{"id":"10.26","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 26","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ षड्विंशोऽध्यायः","topics":["नन्दबाबासे गोपोंकी श्रीकृष्णके प्रभावके विषयमें बातचीत"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.26.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[297,300]},"verses":[{"id":"10.26.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/1/","page":297,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवंविधानि कर्माणि गोपाः कृष्णस्य वीक्ष्य ते।","अतद्वीर्यविदः प्रोचुः समभ्येत्य सुविस्मिताः॥ १"],"iast":["evaṃvidhāni karmāṇi gopāḥ kṛṣṇasya vīkṣya te|","atadvīryavidaḥ procuḥ samabhyetya suvismitāḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! व्रजके गोप भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे अलौकिक कर्म देखकर बड़े आश्‍चर्यमें पड़ गये। उन्हें भगवान्‌की अनन्त शक्तिका तो पता था नहीं, वे इकट्ठे होकर आपसमें इस प्रकार कहने लगे—॥ १॥"},{"id":"10.26.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/2/","page":297,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बालकस्य यदेतानि कर्माण्यत्यद्भुतानि वै।","कथमर्हत्यसौ जन्म ग्राम्येष्वात्मजुगुप्सितम्॥ २"],"iast":["bālakasya yadetāni karmāṇyatyadbhutāni vai|","kathamarhatyasau janma grāmyeṣvātmajugupsitam|| 2"],"meaning":"‘इस बालकके ये कर्म बड़े अलौकिक हैं। इसका हमारे-जैसे गँवार ग्रामीणोंमें जन्म लेना तो इसके लिये बड़ी निन्दाकी बात है। यह भला, कैसे उचित हो सकता है॥ २॥"},{"id":"10.26.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/3/","page":298,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यः सप्तहायनो बालः करेणैकेन लीलया।","कथं बिभ्रद् गिरिवरं पुष्करं गजराडिव॥ ३"],"iast":["yaḥ saptahāyano bālaḥ kareṇaikena līlayā|","kathaṃ bibhrad girivaraṃ puṣkaraṃ gajarāḍiva|| 3"],"meaning":"जैसे गजराज कोई कमल उखाड़कर उसे ऊपर उठा ले और धारण करे, वैसे ही इस नन्हें-से सात वर्षके बालकने एक ही हाथसे गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़ लिया और खेल-खेलमें सात दिनोंतक उठाये रखा॥ ३॥"},{"id":"10.26.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/4/","page":298,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तोकेनामीलिताक्षेण पूतनाया महौजसः।","पीतः स्तनः सह प्राणैः कालेनेव वयस्तनोः॥ ४"],"iast":["tokenāmīlitākṣeṇa pūtanāyā mahaujasaḥ|","pītaḥ stanaḥ saha prāṇaiḥ kāleneva vayastanoḥ|| 4"],"meaning":"यह साधारण मनुष्यके लिये भला कैसे सम्भव है? जब यह नन्हा-सा बच्चा था, उस समय बड़ी भयंकर राक्षसी पूतना आयी और इसने आँख बंद किये-किये ही उसका स्तन तो पिया ही, प्राण भी पी डाले— ठीक वैसे ही, जैसे काल शरीरकी आयुको निगल जाता है॥ ४॥"},{"id":"10.26.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/5/","page":298,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हिन्वतोऽधः शयानस्य मास्यस्य चरणावुदक्।","अनोऽपतद् विपर्यस्तं रुदतः प्रपदाहतम्॥ ५"],"iast":["hinvato'dhaḥ śayānasya māsyasya caraṇāvudak|","ano'patad viparyastaṃ rudataḥ prapadāhatam|| 5"],"meaning":"जिस समय यह केवल तीन महीनेका था और छकड़ेके नीचे सोकर रो रहा था, उस समय रोते-रोते इसने ऐसा पाँव उछाला कि उसकी ठोकरसे वह बड़ा भारी छकड़ा उलटकर गिर ही पड़ा॥ ५॥"},{"id":"10.26.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/6/","page":298,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकहायन आसीनो ह्रियमाणो विहायसा।","दैत्येन यस्तृणावर्तमहन् कण्ठग्रहातुरम्॥ ६"],"iast":["ekahāyana āsīno hriyamāṇo vihāyasā|","daityena yastṛṇāvartamahan kaṇṭhagrahāturam|| 6"],"meaning":"उस समय तो यह एक ही वर्षका था, जब दैत्य बवंडरके रूपमें इसे बैठे-बैठे आकाशमें उड़ा ले गया था। तुम सब जानते ही हो कि इसने उस तृणावर्त दैत्यको गला घोंटकर मार डाला॥ ६॥"},{"id":"10.26.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/7/","page":298,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्वचिद्धैयंगवस्तैन्ये मात्रा बद्ध उलूखले।","गच्छन्‍नर्जुनयोर्मध्ये बाहुभ्यां तावपातयत्॥ ७"],"iast":["kvaciddhaiyaṃgavastainye mātrā baddha ulūkhale|","gacchannarjunayormadhye bāhubhyāṃ tāvapātayat|| 7"],"meaning":"उस दिनकी बात तो सभी जानते हैं कि माखनचोरी करनेपर यशोदारानीने इसे ऊखलसे बाँध दिया था। यह घुटनोंके बल बकैयाँ खींचते-खींचते उन दोनों विशाल अर्जुन वृक्षोंके बीचमेंसे निकल गया और उन्हें उखाड़ ही डाला॥ ७॥"},{"id":"10.26.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/8/","page":298,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वने संचारयन् वत्सान् सरामो बालकैर्वृतः।","हन्तुकामं बकं दोर्भ्यां मुखतोऽरिमपाटयत्॥ ८"],"iast":["vane saṃcārayan vatsān sarāmo bālakairvṛtaḥ|","hantukāmaṃ bakaṃ dorbhyāṃ mukhato'rimapāṭayat|| 8"],"meaning":"जब यह ग्वालबाल और बलरामजीके साथ बछड़ोंको चरानेके लिये वनमें गया हुआ था उस समय इसको मार डालनेके लिये एक दैत्य बगुलेके रूपमें आया और इसने दोनों हाथोंसे उसके दोनों ठोर पकड़कर उसे तिनकेकी तरह चीर डाला॥ ८॥"},{"id":"10.26.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/9/","page":298,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वत्सेषु वत्सरूपेण प्रविशन्तं जिघांसया।","हत्वा न्यपातयत्तेन कपित्थानि च लीलया॥ ९"],"iast":["vatseṣu vatsarūpeṇa praviśantaṃ jighāṃsayā|","hatvā nyapātayattena kapitthāni ca līlayā|| 9"],"meaning":"जिस समय इसको मार डालनेकी इच्छासे एक दैत्य बछड़ेके रूपमें बछड़ोंके झुंडमें घुस गया था उस समय इसने उस दैत्यको खेल-ही-खेलमें मार डाला और उसे कैथके पेड़ोंपर पटककर उन पेड़ोंको भी गिरा दिया॥ ९॥"},{"id":"10.26.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/10/","page":298,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हत्वा रासभदैतेयं तद्बन्धूंश्‍च बलान्वितः।","चक्रे तालवनं क्षेमं परिपक्वफलान्वितम्॥ १०"],"iast":["hatvā rāsabhadaiteyaṃ tadbandhūṃśca balānvitaḥ|","cakre tālavanaṃ kṣemaṃ paripakvaphalānvitam|| 10"],"meaning":"इसने बलरामजीके साथ मिलकर गधेके रूपमें रहनेवाले धेनुकासुर तथा उसके भाई-बन्धुओंको मार डाला और पके हुए फलोंसे पूर्ण तालवनको सबके लिये उपयोगी और मंगलमय बना दिया॥ १०॥"},{"id":"10.26.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/11/","page":299,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रलम्बं घातयित्वोग्रं बलेन बलशालिना।","अमोचयद् व्रजपशून् गोपांश्‍चारण्यवह्नितः॥ ११"],"iast":["pralambaṃ ghātayitvograṃ balena balaśālinā|","amocayad vrajapaśūn gopāṃścāraṇyavahnitaḥ|| 11"],"meaning":"इसीने बलशाली बलरामजीके द्वारा क्रूर प्रलम्बासुरको मरवा डाला तथा दावानलसे गौओं और ग्वालबालोंको उबार लिया॥ ११॥"},{"id":"10.26.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/12/","page":299,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आशीविषतमाहीन्द्रं दमित्वा विमदं ह्रदात्।","प्रसह्योद्वास्य यमुनां चक्रेऽसौ निर्विषोदकाम्॥ १२"],"iast":["āśīviṣatamāhīndraṃ damitvā vimadaṃ hradāt|","prasahyodvāsya yamunāṃ cakre'sau nirviṣodakām|| 12"],"meaning":"यमुनाजलमें रहनेवाला कालियनाग कितना विषैला था? परन्तु इसने उसका भी मान मर्दन कर उसे बलपूर्वक दहसे निकाल दिया और यमुनाजीका जल सदाके लिये विषरहित—अमृतमय बना दिया॥ १२॥"},{"id":"10.26.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/13/","page":299,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दुस्त्यजश्‍चानुरागोऽस्मिन् सर्वेषां नो व्रजौकसाम्।","नन्द ते तनयेऽस्मासु तस्याप्यौत्पत्तिकः कथम्॥ १३"],"iast":["dustyajaścānurāgo'smin sarveṣāṃ no vrajaukasām|","nanda te tanaye'smāsu tasyāpyautpattikaḥ katham|| 13"],"meaning":"नन्दजी! हम यह भी देखते हैं कि तुम्हारे इस साँवले बालकपर हम सभी व्रजवासियोंका अनन्त प्रेम है और इसका भी हमपर स्वाभाविक ही स्नेह है। क्या आप बतला सकते हैं कि इसका क्या कारण है॥ १३॥"},{"id":"10.26.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/14/","page":299,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्व सप्तहायनो बालः क्व महाद्रिविधारणम्।","ततो नो जायते शंका व्रजनाथ तवात्मजे॥ १४"],"iast":["kva saptahāyano bālaḥ kva mahādrividhāraṇam|","tato no jāyate śaṃkā vrajanātha tavātmaje|| 14"],"meaning":"भला, कहाँ तो यह सात वर्षका नन्हा-सा बालक और कहाँ इतने बड़े गिरिराजको सात दिनोंतक उठाये रखना! व्रजराज! इसीसे तो तुम्हारे पुत्रके सम्बन्धमें हमें बड़ी शंका हो रही है॥ १४॥"},{"id":"10.26.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/15/","page":299,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["श्रूयतां मे वचो गोपा व्येतु शंका च वोऽर्भके।","एनं कुमारमुद्दिश्य गर्गो मे यदुवाच ह॥ १५"],"iast":["śrūyatāṃ me vaco gopā vyetu śaṃkā ca vo'rbhake|","enaṃ kumāramuddiśya gargo me yaduvāca ha|| 15"],"meaning":"नन्दबाबाने कहा—गोपो! तुमलोग सावधान होकर मेरी बात सुनो। मेरे बालकके विषयमें तुम्हारी शंका दूर हो जाय। क्योंकि महर्षि गर्गने इस बालकको देखकर इसके विषयमें ऐसा ही कहा था॥ १५॥"},{"id":"10.26.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/16/","page":299,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["वर्णास्त्रयः किलास्यासन् गृह्णतोऽनुयुगं तनूः।","शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥ १६"],"iast":["varṇāstrayaḥ kilāsyāsan gṛhṇato'nuyugaṃ tanūḥ|","śuklo raktastathā pīta idānīṃ kṛṣṇatāṃ gataḥ|| 16"],"meaning":"‘तुम्हारा यह बालक प्रत्येक युगमें शरीर ग्रहण करता है। विभिन्‍न युगोंमें इसने श्‍वेत, रक्त और पीत—ये भिन्‍न-भिन्‍न रंग स्वीकार किये थे। इस बार यह कृष्णवर्ण हुआ है॥ १६॥"},{"id":"10.26.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/17/","page":299,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["प्रागयं वसुदेवस्य क्वचिज्जातस्तवात्मजः।","वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञाः सम्प्रचक्षते॥ १७"],"iast":["prāgayaṃ vasudevasya kvacijjātastavātmajaḥ|","vāsudeva iti śrīmānabhijñāḥ sampracakṣate|| 17"],"meaning":"नन्दजी! यह तुम्हारा पुत्र पहले कहीं वसुदेवके घर भी पैदा हुआ था, इसलिये इस रहस्यको जाननेवाले लोग ‘इसका नाम श्रीमान् वासुदेव है’—ऐसा कहते हैं॥ १७॥"},{"id":"10.26.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/18/","page":299,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते।","गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः॥ १८"],"iast":["bahūni santi nāmāni rūpāṇi ca sutasya te|","guṇakarmānurūpāṇi tānyahaṃ veda no janāḥ|| 18"],"meaning":"तुम्हारे पुत्रके गुण और कर्मोंके अनुरूप और भी बहुत-से नाम हैं तथा बहुत-से रूप। मैं तो उन नामोंको जानता हूँ, परन्तु संसारके साधारण लोग नहीं जानते॥ १८॥"},{"id":"10.26.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/19/","page":299,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["एष वः श्रेय आधास्यद् गोपगोकुलनन्दनः।","अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमञ्जस्तरिष्यथ॥ १९"],"iast":["eṣa vaḥ śreya ādhāsyad gopagokulanandanaḥ|","anena sarvadurgāṇi yūyamañjastariṣyatha|| 19"],"meaning":"यह तुमलोगोंका परम कल्याण करेगा, समस्त गोप और गौओंको यह बहुत ही आनन्दित करेगा। इसकी सहायतासे तुमलोग बड़ी-बड़ी विपत्तियोंको बड़ी सुगमतासे पार कर लोगे॥ १९॥"},{"id":"10.26.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/20/","page":299,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["पुरानेन व्रजपते साधवो दस्युपीडिताः।","अराजके रक्ष्यमाणा जिग्युर्दस्यून् समेधिताः॥ २०"],"iast":["purānena vrajapate sādhavo dasyupīḍitāḥ|","arājake rakṣyamāṇā jigyurdasyūn samedhitāḥ|| 20"],"meaning":"‘व्रजराज! पूर्वकालमें एक बार पृथ्वीमें कोई राजा नहीं रह गया था। डाकुओंने चारों ओर लूट-खसोट मचा रखी थी। तब तुम्हारे इसी पुत्रने सज्जन पुरुषोंकी रक्षा की और इससे बल पाकर उन लोगोंने लुटेरोंपर विजय प्राप्त की॥ २०॥"},{"id":"10.26.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/21/","page":300,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["य एतस्मिन् महाभागाः प्रीतिं कुर्वन्ति मानवाः।","नारयोऽभिभवन्त्येतान् विष्णुपक्षानिवासुराः॥ २१"],"iast":["ya etasmin mahābhāgāḥ prītiṃ kurvanti mānavāḥ|","nārayo'bhibhavantyetān viṣṇupakṣānivāsurāḥ|| 21"],"meaning":"नन्दबाबा! जो तुम्हारे इस साँवले शिशुसे प्रेम करते हैं, वे बड़े भाग्यवान् हैं। जैसे विष्णुभगवान्‌के करकमलोंकी छत्रछायामें रहनेवाले देवताओंको असुर नहीं जीत सकते, वैसे ही इससे प्रेम करनेवालोंको भीतरी या बाहरी—किसी भी प्रकारके शत्रु नहीं जीत सकते॥ २१॥"},{"id":"10.26.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/22/","page":300,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["तस्मान्‍नन्द कुमारोऽयं नारायणसमो गुणैः।","श्रिया कीर्त्यानुभावेन तत्कर्मसु न विस्मयः॥ २२"],"iast":["tasmānnanda kumāro'yaṃ nārāyaṇasamo guṇaiḥ|","śriyā kīrtyānubhāvena tatkarmasu na vismayaḥ|| 22"],"meaning":"नन्दजी! चाहे जिस दृष्टिसे देखें—गुणसे, ऐश्‍वर्य और सौन्दर्यसे, कीर्ति और प्रभावसे तुम्हारा बालक स्वयं भगवान् नारायणके ही समान है, अतः इस बालकके अलौकिक कार्योंको देखकर आश्‍चर्य न करना चाहिये’॥ २२॥"},{"id":"10.26.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/23/","page":300,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["इत्यद्धा मां समादिश्य गर्गे च स्वगृहं गते।","मन्ये नारायणस्यांशं कृष्णमक्लिष्टकारिणम्॥ २३"],"iast":["ityaddhā māṃ samādiśya garge ca svagṛhaṃ gate|","manye nārāyaṇasyāṃśaṃ kṛṣṇamakliṣṭakāriṇam|| 23"],"meaning":"गोपो! मुझे स्वयं गर्गाचार्यजी यह आदेश देकर अपने घर चले गये। तबसे मैं अलौकिक और परम सुखद कर्म करनेवाले इस बालकको भगवान् नारायणका ही अंश मानता हूँ॥ २३॥"},{"id":"10.26.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/24/","page":300,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["इति नन्दवचः श्रुत्वा गर्गगीतं व्रजौकसः।","दृष्टश्रुतानुभावास्ते कृष्णस्यामिततेजसः।","मुदिता नन्दमानर्चुः कृष्णं च गतविस्मयाः॥ २४"],"iast":["iti nandavacaḥ śrutvā gargagītaṃ vrajaukasaḥ|","dṛṣṭaśrutānubhāvāste kṛṣṇasyāmitatejasaḥ|","muditā nandamānarcuḥ kṛṣṇaṃ ca gatavismayāḥ|| 24"],"meaning":"जब व्रजवासियोंने नन्दबाबाके मुखसे गर्गजीकी यह बात सुनी, तब उनका विस्मय जाता रहा। क्योंकि अब वे अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके प्रभावको पूर्णरूपसे देख और सुन चुके थे। आनन्दमें भरकर उन्होंने नन्दबाबा और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ २४॥"},{"id":"10.26.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/25/","page":300,"speaker":"नन्द उवाच","sanskrit":["देवे वर्षति यज्ञविप्लवरुषा वज्राश्मपर्षानिलैः","सीदत्पालपशुस्त्रि आत्मशरणं दृष्ट्वानुकम्प्युत्स्मयन् ।","उत्पाट्यैककरेण शैलमबलो लीलोच्छिलीन्ध्रं यथा","बिभ्रद् गोष्ठमपान्महेन्द्रमदभित् प्रीयान्‍न इन्द्रो गवाम्॥ २५"],"iast":["deve varṣati yajñaviplavaruṣā vajrāśmaparṣānilaiḥ","sīdatpālapaśustri ātmaśaraṇaṃ dṛṣṭvānukampyutsmayan |","utpāṭyaikakareṇa śailamabalo līlocchilīndhraṃ yathā","bibhrad goṣṭhamapānmahendramadabhit prīyānna indro gavām|| 25"],"meaning":"जिस समय अपना यज्ञ भंग हो जानेके कारण इन्द्र क्रोधके मारे आग-बबूला हो गये थे और मूसलधार वर्षा करने लगे थे, उस समय वज्रपात, ओलोंकी बौछार और प्रचण्ड आँधीसे स्त्री, पशु तथा ग्वाले अत्यन्त पीड़ित हो गये थे। अपनी शरणमें रहनेवाले व्रजवासियोंकी यह दशा देखकर भगवान्‌का हृदय करुणासे भर आया। परन्तु फिर एक नयी लीला करनेके विचारसे वे तुरंत ही मुसकराने लगे। जैसे कोई नन्हा-सा निर्बल बालक खेल-खेलमें ही बरसाती छत्तेका पुष्प उखाड़ ले, वैसे ही उन्होंने एक हाथसे ही गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़कर धारण कर लिया और सारे व्रजकी रक्षा की। इन्द्रका मद चूर करनेवाले वे ही भगवान् गोविन्द हमपर प्रसन्‍न हों॥ २५॥"}],"text":[{"b":30182,"kind":"adhyaya_heading","page":297,"text":"अथ षड्विंशोऽध्यायः"},{"b":30183,"kind":"topic_heading","page":297,"text":"नन्दबाबासे गोपोंकी श्रीकृष्णके प्रभावके विषयमें बातचीत"},{"b":30184,"kind":"topic_heading","page":297,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":30185,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.26.1"],"text":"एवंविधानि कर्माणि गोपाः कृष्णस्य वीक्ष्य ते।"},{"b":30186,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.26.1"],"text":"अतद्वीर्यविदः प्रोचुः समभ्येत्य सुविस्मिताः॥ १"},{"b":30187,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.26.2"],"text":"बालकस्य यदेतानि कर्माण्यत्यद्भुतानि वै।"},{"b":30188,"kind":"sanskrit_shloka","page":297,"verses":["10.26.2"],"text":"कथमर्हत्यसौ जन्म ग्राम्येष्वात्मजुगुप्सितम्॥ २"},{"b":30189,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.3"],"text":"यः सप्तहायनो बालः करेणैकेन लीलया।"},{"b":30190,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.3"],"text":"कथं बिभ्रद् गिरिवरं पुष्करं गजराडिव॥ ३"},{"b":30191,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.4"],"text":"तोकेनामीलिताक्षेण पूतनाया महौजसः।"},{"b":30192,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.4"],"text":"पीतः स्तनः सह प्राणैः कालेनेव वयस्तनोः॥ ४"},{"b":30193,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.5"],"text":"हिन्वतोऽधः शयानस्य मास्यस्य चरणावुदक्।"},{"b":30194,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.5"],"text":"अनोऽपतद् विपर्यस्तं रुदतः प्रपदाहतम्॥ ५"},{"b":30195,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.6"],"text":"एकहायन आसीनो ह्रियमाणो विहायसा।"},{"b":30196,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.6"],"text":"दैत्येन यस्तृणावर्तमहन् कण्ठग्रहातुरम्॥ ६"},{"b":30197,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.7"],"text":"क्वचिद्धैयंगवस्तैन्ये मात्रा बद्ध उलूखले।"},{"b":30198,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.7"],"text":"गच्छन्‍नर्जुनयोर्मध्ये बाहुभ्यां तावपातयत्॥ ७"},{"b":30199,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.8"],"text":"वने संचारयन् वत्सान् सरामो बालकैर्वृतः।"},{"b":30200,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.8"],"text":"हन्तुकामं बकं दोर्भ्यां मुखतोऽरिमपाटयत्॥ ८"},{"b":30201,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.9"],"text":"वत्सेषु वत्सरूपेण प्रविशन्तं जिघांसया।"},{"b":30202,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.9"],"text":"हत्वा न्यपातयत्तेन कपित्थानि च लीलया॥ ९"},{"b":30203,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.10"],"text":"हत्वा रासभदैतेयं तद्बन्धूंश्‍च बलान्वितः।"