॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.5.15
दुष्करः को नु साधूनां दुस्त्यजो वा महात्मनाम्।
यैः संगृहीतो भगवान् सात्वतामृषभो हरिः॥ १५
duṣkaraḥ ko nu sādhūnāṃ dustyajo vā mahātmanām|
yaiḥ saṃgṛhīto bhagavān sātvatāmṛṣabho hariḥ|| 15
अर्थ
जिन्होंने भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरिके चरण-कमलोंको दृढ़ प्रेमभावसे पकड़ लिया है—उन साधुपुरुषोंके लिये कौन-सा कार्य कठिन है? जिनका हृदय उदार है, वे महात्मा भला, किस वस्तुका परित्याग नहीं कर सकते?॥ १५॥