श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.15.25

नवम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

स२ वीरस्तत्र तद् दृष्ट्वा आत्मैश्‍वर्यातिशायनम्।✎ 970

तन्‍नाद्रियताग्‍निहोत्र्यां साभिलाषः स हैहयः॥ २५

sa vīrastatra tad dṛṣṭvā ātmaiśvaryātiśāyanam|

tannādriyatāgnihotryāṃ sābhilāṣaḥ sa haihayaḥ|| 25

अर्थ

वीर हैहयाधिपतिने देखा कि जमदग्‍नि मुनिका ऐश्‍वर्य तो मुझसे भी बढ़ा-चढ़ा है। इसलिये उसने उनके स्वागत-सत्कारको कुछ भी आदर न देकर कामधेनुको ही ले लेना चाहा॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    स चैश्‍वर्यं तु त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 78)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #970 शब्दोंके बीचका स्थान: सवीरस्तत्र → स वीरस्तत्र

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