},{"b":30204,"kind":"sanskrit_shloka","page":298,"verses":["10.26.10"],"text":"चक्रे तालवनं क्षेमं परिपक्वफलान्वितम्॥ १०"},{"b":30205,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.11"],"text":"प्रलम्बं घातयित्वोग्रं बलेन बलशालिना।"},{"b":30206,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.11"],"text":"अमोचयद् व्रजपशून् गोपांश्‍चारण्यवह्नितः॥ ११"},{"b":30207,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.12"],"text":"आशीविषतमाहीन्द्रं दमित्वा विमदं ह्रदात्।"},{"b":30208,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.12"],"text":"प्रसह्योद्वास्य यमुनां चक्रेऽसौ निर्विषोदकाम्॥ १२"},{"b":30209,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.13"],"text":"दुस्त्यजश्‍चानुरागोऽस्मिन् सर्वेषां नो व्रजौकसाम्।"},{"b":30210,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.13"],"text":"नन्द ते तनयेऽस्मासु तस्याप्यौत्पत्तिकः कथम्॥ १३"},{"b":30211,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.14"],"text":"क्व सप्तहायनो बालः क्व महाद्रिविधारणम्।"},{"b":30212,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.14"],"text":"ततो नो जायते शंका व्रजनाथ तवात्मजे॥ १४"},{"b":30213,"kind":"hindi_commentary","page":297,"explains":["10.26.1","10.26.2","10.26.3","10.26.4","10.26.5","10.26.6","10.26.7","10.26.8","10.26.9","10.26.10","10.26.11","10.26.12","10.26.13","10.26.14"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! व्रजके गोप भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे अलौकिक कर्म देखकर बड़े आश्‍चर्यमें पड़ गये। उन्हें भगवान्‌की अनन्त शक्तिका तो पता था नहीं, वे इकट्ठे होकर आपसमें इस प्रकार कहने लगे—॥ १॥ ‘इस बालकके ये कर्म बड़े अलौकिक हैं। इसका हमारे-जैसे गँवार ग्रामीणोंमें जन्म लेना तो इसके लिये बड़ी निन्दाकी बात है। यह भला, कैसे उचित हो सकता है॥ २॥ जैसे गजराज कोई कमल उखाड़कर उसे ऊपर उठा ले और धारण करे, वैसे ही इस नन्हें-से सात वर्षके बालकने एक ही हाथसे गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़ लिया और खेल-खेलमें सात दिनोंतक उठाये रखा॥ ३॥ यह साधारण मनुष्यके लिये भला कैसे सम्भव है? जब यह नन्हा-सा बच्चा था, उस समय बड़ी भयंकर राक्षसी पूतना आयी और इसने आँख बंद किये-किये ही उसका स्तन तो पिया ही, प्राण भी पी डाले— ठीक वैसे ही, जैसे काल शरीरकी आयुको निगल जाता है॥ ४॥ जिस समय यह केवल तीन महीनेका था और छकड़ेके नीचे सोकर रो रहा था, उस समय रोते-रोते इसने ऐसा पाँव उछाला कि उसकी ठोकरसे वह बड़ा भारी छकड़ा उलटकर गिर ही पड़ा॥ ५॥ उस समय तो यह एक ही वर्षका था, जब दैत्य बवंडरके रूपमें इसे बैठे-बैठे आकाशमें उड़ा ले गया था। तुम सब जानते ही हो कि इसने उस तृणावर्त दैत्यको गला घोंटकर मार डाला॥ ६॥ उस दिनकी बात तो सभी जानते हैं कि माखनचोरी करनेपर यशोदारानीने इसे ऊखलसे बाँध दिया था। यह घुटनोंके बल बकैयाँ खींचते-खींचते उन दोनों विशाल अर्जुन वृक्षोंके बीचमेंसे निकल गया और उन्हें उखाड़ ही डाला॥ ७॥ जब यह ग्वालबाल और बलरामजीके साथ बछड़ोंको चरानेके लिये वनमें गया हुआ था उस समय इसको मार डालनेके लिये एक दैत्य बगुलेके रूपमें आया और इसने दोनों हाथोंसे उसके दोनों ठोर पकड़कर उसे तिनकेकी तरह चीर डाला॥ ८॥ जिस समय इसको मार डालनेकी इच्छासे एक दैत्य बछड़ेके रूपमें बछड़ोंके झुंडमें घुस गया था उस समय इसने उस दैत्यको खेल-ही-खेलमें मार डाला और उसे कैथके पेड़ोंपर पटककर उन पेड़ोंको भी गिरा दिया॥ ९॥ इसने बलरामजीके साथ मिलकर गधेके रूपमें रहनेवाले धेनुकासुर तथा उसके भाई-बन्धुओंको मार डाला और पके हुए फलोंसे पूर्ण तालवनको सबके लिये उपयोगी और मंगलमय बना दिया॥ १०॥ इसीने बलशाली बलरामजीके द्वारा क्रूर प्रलम्बासुरको मरवा डाला तथा दावानलसे गौओं और ग्वालबालोंको उबार लिया॥ ११॥ यमुनाजलमें रहनेवाला कालियनाग कितना विषैला था? परन्तु इसने उसका भी मान मर्दन कर उसे बलपूर्वक दहसे निकाल दिया और यमुनाजीका जल सदाके लिये विषरहित—अमृतमय बना दिया॥ १२॥ नन्दजी! हम यह भी देखते हैं कि तुम्हारे इस साँवले बालकपर हम सभी व्रजवासियोंका अनन्त प्रेम है और इसका भी हमपर स्वाभाविक ही स्नेह है। क्या आप बतला सकते हैं कि इसका क्या कारण है॥ १३॥ भला, कहाँ तो यह सात वर्षका नन्हा-सा बालक और कहाँ इतने बड़े गिरिराजको सात दिनोंतक उठाये रखना! व्रजराज! इसीसे तो तुम्हारे पुत्रके सम्बन्धमें हमें बड़ी शंका हो रही है॥ १४॥"},{"b":30214,"kind":"topic_heading","page":299,"text":"नन्द उवाच"},{"b":30215,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.15"],"text":"श्रूयतां मे वचो गोपा व्येतु शंका च वोऽर्भके।"},{"b":30216,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.15"],"text":"एनं कुमारमुद्दिश्य गर्गो मे यदुवाच ह॥ १५"},{"b":30217,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.16"],"text":"वर्णास्त्रयः किलास्यासन् गृह्णतोऽनुयुगं तनूः।"},{"b":30218,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.16"],"text":"शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥ १६"},{"b":30219,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.17"],"text":"प्रागयं वसुदेवस्य क्वचिज्जातस्तवात्मजः।"},{"b":30220,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.17"],"text":"वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञाः सम्प्रचक्षते॥ १७"},{"b":30221,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.18"],"text":"बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते।"},{"b":30222,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.18"],"text":"गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः॥ १८"},{"b":30223,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.19"],"text":"एष वः श्रेय आधास्यद् गोपगोकुलनन्दनः।"},{"b":30224,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.19"],"text":"अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमञ्जस्तरिष्यथ॥ १९"},{"b":30225,"kind":"hindi_commentary","page":299,"explains":["10.26.15","10.26.16","10.26.17","10.26.18","10.26.19"],"text":"नन्दबाबाने कहा—गोपो! तुमलोग सावधान होकर मेरी बात सुनो। मेरे बालकके विषयमें तुम्हारी शंका दूर हो जाय। क्योंकि महर्षि गर्गने इस बालकको देखकर इसके विषयमें ऐसा ही कहा था॥ १५॥ ‘तुम्हारा यह बालक प्रत्येक युगमें शरीर ग्रहण करता है। विभिन्‍न युगोंमें इसने श्‍वेत, रक्त और पीत—ये भिन्‍न-भिन्‍न रंग स्वीकार किये थे। इस बार यह कृष्णवर्ण हुआ है॥ १६॥ नन्दजी! यह तुम्हारा पुत्र पहले कहीं वसुदेवके घर भी पैदा हुआ था, इसलिये इस रहस्यको जाननेवाले लोग ‘इसका नाम श्रीमान् वासुदेव है’—ऐसा कहते हैं॥ १७॥ तुम्हारे पुत्रके गुण और कर्मोंके अनुरूप और भी बहुत-से नाम हैं तथा बहुत-से रूप। मैं तो उन नामोंको जानता हूँ, परन्तु संसारके साधारण लोग नहीं जानते॥ १८॥ यह तुमलोगोंका परम कल्याण करेगा, समस्त गोप और गौओंको यह बहुत ही आनन्दित करेगा। इसकी सहायतासे तुमलोग बड़ी-बड़ी विपत्तियोंको बड़ी सुगमतासे पार कर लोगे॥ १९॥"},{"b":30226,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.20"],"text":"पुरानेन व्रजपते साधवो दस्युपीडिताः।"},{"b":30227,"kind":"sanskrit_shloka","page":299,"verses":["10.26.20"],"text":"अराजके रक्ष्यमाणा जिग्युर्दस्यून् समेधिताः॥ २०"},{"b":30228,"kind":"hindi_translation","page":299,"explains":["10.26.20"],"text":"‘व्रजराज! पूर्वकालमें एक बार पृथ्वीमें कोई राजा नहीं रह गया था। डाकुओंने चारों ओर लूट-खसोट मचा रखी थी। तब तुम्हारे इसी पुत्रने सज्जन पुरुषोंकी रक्षा की और इससे बल पाकर उन लोगोंने लुटेरोंपर विजय प्राप्त की॥ २०॥"},{"b":30229,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.21"],"text":"य एतस्मिन् महाभागाः प्रीतिं कुर्वन्ति मानवाः।"