॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.3.32
अहो राजन् निरुद्धास्ते कालेन हृदि ये कृताः।
तत्पुत्रपौत्रनप्तॄणां गोत्राणि च न शृण्महे॥ ३२
aho rājan niruddhāste kālena hṛdi ye kṛtāḥ|
tatputrapautranaptṝṇāṃ gotrāṇi ca na śṛṇmahe|| 32
अर्थ
‘महाराज! तुमने अपने मनमें जिन लोगोंके विषयमें सोच रखा था, वे सब तो कालके गालमें चले गये। अब उनके पुत्र, पौत्र अथवा नातियोंकी तो बात ही क्या है, गोत्रोंके नाम भी नहीं सुनायी पड़ते॥ ३२॥