श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.65

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम्।

हित्वा मां शरणं याताः कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे॥ ६५

ye dārāgāraputrāptān prāṇān vittamimaṃ param|

hitvā māṃ śaraṇaṃ yātāḥ kathaṃ tāṃstyaktumutsahe|| 65

अर्थ

जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक—सबको छोड़कर केवल मेरी शरणमें आ गये हैं, उन्हें छोड़नेका संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ?॥ ६५॥

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