{"id":"1.16","title":"प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16","part":"प्रथम स्कन्ध","heading":"अथ षोडशोऽध्यायः","topics":["परीक्षित‍्की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वीका संवाद"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 1.16.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[157,162]},"verses":[{"id":"1.16.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/1/","page":157,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["ततः परीक्षिद् द्विजवर्यशिक्षया","महीं महाभागवतः शशास ह।","यथा हि सूत्यामभिजातकोविदाः","समादिशन् विप्र महद‍्गुणस्तथा॥ १"],"iast":["tataḥ parīkṣid dvijavaryaśikṣayā","mahīṃ mahābhāgavataḥ śaśāsa ha|","yathā hi sūtyāmabhijātakovidāḥ","samādiśan vipra mahadguṇastathā|| 1"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! पाण्डवोंके महाप्रयाणके पश्चात् भगवान्‌के परम भक्त राजा परीक्षित् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी शिक्षाके अनुसार पृथ्वीका शासन करने लगे। उनके जन्मके समय ज्योतिषियोंने उनके सम्बन्धमें जो कुछ कहा था, वास्तवमें वे सभी महान् गुण उनमें विद्यमान थे॥ १॥"},{"id":"1.16.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/2/","page":158,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["स उत्तरस्य तनयामुपयेम इरावतीम्।","जनमेजयादींश्‍चतुरस्तस्यामुत्पादयत् सुतान्॥ २"],"iast":["sa uttarasya tanayāmupayema irāvatīm|","janamejayādīṃścaturastasyāmutpādayat sutān|| 2"],"meaning":"उन्होंने उत्तरकी पुत्री इरावतीसे विवाह किया। उससे उन्होंने जनमेजय आदि चार पुत्र उत्पन्‍न किये॥ २॥"},{"id":"1.16.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/3/","page":158,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["आजहाराश्‍वमेधांस्त्रीन् गङ्गायां भूरिदक्षिणान्।","शारद्वतं गुरुं कृत्वा देवा यत्राक्षिगोचराः॥ ३"],"iast":["ājahārāśvamedhāṃstrīn gaṅgāyāṃ bhūridakṣiṇān|","śāradvataṃ guruṃ kṛtvā devā yatrākṣigocarāḥ|| 3"],"meaning":"तथा कृपाचार्यको आचार्य बनाकर उन्होंने गंगाके तटपर तीन अश्‍वमेधयज्ञ किये, जिनमें ब्राह्मणोंको पुष्कल दक्षिणा दी गयी। उन यज्ञोंमें देवताओंने प्रत्यक्षरूपमें प्रकट होकर अपना भाग ग्रहण किया था॥ ३॥"},{"id":"1.16.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/4/","page":158,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["निजग्राहौजसा वीरः कलिं दिग्विजये क्‍वचित्।","नृपलिङ्गधरं शूद्रं घ्नन्तं गोमिथुनं पदा॥ ४"],"iast":["nijagrāhaujasā vīraḥ kaliṃ digvijaye kvacit|","nṛpaliṅgadharaṃ śūdraṃ ghnantaṃ gomithunaṃ padā|| 4"],"meaning":"एक बार दिग्विजय करते समय उन्होंने देखा कि शूद्रके रूपमें कलियुग राजाका वेष धारण करके एक गाय और बैलके जोड़ेको ठोकरोंसे मार रहा है। तब उन्होंने उसे बलपूर्वक पकड़कर दण्ड दिया॥ ४॥"},{"id":"1.16.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/5/","page":158,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः।","नृदेवचिह्नधृक् शूद्रकोऽसौ गां यः पदाहनत्।","तत्कथ्यतां महाभाग यदि कृष्णकथाश्रयम्॥ ५"],"iast":["kasya hetornijagrāha kaliṃ digvijaye nṛpaḥ|","nṛdevacihnadhṛk śūdrako'sau gāṃ yaḥ padāhanat|","tatkathyatāṃ mahābhāga yadi kṛṣṇakathāśrayam|| 5"],"meaning":"शौनकजीने पूछा—महाभाग्यवान् सूतजी! दिग्विजयके समय महाराज परीक्षित‍्ने कलियुगको दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया—मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि राजाका वेष धारण करनेपर भी था तो वह अधम शूद्र ही, जिसने गायको लातसे मारा था? यदि यह प्रसंग भगवान् श्रीकृष्णकी लीलासे अथवा उनके चरणकमलोंके मकरन्द-रसका पान करनेवाले रसिक महानुभावोंसे सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिये। दूसरी व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ। उनमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है॥ ५-६॥","meaning_covers":[5,6]},{"id":"1.16.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/6/","page":158,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["अथवास्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम्।","किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद‍्व्ययः॥ ६"],"iast":["athavāsya padāmbhojamakarandalihāṃ satām|","kimanyairasadālāpairāyuṣo yadasadvyayaḥ|| 6"],"meaning":"शौनकजीने पूछा—महाभाग्यवान् सूतजी! दिग्विजयके समय महाराज परीक्षित‍्ने कलियुगको दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया—मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि राजाका वेष धारण करनेपर भी था तो वह अधम शूद्र ही, जिसने गायको लातसे मारा था? यदि यह प्रसंग भगवान् श्रीकृष्णकी लीलासे अथवा उनके चरणकमलोंके मकरन्द-रसका पान करनेवाले रसिक महानुभावोंसे सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिये। दूसरी व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ। उनमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है॥ ५-६॥","meaning_covers":[5,6]},{"id":"1.16.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/7/","page":158,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानामृतमिच्छताम्।","इहोपहूतो भगवान् मृत्युः शामित्रकर्मणि॥ ७"],"iast":["kṣudrāyuṣāṃ nṛṇāmaṅga martyānāmṛtamicchatām|","ihopahūto bhagavān mṛtyuḥ śāmitrakarmaṇi|| 7"],"meaning":"प्यारे सूतजी! जो लोग चाहते तो हैं मोक्ष परन्तु अल्पायु होनेके कारण मृत्युसे ग्रस्त हो रहे हैं, उनके कल्याणके लिये भगवान् यमका आवाहन करके उन्हें यहाँ शामित्रकर्ममें नियुक्त कर दिया गया है॥ ७॥"},{"id":"1.16.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/8/","page":158,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["न कश्चिन्म्रियते तावद् यावदास्त इहान्तकः।","एतदर्थं हि भगवानाहूतः परमर्षिभिः।","अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः॥ ८"],"iast":["na kaścinmriyate tāvad yāvadāsta ihāntakaḥ|","etadarthaṃ hi bhagavānāhūtaḥ paramarṣibhiḥ|","aho nṛloke pīyeta harilīlāmṛtaṃ vacaḥ|| 8"],"meaning":"जबतक यमराज यहाँ इस कर्ममें नियुक्त हैं, तबतक किसीकी मृत्यु नहीं होगी। मृत्युसे ग्रस्त मनुष्यलोकके जीव भी भगवान्‌की सुधातुल्य लीला-कथाका पान कर सकें, इसीलिये महर्षियोंने भगवान् यमको यहाँ बुलाया है॥ ८॥"},{"id":"1.16.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/9/","page":158,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["मन्दस्य मन्दप्रज्ञस्य वयो मन्दायुषश्‍च वै।","निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः॥ ९"],"iast":["mandasya mandaprajñasya vayo mandāyuṣaśca vai|","nidrayā hriyate naktaṃ divā ca vyarthakarmabhiḥ|| 9"],"meaning":"एक तो थोड़ी आयु और दूसरे कम समझ। ऐसी अवस्थामें संसारके मन्दभाग्य विषयी पुरुषोंकी आयु व्यर्थ ही बीती जा रही है—नींदमें रात और व्यर्थके कामोंमें दिन॥ ९॥"},{"id":"1.16.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/10/","page":159,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["यदा परीक्षित् कुरुजाङ्गलेऽवसन्","कलिं प्रविष्टं निजचक्रवर्तिते।","निशम्य वार्तामनतिप्रियां ततः","शरासनं संयुगशौण्डिराददे॥ १०"],"iast":["yadā parīkṣit kurujāṅgale'vasan","kaliṃ praviṣṭaṃ nijacakravartite|","niśamya vārtāmanatipriyāṃ tataḥ","śarāsanaṃ saṃyugaśauṇḍirādade|| 10"],"meaning":"सूतजीने कहा—जिस समय राजा परीक्षित् कुरुजांगल देशमें सम्राट्के रूपमें निवास कर रहे थे, उस समय उन्होंने सुना कि मेरी सेनाद्वारा सुरक्षित साम्राज्यमें कलियुगका प्रवेश हो गया है। इस समाचारसे उन्हें दुःख तो अवश्य हुआ; परन्तु यह सोचकर कि युद्ध करनेका अवसर हाथ लगा, वे उतने दुःखी नहीं हुए। इसके बाद युद्धवीर परीक्षित‍्ने धनुष हाथमें ले लिया॥ १०॥"},{"id":"1.16.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/11/","page":159,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["स्वलङ्कृतं श्यामतुरङ्गयोजितं","रथं मृगेन्द्रध्वजमाश्रितः पुरात्।","वृतो रथाश्‍वद्विपपत्तियुक्तया","स्वसेनया दिग्विजयाय निर्गतः॥ ११"],"iast":["svalaṅkṛtaṃ śyāmaturaṅgayojitaṃ","rathaṃ mṛgendradhvajamāśritaḥ purāt|","vṛto rathāśvadvipapattiyuktayā","svasenayā digvijayāya nirgataḥ|| 11"],"meaning":"वे श्यामवर्णके घोड़ोंसे जुते हुए, सिंहकी ध्वजावाले, सुसज्जित रथपर सवार होकर दिग्विजय करनेके लिये नगरसे बाहर निकल पड़े। उस समय रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेना उनके साथ-साथ चल रही थी॥ ११॥"},{"id":"1.16.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/12/","page":159,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["भद्राश्‍वं केतुमालं च भारतं चोत्तरान् कुरून्।","किम्पुरुषादीनि वर्षाणि विजित्य जगृहे बलिम्॥ १२"],"iast":["bhadrāśvaṃ ketumālaṃ ca bhārataṃ cottarān kurūn|","kimpuruṣādīni varṣāṇi vijitya jagṛhe balim|| 12"],"meaning":"उन्होंने भद्राश्‍व, केतुमाल, भारत, उत्तरकुरु और किम्पुरुष आदि सभी वर्षोंको जीतकर वहाँके राजाओंसे भेंट ली॥ १२॥"},{"id":"1.16.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/13/","page":159,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तत्र तत्रोपशृण्वानः स्वपूर्वेषां महात्मनाम्।","प्रगीयमाणं च यशः कृष्णमाहात्म्यसूचकम्॥ १३"],"iast":["tatra tatropaśṛṇvānaḥ svapūrveṣāṃ mahātmanām|","pragīyamāṇaṃ ca yaśaḥ kṛṣṇamāhātmyasūcakam|| 13"],"meaning":"उन्हें उन देशोंमें सर्वत्र अपने पूर्वज महात्माओंका सुयश सुननेको मिला। उस यशोगानसे पद-पदपर भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा प्रकट होती थी॥ १३॥"},{"id":"1.16.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/14/","page":159,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["आत्मानं च परित्रातमश्‍वत्थाम्नोऽस्त्रतेजसः।","स्नेहं च वृष्णिपार्थानां तेषां भक्तिं च केशवे॥ १४"],"iast":["ātmānaṃ ca paritrātamaśvatthāmno'stratejasaḥ|","snehaṃ ca vṛṣṇipārthānāṃ teṣāṃ bhaktiṃ ca keśave|| 14"],"meaning":"इसके साथ ही उन्हें यह भी सुननेको मिलता था कि भगवान् श्रीकृष्णने अश्‍वत्थामाके ब्रह्मास्त्रकी ज्वालासे किस प्रकार उनकी रक्षा की थी, यदुवंशी और पाण्डवोंमें परस्पर कितना प्रेम था तथा पाण्डवोंकी भगवान् श्रीकृष्णमें कितनी भक्ति थी॥ १४॥"},{"id":"1.16.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/15/","page":159,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तेभ्यः परमसंतुष्टः प्रीत्युज्जृम्भितलोचनः।","महाधनानि वासांसि ददौ हारान् महामनाः॥ १५"],"iast":["tebhyaḥ paramasaṃtuṣṭaḥ prītyujjṛmbhitalocanaḥ|","mahādhanāni vāsāṃsi dadau hārān mahāmanāḥ|| 15"],"meaning":"जो लोग उन्हें ये चरित्र सुनाते, उनपर महामना राजा परीक्षित् बहुत प्रसन्‍न होते; उनके नेत्र प्रेमसे खिल उठते। वे बड़ी उदारतासे उन्हें बहुमूल्य वस्त्र और मणियोंके हार उपहाररूपमें देते॥ १५॥"},{"id":"1.16.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/16/","page":159,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["सारथ्यपारषदसेवनसख्यदौत्य-","वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामान् ।","स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतिं च विष्णो-","र्भक्तिं करोति नृपतिश्‍चरणारविन्दे॥ १६"],"iast":["sārathyapāraṣadasevanasakhyadautya-","vīrāsanānugamanastavanapraṇāmān |","snigdheṣu pāṇḍuṣu jagatpraṇatiṃ ca viṣṇo-","rbhaktiṃ karoti nṛpatiścaraṇāravinde|| 16"],"meaning":"वे सुनते कि भगवान् श्रीकृष्णने प्रेमपरवश होकर पाण्डवोंके सारथिका काम किया, उनके सभासद् बने—यहाँतक कि उनके मनके अनुसार काम करके उनकी सेवा भी की। उनके सखा तो थे ही, दूत भी बने। वे रातको शस्त्र ग्रहण करके वीरासनसे बैठ जाते और शिविरका पहरा देते, उनके पीछे-पीछे चलते, स्तुति करते तथा प्रणाम करते; इतना ही नहीं, अपने प्रेमी पाण्डवोंके चरणोंमें उन्होंने सारे जगतको झुका दिया। तब परीक्षित‍्की भक्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें और भी बढ़ जाती॥ १६॥"},{"id":"1.16.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/17/","page":160,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तस्यैवं वर्तमानस्य पूर्वेषां वृत्तिमन्वहम्।","नातिदूरे किलाश्‍चर्यं यदासीत् तन्‍निबोध मे॥ १७"],"iast":["tasyaivaṃ vartamānasya pūrveṣāṃ vṛttimanvaham|","nātidūre kilāścaryaṃ yadāsīt tannibodha me|| 17"],"meaning":"इस प्रकार वे दिन-दिन पाण्डवोंके आचरणका अनुसरण करते हुए दिग्विजय कर रहे थे। उन्हीं दिनों उनके शिविरसे थोड़ी ही दूरपर एक आश्‍चर्यजनक घटना घटी। वह मैं आपको सुनाता हूँ॥ १७॥"},{"id":"1.16.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/18/","page":160,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["धर्मः पदैकेन चरन् विच्छायामुपलभ्य गाम्।","पृच्छति स्माश्रुवदनां विवत्सामिव मातरम्॥ १८"],"iast":["dharmaḥ padaikena caran vicchāyāmupalabhya gām|","pṛcchati smāśruvadanāṃ vivatsāmiva mātaram|| 18"],"meaning":"धर्म बैलका रूप धारण करके एक पैरसे घूम रहा था। एक स्थानपर उसे गायके रूपमें पृथ्वी मिली। पुत्रकी मृत्युसे दुःखिनी माताके समान उसके नेत्रोंसे आँसुओंके झरने झर रहे थे। उसका शरीर श्रीहीन हो गया था। धर्म पृथ्वीसे पूछने लगा॥ १८॥"},{"id":"1.16.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/19/","page":160,"speaker":"धर्म उवाच","sanskrit":["कच्चिद्भद्रेऽनामयमात्मनस्ते","विच्छायासि म्लायतेषन्मुखेन।","आलक्षये भवतीमन्तराधिं","दूरे बन्धुं शोचसि कञ्चनाम्ब॥ १९"],"iast":["kaccidbhadre'nāmayamātmanaste","vicchāyāsi mlāyateṣanmukhena|","ālakṣaye bhavatīmantarādhiṃ","dūre bandhuṃ śocasi kañcanāmba|| 19"],"meaning":"धर्मने कहा—कल्याणि! कुशलसे तो हो न? तुम्हारा मुख कुछ-कुछ मलिन हो रहा है। तुम श्रीहीन हो रही हो, मालूम होता है तुम्हारे हृदयमें कुछ-न-कुछ दुःख अवश्य है। क्या तुम्हारा कोई सम्बन्धी दूर देशमें चला गया है, जिसके लिये तुम इतनी चिन्ता कर रही हो?॥ १९॥"},{"id":"1.16.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/20/","page":160,"speaker":"धर्म उवाच","sanskrit":["पादैर्न्यूनं शोचसि मैकपाद-","मात्मानं वा वृषलैर्भोक्ष्यमाणम्।","आहो सुरादीन् हृतयज्ञभागान्","प्रजा उत स्विन्मघवत्यवर्षति॥ २०"],"iast":["pādairnyūnaṃ śocasi maikapāda-","mātmānaṃ vā vṛṣalairbhokṣyamāṇam|","āho surādīn hṛtayajñabhāgān","prajā uta svinmaghavatyavarṣati|| 20"],"meaning":"कहीं तुम मेरी तो चिन्ता नहीं कर रही हो कि अब इसके तीन पैर टूट गये, एक ही पैर रह गया है? सम्भव है, तुम अपने लिये शोक कर रही हो कि अब शूद्र तुम्हारे ऊपर शासन करेंगे। तुम्हें इन देवताओंके लिये भी खेद हो सकता है, जिन्हें अब यज्ञोंमें आहुति नहीं दी जाती, अथवा उस प्रजाके लिये भी, जो वर्षा न होनेके कारण अकाल एवं दुर्भिक्षसे पीड़ित हो रही है॥ २०॥"},{"id":"1.16.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/21/","page":160,"speaker":"धर्म उवाच","sanskrit":["अरक्ष्यमाणाः स्त्रिय उर्वि बालान्","शोचस्यथो पुरुषादैरिवार्तान्।","वाचं देवीं ब्रह्मकुले कुकर्म-","ण्यब्रह्मण्ये राजकुले कुलाग्र्यान्॥ २१"],"iast":["arakṣyamāṇāḥ striya urvi bālān","śocasyatho puruṣādairivārtān|","vācaṃ devīṃ brahmakule kukarma-","ṇyabrahmaṇye rājakule kulāgryān|| 21"],"meaning":"देवि! क्या तुम राक्षस-सरीखे मनुष्योंके द्वारा सतायी हुई अरक्षित स्त्रियों एवं आर्तबालकोंके लिये शोक कर रही हो? सम्भव है, विद्या अब कुकर्मी-ब्राह्मणोंके चंगुलमें पड़ गयी है और ब्राह्मण विप्रद्रोही राजाओंकी सेवा करने लगे हैं, और इसीका तुम्हें दुःख हो॥ २१॥"},{"id":"1.16.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/22/","page":160,"speaker":"धर्म उवाच","sanskrit":["किं क्षत्रबन्धून् कलिनोपसृष्टान्","राष्ट्राणि वा तैरवरोपितानि।","इतस्ततो वाशनपानवासः-","स्नानव्यवायोन्मुखजीवलोकम्॥ २२"],"iast":["kiṃ kṣatrabandhūn kalinopasṛṣṭān","rāṣṭrāṇi vā tairavaropitāni|","itastato vāśanapānavāsaḥ-","snānavyavāyonmukhajīvalokam|| 22"],"meaning":"आजके नाममात्रके राजा तो सोलहों आने कलियुगी हो गये हैं, उन्होंने बड़े-बड़े देशोंको भी उजाड़ डाला है। क्या तुम उन राजाओं या देशोंके लिये शोक कर रही हो? आजकी जनता खान-पान, वस्त्र, स्नान और स्त्री-सहवास आदिमें शास्त्रीय नियमोंका पालन न करके स्वेच्छाचार कर रही है; क्या इसके लिये तुम दुःखी हो?॥ २२॥"},{"id":"1.16.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/23/","page":161,"speaker":"धर्म उवाच","sanskrit":["यद्वाम्ब ते भूरिभरावतार-","कृतावतारस्य हरेर्धरित्रि।","अन्तर्हितस्य स्मरती विसृष्टा","कर्माणि निर्वाणविलम्बितानि॥ २३"],"iast":["yadvāmba te bhūribharāvatāra-","kṛtāvatārasya harerdharitri|","antarhitasya smaratī visṛṣṭā","karmāṇi nirvāṇavilambitāni|| 23"],"meaning":"मा पृथ्वी! अब समझमें आया, हो-न-हो तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णकी याद आ रही होगी; क्योंकि उन्होंने तुम्हारा भार उतारनेके लिये ही अवतार लिया था और ऐसी लीलाएँ की थीं, जो मोक्षका भी अवलम्बन हैं। अब उनके लीला-संवरण कर लेनेपर उनके परित्यागसे तुम दुःखी हो रही हो॥ २३॥"},{"id":"1.16.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/24/","page":161,"speaker":"धर्म उवाच","sanskrit":["इदं ममाचक्ष्व तवाधिमूलं","वसुन्धरे येन विकर्शितासि।","कालेन वा ते बलिनां बलीयसा","सुरार्चितं किं हृतमम्ब सौभगम्॥ २४"],"iast":["idaṃ mamācakṣva tavādhimūlaṃ","vasundhare yena vikarśitāsi|","kālena vā te balināṃ balīyasā","surārcitaṃ kiṃ hṛtamamba saubhagam|| 24"],"meaning":"देवि! तुम तो धन-रत्नोंकी खान हो। तुम अपने क्लेशका कारण, जिससे तुम इतनी दुर्बल हो गयी हो, मुझे बतलाओ। मालूम होता है, बड़े-बड़े बलवानोंको भी हरा देनेवाले कालने देवताओंके द्वारा वन्दनीय तुम्हारे सौभाग्यको छीन लिया है॥ २४॥"},{"id":"1.16.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/25/","page":161,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["भवान् हि वेद तत्सर्वं यन्मां धर्मानुपृच्छसि।","चतुर्भिर्वर्तसे येन पादैर्लोकसुखावहैः॥ २५"],"iast":["bhavān hi veda tatsarvaṃ yanmāṃ dharmānupṛcchasi|","caturbhirvartase yena pādairlokasukhāvahaiḥ|| 25"],"meaning":"पृथ्वीने कहा—धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो। जिन भगवान्‌के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय (शरणागतवत्सलता आदि) और भी बहुत-से महान् गुण उनकी सेवा करनेके लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते—उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है॥ २५—३०॥","meaning_covers":[25,30]},{"id":"1.16.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/26/","page":161,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः सन्तोष आर्जवम्।","शमो दमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम्॥ २६"],"iast":["satyaṃ śaucaṃ dayā kṣāntistyāgaḥ santoṣa ārjavam|","śamo damastapaḥ sāmyaṃ titikṣoparatiḥ śrutam|| 26"],"meaning":"पृथ्वीने कहा—धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो। जिन भगवान्‌के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय (शरणागतवत्सलता आदि) और भी बहुत-से महान् गुण उनकी सेवा करनेके लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते—उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है॥ २५—३०॥","meaning_covers":[25,30]},{"id":"1.16.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/27/","page":161,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["ज्ञानं विरक्तिरैश्‍वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः।","स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च॥ २७"],"iast":["jñānaṃ viraktiraiśvaryaṃ śauryaṃ tejo balaṃ smṛtiḥ|","svātantryaṃ kauśalaṃ kāntirdhairyaṃ mārdavameva ca|| 27"],"meaning":"पृथ्वीने कहा—धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो। जिन भगवान्‌के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय (शरणागतवत्सलता आदि) और भी बहुत-से महान् गुण उनकी सेवा करनेके लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते—उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है॥ २५—३०॥","meaning_covers":[25,30]},{"id":"1.16.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/28/","page":161,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः।","गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः॥ २८"],"iast":["prāgalbhyaṃ praśrayaḥ śīlaṃ saha ojo balaṃ bhagaḥ|","gāmbhīryaṃ sthairyamāstikyaṃ kīrtirmāno'nahaṅkṛtiḥ|| 28"],"meaning":"पृथ्वीने कहा—धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो। जिन भगवान्‌के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय (शरणागतवत्सलता आदि) और भी बहुत-से महान् गुण उनकी सेवा करनेके लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते—उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है॥ २५—३०॥","meaning_covers":[25,30]},{"id":"1.16.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/29/","page":161,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["एते चान्ये च भगवन्‍नित्या यत्र महागुणाः।","प्रार्थ्या महत्त्वमिच्छद्भिर्न वियन्ति स्म कर्हिचित्॥ २९"],"iast":["ete cānye ca bhagavannityā yatra mahāguṇāḥ|","prārthyā mahattvamicchadbhirna viyanti sma karhicit|| 29"],"meaning":"पृथ्वीने कहा—धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो। जिन भगवान्‌के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय (शरणागतवत्सलता आदि) और भी बहुत-से महान् गुण उनकी सेवा करनेके लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते—उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है॥ २५—३०॥","meaning_covers":[25,30]},{"id":"1.16.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/30/","page":161,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["तेनाहं गुणपात्रेण श्रीनिवासेन साम्प्रतम्।","शोचामि रहितं लोकं पाप्मना कलिनेक्षितम्॥ ३०"],"iast":["tenāhaṃ guṇapātreṇa śrīnivāsena sāmpratam|","śocāmi rahitaṃ lokaṃ pāpmanā kalinekṣitam|| 30"],"meaning":"पृथ्वीने कहा—धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो। जिन भगवान्‌के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय (शरणागतवत्सलता आदि) और भी बहुत-से महान् गुण उनकी सेवा करनेके लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते—उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है॥ २५—३०॥","meaning_covers":[25,30]},{"id":"1.16.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/31/","page":161,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["आत्मानं चानुशोचामि भवन्तं चामरोत्तमम्।","देवान् पितॄनृषीन् साधून् सर्वान् वर्णांस्तथाऽऽश्रमान्॥ ३१"],"iast":["ātmānaṃ cānuśocāmi bhavantaṃ cāmarottamam|","devān pitṝnṛṣīn sādhūn sarvān varṇāṃstathā''śramān|| 31"],"meaning":"अपने लिये, देवताओंमें श्रेष्ठ तुम्हारे लिये, देवता, पितर, ऋषि, साधु और समस्त वर्णों तथा आश्रमोंके मनुष्योंके लिये मैं शोकग्रस्त हो रही हूँ॥ ३१॥"},{"id":"1.16.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/32/","page":162,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्ष-","कामास्तपः समचरन् भगवत्प्रपन्‍नाः।","सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय","यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता॥ ३२"],"iast":["brahmādayo bahutithaṃ yadapāṅgamokṣa-","kāmāstapaḥ samacaran bhagavatprapannāḥ|","sā śrīḥ svavāsamaravindavanaṃ vihāya","yatpādasaubhagamalaṃ bhajate'nuraktā|| 32"],"meaning":"जिनका कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मा आदि देवता भगवान्‌के शरणागत होकर बहुत दिनोंतक तपस्या करते रहे, वही लक्ष्मीजी अपने निवासस्थान कमलवनका परित्याग करके बड़े प्रेमसे जिनके चरणकमलोंकी सुभग छत्रछायाका सेवन करती हैं, उन्हीं भगवान्‌के कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि चिह्नोंसे युक्त श्रीचरणोंसे विभूषित होनेके कारण मुझे महान् वैभव प्राप्त हुआ था और मेरी तीनों लोकोंसे बढ़कर शोभा हुई थी; परन्तु मेरे सौभाग्यका अब अन्त हो गया! भगवान्‌ने मुझ अभागिनीको छोड़ दिया! मालूम होता है मुझे अपने सौभाग्यपर गर्व हो गया था, इसीलिये उन्होंने मुझे यह दण्ड दिया है॥ ३२-३३॥","meaning_covers":[32,33]},{"id":"1.16.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/33/","page":162,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["तस्याहमब्जकुलिशाङ्कुशकेतुकेतैः","श्रीमत्पदैर्भगवतः समलङ्कृताङ्गी।","त्रीनत्यरोच उपलभ्य ततो विभूतिं","लोकान् स मां व्यसृजदुत्स्मयतीं तदन्ते॥ ३३"],"iast":["tasyāhamabjakuliśāṅkuśaketuketaiḥ","śrīmatpadairbhagavataḥ samalaṅkṛtāṅgī|","trīnatyaroca upalabhya tato vibhūtiṃ","lokān sa māṃ vyasṛjadutsmayatīṃ tadante|| 33"],"meaning":"जिनका कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मा आदि देवता भगवान्‌के शरणागत होकर बहुत दिनोंतक तपस्या करते रहे, वही लक्ष्मीजी अपने निवासस्थान कमलवनका परित्याग करके बड़े प्रेमसे जिनके चरणकमलोंकी सुभग छत्रछायाका सेवन करती हैं, उन्हीं भगवान्‌के कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि चिह्नोंसे युक्त श्रीचरणोंसे विभूषित होनेके कारण मुझे महान् वैभव प्राप्त हुआ था और मेरी तीनों लोकोंसे बढ़कर शोभा हुई थी; परन्तु मेरे सौभाग्यका अब अन्त हो गया! भगवान्‌ने मुझ अभागिनीको छोड़ दिया! मालूम होता है मुझे अपने सौभाग्यपर गर्व हो गया था, इसीलिये उन्होंने मुझे यह दण्ड दिया है॥ ३२-३३॥","meaning_covers":[32,33]},{"id":"1.16.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/34/","page":162,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["यो वै ममातिभरमासुरवंशराज्ञा-","मक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्रः।","त्वां दुःस्थमूनपदमात्मनि पौरुषेण","सम्पादयन् यदुषु रम्यमबिभ्रदङ्गम्॥ ३४"],"iast":["yo vai mamātibharamāsuravaṃśarājñā-","makṣauhiṇīśatamapānudadātmatantraḥ|","tvāṃ duḥsthamūnapadamātmani pauruṣeṇa","sampādayan yaduṣu ramyamabibhradaṅgam|| 34"],"meaning":"तुम अपने तीन चरणोंके कम हो जानेसे मन-ही-मन कुढ़ रहे थे; अतः अपने पुरुषार्थसे तुम्हें अपने ही अन्दर पुनः सब अंगोंसे पूर्ण एवं स्वस्थ कर देनेके लिये वे अत्यन्त रमणीय श्यामसुन्दर विग्रहसे यदुवंशमें प्रकट हुए और मेरे बड़े भारी भारको, जो असुरवंशी राजाओंकी सैकड़ों अक्षौहिणियोंके रूपमें था, नष्ट कर डाला। क्योंकि वे परम स्वतन्त्र थे॥ ३४॥"},{"id":"1.16.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/35/","page":162,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["का वा सहेत विरहं पुरुषोत्तमस्य","प्रेमावलोकरुचिरस्मितवल्गुजल्पैः।","स्थैर्यं समानमहरन्मधुमानिनीनां","रोमोत्सवो मम यदङ्‌घ्रि विटङ्कितायाः॥ ३५"],"iast":["kā vā saheta virahaṃ puruṣottamasya","premāvalokarucirasmitavalgujalpaiḥ|","sthairyaṃ samānamaharanmadhumāninīnāṃ","romotsavo mama yadaṅghri viṭaṅkitāyāḥ|| 35"],"meaning":"जिन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवन, मनोहर मुसकान और मीठी-मीठी बातोंसे सत्यभामा आदि मधुमयी मानिनियोंके मानके साथ धीरजको भी छीन लिया था और जिनके चरणकमलोंके स्पर्शसे मैं निरन्तर आनन्दसे पुलकित रहती थी, उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका विरह भला कौन सह सकती है॥ ३५॥"},{"id":"1.16.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/36/","page":162,"speaker":"धरण्युवाच","sanskrit":["तयोरेवं कथयतोः पृथिवीधर्मयोस्तदा।","परीक्षिन्‍नाम राजर्षिः प्राप्तः प्राचीं सरस्वतीम्॥ ३६"],"iast":["tayorevaṃ kathayatoḥ pṛthivīdharmayostadā|","parīkṣinnāma rājarṣiḥ prāptaḥ prācīṃ sarasvatīm|| 36"],"meaning":"धर्म और पृथ्वी इस प्रकार आपसमें बातचीत कर ही रहे थे कि उसी समय राजर्षि परीक्षित् पूर्ववाहिनी सरस्वतीके तटपर आ पहुँचे॥ ३६॥"}],"text":[{"b":3507,"kind":"adhyaya_heading","page":157,"text":"अथ षोडशोऽध्यायः"},{"b":3508,"kind":"topic_heading","page":157,"text":"परीक्षित‍्की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वीका संवाद"},{"b":3509,"kind":"topic_heading","page":157,"text":"सूत उवाच"},{"b":3510,"kind":"sanskrit_shloka","page":157,"verses":["1.16.1"],"text":"ततः परीक्षिद् द्विजवर्यशिक्षया"},{"b":3511,"kind":"sanskrit_shloka","page":157,"verses":["1.16.1"],"text":"महीं महाभागवतः शशास ह।"},{"b":3512,"kind":"sanskrit_shloka","page":157,"verses":["1.16.1"],"text":"यथा हि सूत्यामभिजातकोविदाः"},{"b":3513,"kind":"sanskrit_shloka","page":157,"verses":["1.16.1"],"text":"समादिशन् विप्र महद‍्गुणस्तथा॥ १"},{"b":3514,"kind":"hindi_commentary","page":157,"explains":["1.16.1"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! पाण्डवोंके महाप्रयाणके पश्चात् भगवान्‌के परम भक्त राजा परीक्षित् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी शिक्षाके अनुसार पृथ्वीका शासन करने लगे। उनके जन्मके समय ज्योतिषियोंने उनके सम्बन्धमें जो कुछ कहा था, वास्तवमें वे सभी महान् गुण उनमें विद्यमान थे॥ १॥"},{"b":3515,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.2"],"text":"स उत्तरस्य तनयामुपयेम इरावतीम्।"},{"b":3516,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.2"],"text":"जनमेजयादींश्‍चतुरस्तस्यामुत्पादयत् सुतान्॥ २"},{"b":3517,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.3"],"text":"आजहाराश्‍वमेधांस्त्रीन् गङ्गायां भूरिदक्षिणान्।"},{"b":3518,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.3"],"text":"शारद्वतं गुरुं कृत्वा देवा यत्राक्षिगोचराः॥ ३"},{"b":3519,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.4"],"text":"निजग्राहौजसा वीरः कलिं दिग्विजये क्‍वचित्।"},{"b":3520,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.4"],"text":"नृपलिङ्गधरं शूद्रं घ्नन्तं गोमिथुनं पदा॥ ४"},{"b":3521,"kind":"hindi_commentary","page":158,"explains":["1.16.2","1.16.3","1.16.4"],"text":"उन्होंने उत्तरकी पुत्री इरावतीसे विवाह किया। उससे उन्होंने जनमेजय आदि चार पुत्र उत्पन्‍न किये॥ २॥ तथा कृपाचार्यको आचार्य बनाकर उन्होंने गंगाके तटपर तीन अश्‍वमेधयज्ञ किये, जिनमें ब्राह्मणोंको पुष्कल दक्षिणा दी गयी। उन यज्ञोंमें देवताओंने प्रत्यक्षरूपमें प्रकट होकर अपना भाग ग्रहण किया था॥ ३॥ एक बार दिग्विजय करते समय उन्होंने देखा कि शूद्रके रूपमें कलियुग राजाका वेष धारण करके एक गाय और बैलके जोड़ेको ठोकरोंसे मार रहा है। तब उन्होंने उसे बलपूर्वक पकड़कर दण्ड दिया॥ ४॥"},{"b":3522,"kind":"topic_heading","page":158,"text":"शौनक उवाच"},{"b":3523,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.5"],"text":"कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः।"},{"b":3524,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.5"],"text":"नृदेवचिह्नधृक् शूद्रकोऽसौ गां यः पदाहनत्।"},{"b":3525,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.5"],"text":"तत्कथ्यतां महाभाग यदि कृष्णकथाश्रयम्॥ ५"},{"b":3526,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.6"],"text":"अथवास्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम्।"},{"b":3527,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.6"],"text":"किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद‍्व्ययः॥ ६"},{"b":3528,"kind":"hindi_commentary","page":158,"explains":["1.16.5","1.16.6"],"text":"शौनकजीने पूछा—महाभाग्यवान् सूतजी! दिग्विजयके समय महाराज परीक्षित‍्ने कलियुगको दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया—मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि राजाका वेष धारण करनेपर भी था तो वह अधम शूद्र ही, जिसने गायको लातसे मारा था? यदि यह प्रसंग भगवान् श्रीकृष्णकी लीलासे अथवा उनके चरणकमलोंके मकरन्द-रसका पान करनेवाले रसिक महानुभावोंसे सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिये। दूसरी व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ। उनमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है॥ ५-६॥"},{"b":3529,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.7"],"text":"क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानामृतमिच्छताम्।"},{"b":3530,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.7"],"text":"इहोपहूतो भगवान् मृत्युः शामित्रकर्मणि॥ ७"},{"b":3531,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.8"],"text":"न कश्चिन्म्रियते तावद् यावदास्त इहान्तकः।"},{"b":3532,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.8"],"text":"एतदर्थं हि भगवानाहूतः परमर्षिभिः।"},{"b":3533,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.8"],"text":"अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः॥ ८"},{"b":3534,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.9"],"text":"मन्दस्य मन्दप्रज्ञस्य वयो मन्दायुषश्‍च वै।"},{"b":3535,"kind":"sanskrit_shloka","page":158,"verses":["1.16.9"],"text":"निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः॥ ९"},{"b":3536,"kind":"hindi_commentary","page":158,"explains":["1.16.7","1.16.8","1.16.9"],"text":"प्यारे सूतजी! जो लोग चाहते तो हैं मोक्ष परन्तु अल्पायु होनेके कारण मृत्युसे ग्रस्त हो रहे हैं, उनके कल्याणके लिये भगवान् यमका आवाहन करके उन्हें यहाँ शामित्रकर्ममें नियुक्त कर दिया गया है॥ ७॥ जबतक यमराज यहाँ इस कर्ममें नियुक्त हैं, तबतक किसीकी मृत्यु नहीं होगी। मृत्युसे ग्रस्त मनुष्यलोकके जीव भी भगवान्‌की सुधातुल्य लीला-कथाका पान कर सकें, इसीलिये महर्षियोंने भगवान् यमको यहाँ बुलाया है॥ ८॥ एक तो थोड़ी आयु और दूसरे कम समझ। ऐसी अवस्थामें संसारके मन्दभाग्य विषयी पुरुषोंकी आयु व्यर्थ ही बीती जा रही है—नींदमें रात और व्यर्थके कामोंमें दिन॥ ९॥"},{"b":3537,"kind":"topic_heading","page":157,"text":"सूत उवाच"},{"b":3538,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.10"],"text":"यदा परीक्षित् कुरुजाङ्गलेऽवसन्"},{"b":3539,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.10"],"text":"कलिं प्रविष्टं निजचक्रवर्तिते।"