युद्धमें उन्हें कोई जीत नहीं सकता था। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे दैत्योंका वध किया था। जब उन्हें देवताओंसे यह मालूम हुआ कि अब मेरी आयु केवल दो ही घड़ी बाकी है, तब वे अपनी राजधानी लौट आये और अपने मनको उन्होंने भगवान्में लगा दिया॥ ४२॥
यो देवैरर्थितो दैत्यानवधीद् युधि दुर्जयः।
मुहूर्तमायुर्ज्ञात्वैत्य स्वपुरं संदधे मनः॥ ४२
युद्धमें उन्हें कोई जीत नहीं सकता था। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे दैत्योंका वध किया था। जब उन्हें देवताओंसे यह मालूम हुआ कि अब मेरी आयु केवल दो ही घड़ी बाकी है, तब वे अपनी राजधानी लौट आये और अपने मनको उन्होंने भगवान्में लगा दिया॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.9.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 50) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/42/