श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.40

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यदुरुवाच

नोत्सहे जरसा स्थातुमन्तरा प्राप्तया तव।

अविदित्वा सुखं ग्राम्यं वैतृष्ण्यं नैति पूरुषः॥ ४०

notsahe jarasā sthātumantarā prāptayā tava|

aviditvā sukhaṃ grāmyaṃ vaitṛṣṇyaṃ naiti pūruṣaḥ|| 40

अर्थ

यदुने कहा—‘पिताजी! बिना समयके ही प्राप्त हुआ आपका बुढ़ापा लेकर तो मैं जीना भी नहीं चाहता। क्योंकि कोई भी मनुष्य जबतक विषय-सुखका अनुभव नहीं कर लेता, तबतक उसे उससे वैराग्य नहीं होता’॥ ४०॥

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