श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.56

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीरुद्र उवाच

वयं न तात प्रभवाम भूम्‍नि

यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशाः।

भवन्ति काले न भवन्ति हीदृशाः

सहस्रशो यत्र वयं भ्रमामः॥ ५६

vayaṃ na tāta prabhavāma bhūmni

yasmin pare'nye'pyajajīvakośāḥ|

bhavanti kāle na bhavanti hīdṛśāḥ

sahasraśo yatra vayaṃ bhramāmaḥ|| 56

अर्थ

श्रीमहादेवजीने कहा—‘दुर्वासाजी! जिन अनन्त परमेश्‍वरमें ब्रह्मा-जैसे जीव और उनके उपाधिभूत कोश, इस ब्रह्माण्डके समान ही अनेकों ब्रह्माण्ड समयपर पैदा होते हैं और समय आनेपर फिर उनका पता भी नहीं चलता, जिनमें हमारे-जैसे हजारों चक्कर काटते रहते हैं—उन प्रभुके सम्बन्धमें हम कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते॥ ५६॥

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