श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.10

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सुकन्या च्यवनं प्राप्य पतिं परमकोपनम्।

प्रीणयामास चित्तज्ञा अप्रमत्तानुवृत्तिभिः॥ १०

sukanyā cyavanaṃ prāpya patiṃ paramakopanam|

prīṇayāmāsa cittajñā apramattānuvṛttibhiḥ|| 10

अर्थ

इधर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनिको अपने पतिके रूपमें प्राप्त करके बड़ी सावधानीसे उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्‍न करने लगी। वह उनकी मनोवृत्तिको जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी॥ १०॥✎ 1631

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1631 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तुम-लोगोंने → तुमलोगोंने

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