चाण्डालकी वह करुणापूर्ण वाणी जिसके उच्चारणमें भी वह अत्यन्त कष्ट पा रहा था, सुनकर रन्तिदेव दयासे अत्यन्त सन्तप्त हो उठे और ये अमृतमय वचन कहने लगे॥ ११॥✎ 881
तस्य तां करुणां वाचं निशम्य विपुलश्रमाम्।
कृपया भृशसन्तप्त इदमाहामृतं वचः॥ ११
चाण्डालकी वह करुणापूर्ण वाणी जिसके उच्चारणमें भी वह अत्यन्त कष्ट पा रहा था, सुनकर रन्तिदेव दयासे अत्यन्त सन्तप्त हो उठे और ये अमृतमय वचन कहने लगे॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.21.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 101) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/21/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)