श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.9.48

नवम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

इति व्यवसितो बुद्ध्या नारायणगृहीतया।

हित्वान्यभावमज्ञानं ततः स्वं भावमाश्रितः॥ ४८

iti vyavasito buddhyā nārāyaṇagṛhītayā|

hitvānyabhāvamajñānaṃ tataḥ svaṃ bhāvamāśritaḥ|| 48

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌ने राजा खट्वांगकी बुद्धिको पहलेसे ही अपनी ओर आकर्षित कर रखा था। इसीसे वे अन्त समयमें ऐसा निश्‍चय कर सके। अब उन्होंने शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमें जो अज्ञानमूलक आत्मभाव था, उसका परित्याग कर दिया और अपने वास्तविक आत्मस्वरूपमें स्थित हो गये॥ ४८॥

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