛṣṇavihāravibhramāḥ|| 3"],"meaning":"अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन-बोलन आदिमें श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयीं; उनके शरीरमें भी वही गति-मति, वही भाव-भंगी उतर आयी। वे अपनेको सर्वथा भूलकर श्रीकृष्ण-स्वरूप हो गयीं और उन्हींके लीला-विलासका अनुकरण करती हुई ‘मैं श्रीकृष्ण ही हूँ’—इस प्रकार कहने लगीं॥ ३॥"},{"id":"10.30.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/4/","page":317,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता","विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्।","पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि-","र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन्॥ ४"],"iast":["gāyantya uccairamumeva saṃhatā","vicikyurunmattakavad vanād vanam|","papracchurākāśavadantaraṃ bahi-","rbhūteṣu santaṃ puruṣaṃ vanaspatīn|| 4"],"meaning":"वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वरसे उन्हींके गुणोंका गान करने लगीं और मतवाली होकर एक वनसे दूसरे वनमें, एक झाड़ीसे दूसरी झाड़ीमें जा-जाकर श्रीकृष्णको ढूँढने लगीं। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण कहीं दूर थोड़े ही गये थे। वे तो समस्त जड-चेतन पदार्थोंमें तथा उनके बाहर भी आकाशके समान एकरस स्थित ही हैं। वे वहीं थे, उन्हींमें थे, परन्तु उन्हें न देखकर गोपियाँ वनस्पतियोंसे—पेड़-पौधोंसे उनका पता पूछने लगीं॥ ४॥"},{"id":"10.30.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/5/","page":317,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्टो वः कच्चिदश्‍वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः।","नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः॥ ५"],"iast":["dṛṣṭo vaḥ kaccidaśvattha plakṣa nyagrodha no manaḥ|","nandasūnurgato hṛtvā premahāsāvalokanaiḥ|| 5"],"meaning":"(गोपियोंने पहले बड़े-बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा) ‘हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं। क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है?॥ ५॥"},{"id":"10.30.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/6/","page":317,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कच्चित् कुरबकाशोकनागपुन्‍नागचम्पकाः।","रामानुजो मानिनीनामितो दर्पहरस्मितः॥ ६"],"iast":["kaccit kurabakāśokanāgapunnāgacampakāḥ|","rāmānujo māninīnāmito darpaharasmitaḥ|| 6"],"meaning":"कुरबक, अशोक, नागकेशर, पुन्‍नाग और चम्पा! बलरामजीके छोटे भाई, जिनकी मुसकान-मात्रसे बड़ी-बड़ी मानिनियोंका मानमर्दन हो जाता है, इधर आये थे क्या?’॥ ६॥"},{"id":"10.30.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/7/","page":317,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये।","सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ ७"],"iast":["kaccittulasi kalyāṇi govindacaraṇapriye|","saha tvālikulairbibhrad dṛṣṭaste'tipriyo'cyutaḥ|| 7"],"meaning":"(अब उन्होंने स्त्रीजातिके पौधोंसे कहा—) ‘बहिन तुलसी! तुम्हारा हृदय तो बड़ा कोमल है, तुम तो सभी लोगोंका कल्याण चाहती हो। भगवान्‌के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम तो है ही, वे भी तुमसे बहुत प्यार करते हैं। तभी तो भौंरोंके मँडराते रहनेपर भी वे तुम्हारी माला नहीं उतारते, सर्वदा पहने रहते हैं। क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्यामसुन्दरको देखा है?॥ ७॥"},{"id":"10.30.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/8/","page":318,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जाति यूथिके।","प्रीतिं वो जनयन् यातः करस्पर्शेन माधवः॥ ८"],"iast":["mālatyadarśi vaḥ kaccinmallike jāti yūthike|","prītiṃ vo janayan yātaḥ karasparśena mādhavaḥ|| 8"],"meaning":"प्यारी मालती! मल्लिके! जाती और जूही! तुमलोगोंने कदाचित् हमारे प्यारे माधवको देखा होगा। क्या वे अपने कोमल करोंसे स्पर्श करके तुम्हें आनन्दित करते हुए इधरसे गये हैं?’॥ ८॥"},{"id":"10.30.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/9/","page":318,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चूतप्रियालपनसासनकोविदार-","जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः।","येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः","शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः॥ ९"],"iast":["cūtapriyālapanasāsanakovidāra-","jambvarkabilvabakulāmrakadambanīpāḥ|","ye'nye parārthabhavakā yamunopakūlāḥ","śaṃsantu kṛṣṇapadavīṃ rahitātmanāṃ naḥ|| 9"],"meaning":"‘रसाल, प्रियाल, कटहल, पीतशाल, कचनार, जामुन, आक, बेल, मौलसिरी, आम, कदम्ब और नीम तथा अन्यान्य यमुनाके तटपर विराजमान सुखी तरुवरो! तुम्हारा जन्म-जीवन केवल परोपकारके लिये है। श्रीकृष्णके बिना हमारा जीवन सूना हो रहा है। हम बेहोश हो रही हैं। तुम हमें उन्हें पानेका मार्ग बता दो’॥ ९॥"},{"id":"10.30.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/10/","page":318,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्‌घ्रि-","स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि।","अप्यङ्‌घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा","आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन॥ १०"],"iast":["kiṃ te kṛtaṃ kṣiti tapo bata keśavāṅghri-","sparśotsavotpulakitāṅgaruhairvibhāsi|","apyaṅghrisambhava urukramavikramād vā","āho varāhavapuṣaḥ parirambhaṇena|| 10"],"meaning":"‘भगवान्‌की प्रेयसी पृथ्वीदेवी! तुमने ऐसी कौन-सी तपस्या की है कि श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके तुम आनन्दसे भर रही हो और तृण-लता आदिके रूपमें अपना रोमांच प्रकट कर रही हो? तुम्हारा यह उल्लास-विलास श्रीकृष्णके चरणस्पर्शके कारण है अथवा वामनावतारमें विश्‍वरूप धारण करके उन्होंने तुम्हें जो नापा था, उसके कारण है? कहीं उनसे भी पहले वराह भगवान्‌के अंग-संगके कारण तो तुम्हारी यह दशा नहीं हो रही है?’॥ १०॥"},{"id":"10.30.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/11/","page":318,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अप्येणपत्‍न्युपगतः प्रिययेह गात्रै-","स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः।","कान्ताङ्गसङ्गकुचकुंकुमरंजितायाः","कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः॥ ११"],"iast":["apyeṇapatnyupagataḥ priyayeha gātrai-","stanvan dṛśāṃ sakhi sunirvṛtimacyuto vaḥ|","kāntāṅgasaṅgakucakuṃkumaraṃjitāyāḥ","kundasrajaḥ kulapateriha vāti gandhaḥ|| 11"],"meaning":"‘अरी सखी! हरिनियो! हमारे श्यामसुन्दरके अंग-संगसे सुषमा-सौन्दर्यकी धारा बहती रहती है,वे कहीं अपनी प्राणप्रियाके साथ तुम्हारे नयनोंको परमानन्दका दान करते हुए इधरसे ही तो नहीं गये हैं? देखो, देखो; यहाँ कुलपति श्रीकृष्णकी कुन्दकलीकी मालाकी मनोहर गन्ध आ रही है, जो उनकी परम प्रेयसीके अंग-संगसे लगे हुए कुच-कुंकुमसे अनुरंजित रहती है’॥ ११॥"},{"id":"10.30.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/12/","page":318,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो","रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः।","अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामं","किं वाभिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः॥ १२"],"iast":["bāhuṃ priyāṃsa upadhāya gṛhītapadmo","rāmānujastulasikālikulairmadāndhaiḥ|","anvīyamāna iha vastaravaḥ praṇāmaṃ","kiṃ vābhinandati caran praṇayāvalokaiḥ|| 12"],"meaning":"‘तरुवरो! उनकी मालाकी तुलसीमें ऐसी सुगन्ध है कि उसकी गन्धके लोभी मतवाले भौंरे प्रत्येक क्षण उसपर मँडराते रहते हैं। उनके एक हाथमें लीलाकमल होगा और दूसरा हाथ अपनी प्रेयसीके कंधेपर रखे होंगे। हमारे प्यारे श्यामसुन्दर इधरसे विचरते हुए अवश्य गये होंगे। जान पड़ता है, तुमलोग उन्हें प्रणाम करनेके लिये ही झुके हो। परन्तु उन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवनसे भी तुम्हारी वन्दनाका अभिनन्दन किया है या नहीं?’॥ १२॥"},{"id":"10.30.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/13/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्‍लिष्टा वनस्पतेः।","नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो॥ १३"],"iast":["pṛcchatemā latā bāhūnapyāśliṣṭā vanaspateḥ|","nūnaṃ tatkarajaspṛṣṭā bibhratyutpulakānyaho|| 13"],"meaning":"‘अरी सखी! इन लताओंसे पूछो। ये अपने पति वृक्षोंको भुजपाशमें बाँधकर आलिंगन किये हुए हैं, इससे क्या हुआ? इनके शरीरमें जो पुलक है, रोमांच है, वह तो भगवान्‌के नखोंके स्पर्शसे ही है। अहो! इनका कैसा सौभाग्य है?’॥ १३॥"},{"id":"10.30.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/14/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युन्मत्तवचो गोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः।","लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः॥ १४"],"iast":["ityunmattavaco gopyaḥ kṛṣṇānveṣaṇakātarāḥ|","līlā bhagavatastāstā hyanucakrustadātmikāḥ|| 14"],"meaning":"परीक्षित्! इस प्रकार मतवाली गोपियाँ प्रलाप करती हुई भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कातर हो रही थीं। अब और भी गाढ़ आवेश हो जानेके कारण वे भगवन्मय होकर भगवान्‌की विभिन्‍न लीलाओंका अनुकरण करने लगीं॥ १४॥"},{"id":"10.30.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/15/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कस्याश्‍चित् पूतनायन्त्याः कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम्।","तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहञ्छकटायतीम्॥ १५"],"iast":["kasyāścit pūtanāyantyāḥ kṛṣṇāyantyapibat stanam|","tokāyitvā rudatyanyā padāhañchakaṭāyatīm|| 15"],"meaning":"एक पूतना बन गयी, तो दूसरी श्रीकृष्ण बनकर उसका स्तन पीने लगीं। कोई छकड़ा बन गयी, तो किसीने बालकृष्ण बनकर रोते हुए उसे पैरकी ठोकर मारकर उलट दिया॥ १५॥"},{"id":"10.30.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/16/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दैत्यायित्वा जहारान्यामेका कृष्णार्भभावनाम्।","रिङ्गयामास काप्यङ्‌घ्री कर्षन्ती घोषनिःस्वनैः॥ १६"],"iast":["daityāyitvā jahārānyāmekā kṛṣṇārbhabhāvanām|","riṅgayāmāsa kāpyaṅghrī karṣantī ghoṣaniḥsvanaiḥ|| 16"],"meaning":"कोई सखी बालकृष्ण बनकर बैठ गयी तो कोई तृणावर्त दैत्यका रूप धारण करके उसे हर ले गयी। कोई गोपी पाँव घसीट-घसीटकर घुटनोंके बल बकैयाँ चलने लगी और उस समय उसके पायजेब रुनझुन-रुनझुन बोलने लगे॥ १६॥"},{"id":"10.30.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/17/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णरामायिते द्वे तु गोपयन्त्यश्‍च काश्‍चन।","वत्सायतीं हन्ति चान्या तत्रैका तु बकायतीम्॥ १७"],"iast":["kṛṣṇarāmāyite dve tu gopayantyaśca kāścana|","vatsāyatīṃ hanti cānyā tatraikā tu bakāyatīm|| 17"],"meaning":"एक बनी कृष्ण, तो दूसरी बनी बलराम, और बहुत-सी गोपियाँ ग्वालबालोंके रूपमें हो गयीं। एक गोपी बन गयी वत्सासुर, तो दूसरी बनी बकासुर। तब तो गोपियोंने अलग-अलग श्रीकृष्ण बनकर वत्सासुर और बकासुर बनी हुई गोपियोंको मारनेकी लीला की॥ १७॥"},{"id":"10.30.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/18/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आहूय दूरगा यद्वत् कृष्णस्तमनुकुर्वतीम्।","वेणुं क्वणन्तीं क्रीडन्तीमन्याः शंसन्ति साध्विति॥ १८"],"iast":["āhūya dūragā yadvat kṛṣṇastamanukurvatīm|","veṇuṃ kvaṇantīṃ krīḍantīmanyāḥ śaṃsanti sādhviti|| 18"],"meaning":"जैसे श्रीकृष्ण वनमें करते थे, वैसे ही एक गोपी बाँसुरी बजा-बजाकर दूर गये हुए पशुओंको बुलानेका खेल खेलने लगी। तब दूसरी गोपियाँ ‘वाह-वाह’ करके उसकी प्रशंसा करने लगीं॥ १८॥"},{"id":"10.30.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/19/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कस्यांचित् स्वभुजं न्यस्य चलन्त्याहापरा ननु।","कृष्णोऽहं पश्यत गतिं ललितामिति तन्मनाः॥ १९"],"iast":["kasyāṃcit svabhujaṃ nyasya calantyāhāparā nanu|","kṛṣṇo'haṃ paśyata gatiṃ lalitāmiti tanmanāḥ|| 19"],"meaning":"एक गोपी अपनेको श्रीकृष्ण समझकर दूसरी सखीके गलेमें बाँह डालकर चलती और गोपियोंसे कहने लगती—‘मित्रो! मैं श्रीकृष्ण हूँ। तुमलोग मेरी यह मनोहर चाल देखो’॥ १९॥"},{"id":"10.30.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/20/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मा भैष्ट वातवर्षाभ्यां तत्त्राणं विहितं मया।","इत्युक्त्वैकेन हस्तेन यतन्त्युन्‍निदधेऽम्बरम्॥ २०"],"iast":["mā bhaiṣṭa vātavarṣābhyāṃ tattrāṇaṃ vihitaṃ mayā|","ityuktvaikena hastena yatantyunnidadhe'mbaram|| 20"],"meaning":"कोई गोपी श्रीकृष्ण बनकर कहती—‘अरे व्रजवासियो! तुम आँधी-पानीसे मत डरो। मैंने उससे बचनेका उपाय निकाल लिया है।’ ऐसा कहकर गोवर्धन-धारणका अनुकरण करती हुई वह अपनी ओढ़नी उठाकर ऊपर तान लेती॥ २०॥"},{"id":"10.30.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/21/","page":319,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आरुह्यैका पदाऽऽक्रम्य शिरस्याहापरां नृप।","दुष्टाहे गच्छ जातोऽहं खलानां ननु दण्डधृक्॥ २१"],"iast":["āruhyaikā padā''kramya śirasyāhāparāṃ nṛpa|","duṣṭāhe gaccha jāto'haṃ khalānāṃ nanu daṇḍadhṛk|| 21"],"meaning":"परीक्षित्! एक गोपी बनी कालिय नाग, तो दूसरी श्रीकृष्ण बनकर उसके सिरपर पैर रखकर चढ़ी-चढ़ी बोलने लगी—‘रे दुष्ट साँप! तू यहाँसे चला जा। मैं दुष्टोंका दमन करनेके लिये ही उत्पन्‍न हुआ हूँ’॥ २१॥"},{"id":"10.30.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/22/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रैकोवाच हे गोपा दावाग्‍निं पश्यतोल्बणम्।","चक्षूंष्याश्‍वपिदध्वं वो विधास्ये क्षेममंजसा॥ २२"],"iast":["tatraikovāca he gopā dāvāgniṃ paśyatolbaṇam|","cakṣūṃṣyāśvapidadhvaṃ vo vidhāsye kṣemamaṃjasā|| 22"],"meaning":"इतनेमें ही एक गोपी बोली—‘अरे ग्वालो! देखो, वनमें बड़ी भयंकर आग लगी है। तुमलोग जल्दी-से-जल्दी अपनी आँखें मूँद लो, मैं अनायास ही तुमलोगोंकी रक्षा कर लूँगा’॥ २२॥"},{"id":"10.30.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/23/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बद्धान्यया स्रजा काचित्तन्वी तत्र उलूखले।","भीता सुदृक् पिधायास्यं भेजे भीतिविडम्बनम्॥ २३"],"iast":["baddhānyayā srajā kācittanvī tatra ulūkhale|","bhītā sudṛk pidhāyāsyaṃ bheje bhītiviḍambanam|| 23"],"meaning":"एक गोपी यशोदा बनी और दूसरी बनी श्रीकृष्ण। यशोदाने फूलोंकी मालासे श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। अब वह श्रीकृष्ण बनी हुई सुन्दरी गोपी हाथोंसे मुँह ढँककर भयकी नकल करने लगी॥ २३॥"},{"id":"10.30.