},{"b":3540,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.10"],"text":"निशम्य वार्तामनतिप्रियां ततः"},{"b":3541,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.10"],"text":"शरासनं संयुगशौण्डिराददे॥ १०"},{"b":3542,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.11"],"text":"स्वलङ्कृतं श्यामतुरङ्गयोजितं"},{"b":3543,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.11"],"text":"रथं मृगेन्द्रध्वजमाश्रितः पुरात्।"},{"b":3544,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.11"],"text":"वृतो रथाश्‍वद्विपपत्तियुक्तया"},{"b":3545,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.11"],"text":"स्वसेनया दिग्विजयाय निर्गतः॥ ११"},{"b":3546,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.12"],"text":"भद्राश्‍वं केतुमालं च भारतं चोत्तरान् कुरून्।"},{"b":3547,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.12"],"text":"किम्पुरुषादीनि वर्षाणि विजित्य जगृहे बलिम्॥ १२"},{"b":3548,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.13"],"text":"तत्र तत्रोपशृण्वानः स्वपूर्वेषां महात्मनाम्।"},{"b":3549,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.13"],"text":"प्रगीयमाणं च यशः कृष्णमाहात्म्यसूचकम्॥ १३"},{"b":3550,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.14"],"text":"आत्मानं च परित्रातमश्‍वत्थाम्नोऽस्त्रतेजसः।"},{"b":3551,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.14"],"text":"स्नेहं च वृष्णिपार्थानां तेषां भक्तिं च केशवे॥ १४"},{"b":3552,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.15"],"text":"तेभ्यः परमसंतुष्टः प्रीत्युज्जृम्भितलोचनः।"},{"b":3553,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.15"],"text":"महाधनानि वासांसि ददौ हारान् महामनाः॥ १५"},{"b":3554,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.16"],"text":"सारथ्यपारषदसेवनसख्यदौत्य-"},{"b":3555,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.16"],"text":"वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामान् ।"},{"b":3556,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.16"],"text":"स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतिं च विष्णो-"},{"b":3557,"kind":"sanskrit_shloka","page":159,"verses":["1.16.16"],"text":"र्भक्तिं करोति नृपतिश्‍चरणारविन्दे॥ १६"},{"b":3558,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.17"],"text":"तस्यैवं वर्तमानस्य पूर्वेषां वृत्तिमन्वहम्।"},{"b":3559,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.17"],"text":"नातिदूरे किलाश्‍चर्यं यदासीत् तन्‍निबोध मे॥ १७"},{"b":3560,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.18"],"text":"धर्मः पदैकेन चरन् विच्छायामुपलभ्य गाम्।"},{"b":3561,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.18"],"text":"पृच्छति स्माश्रुवदनां विवत्सामिव मातरम्॥ १८"},{"b":3562,"kind":"hindi_commentary","page":159,"explains":["1.16.10","1.16.11","1.16.12","1.16.13","1.16.14","1.16.15","1.16.16","1.16.17","1.16.18"],"text":"सूतजीने कहा—जिस समय राजा परीक्षित् कुरुजांगल देशमें सम्राट्के रूपमें निवास कर रहे थे, उस समय उन्होंने सुना कि मेरी सेनाद्वारा सुरक्षित साम्राज्यमें कलियुगका प्रवेश हो गया है। इस समाचारसे उन्हें दुःख तो अवश्य हुआ; परन्तु यह सोचकर कि युद्ध करनेका अवसर हाथ लगा, वे उतने दुःखी नहीं हुए। इसके बाद युद्धवीर परीक्षित‍्ने धनुष हाथमें ले लिया॥ १०॥ वे श्यामवर्णके घोड़ोंसे जुते हुए, सिंहकी ध्वजावाले, सुसज्जित रथपर सवार होकर दिग्विजय करनेके लिये नगरसे बाहर निकल पड़े। उस समय रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेना उनके साथ-साथ चल रही थी॥ ११॥ उन्होंने भद्राश्‍व, केतुमाल, भारत, उत्तरकुरु और किम्पुरुष आदि सभी वर्षोंको जीतकर वहाँके राजाओंसे भेंट ली॥ १२॥ उन्हें उन देशोंमें सर्वत्र अपने पूर्वज महात्माओंका सुयश सुननेको मिला। उस यशोगानसे पद-पदपर भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा प्रकट होती थी॥ १३॥ इसके साथ ही उन्हें यह भी सुननेको मिलता था कि भगवान् श्रीकृष्णने अश्‍वत्थामाके ब्रह्मास्त्रकी ज्वालासे किस प्रकार उनकी रक्षा की थी, यदुवंशी और पाण्डवोंमें परस्पर कितना प्रेम था तथा पाण्डवोंकी भगवान् श्रीकृष्णमें कितनी भक्ति थी॥ १४॥ जो लोग उन्हें ये चरित्र सुनाते, उनपर महामना राजा परीक्षित् बहुत प्रसन्‍न होते; उनके नेत्र प्रेमसे खिल उठते। वे बड़ी उदारतासे उन्हें बहुमूल्य वस्त्र और मणियोंके हार उपहाररूपमें देते॥ १५॥ वे सुनते कि भगवान् श्रीकृष्णने प्रेमपरवश होकर पाण्डवोंके सारथिका काम किया, उनके सभासद् बने—यहाँतक कि उनके मनके अनुसार काम करके उनकी सेवा भी की। उनके सखा तो थे ही, दूत भी बने। वे रातको शस्त्र ग्रहण करके वीरासनसे बैठ जाते और शिविरका पहरा देते, उनके पीछे-पीछे चलते, स्तुति करते तथा प्रणाम करते; इतना ही नहीं, अपने प्रेमी पाण्डवोंके चरणोंमें उन्होंने सारे जगतको झुका दिया। तब परीक्षित‍्की भक्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें और भी बढ़ जाती॥ १६॥ इस प्रकार वे दिन-दिन पाण्डवोंके आचरणका अनुसरण करते हुए दिग्विजय कर रहे थे। उन्हीं दिनों उनके शिविरसे थोड़ी ही दूरपर एक आश्‍चर्यजनक घटना घटी। वह मैं आपको सुनाता हूँ॥ १७॥ धर्म बैलका रूप धारण करके एक पैरसे घूम रहा था। एक स्थानपर उसे गायके रूपमें पृथ्वी मिली। पुत्रकी मृत्युसे दुःखिनी माताके समान उसके नेत्रोंसे आँसुओंके झरने झर रहे थे। उसका शरीर श्रीहीन हो गया था। धर्म पृथ्वीसे पूछने लगा॥ १८॥"},{"b":3563,"kind":"topic_heading","page":160,"text":"धर्म उवाच"},{"b":3564,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.19"],"text":"कच्चिद्भद्रेऽनामयमात्मनस्ते"},{"b":3565,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.19"],"text":"विच्छायासि म्लायतेषन्मुखेन।"},{"b":3566,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.19"],"text":"आलक्षये भवतीमन्तराधिं"},{"b":3567,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.19"],"text":"दूरे बन्धुं शोचसि कञ्चनाम्ब॥ १९"},{"b":3568,"kind":"hindi_commentary","page":160,"explains":["1.16.19"],"text":"धर्मने कहा—कल्याणि! कुशलसे तो हो न? तुम्हारा मुख कुछ-कुछ मलिन हो रहा है। तुम श्रीहीन हो रही हो, मालूम होता है तुम्हारे हृदयमें कुछ-न-कुछ दुःख अवश्य है। क्या तुम्हारा कोई सम्बन्धी दूर देशमें चला गया है, जिसके लिये तुम इतनी चिन्ता कर रही हो?॥ १९॥"},{"b":3569,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.20"],"text":"पादैर्न्यूनं शोचसि मैकपाद-"},{"b":3570,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.20"],"text":"मात्मानं वा वृषलैर्भोक्ष्यमाणम्।"