श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.7

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

देवयान्या पुरोद्याने पुष्पितद्रुमसंकुले।

व्यचरत् कलगीतालिनलिनीपुलिनेऽबला॥ ७

devayānyā purodyāne puṣpitadrumasaṃkule|

vyacarat kalagītālinalinīpuline'balā|| 7

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! दानवराज वृषपर्वाकी एक बड़ी मानिनी कन्या थी। उसका नाम था शर्मिष्ठा। वह एक दिन अपनी गुरुपुत्री देवयानी और हजारों सखियोंके साथ अपनी राजधानीके श्रेष्ठ उद्यानमें टहल रही थी। उस उद्यानमें सुन्दर-सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए अनेकों वृक्ष थे। उसमें एक बड़ा ही सुन्दर सरोवर था। सरोवरमें कमल खिले हुए थे और उनपर बड़े ही मधुर स्वरसे भौंरे गुंजार कर रहे थे। उसकी ध्वनिसे सरोवरका तट गूँज रहा था॥ ६-७॥

यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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