॥ श्रीहरिः ॥
तत्रासीनं मुनिं वीक्ष्य कपिलाख्यमधोक्षजम्।
अस्तौत् समाहितमनाः प्रांजलिः प्रणतो महान्॥ २१
tatrāsīnaṃ muniṃ vīkṣya kapilākhyamadhokṣajam|
astaut samāhitamanāḥ prāṃjaliḥ praṇato mahān|| 21
अर्थ
वहीं भगवान्के अवतार कपिलमुनि बैठे हुए थे। उनको देखकर उदारहृदय अंशुमान्ने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर एकाग्र मनसे उनकी स्तुति की॥ २१॥
तत्रासीनं मुनिं वीक्ष्य कपिलाख्यमधोक्षजम्।
अस्तौत् समाहितमनाः प्रांजलिः प्रणतो महान्॥ २१
वहीं भगवान्के अवतार कपिलमुनि बैठे हुए थे। उनको देखकर उदारहृदय अंशुमान्ने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर एकाग्र मनसे उनकी स्तुति की॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.8.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 43) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/8/21/