श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.17.15

नवम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

त्रिविष्टपं महेन्द्राय यज्ञभागान् समाददुः।

गुरुणा हूयमानेऽ‌ग्‍नौ बलभित् तनयान् रजेः॥ १५

triviṣṭapaṃ mahendrāya yajñabhāgān samādaduḥ|

guruṇā hūyamāne'gnau balabhit tanayān rajeḥ|| 15

अर्थ

देवताओंकी प्रार्थनासे रजिने दैत्योंका वध करके इन्द्रको स्वर्गका राज्य दिया। परन्तु वे अपने प्रह्लाद आदि शत्रुओंसे भयभीत रहते थे, इसलिये उन्होंने वह स्वर्ग फिर रजिको लौटा दिया और उनके चरण पकड़कर उन्हींको अपनी रक्षाका भार भी सौंप दिया। जब रजिकी मृत्यु हो गयी, तब इन्द्रके माँगनेपर भी रजिके पुत्रोंने स्वर्ग नहीं लौटाया। वे स्वयं ही यज्ञोंका भाग भी ग्रहण करने लगे। तब गुरु बृहस्पतिजीने इन्द्रकी प्रार्थनासे अभिचारविधिसे हवन किया। इससे वे धर्मके मार्गसे भ्रष्ट हो गये। तब इन्द्रने अनायास ही उन सब रजिके पुत्रोंको मार डाला। उनमेंसे कोई भी न बचा। क्षत्रवृद्धके पौत्र कुशसे प्रति, प्रतिसे संजय और संजयसे जयका जन्म हुआ॥ १३—१६॥

यह अर्थ श्लोक 13–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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