॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.8.11
हन्यतां हन्यतां पाप इति षष्टिसहस्रिणः।
उदायुधा अभिययुरुन्मिमेष तदा मुनिः॥ ११
hanyatāṃ hanyatāṃ pāpa iti ṣaṣṭisahasriṇaḥ|
udāyudhā abhiyayurunmimeṣa tadā muniḥ|| 11
अर्थ
खोदते-खोदते उन्हें पूर्व और उत्तरके कोनेपर कपिलमुनिके पास अपना घोड़ा दिखायी दिया। घोड़ेको देखकर वे साठ हजार राजकुमार शस्त्र उठाकर यह कहते हुए उनकी ओर दौड़ पड़े कि ‘यही हमारे घोड़ेको चुरानेवाला चोर है। देखो तो सही, इसने इस समय कैसे आँखें मूँद रखी हैं! यह पापी है। इसको मार डालो, मार डालो!’ उसी समय कपिलमुनिने अपनी पलकें खोलीं॥ १०-११॥