श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.9.42

नवम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यो देवैरर्थितो दैत्यानवधीद् युधि दुर्जयः।

मुहूर्तमायुर्ज्ञात्वैत्य स्वपुरं संदधे मनः॥ ४२

yo devairarthito daityānavadhīd yudhi durjayaḥ|

muhūrtamāyurjñātvaitya svapuraṃ saṃdadhe manaḥ|| 42

अर्थ

युद्धमें उन्हें कोई जीत नहीं सकता था। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे दैत्योंका वध किया था। जब उन्हें देवताओंसे यह मालूम हुआ कि अब मेरी आयु केवल दो ही घड़ी बाकी है, तब वे अपनी राजधानी लौट आये और अपने मनको उन्होंने भगवान्‌में लगा दिया॥ ४२॥

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