हरिश्चन्द्रके कोई सन्तान न थी। इससे वे बहुत उदास रहा करते थे। नारदके उपदेशसे वे वरुणदेवताकी शरणमें गये और उनसे प्रार्थना की कि ‘प्रभो! मुझे पुत्र प्राप्त हो॥ ८॥✎ 16372046
सोऽनपत्यो विषण्णात्मा नारदस्योपदेशतः।
वरुणं शरणं यातः पुत्रो मे जायतां प्रभो॥ ८
हरिश्चन्द्रके कोई सन्तान न थी। इससे वे बहुत उदास रहा करते थे। नारदके उपदेशसे वे वरुणदेवताकी शरणमें गये और उनसे प्रार्थना की कि ‘प्रभो! मुझे पुत्र प्राप्त हो॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.7.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 39) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/7/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)