उस बकरीका स्वामी एक ब्राह्मण था। उसने क्रोधमें आकर बकरेके लटकते हुए अण्डकोषको काट दिया। परन्तु फिर उस बकरीका ही भला करनेके लिये फिरसे उसे जोड़ भी दिया। उसे इस प्रकारके बहुत-से उपाय मालूम थे॥ १०॥
तस्यास्तत्र द्विजः कश्चिदजास्वाम्यच्छिनद् रुषा।
लम्बन्तं वृषणं भूयः सन्दधेऽर्थाय योगवित्॥ १०
उस बकरीका स्वामी एक ब्राह्मण था। उसने क्रोधमें आकर बकरेके लटकते हुए अण्डकोषको काट दिया। परन्तु फिर उस बकरीका ही भला करनेके लिये फिरसे उसे जोड़ भी दिया। उसे इस प्रकारके बहुत-से उपाय मालूम थे॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.19.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 93) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/19/10/