श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.16.34

नवम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

स होवाच मधुच्छन्दाः सार्धं पंचाशता ततः।✎ 1892

यन्‍नो भवान् संजानीते तस्मिंस्तिष्ठामहे वयम्॥ ३४

sa hovāca madhucchandāḥ sārdhaṃ paṃcāśatā tataḥ|

yanno bhavān saṃjānīte tasmiṃstiṣṭhāmahe vayam|| 34

अर्थ

इस प्रकार जब उनचास भाई म्लेच्छ हो गये तब विश्‍वामित्रजीके बिचले पुत्र मधुच्छन्दाने अपनेसे छोटे पचासों भाइयोंके साथ कहा—‘पिताजी! आप हमलोगोंको जो आज्ञा करते हैं, हम उसका पालन करनेके लिये तैयार हैं’॥ ३४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1892 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पंचाशता: → पंचाशता

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