श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.49

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यस्मिन्‍निदं विरचितं व्योम्‍नीव जलदावलिः।

नानेव भाति नाभाति स्वप्नमायामनोरथः॥ ४९

yasminnidaṃ viracitaṃ vyomnīva jaladāvaliḥ|

nāneva bhāti nābhāti svapnamāyāmanorathaḥ|| 49

अर्थ

जैसे आकाशमें दल-के-दल बादल दीखते हैं और कभी नहीं भी दीखते, वैसे ही परमात्माके स्वरूपमें यह जगत् स्वप्न, माया और मनोराज्यके समान कल्पित है। यह कभी अनेक नाम और रूपोंके रूपमें प्रतीत होता है और कभी नहीं भी॥ ४९॥

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