॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.18.22
न ब्राह्मणो मे भविता हस्तग्राहो महाभुज।
कचस्य बार्हस्पत्यस्य शापाद् यमशपं पुरा॥ २२
na brāhmaṇo me bhavitā hastagrāho mahābhuja|
kacasya bārhaspatyasya śāpād yamaśapaṃ purā|| 22
अर्थ
वीरश्रेष्ठ! पहले मैंने बृहस्पतिके पुत्र कचको शाप दे दिया था, इसपर उसने भी मुझे शाप दे दिया। इसी कारण ब्राह्मण मेरा पाणिग्रहण नहीं कर सकता’*॥ २२॥
टिप्पणियाँ
- *
बृहस्पतिजीका पुत्र कच शुक्राचार्यजीसे मृतसंजीवनी विद्या पढ़ता था। अध्ययन समाप्त करके जब वह अपने घर जाने लगा तो देवयानीने उसे वरण करना चाहा। परन्तु गुरुपुत्री होनेके कारण कचने उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इसपर देवयानीने उसे शाप दे दिया कि ‘तुम्हारी पढ़ी हुई विद्या निष्फल हो जाय।’ कचने भी उसे शाप दिया कि ‘कोई भी ब्राह्मण तुम्हें पत्नीरूपमें स्वीकार न करेगा।’