परीक्षित्! भगवान्ने राजा खट्वांगकी बुद्धिको पहलेसे ही अपनी ओर आकर्षित कर रखा था। इसीसे वे अन्त समयमें ऐसा निश्चय कर सके। अब उन्होंने शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमें जो अज्ञानमूलक आत्मभाव था, उसका परित्याग कर दिया और अपने वास्तविक आत्मस्वरूपमें स्थित हो गये॥ ४८॥
इति व्यवसितो बुद्ध्या नारायणगृहीतया।
हित्वान्यभावमज्ञानं ततः स्वं भावमाश्रितः॥ ४८
परीक्षित्! भगवान्ने राजा खट्वांगकी बुद्धिको पहलेसे ही अपनी ओर आकर्षित कर रखा था। इसीसे वे अन्त समयमें ऐसा निश्चय कर सके। अब उन्होंने शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमें जो अज्ञानमूलक आत्मभाव था, उसका परित्याग कर दिया और अपने वास्तविक आत्मस्वरूपमें स्थित हो गये॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.9.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 51) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/48/