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/24/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं कृष्णं पृच्छमाना वृन्दावनलतास्तरून्।","व्यचक्षत वनोद्देशे पदानि परमात्मनः॥ २४"],"iast":["evaṃ kṛṣṇaṃ pṛcchamānā vṛndāvanalatāstarūn|","vyacakṣata vanoddeśe padāni paramātmanaḥ|| 24"],"meaning":"परीक्षित्! इस प्रकार लीला करते-करते गोपियाँ वृन्दावनके वृक्ष और लता आदिसे फिर भी श्रीकृष्णका पता पूछने लगीं। इसी समय उन्होंने एक स्थानपर भगवान्‌के चरणचिह्न देखे॥ २४॥"},{"id":"10.30.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/25/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पदानि व्यक्तमेतानि नन्दसूनोर्महात्मनः।","लक्ष्यन्ते हि ध्वजाम्भोजवज्रांकुशयवादिभिः॥ २५"],"iast":["padāni vyaktametāni nandasūnormahātmanaḥ|","lakṣyante hi dhvajāmbhojavajrāṃkuśayavādibhiḥ|| 25"],"meaning":"वे आपसमें कहने लगीं—‘अवश्य ही ये चरणचिह्न उदारशिरोमणि नन्दनन्दन श्यामसुन्दरके हैं; क्योंकि इनमें ध्वजा, कमल, वज्र, अंकुश और जौ आदिके चिह्न स्पष्ट ही दीख रहे हैं’॥ २५॥"},{"id":"10.30.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/26/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तैस्तैः पदैस्तत्पदवीमन्विच्छन्त्योऽग्रतोऽबलाः।","वध्वाः पदैः सुपृक्तानि विलोक्यार्ताः समब्रुवन्॥ २६"],"iast":["taistaiḥ padaistatpadavīmanvicchantyo'grato'balāḥ|","vadhvāḥ padaiḥ supṛktāni vilokyārtāḥ samabruvan|| 26"],"meaning":"उन चरणचिह्नोंके द्वारा व्रजवल्लभ भगवान्‌को ढूँढ़ती हुई गोपियाँ आगे बढ़ीं, तब उन्हें श्रीकृष्णके साथ किसी व्रजयुवतीके भी चरणचिह्न दीख पड़े। उन्हें देखकर वे व्याकुल हो गयीं। और आपसमें कहने लगीं—॥ २६॥"},{"id":"10.30.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/27/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कस्याः पदानि चैतानि याताया नन्दसूनुना।","अंसन्यस्तप्रकोष्ठायाः करेणोः करिणा यथा॥ २७"],"iast":["kasyāḥ padāni caitāni yātāyā nandasūnunā|","aṃsanyastaprakoṣṭhāyāḥ kareṇoḥ kariṇā yathā|| 27"],"meaning":"‘जैसे हथिनी अपने प्रियतम गजराजके साथ गयी हो, वैसे ही नन्दनन्दन श्यामसुन्दरके साथ उनके कंधेपर हाथ रखकर चलनेवाली किस बड़भागिनीके ये चरणचिह्न हैं?॥ २७॥"},{"id":"10.30.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/28/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अनयाऽऽराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्‍वरः।","यन्‍नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद् रहः॥ २८"],"iast":["anayā''rādhito nūnaṃ bhagavān harirīśvaraḥ|","yanno vihāya govindaḥ prīto yāmanayad rahaḥ|| 28"],"meaning":"अवश्य ही सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णकी यह ‘आराधिका’ होगी। इसीलिये इसपर प्रसन्‍न होकर हमारे प्राणप्यारे श्यामसुन्दरने हमें छोड़ दिया है और इसे एकान्तमें ले गये हैं॥ २८॥"},{"id":"10.30.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/29/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाङ् घ्र्यब्जरेणवः।","यान् ब्रह्मेशो रमा देवी दधुर्मूर्ध्‍न्‍यघनुत्तये॥ २९"],"iast":["dhanyā aho amī ālyo govindāṅ ghryabjareṇavaḥ|","yān brahmeśo ramā devī dadhurmūrdhnyaghanuttaye|| 29"],"meaning":"प्यारी सखियो! भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलसे जिस रजका स्पर्श कर देते हैं, वह धन्य हो जाती है, उसके अहोभाग्य हैं! क्योंकि ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी आदि भी अपने अशुभ नष्ट करनेके लिये उस रजको अपने सिरपर धारण करते हैं’॥ २९॥"},{"id":"10.30.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/30/","page":320,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्या अमूनि नः क्षोभं कुर्वन्त्युच्चैः पदानि यत्।","यैकापहृत्य गोपीनां रहो भुङ्क्तेऽच्युताधरम्॥ ३०"],"iast":["tasyā amūni naḥ kṣobhaṃ kurvantyuccaiḥ padāni yat|","yaikāpahṛtya gopīnāṃ raho bhuṅkte'cyutādharam|| 30"],"meaning":"‘अरी सखी! चाहे कुछ भी हो—यह जो सखी हमारे सर्वस्व श्रीकृष्णको एकान्तमें ले जाकर अकेले ही उनकी अधर-सुधाका रस पी रही है, इस गोपीके उभरे हुए चरणचिह्न तो हमारे हृदयमें बड़ा ही क्षोभ उत्पन्‍न कर रहे हैं’॥ ३०॥"},{"id":"10.30.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/31/","page":321,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न लक्ष्यन्ते पदान्यत्र तस्या नूनं तृणांकुरैः।","खिद्यत्सुजाताङ्‌घ्रितलामुन्‍निन्ये प्रेयसीं प्रियः॥ ३१"],"iast":["na lakṣyante padānyatra tasyā nūnaṃ tṛṇāṃkuraiḥ|","khidyatsujātāṅghritalāmunninye preyasīṃ priyaḥ|| 31"],"meaning":"यहाँ उस गोपीके पैर नहीं दिखायी देते। मालूम होता है, यहाँ प्यारे श्यामसुन्दरने देखा होगा कि मेरी प्रेयसीके सुकुमार चरणकमलोंमें घासकी नोक गड़ती होगी; इसलिये उन्होंने उसे अपने कंधेपर चढ़ा लिया होगा॥ ३१॥"},{"id":"10.30.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/32/","page":321,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इमान्यधिकम‌ग्‍नानि पदानि वहतो वधूम्।","गोप्यः पश्यत कृष्णस्य भाराक्रान्तस्य कामिनः॥ ३२"],"iast":["imānyadhikamagnāni padāni vahato vadhūm|","gopyaḥ paśyata kṛṣṇasya bhārākrāntasya kāminaḥ|| 32"],"meaning":"सखियो! यहाँ देखो, प्यारे श्रीकृष्णके चरणचिह्न अधिक गहरे—बालूमें धँसे हुए हैं। इससे सूचित होता है कि यहाँ वे किसी भारी वस्तुको उठाकर चले हैं, उसीके बोझसे उनके पैर जमीनमें धँस गये हैं। हो-न-हो यहाँ उस कामीने अपनी प्रियतमाको अवश्य कंधेपर चढ़ाया होगा॥ ३२॥"},{"id":"10.30.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/33/","page":321,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अत्रावरोपिता कान्ता पुष्पहेतोर्महात्मना।","अत्र प्रसूनावचयः प्रियार्थे प्रेयसा कृतः।","प्रपदाक्रमणे एते पश्यतासकले पदे॥ ३३"],"iast":["atrāvaropitā kāntā puṣpahetormahātmanā|","atra prasūnāvacayaḥ priyārthe preyasā kṛtaḥ|","prapadākramaṇe ete paśyatāsakale pade|| 33"],"meaning":"देखो-देखो, यहाँ परमप्रेमी व्रजवल्लभने फूल चुननेके लिये अपनी प्रेयसीको नीचे उतार दिया है और यहाँ परम प्रियतम श्रीकृष्णने अपनी प्रेयसीके लिये फूल चुने हैं। उचक-उचककर फूल तोड़नेके कारण यहाँ उनके पंजे तो धरतीमें गड़े हुए हैं और एड़ीका पता ही नहीं है॥ ३३॥"},{"id":"10.30.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/34/","page":321,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["केशप्रसाधनं त्वत्र कामिन्याः कामिना कृतम्।","तानि चूडयता कान्तामुपविष्टमिह ध्रुवम्॥ ३४"],"iast":["keśaprasādhanaṃ tvatra kāminyāḥ kāminā kṛtam|","tāni cūḍayatā kāntāmupaviṣṭamiha dhruvam|| 34"],"meaning":"परम प्रेमी श्रीकृष्णने कामी पुरुषके समान यहाँ अपनी प्रेयसीके केश सँवारे हैं। देखो, अपने चुने हुए फूलोंको प्रेयसीकी चोटीमें गूँथनेके लिये वे यहाँ अवश्य ही बैठे रहे होंगे॥ ३४॥"},{"id":"10.30.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/35/","page":321,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रेमे तया चात्मरत आत्मारामोऽप्यखण्डितः।","कामिनां दर्शयन् दैन्यं स्त्रीणां चैव दुरात्मताम्॥ ३५"],"iast":["reme tayā cātmarata ātmārāmo'pyakhaṇḍitaḥ|","kāmināṃ darśayan dainyaṃ strīṇāṃ caiva durātmatām|| 35"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। वे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट और पूर्ण हैं। जब वे अखण्ड हैं, उनमें दूसरा कोई है ही नहीं, तब उनमें कामकी कल्पना कैसे हो सकती है? फिर भी उन्होंने कामियोंकी दीनता-स्त्रीपरवशता और स्त्रियोंकी कुटिलता दिखलाते हुए वहाँ उस गोपीके साथ एकान्तमें क्रीडा की थी—एक खेल रचा था॥ ३५॥"},{"id":"10.30.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/36/","page":321,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्येवं दर्शयन्त्यस्ताश्‍चेरुर्गोप्यो विचेतसः।","यां गोपीमनयत् कृष्णो विहायान्याः स्त्रियो वने॥ ३६"],"iast":["ityevaṃ darśayantyastāścerurgopyo vicetasaḥ|","yāṃ gopīmanayat kṛṣṇo vihāyānyāḥ striyo vane|| 36"],"meaning":"इस प्रकार गोपियाँ मतवाली-सी होकर—अपनी सुधबुध खोकर एक दूसरेको भगवान् श्रीकृष्णके चरणचिह्न दिखलाती हुई वन-वनमें भटक रही थीं। इधर भगवान् श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको वनमें छोड़कर जिस भाग्यवती गोपीको एकान्तमें ले गये थे, उसने समझा कि ‘मैं ही समस्त गोपियोंमें श्रेष्ठ हूँ। इसीलिये तो हमारे प्यारे श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको छोड़कर, जो उन्हें इतना चाहती हैं, केवल मेरा ही मान करते हैं। मुझे ही आदर दे रहे हैं॥ ३६-३७॥","meaning_covers":[36,37]},{"id":"10.30.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/37/","page":321,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सा च मेने तदाऽऽत्मानं वरिष्ठं सर्वयोषिताम्।","हित्वा गोपीः कामयाना मामसौ भजते प्रियः॥ ३७"],"iast":["sā ca mene tadā''tmānaṃ variṣṭhaṃ sarvayoṣitām|","hitvā gopīḥ kāmayānā māmasau bhajate priyaḥ|| 37"],"meaning":"इस प्रकार गोपियाँ मतवाली-सी होकर—अपनी सुधबुध खोकर एक दूसरेको भगवान् श्रीकृष्णके चरणचिह्न दिखलाती हुई वन-वनमें भटक रही थीं। इधर भगवान् श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको वनमें छोड़कर जिस भाग्यवती गोपीको एकान्तमें ले गये थे, उसने समझा कि ‘मैं ही समस्त गोपियोंमें श्रेष्ठ हूँ। इसीलिये तो हमारे प्यारे श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको छोड़कर, जो उन्हें इतना चाहती हैं, केवल मेरा ही मान करते हैं। मुझे ही आदर दे रहे हैं॥ ३६-३७॥","meaning_covers":[36,37]},{"id":"10.30.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/38/","page":322,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत्।","न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः॥ ३८"],"iast":["tato gatvā vanoddeśaṃ dṛptā keśavamabravīt|","na pāraye'haṃ calituṃ naya māṃ yatra te manaḥ|| 38"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मा और शंकरके भी शासक हैं। वह गोपी वनमें जाकर अपने प्रेम और सौभाग्यके मदसे मतवाली हो गयी और उन्हीं श्रीकृष्णसे कहने लगी—‘प्यारे! मुझसे अब तो और नहीं चला जाता। मेरे सुकुमार पाँव थक गये हैं। अब तुम जहाँ चलना चाहो, मुझे अपने कंधेपर चढ़ाकर ले चलो’॥ ३८॥"},{"id":"10.30.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/39/","page":322,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्ध आरुह्यतामिति।","ततश्‍चान्तर्दधे कृष्णः सा वधूरन्वतप्यत॥ ३९"],"iast":["evamuktaḥ priyāmāha skandha āruhyatāmiti|","tataścāntardadhe kṛṣṇaḥ sā vadhūranvatapyata|| 39"],"meaning":"अपनी प्रियतमाकी यह बात सुनकर श्यामसुन्दरने कहा—‘अच्छा प्यारी! तुम अब मेरे कंधेपर चढ़ लो।’ यह सुनकर वह गोपी ज्यों ही उनके कंधेपर चढ़ने चली, त्यों ही श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और वह सौभाग्यवती गोपी रोने-पछताने लगी॥ ३९॥"},{"id":"10.30.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/40/","page":322,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज।","दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्‍निधिम्॥ ४०"],"iast":["hā nātha ramaṇa preṣṭha kvāsi kvāsi mahābhuja|","dāsyāste kṛpaṇāyā me sakhe darśaya sannidhim|| 40"],"meaning":"‘हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा महाभुज! तुम कहाँ हो! कहाँ हो!! मेरे सखा! मैं तुम्हारी दीन-हीन दासी हूँ। शीघ्र ही मुझे अपने सान्‍निध्यका अनुभव कराओ, मुझे दर्शन दो’॥ ४०॥"},{"id":"10.30.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/41/","page":322,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्विच्छन्त्यो भगवतो मार्गं गोप्योऽविदूरतः।","ददृशुः प्रियविश्‍लेषमोहितां दुःखितां सखीम्॥ ४१"],"iast":["anvicchantyo bhagavato mārgaṃ gopyo'vidūrataḥ|","dadṛśuḥ priyaviśleṣamohitāṃ duḥkhitāṃ sakhīm|| 41"],"meaning":"परीक्षित्! गोपियाँ भगवान्‌के चरणचिह्नोंके सहारे उनके जानेका मार्ग ढूँढ़ती-ढूँढ़ती वहाँ जा पहुँची। थोड़ी दूरसे ही उन्होंने देखा कि उनकी सखी अपने प्रियतमके वियोगसे दुःखी होकर अचेत हो गयी है॥ ४१॥"},{"id":"10.30.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/42/","page":322,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तया कथितमाकर्ण्य मानप्राप्तिं च माधवात्।","अवमानं च दौरात्म्याद् विस्मयं परमं ययुः॥ ४२"],"iast":["tayā kathitamākarṇya mānaprāptiṃ ca mādhavāt|","avamānaṃ ca daurātmyād vismayaṃ paramaṃ yayuḥ|| 42"],"meaning":"जब उन्होंने उसे जगाया, तब उसने भगवान् श्रीकृष्णसे उसे जो प्यार और सम्मान प्राप्त हुआ था, वह उनको सुनाया। उसने यह भी कहा कि ‘मैंने कुटिलतावश उनका अपमान किया, इसीसे वे अन्तर्धान हो गये।’ उसकी बात सुनकर गोपियोंके आश्‍चर्यकी सीमा न रही॥ ४२॥"},{"id":"10.30.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/43/","page":322,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततोऽविशन् वनं चन्द्रज्योत्स्ना यावद् विभाव्यते।","तमः प्रविष्टमालक्ष्य ततो निववृतुः स्त्रियः॥ ४३"],"iast":["tato'viśan vanaṃ candrajyotsnā yāvad vibhāvyate|","tamaḥ praviṣṭamālakṣya tato nivavṛtuḥ striyaḥ|| 43"],"meaning":"इसके बाद वनमें जहाँतक चन्द्रदेवकी चाँदनी छिटक रही थी, वहाँतक वे उन्हें ढूँढ़ती हुई गयीं। परन्तु जब उन्होंने देखा कि आगे घना अन्धकार है—घोर जंगल है—हम ढूँढ़ती जायँगी तो श्रीकृष्ण और भी उसके अंदर घुस जायँगे, तब वे उधरसे लौट आयीं॥ ४३॥"},{"id":"10.30.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/44/","page":322,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तन्मनस्कास्तदालापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिकाः।","तद्गुणानेव गायन्त्यो नात्मागाराणि सस्मरुः॥ ४४"],"iast":["tanmanaskāstadālāpāstadviceṣṭāstadātmikāḥ|","tadguṇāneva gāyantyo nātmāgārāṇi sasmaruḥ|| 44"],"meaning":"परीक्षित्! गोपियोंका मन श्रीकृष्णमय हो गया था। उनकी वाणीसे कृष्णचर्चाके अतिरिक्त और कोई बात नहीं निकलती थी। उनके शरीरसे केवल श्रीकृष्णके लिये और केवल श्रीकृष्णकी चेष्टाएँ हो रही थीं। कहाँतक कहूँ; उनका रोम-रोम, उनकी आत्मा श्रीकृष्णमय हो रही थी। वे केवल उनके गुणों और लीलाओंका ही गान कर रही थीं और उनमें इतनी तन्मय हो रही थीं कि उन्हें अपने शरीरकी भी सुध नहीं थी, फिर घरकी याद कौन करता?॥ ४४॥"},{"id":"10.30.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/45/","page":323,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुनः पुलिनमागत्य कालिन्द्याः कृष्णभावनाः।","समवेता जगुः कृष्णं तदागमनकांक्षिताः॥ ४५"],"iast":["punaḥ pulinamāgatya kālindyāḥ kṛṣṇabhāvanāḥ|","samavetā jaguḥ kṛṣṇaṃ tadāgamanakāṃkṣitāḥ|| 45"],"meaning":"गोपियोंका रोम-रोम इस बातकी प्रतीक्षा और आकांक्षा कर रहा था कि जल्दी-से-जल्दी श्रीकृष्ण आयें। श्रीकृष्णकी ही भावनामें डूबी हुई गोपियाँ यमुनाजीके पावन पुलिनपर—रमणरेतीमें लौट आयीं और एक साथ मिलकर श्रीकृष्णके गुणोंका गान करने लगीं॥ ४५॥"}],"text":[{"b":30544,"kind":"adhyaya_heading","page":316,"text":"अथ त्रिंशोऽध्यायः"},{"b":30545,"kind":"topic_heading","page":316,"text":"श्रीकृष्णके विरहमें गोपियोंकी दशा"},{"b":30546,"kind":"topic_heading","page":316,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30547,"kind":"sanskrit_shloka","page":316,"verses":["10.30.1"],"text":"अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः।"},{"b":30548,"kind":"sanskrit_shloka","page":316,"verses":["10.30.1"],"text":"अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्॥ १"},{"b":30549,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.2"],"text":"गत्यानुरागस्मितविभ्रमेक्षितै-"},{"b":30550,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.2"],"text":"र्मनोरमालापविहारविभ्रमैः ।"},{"b":30551,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.2"],"text":"आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापते-"},{"b":30552,"kind":"hindi_commentary","page":317,"verses":["10.30.2"],"text":"स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः॥ २"},{"b":30553,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.3"],"text":"गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषु"},{"b":30554,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.3"],"text":"प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।"},{"b":30555,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.3"],"text":"असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका"},{"b":30556,"kind":"hindi_commentary","page":317,"verses":["10.30.3"],"text":"न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः॥ ३"},{"b":30557,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.4"],"text":"गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता"},{"b":30558,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.4"],"text":"विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्।"},{"b":30559,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.4"],"text":"पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहि-"},{"b":30560,"kind":"hindi_commentary","page":317,"verses":["10.30.4"],"text":"र्भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन्॥ ४"},{"b":30561,"kind":"hindi_commentary","page":316,"explains":["10.30.1","10.30.2","10.30.3","10.30.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् सहसा अन्तर्धान हो गये। उन्हें न देखकर व्रजयुवतियोंकी वैसी ही दशा हो गयी, जैसे यूथपति गजराजके बिना हथिनियोंकी होती है। उनका हृदय विरहकी ज्वालासे जलने लगा॥ १॥ भगवान् श्रीकृष्णकी मदोन्मत्त गजराजकी-सी चाल, प्रेमभरी मुसकान, विलासभरी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारकी लीलाओं तथा शृंगार-रसकी भाव-भंगियोंने उनके चित्तको चुरा लिया था। वे प्रेमकी मतवाली गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो गयीं और फिर श्रीकृष्णकी विभिन्‍न चेष्टाओंका अनुकरण करने लगीं॥ २॥ अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन-बोलन आदिमें श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयीं; उनके शरीरमें भी वही गति-मति, वही भाव-भंगी उतर आयी। वे अपनेको सर्वथा भूलकर श्रीकृष्ण-स्वरूप हो गयीं और उन्हींके लीला-विलासका अनुकरण करती हुई ‘मैं श्रीकृष्ण ही हूँ’—इस प्रकार कहने लगीं॥ ३॥ वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वरसे उन्हींके गुणोंका गान करने लगीं और मतवाली होकर एक वनसे दूसरे वनमें, एक झाड़ीसे दूसरी झाड़ीमें जा-जाकर श्रीकृष्णको ढूँढने लगीं। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण कहीं दूर थोड़े ही गये थे। वे तो समस्त जड-चेतन पदार्थोंमें तथा उनके बाहर भी आकाशके समान एकरस स्थित ही हैं। वे वहीं थे, उन्हींमें थे, परन्तु उन्हें न देखकर गोपियाँ वनस्पतियोंसे—पेड़-पौधोंसे उनका पता पूछने लगीं॥ ४॥"},{"b":30565,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.5"],"text":"दृष्टो वः कच्चिदश्‍वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः।"},{"b":30566,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.5"],"text":"नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः॥ ५"},{"b":30567,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.6"],"text":"कच्चित् कुरबकाशोकनागपुन्‍नागचम्पकाः।"},{"b":30568,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.6"],"text":"रामानुजो मानिनीनामितो दर्पहरस्मितः॥ ६"},{"b":30569,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.7"],"text":"कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये।"},{"b":30570,"kind":"sanskrit_shloka","page":317,"verses":["10.30.7"],"text":"सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ ७"},{"b":30571,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.8"],"text":"मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जाति यूथिके।"},{"b":30572,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.8"],"text":"प्रीतिं वो जनयन् यातः करस्पर्शेन माधवः॥ ८"},{"b":30573,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.9"],"text":"चूतप्रियालपनसासनकोविदार-"},{"b":30574,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.9"],"text":"जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः।"},{"b":30575,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.9"],"text":"येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः"},{"b":30576,"kind":"hindi_commentary","page":318,"verses":["10.30.9"],"text":"शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः॥ ९"},{"b":30577,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.10"],"text":"किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्‌घ्रि-"},{"b":30578,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.10"],"text":"स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि।"},{"b":30579,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.10"],"text":"अप्यङ्‌घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा"},{"b":30580,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.10"],"text":"आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन॥ १०"},{"b":30581,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.11"],"text":"अप्येणपत्‍न्युपगतः प्रिययेह गात्रै-"},{"b":30582,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.11"],"text":"स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः।"},{"b":30583,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.11"],"text":"कान्ताङ्गसङ्गकुचकुंकुमरंजितायाः"},{"b":30584,"kind":"hindi_commentary","page":318,"verses":["10.30.11"],"text":"कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः॥ ११"},{"b":30585,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.12"],"text":"बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो"},{"b":30586,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.12"],"text":"रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः।"