॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.4.54
अहं भवो दक्षभृगुप्रधानाः
प्रजेशभूतेशसुरेशमुख्याः ।
सर्वे वयं यन्नियमं प्रपन्ना
मूर्ध्न्यर्पितं लोकहितं वहामः॥ ५४
ahaṃ bhavo dakṣabhṛgupradhānāḥ
prajeśabhūteśasureśamukhyāḥ |
sarve vayaṃ yanniyamaṃ prapannā
mūrdhnyarpitaṃ lokahitaṃ vahāmaḥ|| 54
अर्थ
मैं, शंकरजी, दक्ष-भृगु आदि प्रजापति, भूतेश्वर, देवेश्वर आदि सब जिनके बनाये नियमोंमें बँधे हैं तथा जिनकी आज्ञा शिरोधार्य करके हमलोग संसारका हित करते हैं, (उनके भक्तके द्रोहीको बचानेके लिये हम समर्थ नहीं हैं)’॥ ५४॥✎ 1635