श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.67

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

मत्सेवया प्रतीतं च सालोक्यादिचतुष्टयम्।

नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविद्रुतम्॥ ६७

matsevayā pratītaṃ ca sālokyādicatuṣṭayam|

necchanti sevayā pūrṇāḥ kuto'nyat kālavidrutam|| 67

अर्थ

मेरे अनन्यप्रेमी भक्त सेवासे ही अपनेको परिपूर्ण—कृतकृत्य मानते हैं। मेरी सेवाके फलस्वरूप जब उन्हें सालोक्य, सारूप्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं तब वे उन्हें भी स्वीकार करना नहीं चाहते; फिर समयके फेरसे नष्ट हो जानेवाली वस्तुओंकी तो बात ही क्या है॥ ६७॥

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