एक बार तो लगातार अड़तालीस दिन ऐसे बीत गये कि उन्हें पानीतक पीनेको न मिला। उनचासवें दिन प्रातःकाल ही उन्हें कुछ घी, खीर, हलवा और जल मिला॥ ४॥
व्यतीयुरष्टचत्वारिंशदहान्यपिबतः किल।
घृतपायससंयावं तोयं प्रातरुपस्थितम्॥ ४
एक बार तो लगातार अड़तालीस दिन ऐसे बीत गये कि उन्हें पानीतक पीनेको न मिला। उनचासवें दिन प्रातःकाल ही उन्हें कुछ घी, खीर, हलवा और जल मिला॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.21.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 100) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/21/4/