},{"b":3571,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.20"],"text":"आहो सुरादीन् हृतयज्ञभागान्"},{"b":3572,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.20"],"text":"प्रजा उत स्विन्मघवत्यवर्षति॥ २०"},{"b":3573,"kind":"hindi_commentary","page":160,"explains":["1.16.20"],"text":"कहीं तुम मेरी तो चिन्ता नहीं कर रही हो कि अब इसके तीन पैर टूट गये, एक ही पैर रह गया है? सम्भव है, तुम अपने लिये शोक कर रही हो कि अब शूद्र तुम्हारे ऊपर शासन करेंगे। तुम्हें इन देवताओंके लिये भी खेद हो सकता है, जिन्हें अब यज्ञोंमें आहुति नहीं दी जाती, अथवा उस प्रजाके लिये भी, जो वर्षा न होनेके कारण अकाल एवं दुर्भिक्षसे पीड़ित हो रही है॥ २०॥"},{"b":3574,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.21"],"text":"अरक्ष्यमाणाः स्त्रिय उर्वि बालान्"},{"b":3575,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.21"],"text":"शोचस्यथो पुरुषादैरिवार्तान्।"},{"b":3576,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.21"],"text":"वाचं देवीं ब्रह्मकुले कुकर्म-"},{"b":3577,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.21"],"text":"ण्यब्रह्मण्ये राजकुले कुलाग्र्यान्॥ २१"},{"b":3578,"kind":"hindi_commentary","page":160,"explains":["1.16.21"],"text":"देवि! क्या तुम राक्षस-सरीखे मनुष्योंके द्वारा सतायी हुई अरक्षित स्त्रियों एवं आर्तबालकोंके लिये शोक कर रही हो? सम्भव है, विद्या अब कुकर्मी-ब्राह्मणोंके चंगुलमें पड़ गयी है और ब्राह्मण विप्रद्रोही राजाओंकी सेवा करने लगे हैं, और इसीका तुम्हें दुःख हो॥ २१॥"},{"b":3579,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.22"],"text":"किं क्षत्रबन्धून् कलिनोपसृष्टान्"},{"b":3580,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.22"],"text":"राष्ट्राणि वा तैरवरोपितानि।"},{"b":3581,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.22"],"text":"इतस्ततो वाशनपानवासः-"},{"b":3582,"kind":"sanskrit_shloka","page":160,"verses":["1.16.22"],"text":"स्नानव्यवायोन्मुखजीवलोकम्॥ २२"},{"b":3583,"kind":"hindi_commentary","page":160,"explains":["1.16.22"],"text":"आजके नाममात्रके राजा तो सोलहों आने कलियुगी हो गये हैं, उन्होंने बड़े-बड़े देशोंको भी उजाड़ डाला है। क्या तुम उन राजाओं या देशोंके लिये शोक कर रही हो? आजकी जनता खान-पान, वस्त्र, स्नान और स्त्री-सहवास आदिमें शास्त्रीय नियमोंका पालन न करके स्वेच्छाचार कर रही है; क्या इसके लिये तुम दुःखी हो?॥ २२॥"},{"b":3584,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.23"],"text":"यद्वाम्ब ते भूरिभरावतार-"},{"b":3585,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.23"],"text":"कृतावतारस्य हरेर्धरित्रि।"},{"b":3586,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.23"],"text":"अन्तर्हितस्य स्मरती विसृष्टा"},{"b":3587,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.23"],"text":"कर्माणि निर्वाणविलम्बितानि॥ २३"},{"b":3588,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.24"],"text":"इदं ममाचक्ष्व तवाधिमूलं"},{"b":3589,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.24"],"text":"वसुन्धरे येन विकर्शितासि।"},{"b":3590,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.24"],"text":"कालेन वा ते बलिनां बलीयसा"},{"b":3591,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.24"],"text":"सुरार्चितं किं हृतमम्ब सौभगम्॥ २४"},{"b":3592,"kind":"hindi_commentary","page":161,"explains":["1.16.23","1.16.24"],"text":"मा पृथ्वी! अब समझमें आया, हो-न-हो तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णकी याद आ रही होगी; क्योंकि उन्होंने तुम्हारा भार उतारनेके लिये ही अवतार लिया था और ऐसी लीलाएँ की थीं, जो मोक्षका भी अवलम्बन हैं। अब उनके लीला-संवरण कर लेनेपर उनके परित्यागसे तुम दुःखी हो रही हो॥ २३॥ देवि! तुम तो धन-रत्नोंकी खान हो। तुम अपने क्लेशका कारण, जिससे तुम इतनी दुर्बल हो गयी हो, मुझे बतलाओ। मालूम होता है, बड़े-बड़े बलवानोंको भी हरा देनेवाले कालने देवताओंके द्वारा वन्दनीय तुम्हारे सौभाग्यको छीन लिया है॥ २४॥"},{"b":3593,"kind":"topic_heading","page":161,"text":"धरण्युवाच"},{"b":3594,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.25"],"text":"भवान् हि वेद तत्सर्वं यन्मां धर्मानुपृच्छसि।"},{"b":3595,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.25"],"text":"चतुर्भिर्वर्तसे येन पादैर्लोकसुखावहैः॥ २५"},{"b":3596,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.26"],"text":"सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः सन्तोष आर्जवम्।"},{"b":3597,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.26"],"text":"शमो दमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम्॥ २६"},{"b":3598,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.27"],"text":"ज्ञानं विरक्तिरैश्‍वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः।"},{"b":3599,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.27"],"text":"स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च॥ २७"},{"b":3600,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.28"],"text":"प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः।"},{"b":3601,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.28"],"text":"गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः॥ २८"},{"b":3602,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.29"],"text":"एते चान्ये च भगवन्‍नित्या यत्र महागुणाः।"},{"b":3603,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.29"],"text":"प्रार्थ्या महत्त्वमिच्छद्भिर्न वियन्ति स्म कर्हिचित्॥ २९"},{"b":3604,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.30"],"text":"तेनाहं गुणपात्रेण श्रीनिवासेन साम्प्रतम्।"},{"b":3605,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.30"],"text":"शोचामि रहितं लोकं पाप्मना कलिनेक्षितम्॥ ३०"},{"b":3606,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.31"],"text":"आत्मानं चानुशोचामि भवन्तं चामरोत्तमम्।"},{"b":3607,"kind":"sanskrit_shloka","page":161,"verses":["1.16.31"],"text":"देवान् पितॄनृषीन् साधून् सर्वान् वर्णांस्तथाऽऽश्रमान्॥ ३१"},{"b":3608,"kind":"hindi_commentary","page":161,"explains":["1.16.25","1.16.26","1.16.27","1.16.28","1.16.29","1.16.30","1.16.31"],"text":"पृथ्वीने कहा—धर्म! