{"id":"10.27","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 27","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ सप्तविंशोऽध्यायः","topics":["श्रीकृष्णका अभिषेक"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.27.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[301,304]},"verses":[{"id":"10.27.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/1/","page":301,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोवर्धने धृते शैल आसाराद् रक्षिते व्रजे।","गोलोकादाव्रजत् कृष्णं सुरभिः शक्र एव च॥ १"],"iast":["govardhane dhṛte śaila āsārād rakṣite vraje|","golokādāvrajat kṛṣṇaṃ surabhiḥ śakra eva ca|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने गिरिराज गोवर्द्धनको धारण करके मूसलधार वर्षासे व्रजको बचा लिया, तब उनके पास गोलोकसे कामधेनु (बधाई देनेके लिये) और स्वर्गसे देवराज इन्द्र (अपने अपराधको क्षमा करानेके लिये) आये॥ १॥"},{"id":"10.27.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/2/","page":301,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विविक्त उपसङ्गम्य व्रीडितः कृतहेलनः।","पस्पर्श पादयोरेनं किरीटेनार्कवर्चसा॥ २"],"iast":["vivikta upasaṅgamya vrīḍitaḥ kṛtahelanaḥ|","pasparśa pādayorenaṃ kirīṭenārkavarcasā|| 2"],"meaning":"भगवान्‌का तिरस्कार करनेके कारण इन्द्र बहुत ही लज्जित थे। इसलिये उन्होंने एकान्त-स्थानमें भगवान्‌के पास जाकर अपने सूर्यके समान तेजस्वी मुकुटसे उनके चरणोंका स्पर्श किया॥ २॥"},{"id":"10.27.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/3/","page":301,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्टश्रुतानुभावोऽस्य कृष्णस्यामिततेजसः।","नष्टत्रिलोकेशमद इन्द्र आह कृतांजलिः॥ ३"],"iast":["dṛṣṭaśrutānubhāvo'sya kṛṣṇasyāmitatejasaḥ|","naṣṭatrilokeśamada indra āha kṛtāṃjaliḥ|| 3"],"meaning":"परम तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव देख-सुनकर इन्द्रका यह घमंड जाता रहा कि मैं ही तीनों लोकोंका स्वामी हूँ। अब उन्होंने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की॥ ३॥"},{"id":"10.27.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/4/","page":301,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं","तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम्।","मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो","न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः॥ ४"],"iast":["viśuddhasattvaṃ tava dhāma śāntaṃ","tapomayaṃ dhvastarajastamaskam|","māyāmayo'yaṃ guṇasampravāho","na vidyate te'grahaṇānubandhaḥ|| 4"],"meaning":"इन्द्रने कहा—भगवन्! आपका स्वरूप परम शान्त, ज्ञानमय, रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित एवं विशुद्ध अप्राकृत सत्त्वमय है। यह गुणोंके प्रवाहरूपसे प्रतीत होनेवाला प्रपंच केवल मायामय है; क्योंकि आपका स्वरूप न जाननेके कारण ही आपमें इसकी प्रतीति होती है॥ ४॥"},{"id":"10.27.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/5/","page":301,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["कुतो नु तद्धेतव ईश तत्कृता","लोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः।","तथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति","धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय॥ ५"],"iast":["kuto nu taddhetava īśa tatkṛtā","lobhādayo ye'budhaliṅgabhāvāḥ|","tathāpi daṇḍaṃ bhagavān bibharti","dharmasya guptyai khalanigrahāya|| 5"],"meaning":"जब आपका सम्बन्ध अज्ञान और उसके कारण प्रतीत होनेवाले देहादिसे है ही नहीं, फिर उन देह आदिकी प्राप्तिके कारण तथा उन्हींसे होनेवाले लोभ-क्रोध आदि दोष तो आपमें हो ही कैसे सकते हैं? प्रभो! इन दोषोंका होना तो अज्ञानका लक्षण है। इस प्रकार यद्यपि अज्ञान और उससे होनेवाले जगत‍्से आपका कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर भी धर्मकी रक्षा और दुष्टोंका दमन करनेके लिये आप अवतार ग्रहण करते हैं और निग्रह-अनुग्रह भी करते हैं॥ ५॥"},{"id":"10.27.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/6/","page":301,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो","दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः।","हिताय स्वेच्छातनुभिः समीहसे","मानं विधुन्वञ्जगदीशमानिनाम्॥ ६"],"iast":["pitā gurustvaṃ jagatāmadhīśo","duratyayaḥ kāla upāttadaṇḍaḥ|","hitāya svecchātanubhiḥ samīhase","mānaṃ vidhunvañjagadīśamāninām|| 6"],"meaning":"आप जगत‍्के पिता, गुरु और स्वामी हैं। आप जगत‍्का नियन्त्रण करनेके लिये दण्ड धारण किये हुए दुस्तर काल हैं। आप अपने भक्तोंकी लालसा पूर्ण करनेके लिये स्वच्छन्दतासे लीला-शरीर प्रकट करते हैं और जो लोग हमारी तरह अपनेको ईश्‍वर मान बैठते हैं, उनका मान मर्दन करते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करते हैं॥ ६॥"},{"id":"10.27.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/7/","page":302,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["ये मद्विधाज्ञा जगदीशमानिन-","स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तन्मदम्।","हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया","ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम्॥ ७"],"iast":["ye madvidhājñā jagadīśamānina-","stvāṃ vīkṣya kāle'bhayamāśu tanmadam|","hitvā''ryamārgaṃ prabhajantyapasmayā","īhā khalānāmapi te'nuśāsanam|| 7"],"meaning":"प्रभो! जो मेरे-जैसे अज्ञानी और अपनेको जगत‍्का ईश्‍वर माननेवाले हैं, वे जब देखते हैं कि बड़े-बड़े भयके अवसरोंपर भी आप निर्भय रहते हैं, तब वे अपना घमंड छोड़ देते हैं और गर्वरहित होकर संतपुरुषोंके द्वारा सेवित भक्तिमार्गका आश्रय लेकर आपका भजन करते हैं। प्रभो! आपकी एक-एक चेष्टा दुष्टोंके लिये दण्डविधान है॥ ७॥"},{"id":"10.27.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/8/","page":302,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["स त्वं ममैश्‍वर्यमदप्लुतस्य","कृतागसस्तेऽविदुषः प्रभावम्।","क्षन्तुं प्रभोऽथार्हसि मूढचेतसो","मैवं पुनर्भून्मतिरीश मेऽसती॥ ८"],"iast":["sa tvaṃ mamaiśvaryamadaplutasya","kṛtāgasaste'viduṣaḥ prabhāvam|","kṣantuṃ prabho'thārhasi mūḍhacetaso","maivaṃ punarbhūnmatirīśa me'satī|| 8"],"meaning":"प्रभो! मैंने ऐश्‍वर्यके मदसे चूर होकर आपका अपराध किया है; क्योंकि मैं आपकी शक्ति और प्रभावके सम्बन्धमें बिलकुल अनजान था। परमेश्‍वर! आप कृपा करके मुझ मूर्ख अपराधीका यह अपराध क्षमा करें और ऐसी कृपा करें कि मुझे फिर कभी ऐसे दुष्ट अज्ञानका शिकार न होना पड़े॥ ८॥"},{"id":"10.27.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/9/","page":302,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["तवावतारोऽयमधोक्षजेह","स्वयम्भराणामुरुभारजन्मनाम् ।","चमूपतीनामभवाय देव","भवाय युष्मच्चरणानुवर्तिनाम्॥ ९"],"iast":["tavāvatāro'yamadhokṣajeha","svayambharāṇāmurubhārajanmanām |","camūpatīnāmabhavāya deva","bhavāya yuṣmaccaraṇānuvartinām|| 9"],"meaning":"स्वयंप्रकाश, इन्द्रियातीत परमात्मन्! आपका यह अवतार इसलिये हुआ है कि जो असुर-सेनापति केवल अपना पेट पालनेमें ही लग रहे हैं और पृथ्वीके लिये बड़े भारी भारके कारण बन रहे हैं, उनका वध करके उन्हें मोक्ष दिया जाय और जो आपके चरणोंके सेवक हैं—आज्ञाकारी भक्तजन हैं, उनका अभ्युदय हो—उनकी रक्षा हो॥ ९॥"},{"id":"10.27.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/10/","page":302,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने।","वासुदेवाय कृष्णाय सात्वतां पतये नमः॥ १०"],"iast":["namastubhyaṃ bhagavate puruṣāya mahātmane|","vāsudevāya kṛṣṇāya sātvatāṃ pataye namaḥ|| 10"],"meaning":"भगवन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सर्वान्तर्यामी पुरुषोत्तम तथा सर्वात्मा वासुदेव हैं। आप यदुवंशियोंके एकमात्र स्वामी, भक्तवत्सल एवं सबके चित्तको आकर्षित करनेवाले हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ १०॥"},{"id":"10.27.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/11/","page":302,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये।","सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः॥ ११"],"iast":["svacchandopāttadehāya viśuddhajñānamūrtaye|","sarvasmai sarvabījāya sarvabhūtātmane namaḥ|| 11"],"meaning":"आपने जीवोंके समान कर्मवश होकर नहीं, स्वतन्त्रतासे अपने भक्तोंकी तथा अपनी इच्छाके अनुसार शरीर स्वीकार किया है। आपका यह शरीर भी विशुद्ध-ज्ञानस्वरूप है। आप सब कुछ हैं, सबके कारण हैं और सबके आत्मा हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ ११॥"},{"id":"10.27.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/12/","page":302,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["मयेदं भगवन् गोष्ठनाशायासारवायुभिः।","चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना॥ १२"],"iast":["mayedaṃ bhagavan goṣṭhanāśāyāsāravāyubhiḥ|","ceṣṭitaṃ vihate yajñe māninā tīvramanyunā|| 12"],"meaning":"भगवन्! मेरे अभिमानका अन्त नहीं है और मेरा क्रोध भी बहुत ही तीव्र, मेरे वशके बाहर है। जब मैंने देखा कि मेरा यज्ञ तो नष्ट कर दिया गया, तब मैंने मूसलधार वर्षा और आँधीके द्वारा सारे व्रजमण्डलको नष्ट कर देना चाहा॥ १२॥"},{"id":"10.27.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/13/","page":302,"speaker":"इन्द्र उवाच","sanskrit":["त्वयेशानुगृहीतोऽस्मि ध्वस्तस्तम्भो वृथोद्यमः।","ईश्‍वरं गुरुमात्मानं त्वामहं शरणं गतः॥ १३"],"iast":["tvayeśānugṛhīto'smi dhvastastambho vṛthodyamaḥ|","īśvaraṃ gurumātmānaṃ tvāmahaṃ śaraṇaṃ gataḥ|| 13"],"meaning":"परन्तु प्रभो! आपने मुझपर बहुत ही अनुग्रह किया। मेरी चेष्टा व्यर्थ होनेसे मेरे घमंडकी जड़ उखड़ गयी। आप मेरे स्वामी हैं, गुरु हैं और मेरे आत्मा हैं। मैं आपकी शरणमें हूँ॥ १३॥"},{"id":"10.27.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/14/","page":303,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं संकीर्तितः कृष्णो मघोना भगवानमुम्।","मेघगम्भीरया वाचा प्रहसन्‍निदमब्रवीत्॥ १४"],"iast":["evaṃ saṃkīrtitaḥ kṛṣṇo maghonā bhagavānamum|","meghagambhīrayā vācā prahasannidamabravīt|| 14"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवराज इन्द्रने भगवान् श्रीकृष्णकी इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीसे इन्द्रको सम्बोधन करके कहा—॥ १४॥"},{"id":"10.27.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/15/","page":303,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मया तेऽकारि मघवन् मखभङ्गोऽनुगृह्णता।","मदनुस्मृतये नित्यं मत्तस्येन्द्रश्रिया भृशम्॥ १५"],"iast":["mayā te'kāri maghavan makhabhaṅgo'nugṛhṇatā|","madanusmṛtaye nityaṃ mattasyendraśriyā bhṛśam|| 15"],"meaning":"श्रीभगवान्‌ने कहा—इन्द्र! तुम ऐश्‍वर्य और धन-सम्पत्तिके मदसे पूरे-पूरे मतवाले हो रहे थे। इसलिये तुमपर अनुग्रह करके ही मैंने तुम्हारा यज्ञ भंग किया है। यह इसलिये कि अब तुम मुझे नित्य-निरन्तर स्मरण रख सको॥ १५॥"},{"id":"10.27.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/16/","page":303,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मामैश्‍वर्यश्रीमदान्धो दण्डपाणिं न पश्यति।","तं भ्रंशयामि सम्पद‍्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम्॥ १६"],"iast":["māmaiśvaryaśrīmadāndho daṇḍapāṇiṃ na paśyati|","taṃ bhraṃśayāmi sampadbhyo yasya cecchāmyanugraham|| 16"],"meaning":"जो ऐश्‍वर्य और धन-सम्पत्तिके मदसे अंधा हो जाता है, वह यह नहीं देखता कि मैं कालरूप परमेश्‍वर हाथमें दण्ड लेकर उसके सिरपर सवार हूँ। मैं जिसपर अनुग्रह करना चाहता हूँ, उसे ऐश्‍वर्यभ्रष्ट कर देता हूँ॥ १६॥"},{"id":"10.27.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/17/","page":303,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["गम्यतां शक्र भद्रं वः क्रियतां मेऽनुशासनम्।","स्थीयतां स्वाधिकारेषु युक्तैर्वः स्तम्भवर्जितैः॥ १७"],"iast":["gamyatāṃ śakra bhadraṃ vaḥ kriyatāṃ me'nuśāsanam|","sthīyatāṃ svādhikāreṣu yuktairvaḥ stambhavarjitaiḥ|| 17"],"meaning":"इन्द्र! तुम्हारा मंगल हो। अब तुम अपनी राजधानी अमरावतीमें जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करो। अब कभी घमंड न करना। नित्य-निरन्तर मेरी सन्‍निधिका, मेरे संयोगका अनुभव करते रहना और अपने अधिकारके अनुसार उचित रीतिसे मर्यादाका पालन करना॥ १७॥"},{"id":"10.27.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/18/","page":303,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अथाह सुरभिः कृष्णमभिवन्द्य मनस्विनी।","स्वसन्तानैरुपामन्त्र्य गोपरूपिणमीश्‍वरम्॥ १८"],"iast":["athāha surabhiḥ kṛṣṇamabhivandya manasvinī|","svasantānairupāmantrya goparūpiṇamīśvaram|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् इस प्रकार आज्ञा दे ही रहे थे कि मनस्विनी कामधेनुने अपनी सन्तानोंके साथ गोपवेषधारी परमेश्‍वर श्रीकृष्णकी वन्दना की और उनको सम्बोधित करके कहा—॥ १८॥"},{"id":"10.27.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/19/","page":303,"speaker":"सुरभिरुवाच","sanskrit":["कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्‍वात्मन् विश्‍वसम्भव।","भवता लोकनाथेन सनाथा वयमच्युत॥ १९"],"iast":["kṛṣṇa kṛṣṇa mahāyogin viśvātman viśvasambhava|","bhavatā lokanāthena sanāthā vayamacyuta|| 19"],"meaning":"कामधेनुने कहा—सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप महायोगी—योगेश्‍वर हैं। आप स्वयं विश्‍व हैं, विश्‍वके परमकारण हैं, अच्युत हैं। सम्पूर्ण विश्‍वके स्वामी आपको अपने रक्षकके रूपमें प्राप्तकर हम सनाथ हो गयी॥ १९॥"},{"id":"10.27.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/20/","page":303,"speaker":"सुरभिरुवाच","sanskrit":["त्वं नः परमकं दैवं त्वं न इन्द्रो जगत्पते।","भवाय भव गोविप्रदेवानां ये च साधवः॥ २०"],"iast":["tvaṃ naḥ paramakaṃ daivaṃ tvaṃ na indro jagatpate|","bhavāya bhava govipradevānāṃ ye ca sādhavaḥ|| 20"],"meaning":"आप जगत‍्के स्वामी हैं, परन्तु हमारे तो परम पूजनीय आराध्यदेव ही हैं। प्रभो! इन्द्र त्रिलोकीके इन्द्र हुआ करें, परन्तु हमारे इन्द्र तो आप ही हैं। अतः आप ही गौ, ब्राह्मण, देवता और साधुजनोंकी रक्षाके लिये हमारे इन्द्र बन जाइये॥ २०॥"},{"id":"10.27.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/21/","page":303,"speaker":"सुरभिरुवाच","sanskrit":["इन्द्रं नस्त्वाभिषेक्ष्यामो ब्रह्मणा नोदिता वयम्।","अवतीर्णोऽसि विश्‍वात्मन् भूमेर्भारापनुत्तये॥ २१"],"iast":["indraṃ nastvābhiṣekṣyāmo brahmaṇā noditā vayam|","avatīrṇo'si viśvātman bhūmerbhārāpanuttaye|| 21"],"meaning":"हम गौएँ ब्रह्माजीकी प्रेरणासे आपको अपना इन्द्र मानकर अभिषेक करेंगी। विश्‍वात्मन्! आपने पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही अवतार धारण किया है॥ २१॥"},{"id":"10.27.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/22/","page":303,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं कृष्णमुपामन्त्र्य सुरभिः पयसाऽऽत्मनः।","जलैराकाशगङ्गाया ऐरावतकरोद‍्धृतैः॥ २२"],"iast":["evaṃ kṛṣṇamupāmantrya surabhiḥ payasā''tmanaḥ|","jalairākāśagaṅgāyā airāvatakaroddhṛtaiḥ|| 22"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर कामधेनुने अपने दूधसे और देवमाताओंकी प्रेरणासे देवराज इन्द्रने ऐरावतकी सूँडके द्वारा लाये हुए आकाशगंगाके जलसे देवर्षियोंके साथ यदुनाथ श्रीकृष्णका अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविन्द’ नामसे सम्बोधित किया॥ २२-२३॥","meaning_covers":[22,23]},{"id":"10.27.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/23/","page":304,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इन्द्रः सुरर्षिभिः साकं नोदितो देवमातृभिः।","अभ्यषिञ्चत दाशार्हं गोविन्द इति चाभ्यधात्॥ २३"],"iast":["indraḥ surarṣibhiḥ sākaṃ nodito devamātṛbhiḥ|","abhyaṣiñcata dāśārhaṃ govinda iti cābhyadhāt|| 23"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर कामधेनुने अपने दूधसे और देवमाताओंकी प्रेरणासे देवराज इन्द्रने ऐरावतकी सूँडके द्वारा लाये हुए आकाशगंगाके जलसे देवर्षियोंके साथ यदुनाथ श्रीकृष्णका अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविन्द’ नामसे सम्बोधित किया॥ २२-२३॥","meaning_covers":[22,23]},{"id":"10.27.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/24/","page":304,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रागतास्तुम्बुरुनारदादयो","गन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः ।","जगुर्यशो लोकमलापहं हरेः","सुराङ्गनाः संननृतुर्मुदान्विताः॥ २४"],"iast":["tatrāgatāstumburunāradādayo","gandharvavidyādharasiddhacāraṇāḥ |","jaguryaśo lokamalāpahaṃ hareḥ","surāṅganāḥ saṃnanṛturmudānvitāḥ|| 24"],"meaning":"उस समय वहाँ नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण पहलेसे ही आ गये थे। वे समस्त संसारके पाप-तापको मिटा देनेवाले भगवान्‌के लोकमलापह यशका गान करने लगे और अप्सराएँ आनन्दसे भरकर नृत्य करने लगीं॥ २४॥"},{"id":"10.27.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/25/","page":304,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं तुष्टुवुर्देवनिकायकेतवो","व्यवाकिरंश्‍चाद्भुतपुष्पवृष्टिभिः।","लोकाः परां निर्वृतिमाप्नुवंस्त्रयो","गावस्तदा गामनयन् पयोद्रुताम्॥ २५"],"iast":["taṃ tuṣṭuvurdevanikāyaketavo","vyavākiraṃścādbhutapuṣpavṛṣṭibhiḥ|","lokāḥ parāṃ nirvṛtimāpnuvaṃstrayo","gāvastadā gāmanayan payodrutām|| 25"],"meaning":"मुख्य-मुख्य देवता भगवान्‌की स्तुति करके उनपर नन्दनवनके दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। तीनों लोकोंमें परमानन्दकी बाढ़ आ गयी और गौओंके स्तनोंसे आप-ही-आप इतना दूध गिरा कि पृथ्वी गीली हो गयी॥ २५॥"},{"id":"10.27.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/26/","page":304,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नानारसौघाः सरितो वृक्षा आसन् मधुस्रवाः।","अकृष्टपच्यौषधयो गिरयोऽबिभ्रदुन्मणीन्॥ २६"],"iast":["nānārasaughāḥ sarito vṛkṣā āsan madhusravāḥ|","akṛṣṭapacyauṣadhayo girayo'bibhradunmaṇīn|| 26"],"meaning":"नदियोंमें विविध रसोंकी बाढ़ आ गयी। वृक्षोंसे मधुधारा बहने लगी। बिना जोते-बोये पृथ्वीमें अनेकों प्रकारकी ओषधियाँ, अन्‍न पैदा हो गये। पर्वतोंमें छिपे हुए मणि-माणिक्य स्वयं ही बाहर निकल आये॥ २६॥"},{"id":"10.27.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/27/","page":304,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णेऽभिषिक्त एतानि सत्त्वानि कुरुनन्दन।","निर्वैराण्यभवंस्तात क्रूराण्यपि निसर्गतः॥ २७"],"iast":["kṛṣṇe'bhiṣikta etāni sattvāni kurunandana|","nirvairāṇyabhavaṃstāta krūrāṇyapi nisargataḥ|| 27"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक होनेपर जो जीव स्वभावसे ही क्रूर हैं, वे भी वैरहीन हो गये, उनमें भी परस्पर मित्रता हो गयी॥ २७॥"},{"id":"10.27.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/28/","page":304,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति गोगोकुलपतिं गोविन्दमभिषिच्य सः।","अनुज्ञातो ययौ शक्रो वृतो देवादिभिर्दिवम्॥ २८"],"iast":["iti gogokulapatiṃ govindamabhiṣicya saḥ|","anujñāto yayau śakro vṛto devādibhirdivam|| 28"],"meaning":"इन्द्रने इस प्रकार गौ और गोकुलके स्वामी श्रीगोविन्दका अभिषेक किया और उनसे अनुमति प्राप्त होनेपर देवता, गन्धर्व आदिके साथ स्वर्गकी यात्रा की॥ २८॥"}],"text":[{"b":30245,"kind":"adhyaya_heading","page":301,"text":"अथ सप्तविंशोऽध्यायः"},{"b":30246,"kind":"topic_heading","page":301,"text":"श्रीकृष्णका अभिषेक"},{"b":30247,"kind":"topic_heading","page":301,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30248,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.1"],"text":"गोवर्धने धृते शैल आसाराद् रक्षिते व्रजे।"},{"b":30249,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.1"],"text":"गोलोकादाव्रजत् कृष्णं सुरभिः शक्र एव च॥ १"},{"b":30250,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.2"],"text":"विविक्त उपसङ्गम्य व्रीडितः कृतहेलनः।"},{"b":30251,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.2"],"text":"पस्पर्श पादयोरेनं किरीटेनार्कवर्चसा॥ २"},{"b":30252,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.3"],"text":"दृष्टश्रुतानुभावोऽस्य कृष्णस्यामिततेजसः।"},{"b":30253,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.3"],"text":"नष्टत्रिलोकेशमद इन्द्र आह कृतांजलिः॥ ३"},{"b":30254,"kind":"hindi_commentary","page":301,"explains":["10.27.1","10.27.2","10.27.3"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने गिरिराज गोवर्द्धनको धारण करके मूसलधार वर्षासे व्रजको बचा लिया, तब उनके पास गोलोकसे कामधेनु (बधाई देनेके लिये) और स्वर्गसे देवराज इन्द्र (अपने अपराधको क्षमा करानेके लिये) आये॥ १॥ भगवान्‌का तिरस्कार करनेके कारण इन्द्र बहुत ही लज्जित थे। इसलिये उन्होंने एकान्त-स्थानमें भगवान्‌के पास जाकर अपने सूर्यके समान तेजस्वी मुकुटसे उनके चरणोंका स्पर्श किया॥ २॥ परम तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव देख-सुनकर इन्द्रका यह घमंड जाता रहा कि मैं ही तीनों लोकोंका स्वामी हूँ। अब उन्होंने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की॥ ३॥"},{"b":30255,"kind":"topic_heading","page":301,"text":"इन्द्र उवाच"},{"b":30256,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.4"],"text":"विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं"},{"b":30257,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.4"],"text":"तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम्।"},{"b":30258,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.4"],"text":"मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो"},{"b":30259,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.4"],"text":"न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः॥ ४"},{"b":30260,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.5"],"text":"कुतो नु तद्धेतव ईश तत्कृता"},{"b":30261,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.5"],"text":"लोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः।"},{"b":30262,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.5"],"text":"तथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति"},{"b":30263,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.5"],"text":"धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय॥ ५"},{"b":30264,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.6"],"text":"पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो"},{"b":30265,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.6"],"text":"दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः।"},{"b":30266,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.6"],"text":"हिताय स्वेच्छातनुभिः समीहसे"},{"b":30267,"kind":"sanskrit_shloka","page":301,"verses":["10.27.6"],"text":"मानं विधुन्वञ्जगदीशमानिनाम्॥ ६"},{"b":30268,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.7"],"text":"ये मद्विधाज्ञा जगदीशमानिन-"},{"b":30269,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.7"],"text":"स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तन्मदम्।"},{"b":30270,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.7"],"text":"हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया"},{"b":30271,"kind":"hindi_commentary","page":302,"verses":["10.27.7"],"text":"ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम्॥ ७"},{"b":30272,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.8"],"text":"स त्वं ममैश्‍वर्यमदप्लुतस्य"},{"b":30273,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.8"],"text":"कृतागसस्तेऽविदुषः प्रभावम्।"