},{"b":30587,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.12"],"text":"अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामं"},{"b":30588,"kind":"sanskrit_shloka","page":318,"verses":["10.30.12"],"text":"किं वाभिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः॥ १२"},{"b":30589,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.13"],"text":"पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्‍लिष्टा वनस्पतेः।"},{"b":30590,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.13"],"text":"नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो॥ १३"},{"b":30591,"kind":"hindi_commentary","page":317,"explains":["10.30.5","10.30.6","10.30.7","10.30.8","10.30.9","10.30.10","10.30.11","10.30.12","10.30.13"],"text":"(गोपियोंने पहले बड़े-बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा) ‘हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं। क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है?॥ ५॥ कुरबक, अशोक, नागकेशर, पुन्‍नाग और चम्पा! बलरामजीके छोटे भाई, जिनकी मुसकान-मात्रसे बड़ी-बड़ी मानिनियोंका मानमर्दन हो जाता है, इधर आये थे क्या?’॥ ६॥ (अब उन्होंने स्त्रीजातिके पौधोंसे कहा—) ‘बहिन तुलसी! तुम्हारा हृदय तो बड़ा कोमल है, तुम तो सभी लोगोंका कल्याण चाहती हो। भगवान्‌के चरणोंमें तुम्हारा प्रेम तो है ही, वे भी तुमसे बहुत प्यार करते हैं। तभी तो भौंरोंके मँडराते रहनेपर भी वे तुम्हारी माला नहीं उतारते, सर्वदा पहने रहते हैं। क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्यामसुन्दरको देखा है?॥ ७॥ प्यारी मालती! मल्लिके! जाती और जूही! तुमलोगोंने कदाचित् हमारे प्यारे माधवको देखा होगा। क्या वे अपने कोमल करोंसे स्पर्श करके तुम्हें आनन्दित करते हुए इधरसे गये हैं?’॥ ८॥ ‘रसाल, प्रियाल, कटहल, पीतशाल, कचनार, जामुन, आक, बेल, मौलसिरी, आम, कदम्ब और नीम तथा अन्यान्य यमुनाके तटपर विराजमान सुखी तरुवरो! तुम्हारा जन्म-जीवन केवल परोपकारके लिये है। श्रीकृष्णके बिना हमारा जीवन सूना हो रहा है। हम बेहोश हो रही हैं। तुम हमें उन्हें पानेका मार्ग बता दो’॥ ९॥ ‘भगवान्‌की प्रेयसी पृथ्वीदेवी! तुमने ऐसी कौन-सी तपस्या की है कि श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके तुम आनन्दसे भर रही हो और तृण-लता आदिके रूपमें अपना रोमांच प्रकट कर रही हो? तुम्हारा यह उल्लास-विलास श्रीकृष्णके चरणस्पर्शके कारण है अथवा वामनावतारमें विश्‍वरूप धारण करके उन्होंने तुम्हें जो नापा था, उसके कारण है? कहीं उनसे भी पहले वराह भगवान्‌के अंग-संगके कारण तो तुम्हारी यह दशा नहीं हो रही है?’॥ १०॥ ‘अरी सखी! हरिनियो! हमारे श्यामसुन्दरके अंग-संगसे सुषमा-सौन्दर्यकी धारा बहती रहती है,वे कहीं अपनी प्राणप्रियाके साथ तुम्हारे नयनोंको परमानन्दका दान करते हुए इधरसे ही तो नहीं गये हैं? देखो, देखो; यहाँ कुलपति श्रीकृष्णकी कुन्दकलीकी मालाकी मनोहर गन्ध आ रही है, जो उनकी परम प्रेयसीके अंग-संगसे लगे हुए कुच-कुंकुमसे अनुरंजित रहती है’॥ ११॥ ‘तरुवरो! उनकी मालाकी तुलसीमें ऐसी सुगन्ध है कि उसकी गन्धके लोभी मतवाले भौंरे प्रत्येक क्षण उसपर मँडराते रहते हैं। उनके एक हाथमें लीलाकमल होगा और दूसरा हाथ अपनी प्रेयसीके कंधेपर रखे होंगे। हमारे प्यारे श्यामसुन्दर इधरसे विचरते हुए अवश्य गये होंगे। जान पड़ता है, तुमलोग उन्हें प्रणाम करनेके लिये ही झुके हो। परन्तु उन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवनसे भी तुम्हारी वन्दनाका अभिनन्दन किया है या नहीं?’॥ १२॥ ‘अरी सखी! इन लताओंसे पूछो। ये अपने पति वृक्षोंको भुजपाशमें बाँधकर आलिंगन किये हुए हैं, इससे क्या हुआ? इनके शरीरमें जो पुलक है, रोमांच है, वह तो भगवान्‌के नखोंके स्पर्शसे ही है। अहो! इनका कैसा सौभाग्य है?’॥ १३॥"},{"b":30592,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.14"],"text":"इत्युन्मत्तवचो गोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः।"},{"b":30593,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.14"],"text":"लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः॥ १४"},{"b":30594,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.15"],"text":"कस्याश्‍चित् पूतनायन्त्याः कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम्।"},{"b":30595,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.15"],"text":"तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहञ्छकटायतीम्॥ १५"},{"b":30596,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.16"],"text":"दैत्यायित्वा जहारान्यामेका कृष्णार्भभावनाम्।"},{"b":30597,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.16"],"text":"रिङ्गयामास काप्यङ्‌घ्री कर्षन्ती घोषनिःस्वनैः॥ १६"},{"b":30598,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.17"],"text":"कृष्णरामायिते द्वे तु गोपयन्त्यश्‍च काश्‍चन।"},{"b":30599,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.17"],"text":"वत्सायतीं हन्ति चान्या तत्रैका तु बकायतीम्॥ १७"},{"b":30600,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.18"],"text":"आहूय दूरगा यद्वत् कृष्णस्तमनुकुर्वतीम्।"},{"b":30601,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.18"],"text":"वेणुं क्वणन्तीं क्रीडन्तीमन्याः शंसन्ति साध्विति॥ १८"},{"b":30602,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.19"],"text":"कस्यांचित् स्वभुजं न्यस्य चलन्त्याहापरा ननु।"},{"b":30603,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.19"],"text":"कृष्णोऽहं पश्यत गतिं ललितामिति तन्मनाः॥ १९"},{"b":30604,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.20"],"text":"मा भैष्ट वातवर्षाभ्यां तत्त्राणं विहितं मया।"},{"b":30605,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.20"],"text":"इत्युक्त्वैकेन हस्तेन यतन्त्युन्‍निदधेऽम्बरम्॥ २०"},{"b":30606,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.21"],"text":"आरुह्यैका पदाऽऽक्रम्य शिरस्याहापरां नृप।"},{"b":30607,"kind":"sanskrit_shloka","page":319,"verses":["10.30.21"],"text":"दुष्टाहे गच्छ जातोऽहं खलानां ननु दण्डधृक्॥ २१"},{"b":30608,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.22"],"text":"तत्रैकोवाच हे गोपा दावाग्‍निं पश्यतोल्बणम्।"},{"b":30609,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.22"],"text":"चक्षूंष्याश्‍वपिदध्वं वो विधास्ये क्षेममंजसा॥ २२"},{"b":30610,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.23"],"text":"बद्धान्यया स्रजा काचित्तन्वी तत्र उलूखले।"},{"b":30611,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.23"],"text":"भीता सुदृक् पिधायास्यं भेजे भीतिविडम्बनम्॥ २३"},{"b":30612,"kind":"hindi_translation","page":319,"explains":["10.30.14","10.30.15","10.30.16","10.30.17","10.30.18","10.30.19","10.30.20","10.30.21","10.30.22","10.30.23"],"text":"परीक्षित्! इस प्रकार मतवाली गोपियाँ प्रलाप करती हुई भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कातर हो रही थीं। अब और भी गाढ़ आवेश हो जानेके कारण वे भगवन्मय होकर भगवान्‌की विभिन्‍न लीलाओंका अनुकरण करने लगीं॥ १४॥ एक पूतना बन गयी, तो दूसरी श्रीकृष्ण बनकर उसका स्तन पीने लगीं। कोई छकड़ा बन गयी, तो किसीने बालकृष्ण बनकर रोते हुए उसे पैरकी ठोकर मारकर उलट दिया॥ १५॥ कोई सखी बालकृष्ण बनकर बैठ गयी तो कोई तृणावर्त दैत्यका रूप धारण करके उसे हर ले गयी। कोई गोपी पाँव घसीट-घसीटकर घुटनोंके बल बकैयाँ चलने लगी और उस समय उसके पायजेब रुनझुन-रुनझुन बोलने लगे॥ १६॥ एक बनी कृष्ण, तो दूसरी बनी बलराम, और बहुत-सी गोपियाँ ग्वालबालोंके रूपमें हो गयीं। एक गोपी बन गयी वत्सासुर, तो दूसरी बनी बकासुर। तब तो गोपियोंने अलग-अलग श्रीकृष्ण बनकर वत्सासुर और बकासुर बनी हुई गोपियोंको मारनेकी लीला की॥ १७॥ जैसे श्रीकृष्ण वनमें करते थे, वैसे ही एक गोपी बाँसुरी बजा-बजाकर दूर गये हुए पशुओंको बुलानेका खेल खेलने लगी। तब दूसरी गोपियाँ ‘वाह-वाह’ करके उसकी प्रशंसा करने लगीं॥ १८॥ एक गोपी अपनेको श्रीकृष्ण समझकर दूसरी सखीके गलेमें बाँह डालकर चलती और गोपियोंसे कहने लगती—‘मित्रो! मैं श्रीकृष्ण हूँ। तुमलोग मेरी यह मनोहर चाल देखो’॥ १९॥ कोई गोपी श्रीकृष्ण बनकर कहती—‘अरे व्रजवासियो! तुम आँधी-पानीसे मत डरो। मैंने उससे बचनेका उपाय निकाल लिया है।’ ऐसा कहकर गोवर्धन-धारणका अनुकरण करती हुई वह अपनी ओढ़नी उठाकर ऊपर तान लेती॥ २०॥ परीक्षित्! एक गोपी बनी कालिय नाग, तो दूसरी श्रीकृष्ण बनकर उसके सिरपर पैर रखकर चढ़ी-चढ़ी बोलने लगी—‘रे दुष्ट साँप! तू यहाँसे चला जा। मैं दुष्टोंका दमन करनेके लिये ही उत्पन्‍न हुआ हूँ’॥ २१॥ इतनेमें ही एक गोपी बोली—‘अरे ग्वालो! देखो, वनमें बड़ी भयंकर आग लगी है। तुमलोग जल्दी-से-जल्दी अपनी आँखें मूँद लो, मैं अनायास ही तुमलोगोंकी रक्षा कर लूँगा’॥ २२॥ एक गोपी यशोदा बनी और दूसरी बनी श्रीकृष्ण। यशोदाने फूलोंकी मालासे श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। अब वह श्रीकृष्ण बनी हुई सुन्दरी गोपी हाथोंसे मुँह ढँककर भयकी नकल करने लगी॥ २३॥"},{"b":30613,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.24"],"text":"एवं कृष्णं पृच्छमाना वृन्दावनलतास्तरून्।"},{"b":30614,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.24"],"text":"व्यचक्षत वनोद्देशे पदानि परमात्मनः॥ २४"},{"b":30615,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.25"],"text":"पदानि व्यक्तमेतानि नन्दसूनोर्महात्मनः।"},{"b":30616,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.25"],"text":"लक्ष्यन्ते हि ध्वजाम्भोजवज्रांकुशयवादिभिः॥ २५"},{"b":30617,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.26"],"text":"तैस्तैः पदैस्तत्पदवीमन्विच्छन्त्योऽग्रतोऽबलाः।"},{"b":30618,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.26"],"text":"वध्वाः पदैः सुपृक्तानि विलोक्यार्ताः समब्रुवन्॥ २६"},{"b":30619,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.27"],"text":"कस्याः पदानि चैतानि याताया नन्दसूनुना।"},{"b":30620,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.27"],"text":"अंसन्यस्तप्रकोष्ठायाः करेणोः करिणा यथा॥ २७"},{"b":30621,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.28"],"text":"अनयाऽऽराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्‍वरः।"},{"b":30622,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.28"],"text":"यन्‍नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद् रहः॥ २८"},{"b":30623,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.29"],"text":"धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाङ् घ्र्यब्जरेणवः।"},{"b":30624,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.29"],"text":"यान् ब्रह्मेशो रमा देवी दधुर्मूर्ध्‍न्‍यघनुत्तये॥ २९"},{"b":30625,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.30"],"text":"तस्या अमूनि नः क्षोभं कुर्वन्त्युच्चैः पदानि यत्।"},{"b":30626,"kind":"sanskrit_shloka","page":320,"verses":["10.30.30"],"text":"यैकापहृत्य गोपीनां रहो भुङ्क्तेऽच्युताधरम्॥ ३०"},{"b":30627,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.31"],"text":"न लक्ष्यन्ते पदान्यत्र तस्या नूनं तृणांकुरैः।"},{"b":30628,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.31"],"text":"खिद्यत्सुजाताङ्‌घ्रितलामुन्‍निन्ये प्रेयसीं प्रियः॥ ३१"},{"b":30629,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.32"],"text":"इमान्यधिकम‌ग्‍नानि पदानि वहतो वधूम्।"},{"b":30630,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.32"],"text":"गोप्यः पश्यत कृष्णस्य भाराक्रान्तस्य कामिनः॥ ३२"},{"b":30631,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.33"],"text":"अत्रावरोपिता कान्ता पुष्पहेतोर्महात्मना।"},{"b":30632,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.33"],"text":"अत्र प्रसूनावचयः प्रियार्थे प्रेयसा कृतः।"},{"b":30633,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.33"],"text":"प्रपदाक्रमणे एते पश्यतासकले पदे॥ ३३"},{"b":30634,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.34"],"text":"केशप्रसाधनं त्वत्र कामिन्याः कामिना कृतम्।"},{"b":30635,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.34"],"text":"तानि चूडयता कान्तामुपविष्टमिह ध्रुवम्॥ ३४"},{"b":30636,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.35"],"text":"रेमे तया चात्मरत आत्मारामोऽप्यखण्डितः।"},{"b":30637,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.35"],"text":"कामिनां दर्शयन् दैन्यं स्त्रीणां चैव दुरात्मताम्॥ ३५"},{"b":30638,"kind":"hindi_commentary","page":320,"explains":["10.30.24","10.30.25","10.30.26","10.30.27","10.30.28","10.30.29","10.30.30","10.30.31","10.30.32","10.30.33","10.30.34","10.30.35"],"text":"परीक्षित्! इस प्रकार लीला करते-करते गोपियाँ वृन्दावनके वृक्ष और लता आदिसे फिर भी श्रीकृष्णका पता पूछने लगीं। इसी समय उन्होंने एक स्थानपर भगवान्‌के चरणचिह्न देखे॥ २४॥ वे आपसमें कहने लगीं—‘अवश्य ही ये चरणचिह्न उदारशिरोमणि नन्दनन्दन श्यामसुन्दरके हैं; क्योंकि इनमें ध्वजा, कमल, वज्र, अंकुश और जौ आदिके चिह्न स्पष्ट ही दीख रहे हैं’॥ २५॥ उन चरणचिह्नोंके द्वारा व्रजवल्लभ भगवान्‌को ढूँढ़ती हुई गोपियाँ आगे बढ़ीं, तब उन्हें श्रीकृष्णके साथ किसी व्रजयुवतीके भी चरणचिह्न दीख पड़े। उन्हें देखकर वे व्याकुल हो गयीं। और आपसमें कहने लगीं—॥ २६॥ ‘जैसे हथिनी अपने प्रियतम गजराजके साथ गयी हो, वैसे ही नन्दनन्दन श्यामसुन्दरके साथ उनके कंधेपर हाथ रखकर चलनेवाली किस बड़भागिनीके ये चरणचिह्न हैं?॥ २७॥ अवश्य ही सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णकी यह ‘आराधिका’ होगी। इसीलिये इसपर प्रसन्‍न होकर हमारे प्राणप्यारे श्यामसुन्दरने हमें छोड़ दिया है और इसे एकान्तमें ले गये हैं॥ २८॥ प्यारी सखियो! भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलसे जिस रजका स्पर्श कर देते हैं, वह धन्य हो जाती है, उसके अहोभाग्य हैं! क्योंकि ब्रह्मा, शंकर और लक्ष्मी आदि भी अपने अशुभ नष्ट करनेके लिये उस रजको अपने सिरपर धारण करते हैं’॥ २९॥ ‘अरी सखी! चाहे कुछ भी हो—यह जो सखी हमारे सर्वस्व श्रीकृष्णको एकान्तमें ले जाकर अकेले ही उनकी अधर-सुधाका रस पी रही है, इस गोपीके उभरे हुए चरणचिह्न तो हमारे हृदयमें बड़ा ही क्षोभ उत्पन्‍न कर रहे हैं’॥ ३०॥ यहाँ उस गोपीके पैर नहीं दिखायी देते। मालूम होता है, यहाँ प्यारे श्यामसुन्दरने देखा होगा कि मेरी प्रेयसीके सुकुमार चरणकमलोंमें घासकी नोक गड़ती होगी; इसलिये उन्होंने उसे अपने कंधेपर चढ़ा लिया होगा॥ ३१॥ सखियो! यहाँ देखो, प्यारे श्रीकृष्णके चरणचिह्न अधिक गहरे—बालूमें धँसे हुए हैं। इससे सूचित होता है कि यहाँ वे किसी भारी वस्तुको उठाकर चले हैं, उसीके बोझसे उनके पैर जमीनमें धँस गये हैं। हो-न-हो यहाँ उस कामीने अपनी प्रियतमाको अवश्य कंधेपर चढ़ाया होगा॥ ३२॥ देखो-देखो, यहाँ परमप्रेमी व्रजवल्लभने फूल चुननेके लिये अपनी प्रेयसीको नीचे उतार दिया है और यहाँ परम प्रियतम श्रीकृष्णने अपनी प्रेयसीके लिये फूल चुने हैं। उचक-उचककर फूल तोड़नेके कारण यहाँ उनके पंजे तो धरतीमें गड़े हुए हैं और एड़ीका पता ही नहीं है॥ ३३॥ परम प्रेमी श्रीकृष्णने कामी पुरुषके समान यहाँ अपनी प्रेयसीके केश सँवारे हैं। देखो, अपने चुने हुए फूलोंको प्रेयसीकी चोटीमें गूँथनेके लिये वे यहाँ अवश्य ही बैठे रहे होंगे॥ ३४॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। वे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट और पूर्ण हैं। जब वे अखण्ड हैं, उनमें दूसरा कोई है ही नहीं, तब उनमें कामकी कल्पना कैसे हो सकती है? फिर भी उन्होंने कामियोंकी दीनता-स्त्रीपरवशता और स्त्रियोंकी कुटिलता दिखलाते हुए वहाँ उस गोपीके साथ एकान्तमें क्रीडा की थी—एक खेल रचा था॥ ३५॥"},{"b":30639,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.36"],"text":"इत्येवं दर्शयन्त्यस्ताश्‍चेरुर्गोप्यो विचेतसः।"},{"b":30640,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.36"],"text":"यां गोपीमनयत् कृष्णो विहायान्याः स्त्रियो वने॥ ३६"},{"b":30641,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.37"],"text":"सा च मेने तदाऽऽत्मानं वरिष्ठं सर्वयोषिताम्।"},{"b":30642,"kind":"sanskrit_shloka","page":321,"verses":["10.30.37"],"text":"हित्वा गोपीः कामयाना मामसौ भजते प्रियः॥ ३७"},{"b":30643,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.38"],"text":"ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत्।"},{"b":30644,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.38"],"text":"न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः॥ ३८"},{"b":30645,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.39"],"text":"एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्ध आरुह्यतामिति।"},{"b":30646,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.39"],"text":"ततश्‍चान्तर्दधे कृष्णः सा वधूरन्वतप्यत॥ ३९"},{"b":30647,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.40"],"text":"हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज।"},{"b":30648,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.40"],"text":"दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्‍निधिम्॥ ४०"},{"b":30649,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.41"],"text":"अन्विच्छन्त्यो भगवतो मार्गं गोप्योऽविदूरतः।"},{"b":30650,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.41"],"text":"ददृशुः प्रियविश्‍लेषमोहितां दुःखितां सखीम्॥ ४१"},{"b":30651,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.42"],"text":"तया कथितमाकर्ण्य मानप्राप्तिं च माधवात्।"},{"b":30652,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.42"],"text":"अवमानं च दौरात्म्याद् विस्मयं परमं ययुः॥ ४२"},{"b":30653,"kind":"hindi_commentary","page":321,"explains":["10.30.36","10.30.37","10.30.38","10.30.39","10.30.40","10.30.41","10.30.42"],"text":"इस प्रकार गोपियाँ मतवाली-सी होकर—अपनी सुधबुध खोकर एक दूसरेको भगवान् श्रीकृष्णके चरणचिह्न दिखलाती हुई वन-वनमें भटक रही थीं। इधर भगवान् श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको वनमें छोड़कर जिस भाग्यवती गोपीको एकान्तमें ले गये थे, उसने समझा कि ‘मैं ही समस्त गोपियोंमें श्रेष्ठ हूँ। इसीलिये तो हमारे प्यारे श्रीकृष्ण दूसरी गोपियोंको छोड़कर, जो उन्हें इतना चाहती हैं, केवल मेरा ही मान करते हैं। मुझे ही आदर दे रहे हैं॥ ३६-३७॥ भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मा और शंकरके भी शासक हैं। वह गोपी वनमें जाकर अपने प्रेम और सौभाग्यके मदसे मतवाली हो गयी और उन्हीं श्रीकृष्णसे कहने लगी—‘प्यारे! मुझसे अब तो और नहीं चला जाता। मेरे सुकुमार पाँव थक गये हैं। अब तुम जहाँ चलना चाहो, मुझे अपने कंधेपर चढ़ाकर ले चलो’॥ ३८॥ अपनी प्रियतमाकी यह बात सुनकर श्यामसुन्दरने कहा—‘अच्छा प्यारी! तुम अब मेरे कंधेपर चढ़ लो।’ यह सुनकर वह गोपी ज्यों ही उनके कंधेपर चढ़ने चली, त्यों ही श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और वह सौभाग्यवती गोपी रोने-पछताने लगी॥ ३९॥ ‘हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा महाभुज! तुम कहाँ हो! कहाँ हो!! मेरे सखा! मैं तुम्हारी दीन-हीन दासी हूँ। शीघ्र ही मुझे अपने सान्‍निध्यका अनुभव कराओ, मुझे दर्शन दो’॥ ४०॥ परीक्षित्! गोपियाँ भगवान्‌के चरणचिह्नोंके सहारे उनके जानेका मार्ग ढूँढ़ती-ढूँढ़ती वहाँ जा पहुँची। थोड़ी दूरसे ही उन्होंने देखा कि उनकी सखी अपने प्रियतमके वियोगसे दुःखी होकर अचेत हो गयी है॥ ४१॥ जब उन्होंने उसे जगाया, तब उसने भगवान् श्रीकृष्णसे उसे जो प्यार और सम्मान प्राप्त हुआ था, वह उनको सुनाया। उसने यह भी कहा कि ‘मैंने कुटिलतावश उनका अपमान किया, इसीसे वे अन्तर्धान हो गये।’ उसकी बात सुनकर गोपियोंके आश्‍चर्यकी सीमा न रही॥ ४२॥"},{"b":30654,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.43"],"text":"ततोऽविशन् वनं चन्द्रज्योत्स्ना यावद् विभाव्यते।"},{"b":30655,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.43"],"text":"तमः प्रविष्टमालक्ष्य ततो निववृतुः स्त्रियः॥ ४३"},{"b":30656,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.44"],"text":"तन्मनस्कास्तदालापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिकाः।"},{"b":30657,"kind":"sanskrit_shloka","page":322,"verses":["10.30.44"],"text":"तद्गुणानेव गायन्त्यो नात्मागाराणि सस्मरुः॥ ४४"},{"b":30658,"kind":"hindi_commentary","page":322,"explains":["10.30.43","10.30.44"],"text":"इसके बाद वनमें जहाँतक चन्द्रदेवकी चाँदनी छिटक रही थी, वहाँतक वे उन्हें ढूँढ़ती हुई गयीं। परन्तु जब उन्होंने देखा कि आगे घना अन्धकार है—घोर जंगल है—हम ढूँढ़ती जायँगी तो श्रीकृष्ण और भी उसके अंदर घुस जायँगे, तब वे उधरसे लौट आयीं॥ ४३॥ परीक्षित्! गोपियोंका मन श्रीकृष्णमय हो गया था। उनकी वाणीसे कृष्णचर्चाके अतिरिक्त और कोई बात नहीं निकलती थी। उनके शरीरसे केवल श्रीकृष्णके लिये और केवल श्रीकृष्णकी चेष्टाएँ हो रही थीं। कहाँतक कहूँ; उनका रोम-रोम, उनकी आत्मा श्रीकृष्णमय हो रही थी। वे केवल उनके गुणों और लीलाओंका ही गान कर रही थीं और उनमें इतनी तन्मय हो रही थीं कि उन्हें अपने शरीरकी भी सुध नहीं थी, फिर घरकी याद कौन करता?॥ ४४॥"},{"b":30659,"kind":"sanskrit_shloka","page":323,"verses":["10.30.45"],"text":"पुनः पुलिनमागत्य कालिन्द्याः कृष्णभावनाः।"},{"b":30660,"kind":"sanskrit_shloka","page":323,"verses":["10.30.45"],"text":"समवेता जगुः कृष्णं तदागमनकांक्षिताः॥ ४५"},{"b":30661,"kind":"hindi_translation","page":323,"explains":["10.30.45"],"text":"गोपियोंका रोम-रोम इस बातकी प्रतीक्षा और आकांक्षा कर रहा था कि जल्दी-से-जल्दी श्रीकृष्ण आयें। श्रीकृष्णकी ही भावनामें डूबी हुई गोपियाँ यमुनाजीके पावन पुलिनपर—रमणरेतीमें लौट आयीं और एक साथ मिलकर श्रीकृष्णके गुणोंका गान करने लगीं॥ ४५॥"},{"b":30662,"kind":"hindi_translation","page":323,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडायां कृष्णान्वेषणं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३०॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":2,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}