श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.23

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

जमदग्‍निरभूद् ब्रह्मा वसिष्ठोऽयास्यसामगः।

तस्मै तुष्टो ददाविन्द्रः शातकौम्भमयं रथम्॥ २३

jamadagnirabhūd brahmā vasiṣṭho'yāsyasāmagaḥ|

tasmai tuṣṭo dadāvindraḥ śātakaumbhamayaṃ ratham|| 23

अर्थ

इस प्रकार छः वर्षतक रोहित वनमें ही रहा। सातवें वर्ष जब वह अपने नगरको लौटने लगा, तब उसने अजीगर्तसे उनके मझले पुत्र शुनःशेपको मोल ले लिया और उसे यज्ञपशु बनानेके लिये अपने पिताको सौंपकर उनके चरणोंमें नमस्कार किया। तब परम यशस्वी एवं श्रेष्ठ चरित्रवाले राजा हरिश्‍चन्द्रने महोदर रोगसे छूटकर पुरुषमेध यज्ञद्वारा वरुण आदि देवताओंका यजन किया। उस यज्ञमें विश्‍वामित्रजी होता हुए। परम संयमी जमदग्‍निने अध्वर्युका काम किया। वसिष्ठजी ब्रह्मा बने और अयास्य मुनि सामगान करनेवाले उद्गाता बने। उस समय इन्द्रने प्रसन्‍न होकर हरिश्‍चन्द्रको एक सोनेका रथ दिया था॥ २०—२३॥

यह अर्थ श्लोक 20–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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