},{"b":30274,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.8"],"text":"क्षन्तुं प्रभोऽथार्हसि मूढचेतसो"},{"b":30275,"kind":"hindi_commentary","page":302,"verses":["10.27.8"],"text":"मैवं पुनर्भून्मतिरीश मेऽसती॥ ८"},{"b":30276,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.9"],"text":"तवावतारोऽयमधोक्षजेह"},{"b":30277,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.9"],"text":"स्वयम्भराणामुरुभारजन्मनाम् ।"},{"b":30278,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.9"],"text":"चमूपतीनामभवाय देव"},{"b":30279,"kind":"hindi_commentary","page":302,"verses":["10.27.9"],"text":"भवाय युष्मच्चरणानुवर्तिनाम्॥ ९"},{"b":30280,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.10"],"text":"नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने।"},{"b":30281,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.10"],"text":"वासुदेवाय कृष्णाय सात्वतां पतये नमः॥ १०"},{"b":30282,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.11"],"text":"स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये।"},{"b":30283,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.11"],"text":"सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः॥ ११"},{"b":30284,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.12"],"text":"मयेदं भगवन् गोष्ठनाशायासारवायुभिः।"},{"b":30285,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.12"],"text":"चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना॥ १२"},{"b":30286,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.13"],"text":"त्वयेशानुगृहीतोऽस्मि ध्वस्तस्तम्भो वृथोद्यमः।"},{"b":30287,"kind":"sanskrit_shloka","page":302,"verses":["10.27.13"],"text":"ईश्‍वरं गुरुमात्मानं त्वामहं शरणं गतः॥ १३"},{"b":30288,"kind":"hindi_commentary","page":301,"explains":["10.27.4","10.27.5","10.27.6","10.27.7","10.27.8","10.27.9","10.27.10","10.27.11","10.27.12","10.27.13"],"text":"इन्द्रने कहा—भगवन्! आपका स्वरूप परम शान्त, ज्ञानमय, रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित एवं विशुद्ध अप्राकृत सत्त्वमय है। यह गुणोंके प्रवाहरूपसे प्रतीत होनेवाला प्रपंच केवल मायामय है; क्योंकि आपका स्वरूप न जाननेके कारण ही आपमें इसकी प्रतीति होती है॥ ४॥ जब आपका सम्बन्ध अज्ञान और उसके कारण प्रतीत होनेवाले देहादिसे है ही नहीं, फिर उन देह आदिकी प्राप्तिके कारण तथा उन्हींसे होनेवाले लोभ-क्रोध आदि दोष तो आपमें हो ही कैसे सकते हैं? प्रभो! इन दोषोंका होना तो अज्ञानका लक्षण है। इस प्रकार यद्यपि अज्ञान और उससे होनेवाले जगत‍्से आपका कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर भी धर्मकी रक्षा और दुष्टोंका दमन करनेके लिये आप अवतार ग्रहण करते हैं और निग्रह-अनुग्रह भी करते हैं॥ ५॥ आप जगत‍्के पिता, गुरु और स्वामी हैं। आप जगत‍्का नियन्त्रण करनेके लिये दण्ड धारण किये हुए दुस्तर काल हैं। आप अपने भक्तोंकी लालसा पूर्ण करनेके लिये स्वच्छन्दतासे लीला-शरीर प्रकट करते हैं और जो लोग हमारी तरह अपनेको ईश्‍वर मान बैठते हैं, उनका मान मर्दन करते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करते हैं॥ ६॥ प्रभो! जो मेरे-जैसे अज्ञानी और अपनेको जगत‍्का ईश्‍वर माननेवाले हैं, वे जब देखते हैं कि बड़े-बड़े भयके अवसरोंपर भी आप निर्भय रहते हैं, तब वे अपना घमंड छोड़ देते हैं और गर्वरहित होकर संतपुरुषोंके द्वारा सेवित भक्तिमार्गका आश्रय लेकर आपका भजन करते हैं। प्रभो! आपकी एक-एक चेष्टा दुष्टोंके लिये दण्डविधान है॥ ७॥ प्रभो! मैंने ऐश्‍वर्यके मदसे चूर होकर आपका अपराध किया है; क्योंकि मैं आपकी शक्ति और प्रभावके सम्बन्धमें बिलकुल अनजान था। परमेश्‍वर! आप कृपा करके मुझ मूर्ख अपराधीका यह अपराध क्षमा करें और ऐसी कृपा करें कि मुझे फिर कभी ऐसे दुष्ट अज्ञानका शिकार न होना पड़े॥ ८॥ स्वयंप्रकाश, इन्द्रियातीत परमात्मन्! आपका यह अवतार इसलिये हुआ है कि जो असुर-सेनापति केवल अपना पेट पालनेमें ही लग रहे हैं और पृथ्वीके लिये बड़े भारी भारके कारण बन रहे हैं, उनका वध करके उन्हें मोक्ष दिया जाय और जो आपके चरणोंके सेवक हैं—आज्ञाकारी भक्तजन हैं, उनका अभ्युदय हो—उनकी रक्षा हो॥ ९॥ भगवन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सर्वान्तर्यामी पुरुषोत्तम तथा सर्वात्मा वासुदेव हैं। आप यदुवंशियोंके एकमात्र स्वामी, भक्तवत्सल एवं सबके चित्तको आकर्षित करनेवाले हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ १०॥ आपने जीवोंके समान कर्मवश होकर नहीं, स्वतन्त्रतासे अपने भक्तोंकी तथा अपनी इच्छाके अनुसार शरीर स्वीकार किया है। आपका यह शरीर भी विशुद्ध-ज्ञानस्वरूप है। आप सब कुछ हैं, सबके कारण हैं और सबके आत्मा हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ ११॥ भगवन्! मेरे अभिमानका अन्त नहीं है और मेरा क्रोध भी बहुत ही तीव्र, मेरे वशके बाहर है। जब मैंने देखा कि मेरा यज्ञ तो नष्ट कर दिया गया, तब मैंने मूसलधार वर्षा और आँधीके द्वारा सारे व्रजमण्डलको नष्ट कर देना चाहा॥ १२॥ परन्तु प्रभो! आपने मुझपर बहुत ही अनुग्रह किया। मेरी चेष्टा व्यर्थ होनेसे मेरे घमंडकी जड़ उखड़ गयी। आप मेरे स्वामी हैं, गुरु हैं और मेरे आत्मा हैं। मैं आपकी शरणमें हूँ॥ १३॥"},{"b":30289,"kind":"topic_heading","page":301,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30290,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.14"],"text":"एवं संकीर्तितः कृष्णो मघोना भगवानमुम्।"},{"b":30291,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.14"],"text":"मेघगम्भीरया वाचा प्रहसन्‍निदमब्रवीत्॥ १४"},{"b":30292,"kind":"hindi_commentary","page":303,"explains":["10.27.14"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवराज इन्द्रने भगवान् श्रीकृष्णकी इस प्रकार स्तुति की, तब उन्होंने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीसे इन्द्रको सम्बोधन करके कहा—॥ १४॥"},{"b":30293,"kind":"topic_heading","page":303,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":30294,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.15"],"text":"मया तेऽकारि मघवन् मखभङ्गोऽनुगृह्णता।"},{"b":30295,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.15"],"text":"मदनुस्मृतये नित्यं मत्तस्येन्द्रश्रिया भृशम्॥ १५"},{"b":30296,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.16"],"text":"मामैश्‍वर्यश्रीमदान्धो दण्डपाणिं न पश्यति।"},{"b":30297,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.16"],"text":"तं भ्रंशयामि सम्पद‍्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम्॥ १६"},{"b":30298,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.17"],"text":"गम्यतां शक्र भद्रं वः क्रियतां मेऽनुशासनम्।"},{"b":30299,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.17"],"text":"स्थीयतां स्वाधिकारेषु युक्तैर्वः स्तम्भवर्जितैः॥ १७"},{"b":30300,"kind":"hindi_commentary","page":303,"explains":["10.27.15","10.27.16","10.27.17"],"text":"श्रीभगवान्‌ने कहा—इन्द्र! तुम ऐश्‍वर्य और धन-सम्पत्तिके मदसे पूरे-पूरे मतवाले हो रहे थे। इसलिये तुमपर अनुग्रह करके ही मैंने तुम्हारा यज्ञ भंग किया है। यह इसलिये कि अब तुम मुझे नित्य-निरन्तर स्मरण रख सको॥ १५॥ जो ऐश्‍वर्य और धन-सम्पत्तिके मदसे अंधा हो जाता है, वह यह नहीं देखता कि मैं कालरूप परमेश्‍वर हाथमें दण्ड लेकर उसके सिरपर सवार हूँ। मैं जिसपर अनुग्रह करना चाहता हूँ, उसे ऐश्‍वर्यभ्रष्ट कर देता हूँ॥ १६॥ इन्द्र! तुम्हारा मंगल हो। अब तुम अपनी राजधानी अमरावतीमें जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करो। अब कभी घमंड न करना। नित्य-निरन्तर मेरी सन्‍निधिका, मेरे संयोगका अनुभव करते रहना और अपने अधिकारके अनुसार उचित रीतिसे मर्यादाका पालन करना॥ १७॥"},{"b":30301,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.18"],"text":"अथाह सुरभिः कृष्णमभिवन्द्य मनस्विनी।"},{"b":30302,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.18"],"text":"स्वसन्तानैरुपामन्त्र्य गोपरूपिणमीश्‍वरम्॥ १८"},{"b":30303,"kind":"hindi_commentary","page":303,"explains":["10.27.18"],"text":"परीक्षित्! भगवान् इस प्रकार आज्ञा दे ही रहे थे कि मनस्विनी कामधेनुने अपनी सन्तानोंके साथ गोपवेषधारी परमेश्‍वर श्रीकृष्णकी वन्दना की और उनको सम्बोधित करके कहा—॥ १८॥"},{"b":30305,"kind":"topic_heading","page":303,"text":"सुरभिरुवाच"},{"b":30306,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.19"],"text":"कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्‍वात्मन् विश्‍वसम्भव।"},{"b":30307,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.19"],"text":"भवता लोकनाथेन सनाथा वयमच्युत॥ १९"},{"b":30308,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.20"],"text":"त्वं नः परमकं दैवं त्वं न इन्द्रो जगत्पते।"},{"b":30309,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.20"],"text":"भवाय भव गोविप्रदेवानां ये च साधवः॥ २०"},{"b":30310,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.21"],"text":"इन्द्रं नस्त्वाभिषेक्ष्यामो ब्रह्मणा नोदिता वयम्।"},{"b":30311,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.21"],"text":"अवतीर्णोऽसि विश्‍वात्मन् भूमेर्भारापनुत्तये॥ २१"},{"b":30312,"kind":"hindi_commentary","page":303,"explains":["10.27.19","10.27.20","10.27.21"],"text":"कामधेनुने कहा—सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप महायोगी—योगेश्‍वर हैं। आप स्वयं विश्‍व हैं, विश्‍वके परमकारण हैं, अच्युत हैं। सम्पूर्ण विश्‍वके स्वामी आपको अपने रक्षकके रूपमें प्राप्तकर हम सनाथ हो गयी॥ १९॥ आप जगत‍्के स्वामी हैं, परन्तु हमारे तो परम पूजनीय आराध्यदेव ही हैं। प्रभो! इन्द्र त्रिलोकीके इन्द्र हुआ करें, परन्तु हमारे इन्द्र तो आप ही हैं। अतः आप ही गौ, ब्राह्मण, देवता और साधुजनोंकी रक्षाके लिये हमारे इन्द्र बन जाइये॥ २०॥ हम गौएँ ब्रह्माजीकी प्रेरणासे आपको अपना इन्द्र मानकर अभिषेक करेंगी। विश्‍वात्मन्! आपने पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही अवतार धारण किया है॥ २१॥"},{"b":30313,"kind":"topic_heading","page":303,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30314,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.22"],"text":"एवं कृष्णमुपामन्त्र्य सुरभिः पयसाऽऽत्मनः।"},{"b":30315,"kind":"sanskrit_shloka","page":303,"verses":["10.27.22"],"text":"जलैराकाशगङ्गाया ऐरावतकरोद‍्धृतैः॥ २२"},{"b":30316,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.23"],"text":"इन्द्रः सुरर्षिभिः साकं नोदितो देवमातृभिः।"},{"b":30317,"kind":"topic_heading","page":304,"verses":["10.27.23"],"text":"अभ्यषिञ्चत दाशार्हं गोविन्द इति चाभ्यधात्॥ २३"},{"b":30318,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.24"],"text":"तत्रागतास्तुम्बुरुनारदादयो"},{"b":30319,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.24"],"text":"गन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणाः ।"},{"b":30320,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.24"],"text":"जगुर्यशो लोकमलापहं हरेः"},{"b":30321,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.24"],"text":"सुराङ्गनाः संननृतुर्मुदान्विताः॥ २४"},{"b":30322,"kind":"hindi_commentary","page":303,"explains":["10.27.22","10.27.23","10.27.24"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर कामधेनुने अपने दूधसे और देवमाताओंकी प्रेरणासे देवराज इन्द्रने ऐरावतकी सूँडके द्वारा लाये हुए आकाशगंगाके जलसे देवर्षियोंके साथ यदुनाथ श्रीकृष्णका अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविन्द’ नामसे सम्बोधित किया॥ २२-२३॥ उस समय वहाँ नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण पहलेसे ही आ गये थे। वे समस्त संसारके पाप-तापको मिटा देनेवाले भगवान्‌के लोकमलापह यशका गान करने लगे और अप्सराएँ आनन्दसे भरकर नृत्य करने लगीं॥ २४॥"},{"b":30323,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.25"],"text":"तं तुष्टुवुर्देवनिकायकेतवो"},{"b":30324,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.25"],"text":"व्यवाकिरंश्‍चाद्भुतपुष्पवृष्टिभिः।"},{"b":30325,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.25"],"text":"लोकाः परां निर्वृतिमाप्नुवंस्त्रयो"},{"b":30326,"kind":"topic_heading","page":304,"verses":["10.27.25"],"text":"गावस्तदा गामनयन् पयोद्रुताम्॥ २५"},{"b":30327,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.26"],"text":"नानारसौघाः सरितो वृक्षा आसन् मधुस्रवाः।"},{"b":30328,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.26"],"text":"अकृष्टपच्यौषधयो गिरयोऽबिभ्रदुन्मणीन्॥ २६"},{"b":30329,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.27"],"text":"कृष्णेऽभिषिक्त एतानि सत्त्वानि कुरुनन्दन।"},{"b":30330,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.27"],"text":"निर्वैराण्यभवंस्तात क्रूराण्यपि निसर्गतः॥ २७"},{"b":30331,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.28"],"text":"इति गोगोकुलपतिं गोविन्दमभिषिच्य सः।"},{"b":30332,"kind":"sanskrit_shloka","page":304,"verses":["10.27.28"],"text":"अनुज्ञातो ययौ शक्रो वृतो देवादिभिर्दिवम्॥ २८"},{"b":30333,"kind":"hindi_translation","page":304,"explains":["10.27.25","10.27.26","10.27.27","10.27.28"],"text":"मुख्य-मुख्य देवता भगवान्‌की स्तुति करके उनपर नन्दनवनके दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। तीनों लोकोंमें परमानन्दकी बाढ़ आ गयी और गौओंके स्तनोंसे आप-ही-आप इतना दूध गिरा कि पृथ्वी गीली हो गयी॥ २५॥ नदियोंमें विविध रसोंकी बाढ़ आ गयी। वृक्षोंसे मधुधारा बहने लगी। बिना जोते-बोये पृथ्वीमें अनेकों प्रकारकी ओषधियाँ, अन्‍न पैदा हो गये। पर्वतोंमें छिपे हुए मणि-माणिक्य स्वयं ही बाहर निकल आये॥ २६॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक होनेपर जो जीव स्वभावसे ही क्रूर हैं, वे भी वैरहीन हो गये, उनमें भी परस्पर मित्रता हो गयी॥ २७॥ इन्द्रने इस प्रकार गौ और गोकुलके स्वामी श्रीगोविन्दका अभिषेक किया और उनसे अनुमति प्राप्त होनेपर देवता, गन्धर्व आदिके साथ स्वर्गकी यात्रा की॥ २८॥"},{"b":30334,"kind":"hindi_translation","page":304,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे इन्द्रस्तुतिर्नाम सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":2,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}