श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.43

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

पूरुरुवाच

को नु लोके मनुष्येन्द्र पितुरात्मकृतः पुमान्।

प्रतिकर्तुं क्षमो यस्य प्रसादाद् विन्दते परम्॥ ४३

ko nu loke manuṣyendra piturātmakṛtaḥ pumān|

pratikartuṃ kṣamo yasya prasādād vindate param|| 43

अर्थ

पूरुने कहा—‘पिताजी! पिताकी कृपासे मनुष्यको परमपदकी प्राप्ति हो सकती है। वास्तवमें पुत्रका शरीर पिताका ही दिया हुआ है। ऐसी अवस्थामें ऐसा कौन है, जो इस संसारमें पिताके उपकारोंका बदला चुका सके?॥ ४३॥

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