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो। जिन भगवान्‌के सहारे तुम सारे संसारको सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणोंसे युक्त थे, जिनमें सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, शम, दम, तप, समता, तितिक्षा, उपरति, शास्त्रविचार, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, निर्भीकता, विनय, शील, साहस, उत्साह, बल, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उनतालीस अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषोंके द्वारा वाञ्छनीय (शरणागतवत्सलता आदि) और भी बहुत-से महान् गुण उनकी सेवा करनेके लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षणके लिये भी उनसे अलग नहीं होते—उन्हीं समस्त गुणोंके आश्रय, सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्णने इस समय इस लोकसे अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है॥ २५—३०॥ अपने लिये, देवताओंमें श्रेष्ठ तुम्हारे लिये, देवता, पितर, ऋषि, साधु और समस्त वर्णों तथा आश्रमोंके मनुष्योंके लिये मैं शोकग्रस्त हो रही हूँ॥ ३१॥"},{"b":3609,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.32"],"text":"ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्ष-"},{"b":3610,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.32"],"text":"कामास्तपः समचरन् भगवत्प्रपन्‍नाः।"},{"b":3611,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.32"],"text":"सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय"},{"b":3612,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.32"],"text":"यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता॥ ३२"},{"b":3613,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.33"],"text":"तस्याहमब्जकुलिशाङ्कुशकेतुकेतैः"},{"b":3614,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.33"],"text":"श्रीमत्पदैर्भगवतः समलङ्कृताङ्गी।"},{"b":3615,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.33"],"text":"त्रीनत्यरोच उपलभ्य ततो विभूतिं"},{"b":3616,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.33"],"text":"लोकान् स मां व्यसृजदुत्स्मयतीं तदन्ते॥ ३३"},{"b":3617,"kind":"hindi_commentary","page":162,"explains":["1.16.32","1.16.33"],"text":"जिनका कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मा आदि देवता भगवान्‌के शरणागत होकर बहुत दिनोंतक तपस्या करते रहे, वही लक्ष्मीजी अपने निवासस्थान कमलवनका परित्याग करके बड़े प्रेमसे जिनके चरणकमलोंकी सुभग छत्रछायाका सेवन करती हैं, उन्हीं भगवान्‌के कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि चिह्नोंसे युक्त श्रीचरणोंसे विभूषित होनेके कारण मुझे महान् वैभव प्राप्त हुआ था और मेरी तीनों लोकोंसे बढ़कर शोभा हुई थी; परन्तु मेरे सौभाग्यका अब अन्त हो गया! भगवान्‌ने मुझ अभागिनीको छोड़ दिया! मालूम होता है मुझे अपने सौभाग्यपर गर्व हो गया था, इसीलिये उन्होंने मुझे यह दण्ड दिया है॥ ३२-३३॥"},{"b":3618,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.34"],"text":"यो वै ममातिभरमासुरवंशराज्ञा-"},{"b":3619,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.34"],"text":"मक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्रः।"},{"b":3620,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.34"],"text":"त्वां दुःस्थमूनपदमात्मनि पौरुषेण"},{"b":3621,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.34"],"text":"सम्पादयन् यदुषु रम्यमबिभ्रदङ्गम्॥ ३४"},{"b":3622,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.35"],"text":"का वा सहेत विरहं पुरुषोत्तमस्य"},{"b":3623,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.35"],"text":"प्रेमावलोकरुचिरस्मितवल्गुजल्पैः।"},{"b":3624,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.35"],"text":"स्थैर्यं समानमहरन्मधुमानिनीनां"},{"b":3625,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.35"],"text":"रोमोत्सवो मम यदङ्‌घ्रि विटङ्कितायाः॥ ३५"},{"b":3626,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.36"],"text":"तयोरेवं कथयतोः पृथिवीधर्मयोस्तदा।"},{"b":3627,"kind":"sanskrit_shloka","page":162,"verses":["1.16.36"],"text":"परीक्षिन्‍नाम राजर्षिः प्राप्तः प्राचीं सरस्वतीम्॥ ३६"},{"b":3628,"kind":"hindi_commentary","page":162,"explains":["1.16.34","1.16.35","1.16.36"],"text":"तुम अपने तीन चरणोंके कम हो जानेसे मन-ही-मन कुढ़ रहे थे; अतः अपने पुरुषार्थसे तुम्हें अपने ही अन्दर पुनः सब अंगोंसे पूर्ण एवं स्वस्थ कर देनेके लिये वे अत्यन्त रमणीय श्यामसुन्दर विग्रहसे यदुवंशमें प्रकट हुए और मेरे बड़े भारी भारको, जो असुरवंशी राजाओंकी सैकड़ों अक्षौहिणियोंके रूपमें था, नष्ट कर डाला। क्योंकि वे परम स्वतन्त्र थे॥ ३४॥ जिन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवन, मनोहर मुसकान और मीठी-मीठी बातोंसे सत्यभामा आदि मधुमयी मानिनियोंके मानके साथ धीरजको भी छीन लिया था और जिनके चरणकमलोंके स्पर्शसे मैं निरन्तर आनन्दसे पुलकित रहती थी, उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका विरह भला कौन सह सकती है॥ ३५॥ धर्म और पृथ्वी इस प्रकार आपसमें बातचीत कर ही रहे थे कि उसी समय राजर्षि परीक्षित् पूर्ववाहिनी सरस्वतीके तटपर आ पहुँचे॥ ३६॥"},{"b":3629,"kind":"hindi_translation","page":162,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पृथ्वीधर्मसंवादो नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥"}],"notes":[{"id":"v1:141","mark":"१","page":158,"after_verse":"1.16.5","text":"प्रा० पा०—विष्णु।"},{"id":"v1:142","mark":"२","page":158,"after_verse":"1.16.8","text":"प्रा० पा०—भगवानुपहूतो महर्षिभिः।"},{"id":"v1:143","mark":"१","page":159,"after_verse":"1.16.10","text":"प्रा० पा०—शौण्ड आददे।"},{"id":"v1:144","mark":"२","page":159,"after_verse":"1.16.13","text":"प्रा० पा०—गीयमानं च पुरतः।"},{"id":"v1:145","mark":"३","page":159,"after_verse":"1.16.16","text":"प्रा० पा०—स्म।"},{"id":"v1:146","mark":"१","page":161,"after_verse":null,"text":"प्रा० पा०—धरोवाच।"},{"id":"v1:147","mark":"२","page":161,"after_verse":"1.16.25","text":"प्रा० पा०—भवानेव हि तद्वेद यन्मां।"},{"id":"v1:148","mark":"३","page":161,"after_verse":"1.16.26","text":"प्रा० पा०—दानं त्यागः।"},{"id":"v1:149","mark":"४","page":161,"after_verse":"1.16.27","text":"प्रा० पा०—धृतिः।"},{"id":"v1:150","mark":"५","page":161,"after_verse":"1.16.27","text":"प्रा० पा०—कान्तिः सौभाग्यं मार्दवं क्षमा।"},{"id":"v1:151","mark":"६","page":161,"after_verse":"1.16.29","text":"प्रा० पा०—इमे।"},{"id":"v1:152","mark":"१","page":162,"after_verse":"1.16.32","text":"प्रा० पा०—यदनिशं।"},{"id":"v1:153","mark":"२","page":162,"after_verse":"1.16.32","text":"प्रा० पा०—तपोव्रतधरा भगव०।"},{"id":"v1:154","mark":"३","page":162,"after_verse":"1.16.33","text":"प्रा० पा०—तपोविभूतिं।"},{"id":"v1:155","mark":"४","page":162,"after_verse":null,"text":"प्रा० पा०—पारिक्षिते षोड०।"}],"corrections":{"count":4,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}