},{"b":30230,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.21"],"text":"नारयोऽभिभवन्त्येतान् विष्णुपक्षानिवासुराः॥ २१"},{"b":30231,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.22"],"text":"तस्मान्‍नन्द कुमारोऽयं नारायणसमो गुणैः।"},{"b":30232,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.22"],"text":"श्रिया कीर्त्यानुभावेन तत्कर्मसु न विस्मयः॥ २२"},{"b":30233,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.23"],"text":"इत्यद्धा मां समादिश्य गर्गे च स्वगृहं गते।"},{"b":30234,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.23"],"text":"मन्ये नारायणस्यांशं कृष्णमक्लिष्टकारिणम्॥ २३"},{"b":30235,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.24"],"text":"इति नन्दवचः श्रुत्वा गर्गगीतं व्रजौकसः।"},{"b":30236,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.24"],"text":"दृष्टश्रुतानुभावास्ते कृष्णस्यामिततेजसः।"},{"b":30237,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.24"],"text":"मुदिता नन्दमानर्चुः कृष्णं च गतविस्मयाः॥ २४"},{"b":30238,"kind":"hindi_translation","page":300,"explains":["10.26.21","10.26.22","10.26.23","10.26.24"],"text":"नन्दबाबा! जो तुम्हारे इस साँवले शिशुसे प्रेम करते हैं, वे बड़े भाग्यवान् हैं। जैसे विष्णुभगवान्‌के करकमलोंकी छत्रछायामें रहनेवाले देवताओंको असुर नहीं जीत सकते, वैसे ही इससे प्रेम करनेवालोंको भीतरी या बाहरी—किसी भी प्रकारके शत्रु नहीं जीत सकते॥ २१॥ नन्दजी! चाहे जिस दृष्टिसे देखें—गुणसे, ऐश्‍वर्य और सौन्दर्यसे, कीर्ति और प्रभावसे तुम्हारा बालक स्वयं भगवान् नारायणके ही समान है, अतः इस बालकके अलौकिक कार्योंको देखकर आश्‍चर्य न करना चाहिये’॥ २२॥ गोपो! मुझे स्वयं गर्गाचार्यजी यह आदेश देकर अपने घर चले गये। तबसे मैं अलौकिक और परम सुखद कर्म करनेवाले इस बालकको भगवान् नारायणका ही अंश मानता हूँ॥ २३॥ जब व्रजवासियोंने नन्दबाबाके मुखसे गर्गजीकी यह बात सुनी, तब उनका विस्मय जाता रहा। क्योंकि अब वे अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके प्रभावको पूर्णरूपसे देख और सुन चुके थे। आनन्दमें भरकर उन्होंने नन्दबाबा और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ २४॥"},{"b":30239,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.25"],"text":"देवे वर्षति यज्ञविप्लवरुषा वज्राश्मपर्षानिलैः"},{"b":30240,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.25"],"text":"सीदत्पालपशुस्त्रि आत्मशरणं दृष्ट्वानुकम्प्युत्स्मयन् ।"},{"b":30241,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.25"],"text":"उत्पाट्यैककरेण शैलमबलो लीलोच्छिलीन्ध्रं यथा"},{"b":30242,"kind":"sanskrit_shloka","page":300,"verses":["10.26.25"],"text":"बिभ्रद् गोष्ठमपान्महेन्द्रमदभित् प्रीयान्‍न इन्द्रो गवाम्॥ २५"},{"b":30243,"kind":"hindi_translation","page":300,"explains":["10.26.25"],"text":"जिस समय अपना यज्ञ भंग हो जानेके कारण इन्द्र क्रोधके मारे आग-बबूला हो गये थे और मूसलधार वर्षा करने लगे थे, उस समय वज्रपात, ओलोंकी बौछार और प्रचण्ड आँधीसे स्त्री, पशु तथा ग्वाले अत्यन्त पीड़ित हो गये थे। अपनी शरणमें रहनेवाले व्रजवासियोंकी यह दशा देखकर भगवान्‌का हृदय करुणासे भर आया। परन्तु फिर एक नयी लीला करनेके विचारसे वे तुरंत ही मुसकराने लगे। जैसे कोई नन्हा-सा निर्बल बालक खेल-खेलमें ही बरसाती छत्तेका पुष्प उखाड़ ले, वैसे ही उन्होंने एक हाथसे ही गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़कर धारण कर लिया और सारे व्रजकी रक्षा की। इन्द्रका मद चूर करनेवाले वे ही भगवान् गोविन्द हमपर प्रसन्‍न हों॥ २५॥"},{"b":30244,"kind":"hindi_translation","page":300,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":2,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}