दुर्वासाजीकी यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकड़नेसे लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान्के चक्रकी स्तुति करने लगे। उस समय उनका हृदय दयावश अत्यन्त पीड़ित हो रहा था॥ २॥✎ 2044
तस्य सोद्यमनं वीक्ष्य पादस्पर्शविलज्जितः।
अस्तावीत् तद्धरेरस्त्रं कृपया पीडितो भृशम्॥ २
दुर्वासाजीकी यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकड़नेसे लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान्के चक्रकी स्तुति करने लगे। उस समय उनका हृदय दयावश अत्यन्त पीड़ित हो रहा था॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.5.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 28) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/5/2/