श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.2

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तस्य सोद्यमनं१ वीक्ष्य पादस्पर्शविलज्जितः२।

अस्तावीत् तद्धरेरस्त्रं कृपया पीडितो भृशम्॥ २

tasya sodyamanaṃ vīkṣya pādasparśavilajjitaḥ|

astāvīt taddharerastraṃ kṛpayā pīḍito bhṛśam|| 2

अर्थ

दुर्वासाजीकी यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकड़नेसे लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान्‌के चक्रकी स्तुति करने लगे। उस समय उनका हृदय दयावश अत्यन्त पीड़ित हो रहा था॥ २॥✎ 2044

टिप्पणियाँ

  1. १

    तद‍्व्यसनं।

    (मुद्रित पृष्ठ 28)
  2. २

    स्पर्शेन लज्जि०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 28)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2044 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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