ऐसा निश्चय करके मन-ही-मन भगवान्का चिन्तन करते हुए राजर्षि अम्बरीषने जल पी लिया और परीक्षित्! वे केवल दुर्वासाजीके आनेकी बाट देखने लगे॥ ४१॥ दुर्वासाजी आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होकर यमुनातटसे लौट आये। जब राजाने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया तब उन्होंने अनुमानसे ही समझ लिया कि राजाने पारण कर लिया है॥ ४२॥
यह व्याख्या श्लोक 9.4.41 से 9.4.42 तककी एक साथ है।
इत्यपः प्राश्य राजर्षिश्चिन्तयन् मनसाच्युतम्।
प्रत्यचष्ट कुरुश्रेष्ठ द्विजागमनमेव सः॥ ४१
ऐसा निश्चय करके मन-ही-मन भगवान्का चिन्तन करते हुए राजर्षि अम्बरीषने जल पी लिया और परीक्षित्! वे केवल दुर्वासाजीके आनेकी बाट देखने लगे॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 23) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/41/