श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.16

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

मेनेऽतिदुर्लभं पुंसां सर्वं तत् स्वप्नसंस्तुतम्।

विद्वान् विभवनिर्वाणं तमो विशति यत् पुमान्॥ १६

mene'tidurlabhaṃ puṃsāṃ sarvaṃ tat svapnasaṃstutam|

vidvān vibhavanirvāṇaṃ tamo viśati yat pumān|| 16

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! अम्बरीष बड़े भाग्यवान् थे। पृथ्वीके सातों द्वीप, अचल सम्पत्ति और अतुलनीय ऐश्‍वर्य उनको प्राप्त था। यद्यपि ये सब साधारण मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ वस्तुएँ हैं, फिर भी वे इन्हें स्वप्नतुल्य समझते थे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस धन-वैभवके लोभमें पड़कर मनुष्य घोर नरकमें जाता है, वह केवल चार दिनकी चाँदनी है। उसका दीपक तो बुझा-बुझाया है॥ १५-१६॥

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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