उनके राज्यमें पृथ्वी और आकाश प्रजाकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण कर देते थे। भरतने सत्ताईस हजार वर्षतक समस्त दिशाओंका एकछत्र शासन किया॥ ३२॥✎ 1647
सर्वकामान् दुदुहतुः प्रजानां तस्य रोदसी।
समास्त्रिणवसाहस्रीर्दिक्षु चक्रमवर्तयत्॥ ३२
उनके राज्यमें पृथ्वी और आकाश प्रजाकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण कर देते थे। भरतने सत्ताईस हजार वर्षतक समस्त दिशाओंका एकछत्र शासन किया॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.20.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 98) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/20/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)